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Praintod ond Published
BY
पपा SER KRISHNADAS
SHRI VENKATESHWAR STEAM
PRESS
BOMBAY.
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All nights reserved
॥ श्रीः ॥
पंव्वतन्त्रस् ।
श्रीविष्णुइार्ससंकलितम् ।
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मुरादाबादवास्तन्यकामेश्वरसंस्कृतपाठशालाप्रधाना-
ध्यापकसनातनघधर्समहो पदेशक--
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स्वकोये “अ्रीवेडुटेशवर'! स्टीम्-सुद्रणयन्त्रालये
मुद्यित्वा प्रकाशितम् ।
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सत् १९६६, शके १८३१.
इसका रजिस्टरी हक यन्त्राल्याध्यक्षने
स्वावीन रक््खा हे
भूमिका । .
पाप्या ,
मारतवर्ष जिस प्रकार अनेके विद्याओका भंडार है इसी प्रकार यहांकी
नीतिप्रणाढी मी अद्वितीय हैं, ससारमे रहकर जो नीतिशाखसे बंचित हुआ है
मानो उसने बहुत कुळ नही जाना और एक प्रकारसे मानो संसारमे उसका
आगमन मिरथंक ही है, हमारे इस देशके पूर्वज महानुभाव दिव्यस्वभाव त्रिका-
लक्ष महायागी आचार्थोने जन्समहण करके अपने अनन्त ज्ञानकी महिमासे इस
जगतको अनन्त अवादि जानकर अपने अप्रतिहत योगवळसे ब्रह्म ओर जह्मवि-
षयक सम्पूर्ण तन्त्र निरूपण करादेये है, तवसे लेकर इस प्रथ्वीपर कितनेही
राजाओका आविसोच और तिरोभाव, तथा बसुंवरापर कितनी बार विश्व
और विपर्यय हुआ है तथा जनसमूहका कितनीवार पारिवतन हुआ हे किन्तु
उन महर्पियोके योगबछसे निर्मित वह सकळ ग्रन्थ ध्रुवकी समान प्रकाशमान
होरहेहें, उनके इन ज्ञानपूर्ण रत्नोके कारण आजतक यह भारतभूमि जगत
रत्नमंडार तामस विख्यात है उन्ही अमूल्य रत्नोमेसे यह नीतिमय अन्ध “पेच-
तंत्र” एक अनुपम रत्न है, इसके निर्माण करनेवाले महापंडित विष्णुशर्मा है
यह् अति प्राचीन कालके महापंडित है । इन्होने अति प्राचीन समयके महार्षि
सलु, बृहस्पति, शुक्र, वाल्मीकि, पराशर, व्यास, चाणक्य प्रश्चति महारमाओके
'बहुत काळ पश्चात् जन्मग्रहण किया है, मधुमक्षिका जिस प्रकार अनेक पुष्पेसि
रस ग्रहणकर अपूव मधुकी रचना करती है, विप्णुशमानेभी इसी प्रकार अपन
पूर्ववर्ती पीडितोके शाखसे सार ग्रहण करके पेचतन्त्रको निमोण किया है, इसके
उपदेश सबही अवस्थाम मतुष्यमात्रको उपयोगी हे, क्या योगी, क्या भोगी
सवहीको यह समान उपकारक है । इससे योगी योगासाद्ि, भोगी पवित्र
भोगशाक्ते, रोगी रोगशान्ति, शोकार्त शोकशान्तिको प्राप्त होता हे । राजा,
प्रजा, ग़हस्थ, संन्यासी, पंडित, भूख, धनी, निधन, वाळक, वृद्ध, युवा, आतुर
सवकोही यह स्नेहमयी माताकी समान सुखदायक है। '
राजनीति एकवडा शाख हे संवको पारिश्रमसेभी कठिनतासे आ सकता है
इन महात्मा विष्णुशमाने इसकी इस चतुराइसे निर्माण किया हे कि, छोटीसे
छोटी घुद्धिके मनुष्य भी सरळतासे इसके आशयको समझ सक्ते दे, सम्पूर्ण
नीति कथाओमे ठाकर इस प्रकारस बणतकी है के, जिससे पढेवेवाळिकी
बुद्धि चमत्कृत होजाती है. के
(६) पश्चतन्त्र माषाटीकाकी-
कालक्रमसे इस प्रन्थका सौरभ जव देश विदेशमे वि्काण हुआ तब परदेश
! के अनेक गुणम्राही इस देशमै आकर इस अपूव सको महण करने लमे
कमसे वह और इनका दूसरा मन्थ हितोपदेश प्रथ्वीके नानादेशेसिं अनेक
भाषा और अनेक आकारसे प्रचलित हुए (१) इसकी नीतिगसिंत कथायें
असभ्य जातियोंमें भी अनेक नामसे प्रचलित हुई हैं ।
रेळिया, यूरूप, अमेरिकाआदि सम्पूर्ण देशोंके सम्पूर्ण धर्मावलम्बी ढोक
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सिद्धवाक्यके समान इसके उपदेशोम श्रद्धा और भक्ति करते हैं।
पेचतंत्रके कर्ता किस समय किस स्थानमें प्रादुर्भूत इए, विष्णुशर्मा उनका
प्राकृत नाम है कि नही, यह सम्पूर्ण ऐतिहासिक वृत्तान्त स्पष्ठरूपसे जाननेका
कोई उपाय नहीं, कारण कि, भारतवर्षके प्राचीन आचार्योने कही अपने
अन्धॉमें अपना छीकिक पारेचय नहीं दिया है, वह किस समय, किस देश,
किस कुछ, किस अवस्थामें प्रादुसूत हुए थे, क्या आकृति थी इत्यादि आधुनिक
ऐतिहासिक परिचय कुछ भी नहीं जाना जाता और उन्हे आत्मपरिचय देने-
की आवश्यकता भी क्या थी । वे सम्पूर्णरूपसे अपनको सुलाकर तन्मय भाव?
से ज्ञानचिन्तामें मग्न थे । बह महायोगी सिद्धिलाम करके ही आत्माको
चरितार्थ ज्ञानमय करतेथे । ग्रन्थ घन्थकारका नास घाम आदि परिचय देनेमें'
इनकी इच्छा ही नहीं होतीथी; रामायण, महाभारत, हारिवेशादि अन्धो भी
अपरिमित प्रभाझाळी उन ऋषियोंने अपना नाम घामका उल्लेख नही किया है;
चाठमीकि व्यास यह प्रकत नाम नहीं हैं किन्तु वल्मीकसे प्राप्त होनेसे वाहिम-
. कि और वेद् विभागकरनेसे वेदव्यास व्यास! नास हुआहे । इन महार्षियोंके
निर्माणकिये ज्ञानकाण्डकी ब्रह्मासे स्तम्बपर्यन्त व्याप्त दोनेवाळी विशालता देख-
कर तथा उनमें एक एककी आकातिका ध्यान करके सन्मुख एक एक महानु-
भावकी विशाल मूर्ति आविभूत होती है। यद्यपि उन्होंने अपना लौकिक
पारेचय नहीं दियाहे परन्तु जो मनुष्योका यथार्थे परिचय है वहं उस अलौ
किक ज्ञानका परिचय प्रदान करगये हैं, वे जीचलोकके कल्याण करनेको यह
अमूल्य ज्ञातधन संचय करगये हैं, इसकारण उनका आत्मपरिचय तो चन्द्र
"सूर्यकी स्थितिपयैत है महावीर करणने कहाहै-- |
|
(१ ) दिव्रु, छाडिन, औीक,सायारेझ, इठेलिक,जर्मनी, फ्रेंच,स्पोनेश,अरबी,पारसी,
दुरुष्क, चीन, उदू, अंग्रेजी, नगला, र्ति पृथ्वीकी प्राचीन ब आधुनिक जितनी भोषा
हैं सबसे गद्य और पद्यमें पंचतंत्र और हितोपदेशका अनुवाद है |
भूमिका! (७)
सुतो वा सूतपृत्रो वा यो वा को वा भवाम्पहम |
देवायत्तं कुले जन्म मदायत्तन्ठ पोरूषम ॥
अर्थीत् चाहै सूत हूँ चाहे सूतपुत्र हू जो कोईभी मे हू इससे क्या ९ कुलमे
जन्म देवाधीच है परन्तु पुरुषाथे ता मेरे आधीन है (वेणीसंहार) अथोत् पुरुषा्थ
ही हमारा परिचय है । इसकारण पञ्चतँत्रके कर्ताका नाम घाम बेशका' परि”
चय च पानेसे मनुष्यजातिकी कोई हानि नहीं, उनका यह पञ्चतंत्रही अनन्त
काल पर्येत जीव लोकका महाउपकार साधनकर उनके मनुष्यत्वका परिचय
बरदान करता रहेगा (१)
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पञ्चतंत्र और हितोपदेश यह दो ग्रन्थ विष्णुशमाके रचित हैं यह प्रसिद्ध है।
जिसमे यह पञ्चतन्त्र पहला और हितोपदेश इसका सार लेकर पीछे ' निर्माण
पेक॒या गया है, दोनो ्न्थोमें एकही बस्तु कथन की है इसमें विस्तार और
हितोपदेशसे संक्षेप है । इसमे पांचतंज और हितोपदेशम चार तन्त्र हे, कही
कहीं हितोपदेशे पचतत्रके सिवाय अन्य स्थानोंसे भी सम्रह किया दे यथा-
मित्रलाभः खुहद्धेदो विग्रहस्सन्धिरेव च ।
पश्चतन्त्रातथान्यस्मादरन्थादाकृष्प लिख्षते ॥ १ ॥
अथीत् मित्रलाभ, सुछड्भेद, विग्रह और सन्धि यह पचतत्र तथा अन्य ग्रथोसे
छाकर लिखते है । मंगला चरणमे विष्णुशर्माने मनु, वहस्पाते, शुक्र, पराशर,
व्यास, चाणक्यादि नीतिञासत्र करनेवालोको नमस्कार किया है इससे चाण-
क्यके पत्चातही विप्णुरार्मा हुए है इसमे तो कोई सन्देह नहीं है, कारण कि,
नीतिशाखके कतां जगत्पूज्य हुए है और न्रह्मासे यह ञाख मादुर्भूत हुआ है,
महाभारत राजधर्मके ५९ अध्यायम लिखा है-देवताओकी पार्थचासे त्रह्माजीने
लक्षर्होकमे नीतिशास्त्र निर्माण किया, भिवजीने संक्षेप कर दशसहस्न अध्याय
किये और विश्ञालाक्ष शिवका नाम है इस कारण बह गाज विशालाक्ष नामले
प्रसिद्ध हुआ, उन्द्रने थिवजीसे पढ़ पाच सहस्र आध्यायमे संक्षेप कर अपने
नामके अनुसार उसका नाम वाहुदुन्तिक रक्खा | फिर वृहस्पतिने तीन सहनन
अध्यायोमे संक्षेप कर उसका नाम वाहेस्पत्य प्रसिद्ध किया । झुक्राचार्यने उसे
एक सहस अध्यायोमे संक्षिप्त कर उसका नाम औशनस रक्खा। गरुडपुराणमे
देखा जाता है कि, चाणक्यने वृहस्पतिप्रणीत नीतिशाख्रका सग्रह कर उससे
१ पचतत्रमे बहुतसी कथा महिळारोग्य नगरका परिचय देकर लिखी है, यञ्रपि
इसका नाम इस समय क्या है सो विदित नहीं होता परन्तु सद्मविचारसे विदित होता
है कि, कदाचित् यदी दक्षिण ठेगमें विष्णुशमक्ति रहनेका स्थान हो |
(८) पश्चतन्त्र भाषाटीकाकी-
ज्छोक संगृहीत किये इसकारण नीतिशाख मन्थके इछोक और चाणक्यके
जोक प्रायः एकरूप हे । दंडिप्रणीत दशक्ुसारचीरतके विश्रुतचारित्रमें लिखा
है कि, विष्णु गुप्त अर्थात् चाणक्यने सोयेबंशीय महाराज चन्द्रगुप्तके लिये
पुर्वे)्नच छित नीतिशा ब्को संक्षिप्त करके छः सहस्र कोकोंमें निबद्ध किया,
शास्त्रके पारगामी महापंडित विष्णुशमीको जगतका प्राचीन रत्नसंग्रहक्तों
पुरुष कहना उचित हे, यह सत्य है कि, इन्होंने यह ग्रन्थ प्राचीन अन्थ बाहें-
स्पत्य, महाभारत, आदिअन्धोखि संग्रह किया है, परन्तु इन्होंने यह रत्न अपूरे
आख्यायिकारूप सूत्रे इस प्रकार यूथे हे कि, उनकी असाधारण बहुद॒शिता,
अद्भत सारमाहिता, तथा विचित्र रचना कौशळकी सबही मुक्तकण्ठले प्रशंसा
करते है, उनका रचित गद्य इतना सरल, मनोहर और शुद्ध है कि उसके देख-
नेसेही बोध होता है कि, इसप्रकारका अन्य कोई मन्थ सरलता सघुरतासे पूणे
संस्क्तसाहित्यमे नहीं है.उनकी चमत्कारिणी गयरचना संस्कतकी गद्यरचनाका
आदओ स्वरूप है, इसमें सन्देह नहीं कि, इन्होंने प्राचीन सामग्रीसे अपनी
चुद्धिके बढखे एक अपूबे नूतन पदार्थकी सृष्टि की है ।
पश्चतन्त्रकी कथाओंका मूलतेत्र निरूपण करना बड़ा कठिन है, जैसी
कहानी भारतवासी अपने छोटे बाळकॉको सुताया करते हैं और जो बहुत काळ-
तक कमसे कण्ठमेंही चळीआती थीं, वेसीही कथाओऑको शिक्षासहित महाप
डित विष्णुशमोचे लिखा हे। पञ्चतन्त्रकी कहावत हमारे देशकी शिक्षाका प्रथम
सोपान है, तथा मनुष्य जातिका बारयावस्थाके निमित्त एक सरल मधुर और
कोमळ पदार्थ है, तथा जगतका प्रथम सत्व भारतकी अततिपुरातन >हाघनीय
सम्पत्ति है यह अवश्यही सबको स्वीकार है।
सहाभारंत हमारे देशकी अतिपुरातन सम्पत्ति है, प्राय: महाभारतकी रच-
नाको साडेचार सहस्र वपेसे अधिक व्यतीत होचुकेहँ, इसमें सन्देह नहीं कि,
इस अन्थमें मञुष्यजातिके अतिपुरातन चित्र खैंचकर सम्पूर्ण नीति और धर्मके
आख्या बड़ी चमत्कारतासे वर्णन किये हैं, अनेक स्थलोमें पंचतन्त्रकी रीतिके
समान घर्मादिविषय निरूपण किये हैं, बहुत क्या पञ्चतन्त्र और हितोपदेशकी
कई कथा महाभारतसे छूकर लिखीगई हैं, जैसे व्याध-कपोत आदि इससे
विदित होता है फि, कोई २ कथा भारतसे पहले भी विद्यमान थी और अधिक
खोज करनेसे यहभी जना जाता है कि, सबसे अधिक प्राचीन अ्रन्थोंमें भी
कही कहीं ऐसी कथा लिखी हैं, विष्णुशंमाने कोई पुरानी लिखित कथा और
कोई पुरुष परंपरासे प्राप्त प्राचीन कथा संग्रह करके मनोहर छिपिसूत्रमै थित
केया है, इनकी कहावत किस देशसे किस आकार और रूपभे वर्तमान है.
|
भूमिका । (९)
इसका विस्तार विद्वान् कोलयुक साहबने अपने टीका किये पंचवंत्रकी भूमि-
कामें लिखा हैं यहाँ अप्रासंगिक जानकर वह वाती लिखना उचित नही है ।
इसप्रकार सर्व देशप्रचलित और विख्यात इस. प्रन्यका भाषान्तर होकर
समस्त भूमैडछमे प्रकाशित होरहा है, परन्तु आजतकभी हिन्दी भाषाके भण्डा-
रमे इसका नाम अंकित नही हुआ था, हाँ । हितोपदेशके ऊपर कई भाषाटीका
छपचुकी है जिनमे एक हितोपदेशकी भाषाटीका अपने शिप्यद्वारा निजअतुम-
तिसे कराय भलीप्रकार शुद्धकर कल्याणमें सम्वत् १९५० मे मुद्रित करं “चुके
है; परन्तु कितनीही आवश्यकीय वार्ताओसे युक्त भूमिका, परिशिष्ट, आशय,
“ उपदेशके मर्मसहित अत्युत्तम भाषासे पंडित बळदेबप्रसादमिश्रने अनुवाद किया
है वह सुद्रित (१) होनेपर देखनेही योग्य होगा और कथा टिप्पणीके सिवाय
उसमे यहभी दिखलाया है किं, हितोपदेशम कौन लोक किस प्रैथका है जिससे
अनुवादकके पारिश्रमका पूण परिचय लक्षित होता हे । `
इस समय संस्कृतका उतना प्रचार नहीं है कि, जैसा पूर्व समयमै था और
हमारे आचार विचार नीति रीति घर्मादिके मथ प्राय: सब संस्कृतमें ही विद्यमान
है अब कालक्रमसे प्रायः वृत्तिकी आशासे जाह्मणादि वर्ण विदेशीय भाषाओं
यहांतक रुचि रखते दे कि, बहुधा विदेशीय भाषाको सीखकर अपना कमै
धर्म भी विदेशीय रीति नीतिके अनुसार बदल डालना चाहते हैं, अपने शाख-
का ममे कुछ जानते नहीं है केवळ विदेशीय टीके वा दवॉमे हां मिलानेवाले वा
पक्षपातियोकी गप्पसेही अपनेको धर्म रीति नीतिका तत्त्वज्ञाता मानकर शाखो-
पर मीमांसा करने लगे हैं, कोई बालविवाहसेही देशका विगाड़ समज्ञकर_ ४८
वर्षका पुरुष २० वर्की कन्यासे विवाह करनेसे ही देशका उद्धार बल विद्याकी
उन्नति समझते हैं, कोई शाखके सेको बिना समझे यहांतक अधीर होगये है
कि, जव किसी प्रकार बल नही चला तो अपना तासभी रिफासरोसे होजाय
इस कारण विदेशीय रीतिपर आरूढ हो ईश्वरके आगे चिल्ली पुकार कर मनको
उमंग निकालते हैं, अभी मुरादाबादसे भी विवाह॒विचारमें एक पुस्तक ऐसीही'
विश््वित्र लीलाकी प्रकाशित होचुकी है । कोई आगमे थी फूकनेस ही देश भरकी
वायु शुद्ध करनेका साहस करके कुण्डोमें प्रतिदिन आधी छटांक वा छटांकभर
घी फूककर देशको सुगंधित कररहे दे, कोई विधवाविवाह नियोग करना 'धर्स
शाखके अनुसार कहकर अपनेको विधवाऋणसे' उकण मान देशका मुख
उज्ज्वछ कररहे है, कोई एक एक खीके ग्यारह पतिकी आज्ञा देकर वेदार्थके
न 3 ४ र
१ इस (३० १९६६ ) समय इसकी द्वितीयाद्रत्तिभी छपके बिकरही है [
(१०) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी-
छोट फेर करनेसेही देशका भळा और अपतेको कृतकृत्य मानते हैं, कोई चारो-
वर्णोका खान पान एक करके भारतभूमिके सुपुत्र कहळानेकी उत्कट इच्छा
करते हैं, कोइ फारसी अंग्रेजी पढकर ही समस्त वेदवेदांगका तत्व निरूपगकर
देशका भळा करनेके साहसी होरहे हैं, इत्यादि जहां देखो जहां सुनो देशसुधार
जातिसुधार देशोन्नतिकी पुकार जळ वायुकी शुद्धिका विचारही श्रवगगो'चर
होता है अब इसके फलकी ओर दृष्टि की जाती है तो सवथा परिणाम उलटा
इृष्टि आता है, मनमै और वचनमें और कार्यमें और है, विदेशियोंकी रीतिपर
लेखनी चलीजाती है, खण्डन मण्डनमें पत्र रंग दिये जाते हे, फळ क्या है,
काळपडते जाते है, महामारीसे देश उजडे जाते हैं, लोग अल्पायु निर्धन हुए
जाते है, जळ, वायु बिगड़े जाते है इसी वर्षकी विचार छीजिये कि ( १९५३,
१९५४ ) वषेके इस अकालने देशभरमें डामाडोल मचादिया है, असेख्य भार--
तवासी भूखे मर गये, देशभर “दीयताम्? की पुकारसे गूंजउठा दै, कितनेही
शहर भूंखोंने लूटे, कितनीही आत्महत्या हुईं, कितनेही बिके, कितनेही अयोग्य
कुत्यमे प्रवृत्त हुए, किंतनेही पशुओकी भांति घासपत्तेतक खागये, चौगुन पच-
गुने मोळ अन्न होगया, छक्षों रुपया सकोरने भी व्यय किया, सनातनधमीव-
लम्बी महात्माओंने सदावते जारी किये, दूसरे यूरपदेशोसे भो छक्षों चन्दा
आया, परन्तु महाभूखस आरत भारतके लिये वह क्या कुछ होसकता है;
हमको भूंखोंकी जो दशा दृष्टिगोचर हुई कि, जो भूंखके मारे प्राण छोडनाही
चाहते हैं, जो जंगलमें वृक्षोके नीचे मरणोन्मुख पडे हे, उनके पास कितने जळ
आर अन्न लेकर पहुंचे है, और हो भी क्या जिसके पास खयं नहीं वह दूसरेको
क्या देगा, श्रावण भादों दोनों महीने साफ उतरगये अझ्निमें घृत चढ़ानेपर भी
इन्द्रदेवने जल न दिया, इधर तो यह अन्नकष्ट उधर रोगकष्ट भी देखिये भारत-
“वासी बहुत दिनोसे विषूत्चिकासे परिचित हैं, प्रतिवर्ष प्रायः सबे नगरोंमे हैजेका
आदुर्भाव होता है, चोवीस घण्देकी लड़ाईँमें वहुधा मनुष्य! इस्से हारकर
कालकचलित होते हैं, परन्तु बहुत दिनोंके” पारेचित होनेसे इसके नामसेही
कम्पित नहीं होते थे, परन्तु इस समय जिस आकरमें (छग) महामारी (अन्वि
विसर्प ) बम्बईसे प्रगट हुई हे उसे सुनकर ही बड़े २ थीरजवाछे थरीगये हैं,
सहस्रो मनुष्य अचानक इसके उपस्थित होनेमें काळकवलित हुए है, ज्वर
और मन्थि निकलते ही मलुष्यका प्राण पयान कर जाता है, घरके घर खादी
दोगये हं, लक्षो मनुष्यं देशान्तरोंको भाग,गये हैं, बीमारी भी पम्बईसे आगे
चलकर पूना आदि देशोंमें फेल गई है अव भागकर भी कहे जॉय, एक ओर
यताम्? और एक ओर “रायस (रक्षाकरो) की ध्वाने फेल रही हे । महा”
भूमिका । (११)
मारीके रोकनेके निमित्त बड़े २ उच श्रेशोके नवोन रोति नोतिवालोके महदा
घोर प्रयत्न भी निष्फळ हो रहे है । मह्दामारीसम्बन्धी नियमावली बनचुकी है
` रोगी होते ही घरवालोसे प्रथक् कर शहरसे दूर चिकित्सालयमे रक्खा जाय,
रोगीके मरनेपर ओपडा फूकनेकी आज्ञा है, मकानमें मरे तो दोदो इंच सट्टी
खुदवा कर फेक दो, उसकी खाट कपडे जला दो, मकानका द्वार झुलस दो,
प्रेतहारी दशादिनतक नगरमे न आवि, इत्यादि प्रवन्धोकी धूमसे भारतवासी
तीसरा संकट भोग रहे है, अब कहाँ भांगे, रेछपर कठिन जांच होती है,
अनेक ग्रकारसे खो पुरुषोकी मनमानी परीक्षा करते है, पुलिसकी वनपडी हे,
कई हत्या भी इस विषयमे हो चुकी है, सदेह होतेही लोग शिफाखाने भेजे
जाते है, वहाँ उनका रामही रक्षक है, आगे महामारी न बैठे इस कारण आह-
रोमे सफाई कराई जाती दे सब कच्चे पके मकान चूनेसे पुताये जाते है, किसीने
सत्य कहा हे बारह वर्षमे घरकै दिन भी फिरते हे, हमने स्वय देखाहे कि,
जिन निकृष्ट जनोके कचे मकानोमे वा वाजारकी दूकानेकि भीतर मटका भो
पोता नही छूगाथा, वक्षे सरकारी आज्ञासे मट्टीकी चांदनी हो रही हे, अन्न कष्ट
रोग कष्ट, द्रव्य कष्ट, राज्य ढेड, आदि कई कष्ट, एकसाथ उपास्थित हो रहे
है बडे २ देशउद्वारक मौन हैं, हम पूछते है यह कया हुआ, यह कैसी उन्नति
हो रही है, यह वायुमे सालिनता कहाँकी आगई, पहले एसा सफाइका प्रवन्ध
नही था, नई ऐसी रीति नीति नहीं थी, जिस कारणसे आप देशका , सुधार
कहते है वह बात नहीं थी, परन्तु तथापि राजा प्रजा आनन्दसे रहतेथ, अन्न
अनका रोगका ऐसा कष्ट किस्रीसमय नहीं पडाथा, पुराने इतिहास ही इसके
साक्षी हे, तव क्या था, तब यही वार्ता थी कि, भारतवर्पेकी चिकित्सा भारत"
बके नियामक धर्मग्रंथोके अलुसारही होतीथी, जप, तप, संयम, पुजा, पाठ,
सत्य, स्तुति, प्रार्थना, हवन, अन्तवीह्य शुद्धि, सरलता, निष्कपटता, आस्तिकता
शाखोको सत् व्याख्या, निष्पक्षता आदि मनुष्यमात्र अवलम्बन कियेथे,
इससे देशभर मंगल्युक्त रहता था, जवसे संस्कत विद्याकी न्यूनता और कृत्यमे
अलसता ग्राप्तहुई तभीसे देशमें नये २ रोगादि कष्ट उपस्थित होनेछगे है, छोग
अपनी रीति नीति मूले जाते हैं, इस कारण वहुतसे दूरदर्शी विद्वानोंने यह
आर अपने ऊपर 'लियाहे कि, पुरातन प्रथॉका जहॉँवक हो यथार्थ अलुबाद
करके पक्षपातरहित अर्थ कियाजाय जिससे प्राचीन समथके व्यवहार दर्पण-
चतत् महादायोके सन्मुख उपास्थित होजॉय, मानना या न मानना यह पाठकोके
, आधीन हे, यही विचारकश हमने भी वाल्मीकिरामायण, शिवपुराण, श्रीसद्धाय-
, बत्; हरिवेशादि कितनेही अन्थोका देशभाषामे यथार्थं अनुबाद कियांहे ओर!
{ १२) पश्चतन्त्र भाषाटीकाकी-
न्य
-कितनेही ग्रंथोका अनुवाद कियाजाताह कि, जिससे विज्ञ महाशय अपने घर्म
कसैको यथाथ जान उसमें प्रवृत्त होकर उभय छोकमें सुख प्राप्तकरें, जिस-
अकार धर्मादि करना मनुष्य मात्रका काये है, इसीप्रकार छोकनिर्वाह और
खुद्धिकी अधिकाइके निमित्त नीतिका जाननाभी मलुष्य मात्रको उचित ह,
इसीकारण सव प्रफारके सणोसे युक्त विदयार्थियांको परम उपकारक इस
“पंचतंत्र” प्रथका भाषामे अबुवाद कियाहे, ऐसा कौन है कि इसकी कर्थामें
जिसे रुचि न हो, यह अंथ सरकारी परीक्षाओंमें भी नियुक्त है और अंग्रेजोके
साथ जो संस्कृत पढाई जाती हे उसके साथसी इसका कोई न कोई अंश
अवश्य रहता दे, इसकारण संस्कृतके विद्यार्थियाकोभी उपयोगी हो, इस
निमित्त संस्क्रतके शब्दोंके अनुसारही इसका भावार्थ किया है, कहीं कुछ
ज्यूनाधिक नही कियाहै और जहाँ कहीं अथे खोलनेके लिये कुछ विशेष
लिखा हैं वहां कोष्ट करादिया है और संस्क्ततमें जहां वाक्य समाप्त होकर
“देसी । रेखा कर वहां भापामे भी ऐसीही रेखा कर दीहे, जिससे विद्याथियोंको
आब्दाध जाननेमे कठिनता न पडे, हॉ अन्वयानुसार अर्थ करनेके कारण सहोक-
में अधिकतर कर्तासे अर्थका करना प्रारम्भ किया हे यदि ऐसा न करते तो
सक्योकार्थ रुचिकर सरस न होता ?होकका अन्त्रय कर पाठक उसीके अनुसार
अधे पासकेंगे ।
इस ग्रन्थमें नीतिकी उत्कृष्टता सबका सार लेकर वर्णन की है इसकारण
इस टोकेका नामभी “नीतिसवेत्व” रकखा है ।
इसप्रकार यह अन्थ पूर्णफर जगद्विल्यात परसप्रवीण सनातनधर्म निरत
सदम्न्धप्रचारक परमउपकारक गुणिजनरंजक परमोदार “अरीवेंकटेश्वर” येञा-
ल्याध्यक्ष सेठजी श्रोयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजी महाशयको सम्पूर्ण स्पत्वके
सहित समपैण करदियाहे जो कि, अपनी परम उदारतासि हमको सब प्रकार
सन्तुष्ट कररहेदै । ।
हिन्दी भाषांक परम रसिक हमारे परम अनुग्नाहक दिजवैशदिवाकर दान-
शील पंडित हरसद्दाय पाठक तथा कुमार बनारसी दासजी एम. ए. बाधू उदित
नारायण लाळ घमा फीडर गाजीपुर तथा पंडित हरिहर प्रसाद पाठक मेनेजर
-सित्यसिघुः?, छाछा शालिग्रामजी वैश्य, सेठ कुन्दन लाळ आदि विज्ञ जनभी
धन्य वादके योग्य हैं जो हिन्दी भाषांके प्रचारसे सदा रत रहत हैं ।
पाठक महाझयोंसे प्राथना है कि, यथाशक्ति टीका करनेंसे कोई जुटि नहीं
“की है तथापि यदि कही भूल चूक पावे तो उसे क्षमा करें कारण कि, सर्वज्ञ
थरमेश्वरदीहे ।
भूमिका । (१३)
विदेशीय महाशयोने जो हमारे अन्योका देख प्रशसापत्र भेजे है उनको हम
अन्तःकरणसे धन्यवाद देते हैं ।
- और अबकी बार फिर सी भलीभाति संशोधन कर उत्तम व्यवस्थासे
छपकर तैयार हुआ है, आशा है फि, नीतिप्रिय महाशय इसे अहणकर स्वये
अमूल्य लाभ उठावेंये और अन्धकार टीकाकार एवं प्रकाशकको सफल मनो-
रथ करैगे । -
पण्डित ज्वालाप्रसाद मिश्र,
दीनदार परा-सुरादाबाद.
अथ पश्चतन्त्रकी कथासूची ।
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कथामुख .... हि कन विव
मिन्रमेद प्रथम तस्त्र ।
१ बानरोके यूथकी कथा... - २२ -.-
२ शगाळ और भेरीकी कथा ... ---
३ दन्तिलकी कथा ... ee
४ देवशम परिब्राजकादिकी कथा .., न्न
५ विष्णुरूपकौलिककीकथा ... -...
है काकी और कनक सूत्रकी कथा... ....
७ वक और कर्टककी कथा क छि
८ सासुरक सिहकी कथा “न्न किक
९ मत्कुण मन्दविसर्पिणीकी कथा ... किक
१० चण्डरव शुगारुकी कथा नन ---
११ सदोस्कट सिंहकी कथा er
* १२ टिट्टिभ और समुद्रकी कथा .... ...
१३ ठुवुद्धिक्मकोकथा ... ... ...
१४ अनागत विधाता आदि तीन मच्छोकी कथा...
१८ चरकी काएकूटकी कथा हि ,--
१६ बजञदंप्र सिंहको कथा... --- --
१७ सुचीमुख वानरकी कथा किक म
१८ चटक दम्पतीकी कथा 222 कन
१९ घमेवुद्धि प्रामवुद्धिकी कथा ... २...
२० सूखे वक ओर नोलेकी कथा ... क
२१ जीर्णधन वणिक् पुत्रकी कथा ... ...
२२ सूख वानर और राजाकी कथा... ...
शभिवसम्प्राति द्वितीय तंत्र !
चित्रत्रीव उपाख्यान ... किक "०
हिरण्यक छघुपतनक संवाद् ... ...
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पञ्चतन्त्रकी कथारूची ! (१८)
पय प्र
१ हिरण्यक व्रन्तान्तका कथा - » RRS
= तिल बेचन बार्डीकी कथा . .- २३२
३ पुलिन्दकी कथा .. विक . - २२४
४ सागरदत्त वणिककी कथा - नन २४७
० सोमलिककी कथा ... . नष्ट
६ वृपभके पीछे फिरनवाळे स्गाळकी कथा . २५६४
काकोळकोय ततीय तम्त्र। २८८
जाक उळक वृत्तान्त .. - २८८
१ चतुदेन्त हाथोकी कथा - २२ .. .. _ ४१०
२ गशकपिजलकी कथा --- कि ... ३२६
३ ब्राह्मण और वकरेकी कथा ... ... . ३२६
४ सर्प और चैटियोकी कथा ... . ३९५
० हरिदत्त दाह्मणकी कथा . न - २३६
६ पदावनके हेसोकी कथा . हि ३३८
७ व्याघको कथा क . - ३४९
वृद्ध वणिकूकी कथा ... -- - - ३४९
५ चोर और राक्षसकी कथा « .. न रेपर
६० वल्मीक और उदरके सर्पकी कथा _ , ३५५
१५ रवकार और उसकी खीकी कथा _ . .., ३५८
न मूपकाको क्था .. - -- ३६
१३ स्वणेष्ठीवीकी कथा _ - ३७१
१४ खर सखर सिहका कथा -- ग्ज्छ
१५ सन्दविप सर्पकी कथा हि ३८३
१६ घृतान्ध आह्मणकी कथा ति ३८६्
लब्धप्रणाश चलुर्थ तत्र । ३८७
२ जछस्थित वानरकी कथा व न दे९ेछ
२ गगद्त सण्ड्ककी कथा ००२ ष्ट्व
३ कराळकेगर सिहकी कथा २ - - ४१५
४ कुमकारकी क्था ... --. . ४५२
५ सिह ओर गीदडकी कथा .. ४२४
(१६) पश्वतल्बकी कथासूची
विप्रय,
६ च्राझणीकी कथा .... ति
७ नन्द्राजाकी कथा .... क
< शुद्ध पट रजककी कथा -.- छ
९ हालिककी खीकी कथा हिका ८०५
१० चटाबन्ध ऊंटकी कथा किक कि
११ चतुरक ऋगाढलकी कथा विक ०००
१२ चित्रांग सारमेयकी कथा किक कि
अपराक्षत कारक पचन सन ।
१ मणिभद्रनाम सेठकी कथा ...
२ ब्राह्मणी और नौलेकी कथा ... ...
३ सस्तकपर चक्र भ्रमण करनेवालेकी कथा ...
४ सिंह बनाने वाळे ब्राह्मणोंकी कथा
५ सूख पण्डितोंकी कथा किक वि
६ शतबुद्धि आदि मत्स्योकी कथा .... किक
७ दभ और >गाळकी कथा .... .
८ मन्थर कौलिककी कथा ०० .-.-
- ९ सोमरामांके पिताकी कथा ... .--
१० चन्द्रराजाकी कथा ... विक कि
११ राक्षस और राजकन्याकी कथा ... २०
७००५
१२ अन्धे कुबडे और तीनस्तनवाळी राजकन्याकी कथा ...
१३ चण्डकर्मा राक्षस और त्राह्मणकी कथा ....
१७ भारण्डपश्षीकी कथा ... ००० ०००
१५ ककड आर त्राह्मणको कथा ..-
दात कथासूचा समता ।
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- ४३२
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॥ श्रीः ॥
ञ्जृ © स्र
थ् पंचतल्त्रस्।
भाषाटीकासहितम् ।
—— Prot
ब्रह्मा रुद्रः कुमारो हरिवरुणयमा वह्विरिरद्रः कुबेर-
श्न्द्रादित्यो सरस्वत्युद्धियुगनगा वायुरूवी सुजङ्ाः।
सिद्धानद्योऽश्रिनो श्रीदितिरादितिछुता मातरश्चण्डिकाद्या
वेदास्तीर्थानि यज्ञा गणवसुमुनयः पान्तु नित्यं अहा १॥
मया उ्वाळाप्रसादेन नमस्कृ गजाननम् ।
कियते पञ्चर्तत्रस्य भापाटीका मनोरमा |।
दोहा-शभु दिवा रघुपति सिया, बन्दो पवनकुमार |
कृपा करइ जन जान मोहि, गुणागार छुखसार ॥
रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु, वरूण, यम, अनि, इन्द्र, कुबेर, चन्द्र, सूर्च,
सरस्वती, सागर, चारोंयुग, पर्वत, वायु, इती, वासुके आदि सर्प, कपिछादि
सिद्ध, नदी, अश्विनीकुमार, रक्ष्मी, दिति ( कऱ्यपपत्ती ), अदितिके पुत्र
( देवता ), चण्डिकाआदि माताये, वेद ( ऋकू, यज्ञ, साम, अवे ), तीथे
{ पुण्य्चत्र काशी आदि ), यज्ञ ( दर्श पोरेमासादि ), गण ( प्रमथादि ), बढ्नु
( आठ देव ), सुनि ( व्यसादि ), ग्रह ( सूर्यादि ), नित्य ( हमारी ) रक्षा
करें । गधरा छन्द है॥ १ ॥
मनवे वाचस्पतये शुक्काय पराशराय ससुताय ।
चाणक्याय च विदुषे नमोऽस्तु नयशाख्रकर्तेम्यः ॥२॥
स्वायम्यू मनु, बृहस्पति, शुक्र, सपुत्र ( व्याससहित ) पराशर, पण्डित
चाणक्य और नीतिदाल्नके ववानेवाळोके निमित्त नमस्कार है ॥ २॥
(२) पञ्चतन्त्रम् ।
सकलार्थेशाखसार जगति समालोक्य विष्णुशमेंदम् ।
तन्त्रेः पश्चमिरेतच्चकार सुमनोहरं शास्त्रम् ॥ ३॥
इस प्रकार विष्णुशर्मावे इस जगने सम्पूर्ण अर्थशाख्का सार देखकर पंच-
तत्रेमे यह मनोहर झाल्ल निमोण क्रिया दे ॥ ३॥
त्था अनुथूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिछारो-
प्यं नाम नगरम् । तत्र सकलार्थिकल्पदुमः घवरमुकुटमणि-
मरीचिमञ्ररीचार्चितचरणयुगलः सकलकलापारंगतोऽमरश-
क्तिनाम राजा बभूव! तस्य चयः पुचाः परमडुमेंथसो बहुश-
क्तिरूग्रशक्तिरनन्तशाक्तिश्बोतिनामानो बभूवः ! .अथ राजा
तान् शाश्विसुखान् आलोक्य सचिवान् आहूय मोदाच-
«मनो ! ज्ञातपेतद्गवाद्विः यन्ममेते पुत्रा! शास्त्राविसुखा विवेक-
राहिताश्च । तत् एतान् पश्यतो मे महदपि राज्यं न सौख्य
मावहति | अथवा साथ्विदसुच्घते-
सो ऐसा सुना है कि, दक्षिणके देशमें एक माहिळारोप्यनाम नगरंदे | वहां
म्पूर्ण याचकोंके ( मनोरथ पूर्ण करनेको ) करपदृक्ष, बडे बडे निर्जित राजा-
सकी मुकुटमणियॉका किरणोंके समूहसे एजित चरणयुगळ, सम्पूर्ण कळाओका
पाएमा, अमरशक्ति नाम राजा था, उसक तीन पुत्र आतंदुबादू--बहुशाक्ते,
उम्रशक्ति, अनन्तशक्ति नामवाळे थे । तब राजा उनको शात्रसे बिमुख देखकर
मन्त्रियोंकी बुछाकर वोछा--“क्या यह आपको विदित हे कि, जो यह सेरे पुत्र
शास्रे विमुख विवेक रहित हैं । सो इनको देखकर मुझको यह बडा राज्य सुख
नहा दता हैं। अथवा किसीने यह अच्छा कहां इ कू
अजातसृतसूखेभ्थो छुलाजातो सुती बरस्।
यतस्तौ स्वल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दुहेत् ॥ ४ ॥
न हुए, होकर मरगये और मूर्ख इन ( तोन प्रकारके ) पुत्रौमे नहुए और
` दाकर मरगय सळ हू, कारण. (%, वे दाना थाड दुःखका [चित हूँ, सूख ता
जन्मपयन्त जछाता हे | ४ |
वरं गर्भेझावों वरमतुष नेवाभिगमतं
रं जातप्रेतो वरमपि च कन्येक जनिता।
भाषाटीकासमेतम् । (३)
वरं वन्ध्या भार्या वरमपि च गर्भेष बसति- '
ने चाविद्वावूपद्रविणगुणयुक्तोषपि तनयः॥ ५ ॥
गर्मका स्राव होजाना अच्छा है, तुमे छ्लोके निकट न जाता अच्छा है,
'उद्यन होतेही मरजाचा अच्छा है, था कन्याही होनी अच्छी हे, भाका वन्ध्या-
होनामी भळा, वा गर्भमें रहनाही भळा है, परन्तु अपण्डित रूप-द्रव्यसम्पन्नमी
पुत्र भच्छा बही है॥ ५ ॥
कि तया क्रियते धेन्वा या न सूते न इग्धदा ।
कोऽथः पुरेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान् ॥ ६ ॥
उस गोसे क्या किया जाय, जो न अनती है, न दूध देती है, उस पुत्रते
कया है, जो न विद्वान् है न भक्तिमान् हैं॥ ६ ॥
वरमिह वा सुतमरणं मा मखत्वं कुलप्रसूतस्य ।
थेन विवुधजनमध्ये जारज इव लते मडुजः॥ ७॥
इस जगतमें पुत्रका मरण अच्छा हैं, परन्तु कुछोत्यन्न पुत्रका मूर्ख होना
मळा नहीं, जिससे -विद्वानोके वीचमें मवुष्य जारोखन्नकी सपान लजित
होताहे ॥ ७ ॥
गुणिगणगणनारम्भे न पतति काठेनी ससम्भमा यस्प ।
तेवास्बा यदि झुतिनी बद वन्ध्या कीडशी भवति ॥ ८॥
गुणिजनेकी गणनाके आरम्भे जिसकी रेखा भूलसेमी नहीं गिरती है,
hr
याद उपास उसका माता पुत्रवता है, त कहा वन्या कसा हाता६?॥८॥
तदेतेषां यथा बुद्धिप्रकाशो भवति तथा कोडप्युपायो5तु-
छीयताम् । अन्न च मइत्तां वृत्ति भुञ्जानानां -पाण्डितानां
पञ्चशती तिष्ठति | ततो यथा मस मनोरथाः सिद्धि यान्ति
तथा अबुष्टीयताम्? इति । तत्रेकः प्रोवाच- देव | द्वादशाभि-
वषव्यांकरणं श्रूयते, ततो धमशाख्राणि मन्वादीनि, अर्थ
शाख्चाणि चाणक्यादीनि, कामशास्त्राणि वात्स्यायनादी-
'नि। एवं च ततो धर्माथकामशाख्राणि ज्ञायन्ते । ततः प्राति-
बोधनं भवति? । अथ तन्मध्यतः सुभतिनांम सचिवः माह-
मशाश्वतोऽयं जीवित्तव्याविषयः । प्रभूतकालन्ञेयानि शब्द-
८४) पञ्चतन्त्रम् ।
शास्त्राणि । तत्सक्षेपमात्रै शाखं किञ्चिदेतेषां भबोधनार्थ
चिन्त्यतामिति । उक्तञ्च यत+-
सो जैसे इनकी बुद्धिम प्रकाश हो वेसा कोई उपाय कियाजावे। यहाँ मेरी
-दीहुई आजीविकाको भोगते हुए पांचसौ पडित हे । सो जैसे मेरे मनोरथ सिद्ध
हो, वेसा अनुष्ठान करो””। उनमें एक बोळा-“'देव ! बारह वर्षें व्याकरण पढा-
जाता है, फिर धर्मेशात्न मनुआदिके, अर्थश्ञात्र चाणक्यादि, कामशात्र वात्स्या-
यनादि, इसके उपरान्त फिर धर्म, अर्थ, कामशाह्न जाने जाते है, तव ज्ञान
होताहे'?| तब उनमेंसे सुमति नाम मन्त्री बोढा- यह जीवन विपय अनित्य है,
बहुत शब्दशास्त्र बहुत दिवोमें पढेजाते हैं, सो कोई संक्षेपमात्र शालन इनके ज्ञानके
निमित्त विचार करो, कहा भी है-
अनन्तपारं किल शब्दशास्त्रं स्वल्पं तथायुर्षहृवश्च दिज्नाः ।
सारं ततो आह्यमपास्य फल्गु हंसेयेथा क्षीरमिवाम्वबुमध्याता
शब्दशास्रका पार नही है, अवस्था थोडी भोर विन्न बहुत है, इस कारण
"सारको ग्रहण करे, असारको त्याग दे, जैसे हंस जळमेसे दूध निकाळ छेते हैं.
उपजाति कृत है ॥ ९ ॥
तदत्रास्ति विष्णुशर्मा नाम बाझणः सकलशास्तरपारङ्भम-
श्छात्रसंसादि लब्धकीत्तिः तस्मे समपेयतु एतान् । स नून
द्राक अडुद्धान् करिष्यति? इति । स राजा तदाकर्ण्य विः
स्णुशमोणमाहूय मोवाच-'भो भगवन् ! मदनुग्रहार्थमेतान्
अर्थशाख्च माति द्वाग्यथा अनन्यसहशान् विदधाति तथा कुछ!
तदा अहं त्वां शासनशतेन योजयिष्यामि” | अथविष्णुशर्मा
तं राजानमूचे" देव ! श्रूयतां मे तथ्यबचनमानाहं विद्यावि-
कयं शासनशतेनापि करोमिपुनरेतांस्तव पुत्रान् मासषट्केन
-यदि नीतिशाख््ज्ञान न करोमि ततः स्वनामत्यागं करोमि।
कि बहुना, शूयता ममेष सिंहनादः नाहमथोडिप्सुत्रेबीमि ।
ममाशीतिवर्षस्य व्यावृत्तसर्वेन्दरिार्थस्य न किद्चिदर्थेन प्रथा-
A Se
-जनं किन्तु त्वलाथेनासिद्धचर्थ सरस्वतीविनोदं करिः
भाषाटीकासमेतम् ! (५)
स्यामि । तलिस्पतामद्यतनो दिवसः। यादि अहं पण्मासा-
भ्यन्तरे तव पुत्रान् नयशाख्र प्रति अनन्यसदृशात् न कारिः
ष्यामि ततो नाहोते देवो देवमार्ग सन्दर्शयितुम्” । अथासो
राजा तां ब्राहणस्यासंभव्यां प्रतिज्ञां श्रुत्वा ससचिवः प्रहृष्टो
विस्मयान्वितः तस्मे सादरं ताव कुमारान् समर्प्य परां
निञ्जतिमाजगाम । विष्णुशर्मणापि तानादाय तदर्थ मित्र-
भेद्-मित्रत्राति-काकोल्की य-लन्घप्रणाश-अपरीक्षितका-
रकाणि चेति पञ्च तन्त्राणि रचथित्वा पाठितास्ते राजपुन्राः।
तेऽपि तानि अधीत्य मासषट्केन यथोक्ताः संवृत्ताः । ततः
प्रभाते एतत्पवतन्चवक नाम नोतिशा्त्र बालावबीधनाथ
भूतले प्रत्तम् । किं बहुना ।
सो यहा एक विष्णुरामी नाम ब्राह्मण सव शाल्लका पारगामी विद्यार्थियोमें
प्राप्त यदववाळा है, उसके निमित्त इन पुत्रोको समर्पण करदो वह अवस्य शीघ्र
इनको ज्ञानवान् करदेंगा!? । बह राजा यह बचन सुन विष्णुशर्मा बुलाकर
चोळा-“भगबन् । घुझपर कृपाकर इन मेरे पुत्रको अर्थशाल्ममें शीप्रही असा-
आरण जेसे बने तैसे करो । तो में तुमको सो सख्याक सम्पत् दूगा” | तब
विष्णुशर्मा उस राजासे कहने रुगा-“देव । मेरा सत्य बचन सुनो, में सम्पतसे
विद्यावित्रय नहीं करताहू, परन्तु इन तुम्हारे पुत्रोंको यदि छः महीनेमे नीति-
शासनका ज्ञाता न करू तौ अपना नाम त्यागनकरू | बहुत कहनेसे क्याहै येरा
यह् सिहवद्र्जत सुनो घनकी इच्छासे में नहीं कहताहूं । मुक्त अस्सी वर्षके
सब इन्द्रियोंके भोग्यते निस्पृह इएको भर्थसे कुछ प्रयोजन नहीं हे, परन्तु तुम्हारी
प्रार्थना सिद्धिके निमित्त सरस्वती बिनोद करूगा | सो आजका दिन लिखिये
जो में छः महानेमे तुम्हारे पुत्रोको बिद्यामें असाधारण ( जिसके बराबर कोई
नहो ) न करू तो जगर्दाश्वर मुझको देवमार्ग ( स्वर्ग ) न दिखावे? | तब यह
राजा इस ब्राह्मणक असम्माव्य ( असम्मावसी ) प्रतिज्ञाको सुनकर, मन्त्रयां
सहित प्रसन्न हो, विस्मयको प्रात्त इभा। उसके निमित्त आदग्से उन छुमारोंको.
समपंणकर, अत्यन्त सतोषको प्रात हुआ । बिष्णुशर्मानेमी उनको ळे उनके निमित्त
£
मित्रमेद, मित्रसम्प्रातति, काकोळूकीय, ब्यप्रणाश, अपरीक्षितकारक इन पाच
(६) पञ्चतन्त्रम् ।
तन्त्रोको निर्माणकर उन राजङुमारोंको पढाये । वेभी उनको .पढकर छः महीनेमें ,
जैसा कहाया पतेहुए । उस दिनसे यह पंचतन्त्र सामक नीतिशास्त्र बालकोंके--
ज्ञनके निमित्त पृथ्वीमें विख्यात हुआहै बहुत क्या- .
अधीते य इदँ नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च ।
न पराभवमामरोति शक्रादपि कदाचन ॥ १०॥
कथासुखमेतत्।
जो इस नीतिशा्लको पढता और सुनतांह, वह कभी इन्द्रसेमी पराभवको
प्राप्त नहा होंताह ॥ १० ॥
इति पण्डितज्चाळाप्रप्तादमिश्रक्तायां पञचतेत्रमाषाटीक्ायां कथायुखं समातम् ।
अथ मित्रभेदोनाम प्रथम तंत्रम् ।
SD Se
अथातः प्रारभ्यते मित्रमेदा नाम प्रथमं तन्त्रम् । यस्याय-
मादिमः छोकः
इसक अनन्तर ३मंत्रभद नामवाछा प्रथम तलका प्रारम्भ करत ति ||
जसका जादुम यह लिफह--
वद्धेमानों महान्लेहः सिहगोवृषयोव्रने ।
, पिश्रुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः ॥ १॥ -
. सिंह और बैलका, वनमे बढाहुभा महास्नेह चुगुछ ळाळची जम्बुक ( गीदड ).
ने विनाशकुर दिया | १॥ .
तद्यथा जल॒श्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं
नाम नगरम्। तत्र धर्मोपार्जितभारविभवो वद्धेमानको नाम
वणिक्पुत्रो बभूव । तस्य. कदााविद्रात्रो शय्यारूढस्य चिन्ता
समुत्पन्ना । “'यत्मभूतेअपे विस्ते अथोपायाश्चिम्तनीयाः कत्त
उ्याश्चेति । यत उक्तच:-
- सो यह सुनाजाता है।के, दाक्षिण देशों महिछारोप्यनाम एक नगर हे वहां '
धर्मसे महाँघन उपाजेन कती बद्धेमान नामक, वणिक् पुत्नथा॥ उसको एक समय
माषारीकासमेतम्। (७)
रात्रोमे खाटमें छेटेइर चिन्ता उत्पन हुई; कि “बहुत घन उत्पन्न होनेपरभी
धनप्राप्तिका उपाय चिन्ता करना चाहिये कहाभी हे-
न हि तद्विद्यते किश्चिद्यदर्थेन न सिद्धयति ।
यत्नेन मतिमास्तस्मादर्थमेकं प्रसाधयेत् ॥ २॥
ऐसी कोई वस्तु नही जो अर्थसे सिद्ध न होती हो इस कारण बुद्धिमान्
यत्नसे ,अर्थक्गा उपाजन करे ॥ २ ॥
यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य वान्धवाः ।
यस्यार्थाः स पुमांछोके यस्याथाः स च पण्डितः ॥ ३ ॥
जिसके धन है उसके मित्र हे, जिसके धन दे उसके बघु हैं, जिसके धव
है छोकमे वही पुरुष हे, जिसके धन हे वही पडित है ॥ ३ ॥
न सा विद्यां न तदान न ताच्छिलपं न सा कला ।
न तस्सथेय्य हि धनिनां याचकैर्यन्न गीयते ॥ ४॥
न चह विदयाहे, न वह दान है, न वह कारीगरी है, न वह कळा हे, व वह
घनियोंकी स्थिरता है, जिसको याचक न गाते हो ॥ ४ ॥
इह लोके हि धनिनां परोऽपि स्वजनायते ।
स्वजनोऽपि दरिद्राणां सवेदा दुर्जनायते ॥ ५ ॥ _"
इस लोके घनियोंके गेरभी स्वजन होजाते हैं, दरिद्रॉसे कढुम्त्री भी सदा
दुर्जन होजाते हें ॥ ५ ॥
अर्थेभ्योऽपि हि वृद्धेभ्यः संवत्तेम्यस्ततस्ततः ।
भवचंन्ते क्रिया) सर्वाः पर्वतेभ्य इवापगाः ॥ ६॥
धनके बढनेसे और इवर उधर इकडे होनेसे सब किया प्रदत्त होती हैं,
जैसे पर्वतोसे नादिया ( निकळ कर सज कार्य पूर्ण करती हैं ) ॥ ६ ॥
` पूज्यते यदपूज्योऽपि यदगम्योऽपि गम्यते ।
` वन्यते यदवन्धोऽषि स प्रमावो धनस्य च ॥ ७॥
अपूज्यमी ( धनसे ) एूजितै होता है, आभ्यके निकटमी जाया जाता है,
अनमस्कारी पुरुषमी वन्दन योग्य होताः हे, यह प्रभाव घनकाही हे ॥ ७ ॥
अशनांदिन्द्रियाणीव स्युः कारय्याण्यखिलान्यपि। -
एतस्मात्कारणाद्वितं सवेसाधनसुच्यते ॥ ८ ॥, `
=
(८) एञतन्त्रस् ।
~
भोजन करमेसे जेते सब इन्द्रिय ( समये होती हें) इसीप्रबार सम्पूर्ण कार्य
घनसे ( होते हें), इस कारणसे घन सत्रका साधन कहा जाता है ॥ ८॥
अरथार्थी जीकलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते ।
त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःरुबं गच्छति दूरतः ॥ ९॥
धमकी इच्छासे यह प्राणी शाशानकोमी सेवन करता हे, निर्धन अपने
उत्पन्न करनेवालेको भी छोडकर दूर जाता हे ॥ ९॥
गतवयसामपि पुंसां येषामर्था भवन्ति ते तरुणाः ।
अर्थेन तु थे हीना वृद्धास्ते योवनेऽपि स्युः ॥ १० ॥
वृद्ध पुरुषोभेभी जिनके धन हैं वे तरुण हे, जो धनसे हीन हैं, वे युवा अव-
स्थामं ही इद्ध होते हैं ॥ १० ॥
स चार्थः पुरुषाणां षड्भिरुपायेमेवाति भिक्षया, नृप-
सेवया, कृषिकर्मणा, विद्योपाजेनेन, व्यवहारेण, बणिक्क-
मेणा वा ! सर्वेषामपि तेषां वाणिज्पेन अतिरस्क्रतोऽ्थलाभः
स्पात् । उक्तश्च यतः-
बह घन पुरुषोंको छ; उपायोंसे मिळता हे, भिक्षा, राजसेवा, खेतीका कार्य,
विद्याउपार्जव, लेनदेन वा वणिक्कमेसे | इन समे वाणिज्यसे सर्वेसम्मत लाम
होता है ।
कृता मिक्षाऽनेकर्वित्तराति नृपो नोचितमहो
क्षिः छिट्टा बिद्या शुहुविनयङ्वस्यातिविषमा ।
कुसीदादारिद्रचं पर करगतग्रन्थिशमना-
न्न मस्ये वाणिज्यास्किमपि परमं वर्तनमिह ॥ ११॥
अनेक पुरुषरने भिक्षा की है, राजाभी, योग्य बति नहीं देता है, खेती
छेरादायिनी है, विद्या गुरुकी विनयद्त्तिसे अति विषम हे, व्याजसे भी दारिद्र
होता है, कारण कि, दूसरेके ' हाथमे भानेसे ग्रन्थिशमन हो जाय, वाणिज्यसे
अधिक कोईमी जीबनोपाय नहीं मानताहूं । शिखारेणी छन्द है॥ ११ ॥
उपायानाश्च सर्वेषासुपायः पण्यसंग्रहः ।
धनाथ शस्यते होकस्तदन्यः संशयात्मकः ॥ १२ ॥
१ कोई धरोहर मारके ।
भाषारीकासमेतम् । (९)
सम्पूण उपयेमि बेचने योग्य द्रव्यका संग्रहही एक उत्तम हे और
सशयात्मक हें ॥ (२॥
तत्व वाणिज्य सप्तविधमर्थागमाय स्याचद्यथा गान्धिकऽध-
वहारो, निक्षेपभवेशो, गोष्टिककर्म, परिचितम्राइकागमो,
मिथ्याक्रषकथनं, कूटठुलामानं, देशान्तराद्धांडानयनख्रेति ।
उक्तश्च-
वह वाणिव्य सातप्रकारका घनके निमित्त होता हे, गन्धद्रव्यका व्यवसाय,
निक्षेप प्रवेश भथीत् रुपयेका अपने यहा जमा करना उसे व्याज देना, गोसम्ब-
न्वीकर्म, पहचाने हुए आहकोंका भावा ( कारण कि, जानाइभा प्राहक
दुरुक्ती नही करता है ), वस्तुका मिथ्या मोळ कहना ( थोडे मूल्यमे खरीद कर
आविक सोल बताना ), कमती तोला, देशाम्तरोसे बरतन द्रब्यादिका
लाचा, कहा हे कि-
पण्यानां गान्धिकं पण्यं किमन्यः काञ्चनादिभिः ।
यन्नेकेन च यत्क्रीतं तच्छतेन प्रदीयते ॥ १३ ॥
वचने योग्य इव्योमे सुगन्धि दश्यङ्ग व्यापार श्रेष्ठ हे और दूसरे सुवणोदिसे
क्याँहै; जो कि, एकसे मोळ छेकर सौको बचा जाता है॥ १९॥
निक्षेपे पातिते हर्म्ये श्रेष्ठी स्तोति स्वदेवताम् ।
निक्षेपी म्रियते तुभ्यं भदास्याम्प्रपयाचितम्॥ १४ ॥
धरोहर घरमे आनेसे सेठ अपने देवताको स्तुति करता है कि, यदि यह
घरोइरवाला मर जाय, तो मे तुझको भभिमत वस्तुसे पूजन करूगा | १४ ॥
मोष्टिककमेनियुक्त; श्रेष्ठी चिन्तयति वेतसा हृष्टः ।
व्लुधा वसुसंपूर्णा मयाद्य लब्धा किमन्येन ॥ १५ ॥
गोष्ठीकमस नियुक्त हुआ श्रेष्टी प्रसन्न मनहो विचारता हे, मेने धनसे पूर्ण
"पृथ्वीको प्राति की भोर क्या चाहिये | १९]
परिचितमागच्छन्तं आहकसुत्कण्डया विलोक्यासौ ।
हृष्यति तद्धनछुन्धो यद्धत्पुचेण जातेन ॥ १६॥
पहचाने ग्राहकको आता हआ देखकर उत्कठासे यह उसके धनसे ऐसे प्रसन्न
,दोताहे; जेसे पुत्र उत्पन्न होनेसे ॥ १६ ॥
(१०) पञ्चतन्त्रम् ।
अन्यच- “
अरसा~
पूणापूर्णे भाने परिचितजनवञ्चनं तथा नित्यम् ।
मिथ्याक्रयस्य कथनं प्रकृतिरिय स्यास्किरातानाम्॥१७॥
पूराकमती तोळकर नित्य पहचाने जनका वंचन करना, मिथ्या मोळ कहनाः
यह किराताकी प्रकृति है ॥ १७ !!
अन्यञ्च-
ओरमी-
द्विगुणं चिगुणं वित्तं भाण्डकयविचक्षणाः।
आप्लुवन्त्युयमाछोका दूरदेशान्तरं आत्ताः ॥ १८ ॥”
भाण्डक बंचनम चतुर दुगुन तियुव घरका दूरदराम जावेवाळं मनुष्य उद्यमः
प्रात हाते ह॥ १८॥”
इत्ये सम्मधाय्य मथुरामामी नि भाण्डानि आदाय शुभायां
तिथा गुरुंजनानज्ञातः सुरथाधिरूदः प्रस्थितः । तक्ष्य च
मगलबृषमा सञ्जीबकनन्दकनामानो -ग्रहोत्पन्नों धूवोंडारो
एस्थता ॥ तयारेकः सञीवका भिधानो यसुनाकच्छमवतीणेः
सन् पङ्कुपूरमासाद्य कलितचरणो यूगभंगं विधाय निषसाद!
अथ त तदवस्थमालोक्य वर्देमानः परं विषादमगमत् ।
तदर्थ च खेहाद्रहद्यः त्रिरात्रं याणनगंमकरोत्। अथ ते
विषण्णमालोक्य सा्थिकरमिहितम्-'भोः श्रेष्ठिन ! किमेव
बृषभस्यः कुत् सहव्याघसमाकुले बहपायेऽस्मिन् बने समः
स्तसाथः त्वया सन्देहे नियोजित: । उत्तख-
इस ,प्रकार मनम विचार, मथुराके जानेवाळे भाण्डोंको ठेकर, शुम तिथिमे
गुरजनाका भाज्गाळकर, रथपर चढकर चला, उसके दा भगळवृषम सर्जादक,
नन्दक, नापवार घरे उत्पन्न हुये भारवाहक थ; उनम एक सर्जावक बॉमिवाळा
बेळ यमुनाक अनुप देशमं' प्राक्त होकर, महादळदरमें फंसनेके कारण लेगडी टांग
हकर जुभा राय स्यत हुआ । उसका -यह : दशा देखकर चद्धमान परम
बिषादको प्राप्त इभा और उसके निमित्त प्रमसे आद्र्ददय होकर तीन रात्रितक
भाषाटीकासमेतम् । (११)
गमन न किया । तब उसको दुःखी देख सार्थियोंने कहा-“भो सेठ ! क्यो इस
बेळके निमित्त सिह व्याप्रसे युक्त अनेक विपत्तिवाळे इस वने सम्पूर्णे साथियोको'
तुमने सन्देहमे नियुक्त किया है, कहाहे कि--
न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशघेन्मतिमान्नरः । -
एतदेवात्र पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद्वरिरक्षणम ॥ १९॥ ?
बुद्धिमान् थाडेके निमित्त बहुतका नाश न करे, यह पडिताई है कि,थोडेहसे
बहुतकी रक्षा करे | १९ ॥?
अयासो तदवधार्य्यं सञ्जीदकस्य रक्षापुरुषान निरूप्य
अशेपसार्थ नीत्वा प्रस्थितः । अथ रक्षापुरुषा अपि बह्वपायं
तद्वनं विदित्वा सजीवक परित्यज्य एछतो गत्वा अन्येद्युस्तं
सार्थवाह मिथ्याहुः- स्वामिन्। मृतोऽसो सञआीवकोऽस्मा-
भिस्तु सार्थवाहस्याभीष्ट इति मत्वा वह्निना संस्कृतः” इति
तच्छुत्वा सार्थवाहः कृतज्ञतया सनेहाद्रेहइथस्तस्य ओर्व
देहिककियाः इषो त्सर्गादिकाः सवाश्चकार । सञ्जीवकोज्प्या-
युःशेषतया यमझुनासलिलमिश्रेः शिशिरतरवातेः आप्या-
थितशरीरः कथञ्चिदप्युत्याय यसुनातटसुपपेदे ॥ तत्र मरक-
तसहशानि बालतणाग्राणि भक्षयन् कतिपयैरहो भिहेरव्र्षम
इव पीनः ककुआन् बलवांश्च संउत्तः प्रत्यहं वल्मीकाशिखरा
आणि झ्ुंगाभ्यां, विदारयन् गर्जेमानः आस्ते । साइ चेदसु-
च्यते-
तव यह वैश्य इस बातको विचारकर, सज्ञांवकके निमित्त रक्षापुरुषोंको
निरूपण कर ओर सब सारथयोको लेकर चला । तब रक्षक पुरुषभी अनेक
कष्ट्युक्त उत्त वनको देख सजीवकको छोड उसके पीछे जाकर दूसरे ढिन सार्थ
वाहसे मिथ्या कहने ठगे-“'हे स्वामिन् | वह सज्जीवक़् मराया,हमने आप (सार्थ
वाह ) का प्यारा जानकर अग्निसे सस्कार किया?*-| यह सुनकर साथबाह कृत-
ता भोर प्रेमसे भाद्रेहृदय होकर उसकी औओर्वदेहिक क्रिया बृषोत्सगीदे सब
करता मया । ( इधर ) सर्जावकभी आयु शेप रहनेके कारण यमुनाजरुसे मिली
CNN
अत्यन्त शीतळ वायुद्वारा तृप्तशरीरसे किसी प्रकार उठकर यमुनाके किनारे आप्त
(१२) पञ्चतन्त्रस्।
हुआ, बहां मरकतर्माणकी समान छोटे तृणके भप्रमाग भक्षण, करता हुआ कुछ
दिलोंमें शिवजीके वृषमके समान स्थूळ ककुदइबाछा बलवान् हुआ प्रतिदिन
वह्मक्रके शिखरके अप्रभागोंको झुगोसे विदीणे करता गर्जता रहा । कहामी
सत्य है कि-
अरक्षितं तिष्ठाति देवरक्षितं सुरक्षितं देवहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि बने बिसाजितः कृतप्रयत्नोडपे गृहे बिन-
श्यति ॥ २० ॥
अप्रतिपाछित वस्तु देवसे रक्षित इई स्थित रहती है, भली प्रकार र्षित हुई
चस्तुभी देवसे अरक्षितहो नष्ट होजातीहै, अनाथमी वनमे त्यागन किया जीतांहे
यत्न करनेपरभी घरमे नहीं जीताहे, घंश्चस्थ वृत्त ॥ २० ॥
अथ कदाचित् पिगलको नाम सिंहः सर्वेम्रुगपारिव्वतःपिपा-
साकुल उद्कपानार्थ यमुनातटमवतीर्णः सजी वकस्य गम्भीर”
तरारावं दूरादेर अश्णोत् । तच्छुत्वा अतीव व्याङुलहृद्यः
ससाध्वसमाकारं प्रच्छाद्य बटतले चतुर्मण्डलावस्थानेन खवः
स्थितः । चतुर्मण्डलावस्थानं त्विदम्-सिहः सिंहानुयायिनः’
काकरवाः किवृत्ता इति। अथ तस्य कररकदमनकनामानो दो
शृगालो मन्त्रिपुत्रो भ्रष्टाघिकारी सदातुयायिनो आस्ताम् ।
तो च परस्परं मन्त्रयत॥ तत्र दमनकोऽब्रवीत् भद्र करटक !
अयं तावदस्मत्स्वामी पिङ्गलक उदकग्रहणार्थं यसुनाकच्छ-
मदतीय्य स्थितः स कि निमित्तं पिपासाकुलोऽपि निदृत््य
व्यूहरचनां विधाय दोर्मनस्येनाभिभूतोऽत्र वर्तले स्थितः"
करटक आह भद! किमावयोरनेन व्यापारेण! उक्त यतः-
एक समय पिंगळक नाम सिंह सम्पूर्ण गृगोसे युक्त प्याससे व्याकुळ जळ
पीनेके निमित्त यसुनाके किनारे प्राप्त हुआ, संजीवकका अधिक गम्भीर शब्द दूरसे
सुनता भया । बह सुन अत्यन्त व्याकुळ हृदय होकर भयके आकारको छिपाकर
घटदृक्षके नचि चतुमैण्डळावस्थान ( जिसके चारों ओर मृग बैठे हों ) से बैठा ।
चतुर्मण्डलावस्थान इसको कहते, कि तिह,सिहानुयायी, काकरव (काककेसे शब्द:
करनेबाल ), किंडल (क्यों उपस्थित हुआ है, इस दत्तान्तके जानतेत्राले ) बैठे ।
भाषाटीकासमेतम् । (१३)
तब उसके करटक, दमनक नामबाळे दो शुगाछ मत्रीके पुत्र अधिकारसे अष्ट
सदा अनुयायी ये । वह दोनो परस्पर सम्मति करने लगे, उसमे दमनक बोला-
“भद्र करटक!यह तो हमारा स्वामी पिंगछक जळ पानेको यमुनाकच्छ प्राप्त हो
स्थित हुआ थाया कारण हे कि,प्याससे व्याकुळ होकरमी छोटकर अपनी सेनाकी
मण्डल रचनाको विधानकर दुमेनस्कतासे तिरस्क्रत हुआ इस वट इक्षके नीचे
बैठा है?'करटक वोळा-“भड्र | हमारा इस व्यापारसे क्या छाभ हे,कहा भी है-
अव्यापारेषु व्यापार थो नरः कत्त॑मिच्छति ।
स एव निधनं याति कीलोत्पाटीव वानरः ॥ २१ ॥”
जो मनुष्य अवधिकारियोमे आधिकार करनेकी इच्छा करता है वही नाश
होता है, जैसे कीळको उखाडकर वानर | २१ ॥ ”
दमनक~-आह-“कथमेतत” ? । सोऽन्रवीत.-
दममक बोला “यह केसी कथा है! १? बह बोछा-
- कथा 3.
कस्मिश्चित् नगराभ्यासे केनापि वणिक्पुत्रेण तरुषण्ड-
मध्ये देवतायतनं कत्तेमारब्वम् । तत्र च ये कम्मेकराः स्थप-
त्पादथः ते मध्याह्ववेलायामाहाराथ नगरमध्ये गच्छन्ति ।
अथ कदाचित् तत्रातषङ्गिकं वानरयूथामितश्चेतश्च परिश्रमत
आगतम् । तत्र एकस्य कस्यचित् शिह्पिनोऽद्वस्फाटितोऽञ्र
नवृक्षदारुमयः स्तम्भः खदिरकीलकेन मध्यनिहितेन तिष्ठति
एतस्मिव् अन्तरे ते वानराः तरुशिखरप्रासादशब्गदा रुपर्य-
न्तेषु यथेच्छया क्रीडितमारब्धाः । एकश्च तेषां भत्यासन्नमृत्युः
चापह्यात् तस्मिन्नद्धेस्फाटितस्तम्मे उपविश्य पाणिभ्यां
कीलकं संगृह्य यावत् उत्पाटायितुमारेमे तावत तस्थ स्तम्भः
मध्यगलञ्गषणस्य स्वस्थानात् चलितकीलकेन यद्वृत्तं तत्मा-
गेब निवोदेतम् । अतोऽहंबवीमि “अव्यापारेषु” इति ।
आवयोः भक्षितशेष आहारोऽस्त्येव, तत् किमनेन व्यापा-
रग? दमनक आह-“तत कि मवान् आहाराथी केबलमेचा
तन्न युक्तम् । उक्त च-
(१४) पञ्चतन्त्रम् ।
किस एक नगरके समीप किसी वे्यपुत्रने दृक्षमण्डर्लाके मध्यमें देवस्थान
बनाना प्रारंभ किया, उसमें जो कर्मचारी थे शिल्पी आदि थे दुपहरके समय
भोजनके निमित्त नगरमें जातेये । एक समय जपनी जातिके अनुकमसे प्राप्त
वानरयूथ इधर उधर घूमता इभा आया, वहां किंसी एक कारोगरका आधा
चीरा इभा अज्ञनदृक्षका काष्टस्तम्स बाचर्मे खेरकी खुंटी अडाया हुआ था, इसी
समय वे वानर वृक्षोंके शिखर प्रासाद श्वंग तथा काष्टके चारों भोर क्रीडा करना
प्रारम्भ करते हुए एक उनमेंसे निकटमृत्युवाछा चंचछत्तासे उस आधे फाडे हुए
स्तम्भपर बैठकर हाथसे उस खूंटको पकड ज्योंही उखाडने ढगा कि त्योही
उसके स्तम्मके छिद्रमें कटके इए इषणो (अंडकोष) की अपने स्थानसे कौ्ठाके
` उखडनेसे जो दशा हुई है सो.पहळेही निवेदन कर दी हे।' इससे में कहता हूं
“अनधिकारमे” इत्यादि । हम दोनोंका खावेसे बचा मोजन स्थित है हो, फिर
इस व्यापारसे क्या हे” | दमनकने कहा-तो क्या आप केवळ आहारमात्रकी
इच्छा करते हो ? सो युक्त नहीं है, कहा है कि-
सुदृदाइपकारकारणाद्द्विपतामप्यपकारकारणात् t
सूपसंश्रय इष्यते बुघेजठरं को न बिभाति केवलम् ॥ २२
मित्रोंका उपकार करनेसे,शत्रुओंका अपकार करनेसे बुद्धिमान् राजाका आश्रय
करते हैं, केवळ पेट कौन नहीं भरता हे॥ २२॥
किन
कारण कि,
यस्मिव् जविति जीवन्ति बहवः सोऽत्र जीवतु ।
वर्यासि किं न कुर्वेन्ति चळ्च्या स्वोदरपूरणम्! ॥ २३ ॥
जितके जीनेसे बहुतसे पुरुष जिये, सोई जाता है और पक्षी क्या चोंचसे
अपना उद्रपूर्ण नहीं करते हैं १ ॥ २३ ॥
सथाच- *
औरसी-
यज्जीव्यते क्षणमपि रथितं मङुष्परविज्ञानशोय्यविभवाय्यः
गुणे? समेतम् । तन्नाम जीवितमिह प्रवदान्ति तज्ज्ञाः काको
En a
ऽपि जीवति चिर बलि च चुकते ॥ २४.॥ `
माषाटीकासमेतमू । (१५)
० rr
जो क्षणमात्र भी मनुष्योसे प्रतिष्ठित होकर जीना है,विज्ञान, शूरता, ऐउवर्षके
गुणोंसे सहित जो जीवित है, उसके जाननेवाळे उसीका नाम जीवित कहते हैं,
च
यो तो कौचाभी बहुत काङतक जीता भौर बाछ खाता हे ॥ २४ ॥
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यो नात्मना न च परेण च बन्धुवर्गे दीने दयां न कुरुते
न च मत्त्यवर्मे। कि तस्य जीवितफलं हि मनष्यलोके काको
ऽपि जीवति चिर बलि च भुंक्ते॥ २०॥
जो न अपने, न दूसरोमें, न बन्धुकीमें, न दीनेमें, न मनुष्योमे दया करता
है, मनुष्यछोकमे उसके जीवेका क्या फल हे, यातो कोभामी चिरकाळतक
जीता भोर बढि खाता हे ॥ २५ |
सुपूरा स्यात्कुनदिका सुपूरो माषिकाअलिः ।
सुसन्तुष्टः कापुरुषः स्वल्पकेनापि तुष्यति ॥ २६॥
कुनदी जब्दी भर जती है, मूषको अजळी शीघ्र भरजाती हे, कापुरुष
शीघ्र सतुष्ट हो जातेहे, यह खत वस्लुसे ही सन्तुष्ट हो जाते है ॥ २६ ॥
फकिश्व-
कारण कि- |
कि तेन जातु जातेन मातुर्योदनहारिणा ।
आरोहति न यः स्वस्थ वंशस्याग्रे ध्वजो यथा ॥ २७॥
माताके यौवन हरनेवाले उस पुरुषके जन्मसे क्या हे, जो अपने बशमे
ध्वजाके अग्रमागकी समान नहीं स्थित होता है ॥ २७॥ '
परिवत्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते ।
जातस्तु गण्यते सोऽत्र यः स्फरेच ख्रियाधिकः॥ २८ ॥
बदलते हुए संसारमै कोन नहीं मरा और कोन नहीं उत्पन्न हुआ, बही जन्म
छेनेवाळा गिना जाता है, जो अधिक लक्ष्मीते स्फुरयमानहो ॥२८॥
किश्व- ,
आर मी-
जातस्य नदीतीरे तस्यापि तणस्य जन्मसाफल्यस् ।
य॑त्सलिलमञनाकुलजनहस्तालम्बनं भवति ॥ २९ ॥
१
१५
(१६) पञ्चतन्त्रम् ।
नदीके किनारे उत्पन्न हुए उस तृणका भी जन्म सफळ है, जो जल्मे
डूबनेसे घवडाये हुए सबुष्योका भवढम्बन होता है ॥ २९ ॥
तथाच
और देखो-- |
स्तिमितोन्नतसश्चारा जनसन्तापहारिणः ।
जायन्ते विरला लोके जळदा इव सञ्जनाः ॥ ३० ॥
ऊँचे नीचे संचरण करनेवाले जनके सन्ताप हरनेवाळे मेघकी समान कोई
सजन विरछेही होते हे ॥ ३० ॥
निरतिशयं गरिमाणं तेन जनन्याः स्मरन्ति विद्वांसः ।
यत्कमपि बहति गर्न महतामपि यो गुरूमबलि ॥ ३१ ॥
विद्वान् लोग उसके जन्मसे माताकी अधिक मारता स्मरण करते है कि,उसने
इसको किस प्रकार घारण किया है, जो बडे पुरुषॉको भी भारी होता है॥ ३१॥
अप्रकटीकृतशक्तिः शक्तोऽपि जनस्तिरस्क्रियां लभते ।
निवसन्नन्तदोरुणि लंघचो बहिन तु ज्वलितः ॥ १२॥”
शाक्ति न प्रगट करनेबाळा समर्थमी जनोंते तिरस्कृत होजाता हे,काठके मीतर
रइनेवाळी अग्निको सब कोई उलंघन करता है, न जळती हुई को॥ ३२ |
करटक अआाह-
करटक बोछा-
“आवां तावदभधानो तत्किमावयोरनेन व्यापारेण । उक्तश्व-
“इम तों यहां भप्रधानहें,सो हमे इस वातीसे क्या प्रयोजनहे | कहा भी है-
आपृष्टोऽनाधरधानो थो ब्रूते शज्ञः पुरः छुधीः ।
न केवलमसंमानं “लभते च विडम्बनम् ॥ ३३॥
विना एछे जो अप्रधान कुबुद्धि इस संसारमै राजाके आगे बोळता है, वह
केवळ असम्मानकोही प्राप्त नहीं होता किन्तु अवपानताकोमी प्राप्त होता है ॥३३॥
तथाच-
और मो--
वचस्तत्र भयोक्तव्य॑ यत्रोक्तं लभते फलम् ।
स्थायीभवति चात्यन्तं राग; शुक्रपटे यथा ॥ ३४ ॥ ?
भाषाटीकासमेतम्। (१७)
वचन वहां कहना चाहिये, जहाँ कुछ कहनेका पछ हो जैसे कि,सफेद
वल्लपर रग अत्यत स्थायी होता हे ॥ ३४ || ”
दमनक आह- मा मा एवं बद्।
दमनक बोछा-- ऐसे मत कहो |
अध्रधानः प्रधानः स्यात्सेवते यदि पार्थिवम्।.
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवजितः ॥ ३५॥
याद राजाका सववकर ता भप्रधाचभा प्रधान हाजाता हूं सर सवास
वार्जत हा ता प्रधानभा अप्रधान हॉजाता हं) डे ६]
यत दक्तश्व-
कारण कहासा ह~
आसन्नमेव नृपतिर्भजते मनुष्य
विद्याविहीनमकुलीनमसंस्ङ्गतं वा ।
प्रायेण भूमिपतयः ्रमदा लत्ताश्च
यत्पाश्वेतो भवति तत्परिवेष्टयान्ति ॥ ३६॥
राजा निकटकेही मनुष्यकों भजतहें, चाहे बह वियाह्दीन, अकुछीन, सस्कार-
हीन हो, प्रायः राजा,ल्ी और वेळ जो निकट होताहै उसीको वेष्टन करते हैं ३६
तथाच-
और भी-
कोपप्रसादवस्तूनि थे विचिन्वन्ति सेवका? ।
आरोहन्ति शनेः पश्चाद्कन्वन्तमपि पार्थिवम् ॥ ३७॥ |
जो सेवक कध ओर प्रसक्षताके बिषयको खोजते रहतेहे, वे-क्रामसि विरक्त
गजाकोमी प्राप्त होते हँ ॥ ३७ | *
विद्यावतां महेच्छानां शिल्पविक्रमशालिनाम ।
सवावृत्तिविदाचेब नाश्रयः पार्थिवं विना ॥ ३८ ॥
विद्यायुक्त, कारीगर भर विक्रमसे सम्पन्न, सेपाइत्तिकें जाननेवाठे मह्यहा- ˆ
पोको राजाके विना अन्य आश्रय नहीं है | १८ ॥
श्
(१८) पश्चतन्त्रम् ।
नि.
य जात्यादिमहोत्साहान्नरेन्द्रान्नोपयान्ति च।
. तेषामामरणं भिक्षा प्रायश्चित्तं विनिर्मितम् ॥ ३९ ॥
जो अपनी जाती आदिके महा अमिवानसे राजाके समीप नही जातेहेँ, उनको
मरण पर्यन्त मिक्षाका प्रायश्चित्त कहे ॥ ३९ ||
थे च मराहुइरात्मानो दुराराध्या महीजः ।
्रमादालस्यजाव्यानि ख्यापितानि निजानि तेः ॥ ४० ॥
और जो दुराआ कहते हैं कि राजा दुराराध्य ( कठिनतासे सेवने योग्य ) हैं,
उन्होंने अपची प्रमाद, भाळस्य और जडता प्रगट की है | ४० |
सर्पान् व्याघ्रान् गजान् सिंहान् दृष्टोपाथेर्वशीकृतान् ।
* राजेति कियती मात्रा घीमतामप्रमादिनाम् ॥ ४१ ॥
सपे, व्यात्र, गंज, सिंहोंकोमी उपायोंसे वर्शाभूत देखा हे, भप्रमादी छुद्धि-
मानोंको राजाका वझमें करना क्या बडी बात दै? ॥ ४१ ॥
राजानमेव संश्रित्य विद्वान्याति परां गतिम्।
विना मलयमन्यत्र चन्दनं न प्ररोहति ॥ ४२॥
राजाकेही आश्रयसे विद्वान् परमगति ( उन्नति) को प्राप्त होता है, मळ्याच-
*ळके विना अन्यत्र चन्दन नहीं ऊगता है ॥ ४२ ॥
धवलान्यातपत्राणि वाजिनश्च मनोरमाः। |
सदा मत्ताश्च मातङ्गाः प्रसन्ने सति भूषतो ॥ ४३ ॥!!
खेत छत्र, मनोहर घोडे, मच मातङ्ग यह सदा राजाको प्रसननतासे
७७७७ उपे.
५ द्र
होते हे ॥ ४३ |
करटक आह-
करटक बाठा
, “अथ भवान् कि कश्चेमनाः १” । सोजबीत-“अद्य
अस्मत्स्वामी पिङ्गलको भीतो भीतपरिवारश्च वर्तते । तव
एनं गत्वा भयकारणं विज्ञाय सन्धिविप्रहयानासनसंश्र-
यद्वैवीभावानामेकतमेन संविधास्थे ”। करटक आह-“कथं
वेत्ति भवान यद्भयाविष्टोऽयं स्वामी ९” सोऽब्रवी त~“ शेयं
किमत्र । यत उक्तश्च-
भाषाटीकासमेतम्। (१९)
, "किर आपकी क्या करनेकी इच्छा है! ”? बह बोळा-“आज हमारा
स्वामी पिंगळक डरेकुटुम्बसहित भीत स्थितहे सो इसके निकट जाय
डरके कारणको जान सन्धि ( मेळ ) विग्रह ( युद्ध) यान ( शन्रुके प्रतियात्रा )
आसन ( समयका देखना') सश्रव ( बलवानसे अभियुक्त हविक्ष कारण सब-
छका आश्रय ) इनमेसे एकका आश्रय करूगा | ? करदक बोछा- आप केसे
जानते हैं कि, छामा भयभीत हेट" बह बोडा-- इस जानने क्या हे,कहा ह `
उदीरितोऽर्थः पशुनापि गह्यते
हयाश्च नागाश्च वहन्ति चोदिताः
अदुक्तमप्यू्दीत पाण्डता जनः
परेङ्वितश्चानफला हि बुद्धयः ॥ ४४॥ `
` कहें अको पञुभी ग्रहण करठेते हैं, हाथी, घोडे भ्ररेतडुए ( भार ) वहन
करते हैं, पण्डितजन दिनकी बातकोमी ग्रहण करते, क्योंकि पराई चेशके
ज्ञान होनेके फळवाळी बुद्धियाँ हाताह || ४४ ॥
तथाच मचः
जैसाही मनुजीने कहाहै--
आकारीरिङ्ितेर्गत्या चेष्टया भाषणेन च ।
नेत्रवक्कविकारेश्च लक्ष्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ ४५॥
आकार (अवयव विषाद प्रतादको प्राप्त से सकेतसे, गमन, क्रिया, भाषण,
नेत्र और मखके विकारते, मनके अन्तरकी बात जानी जाती है॥ ४५ ||
तदद्यन भयाङुल भाष्य स्वदाळभभावणानभय कुत्वा वशा”
कृत्य च निजां साचिव्यपददी समासादयिष्यामि” | करटक
आह-“अनभिज्ञो भवान् सेवाधर्मस्य । तत्कथमेनं वशीकरि-
ष्यसि १” सोऽब्रवीत्~“ कथमहं सेवानभिशः मया हि तातो-
त्सङ्घे कडता अभ्यागतसाधूनां नीतिशास्त्रं पठतां यच्छतं
सेवाधमस्य सारभूत हाद स्थाप श्रूयता तन्चद्म्
सो इस भयसे व्याकुळ इएको प्राप्त होकर अपनी छुद्धिसे निभय कर इसको
वशीभूत कर अपनी मन्निषदवीको प्रास हृगा!7| करटक बोळा-“आप सेंवाधर्मसे
अनामिज्ञ हो तो इसे किंस प्रकारले बशीभूत करोगे” ! । षह बोका-में किंस
अकारं सेवासे अनभिज्ञ मैने पिताकी गोदीमे खेळते इए अभ्यागत साघुओकी
(२० ) , पञ्चतन्त्रम् ।
नीतिझाल्न पढते इए जो सुना है, वह सेवाधर्मका सारभूत हृदयमें स्थापन कर-
लिया है उसे सुनो-
खुवणेपु्पितां पृथ्वी विचिन्वन्ति नराखयः ।
शूरश्च कृतविद्यश्च यश्च जानाति सेवितुम् ॥ ४६ ॥
विक्रमी, विद्वान् और सेवक सुबर्णके पुष्पवाळी पृथ्वीको खोज करते
( ब्रातं करते हैं )॥ ४६ ॥
सा सेवा या प्रभुहिता ग्राह्या वाक्य विशेषता । `
आश्रयेत्पार्थिवं विद्वांस्तद्ाारेणेव नान्यथा ॥ ४७ ॥
बही सेवा दै, जो प्रभुका हित करनेवाली है, वह प्रभुके वाक्यसे प्रहणकरी
जाती है, विद्वान् पुरुष उस ( वाक्य ) द्वारसे राजाका आश्रय करे और उपाय
नहीं हे॥ ४७॥
यो न वेत्ति गुणान्यप्य न तं सेवेत पाण्डितः ।
न हि तस्मात्फलं किंचितछुकृष्टादूषरादिव ॥ ४८ ॥
जो जिसके गुण न जाने, विद्वान् उसकी सेवा न करे, कारण कि, उससे
कुछ फल नहीं होता, जेते उषर भूमिके जोतनेसे ॥ ४८ ॥
द्रग्यमककतिहीनोऽपि सेव्यः सेव्यगुणान्वितः ।
भवत्याजीवनं तस्मात्फलं कालान्तरादपि ॥ ४९ ॥
घन और प्रक्कापिसे हीन पुरुषमी सेवर्नाय शुणोसे युक्त हो तो सेवा करनी
नाहिये, उससे आजीवन और काळान्तरसे फळकी प्राप्तिमी होसकती है ॥४९॥
अपि स्थाणुबदासीनः झुष्यन्पारिगतः क्षुधा । ,
न त्वेवानात्मसम्पन्नादृत्तिमीहेत पण्डितः ॥५० ॥ -
ठूंठकी समान स्थित हुआ सूखता हुआ महाभूंखसे स्थित रहना (अच्छा)
हे परन्तु चतुर पुरुष ज्ञानशून्य प्रभुसे इत्तिप्रात होनेकी इच्छ न करे ॥ १० ॥
सेवकः स्वामिनं दवेष्टि कृपणं परुषाक्षरम |
आत्मानं किं स न द्वेष्टि सेव्यासेव्यं न वेत्ति यः ॥ ५१ ॥
सेवक कृपण स्वामीको कठिन अक्षरोंसे निन्दा करताहे, परन्तु बह अपनी ,
निन्दा क्यों नहीं करता? वह जो सेव्य और असेव्यको नहीं जानता हे, ( कारण
mn
कि यह कपण हे वा नहीं पहले ही वह विचार कर स्वाप्रीकी सेवा करे )५१॥
भाषाटीकासमेतम् | (२१)
यमाश्रित्य न विश्रामं क्चुधारत्ता यान्ति सेवकाः
सोऽकेवन्नपातिर्त्याञ्यः सदा पण्पफलो षे सन् ॥ ५२ ॥
जिप्रका प्राप्त हाकर क्षुत्रास व्याकुळ सवक विश्रामको प्राप्त नहाँ होते ६, वह
सदा पुष्प फळ्युक्तमा राजा आकके वृक्षको समान त्यागने योग्य हे ॥ ५२ ॥
राजमातरि देव्यां च कुमारे मुख्यमन्त्रिणि ।
पुरोहिते प्रतीहारे सदा वर्तेत राजघत् ॥ ५३ ॥
राजमाता, पटरानी, कुमार, मुख्यमत्री, पुरोहित ओर दारपाल इनसे राजाको
समान वत्तोव कर || ५३ ||
जीवेति भत्रु॒ मोक्तः कृत्याकृत्यविचक्षणः
करोति निर्विकल्प ¦ स भवेद्राजवकमः ॥ ५४ ॥
" कृत्य अहृत्यका जाननबाडा पुकारतेसे जाव एसा कहे और विना बिचारे आज्ञा
सम्पादन करे वह राजाका प्रिय होताहे ॥ १४ ॥
प्रशुपसादजं वित्तं सुप्राप्त यो निवेदयेत् ।
वख्ाग्रश्व दघात्यङ्घ स अवैद्राजवल्लम; ॥ ९५ ॥
जी प्रभुका प्रसनतास प्राप्त हुए द्रव्यत सन्ताष प्रकाश वार जार
उसके घस्र आदि अपने अँगमे धाएण करे वह राजाका प्रिय होताह ॥ ५१५१
अन्तःपुरचरेः साद्धै यो न मन्त्रं समाचरेत् ।
न कलत्रैनरेन्द्रस्य स भवेद्राजबछभः ॥ ९६ ॥
अन्तःपुरे रहनेवाठोंके साथ जो सळाह नहीँ करता हे, न राजाको कल
भोसे वात करताहै, बह राजप्रिय होताहै ॥ ५६ ॥
यूतं यो यमदूताभं हालां हालाह लोपमास ।
८ पश्येद्ारान्ट्थाकारान्स भवेद्राजवछमः ॥ ५७॥
जुएका यमदूतका समान, सुराका (वपक! समान, लियाकां झाव्सत आकार
बाळी देखता है, वह राजप्रिय होता है॥ ५७॥
युद्धकालेउग्रगो यः स्यात्सदा एष्ठाउुगः पुरे ।
्रभोद्वाराश्रितो हम्ये स भवेद्राजवछभः ॥ ०८६
जो युद्वकाळमे आगे चळे, पुरमे पीछे २ चळ, महळम प्रमुक दार (स्थत रह
भह राजाका प्रिय होता हे ॥ ५८ ॥
(२२) पश्चतन्त्रम् ।
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सम्मतोऽहं विभोनित्यमिति मत्वा व्यतिक्रमेत् ।
कुच्छेष्वापि न मय्यादां स भवद्राजवछभः ॥ ५५ ॥
म प्रभुका [नव्य सम्मत हू; एस बिचार कर जा काठनताम भा मयादाकई
आक्रमण नहीं करता है वह राजाका प्रिय होता है ॥ ९९ ॥
द्वेषिद्वेषपरो नित्यमिष्टानामिष्टकर्मक्कत् ।
यो नरो नरनाथस्य स भवेद्वाजवछ्मः ॥ ६० ॥
जा राजाक हाषयास नित्य द्रोह करता ह, ।प्रबजनाका (बत्य (प्रय करता ह,
चह राजाका प्रप हाता || द् ०॥
प्रोक्तः प्रत्युत्तर नाह निरुद्ध प्रभुणा च यः ।
न समीपे हसत्युचेः स भवेद्राजबळमः ॥ ६१ ॥
जा प्रभक कहनंपर ववरुद्ध उत्तर नहा दता ह समापम उच स्वरस नही हस-
ताहे, षह राजप्रिय होता हे || ६१॥
यो रण शरणं तद्वन्मन्यते भयवर्जित; ।
प्रवास स्वपुरावासं स भवेद्राजर्बछभमः ॥ ६२ ॥
+ जों भयतहतत हो युद्धका गुहचत् माचता ह,परदराका अपच नगरका समान
मानता है, वह राजबलछ॒भ हाता हं ॥ ६२ ॥
न कुर्यान्नरनाथस्य योषिद्धिः सह सङ्गतिम् ।
- न निन्दाँ न विवादं च स भवेद्राजवछभः ॥ ६३ ॥
राजाकी ल्ियोके साथ संगती न करे, तथा उनकी निन्दा और विवाद न
करे, वह राजाका प्रिय होताहे ॥ ६३ ॥!!
ररक आह- अथ भवान् तत्र गत्वा कि तावत् प्रथमं
वक्ष्याति तत् तावड्च्यताम् १ !'
करटक बोळा-“तो तुम प्रथम वहां जाकर क्या कहोंगे, वह तो कहो ! 7
दमनक आह-
दनक बोढा-
उत्तरादुत्तर वाक्ये बदतां सम्प्रजायते ।
सुवाष्टिगणसम्पन्नाह्दीजाद्वीजमिवापरम् ॥६४॥ ˆ
“कहनेसे वाक्य उत्तरोत्तर प्रदत्त हो जाता है, जसे सुश्ष्टिके गुणसे बीजसे
बीज होताहे ॥ ६४ ॥
भाषाटीकासमेतम्। (२३)
अपाथसन्दर्शनजां विपत्तिमुपायसन्दशेनजाश्च सिद्धिम् ।
मेधाविनो नीतिएणप्रयुक्तां पुरःस्फुरन्तीभिव वर्णयन्ति ६५
"अपायसे प्राप्त होनेवाढी विपाते, उपायके करनेसे सिद्धि बुद्धिमान् नीतिके
गुणसे प्रयुक्त की हुई आगे स्फुरायमान होते एकी समान वर्णन करतेहे ॥६९॥
एकेषां वाचि शुकवदन्येषां हृदि मूकवत् ।
हादि वाचि तथान्येषां वल्ण वरगन्ति सूक्तयः ॥ ६६॥
किन्हीके वचन बोळमेमे तोतेकी समान मधुर और मनमे कपट, कोई 'हृदयमें
मूकवत् भर्थात् वाक्य तो सुननेमे कठोर भौर हृदय कपटशूत्य, दूसरे पुरुषोंके
सुवचन हृदय और बचन दोनोंसेही सारताको प्रगट करते हैं ॥ ६६ ॥
न च अहमप्रातकाले वह्ये । आकर्णितं मया नीतिसारं
पितुः पूवेमुत्सङ्घै हि निषिवता । व
में असमयके वचनोको न कहूगा, पिताकी गोदीको सेवन करते हुए पहले
मैने सुना है ।
अप्राप्तकाले वचनं बृहस्पतिरपि बुवन्।
लभते बढ्ववज्ञानमपमानश्व पुष्कलम् ॥ ६७॥ए'
अप्राध काळके वचनोंको बृहस्पतिमी कहे तो बहुत अवज्ञा और अपमानको
प्राप्त होते हैं ॥ ६७॥ ”
करटक आइ-
करटक बोछा-
“ दुराराध्या हि राजानः पर्वता इव सर्वदा ।
व्यालाकीर्णाः सुविषमाः कठिना इष्टसेविताः ॥ ६८ ॥
“परवेतकी समान राजा सदा दुराराध्य हैं, जैसे कि राजा और परेत सर्प
{ दिसजन ) श्वापद जीबोसे युक्त दारुण भोर बीचे ऊचे मागांसे विषम होते हैं,
इसी प्रकार राजा दुष्ट सेवित होनेस कठिन होते हैं ॥ ६८ ॥
तथाच-
ओर देखो--
भोगिनः कञ्चुकाविष्टाः कुटिलाः छूरचेष्टिताः ।
सुडष्टा मन्नसाध्याश्च राजानः पन्नगा इच ॥ ६९ ॥
(२४) चञ्चतन्त्रम् ।
सुख भोगमें रत, फणावाळे,बल्लधारी, केचछीवारी, कुटिळ ( कपटी ), टेढी
गतिवाळे, निठुरचेष्टावाळे, दुष्टराजा सर्पेकी समान मन्त्र चित्तानुदृत्तिसेही
साध्य होते हैं ॥ ६१९॥ - *
द्विजिद्दाः छूरकमोणोऽनिष्टाश्िद्रादसारिणः ।
दूरतोऽपि हि पश्यन्ति राजानो झुजगा इब ॥ ७० ॥
दो जिहवाबाळे, क्षण क्षणमे भिन्न बचन कहनेवाळे, करके करनेवाले, अनिष्ट
( निष्पत्तिरहित ) दोषको देखनेवाळे, ( बिलमें गमन करनेवाले ) राजा
सर्पोंकी समान दूरसेही देखते हैं ॥ ७० |
स्वल्पमप्यपकु्वन्ति थेऽम्रीष्टा हि महीपतेः ।
ते वह्वाविष दह्यन्ते पतङ्गाः पापचेतसः ॥ ७१ ॥
जो राजाके इष्टपुरुप उनका थोडामी भनिष्ट करते हैं, वे पापचित्तवाळे
अग्नि पत्तंगकी समान जळते हैं॥ ७१ ॥
ढुरारोह पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम् ।
स्वस्पेनाप्यपकारेण ब्राह्मण्यमिव इुष्याति ॥ ७२॥
सब लोकोंसे नमस्कार करनेके योग्य राजोंका पद दुरारोह ( कठिमसे प्राप्त )
हे, थोडेसेमी अपकारे ब्राह्मणत्वकी समान दूषित होजाता हे | ७२ ॥
दुराराध्याः भियो राज्ञा डुरापा इुष्पारे्रहाः ।
तिष्ठन्त्याप इवाधारे चिरमात्मनि संस्थिताः ॥ ७३॥”
राजलक्ष्मी कठिनतासे सेवर्नाय होसक्ती हे, इसी कारण दुळेस और प्राप्य
होनेको अशक्य है, लक्ष्मी भाधार (पात्र ) में जळकी समान यत्नसे रक्षित
की हुईं चिरकाळतक अपने पास रहती है ॥ ७३ ॥"
' दमनक आह-“ सत्यमेतत्परं किन्तु-
दमनक बोळा,- यह सत्य हे किन्तु-
यस्य यस्य हे यो भावस्तेन तेन समाचरेत् !
अनुप्रविश्य मेधावी क्षिप्रमात्मवशं नयेत् ॥ ७४॥
जिस जिसका जो जो भाव हे; उत उस भावसे उसको सेवन करे,
बुद्विमान् उसमें प्रवेश कर शीघ्र अपने वशमे करे ॥ ७४ |
भत्ते श्ित्तानवात्तित्वं सुबतं चानुजीविनाम् ।
राक्षसाश्चापि गृह्यन्ते नित्यं छन्दातवत्तिमिः ॥ ७५ ॥ `
भाषाटीकासमेतम् । (२५)
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स्वामीके चित्तके अनुसार वर्तना अनुजीवियोका सुशीळ है, निरन्तर
उनके भाइयके अनुसार चळनेवाछे मनुष्य 'राक्षसोकोमी वश करडेत हैं ॥७९॥
सरुषि नृपे स्तुतिवचनं तदभिमते प्रेम तद्दिषि द्वेषः ।
तद्दानस्य शंसा अमन्त्रतन्त्रं वशीकरणम् ॥ ७६॥ ”
राजाके क्रोधकरनेमै स्तुतिके बचन, उनके इष्टे प्रेम, उनके द्वेषबालेसे द्वेष,
उनके दानकी प्रशसा, बिना मत्रके वशीकरण तत्र हे ॥ ७६ ॥ ”
करटक आह-
करट बाळा
“'्यद्धेवमनिमतं तहि शिवास्ते पन्थानः सन्तु । यथाः
भिलाषितम् अनुष्ठीयताम् ” । सोऽपि प्रणम्य पिङ्गलका"
भिमुखं तस्ये । अथ आगच्छन्तं दमनकमालोक्य पिङ्गलको
द्वाःस्थमबदी त्-' अपसार्य्यतां वेत्रलता । अयमस्मार्क चि-
रन्तनो मन्त्रिपुचो दमनकोऽव्याहतप्रवेश्ः। तत्मवेश्यतां द्विः
तीयमण्डलभागी” इाति । स आह-“थथा अवादीत् भवान्
इति । अथोपशुत्य दमनको निर्दिष्टे आसने पिङ्गलकं प्रणम्य
प्राप्तातुज्ञ उपाविष्टः । स तु तस्य नखकुलिशालंकृत॑ दक्षिण-
पाणिसुर्पारे दर्वा मानपुरःसरसुवाच- अपि शिवं भवतः !
कस्माच्चिरात दृष्टोऽसि ?!। दमनक आह-“'न किञ्चिदेव
पादानामस्मामिः प्रयोजनम् । परे भवतां प्राप्तकाले बक्तव्य
यत उत्तममध्यमाधमैः सर्वैरपि राज्ञां प्रयोजनम् ।
“जो यह विचारहे तौ आपके मार्ग मगळकारी हों । यथेच्छ अनुष्ठान
करो” | बहुभी प्रणामकर पिंगलकके सन्मुख चढा । तब भाते इए दमनककों
देखकर पिंगळक द्वारपालसे बोळा-“वेत्रजता ( दड ) अळ्गकरो, यह
हमारा प्राचीन मन्त्रापुत्र बेरोकटोक प्रवेशवालाहै सो आनेदो दूसरे मण्डछ
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(आसन ) का अधिकारी है” | वह बोला--/जों कुछ आप आज्ञा देते हैं
तब जाकर दमनक दिये हुए आसनमें पिंगळकको प्रणाम करके बेठा । वह तो
उसके नखरूपी वन्ने अलंकृत दक्षिण हाथको ऊपर रखकर सन्मानसे बोढा-
“आपको मगर है | क्यों बहुत दिनोमें दीखे !”दमनक बोढा--श्रीमानके चर-
(२६) पञ्चतन्त्रस्।
णोंका यद्यपि हमसे कुछ प्रयोजन नहीं है परन्तु आपसे समयपर वचन कहना
उचितही है.कारण कि,उत्तम,मध्यप्र,अधम सभीसे राजाओंका प्रयोजन होता है |
उक्तश्च-
कहामी है"
दन्तस्य निष्कोषणकेन नित्यं कणस्य कण्डूयनकेन वापि ।
तृणेन कार्य्यं भवतीश्वराणां किमंग वाग्घस्तवता नरेण७७
दांतोंके कुरेदनेसे वा नित्य कणोके खजानेसे तृणसे भी राजोंका कार्थ
होतांहै हे भङ्ग ! वाणी और हाथवाळे मनुष्यसे कार्य होता हे सदा तो
कहनाही क्या हे || ७७॥
तथा वयं देवपादानामन्वयागता भृत्या आपत्स्वपि पृष्ठः
गामिनो यदापि स्वमधिकारं न लभामहे तथापि देवपादा-
नामेतत सुक्तं न भवाति ।
इसी प्रकारसे हम स्वामीके चरणोंफे कुळक्रमसे प्राप्त हुये मत्य आपदेमेंभी
पीछे चडनेवारे हैं यद्यपि अपने अधिकारको प्राप्त नहीं हैं तौमी श्रीमानके
चरणोंकी यह योग्य नहीं है ।
उक्त
कहाभी है-
स्थानेष्वेव नियोक्तव्या भृत्याश्चाभरणानि च ।
न हि चूडामणिः पादे प्रभवामीति बध्यते ॥ ७८॥
भृत्य और गहने स्थानमै नियुक्त करने चाहिये । भैं प्रभु ऐसा मानकर
चुडामाण ( झिरका भूषण ) चरणपर कोइ धारण नहीं करता हे | ७८ ॥
यतः -
कारण- |
अनभिज्ञो शुणानां यो न भृत्येरठगम्यते ।
धनाढ्योऽपि कुलानाशप ऋमायात्ताशप भूपातः NSN
जो गुणोंसे अनभिज्ञ है; मत्य उसको साथ नहीं देते, चाहें बह् धनाढय
कुलीन भीर क्रमायात राजा हो ॥ ७९ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (२७)!
उक्तश्व-
कहा हे वि-
असम समायमानः समश्च पारहायमाणसत्कार£
घुरि यो न यज्यमानखिमिरथपाति 'त्यजाति मृत्य; ॥८०॥
जो मृत्य असमान भुत्योसे समानताको प्राप्त किया जाय तुल्य भुत्योसे दूर
सत्कारवाळा किया जाय तथा कार्यमारमे नियुक्त न किया जाय इन तीन कार-
णोसे मृत्य राजाको त्यागन करदेता है| ८० ॥
यञ्च अविवेकितया राजा भत्याइत्तमपद्योग्यान हीना
धमस्थाने नियोजयति न ते तत्रेव तिष्ठान्ति न भूपतेदॉषो
न तेषाम् । उक्त
और जो भन्ञानतासे उत्तम पदके: योग्य भत्योंको हीन अघम स्थानमें नियुक्त
करता हे, न वे वहा रहते हे न राजाका दोषे न उनका । कहाभी हे>
कनकभूषणसंग्रहणोचित्तो यदि माणिखपुणि प्रतिबध्यते
न स विरोति.न चापि स शोभते भवति योजयिठुवचनी-
यत्ता, ॥ ८१ ॥
सुवर्णके गहनेमे लगाने योग्य माणि यदि निकृष्ट धातुमे लगाई जाय, वह मागि'
न रोती है, न शोभित होती है किन्तु वैसे नियुक्त करनेवाळेकी निन्दा होतीं है
के, लगानेवालेको योग्यायोग्यका ज्ञान नहीं है | ८१॥
यञ्च स्वामी एवं वदति “चिराइश्यते? तदपि श्रूयताम् ।
सब्धदक्षिणयोधेत्र विशेषे नास्ति हस्तयोः
कस्तत्र क्षणमप्याय्यों विद्यमानगातिवसेत ॥ ८२ ॥
और जो स्वामी यह कहते हैं फे, “बहुत काठमे देखा” सोभी सुनो जिस
स्थानमे दहिने वाये हाथका विशेष नहीं है, वहा सब स्थानमे जानेवाठा कौना
बुद्धिमान् क्षणमात्रभी स्थिति करेगा ॥ ८९॥
काचे मणिर्मणो काचो येषां ब॒द्धिविंकरुप्यते ।
न तेषां सन्निधो +ृत्यो नाममात्रोऽपि तिष्ठाति ॥ ८३.॥
जिनकी बुद्धि काचमे मणि मणिम. काचको विकल्प करती है उनके निकट
भृत्यजन नाममातरकांमी स्थित नहीं होते ॥ <३॥
d
(२८) पश्चतन्त्रम्।
परीक्षका यत्र न सन्ति देशे नार्घन्ति रत्नानि समुद्रजानि ।
आभीरदेशे किल चन्द्रकान्तं त्रिभिर्वराटैविषणन्ति गोपाः ८४
जिस देशमें परीक्षा करनेवाळे नहीं हैं वहां समुद्रसे उत्पन्न इए रत्नोंका मूल्य
नहीं होता ह भाभीर देशमै वन्द्रकान्तमणिको गोप तीन कोडीते खरीदते हैं ८४
लाोहिताख्यस्थ च मणः पञ्चरागस्थ चान्तरम् |
यत्र नास्ति कथं तत्र क्रियते रत्रावेक्रयः ॥ ८९॥
छोहित मणि भौर पश्षरागमणिको अन्तर जहां नहीं है, पहाँ किस प्रकार
रत्नोंका विक्रय होकषक्ता हें॥ ८१ ॥
निर्विशेषं यदा स्वामी समं भृत्येषु बत्तेते। .
तत्रोद्यमसमथानामुत्साहः परिहीयते ॥ ८६॥
जब खामी सबमत्येमें एकसा विशेषतः रहित वर्तता हे वहाँ उम्म सम-
-थौंका उत्साह हीन हो जाताहे ॥ ८६ ॥
न विना पार्थिवो भृत्यनै म्टत्याः पार्थिवं विना ।
“ तेषां च व्यवहारोऽयं परस्परनिबन्धनः ॥ ८७॥
भत्याँके विना राजा नहीं और न राजाके बिना मस्य हैं, उचका यह ' व्यव-
हार प स्पर चिबन्धवाळा इ | ८७॥
>ृत्येविना स्वथं राजा लोकातुग्रहकारिभिः
मयूखारव दाताशुस्तजरख्यांप न शोभते ॥ ८८॥
भृत्योंक्षे विना राजा ऐसे शोमित नहीं हाता जिस प्रकार ढाका भवुग्रह
करनेवाळी किरणोंके विना तेजस्वी सूर्य नहीं शोभित हाता ह ॥ ८८॥
अरेः सन्धाय्यते नाभिनोभो चाराः मतिष्ठिताः
स्वामिसेवकयोरेवं वुत्तिचक्रै प्रवत्तते ॥ ८९ ॥ |
` झरोंमें नामि और नाभ ( पुढी ) में भरें स्थित रहते हैं, इस प्रकारस थह
स्वामी सेवकका आजीविका चक्र चळता हं ॥ ८९ ॥
शेरसा बिधरता नित्य स्नेहेन पारपा लता: ।
. कशा आप विरज्यन्ते निःस्नेहाः के न संवका* ॥-९० ॥
निद्य शिरसे घारण किये स्नेहसे पारेपालित तेलके विना केशमी रूख हो
“जाते हैं, क्या सेवक न होंगे ॥ ९० |
भाषाटीकासमेतम्। (२९)
राजा दुष्टो हि अत्यानामथमाख्र प्रयच्छति !
ते तु सम्मानमात्रेण प्राणेरप्युपकुवेते ॥ ९१ ॥
राजा प्रसन्न होकर भत्योको अर्थमात्र प्रदान करता है, और वे सन्मानमात्रसे
उसके निमित्त अपने प्रण छगादेते हैं ॥ ९१ ॥
एवं ज्ञात्वा नरेन्द्रण भृत्याः कार्या विचक्षणाः ।
कुलीनाः शोय्यसंयुक्ताः शक्ता भक्ताः ऋमागताः ॥ ९२॥
यह विचारकर राजाभोको चतुर भृत्य करने चाहिये, जो कुलीन झारतासे
सयुक्त समर्थ भक्त और कुळपरपरासे आये हां ॥ ९२ ॥
यः कृत्वा सुङ्गतं राजो इप्करं हितसुत्तमम् ।
लज्जया वक्ति नो किवित्तेन राजा सहायवान् ॥ ९३॥
जो राजाका दुःसाव्य उत्तम हित करके लजासे कुछ नहीं कहता है, उससे
ही राजा सहायवान् होता है॥ ९३॥ ` ` `
यस्मिन् कृत्यं समावेश्य निर्विशङ्केन चेतसा ।
आस्पते सेवकः स स्यात्कलनामेब चापरम् ॥ ९४॥
जिसमें कार्यको निर्भय चित्तस समर्पण करके राजा स्थित होताहै वह सेवक
राजाको अन्य कळ्त्रकी समान पषिणयि हे ॥ ६४ ॥
योऽनाहूतः समभ्योति द्वारि तिष्ठति सर्वदा ।
पृष्ठः सत्यं मितं ब्रते स भृत्यो5हीं महीसुजाम् ॥ ९५ ॥
जो विनाबुळाये समीपमें स्थित रहता हे सदा द्वारेही स्थित रहता है और
पूछनेसे सत्य बोळता हे षह राजाके भव्य हनक योग्य है ॥ ९१-॥
अनादिष्टोऽपि भूपस्य दृष्टा हानिकरश्च यः ॥
यतते तस्य नाशाय स त्योऽहोँ महीशुजाम् ॥ ९६॥
और जो राजाकी भाज्ञाके विनासी हानिकारक वार्ताको देख-उसके नाश
करनेका यत्व करता है, पह राजाके मत्य होनेके योग्य है ॥ ९६ ॥
ताडितोऽपि दुरुक्तोऽपि दण्डितोऽपि महीशुजा ।
यो न चिन्तयते पार्ष स भृत्योऽहों महीसुजाम् ॥ ९७॥
जो राजाले ताडित होकर कठोर कहा जाकर दण्ड दिया जाकर भी राजाका
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अनिष्ट चिन्तन नहीं करताह वह राजाका भत्य होनेक योग्य है ॥ ९७ |
(३० ) पश्चतन्तरम्।
न गर्व कुरुते माने नापमाने च तम्यते। .
स्वाकारं रक्षयेद्यर्ठु स भ्त्योऽहों महीसुजाम् ॥ ९८॥
जो सन्मानमें गर्व नहीं करता, अपमानमें तापित नहीँ होता है और जो
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अपने मानापमासक भावका राक्षत करता हूँ वह राजाका मत्य हाववा याग्यह९ ८
न क्षुधा पीडयते यस्ठु निद्रया न कदाचन ।
न च शीतातपाद्येश्च स भत्योःही महीशुजाम् ॥ ९९॥
कभाभी जा [वदरा आर क्षुवा शात आइस पाडत नही हाता धह राजा--
ओके भव्य हानेके योग्य है ॥ ९९ ॥
श्रत्वा सांग्रामिकीं वात्ता भविष्यां स्वामिनं प्रति ।
भ्रसन्नास्यो भवेद्यस्तु स शृत्योऽहो मदासुजाम॥ १००॥
जो आगे होनेवाळी स्वामीकी संग्राम वार्ताको छुनकर प्रसन्मुख होता हे
चह राजाके भव्य होनेके योग्य है॥ १०० ॥ ,
सीमावद्धि समायाति शुङ्कपक्ष इव्रोडराट्।
नियोगसंस्थिते यस्मित् स शत्योऽहों महोझुजाम् ॥१०१॥
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जिस भृत्य नियुक्त निम शुद्ध पक्षक चन्द्रमाक्षा समान राजाका सामा
बृद्धिको प्रात होती है वही राजाभोंका अत्य होनेके योग्य हे॥ १०१॥ '
सीमा सङ्गोचमायाति वह्नी चर्म इवाहितम्।' ,
स्थिते यस्मिन्स तु त्याज्यो शत्यो राज्यं समीहता॥१०२॥
और जिसकी स्थितिमें अमिमें चर्मेकी समान सीमा संकोच भावको प्राप्त
होतीहे राज्यकी इच्छा करनेवाळे राजा उस सत्यको त्यागंन करे | १०२ ॥
तथा झगालोऽयामिति मन्यमानेन ममोपरिस्वामिना यदि
अवज्ञा क्रियते तदपि अयुक्तम्.। उक्तं च यतः
ओर यह श्वगाळ है यदि एसा मानकर स्वामी मेरी अपज्ञा करें तो यहभी
अनुचित है। कारण कहा भौ है- ना
कोशेयं कृमिजं सुवर्णमुपलाइवाप गोरोमतः
` पङ्कात्तामरसं शशाङ्क उदधेरिन्दीवरं गोमयात् ।
काछादश्निरहेः फणादपि मणिगोपित्ततो रोचना
भाकाश्यं स्वगुणोदयेन गाणिनो- गच्छन्ति कि जम्मनः १०३
ह
भाषाटीकासमेतम् । (३१)
रेशम कीडोसे, सुवण पाषाणसे, दूवी गोके रोमसे, कमळ काचडसे, चन्द्रमा
सागरसे, इन्दीबर (कमळ ) गोबरसे, भमि काष्ठसे, मणि सर्पके फणसे, ,रोचन
गोपित्तसे उत्पन्न होता हे, गुणी अपने युर्णेकि उदयसे प्रकाशित होते है न कि
जन्मते | १७३ ॥ .
मूषिका गृहजातापि हन्तव्या स्वापकारिणी ।
अक्ष्यप्रदानेर्साजारो हितक्गत्मराथ्यते जनेः ॥ १०४ ॥
घरमे उत्पन हुई अपना अपकार करनेवाळी मूषिकामी मारने योग्य है, हित-
कारी बिछावको भक्ष्य दान देकरमी लानेकी मनुष्य प्रार्थना करते ह॥ १०४ ॥
एरण्डभिण्डार्कनलैः प्रभूतेरपि सञ्चितैः ।
दारुकृत्य यथा नास्ति तथेवाज्ञेः प्रयोजनम् ॥ १०५ ॥
जिस प्रकार बहुतसे एरण्ड भिण्ड आक नळसे कुछ काठका प्रयोजन नहीं
निकलता इसी प्रकार अज्ञोसे प्रयोजन सिद्ध नहीं होता हे॥ १०५॥
कि भक्तेनासमर्थेन कि शक्तेनापकारिणा ।
भक्तं शक्तं च मां राजन् नावज्ञातुं त्वमर्हसि ॥ १०६ ॥”
असमर्थं भक्त ओर अपकारी सामथ्येवान् पुरुषले क्या हे, हे राजन्! सुझ
भक्त और समर्थकी अवज्ञा करनेको आप योग्य नहीं हैं॥ १०६ ॥ ??
पिगलक आह-““भवतु एबं तावत् । असमर्थः समथों वा
चिरन्तनः त्वमस्मार्क मन्त्रिपुत्रः तद्विश्रब्धं बाहि यत् किचि-
दक्तकामः” । दमनक आह-' देव ! विज्ञाप्यं किञ्चिदस्ति? ।.
पिगलक आइ~-““तन्निवेदष अभिप्रेतम्!” । सोऽब्रवीत्-
पिंगळक बोळा-“'हो यह समर्थे बा असमथ, परन्तु तुम हमारे पुराने सत्रि-
पुत्र हो सो जो तेरे कहनेकी इच्छा दै. निर्भय कहो ”” दमनक बोळा-“देव !
कुछ कहना तो है.” पिंगळक बोळा-“'अपना अभीश्कहो” बह बोळा--
«अधि स्वल्पतरं कार्य्ये यद्भवेत्ट्थिवी पतेः ।
तन्न वाच्यं समामध्ये प्रोवाचेदं बृहस्पतिः ॥ १०७॥
“राजाका जो भत्यन्त छोटासामी कार्ये हो ब्रह समामे नही कहना चाहिये
ऐसा बृदृह्पतिने कहा है || १०७ ॥
(३२) पञ्चतन्त्रम्
तत् एकान्तिके म हविज्ञाप्यमाकर्णयन्ठु देवपादाः । यत्तः-
सो एकान्तमें स्वामीकें चरण मेरी विज्ञप्तिकों श्रवण करें कारण कि-
षट्कणों भिद्यते मन्त्रश्चतुष्कर्णः स्थिरो भवेत् ।
तस्मात्सवेप्रयन्नेन षट्कण वजथेत्सुथीः ॥ १०८॥ ?
छः कानम मत्रे भदका प्रात हाता ६, चारकणम [स्थर हाता है इस कारण
द्विमान सब प्रकार षट्कर्णको वार्जेत करें | १०८ ॥ ?
अथ पिंगलकामिप्रायज्ञा व्याघद्वीपिदकपुरःसराः सर्वेऽपि
तद्ठचः समाकण्यं संसदि तत्क्षणादेव दूरीभूताः । ततश्च
दमनक आह-'उद्कम्रहणाथै प्रबृत्तस्थ स्वामिनः किमिह
निवृत््यावस्थानम्”? । पिंगलक आह-(साविलक्षस्मितम् ) “
किञ्चिदपि” । सोऽब्रवीत्-“ देव | यदि अनाख्येयं तत्तिष्ठलु ।
उक्तश्च
तब पिंगलकके अभिप्राय जानमेबाळे व्याघ्र गेंडे वृक आदि सव कोई उसके
वचनको श्रवण कर सभामेसे उसी समय दूर होगये । दमनक बोढा--“जछ
ग्रहणके लिये गये इए स्वामी क्यों लौटकर यहां स्थित इए”? पिड्नलकने चजासे
कुछ हास्यके-सहित कहा-“कुछ नहीं” उसने कहा-“देव ! यदि कहनेके योग्य
नहीँ है तो जाने दीजिये | कारण कहा है-
दारेष किञ्चित्स्वजनेषु किञ्चिद्गोप्यं वयस्येषु सुतेषु किञ्चित ।
युक्तं न वा युक्तमिदं विचिन्त्य बढे द्विपाश्चन्महतोऽदुरोधाता।'”
कुछ खियोम, कुछ स्वजनोंमें, कुछ बन्धुऑमें, कुछ पुत्रॉमें गुप्त रखे;
परन्तु विद्वान् यह युक्त है वा नहीं ऐसा विचार कर महाकार्यके बरसे
गुप्तमी कहे ॥ १०९ ॥ ??
तच्छृत्वा पिंगलेर्कश्चिन्तयामास । “ योग्योऽयं दृश्यते ।
ततत् कथयाम एतस्य अन्न आत्मनाजभप्रायम् । उक्तव्वल
यह् सुनकर पिंगळ्क विचार करने ठगे “यह तो योग्य ही है सो इसके
आगे अपना अभिप्राय कधन करू, क्योंकि-
सुहाद् गनरन्तराचत्तगुणवात भत्यंतुवातान कलत्रे ।
स्वामिनि सोहदयुक्ते निवेद्य दुःखं सुखी भवति ॥ ११०॥
भाषाटीकासमेतम् । ( ३३
निरन्तर चित्तवाछे सुहृदमे, गुणवान् भृत्यमे, अनुगामिनी ल्लीमे, सौहादेयुक्त '
स्वामीमें दुःख निवेदन कर सुखी होता है ॥ ११० ॥
भो दमनक! शृणोषि शब्दं दूरात् महान्तम् ! ? । सोऽब्र-
वीत-“स्वामिन् ! झणोमि ततः किम १ पिगलक आह-
“द्र ! अहमस्मात् वनात् गन्तुमिच्छामि” दमनक आह-
"करनात्” १। पिंगलक आह-“यतो5द्य अस्मडने किमपि
अपूर्व सर्वं प्रविष्टं यस्य अयं महाशब्दः श्रूयते । तस्थ च
शब्दादुरूपेण पराक्रमेण भाव्यमिति” | दमनक आह-“यत्
शब्द्माचादाि भयमुपगतः स्वामी तदपि अयुक्तम् । उक्तञ्च-
सो दमनक | क्या तू दूरसे महान् शब्द श्रवण करता है” | । बह बोळा-
“सामिन् ! सुनता हू सो क्या”? £ | पिंगछक बोळा-“भद्र ! में इस वनसे
जानेकी इच्छा करता हु” । दमनक बोळा-“कर्या (! । पिंगछक बोळा-“'जो
कि, इस वनमे कोई अपूर्व जीव आया; जिसका यह महाशब्द सुनाई देता है ।
शब्दके अनुरूप इसका पराक्रम भी होगा” । हभनक बोला~“यदि स्वामीको
जब्दमात्रसेमी मय प्राप्त हुआ है, सोमी युक्त नहीं दै । कहा है-
अम्भसा भिद्यते सेतुस्तथा मन्नोऽप्यरक्षित्तः ।
पेशुन्याद्वियते स्नेहो भिद्यते वागिमरातुरः ॥ १११ ॥
जैल जरसे सेतु भेदको प्रात होता हे इसी प्रकार भरक्षित मत्र भेदको
प्राप्त होता है ( दुर्जनतासे ) चुगछीसे खेह और पीडित जन शुष्क कथासे
भेदको प्राप्त होता है ॥ १११ ॥
तन्न युक्त स्वामिनः पूर्वोपार्जितं वनं त्यक्तम् । यतो
भेरीवेणुबीणामुदंगतालपटहशंखकाहलादिभेदेन शब्दा अनेक
विधा भवन्ति । तत् न केबलात शब्दमात्रादपि भेतव्यम् ।
उक्तश्व-
सो स्वामीकों कुलकमागत बन त्यागना उचित नहीं है, जो कि मेरी, वेणु
वीणा, मृदंग , ताळ, पटइ, काहळादिके भेदसे शब्द भनेक प्रकारके , होते
हैं, सो केवळ शब्दमात्रसेही न डरना चाहिये । कहाहै-
३
(३ भु ) पञ्चतन्त्रम् ।
अत्युत्कटे च रोद्रे च शबो आते न हीयते ।
घेय्य यस्थ महानाथान स यात पराभवम् ॥ ११२॥
_ निस राजाका यैर्मे अति उत्कट (दारुण) भयानक रात्रुके प्राक्त होनेसेमी नष्ट
नहीं होताहै, उसका कभी परामव नहीं होता ॥ १.१९ ॥
दशितमयेऽषि धातरि घेय्येध्बंसो भवेन्न धीराणाम् ।
शाषितसराल निदावे ननितरामवोद्धतः (सन्युः ॥ ११३॥
विधाताकेमी भय दिखानेसे घीरोका घेय्येच्वंस नहीं होताहै, गरमीमें सरोवर
सूखते हैं, परन्तु सिन्धु अत्यन्त बढ़ताही दै ॥ ११३॥
'तथाच-
और देखो-
यस्थ न विषादि विषादः सम्पदि हषो रणे न भीरुत्वम् ।
ले खुबनचयतिलके जनयाते जनना सुत वरलम् ॥११४॥
जिसको विपत्तिमें विषाद, सम्पत्तिम हर्ष और रणमें भय नहों होताहै, उस
त्रिमुवनक ।तिळक् किसी विरळेही पुत्रको माता उत्पन्न करती हे॥ ११४ ॥
तथाच-
औरभी-
शक्तिवेकह्यनम्रस्य निःसारत्वाळघीयसः ।.
जन्मिनो मानहीनस्य तृणस्य च समा गातिः ॥ ११५ ॥.
शक्तिकी विकळतासे नम्र हुए, निस्सार होनेसे अत्यन्त 'छघु, मानहीन
जन्म घारीकी और तृणकी समान गाते हे ॥ ११५ ॥
आक्चि-
और भी
अन्यप्रतापंमासाय यो इढत्व न गच्छ॑ति । हि
जतुजाभरणस्येव रूपणापि हि तस्य किम॥-११६॥
दूसरेंके प्रतापको प्राप्त होकर जो इढताको नहीं प्राप्त होताहे छाखके आभर-
रणकी समान उसके रूपसे भी कया ह॥ ११६ ॥
तदच साला स्वामना घेय्योवष्टस्मः काय्यः। न शब्दमा-
त्रात भेतव्यम् । उक्तश-
भाषाटीकासमेतम्। (३५)
Nr
यह जानकर 'स्वामीको घेयकी स्थिति करनी योग्य है, शब्दमात्रते डरना
त चाहिये कहामी हे-
पूर्वमेव मया ज्ञातं पूर्णमेतद्धि मेदसा ।
अतुप्रविश्य विज्ञातं यावखम च दारु च ॥ ११७ ॥”
- मैंने पहले मजासे पूर्ण जाच छिया था परन्तु पीछे प्रवेश कर देखा तो -इसमें
” ९
नम ओर दारही निकला ॥ ११७ [7
पिङ्गलक आह- कथमेतत”'? सोऽब्रवीद-
'पिंगळक चोळा-'"'यह केसी कथा हे” £ । बह बोढा-
- कथा२ .
कश्चित् गोमार्युनाम शृगालः क्ुतक्षामकंठः इतस्ततः पारि-
भ्रमन् वने सैन्यद्वयसंग्रामभूभिमपश्यत् (तस्थाच दुन्दुभः पति-
तस्य वायुवशात् वलीशाखाग्रेः हन्यमानस्य शब्दमश्णोत ।
अथ क्षमितहृदयश्चिन्तयामास । “अहो ! विनष्टोऽस्मि । तद्या-
वत् न अस्य भाचचारतशब्दर्थ दाएगाचर गच्छाम तावद्
अन्यता ब्रजाम । अथवा नतत युञ्घत सहसव गपठपतामह
बनं त्यक्तुम्। उक्तख-
कोई गोमायु नामबाळा श्वगाङ भूखसे दुबक कंठवाला इधर उधर घूमता
इभा वनमे दोनो सेनाको सम्रामसूमि देखता भया | वहां गिरे इए नगाडेका
पवतके वशसे वली शाखाओके अग्रभागके ताडनसे उठा शब्द सुनता भया ।
तब क्षुमितह्ृदय हो विचारने ढगा “अहा में मरा, सो जबतक इस उच्चारण किये
| शब्दके सन्मुख नहूं, तवतक यहासे अन्य स्थानमै जाऊ। भयवा एकसाथे पिता-
मह जनोका यह वन त्यागन करनेके योग्य नहीं है। कहामी है- |
भये बा यदि वा हर्ष संत्राते यो विमशेयत |
कृत्य न कुरूते वेगान्न स सन्तापमाप्ठुात्॥ ११८ ॥
भय बा इषेके प्राप्त होनेपर जो विचार करता है भोर कायको शाप्रत्तासे
नहीं करता हे, वह सन्तापको प्राप्त नही हाता हे ॥ ११८ ॥ >
तत तावत् जानामि कस्य अयं शब्दः” । चेय्यमाह्रेस्ब्यो,
'विमशयन् यावत् मन्दं मन्दं गच्छति तावत् इन्डभिम् अप-
क
(३६) पञ्चतन्त्रम् ।
श्घत् । स च तं परिज्ञाप समीपं गत्वा स्वयमेव कोतुकाव
अताडयत् । न्यश्व ह्षात आचिन्तयत्। “अहो ! चिरादेतत्
अस्माक महत् भोजनमापतितस्,तत् चुन प्रभूतमासमेदोऽसः
एभिः परिपूरितं भाविष्यति” । ततः परूषचर्मावशुंठितं तत्कः
थमपि विदाय्यं एकदेशे छिद्रं कृत्वा संहृष्टमना मध्ये प्रविष्टः
परं चमीविदारणतो दंष्टाभङ्घः समजनि । अथ निराशीभूतः
तत् दारुशेषमवलोक्घ छोकमेनमपठत। पूवमेव मया ज्ञातम्
इति। ततो न शब्दभात्रात् भेतव्यम्' । पिङ्गलक आइ-“भोः।
पश्य अयं मम सवोऽपि परिग्रहो भयव्याकुलितमनाः पला.
यितुमिच्छति । तत् कथमहं घेय्योवद्म्म करोमि” ।
सोऽत्रवी-'र्वामिन्! नेषामेष दोषो यतः स्वामिसदृशा
एव भवन्ति भृत्याः । उक्तश्च-
सो पहळे में यह जानूं, करि, यह - किसका शब्द हे” | पेर्को अव-
म्बन कर जबतक शव; २ गया तबतक नगाडेको देखता भया | वह इसको
जान घोरे जाकर स्वयंद्दी कोतुकसे ताडन करता इभा,फिरमी प्रसन्नतासे विचा-
रता भया । “अहो । बहुत काळमें यह भोजन हमको प्राप्त हुआहै। सो विश्व”
` यहीं बहुतसे मांस मेंद रुधिरसे परिपूर्ण होगा” सो कठिन चमसे मढे हुए इस
( ढोळ ) को किसी प्रकारसे विदीर्ण करके एक देशमें छिद्र करके प्रसन्षमनसे
भीतर प्रविष्ट हुआ । और चर्मके विदारण करनेसे डालें टूटगंडे । तब विराझ
होकर केवळ काष्ठपात्र देखकर इसक्षोकको पढताइभा फि, “मेचे पहले जाना
य? | इससे शन्दमात्रसे न डरना चाहिये? पिंगछक बोडा “पो ! देखो यह मेर.
सम्पूर्ण कुटुम्ब भयब्याङुळ मन होकर भागनेकी इच्छा करता हे, सो में किस |
प्रकार धेय घारण कर ” | बह वोळा-"'स्ामिन् ! इनका दोष नह जिस
कारण कि, मत्य स्वामीकी समान होते हें | कहामी है- ”
अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्व नारी च।
पुरुषविशेषं भाता भवन्त्ययोग्याश्च योग्याश्वं॥ ११९ ॥
घोडा, शक्ष, झाल्न, वाणा, वाणी, नर भौर नारी यह पुरुषविशपेको प्राप्त
होकर य्य भाग्य हांजात हं ॥ ११९ ॥
f
भाषाटीकासमंतम् ! (३७)
, तत् पोरुषावष्टम्म॑ कृत्वा त्वं तावत् अत्र एव प्रतिपालय-
-थावदहमेतत शब्दस्वरूप ज्ञात्वा आगच्छामे । ततः
पश्चात् यथोचित काय्मम हाते । पपङ्गलक आह- कि तत्र
भवान् गन्तुसुत्सहते ' । स आह- कि स्वाम्यादेशात्सद्न-
त्यस्थ कृत्याळृत्यमासत उक्तश्च-
सो पुरुषाथका अवढळमबतन कर तुम तबतक यहा रहो जबतक में इस शन्द-
स्वरूपक्ता जानकर आऊ, तब पाऊ जता उाचत हा सा करना” | पिगळक
बोछा-- क्या आप वहा जानेकी इच्छा करते हो [१ वह बोढा- “खार्माकी
भाज्ञपे भत्यकों कृत्यका भोर अक्नत्यका विचार क्या है ! । कहाहे कि-
स्वाम्यादेशात्सुभृत्यस्य न भीः सञ्जायते काचित् ।
प्रविशेन्मुखमाहेय॑ दुस्तरं बा महाणवस ॥ १२० ॥
स्वामीकी भाज्ञासे घुभत्यको कृहीमी कुछ भय नहीं होताहे, सर्पके पुखर्मे
अवश क्रजाय् वा दुस्तर महासागर तर जाय ॥ १२० | |
त्तथाच-
चप्ताहा=
स्वाम्थादिष्टस्तु यो धत्पः समं विषममेव च।
मन्धते न स सन्धाय्यों भूमुजा भूतिमिच्छता ॥१२१॥'?
जो मृत्य स्वामीको आज्ञाको समवा विषम नहीं मानता हे ऐश्वर्यकी इच्छाक-
रनेवाले राजाओंको सदा उसको अपने समीप रखना उचित हे ॥ १९१ ॥”?
पिङ्गलक आह- भद्र ! यदि एवं तत् गच्छ शिवास्ते
पन्थानः सन्ठ' इति! दमनकोऽपि त प्रणम्य सञ्जीवकशब्दा-,.
नुसारी प्रतस्थे अथ दमनके गते भयव्याकुलमनाः पिड़-
रक? चिन्तयामास | “अहो ! न शोभनं कुतं मया, यत् तस्य
<बिश्वासं गत्वा आत्माभिप्रायो निवेदितः । कदाचित दमनः
कोऽयसुभयवेतनो भूत्वा ममोपरि इष्टबाद्धिः स्यात् अष्टा-
विकारत्वात् । उक्तत्र- |
पिगलक बोला, “भद्र! जो ऐसा है तो तेरे मार्ग मगलकारी हो” दमनक भी
उसको प्रणाम करके सञ्जीवकके शब्दका अनुसरण कर चला | तब दमनकके
(३८) पञ्चतन्त्रम्!
जानेमें मयसे व्याकुळमन होकर पिंगळक विचार करने छगा कि, “देखो मैंने
अच्छा नहीं किया जो इसके विश्वासको प्रात होकर मैंने अपना भेद कहुँ दिया]
जो कदाचित यह दमनक दोनों तरफका बनकर मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि होजायं
कारण कि, यह आधिकारसे अष्ट है। कहाहे कि-
ये भवन्ति मर्हापस्थ सम्मानितविमानिताई ।
यतन्ते तस्य नाशाय कुलीना अपि सर्वदा ॥ १२२ ॥
„जो राजाके पहले सन्मानपात्र होकर पीछे-तिरस्क्कत होते है, चाहे वे-कुळीन
भा हाँ तोभी उसके नाशके विभित्त यत्त करते ह ॥ १२९ ॥
तत् तावदरुख चकाषत बच्ुमन्यत् स्थानान्तर गत्वा.
प्रतिपालयामि । कदाचित् दमनकः तमादाय मां उयापाद्-
बिठुमिच्छति । उक्तश्व-
सो तबतक इसकी इच्छा देखनेको दूसरे स्थानमें जाकर स्थित रहूं, कदाचित्
दमनक उसको साथ छाकर मुझे मरवा डाळनेकी इच्छा करताहे क्या कहाहे कि--
न बध्यन्ते ह्विश्वस्ता बलिभिडुंबला अपि ।
विश्वस्तास्त्वेव बध्यन्ते बळवन्तोपि इुबेलेः ॥ १२३॥
किसीका विश्वास म करनेवाले दुर्बेळभी बळवानोंसे नहीं बंधते हे भोर
विश्वास करनेसे बलवानही दुबेलोसे बंधजातेहँ || १२३ ॥
बहस्पतराप पाजा न [वशवास त्रजन्नर' मु
य इच्छेदात्मनो वृद्धिमासुष्यथ्व सुखानि च ॥ १२४ ॥
बुद्धिमान् तो बृहस्पतिके बिश्वासमेंमी न जाय जरो अपनी आयुवृद्धि भोर
सुखका इच्छा करता हा॥ १२४॥ :
शपथेः सन्धितस्यापि न विश्वासे ब्रजेद्रिपो:
राज्यलाभोद्यता इन्रः शक्रेण शपथइतः १२५ ॥
शपथसे सन्धान किये श्त्रुके विश्वासमें न जाय, देखो विश्वाससेही राज्यछो-
भसे उद्यत हुए दको ईनद्रने मार डाला ॥ १२५॥ '
न विश्वासं विना शब्रदेंबानामपि सिद्धयाति.. ..
विश्वासात्रिदशेन्द्रेण दितेगेभो विदारितः ॥ १२६ ॥?
भाषाटीकासमेतम् ! (३९)
विश्वासके बिना तो देवताभी शत्रुको सिद्ध नहीं कर सकते, विरवाससेही
इन्द्रने दितिका गर्भनारा कर दिया ॥ १२६ |”
एवं सम्मधारय्य स्थानान्तरं गत्वा दमनकमाभमवलोकयत्
एकाकी तस्थो । दमनकोऽपि सञ्जीवकसकाशं गत्वा वृषभोऽ-
यमिति परिज्ञाय हष्टमना व्यचिन्तयत् । “अहो ! शोभन-
मापतितम् अनेन एतस्य सन्धिविग्रहद्वारण मम पिगलको
वश्यो भविष्यति इति । उक्तश्च-
ऐसा विचारकर अन्यस्थानमें जाय दमनककी बाट देखता इभा इकला स्थित
रहा । दमनकमी सजीवकके निकट जाकर थह बेल हे ऐसा जानकर प्रसन्न हो
विचारने ढगा “भाहा ! यह चो अच्छी बात हुई । इसके साथ उसकी संधि '
विग्रह होनेसे पिंगळक मेरे बशीमूत हो जायगा । कहाभी है-
न कोलीन्यान्न सादादान्तृपो वाक्ये भवत्तेले ।
मन्त्रिणां यावदभ्येति व्यसनं शोकमेव च ॥ १२७॥
कुळीनता भौर सुहृदतासे राजा मत्रियोके वावयमे प्रदत्त नहीं होताहे जवतक
कि, उसको व्यसन और शोककी प्राप्ति नहीं होती || १२७॥
सदैवापट्वतो राजा भोग्यो भवति मन्त्रिणाम् ।
अत एव हि वाञ्छन्ति मन्त्रिणः सापदं तपम् ॥ १२८ ॥
आपत्तिमे प्राप्त हुआ राजा मन्त्रियांको सदा भोग्य होताहै, इसकारण मत्री
राजाको भापत्तियुक्त रहनेकीही इच्छा करतेहे ॥ १२८ ॥ -
यथा नेच्छति नीरोगः कदाचित्सुचिकित्सकम ।
तथापद्रहितो राजा सचिवं नाभिवाञ्छति ॥ १२९ ॥”
जेसे निरोगी कभी वैयको इच्छा नहीं करता, इसी प्रकार आपत्तिरहित राजा
कमी मत्रीको इच्छा नहीं करता ॥ ११९ ॥”
एवं विचिन्तयन् पिंगलकाभिसुखः प्रतस्थे । पिंगलकोऽपि
तमायान्त भ्रश्य स्वाकार रक्षन् यथापूवमचास्थतः । दम न-
कोऽपि पिंगलकसकाशं गत्वा अणम्थ उपविष्टः । पिंगलक
आइ- कि दृष्टं भवता तत् सत्त्वम”! । दमनक आह- हुई
१ देखो भागवतपर हमारी रीका ।
(४०) पञ्चतन्त्रम् ।
स्वामिप्रसादात” । पिगलक आइ- अपि सत्यम्” १। दम-
नक आहई-*कि स्वामिपादानाममेऽसत्यं विज्ञा प्यते? । उक्तश्च
_ ऐसा विचारकर पिंगळकके समीप चळा, पिंगरुकभी उसको आता देख
अपना आकार र्षित किये हुए पहलेकी समान स्थित, भया । दमनकमी पिंग-
छकके घोरे जाकर प्रणामकर स्थित हुभा । पिंगलऊ बोला-“क्या आपने उस
जीवको देखा!” दमनक बोछा-“स्वामीकी कपासे देखा” | पिंगळक बोळा-
“क्या सत्य हे!” | दमनक बोला-“क्या स्वामीके चरणोंके सन्मुख असत्य
कहाजाता हे ? । कहा भी है कि-
अपि स्वल्पमसत्यं यः पुरो वदति भूभुजाम् । -
देवानाञ्च विनश्येत स हुतं सुमहानपि ॥ १३० ॥
जो देवता और राजाके आगे थोडामी असत्य कहताहे षह महान् भी शाँच्र-
नष्ट होजाताहे | १३० ॥
तथाच-
और देखो-
सर्वेदेवमयो राजा मनुना सम्मकीत्तितः।
तस्मात्तं देववत्पश्येन्न व्यलीकेन कर्हिचित् ॥ १३१॥
मनुजीने कहा है फि, राजामे सब्र देवता निवास करते । इस-
कारण उसको सदा देवताओंके समान देखना कमी भौर प्रकारसे नही। १ ३१॥
सवेदेवमयस्यापि विशेषो नृपतेरयम् ।
शुभाशुभफलं सद्यो तृपादेवाद्भवान्तरे॥ १३२ ॥”
सबैदेवमय होनेवाले राजामे यह विशेष हे कि, राजासे झुमाझुभ फल शीत्र
मिरताहे और देवताओंसे जन्मान्तरमें फळ मिळताहे ॥ १३२ ॥?
पिङ्गलक आह-सत्यं इष्टं भविष्यति भवता । न दीनो
परि महान्तः कुप्यन्ति इति न त्वं तेन निपातितः । यतः-
पिंगळक बोढा- आपे सत्यही देखा होग , परन्तु दीनोंकं ऊपर महान्
क्रोध नहीं करते,इस कारण उसने तुझको नहीं मारा । क्योंकि,-
` तृणानि नोन्मूलयाति भभञ्जनो
सुदति नीचेः भणतानि सवतः ।
भाषाटीकासमेतम् t (४१)
स्वभाव एवोन्नतचेतसामयं "
महान्महस्स्वेव करोति विक्रमम् ॥ १३३॥
पवत मूदु बचे सब प्रकार प्रणत इए तृर्णोका उन्मूलन नहीं करताहे श्रेष्ठ
चित्तवालोका यह खमावही हे वडे पुरुप बंडोमेही विक्रम करतेहे ॥ १३३॥
अपिच-
भोरभी--
गण्डस्थलेषु मदवारिषु बद्धराग-
मत्तश्रमद्वमरपादतलाहतोऽपि ।
कोपं न गच्छति नितान्तबलोऽपि नाग-
स्तुल्ये बले तु बलवान्परिकोपमेति ॥ १३४ ॥ ”
मदके जळ्वाळे गण्डस्थछोंमे प्रीति करनेवाले मतवाळे अमण करते
इए भोराके चरणतळसे ताडित होकर सी महाबळी हाथी उनपर क्रोध नहीं
करता कारण कि, बळवान् तुल्यवळ्मे क्रोध करताहे ॥ १९४ ॥?
दमनक आह-“ अस्त एवं स महात्मा वैय कपणाः तथापि
स्वामी यदि कथयति ततो भृत्यत्वे नियोजयाभि |” पिङ्गलक
आइन ( सोच्छासम् ) कि भदान् शक्तोत्येबं क्हम्!”। दम-
नक आइ-“किमसाध्यं बुद्धेरस्ति । उक्तश्व-
दमनक बोळा-“यही हो क्योंकि, वह महात्मा और हम दीन हैँ तोभी यदि
आप कहें तो आपके मत्यपनमें उसको नियुक्त कहूँ” । पिंगळक ( विश्वास
छेकर ) वोछा-- क्या तुम यह कर सकते हो? | दमनक बोछा--*' बुद्धिके सामने
क्या भसाध्य है, कहा हे.
न तच्छल्लेन नागेन्द्रेन हयेन पदातिः ।
कार्य्यं संसिद्धिमभ्योति यथा बुद्धया मसाधित्तम् ॥१३५॥ ”
कार्य जैसा बुद्धिस सिद्ध होताहे ऐसा शक्त, हाथी, घोडे, पेदोंसे सिद्ध नहीं
होता, ॥ १३९॥ ”
पिद्ललक आह- यदि एवं , तहि अमात्यपदे अध्यारोपि-
तस्त्वम् । अद्यप्रभ््ाति प्रसादनिग्नहादिकं त्वयेव काय्येमिति
निश्चयः” । अथ दमनकः सत्वरं गत्या साक्षेपं तमिदमाह
(४२) पञ्चतन्त्रम् ।
“एह्याहि दुष्टवृषभ ! स्वामी पिङ्गलकः त्वाम् आकारयति कि
निःशङ्को भूत्वा सुहुर्खुहुनेदासि थेति” । तच्छू सञ्जीव
कोञ्चवीत- भन्न ! कोऽये पिङ्गलकः | दमनकः आह-“कि
स्वामिनं पिङ्गलकमपि ने जानासि? तत्क्षणं ्रातिपालय फले-
नेव ज्ञास्यसि.। ननु अयं सर्वम्रगपारिवृतो वटतले स्वामी पिङ्ग
लकनामा सिंहस्तिष्ठति” । तनया गतायुषमिवात्मानं
मन्यमानः सञ्जीवकः परं विषादमेगमत्। आह च-“भद्र !
अवान् साडुसमाचारो वचनपटुश्च हश्यते। तत् यंदि मामवश्यं
तत्र नयसि 'तदभयमदानेन स्वामिनः सकाशात् प्रसादः
कारयितव्यः” । दमनक आह-भो? सत्यमभिहितं भवता ।
नीतिरेषा । यतः-
पिगलक बोला--“जो ऐसा हे ता तुझको अमात्यपदमे स्थापित किया । आजसे
लेकर (प्रजा अनुजीवियोपर ) प्रसाद निम्रह (दंड) तुम्हारेही आधीन है यह निश्चय हे”?
तब दमनक शोप्रतास जाकर तिरस्कारवक यह बोढा-* साभा आस !
दुष्ट दम ! स्वामी पिंगलक तुझको पुकारताहे । क्यों निरदाक होकर
वारंवार वृथा नाद् करताहे'? | यह सुनकर सबक बोला-“भद्र ! पिंगलक
कोन है,?? दमनक बारा क्या तू स्वाम ।पगलकको नहा जानताह १ | सा
क्षणमात्रको ठहर फलसेही जानछेगा, निश्चयह्दी यह सब मृगोसे युक्त बटतले
हमारा खाम |[पगळक लह [स्थत्त ह ११ | यह सुन भायुर।हत अपनका मानता-
इभा संजीवक महादुःखको प्राप्त हुआ और बोळा-“ भद्र | आप साधु-
समाचार आर वचत वाल्नम चतुर दाखत हा | याद मुझका भवश्य ही वह
लिये जाते हो, तो अभयप्रदानसें स्वामीके निकट प्रसाद कराओ” । दमनक
बोळा-““मो ! तुमेन सत्य कहा नीति ऐसी हौ है । कयोंकि-
पय्यन्तो लभ्यते भूमेः समुद्रस्य गिरेरपि।,
न कथादिन्महीपस्य चित्तान्तः केनचित् कचित् ॥ १३६ ॥
मनुष्य पृथ्वी, समुद्र और पर्वेतका भी अन्त पासकतेे, परन्तु राजाकै
चित्तका अन्त कमी किसीने नहीं पाया ॥ १९६/॥ -
जा
भाषाटीकासमेतम । (४३)
तत त्वमत्रेव तिष्ठ यावदहं तं समय दृष्ट्रा ततः पश्चात्
त्वांनयामि इति” ।' तथा अबुछिते दमनकः पिगलकसकार्श
गत्वा इंदमाह-“स्वामिन् | न तत् प्राकृत सत्वं, स हि भग-
वतो महेश्वरस्य वाहनभूतो वृषभ इति मया पृष्ट 'इदमूचे-
“महेश्वरेण परितुष्टेन कालिन्दीपरिसरे शष्पा्राणि भक्षयितुं
समादिष्टः किं बहुना ममभद्त्तं भगवता कीडार्थ वनमिदम्”
पिंगलक आह-(सभयम्) “सत्यं ज्ञातं मयाएधुना । न देवता?
ब्रसादं विना शष्पभोजिनो व्यालाकीर्ण एवविधे वने 'निःशंका
' नदन्तो भ्रमात्त | ततस्त्वया किमभिहितम्”! दमनक आह
“र्वानिन् ! एतदाभिहितं मया 'यदेतद्वनं चण्डिकावाहनभूत-
स्य मत्स्वानिनः पिंगलकनासः सिंहस्य विषयीभूतं तद्व
वानभ्यागतः भियोऽतिथिः । तत् तस्य सकाशं गत्वा
्रातस्ेदेन एकतर भक्षणपानविहरणक्रियाभिः एकस्थानाअ-
थेण कालो नेय इति” ततः तेनापि सर्वमेतत् श्रतिपन्नमुक्तञच
सहर्षम् । स्वामिनः सकाशात् अभयदाक्षिणा दापायितव्था ।
इति । तदत्र स्वामी प्रमाणम्” । तच्छत्वा पिगलक आह-
“साघु सुमते! साधु । मन्तिश्रोत्रिय | साधु । मम हृद्येन
सह सम्मन्त्र्य भवता इद्मभिहितम् । तद्वत्ता मया तस्य
अभयद्क्षिणा । प्र सोऽपि मदर्थं अमयदक्षिणां याचायित्वा-
दुततरमानीयतामिति । अथ साधु चेदमुच्यते i
सो तूं यहाँ स्थित हो जवतक में समयको देखकर पीछे तुझको वहा छे जाउ?” ?
ऐसा करनेपर दमनक पिंगलके समीप जाकर यह बोळा-“स्वामिन् ! बह प्राक्त”
जीव नहीं दे, वह शिवजीका वाहनेभूत इषम हे | मेरे पूछनेसे उसने सुंझसे
कहा हे कि, “शिवजीने प्रसन्न होकर यमुना तीरके देशमे नवीन तृण खानेकी
साझा दी हे, बहुत कहनेसे क्या हे भगवान् शिवने मुझे यह बन कौडाके निः
मित्त प्रदान किया दै” पिंगछक ( भयपू्वेक ) बोछा-““अब मैंने सत्य २ जाना
देवताकी प्रसन्नताके विना घास खानेवाळे सर्पादिकसे युक्त इस प्रकारके वतमे
निइाक नाद करते हुये घूमते केसे रहें सो तेने" क्या कहा” £ । दमनं
३
ही
(४४) पश्चतन्त्रमू ।
'बोझा-स्थामिन् ! मैंने यह कहा कि “यह वन चण्डिकाके वाहनभूत हमारा
स्वामी पिंगलक नाम सिंहका अधिकृतेह, सो आप अभ्यागत प्रिय भतिथि प्राप्त -
हो सो उस ( स्वामी ) के पास चळकर जातृसनेहसे एक स्थानमेही भक्षण पान
विहार क्रियासे एक स्थानम रहकर समय व्यतीत करों, तब उसने यह सब स्घी-
RN कि
कार करके प्रसन्न हो कहा--“स्वामीके निकटसे भमयदक्षिणा दिवाभो, सो इसमें
स्वामाही प्रमाण हे”? यह सुनकर पिंगळक वोला-- धन्य बुद्धिमान् धन्य | मानो
यह मेरे हृदयसेही सम्मति करके तेने कहा । मैंने उलको अभय दक्षिणा दी, परन्तु,
उससेभी मेरे निमित्त अभय दक्षिणा दिवाकर शीघ्र छाओ।ठीकही कहा है--
, अन्तःसारेरकुटिलेराच्छिट्रैः परीक्षितैः ।
मन्त्रिभिधोरय्यते राज्यं सुस्तम्भेरिव मन्दिरम् ॥ १३७॥
- साखान् कुटिलतासे रहित निर्दोष अच्छी प्रकार परीक्षा किये हुए मंत्रियांसे
राज्य धारण कियाजाताह जैसे अच्छे स्तम्भोसे मादर || १३७ ||
लथाच-
भोर भी-- |
मान्त्रणां भिन्नसन्धांन भिषजां सान्निपातिके ।
कमणि व्यज्यते प्रज्ञा स्वस्थे को वा न पाण्डितः ॥१३८॥”
भयुक्तके युक्त करनेमे मन्त्रियोकी सान्निपातके कम ( व्यापार ) में वेयोंकी -
बुद्धि देखी जातीहे स्वस्थतामं कोन पंडित नहीं होताहे ॥ १३८॥
दमनकोऽपि तं प्रणम्य सञ्ञीवकसकाशं प्रस्थितः सहर्षमाचि
न्तयत्। अहो ! प्रसादसम्सुखो नः स्वामी वचनवशगश्च संजू-
ज्स्तन्रास्ति धन्यतरो मम । उक्तश्च-
दमनकमी उसको प्रणाम कर.संजीवकके समीप गया, और प्रसन्नताते विचारने
छया “अहो इस समय स्वामी हमपर प्रसन्न हे वचनके वशीभूत हे सो इस समय
मुझसे भविक धन्य - ओर कोनहे । कहाभी है-
अमृतं शिशिरे बाद्विरमृतं मियदशनम् ।
अमृतं राजसम्मात्रममृतं क्षीरभोजनम् .॥ १३९॥
जाडम अञ्चि अमृत इ, प्रियदरशेन अमृत हे, राजसन्मान भमृत्त हे, तथा
क्षीर भोजन अमृत है | १३९ ||
जट
~
भाषाटीकासमेतम् । (४५)
अथ सञ्जीवकएकाशमासाच सप्रश्रयमुबाच- भो मित्र !
प्राथितोऽसो मया भवदर्थे स्वाम्यभयप्रढानम् । तद्विश्रन्ध मा-
गम्यतामिति। परं त्वया राजप्रसादमासाय मया सह समय"
घर्मेण वत्तिततव्यम्। न गवमासाद्य स्वप्रभुतया विचरणीयम् ।
अहमपि तव संकेतेन सर्वा राज्यडुरममात्यपद्वीमात्रित्य _
उद्धारप्यामि। एवं कृते योरपि आवयोः राज्यलक्ष्मीमोग्या
भविप्यति । यतः-
सजीवकके निकट जाकर नम्रताप्र्वक यह बचन बोळा--“हे मित्र | आपके
निमित्त मैने खामीसे अमथदानके लिये प्रार्थना की | सो नि शक होकर चळो
परन्तु तुमको राजाका प्रसाद प्रात कर, मेरे साथ नियमक्रमसे बर्तेवा चाहिये"
गर्वको प्राप्त होकर अपनी प्रभुतासे न विचरना और मैंमी तुम्हारे सकेतसे
सम्पूर्ण राज्यभार भमाच्यपदवीको प्राक्त कर धारण करूगा ऐसा करनेसेही हम
दोनोको राज्यलक्ष्मी भोग्य होगी । कारण-
आखेटकस्य धर्मेण विभवाः स्युवंशो नृणाम् ।
नृप्रजाः प्रेरयत्येको हन्त्यन्योऽत्र सगानिव ॥ १४०॥
आखटके ध्मसे ऐश्वर्य मनुष्ये।के वशीभूत होजाते हैं, एक मनुष्यरूपी प्रजा”
ओको प्रेषण करता हैभोर दूसरा इस ससोरमें मृगोकी समान कार्यसिद्धि
करता हे ॥ १४०॥
तथाच-
ओर देखो- र
यो न पूजयते गर्वादत्तमाधममध्यमान् ।
भूषसम्मानमान्योऽपि भ्रश्यते दन्तिलो यथा ॥ १४१ ॥”
जो गर्वसे उत्तम, अधम, मध्यमका सन्मान नही करता हे, वह राजासे
सन्मान मान्यताको प्राप्त होकरसी दन्तिळके समान अष्ट होता हे ॥ १४१ |?
सञ्जीवक आह- कथमेतत् १ ” सोऽब्रवीत-
सज्गीवक बोठा- यह केक्षी कथा हे £? बह बोछा--
(४६) पञ्चतन्त्रम् ।
कथा ३
अस्त्यत्र धरातले वद्धमानं नाम नगरम्। तत्र 'दन्तिलो -
जाम नानाभाण्डपतिः सकलपुरनायकः अतिबसतिस्म । तेन
पुरंकार्य्य नृपकार्य्यश्च कुर्वता ठुष्टि नीताः तत्युरवासिनों
लोका नृपतिश्च । कि बहुना । न कोऽपि ताहक्र केनापि
चतुरो दष्टो न अपि श्रतो वाते । अथवा साधु चेदसुच्यते-
इस धरातळमें वद्धेमान नाम नगर है उसमे दन्तिळ नामत्राछा बहुत धनपति
(सेठ ) सब पुरका नायक रहताथा । उसने पुरकार्यं और राजकार्य करके उस
पुरक रहनंवाक छाक आर राजाका प्रसन किया काईमा उसके समान चतुर
दक सान न देखा न सत्ता; अथवा यह सत्य कहा ह कि-
रपतिहितकत। द्वेष्यतां याति लोके
जनपदहितकर्ता त्यज्यते पार्थिवेन्द्रः ।
इति झहत्ति विरोधे वर्तमाने समाने
नृपतिजनपदानां इमः कारय्यकत्ता ॥ १४२॥
राजाका हितकती लोकें देषताको प्राप्त होता हे, देशका हित करनेवाला
राजास त्यागा जाता ह, ईस प्रकार बड वेराधक वर्तमान हानस सजा और
ग्रजाका कार्य साधक दुर्लभ है ॥ १४२॥
अथ एवं गच्छाति काले दन्तिलस्य कदाचिद्विवाहः सम्म-
' ब्रत्तः । तत्र तेन सर्वे पुरनिवासिनो राजसन्निथिलोकाश्च
सम्मानपुरःसरमामन्त्य भोजिता वस्रादिभिः सत्कृताश्च!
ततो विवाहानन्तरं राजा सान्तःपुरः स्वगहमानीय अभ्य-
चितः! अथ तस्य दृपतेः शहसम्मार्जनकर्ता गोरम्भो नाम
राजसेवको गहायातोऽपि तेन अबुचितस्थाने उपविष्टोऽवज्ञया
अद्ध्चन्द्रं दत्वा निःसारितः । सोऽपि - तत+प्रद्धाते निःश्वसन्
अपमानात् न रात्रो अपि अधिशेते । “कथं मया तस्य भाण्ड-
यतेः राजप्रसादहानिः. कर्तव्या’ इति चिन्तयन आस्ते ।
अथवा किमनेन बथा शरीरशोषणेन । न किञ्चित् मया तस्य
अपकर्द शक्यमिति । अथवा साधु इदसुच्यते- ` .
भाषाटीकासमेतम्। (४७)
, इस प्रकार समयके बीतनेपर एक समय दन्तिळका विवाह हुआ वहा उसने सब
नगरके रहनेवाळे तथा सजसमीपी लोक बहुत सन्मानते निमन्त्रण कर बुछाय
भोजन कराय बल्लादिस सत्कार किये | तब बिवाहके उपरान्त रनवाससहित
राजाकोभी अपने घरमे घुलाकर सत्कार किया | उस राजाके घरकी बुहारी
देनेवाछे गोरम्भ नाम राजसेवको घर आनेपरमी अनुचित स्थानमे देठनेके
कारण गळहस्त देकर निकाळ दिया | वहभा उस दिनसे लेकर निश्वास लेता
हुआ अपमानके कारण रात्रिक्रोमी नहीं सोता था । “किस प्रकारमँ इस भाडप-
तिकी राजप्रसाद हानि करू? यही विचार करता रहता । 'अथवा इथा इस.
इारीरके झुण्ककरनेसे क्याहे । में कुछमी उसका अपकार नहीं करसकता | अथवा
किसीने सत्य कहाहै-
यो ह्यपकर्तुमशक्तः कुप्यति किमसो नरोऽत्र निलेज्नः।
उत्पतितोऽपि हि चणकः शक्तः कि भ्राष्ट्रकं भट्टकुस्॥१४२॥
जो किस्तीका कुछ अपकार नहीं कर सकता बह निळेज इथा क्यों “कध
करताहे, कूटकरभी बया चना भाडको फोड सकतादे ॥ १४३ ॥
अध् कदाचिलत्यूषे योगनिद्रां गतस्य राज्ञः शय्यान्ते मा-
जनं कुवेन् इदमाह-“अहो ! दान्तलस्य महदतत्वं यत् राज-
महिषीमालिङ्गति?तच्छत्वा राजा ससम्भ्रममुत्थाय तसुदाच-
“भो! भो! गोरम्भ | सत्यमेतत् थत् त्वया जल्पितं कि देवी
दन्तिलेन समालिगाता ! इति” । गोरम्भ? प्राह- देव ! रा-
पनजागरणन सूतासक्तस्य म॑ बलात् निद्रा समायाता । तत
न वेञ्चि किं मया अभिहितम्” । राजा-( सेप्य स्वगतम्}
एष तावदस्मदगुहें अप्रातिहतगतिः तथा दन्तिलोऽपि ॥
तत्कदाचत् अनन दवा समाळग्यमाना हेष्टा भविप्यति ।
तेन इदमाभिंहितम् । उक्तच-
एकसमय प्रातःकाळ जब कि, राजा ऊधानींदम था उनकी सेजके निकट
चुहारी देता इभा या बोछा-"'आश्चहे दन्तिळका ऐसा घमण्डहै कि, राजम-
हिषाको भाठिगन करताह'? । यह सुन राजा घवडाता हुआ उठकर उससे
बरोडा-“मोमो गोरम्म ! यह सत्य है दया जो तेने कहा, क्या देवीको दन्तिङने
(४८) पञ्चतन्त्रम्।
क.
मझारिंगत कियांहे 2 ” । गोरम्भ बोळा-“ देव ! रात्रिम द्रव खेलनेके कारण
क्ष ०७
७७
जागरण करनेसे मुझे बहुत निद्रा होरहीहै, सो मुझे विदित नहीं कि, मेंने क्या
कहा? । राजाने ( इंषीसे मनमें ) कहा-- यह हमारे घरमे बेरोकटोक आन्े-'
चाळ है और दन्तिङभी, सो इसने कभी देवी आशिड्वित होती देखी होगी,
इसकारण यह कहता हे । कहाहै-
यद्वाञ्छति दिवा मच्यो वीक्षते वा करोति वा ।
तत्स्वप्नेऽपि तदभ्यासाद् प्रते वाथ करोति वा ॥ १४४ ॥
जो मनुष्य दिनमें इच्छा करता, देखता वा करताहें उसके भम्याससे वह
स्वर्घमेंभी वही बोलता या करताहे ॥ १४४ ॥
तथाचन
जओरभी- ।
शुभ वा यादे वा पापं सन्नर्णा हृदि संस्थितम ।
सुमूठमपि तज्तेये स्वभबाक्यातथा मदात् ॥ १४५ ॥
अच्छा या बुरा जो मनुप्योके हृदय स्थितहे वह स्वप्तवाक्यसे भथवा
मदसे गुप्त बातभी विदित होजाती हे ॥ १४५॥
अथवा स्त्रीणां विषये कोऽत्र सन्देहः ?
अथवा त्त्रियोके विषयमे क्या सम्देह हे!
जहपन्ति सादमन्येन पश्यन्त्यन्धं सबिन्नमाई ।
` हहूतं चिन्तयन्त्यन्यं भियः को नाम योषित्तास ॥ १४६ ॥
किसीकें साथ बोळतीहें, किसीको बिळासपूर्वक देखती, हदये प्राघडए
अन्यको विचार करतीहें कहो, ख्ियाको कोन प्याराहे ॥ १४६॥
अन्यञ्च-
सोरमी-
एकेन स्मितपाटलाघररुचो जहपन्त्यनहपाक्षर
वीक्षन्तेऽन्यमितः स्फुटत्कुसादिनी फुछोछसल्लोचनाः ।
दूरोदारचरितरचित्रविभवं ध्यायन्ति चान्यं चिया
केनेत्थं परमार्थतोऽर्थवदिव प्रेमास्ति वाम झुवाम् ॥ १४७॥
५ हॅ
भाषाटीकासमेतम् । (४९)
स्मित ढाळ अधरकी कान्तिवाळी किसीके साथ थोडा वोठती है, स्फुरित
खिली कुमुदिनीको समान किसीको देखती हैं, विचित्र चारत्रचाळे विविध सम्प-
त्तिमान् अन्य पुरुषको बुद्धित व्यान करती हैं, ल्लियोंका यथार्थ और सत्य प्रेस
किएके साथ है ? किसीके नहीं, ( झादू् विक्रीडित छन्द ) | १४७ ||
तथाच
तैसाही-
नाश्निस्तप्याति काष्ठानां नापगानां महोदाधिः ।
नान्तकः स्वेक्षतानां न एंसां वामलोचना ॥ १४८॥
अग्नि काष्ठोसे, सागर नदियोसे, काळ सब प्राणियोंसे, और ल्ला पुरुषोसे तृप्त
नहीं होती इं ॥ १४८॥
रहो नास्ति क्षणो नास्ति नास्ति प्राथयिता नरः।
तेन नारद नारीणां सतीत्वमुपजायते ॥ १४९ ॥
एकान्त नहीं है, अवकाश नहीं हे, प्रार्थना करनेवाला मनुष्य नहीं है, हे
नारद ! इसी कारण खिर्वोका सर्ताल रहताहे ॥ १४९ ॥ ८
यो मोहान्मन्यते रूढो रक्तेयं मम कामिनी ।
स॒ तस्था वशगो नित्यं भवेत्कीडाशकुन्तवत् ॥ १५० ॥
जो मनुष्य मूर्ख सज्ञानसे यह जानता दे कि, यह खी मुझसे अनुरक्त है,
बह मनुष्य उसके वशीभूत होकर कीडाका पक्षीसा होजाताहे ॥ १६०॥
तासां वाक्यानि कृत्यानि स्वल्पाने सुग़रूण्यपि ।
करोति यः कृती लोके लघुत्वं याति सर्वेतः ॥ १५१॥
जो कृती घुरुप ल्लियोके छोटे बडे, योडे या बहुत वाक्योंकोभी करताहे बह
सब प्रकारसे ब्घुताको प्राप्त होता है ॥ १५१ ॥
खियश्च यः मार्थयते सन्निकर्षश्च गच्छाति।
इषञ्च कुरुत सेवां लमेवेच्छान्ति योषितः॥ १५२ ॥
जो ज्लीकी प्रार्थना करता हे ओर उनके निकट जाताहे और थोडीमी सेवा
करता हे खी उर्षाकी इच्छा करतीहें || १५२ ॥
अनर्थित्वान्मतुष्याणां भयात्परिजनस्य च। _
मर्य्यादायाममय्योदाः खियस्तिष्ठन्ति सर्वदा ॥ १५३ ॥
है
(५०) पञ्चतन्त्रम् ।
Ss ८६.५ €,
भ्
मनुष्यांके न चाहनेसे, परिजनोंके भयसे, मर्य्यांदा रहित ल्रिये सदा मयीदामें
रहती हैं ॥ १५३ ॥
नासां कश्चिदगम्योऽस्ति नासाच वयसि स्थितिः !
ङिरूपं रूपवन्तं बा पुमानित्येव छुज्पते ॥ १५४ ॥
इनको कोई अगम्य नहीं, न इनमें कुछ अवस्थाकी स्थिति है ( यह बूढा
या तरुण ) विरूप या रूपान् हे, केवळ पुरुपमात्रको भोगती हे | १५४ ॥
रक्तो हि जायते भोग्यो नारीणां शाटको यथा ।
घष्पते यो दशालम्बी नितम्बे विनिवेशितः ॥ १५८ ॥
रक्त { प्रेमी वां लाल ) पुरुप शाटी ( धोती) की समान छ्वियोक्गो भोग्य
होताहे जो उत्कृष्ट दशाम प्राप्त हो भवळंबित होता हे. अववा जो वल्ल नित-
मतर आरोपण किया घर्षणको प्राप्त होताहे ॥ १५५ ॥
अलक्तकी यथा रक्तो निप्पीडच पुरुषस्तथा ।
अबलाभिर्बलाद्वक्तः पादमूखे निपात्यते ॥ १५६॥ ”
खि जेसें लाखका रंग वळसे पीडन कर चरणमै छगातीहँ इसी प्रकार रक्त
( अनुरागी ) पुरुषको चरणोंमे डाळतीहे ॥ १५६ ॥ ”
एवं स राजा बहुविधं विळप्य तत्मकति दन्तिलस्य प्र-
सादपराइमुखः सञ्जातः ! कि बहुना राजद्वारभ्रवेशोऽपि
तस्य निवारितः । दन्तिलोऽषि अकस्मादेव प्रसादपराङ्सुख-
मवनिपलिमवलोकथ चिन्तयामास ।
इस प्रकार राजा अनेक परितापकर उसी दिवसे दन्तिळसे विगत अनुराग-
बाला हुआ । बहुत क्या राजद्वारमें उसका प्रवेश निवारत हुआ, दन्तिलमी
अकस्मात् रुष्टराजाको देखकर विचारवे छगा |
& अहो ! साध चेदसुच्यते-
“अहो ( आवहे ) किलोने सत्य कहाहे--
कोऽर्थान् प्राप्य न गर्दितो विषयिणः कर्यापदोऽस्तङ्गताः
ख्रीलिः कस्य न खण्डितं सुवि मनः को नाम राज्ञां मियः।
कः कालस्य न गोचरान्तरगतः कोऽ्थी गतो गोरवं
कोवा इुर्जनवाएराखुं पतितः क्षेमेण यातः इमान् ॥ १५७ ॥
भाषाटीकासमेतम । , (५१)
घनको प्राप्त होकर कौन गर्वित न हुआ किस विषयी पुरुषक्षी आपत्ति नाश
हुई हे ? धीमे स्त्रियासे किसका मन खण्डित नहीं हुआ ? राजाका प्यारा
फोनहै ° कालके गोचर कौन नहीं हुआ ९ कौन मागतेवाळा गौरवको प्राप्त
इआहे | और कौन पुरुष दुर्जनोकी गोष्ठीमे बैठकर कुशळताको प्राप्त हभाहे £
कोई नहीं ॥ १९७ ||
तथा च-
और भौ कहाहै-
काके शोचं दयूतकारे च सत्यं
स्पे क्षान्तिः सोप कामोपशान्तिः ।
क्वीबे धेय्य म्पे तत्त्वचिन्ता
राजा मित्रं केन दष्टं श्रुतं वा ॥ १५८ ॥
कोएमें पवित्रता, जुएमे सत्य, सर्पमें सहनशीलता, खियोमे कामनान्ति,
नपुत्तकमे धेय, मद्यपे तर्लाचन्ता, और राजा मित्र किसने देखा वा
सुना है? ॥ १५८)
अपरं मया अप्य भूपतेरथवा अन्यस्यापि कस्यचित्
गजसम्बन्धिनः र्वमेऽपि न अनिष्टं कृतम् । तत्किमेतत् परा-
ङ्मुखो मां भति भूपातिः? इति। एवं तं दन्तिलं कदाचित्
राजद्वार बिस्तम्मित्त बलाक्य सम्माजनकत्ा गारम्भा
विहस्य द्वारपालानिद्मूचे- भो भो द्वारपालाः | राजप्रसा-
दाथिषितोऽय दन्तिलः स्वयं निम्रहातुत्रहकत्ता च। तदनेन
निवारितेन यथा अहं तथा यूयमपि अङ्चन्द्रभाजिनो भवि-
प्यथ” । तच्छुत्वा दन्तिळश्चिन्तयामास । “नूनमिदमस्य
गारम्भष्य चाशम् । अथवा साप्वद्छुच्यत-
मेने इस राजाका तथा अन्य किसी शराजसम्बधीका खप्नमँमी अनिष्ट नहीं
मिया सो यह क्या हे जा राजा मुझसे विरुद्ध हे” । इस प्रकार उस दन्तिरुको
कभी राज द्वारमें स्तस्मित देखकर सम्म्राजेनकती बह गोरम्भ हॅसकर द्वारपाले
बोला-- हे द्वारपाळ ! राजप्रसादमें प्रात हआ यह दन्तिल स्वय निग्रह और
अनुप्रहका कती है, सो इसके निवारण करगेसे जैसे में इसी प्रमारसे तुमभी
(५२) पञ्चतन्त्रम् ।
अधैचन्द्र ( गलहस्त ) भागी होंगे” .यह सुनकर दस्तिछ विचारने टगा-- “यह
अवइयही इस गोरम्मकी चेष्टा है । अथवा ठीक कहा है कि-
अकुलीनोऽपि मूर्खोउपि भूपालं यो5च सेवते ।
अपि सम्मानहीनोऽपि स सवत्र प्रपूज्यते ॥ १५९ ॥
म्वाइ कुढीन या सूख कोईभी राजाकी सेवा करता हो सन्मानसे हीनभी बड़
स्त्र पूजित होता है॥ १५९ ॥
अपि कापुरुषो भीरुः स्थाचेन्नृपतिसेवक!।
तथापि न पराभूति जनादामोति मानवः ॥ १६० ॥ ?
नाहे कापुरुष डरपोक भौ राजाका सेवक हो तो वह किंसीसे पराभवको
प्राप्त नही होताहै ॥ १६० ॥ ?”
एवं स बहुविधं विलप्य विलक्षमनाः सोद्वेगो मतप्रभावः
स्वगृहं गत्वा निशासुखे गोरम्भमाहूय वख्चयुगलेन सम्मान्य
इदसुवाच-भद्र ! मया न तदा त्वं रागवशात् निःसा-
रितः । यतस्त्वं ब्राह्मणानामग्रतोऽदुचितस्थाते सम्नपविष्ठो
इष्ट इति अपमानितः । तत क्षम्यताम्” । सोऽपि स्वर्भरा-
उयोपमं तदखयुगलमासादय परं परितोषं गत्वा तमुवाच-
“मोः श्रेष्ठिन ! क्षान्तं मया ते तत्। तदस्य सम्मानस्य कृते
पश्य मे बुद्विप्रभावं राजप्रसादशव । एवमुक्ता सपरितोषं
निष्क्रान्तः । साधु चेदसुच्यते-
इसप्रकार अनेकविध तापित होकर छाितमन भर उद्देंगसे प्रभावहीन बह
(दन्तिङ) घर जाकर रात्रिमें गोरम्भको वुझाय दो वल्लोंसे सन्मानकर यह बोछा-
“भद्र ! मैंने उससमय घुझको क्रोधवञ्जसे नहीं निकाछा था | परन्तु जो कि, तू
ब्राह्मणोंके आगे अनुचित स्थानपर वेळा देखागया इससे तिरस्कृत किया सो
क्षमाकरो”? । चह स्वर्गराज्यकी समान घल्लइयको प्राह परमसन्तुष्टतासे उससे
चोळा,-“भो श्रेष्ट | मेंने वह सब झान्त किया । सो इस सन्मानके करनेसे
मेरे बुद्धिप्रभाव भोर राजप्रसादको देखो ” यह कह सन्ुष्टतासे चला गया ।
यह अच्छाही कहाहे-
“ स्तोकेनोन्नतिमायालि स्तोकेनायात्यधोगतिम्।
अहो सुसरशी चेष्ठा तुलायष्टेः खलस्य च॥ १६१॥”
आषाटौकासमेतम् । (५३)
“धोडेसेही उपरको चलाजाताहे, थोडेसेही नचिको जाताहे, तराजू ओर
दुष्टकी एकहीसी चेष्टहे ॥ १६११ ॥”
ततश्च अन्येद्युः स गोरम्भो राजकुले गत्वा योगनिद्रां
गतस्य भूपतेः सम्मार्जनाक्रियां कुवन् इदमाह-अहोऽविवे-
कोऽस्मङ्पतेः यत् पुरीषोत्समेमाचरन् चिमेटीभक्षणं करोति”
तच्छत्वा राजा सविस्मयं तसुवाच-' रेरे गोरम्भ ! किमभ-
स्तुत्तं लपसि ! । गृहकर्मकर मत्वा त्वां न व्यापादयामि। कि
-त्वया कदाचिदहमवविधं कम समाचरन् र्ट! 'सोऽत्रवीत्-
“देवं चूतासक्तस्य रात्रिजागरणेन सम्मानं कुवीणस्य मम
बलात् निद्रा समायाता ! तथा अधिष्ठितेन मया किखिज्न-
लिपतम, तन्नवेस्मि, तत्सा करोतु स्वामी निद्रापरचशास्ये-
ति''।एवं श्रुत्वा राजा चिन्तितवान् यन्मया जन्मान्तरे पुरी-
खोत्सग कुर्वता कदापि चिभोटेका न भक्षिता । तत् यथा
अपं व्यातिकरो असम्भाव्यो मम अनेन सूटेन व्याहतः तथा
दन्तिलस्य अपि इति निश्चयः । तन्मया न युक्तं कृतं थत स
वराकः सम्मानेन वियोजितः न ताहृकपुरुषाणामेवेविधं
चोष्टितं सम्माव्यते । तदभावेन राजक्कत्यानि पोरकृत्यानि च
सर्वाणि शिथिलतां ब्रजन्ति” । एवमनेकधा विमृश्य दन्तिलं
समाहूय निजाङ्गवताभरणादिमिः संयोज्य स्वाधिकारे
नियोजयामास।अतोऽहं घवीमि- यो न पूजयते गर्वात् इति
सो दूसरे दिन गोरम्म राजकुडर्मे जाकर राजाकी सम्मर्जव क्रिया करता हुआ
यह चोळा कि-“इस हमारे राजाकी केती अज्ञानताहे जो पुरीष उत्सर्ग ( मळे-
त्याग ) करनेमे चिभेटी ( काकुडी ) भक्षण करताहै” यह सुन राजा विस्मितहों
बोळा,-“रे गोरम्स ! क्या अनहोनी वात कहताहै, घरके कर्म करनेवाला जान-
कर तुझको नहीं मारताहू क्या कमी इस प्रकारके कर्म करते तेने मुझे देखा १” वह
बोजा-“स्रामिन् ! चुर खेलनेके कारण रात्रिमें जागनेसे समाजेव करते २
१-कक्रडी ।,
' (५४) पञ्चतन्त्रम् ।.
` बढसे मुझे निद्रा आगई, सो निद्रित होनेके कारण कुछ मेरे मुखसे निकळ गया,
सो मुझे बिदित नहीं, सो मुझ निद्रापरवशके ऊपर भाप प्रसन्न हुजिये'? यह
सुनकर राजाने विचार किया कि, “मैने तो जन्मान्तरमें भी मढत्याग करते कभी
चिर्सटी नहीं खाई, जिस कारण यह सम्बन्ध.नंहीं होनेवालामी इतत मूर्खने कहा
इसी प्रकार दन्तिळकाभी ( असत्य है) यह निश्चय है । सो मैंने यह अच्छा नहीं
१ 2.
किया जो बृथा उस बिचारेको सन्मातसे बहिष्कृत किया, इस सराखे पुर्पोकी
कभी ऐसी चेष्टा नहीं होसकती है, उसके विना सब राजक्राज और पुरके
काये शिथिल पडे हैं?” इस प्रकार भनेक विचार कर दन्तिळको घुठाय अपने
अगके वल्ल आमरण आदिते उसको सत्कृत कर निज भधिकारभे नियुक्त किया!
इससे में कहताहू “जो गर्वसें नहीं प्रूजता है? '-इत्यादि |
सञ्जीवक आइ- भद्र ! एबमेबेतत | यद्भवता अभिहितं
तदेव मया कत्तेव्यमिति' । एवमभिहिते दमनकस्तमादाय
पिंगलकसकाशमगमत् । आह च- देव ! एष मया आनीतः
स सञ्जीवकः । अधुना देवः प्रमाणम्”? । सञ्जीवकोऽपि तं
सादरं प्रणम्य अग्रतः सबिनयं स्थितः । पिंगलकोऽपि तस्थ
पीनायतकङुग्मतो नखकुलिशालंकृतं दक्षिणपाणिस्ुपारे
द्रवा मानपुरःसरशुवाच ।अपि शिवं भवतः! कुलस्त्वमस्मि-
न्वने विजने समायातोऽसि! तेनापि आत्मवृत्तान्तः कथित
यथा वर्डमानेन सह वियोगः सञ्रातस्तथा सब निवादितम्।
तच्छुत्वा पिगलकः सादरतरं तसुवाच-" वयस्य | न भेत-
व्यम्,म्ुजपञ्जरपरिरक्षितेन यथेच्छं त्वया अधुना वत्तिंतव्यम्
अन्यञ्च नित्यं मत्समीपवत्तिना भाव्यं यतः कारणाद्वहपाथं
रोद्रसत्वनिषेबितं वनं शुरूणामपि सत्वानामसेव्ये कुतः
शष्पभोजिनाम् एवसुक्त्वा सकलमृगपरि डतो यस्ञनाकच्छ-
मबतीय्ये उदकग्रहणं कृत्वा स्वेच्छया तदेव दनं प्राविष्टः।
ततश्च करटकदमनकनिक्षित्तराञ्यभारः सञ्जीवकेन सह
सुभाषितगोष्ठी मतुभवन्नास्ते ! न
भाषाटीकासमेतम्। (५५)
संजीवक बोढा-“यह ऐसाहीह जैसा तुमने कहाहै वही मै करूणा? | यह
कहनपर दमनक उसको छे विंगळकके समीप गया भौर वोछा-“देव ! यह में
' सञ्चीवकको छायाहू, अव स्वामीही प्रमाण हे” । सजीवकमी उसको सादर
प्रणाम कर विनयपूर्वक आगे बैठगया और पिंगळकर्भा उसके पुष्ट और बडे कघे-
पर नखरूपी बज्रते अळकृत दहिना हाथ ऊपर रख आदरसे बोछा-भाप
कुद्यलहं | इस निर्मेनवतमे कहाते आये ¦ " उसनेमी अपना वृतान्त कहा जेर
वर््धमानके सगबियोग हुआ वहसी सब कहा | यह सुच पिंगळक आदरपूवेक उससे
बोला-- मित्र मेरे मुजपज्ञरसे रक्षित होकर कहीं मत डरो, जब तुम यथेच्छ
( स्वच्छन्द ) रहा और नित्य हमारे समीप आभो जिस कारणसे कि, बहुतसे
दुःखवाळे भयकर जीवोसे सेवित यह वन बडे २ प्राणियोको भा अससेव्यहे,फिर
घास खामेवालोका तो क्या? | यह कह सब मुगाक सहित यमुनाक फिनारपर
आय जलपान कर सेच्छासे उत वचमें प्रविष्ट हुमा | तब करटक दमनकपर
राज्यभार सोप सञ्जीवकके साथ सुभाषित गोष्टोका सुख भटयव करता
रहेन लगा ।
अथवा साव्वदमच्यतं-
अथवा यह सत्य कहा है-
छयाप्युपनत सक्रत्सलनसड्रलम ।
भवत्यजरमत्यन्त नाभ्यासक्रममाक्षते # १६२ ॥
अकस्मात् महान् उपस्थित हुआ सनका सग अक्षय फळवाढा होता
है, बह बारबार अभ्यासको क्रमकी अपेक्षा नहीं करता है(एकही बारमें बहुत
उपकार हाता है )॥ १६१ ॥
सञजवर्कताप अनकशाख्रावगाहनात् उत्पन्नश्चाद्धप्रागः
ल्म्येन स्तोकरेवाहोभिमूढमतिः पिगलको धीमान् तथा
कृतो यथारण्यधनाद्वियोज्य आम्यधर्मेषु नियोजितः । कि
बहुना शत्य पगलकसञ्ावकावेव केवल रहास मन्त्रयतः
शेषः सर्वोपि मृगजनो दूरीभूतस्तिष्ठति । करटकदमनका-
वि प्रवेश न लभेते । अन्यञ्च सिंहपराक्रमाभावात्सवॉडदि
मगजनर्ता च झ॒गाला धुधाव्याधिबाधेता एकां दिशमा-
'श्रत्य पस्थताः। ङक्तश्च~
` (९६) . पञ्चतन्त्रम् !
सञ्जीबकद साथ भनेक शाख्रक्रे' अवगाहनसे बुद्धिकी प्रगह्मता अघिक ,
होनेक्रे कारण थोडेही दिनामें. उसने मूढर्मात पिंगछक इस प्रकार बुद्धिमान् कर
दिया कि, वनके धर्मोसे पृथक् कर ग्राग्य धर्ममें ङगादिया | बहुत कहनेले क्या
प्रतिदिव संजीवक और पिंगळकही केवळ एकान्तमें सम्माति करते, शेष सम्पूर्ण
मृगजन दूरस्थित रहते, करटक दमनकको भी प्रवेश न मिछता। और सिंहके
पराक्रम न करनेके कारण सम्पूण मृग और वे दोनों श्रगाङ क्षुधारूप रोगसे
व्याधित हुए एक दिशामें आश्रित हो स्थितहुए । कहा ६-
फलहीनं नृपं भृत्याः कुलीनमपि चोन्नतम् ।
सन्त्यञ्यान्यन्न गच्छान्त शुष्क वृक्षमिवाण्डजाः ॥ १६३॥
मत्यजन फलहीन कुलीन और उन्नत राजाकोमी छोड़कर अन्यत्र चले
जाते इ, जेते शुष्क वृक्षको पक्षी ॥ १६३ ॥
तथाच-
तेतेही-
अपि सम्मानसंयुक्ताः कुलीना भक्तितत्पराः ।
वृत्तिमगान्महीपाछं त्यजन्त्येव हि सेवकाः ॥ १६४ ॥
सन्सानसेमी संयुक्त कुलीन भातिमे तत्पर सेवकभी आजीविका न मिल्नेसे
स्वामीको त्याग देते द ॥ १६४ ॥
अन्घच्च- .
ओरभी- -
कालातिक्रमणं वृत्तेयों कुर्वीत भूपतिः ।
कदाचित्तं न सुञ्चन्ति भत्तिता अपि सेवकाः ॥ १६५॥
जो राजा मासिक देनेका कालातिक्रम नहीं करता है उसको घुड़कनेसेभी
सवक कभी नहीं त्यागते हैं ॥ १६५ ॥
तथा ज्ञ केवलं सेवका इत्थम्भूता यावत् समस्तमपि एत-
जगत् परस्परं भक्षणार्थं सामादिलिरुपाथेरितष्ठात । तद्यथा-
इस प्रकारले सेवक सम्पूर्ण जगत्को परस्पर मक्षणके निमित्त सामादि उप-
याँसे स्थित रहते हैं । सो ऐसे कि--
भाषाटीकासमेतम्। | (<७)
देशानामपरि क्ष्माखदातुराणां विकित्तकाः।
वाणिजो ग्राहकाणां च मूर्खाणामपि पाण्डताः ॥ १६६ ॥
देशोपर राजा, रोगिर्योको बै, ग्राहकको वणिकू, मूखोंको पण्डिता।१६६॥
अमादिनां तथा चोरा भिक्षुका गृहमेधिनाम् ।
गणिकाः कामिनाश्ेव सर्वलोकस्प शिल्पिनः ॥ १६७ ॥
असाबधानोको चौर, गृहास्थियोको फकीर, कामियॉको गणिका, और
सब छोकको शिल्पी || १६७ ॥
सामादिसज्जितैः पार; प्रतीक्षन्ते दिवानिशम् ।
उपजीवन्ति शत्तपा हि जलजा जलदानिव ॥ १६८॥
साम दानादि द्वारा गाये पार्गोसे रात दिन देखते रहते हे जेते ब्रीहि
आदि मेघोंकी ( प्रतीक्षा करते हैं ) इस प्रकार सव उनकी शक्तिसे जीते हैं! ६८
अथवा साध्विदएच्यते-
अथवा यह अच्छा कहा है--
सर्पाणा्च खलानाश्च परद्रव्यापहारिणाम्।
अभिप्राया न सिध्यन्ति तेनेदं वर्तते जगत् ॥ १६९ ॥
सर्प और पराये दव्य हरनेवाळे दुष्टोंके अभिप्राय नहीं सिद्ध होते इसी कार-
णसे यह जगत् रक्षाको प्राप्त हे ॥ १६९ ॥
अर्खु वाञ्छति शाम्भवो गणपतेराखुं क्षुधार्तः फणी
तं च ऋश्वरिपोः शिखी गिरिसुतासिंहोऽपि नागाशनम्।
इत्यं यत्र परिग्रहस्प घटना शम्भोरपि स्पादगगदे
तत्रान्यस्य कथं न भावि जगतोयस्मात्स्तररूप हितत्१७०॥
(देखो ) शिवजीका सर्प क्षुधित होकर गणेशाजीके मृषककों खानेकी इच्छा
करता हे, उसको कािकेयक्ा मोर ओर मोरको गिरिजाका वाहन सिंह खानेकी
इच्छा करता है, इसप्रकार शिवके धर्मी परस्पर आक्रमणकी घटना है, तो
दूसरेके घरमे क्यों न होगी, कारण कि, परस्पर उपजीविकाबाळा जगत्का
स्वरूप झी है | १७० ||
ततः स्वामिमसाद्रहितो शुत्क्षामकण्ठो परस्परं करटक-
दमनको मन्त्रयेते । तत्र दमनको ब्रते“ आर्थ'करटक !
(५८) पञ्चतन्त्रम् ।
आवां तावदप्रधानतां गतो। एष पिगलकः सञ्जीवकावरक्तः
स्वव्यापारपराङसुखः सजातः । सवोऽपि परिजनो गतः ।
तरिक करिवले” । करटक आह- यद्यपि त्वदीयवचनं न
करोति तथापि स्वामी स्वदोषनाशाय वाच्यः । उक्त्च--
सो स्वामिके प्रसादस रहित भूखले दुर्बळ करटक और दमनक सम्मति करने
लगे । दमनक बोळा-''आय्ये करटक ! हम तो अब अप्रधानताको प्रात्तहुए भौर
यह पिंगळक संजीबक्रमें अनुरक्त होकर अपने कार्यसे विमुख हुआ | सब परिजन
चलेगये अब क्या करें? | काटक वोळा-' यद्यपि आपके वचन नहीं मानता
तथापि अपने दोष नाशके लिये स्त्रामीसे कहना उच्चितेह । कहाहै कि-
अशृण्वन्नपि बोद्धव्या मंत्रिभिः एथिवीपतिः ।
यथा स्वदोषनाशाय विडुरेणास्विकाुतः॥ १७१ ॥
मंत्रियोंको राजा न सुनतेहुएमी समझाना चाहिये जेसे विदुरने छृतराटू-
को अपने दोष नाश करनेके लिये समञ्ञाया था | १७१ ॥
तथाच-
और देखो-
मदोन्मत्तर्प भूपस्य कुजरस्य च गच्छतः ।
उन्मार्ग वाच्यतां यान्ति महामाचाः समीपगाः ॥ १७२ ॥
मदोन्मत्त राजा और हाथीके उन्मार्ग जानेमें उनके समीपी और महावत
वाच्यता ( निन्दा )को प्राप्त होते ह॥ १७२॥ '
तत् त्वया एष शष्पभोजी स्वामिनः सकाशमानीतस्त-
त्स्वहस्तेन अङ्गाराः कर्षिताः! दमंनक आद्-“सत्यमेतत ।
ममायं दोषो स्वामिनः । उक्तश्चः
सो तैने यह घास खानेवाला स्वामीक निकट प्राप्त किया सो अपने हाथसे हो
तेने अगारा खैँचा''दमनक बोळा-“यह सत्य हैं इसमे मेरा दोषे स्वामीका
नहीं । कहांहै-
जम्बूको हुडुयुद्धेन वयं चाषाढभूतिना ।
दूतिका परकार्य्थण चयो दोषाः स्वयंळूताः ॥ १७३ ॥”
इडु ( जीवविशेष ) से जम्बूक और आपाढभूतिसे हम दूसरेके कार्यते
दूती यह तीनों अपने दोषसे ( दूषित इए ) ॥ १७३॥”
आषाटीकासमेतम् । (५९)
करटक आह -“कथमेतत ११ सोज्तबीत-
करकट बोछा-पह कैसी कथा हे ?? वह बोछा-
कथा ४.
अस्ति करिनिश्चिद्विविक्तमदेशे मठायतनम् । तत्र देव"
शर्मा नाम परित्राजकः प्रतिवसति स्म । तस्य अनेकः
साधुजनढत्तसक्ष्मवञ्चघिक्रयवशाद् कालेन महती बित्त-
मात्रा सञ्जाता | ततः स न कस्यचिद्विश्व्तिति। नक्त-
-न्दिने कक्षान्तरातां मात्रां न मुश्चति। अथवा साधु चेन
दुमुच्यते-
एक किस्ती निर्जन स्थानमे मठत्यात हे वहा देवशरमी नामक सन्यासी रह-
ताया, उसने पास अनेक महात्मा पुरुषोक दिये सूदुम वल्लोके वेचनेते कुछ
समयर्मे बहुतसा द्रब्य प्राप्त हुभा । तबसे वह फिसीका विश्वास नहीं करता
रातदिन बगल्मेसे उस दृब्यकों नहीं छोडता था । अथवा किसीने सत्य कहा हे-
अर्थानामर्जने हुःखमर्जितानाश्व रक्षणे!
आये डःखं व्यये दुःख धिगर्थाः कष्टसेश्रयाः ॥ १७४ ॥
अर्थोके उत्पन्न करनेमें दु ख, अजब किमेकी रक्षा करनमे दुःख, आनेमे
दु ख, जानेमें दु ख गष्टेक आाश्रयवाळे अथोको धिक्कार हे ॥ १७४ ॥
अथ आपषाठभूतिनाम परवित्तापहारी पूर्तस्तामर्थमात्रां
तस्थ कक्षान्तरगतां लक्षयित्वा व्यचिन्तयत ।“कर्थ मया
अस्य इयमर्थमाचा हत्तेव्योति । तदत्र मठे तावइटशिला-
सश्चयवशात् भित्तिभेदो न भवते । उच्चेस्तरत्वाञ्च हारे
वेशो न स्यात् । तदेनं मायावचने विश्वास्य अहे छात्रतां
ब्रजामि येन स विश्वस्तः कदाचिद्विश्वासमोति । उक्त्च-
उस समय आषाढभूतिनामक पराये धनका हरण करनेवाला धूर्त उस धनको
उसकी वगळमें देखकर विचारने ऊगा-“किस प्रकार में यह इसकी घनमात्रा
अहण करू | और दढ पत्परके बने हुए इस मठे कूमळ नहीं छगसक्ता,
ऊंचा अधिक होनेसे द्वारम प्रवेशभो नहीं होसकता, सा इसको वचनोंसे विश्व
(:६० ) पञ्चतन्त्रम् ।
~
देकर में इसका रिष्पबनू, जिस
* विज्वासमें आजाथ । कहाई--
निःस्पृहो नाधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनमियः।
नाविदग्धः प्रिय बूयात्स्फुटवक्ता न वञ्चक;ः ॥ १७५ ॥”
निस्पृह अधिकारी नहीं होता, भकामी श्रंगारप्रिय नहीं होता, ' मूर्खे कमी
प्रिय नहीं बोडसकता, साफ़ कहनेवाला ठग नही होता ॥ १७५ |”?
एवं निश्चित्य तस्थान्तिकसुपगम्य “ नमः शिबायोति'?
ज्रोब्याय्ये साष्टांग प्रणम्घ च समश्रयञ्चवाच~-''भगवन् ! अ-
सारः संसारोऽयं, गिरिनदीवेगोपमं योवनं, तणाश्चिसमं जी-
वित्तम्, शरदश्रच्छायासदशा भोगाः, स्वभसरशो भित्रपुतर-
कळत्रभृत्यवर्गसन्धन्धः । एवं मया सम्यक परिज्ञातम् । तत्
कि कुर्वतो मे संसारसछुद्रोत्तरणं भविप्यति’? । तच्छुत्वा देव-
शम्मो साद्रमाद~ “वत्स! धन्योऽसि यत्मथमे वयलि एवं
बिरक्तिभावः । उक्तश्च-
यह विचारकर उसके समीप जाय उ» नमः शिवाय” यह उच्चाणकर
साष्टांग प्रणाम कर नम्नतास बोला-'भागवन् ! यह असार संसार है, गिरिन-
-दीके वेगकी समान यौवन है, तृणकी अश्निकी समान जीवन हे, शरदके मेघकी
समान भोगहें, स्वप्रकी समान मित्र, पुत्र, कळत्र (ल्ली) वर्गका सम्बन्वहै, यह मैंने
मली प्रकार जान लिया सो क्या करने में संसारसागरके पार हूंगा” यह
-सुन देवशम आदरसे बोछा-“हे पुत्र | धन्य हे जो पहळी अवत्यामे ही तुझको
यह विरक्तता उत्पन्न इहै । कहाहै--
पूर्वे दयसि यः शान्तः स शाम्त इति मे मतिः।
थाठुषु क्षीयमाणेषु शमः कस्य न जायते ॥ १७६॥
जो प्रथम अदस्थाम शान्तंहै बही शान्त हे ऐसा में मानताहूं आर घातुओके
क्षीण होनेमें कोन शान्त नहीं होताहे ॥ १७६ ॥
आदो चित्ते ततः काये सतां सम्पद्यते जरा ।
असतान्ठु पुनः काये नेव चित्ते कदाचन ॥ १७७.॥
जरा सत्पुरुषोंके पहले चित्तमे, पीछे कायामें प्रदत्त होतीहे, जरा अशान्तोंके
झरीरमें. प्रातहोकरभी चित्तमें नहीं होती ॥ १०७ ||
यह विश्वासकों प्रातहुआ कदाचित् मेरे
भाषाटीकासमेतम् । (६१),
यच्च मां संसारसागरोत्तरणोपायं एच्छसि तच्छूयताम् 0
ओर जो मुझसे ससारसागरसे पार होनेका उपाय एछताहे, तो सुन-
झूद्धो वा यादि वान्योऽपि चण्डालोऽपि जटाधरः
दाक्षतः शिवमन्नेण स भस्माङ्घा शिवा भवत ॥ १७८ ॥
यूद्ध अथवा कोई अन्य चाण्डाळ वा जटाधारी कोईहों मिबभत्रत दीक्षित
हो शरीरमें भस्म छगानेसे शिव होजाताहै॥ १७८ ॥
षडक्षरेण मन्त्रेण पुष्पमेकमपि स्वयम ।
लिंगस्य मूघि यो दद्यान्न स भूयोऽभिजायते ॥ १७९ ॥”
जो पडक्षामत्रसे एकमी कछ शिवालिगपर चढाताह उसका फिर जन्म नहीं
होताहे ॥ १७९, |?
तच्छत्वाआषादभातंस्तत्पादा ग्रहात्वा समश्रयामदमाह-
“भगवन् ! तहि दक्षिया मे अनुग्रह कुरू'! । देवशर्मा आह-
“वत्त! अतुम्रह त कारण्याम परन्तु रानां त्वया मठमध्य न
अवेश्व्यं यत्कारणं निःसङ्गता यतीनां प्रशस्यते तव च ममापि,
च । उक्तश्च-
यह सुन आषाढमूति उप्तके चरणोंको ग्रहणकर आदरसे यह बोळा-“मभ-
वन् | तो दीक्षा कर मेरे ऊपर अलुग्रहकरो? | देवशमी वोळा-“चत्स ! तेरे
' ऊपर में अनुग्रह करूगा, परन्तु रानिमें तू मठमे प्रवेश न करना कारण यह है
कि, यतियोकी निस्तगताही प्ररासनीयंदे सो तुम्हारी और मेरीमी । कहाहै-
दुर्मन््त्रान्तृपातिविनश्याति यातिः सङ्भात्छुतो लालनाद्
विभ्रोऽनध्ययनात्कुळं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात् ।
मैत्री चाघणयात्समृद्वधिरनयात्खेहः बवासाश्रयात्
स्री गर्वादनवेक्षणादपिक्कषिर्त्यागात्ममादाद्धनस् ॥१८०॥,
दुर्मलसे राजा नष्ट होता हे, संगसे यति, छाडसे पुत्र, न पढनेसे ब्राह्मण,
कुपुत्नसे कुछ, दुष्टोंके संगते शीळ, अप्रणयसे मित्रता, भनयसे समृद्धि, परदेशमे
रहनेसे स्नेह, गर्यसे क्षी, न देखनेसे खेती, त्याग भौर प्रमादसे घव नष्ट
होताहै ॥ १८० |
(६२). ` पञ्चतन्त्रम् ।
तत् त्वथा ब्रतप्रहणानन्तरंः मठद्वारे तृणकुटीरके शथि-
'तव्घामिति। स आह-भगवन् ! भवदादेशः प्रमाणम् । परत्र
हि तेन मे प्रयोजनम्”! अथ कृतशयनसमथे देवशम अनु
ग्रहं कृत्या शा्रोक्तविमिना शिष्यतामनयत् । सोऽपि हस्तः
पादावमदवादिपारिचर्थया तं परितोषमनयत् । पुनस्तथापि
मुनिः कक्षान्तरान्मातरां न सुश्चाति। अय एवं गच्छाति काले
आषाहभूतिश्चिन्तयामास ।“अहो ! न कथविदेष मे विश्वा-
समागच्छति । तत् कि दिवापि श्ण मारयामि, कि वा
विष प्रथच्छामि, किवा पशुधर्मेण व्यापादयामि” । दत्पेद ˆ
-चिन्तयतस्तस्प देवशमणोऽपि शिष्यपुत्रः कथ्चिद्रामादामन्त=
णाथ समायातः । धाह च-“भगवन् । पविन्रारोपणकृते मम
गृहमागम्पतामिति” । तच्छत्वा देवशर्मा आषाहभूतिना सह
प्रह्टमना: प्रस्थितः । अथ एवं तस्य गच्छतोऽग्रे काचिन्नदी
समायाता । ताँ दृष्टा मात्रां कक्षान्तरादवताय्य कन्यामध्ये
सुगुप्तां निधाय स्नात्वा देवाचेनं विधाय तदनन्तरमाषा-
ठभूतिमिदमाह-''भो आषाढमूते ! यावदहं पुरीषोत्सग
कृत्वा समागच्छामि तावदेषा कन्था योगेश्वरस्य सावधान-
तया रक्षणीया” इत्यक्त्वा गतः । आषाटभूतिरपि तस्मिन्न
दर्शनीमूते मात्रामादाय सत्वरं प्रस्थितः । देवशर्मापि छात्र-
शुणाहुरञ्जितमनाः सुविश्वस्तो यावइपपिष्टस्तिष्ठति ताव-
त्सुवणेसेमदेहपूथमध्ये हुडुयुद्ध मपश्यत् । अथरोषवशाद्डुसु-
गलस्य दूरमपसरणं कृत्वा भूयोऽपि समुपेत्य ललाटपट्टाभ्यां
अहरतो सूरि रुधिरं पतति । तञ्च जम्बूको जिह्वालौल्येन
रंगमूर्सि भविश्य आस्वादयाति । देवशर्मापि तदालोक्य
व्यचिन्तयत् । “अहो ! मन्दमतिरयं जम्बूकः यदि कथमपि
अनयोः संघट्टे पतिष्यति तनूनं मृत्युमवाप्स्यतीति वितर्कः
यामि" । क्षणान्तरे च तथेव रक्तास्वादनलोल्यान्मध्ये प्रावि”
शस्तयोः शिरःसम्पाते पतितो मृतश्च झगालः । देवशर्मापि
भाषाटीकासमेंतम् । ( ६३)
तं शोचमानो मानाप्ठदिश्य शने? शने? प्रस्थितो यावदाषा-
'ठभूति न पश्याति ततश्च ओत्सुक्येन शौच विधाय यावत
' कन्थामालोकयति तावत् मात्रां न पश्यति । ततश्च “हा !
CaM aS
हा ! मुषितोऽस्मीति” जल्पत् एथिवीतळे सूच्छया निप-
पात । ततः क्षणात चेतनां लब्ध्वा भूयोऽपि सटत्थाय
फूत्कलुमारब्धः। भो आषाढमूते' क मां वञ्चयित्वा गतोऽसि ।
तदाहि मे भातिबचनम्”” । एवं बहु विलप्य तस्य पदपद्धतिम-
न्वेषयञ्छनैः शनेः प्रस्थितः । अथ एब गच्छन् सायन्तनसमथे
कख्चिद्वाममाससाद । अथ तस्माड़ामात्क्चित्कोलिवः सभाः
रर्यो मद्यपानकृते समीपवर्सिनि नगरे प्रस्थितः । देवशमोपि
तमालोक्य प्रोवाच- “भो भद्र! व सूय्योंठा अतिथयस्त-
वान्तिकं प्रा्ता न कमपि अत्र यामे जानीमः। तद्भह्मताम-
तिथिधर्मः । उक्तश्च--
सो तुझ ब्रतग्रहणके उपरान्त मठे द्वारे तृणके कुटीमे प्रबेश करना
चाहिये? । बह बोळा-''मगवन् ! भाषकी आजा प्रमाण है दुसरे कोकमे मग
लहो यही मेरा प्रयोजन है” सो झायनकी प्रतिज्ञा कर देवशर्मो अनुग्रहकर
शाज्नोक्त विधिस उसको ग्रिष्प करता भया । वहभी हाथ पैर भादि दावनेकी
परिचर्यासे उसको सुष्ट करता हुआ, इसपरमी बह मुनि बगछसे मात्राको व
स्यागता । तब कुछ समय बीतनेपर आषाढ भूति विचार करनेळ्या, “अहे
फिसीप्रकारसेमी यह मेरे विश्वासको प्राप्त नहीं होताहे । सो क्या दिनमें शल्लसे
मारू या इसको विषदू या पशुको समान मारडाळ'? । यह उसके निचारकरनेपर
देवशमोके शिष्यक्षा पुत्र कोई ग्रामसे निमत्रण करनेकों आया और बोला--
“गवन । यज्ञोपबीत देनेक निमित्त मरे घर आइये”? | यह सुन देवशम
आपाढभूतिके साथ प्रसन्न मन हो चळा । तब उनके जातेमे कोई नदी आगे
आई | उसको देखकर मात्राको वगळमेले निकाळ गुदडीमें छिपाय रख खान-
कर देवाचेनविधिकर भाषाढभूतिसे यह वोळा-“'हे आषाढमूति | जबतक मैं
पुरीप त्यागन करआऊ तबतक यह मुझ योगेइवरकी गुदडी साबधानतासे रक्षा
कना” यह कह गया | आषाढभूतिसी उसके अदीन होनेमें उस मात्राको
(६४) पञ्चतन्त्रस् ।
लेकर पलायन कराया । देवशमोभी शिष्यके गुणोसे अनुरंजितमन होकर विश्वा-
सकर जबतक स्थितरहा तबतक सुवर्णेरोम ( जन्तु ) के यूथमें हुडनामक जीवका
युद्ध देखने लगा | तब रोपके कारण दोनो हुड पीछे हटकर फिरभी बडे वेगसे
आकर मस्तकम प्रहार करते जिससे बडा रुविर निकलता था। वहां एक गीदड
जिद्दाके ढोल्यते रंगसूमिमे प्रवेशकर रुधिर खाता था । देवशमीमी इसको देख-
कर विचार करने ढगा ।'अहो यह गीदड मन्दमति है,यदि किसी प्रकारसे इन
दोनोंके संघट्टे प्राप्त होगा तौ अवश्य मृत्युकों प्राप्त होगा ऐसी में तकेना कर-
ताह” । उसीक्षणमें रुघिर भास्तादानकी चचळतासे बाचमे प्रवेश करताइभा
उनके शिरक झटकेसे श्रगाळ मृतक भया, देवशर्मामी उसको शोचकरता हुआ
घनका स्मरण कर शने; २ चळकर जबतक आषाढमूतिको नहीं देखतादे तंब-
तह्न उत्कठासे शोच करके ज्योंही गुदडीको देखा कि, उसमें मात्राको न पाया
तब “हाय | हाय ! मै ठगा गया?” यह कहकर पृथ्वीमे मूछत हो गिरा । फिर
चेतनताको प्रात होकर उठ श्वास लेने लगा भो आषाइभूति ! मुझे ठाकर
कहां गया ? मुझे उत्तर तो दे”इसप्रकार बहुत विळाप कर उसके पैरोंके चिन्हके
अनुसरण क्रमसे खोजता हुआ शनेः २ चला । यों जाताहुआ संध्यासमय
किसी गांग्रमं प्राप्त हुआ, उस गांवसे कोई कोलिक स्रीक सहित मद्यपान किये
नगरके समीप चलाथा] देवशमोभी उसको देखकर बोळा-'“मो मद्र! हम सूर्योढ
( सन्ध्या समय गृहस्थियोंके घरजानिवाले ) अतिथि तुम्हारे निकट प्राप्त हुए हैं
किसीको इस गांवमें नहीं जानते सो आतिथिधर्म स्वीकार कीजिये । कहाहे-
संप्राप्तो योऽतिथिः सायं सूय्योंटो गहमेधिताम् ।
पूजया तस्य देवत्वं प्रयान्ति गृहमेधिनः ॥ १८२ ॥
जो अतिथि गृहस्थियोके यहां संध्यासमय ( सूर्यक्िपनेके समय ) प्राह
गृहस्थी उसकी पुजाको तो देवत्वको प्राप्त होतेहे | १८१॥
तथाच है
चेत
तुणानि म्रुमिरुदर्क वाऊ चतुर्थी च सूनृता ।
सतामेतानि हम्येंषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १८२ ॥
तृण, भूमि, जळ और चौथी सत्य मघुर वाणी यह सःपुरुषोके घरसे कदा-
चित् भी नष्ट नहीं होतीहे ॥ १८२॥ '
भाषारीकासमेतम् । ( ६५)
स्वामतेनाम्नयस्तत्ता आसनेन शतक्रतुः ।
पादशोचेन पितर अर्घोच्छम्शुस्तथातिथिः ॥ १८३॥
आइये ऐसा कहनेसे अमि, आसनसे इन्द्र, चरणघोनेस पितर और आते-
थिक्के भर्घ देनेसे शिवजी प्रसन्न होजातेदै ॥ १८३॥
कोलिकोऽपि तच्छुत्वा भाय्योमाह-'प्रिये ! गच्छ
त्वमतिथिमादाय गृह प्रति । पादशोचभोजनशयना-
दिभिः सत्कृत्य त्वं ततरे तिष्ठ । अहं तव कृते अभूतं मद्य-
मानेष्यामि'' । एवषुक्ता भस्थितः । साषि भार्य्या पुंश्चली
तमादाय प्रहसितवदना देवदत्त मनसि व्यायन्ती ग्रह प्रति
प्रतस्थे । अथवा साध चेदसुच्यते-
कोलिक्रमी यह वचन सुन अपनी ल्लीसे बोछा-हे प्रिये ! तू इस साते.
यका ढेकर घर जा चरणघाना भाजन शबनादेस सत्कार करक धरहा रह
जोर में तेरे निमित्त वहुतसी मथ छाताह” । यह कह चछा | यह उसका
भाग्या व्यनिचारिणी उसको छ इसतीहुई देवदत्तका मनमे ध्यान करतीहुई
घरको चली । भयवा सत्य कहाहै-
दोदवस घनातामर इ'सश्चराजु घनवाथाष
पत्यावद्रागमनं परमसुख जघनचपलायाः ॥ १८४ ॥
मेधसे आच्छादित दिनम, घन अधकारमे, जहा किप्तीका प्रवेश न हो ऐसी
गळियोमे, पतिके विदेश जानम, चपळजवा (रतिप्रिया ) ह्लियोको परम सुख
हांताह ॥ १८४ ॥
तथाच-
तेसेही-
पय्यडूप्वारतरण पातमतुकूल मनोहर शयनम् ।
टणामव छइ मन्यन्त कामन्यश्वाय्यंरतळुन्याः ॥१८५॥
छगपर साना, पतिको अनुकूडता, तथा मनोहर शयनको भी चौररातिकी
लाळचा त्रियं तृणकी समान लघु मानतीहे ॥ १८५ ॥
प्
~
( ६६) पञ्चतन्त्रम् ।
तथाच-
आरभत
केलिं प्रदहति लजना शृङ्गरोऽस्थीनि चाटवः कटवः
अक्घाः परितोषो न किखिदिष्टं मवेत्पत्यो ॥ १८६ ॥
कुट्डाआका रज्ञा पातिम क्राडा जलाताह, शगार सस्था मनाहर् बचन
कटु छगतेहें, बहुत क्या कोईमी पति इष्ट और परितोषता नहीं होती ॥१८६॥
छुलपतरन जनगहाँ बन्धनमपि जीवितव्यसन्देहम् ।
अङ्गीकरोति कुलटा सततं परपुरुषसंसक्ता ॥ १८७॥
कुला हानता नुष्याम॑ नन्दा, बन्चच, जॉविनम सम्दह यह सब
परपुरुषमें मन ळगानेवाळी कुलटा स्वीकार करलेतीह॥ १८७॥
अथ कौलिकभार्या गह गत्वा देवशर्मणे गतास्तरणां
अग्ना खट्टा समप्य इदमाह-"भो भगवन् | यावदहं स्वः
सखी आमादभ्यागतां सम्भाव्य इतमागच्छामे तावत्त्वया
मदहेऽत्रमत्तन भाव्यम्? एवमभिधाय शगारावोध विधाय
यावदेबद्त्तस्ञदिश्य ब्रजति तावत तद्गता सन्सखो मदविह्व-
गो मक्तकेश; पदे पदे मस्खलन गहीतमद्यभाण्डः समभ्यति ।
सञ्च दृष्टा सा ढुततर व्याघुट्य स्वशूहं प्रविश्य सुक्तश्रंगार"
वेशा यथापूवेमभवत्। कोलिकोऽपि ताँ पलायमानां कृता-
द्वतशगारां विलोक्य घ्रामेब कर्णपरम्परया तस्याः श्वत्ता-
यवादक्ुभितहृदयः स्वाकार निगूहमानः सदेवास्ते। ततश्च
तथाविधं चेष्टितमवलोक्य दृष्ठप्रत्यथः कोधवशगो गह भ्रवि-
श्य तामुवाचआः पापे | पुश्चाळ ! क मास्थताऽसि?” सा
प्रोवाच -“अहं त्वत्सकाशादागता न छुन्रचिदपि निर्मता।
तत् कंथ मद्यपानवशात् अत्रस्ठुत॑ वदसि” अथवा साधु
चेदुच्यते
तब कौलिककी ल्ली घर जाय देवशम यतिको बिछोने रहित भम ( ठूटी )
खाठको समर्पण कर बोछ-“भंगवन्.! जबतक ग्रामसे आई हुईं अपनी सखीसे
कुळ कहकर शीघ्र भाउ तबतक तुम हमारे घर; सावधानतासे रहना”. यह
भाषाटीकासमेतम् । (६७)
कह शंगारकर जबतक देवदत्तके निकट चढी कि, तबतक उसका मतो साम-
नेसे मदसे विह्वळं शरीर बाळ खोले पय पगपर गिरता इभासा मका बर्तन
प्रहणकरे हुए आया । उसको देख वह बहुत, शीघ्र छौटकर तत्काळ श्रगार
उतार पूर्ववत् स्थित हुई । कोळिकमी उसे भागती हुईं जद्भुत श्व्गार किये
देखकर प्रथम ही कर्णपरम्परासे उसकी निन्दासे क्षुमित हृदय हुआ अपने
आकारको छिपाये हुए सटा स्थित रहताया ) उसकी इस प्रकारकी चेष्टाको
देख उम्रबातका विस्वासकर क्रोधसे घरमे प्रवेश कर उससे बोला-“आः पापे
व्यमिचारिणी,! कहा जाती है १? वह बोली-“मैं तुम्हारे पाससे आकर कहींमी
नहीं निकठी, सो किसप्रकार मचपान करके अप्रस्तुत वचन बोलते हो" । अथवा
सत्य कहा हे-
बेकल्य घरणीपातमयथी चितजहपनम् ।
सन्निपातस्य चिद्वानि मद्यं सर्वाणि दर्शयेत् ॥ १८८ ॥
विकलता, धरणीपर गिरना, जो सनम भावे सो वकचा, यह सन्निपातके
चिन्ह मद्यम सव स्थित रहते हैं ॥ १८८ ॥
करस्पन्दोषम्वरत्पागस्तेजोहानिः सरागता ।
वारूणीसंगजावस्या भानुनाप्यनुभूयते ॥ १८९ ॥
हाथमे फॅपकपी, वल्त्याग, तेजहानि, रागता, यह वारुणीपानकी अवस्या
सूयते भी अनुभव कोजाती है, अन्यकी कीन कहे पश्चिम दिशार्म अस्त होते समय
सूर्यका यहीं दशा होती हे [| १८९ ॥
सोऽपि तच्छत्वा ्रलिकूलवचनं वेशाविपय्यय च अव-
लोक्य तामाह- “पुंश्चलि! चिरकालं श्व॒तो मया तव अपवाद
तदद्य स्वयं स्ातप्रत्ययः तव यथोचितं निम्रहं करोमि’
इति अभिधाय लगुडप्रहारेः तां जजेरितदेहां विधाय स्थू-
णया सह दृटबन्धनन बद्धा, सोऽपि मदविह्वलो निद्रावश-,
मगमत् । अत्रान्तरे तस्याः संखी नापिती कोलिकं निद्रा-
वशगतं विज्ञाय तां गत्वा इदृमाह-'साखि! स देवदत्तः
तस्मिन् स्थाने त्वां प्रतीक्षते तच्छीध्रमागम्यताम्। ' दात सा
च आह-“पंश्ये मम अवस्थाम् । तत्कथं गच्छामि ! तदत्वा
८६८) पञ्चतन्त्रस् ।
कुळ
ज्ञाहे ते कामिनं यदस्यां रात्रो न त्वया सह समागम! |
नापिती प्राह-' सखि । मामेवं बद । न अयं कुलटाधर्मः ।
उक्तव- -
चढनी यह बचन सुन प्रतिकूळ वचन खोर बाडांका बिखरना देख उससे
बोला--पुश्चछि | बहुत दिलेंमें मैंने तेरा अपवाद घुनरवखा हे, सो आजदिन
स्वयं देखकर विश्वास आगया है अब तेरा यथोचित दण्ड करता हुं, ” बह कह
लकडीके प्रह्मस्स उसकी जजीरेत देह ( चरणे ) करके स्तम्मर्मे दृढ बांधकर
मदविहरु हो निद्राके वशीभूत हुआ, इसी समय, उसकी सखी नायन कौठिकको
निद्राके वशीमूत हुआ जानकर जाकर उससे थीं बोलो--“सखी देवदत्त उस
स्थानमे तेरी बाट देख रहा है सो शीघ्र जाओ” बह बोळी-, “मेरी अवस्था तो देख
मला मै कैसे जासक्ता हूं £ सो तूही जाकर उस कामीसे कह आजकीरात तुम
सग समागम न होगा” नायन बोछी-- सखी ऐसा मत कृह, यह कुलटाभोंका
घमं नहा हं । कहा हल"
विषमह्थर्दाइफलयहणव्घबक्षायनिश्चथो थेषाम्।
उष्ट्रणानिव तेषां मन्षेऽह शंसितं जन्म ॥ १९० ॥ .
कठिन स्थाचमें स्थित स्वादु फळके ग्रहण करनेका जिनका निश्चय हैं
उन्हीका जन्म में ऊंडोको “समान प्रशंसित मानती हूं ॥ १९० ॥
तथाच '
तैपेही-
खोन्दग्ध परलाक जनापवाद च जगात बहाचिन्ने ।
स्वाधीन पररमणे बल्यास्तारुूण्यफलभाज! ॥ १९१ ॥
परलोक॑में सन्देह है, जनापवाद चित्र विचित्र होता हे, दूसरेसे रमण करना
स्वाधीन है युवावस्थाके फळ भोगनेवाली त्री घन्य हैं॥ १९१ ॥
यदि भवाति देवयोगात्पुमान् विरूपोऽपि बन्धकीरहसि ।
नत कृच्छादाप नदर ।नजकान्त सा नजत्येव ॥ १९२ ॥
औरमी यदि देवयोगसे पुरुष कुरूपमी एकान्तमे प्राप्तहों तथापि वह कष्टको
आत्त हुई झुन्दरंसी भपने पतिका भजन नहीं करती है | १९२ ॥.
| A ® ५६
भाषाटीकासमेतम् ! (६९ )
सा अब्रवीव- “यदि एवं तार कथय कथं हठवन्धनबद्धा
सती तत्र गच्छामि १। सन्निहितश्चायं पापात्मा मत्पतिः? ।
नापिती आहइ-''सखि ! मदविह्वलोऽयं सूर्यकरस्पृष्टः प्रबोधं
यास्पाति । तदहं त्वा्ुन्मोचयामे । मामात्मस्थाने बद्धा
टुततरं देवदत्तं सम्भाव्य आगच्छ) । सा अन्रबीत- एव-
मस्ठु'' इति । तदल सा नापिती तां स्वसखी बन्धनांदि-
मोंच्य तस्याः स्थाने यथापूर्वमात्मानं बद्धा तां देवदत्तसकाशे
संड्केतस्थानं प्रेषितवती । तथानुछिते कोलिकः कास्मिश्चि-
क्षण समत्याय किश्चिद्तकोपो विमदश्तामाह,-' हे परू-
षवादिनि ! यदि असद्येप्रद्धति गृहान्निष्क्रमणं न करोषि
न च परुषं वदसि ततेः त्वामुन्मोचयामि’ ! नापिती
अपि स्वरभेदभयात यावन्न किश्चित ऊचे तावत सोऽपि
भूयोभूयस्तां तदेव आह । अथ सा यावत प्रत्युत्तर
किमपि न ददौ लावत. स प्रकापितस्तीक्ष्णशख्मादाय
नासिकामच्छिनत् आह च- २ पुंश्चलि ! तिष्ठ इदानी न
त्वां भूयस्तोषयिष्यामि इति जल्पन् पुनरपि लिद्वावशमग-
मत्! देवशर्मा अपि वित्तनाशात धुत्कासकण्ो नष्ठनिल््न-
स्तत्सर्वे त्रीचरित्रमपश्यत् । सापि कोलिकभार्य्या यथेच्छया
देवदत्तेन सह सुरतसुखभलुभूय करिमिश्चित् क्षणे स्वगहमा-
गत् तां नापितीमिदमाइ-''अयि ! शिवं भवत्याः । नाथं
पापात्मा मम गताया उत्थितः? । नापिती आह-“शिवं
नासिकया विना शेषस्य शरीरस्य । तद् ट्रुतं मां मोचय
चन्धनात, यावन्नायं मां पश्याति थेन स्वशृहं गच्छामि’? ।
तथा अलिते भूयोऽपि कौलिक उत्थाय तामाह- पुंश्चलि !
किमद्यापि न वदसि । कि भूयोऽप्यतो इष्टतरं निम्नहं- कणे-
न्क करोमि” । अथ सा सकोपं साथिक्षेपमिदमाह-
भेक थिक महासृढ ! को मां महासतीं धर्षथिठं व्यंग-
'यिठुँ वा समर्थ: । तत् शण्बन्तु सर्वेऽपि लोकपालाः ।
(७०) पश्चतन्त्रम् ।
वह वोळी-“यादि ऐसा हे बता किसप्रकारसे मै दृढ बंधनमें बँधी हुई वहां
जाऊ? और यह पापात्मा मेरा पति समीपमें हे” | नायन बोळी--“सखी !
मदसे विहृळ हुआ यह सूर्ये निकळनेपर जागेगा । सो मैं तुझे खोले देतीङू,
मुझ अपन स्थानम बांधकर बहुत शत्र देवदक्तका मन मनाकर आ” बह,
बोळी-~'एंसाहा हो? तब यह नायव उस अपनी सखीको बन्धनसे खोळ उसके
स्थानमें यथापू अपनी आत्माको बांधकर उसको देवदत्तके निकट संकेत स्थान
भेजती हुई । ऐसा होनेपर कोळिक कुछ काळ उपरान्त उठकर कुछ गतकोप और
मद् उतरनेसे बोला-“'हे कठोरवादिनि ! यदि आजसे लेकर तू घरसे न निकरे
तो तुझे खोळ”? नायनभी स्वरभेदके भयसे जबतक कुछ नहीं बोळती तबतक ,
वहभी वारंवार उससे यही कहने लगा ओर जब उसने कुछमी उत्तर नदिया तन,
वह क्रोधकर तीक्ष्ण छुरी लेकर उसकी नाक काटता हुआ और बोछा-“कुलटा |
ठहर फिर नतुझको संतुष्ट करूंगा?” यह कहकर सोगया । देवशमोमी धनके नाशसे
वासे शुष्ककेठ हुआ निद्रा रहित होकर यह सब स्रीचारित्र देखता रहा था, और,
वह कोलिकमारयों यथेच्छ देवदत्तके संग घुरतका सुख अनुभव कर कुछ काळ
उपरान्त घर आकर उस नायनसे बोळी-“कहो तुम्हारे कुशळ हे? खयि !
तुम्हारी कुशळ है ? मेरे जानेपर यह पापात्मा उठा तो नहीं”? नायन बोली-
“नासिकाके विना और सब शरीरमें कुश है, सो शीघ्र मुझे बन्धनसे खोळ '
जवतक यह मुझे न देखे जिससे में अपने घर चली जाऊं?” ऐसा करनेपर
दिरमी कौडिक उठकर बोला-“पुं्ाले | क्या भनभी नहीं, बोलती क्या
अब फिर कठिन दण्ड कर्णेछेदनका तुझको करू” | तब वह क्रोध और
आक्षेपके सहित यह बोळी,-“घिक् विकू महामृढ ! कौन मुझ महासतीको-
घर्षण करनेका अथवा व्यंग ( शरीरछेदन ) करवेको समर्थ हैं। सो. सब
लोकपाळ छुनें-
आदित्यचन्द्राचनिलोऽनलश्च
दाभूमरापो हदस यमश्च ।
अहश्च रात्रेश्च उन च सन्ध्य ,
धमश्च जानाते नरस्य ब्रत्तम्॥ १९३ ॥
सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अनि, स्वर्ग, पृथ्वी, जळ, हृदय, यम, दिनरात, दोर्नो
संध्या ओर धम मनुष्यका वृत्त जानते है || १९३ ॥
भाषाटीकासमेतम्। (७१)
तद्यदि मम सतीत्वमस्ति मनसापि परपुरुषो नाभिल-
षितः ततो देवा भूयोऽपि मे नासिकां ताइग्रपामक्षता
कुवेन्तु । अथवा यदि मम चित्ते परपुरुषस्य भ्रान्तिरपि
भवति मा भस्मसान्नयन्ठ” । एवसक्ता भूयोऽपि तमाह-
“भो दुरात्मन् ! पश्य मे सतीत्वप्रभावेण ताशी एव
नासिका संदृत्ता”। अथ असा उल्एुकमादाय यावत्पश्यति
तावत् तद्रूपां नासिकाञ्च भूतले रक्तत्रवाहृश्च महान्तमप-
श्यत्। अथ स विर्िमितमनास्तां बन्धनाद्विसच्य शय्यायामा-
रोप्य च चाटुशतेः पर्य्थतोषयत्। देवशर्मा अपि तं सर्वेववत्ताः
न्तमालोक्य विस्मितमना इदमाहु-
सो यदि मेरा सतीत है और मनसेभी परपुरुषका अभिलाष नही
कियाहे तो देवता फिरभी मेरी वातिकाको उसी प्रकारकी अक्षत करदें | अथवा
यदि मेरे चित्ते परपुरुषकी आन्तिभी हो तो सुन्नको भस्म करदे”” | यह कह फिर
उससे बोळी,-“भो दुरात्मन् ! देख मेरे सती्के प्रमाबसे फिर वेसीहा नासिका
होगई'? तब यह दीपक लेकर देखनेछगा तो उसी प्रकारकी उसकी नासिका
ओर पृथ्वीमें रक्तप्रवाइ बहुत देखता भया। तब यह बिह्मितमन होकर उस ब्न्थ-
नसे खोळ शब्यामें आरोपणकर सैंकडों मनोहर वचनोसे उसको सन्तुष्ट करता-
हुआ । देवशमीभी इस सब बृततान्तको देखकर विस्मयको प्राप्त होकर यह बोछा-
“शम्बरस्य च या माथा या माथा नसुचेरपि ।
बले; कुम्भीनसेश्चैव सर्वास्ता योषितो विदुः ॥ १९४ ॥
“जो झम्वरकी मायाहे, जो नमुचिकी मायाहे, बलि और कुम्मीनसको जो
मायाहे वे सव माया ल्रिये जानतीहें ॥ १९४ ॥
हसन्तं मरहुसन्त्यता सुदन्तं मरुद्न्स्यपि I -
अमिय प्रेयवाक्ये्व गहन्ति कालयोगतः ॥ १९५ ॥
यह हंसते हुएके साथ हँसती, रोते इएके साथ रोती, समय योगले अनुरक्त
जनको प्रियवचनोंसे, ग्रहण मरती हैं ॥ १९५ |
उशना वेद यच्छाखं यञ्च चेद् बृहस्पतिः ।
स्रीबुद्धया न विशिष्येत तस्माद्रक्ष्घाः कथं हि ताः॥१९६॥
(७२) पश्चतन्त्रस् ।
जो झाल्ल शुक्र जानताहै भौर जो शास्र बृहस्पति जानता है वह ज्लीकी
बुद्धिमें कुछ विशेष नहीं है इस कारण उन ह्वियोंकी केसे रक्षाहों ॥ १९६ ॥
अनूत सत्यमित्याहुः सत्य चापि तथानृत्तम्।
- इति याइताः कथ धीरेः संरक्ष्याः एरुषेरिह ॥ १९७ हे
जो असत्यको सत्य और सत्यको असत्य कहती हैं घोर पुरुष इस संसारसें
उनकी किस प्रकार रक्षा कर सकतेई ॥ १९७॥
अन्यत्रापि डक्तम्-
ओर स्थानमे भी कहाहै-
नातिप्रसंगः प्रमदासु कार्यों नेच्छे ळं स्त्रीषु विवद्धेमानम् ।
अतिप्रसक्तैः पुरुषेसुतास्ताः क्रीडन्ति काकेरिव लूनपक्षेः१९८
ब्रियोंमे अतिप्रसग न करे ओर उनका बल बढ़ने नदे कारण अति आसक्त हुए
पुरुषोंसे वह पंखनुचे कोभोकी समान क्रीडा करती हैं ॥ १९८ ॥
खुसुखेन वदन्ति वल्गुना प्रहरन्त्येव शितेन चेतसा ।
मधु तिष्ठति बाचि योषितां हृदये हालहलं मह॒द्विषम् १९९
सुन्दर सुखसे मनोहर बोलतीहैं, तीक्षण चित्तसे प्रहार करती हैं छ्षियोके वच-
नमे मधु' और हृइयमं हळाइळ विप रहताहे ॥ १९९ ॥
अतएव निपीयतेऽधरो हृद्यं मुष्टिभिरेव ताडयते ।
पुरुषेः सुखलेशबखितर्मघुलुब्बेः कमलं यथालिभिः २००॥
इसी कारण उनके अधर पिये जातेह और हृदय सुष्टियोंसे ताडन किया
जाता हे, सुखलेशस बञ्चित हुए पुरुषोसे, मघुसे छन्त इए भोरों द्वारा कमळकी
समान ( भोग किया जाता हें )॥ २०० |
अपिच- i
और मी कहतेहे-
आवत्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साहसानां
दोषाणां सन्निधानं कपटशतगृहं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् ।
ढुम्राह्यं यन्म हद्विर्नरवरश्षभेः सर्वमायाकरण्डं
haa 0, त
, ख्घेयन्त्रै केन लोके विषमसतयुतं धर्मनाशाय सृष्टम् २०१॥
भाषाटीकासमेतम् । (७३)
सदेहोका आवर्ते ( भोर ), भविनयका घर, साहसका पत्तव (नगर ),
दोषोंका स्थान, कपटका शतगृह, अविश्वासका क्षेत्र, बडे नरपुरुपॉसे ग्रहण
' करनेको असमर्थ, सव मायाकी पोटढी ल्लीरूपी यत्र जो बिष और अगुतसे
युक्त है सो धर्म नाशके किये किसने निर्माण की है? ॥ २०१ ॥ '
कार्कश्यं स्तनयोदेशोस्तरलतालीकं सुखे दश्यते
कौटिल्यं कचसश्चये प्रवचने मान्द्यान्त्रिके स्थूलता !
भीरुत्वं हदये सदेव कथितं मायाप्रयोगः प्रिये .
यासां दोषगणो एणा झृगहशां ताः कि नराणां मियाः२०२
स्तनेंमें कठिनता, नेत्रोमें चचळता, सुखें असत्य, वाळसमुहूर्म कुटिलता,
वचनमें मधुरता, नितम्बोमे स्थूढता, हृदयमें भय, स्वामीमें मायापूबेक वचनोका
कहना, इस प्रकारके जिनके दोप गुणनामसे ग्रहण किये जाते हें, क्या वह
मनुध्याँकी प्रिया हें * अथीत् नहीं हें ॥ २०२ ||
एता हसन्ति च रुदन्ति च कार्य्थहेतो-
विश्वासयान्ति च परं न च विश्वसन्ति ।
तस्मान्नरेण कुलशीलवता सदैव
नाय्येः श्मशानवटिका इव वर्जनीयाः ॥ २०३ ॥
यह कार्यके निमित्त हॅतती और रोती हैं, विश्वास करकेमी यह विश्वासको
प्राप्त नहीं होती हैं इसकारण कुठ्शीळवाछे मनुष्यको सशानफे चटबृक्षकी
समान सदा त्रये वर्जनीय हैं ॥ २०३ ॥
व्याकीर्णकेशरकराळघखा मृगेन्द्रा
नागाश्च भूरिमद्राजिंबिराजमानाः ।
मेधाविनश्च पुरुषाः समरेषु शूराः
स्रीसन्निधो परमकापुरुषा भवन्ति ॥ २०४॥ = -
विखरे हुए गरदनके बालोंते करालमुर्खासह, अत्यन्त मदसनूहसे विराज-
मानहाथी तथा बुद्धिमान् समरझूर, पुरुष भी खीके निकट परम कायर
होजाते हे | २०४ ॥ । हि
कुवेन्ति तावत्मथमं भियाणि
यावन्न जानन्ति नरं प्रसक्तम् ।
(७ पञ्चतन्त्रम् ।
रे
ज्ञात्वा च तं मन्मथपाशबद्धं
ग्रस्तामिषं मीनमिवोद्धरन्ति ॥ २०५ ॥
जनतक यह मनुष्यको प्रसक्त नहीं जानती तबतक प्रिय करतीहें ओर पाठे
उसे कामके पर्शामूत जानकर मांस ग्रहण करनेबाळी मछर्लाकी समान उठा.
ऊती हैं॥ २०६ ॥
समुद्रवीचीव चलस्वभावाः
सन्ध्यात्ररखच सहततरागाः ।
खियः कृताथ पुरुषं निरर्थ
निष्पीडिताळक्तकवत््णजन्ति ॥ २०६॥
समुद्रकी तरंगोंक समान चंचळ सभाव संध्याकालके मेघरेखाकी समान
मुहूतेमात्रको रागवाली ख्ये सिद्धकाम होकर निधेन पुरुपको विचोडे महाबरकी
समान व्याग देती हैं ॥ २०६ ॥
अनृतं साहसं माया मू्खत्वमतिलोभता ।
अशाचं निर्दयत्वश्च सत्रीणां दोषाः स्वभावजाः ॥ २०७ ॥
झूठ, साहस, माया, मूर्ख, अतिळोभ, अपवित्रता, नि्देयता यह छ्ियोके
स्वाभाविक दोषै ॥ २०७ ॥
सम्मोहयन्ति मदयन्ति विडम्बयन्ति
निभेत्सेयान्त रमयन्ति विषादूयन्ति !
पताः श्रावश्य सरल हृदय नराणा
कि वा न वामनयना न समाचरन्ति ॥ २०८॥
मोहित करती, मदकरती, प्रसन्न करती, वंचित करती, घुडकती, रमती भौर
बिषादित करती हैं, बहुत क्या यह कुटिळ नेत्रवाढी पुरुषॉके सरल हृदयोमें
प्रवेश करके क्या क्या नहीं करती हैं || २०८ ॥
अन्तर्विषमया होता बहिश्चैव मनोरमाः ।
गुखाफलसमाकारा योषितः केन निर्मिताः ॥ २०९ ॥??
यह भीतरसे विषमय और बाहरसे मनोरम, चौंटलीके फलकी समान त्र्य
किसने निर्मित की हें १ ॥ २०९. ॥”
एवं चिन्तयतस्तस्य परिब्राजकस्य सा निशा महता कृच्छ्रेण
अतिचक्राम! सा च दूतिका छिन्ननासिका स्वगृहं गत्वा
भाषाटीकासमेतम् । (७५)
चिन्तयामास । ''किमिदानी कत्तव्यम् । कथमेत्तत् महच्छिदे
स्थगयितव्यम्’? । अथ तस्या एवं विचिन्तयन्त्या भत्ता काय"
वशाद्वाजङुले पर्युषितः भत्यूषे च स्वग्हमभ्युपेत्य द्वारदे-
शस्थः विविधपौरक्ृत्योत्सुकतया तामाह- भद्र ! शीघ्रमा-
नीयतां क्रुरभाण्डं येन क्षोरकर्मकरणाय गच्छामि'' । 'सापि
छित्रनासिका' गुहमध्यस्थितेव कार्यकरणापेक्षया क्षुरभाः
ण्डात्क्ुरमे्क समाङ्गष्य तस्य अभिसुखं प्रेषयामास । नापि-
तोऽपि उत्सुकतया तमेकं क्षरमवलोकय कोपाविष्टः सन् तद्-
भिसु॒खमेव तं क्षुरं प्राहिणोत् । एतस्मिन्नन्तरे सा इष्टा उद्धः
बाहू विधाय फ्त्कत्ठमना गृहात् निश्चक्राम । “अहो! पापेन
अनेन मम सदाचारवर्तिन्याः पश्यत नासिकाच्छेदो बिहितः।
तत्परिन्नाथतां परित्रायताम्’? । अत्र अन्तरे राजपुरुषाः सम-
भ्धेत्य तं नापितं लणुडमहारेजजेरीकृत्य हढबन्धनेबेद्धा
तया छिन्ननासिकया सह धर्माधिकरणस्थानं नीत्वा सभ्यान्
ऊचुः “ण्बन्तु भवन्तः सभासदः । अनेन नापितेन अपराधं
विना ख्रीरत्रमेतद्वयद्गितं तदस्य यत् यज्यते तत् क्रिय-
ताम्? । इति अभिहिते सभ्या ऊच्रः- रे नापित ! किमर्थे
त्वया मार्या व्यंगिता। किमनया परपुरुषोऽभिलषितः, उत
स्वित् प्राणद्रोहः कृतः, किंवा चोय्येकम आचरितम् । तत्
कथ्यतामस्या अपराधः १” । नापित्तोऽपि प्रहारपीडिततनु-
वेकं न शशाक ! अथ तं तूष्णीभूतं दृष्टा पुनः सभ्या ऊचुः
अहो ! सत्यमेतत् राजपुरुषाणां वचः पापात्मा अथम्।
अनेन इथं निदोंषा वराकी दूषिता । उक्तस्व- .
यह [वचार करते उस सन्यासाका वह रात बड कष्टस वाता भोर बह नाक“
कटा दूता अपन घर जाकर [विचार करने छगी कि, अब में क्या करू | किस
प्रकार यह महाछिद्र छिपामा चाहिये!” | उसके यह विचार करतही उसका
स्वामी किसी कार्यके बशसे राजङुलमें रहाहुभा प्रातःकाळ निज घरमै आकर
द्वारपर स्थित इआही बहुतसे नगरवासियोंके कार्यकी उत्कठासे उससे बोळा=
(७६) पञ्चतन्त्रम्।
त,
“मद्रे ! शीत क्षुरभाण्ड (किखत ) ळा जिससे के, क्षोरकम ( हजामत ) बना,
-नको जाउ” । चहमी नाककटी अपने घर्मेसेही बहुत कार्य करनेकी व्याज-
तासे किसबतमेंसे एक उसतरा निकाळ उसके निकट भेजती भई, इधर नापित-
नेमी उत्कंठासे एकक्षुरको देख क्रोधकर उसके सन्मुख उस क्षुरको फंकादिया ।
इसी अवसरम वह दुष्टा उपरको भुजा उठाकर स्वास लेती ( हाय हाय ) करती
चरसे निकछी,“भहो ! इस नाईने मुझ सदाचारमें रहनेवालीकी चाक काटदी,
सों रक्षा करो रक्षा करो” | उसी अवसरमें राजपुरुप भाकर उस नाईको डंडोसे
ताडितकर दढ बंधनसे बांब उस छिन्ननासिकाके सहित धर्माधिकारीके स्थान
(कचहरी ) में ळेजाकर वहांके सभ्योंसे बाळ-“हे सभासदों! सुनो । इस नाईने
अपराधके विचा इस स्रीख्नका अंगसंग किसा, सो जो कुछ इसका करना हम
करो” | यह कहनेपर सम्य बोले-- हे नाई ! क्यों तेने इस छ्लीको ब्यगित किया १
क्या इसने परपुरुषकी भामिळाषा की | या प्राणद्रोह किया । या चोरी की। सो
इसका भपराध कहो?” । नाइभी प्रहारसे पीडित शरीर होनेके कारण कुछ ब
कुहसका ।'उसको चुप देखकर सम्प वोळे-““अहो यह राजपुरुर्षोका वचन सत्यहे ।
यह पापात्माहै इसने इस विचारी निदोर्षाको दूपित कियांहे । कहाहै-
= गिन्नर्वरभुखवणः शाङ्कतरा®ः समुत्पातततजा; ।
भवाति ह् पाप कृत्वा स्वकमसन्तरासंतः एरूषः॥ २१० हे
ओर प्रकारका स्वर, मुखका अन्य वणे, संदिग्ध इष्टि, उत्पातित तेज (नृष्टश्री)
यह वस्तु पापकरके अपने कमसे सन्तापित पुरुषोंको होतीहें ॥ २१० ॥
तथाच-
"और देखो-
आयाति स्खलिते? पादेमुखवेवण्यसंयुतः
ललाटस्वंदमाक भार गढ भाषत वचः ॥ २११ ॥
स्खकित् चरणोसे आताहे, मुखमें विषणे होताहै, माथेपर पसीना, और बोडनेमै
गडबड ॥ २११ ॥
अधाद्ाष्ट्नवत्ट्वत्वा पाप आततः सभा नरः
तस्माद्लात्पारज्ेयाश्चहरतावचक्षण्ः ॥ २१२,॥
` पाप कारके यदि मनुष्य सभामें भावे ता उसकी अधोष्ट होती है इसकारण'
“इन चिन्होंसे मनुष्य यत्से इनको पहचाने ॥ २१९॥
१
भाषाटीकासमेतम् । (७७)
अन्वञ्चः
आर भ~ है
असन्नवदनो दष्टः स्पष्टवाक्यः सणांषरकू । न र
सभायां वाक्त सामपे सावष्टम्मा नरः शाचः ॥ २१३.॥ .
प्रसन्नवदन, हृष्टता, स्पष्टचन- बोलनेवाठा; क्रोपदाष्टि, धेयेतासे सभाके
चिते पवित्र मनुष्य धसे बोताहै ॥ २१३ ॥
तदेष दष्टचरित्रलक्षणो इश्यते । स्री धर्षणात् वध्य इति।
तच्छुलमारोप्यताम्? हाते | अथ वध्यस्थाने नायमानं तम-
बलोक्य देवशमो ताव् धर्माधकृतान गत्वा प्रोवाच- भोः!
मोः! अन्यायेन एष वराको वध्यते । नापतः साइसमाचार
एब्१। तत् श्रूयतां मे वाक्यम्। ` जम्बूको हुडुयुद्धेन हाते । अथ
ते सभ्या ऊदुः भो भगवन्! कथमेतत्?” । ततो देवशर्मा
तेषा अथाणामाप दृत्तान्त बस्तरण अकथयत् । लदाकण्य
सुविस्मितमनसस्ते नापितं विमोच्य मिथः भोचुः-“'अहो !
सो यह दुष्टचारत्र लक्षणवाळा दीखताहै, ल्लीके धर्षणसे वध्यहै सो इसको शूछ-
पर अरोपण करो” । तत्र बष्यस्थानमे लेजाते इए इसको देख देवशर्मा उन
अघिकारियोके पास जाकर बोला- मो | मो | अन्यायसे यह बिचारा मारा
जाताहै, यह नाई तो श्रेष्ठ आचारवाळादै, सो मेरा वाक्य श्रवण करों-“जम्बुक
हुडयुद्धसे” इत्यादि । तब वे सभ्य वोले¬ “भगवन् | यह क्या बात्तहै १” |
तब ढवशर्मा उन तीनोंके इत्तान्तको बिस्तारसे कहता भया | यह बचन सुन
वे सव विस्मयको प्राप्तहो नाईको छोडकर परस्पर कहने लगे “भहो ]
- अवध्यो ब्राह्मणो वालः स्त्री तपस्वी च रोगमाक।
विहित्ता व्थंगिता तेषामपराधे महत्यपि ॥ २१४ ॥
ब्राह्मण, वालक, स्री, तपस्वी, रोगी यह भवष्यहें, यदि इनका कोई बडा
भपराध हो तोमी कोई भङ्ग विकळ कर्देना उचितहै ॥ २१४.
तदस्या नासिकाच्छेदः स्वकर्मणा हि संडत्तः। ततो राज-
निग्रहस्ठु कर्णेच्छेदः कार्यः? । तथाबुछ्ति देवशर्मापि वित्त-
(७८) - पश्चतन्त्रस् ।
नाशसमद्भधतशोकरदितः पुनरपि स्वकीयं मठायतनं जगाम ।
अतोउहै ब्रवीमि-“जम्बूको हुड्युद्धेन' इति ।
सो इसका नासिकाच्छेद तो इसके कसेही होगयाहे । अब राजनिग्रह कर्ण-
च्छेद करना” । एपा हॉनपर दवझमाभा अपन घननाशक शाकस राहित हो अपने
अठमें आया, इससे में कहताइ-* जम्बुक हुडुयुद्धस”' इत्यादि ।
करटक आइ“ “एवंविधे व्घतिकरे कि कत्तेव्पमावयोः” [
दमनकोऽब्रवीत्- एवाविधेऽषि समथे मम बुद्धिस्फुरणं भवि
ष्यति, थेन सञ्जीवकं प्रभोविश्लेषायेष्यामे । उक्तश्च-
करटक बोळा-“इस प्रकारकी अवस्थाम इम दोनांको क्या करना चाहिय? । -
दमनक बोळा-“इस प्रकारके समयर्मेमी मेरी बुद्धि स्फारित होगी, जिससे
संजीवकको प्रभुसे पृथक् करसकूंगा | कहाहै-
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुसुक्तो धनुष्मता । ` ˆ
बादवाद्धमतः सष्टा हान्त राष्ट सनायकम् ॥ २१५ ॥
घनुष्यधारीके धनुषसे निकळा हुआ वाण किसी एकको मारे था न मारे लेकित्
बुद्धिमासकी बुद्धिसे किया कत्य राजा सहित राज्यको नष्ट करतहे | २१६ ॥
तदह मायाभ्रपश्चेन गृत्तमाश्रित्य तं स्फोटायेष्यामि” ।
रटक आह- भद्र ! यदि कथमपि तव मायाप्रवेशं पिड़-
लकः ज्ञास्यति सञ्ीवको वा तदा नूनं विघात एव''।
सोऽन्रवीत-' तात ! नेवं वद् गूढबुद्धिनिरापत्काळे विधुरेः
ऽपि देवे बुद्धि; ्रयोक्तव्या नोद्यमस्त्याज्यः कदाचित् छणा
क्षरन्यायेन बुद्धेः साम्राज्य भवति । उक्त्च-
सो मैं मााप्रपंचसे शुत आश्रय कर इनमें छूट करू” करटक बोळा--
“मद्र | यदि किसीप्रकार यह पिंगळक संजीवक तुम्हारी मायाका प्रवेश जान
जायें तो अवश्य नष्ट होना होगा” बह वोला--“तात ! ऐसा
मतकहो, महाबुद्धिमानांको भापत्काळमे प्रार्धके नष्ट होनेमेंभी घुद्धिका प्रयोग
करना ठचितहे, उद्यमका- त्याग करना अच्छा नहीं है, कदाचित घुणाक्षरन्यायसे
बुद्िद्वारा सुखसाम्राज्य प्राप्त होजाय । कहा भी है--
” १ धुनके कुरेदनेसे जो अक्षर वनजाय |
भाषाटीकासमेतम्। (७९ )
त्याज्यं न घेय्थ विधुरेऽपि देवे
घैरर्वात्कदाचित्स्वितिमाप्त॒यात्सः ।
याते समुद्रेडपि हि पोतभङ्गे
सांयात्रिको वाञ्छति कम्म एव ॥ २१६ ॥
देवके विगडनेमेभी धीरता त्यागत करनी नहीं चाहिये कारण कि, पैयेसे
कदाचित् स्थितिकी प्राति होजाय समुद्रमे जहाज इबनेपरमी ' पोत बणिक् उद्यम
करनेकीही इच्छा करता है। ( भवीन्तरन्या्ः) ॥ २१६ ॥
तथाच-
सर देखो-
खोगिनं सततमत्र समेति लक्ष्मी
देवं हि दैवमिति कापुरुषा वदान्ति।
_ देवं निहत्य कुरू पीसषमात्मशत्तया
यत्ने कृते यदि न सिद्धयति कोऽत्र दोषः ॥ २१७ ॥
उद्योगी पुरुषको निरन्तर लक्ष्मी मिळती है, प्रारब्ध देता है यह कायर कहते
हैं, देवको त्यागकर भाशक्तिसे पुरुपार्थ कर यत्न करमेपरमी यदि सिद्ध न हो
तो किसका दोष हे ॥ २१७ ॥
तदेवं ज्ञात्वा,सुयूट्चुद्धित्रभावेण यथा तो द्वौ अपि न
ज्ञास्यतः तथा मिथो वियोजयिष्यामे । उक्तव-
सो ऐसा जानकर अपनी बुद्धिके प्रभाष करके जेसे वह दोनों न जाने इस
प्रकार उनको वियुक्त कर दूंगा । कहाभी है-
सुगुत्तस्यापि दम्मभस्य त्रह्माप्यन्तं न गच्छति ।
कोलिको विष्णुरूपेण राजकन्यां निषेवते ॥ २१८ ॥”
| सम्यक् प्रकारसे छिपाये दम्मके अन्तको तो ब्रह्मामी नहीं जानसकता, इसी
छिये एक कौलिक विष्णुके खूपसे राजकन्यासे रमताथा ॥ २१८ |?
करटक आह-''क्रथमेतत् ??? सोऽब्रबीत्-
करटक बोला,-यह कैसी कथा हे £? वह बोला<
a
२
(८०) पञ्चतन्त्रम् ।
" कृथा ५
कस्मिंथश्विदृधिष्ठाने कोलिकरथकारों मित्रे प्रतिवसतः स्म!
तत्र च तो बाल्यात् मरति सहचारिणी, परस्परमतीव स्ने-
हपरौ सदा एकस्थानविहारिणी कालं नथतः। अथ कदाचित्
तत्राथिष्ठाने कस्मिंश्चिदेवायतने यात्रामहोत्सत्रः संवृत्तः
तत्र च नटनत्तेकचारणसंकुले नानादेशागतजनाृते तो सह
चरौ भ्रमन्तो, काश्विद्राजकन्यां करेणुकारूढां सर्वलक्षणस-
नाथां कञ्जकिवर्षवरपरिवारितां देवतादर्शनार्थं समायातां
दृष्टवन्तो । अथासौ कौलिकस्तां दृष्टा विषादित इव इष्टः -
अहशुहीत इव कामशारे? हन्यमानः सहसा भूतले निपपात ।
अथ तं तदवस्थमवलोकथ रथकारः तद्डःखइःखित आप्त-
पुरूषेर्तं सघुत्क्षिप्य स्वगृहमानायथत। तत्र च विविघैः शी-
तोफ्चारेः विाकित्सकोपादिष्ेः मन्त्रवादिमिरुपचर्यंमाण-
श्विंरात्कथश्चित्सचेतनो वभूव। ततो रथकारेण पृष्ट । “भो
मित्र | किमेवं त्वमकस्मात् विचेतनः सञज्ातः। तत्कथ्यता-
मात्मस्वरूपस् ?? । स आह,- बघस्य ! यदि एवं तच्छुण में
रहस्ये थेन सर्वामात्मवेदनांते बदाभि यदि त्वं मां सुहृदं
प्रन्यसे ततः काष्ठनदानेन प्रसादः क्रियतां, _क्षम्यतां यद्वा
किथित्मणयातिरेकादयुक्त तव मयाइछितम्”.॥ सोऽपि
तदाकण्य वाष्पपिहितनयनः खगङ्गद्सुवाच-' वयस्य ! यत्कि-
खिदइश्खकारणं तद्वद येन प्रतीकारः क्रियते यदि शक्यते
कलम् । उक्तश्च-
किसी स्थानमें एक कोळिक और बढई दो मित्र रहतेये, बह वाळकपनसे
सहचारी थे, परस्पर अत्यन्त खेहवाळे सदा एक स्थानमें रहते” समय विचरतेथे,
तब कमी उस स्थानमै किसी देवताके स्थानम यात्राका महोत्सव हुभा । वहां
तट नर्तक चारणसे युक्त. भनेक अनेक देशोंसे आये मनुष्यॉसे भावत वह दोनों
सहचर घूमते इए किसी राजकन्याको हथिनीपर चढी सम्पूर्ण गहने पहर अन्तः-
पुरके बृद्ध ब्राह्मण और नपुसकोंसे युक्त देवताके दर्शन- करनेके निमित्त आई
भाषाटीकासमेतम् । (८१)
डुईंको देखते भये, तब यह कोलिक उसको देखकर विषसे आदित इएकी समान
दुष्टम्रहसे गृहीत हुआसा कार्मवाणतल ताडितकी समान सहसा पथ्वीमे गिरा [
उसकी यह दशा देखकर रथकार उसके दुःखसे दुःखी हुआ, अपने मनुष्यो
उसको उठत्राय अपने घरमै छाया । वहा अनेक प्रकारके शीतल उपचार वेयोंके
किये हुए तथा मत्रादिस उपचारको प्राप्त हुआ वहुतकाळमे कुछ सचेत मया | तब
रथकारने पंछा-- मित्र | यह क्या हे जो तुम भकस्मात् भचेत्तन होगये अपनी
वात तो कहो १?! | वह वोला,- मित्र ! जो ऐसा हे तो मेरी गुप्त वाता सुनो, जित
कारण मैं सव अपना दुःख तुझसे कहताहू । जो तू मुझे अपना सुहृदय मानता
हे तो चिता रचकर मेरे उपर कृपा करों | औरक्षमा करना जो कुछ प्रणयके
कारण तुमसे अयुक्त कहा होवे”? | वहभी यह वचन सुन आखोमे आंसू भर गढूद-
कते बोछा-मित्र ! जो कुछ दु खका कारण हे, सो कहो जिससे यदि होसके-
गा तो उसका प्रतिक्कार किया जायगा | कहा है--
औषधारथेखुमन्नाणां बुद्धेधेव महात्मनास्। '
असाध्य नास्त लाक यथद्गाण्डस्य मध्यगम् ॥२ १९ ॥
इस ससार और त्रहाण्डके मध्यमे जो कुछभी हे वह भौषधी, अथ और सुमन्त्र
तथा महात्माओंकी घुद्धिके सामने कुछ असाध्य नहीं है॥ २१९ [|
तदषा चलुणा याद साध्य भावप्यात तदा अह साध-
यिष्यामे” । कालिक आह-वयस्य ! एतेषामन्येषा-
मपि सहख्ाणामुपायानामसाध्यं तत मे दुःखम् । तस्मा-
न्मम मरणे मा कालक्षेप कुछ” । रथकार आह-““मो
मित्र ! ,घद्याप असाध्य तथाप निवेद यनाहमाण तदसाध्यं
मच्वा त्वया सह बह्वा प्रावशाम । न क्षणमपि त्वाह्यांग
सहिष्ये । एष मे निश्चयः? । कोलिक आह-“'वयस्य !
या असो राजकन्या करेणुकारूटा तत्र उत्सवे दृष्टा तस्था
दु्शेनानस्तरं मकरध्वजेन ममेयमवस्था विहिता । तव न
शक्राम तड्दना साढ्म् । तथाचाक्तम्-
सो इन चारोंबे यदि साध्य होगा तो में साधन कडग” | कोडिक बोछा,-
६
(८२) पश्चतन्तरम् ।
hh कक
“त्र ! इन चारोंमे अघत्रा अन्य सहस्रो उगायाँसेमी मेरा दुःख असाष्य
है इस कारण मेरे मरणमें द्या समपञ्चा बिताना मतकरो”” । रथकार बोछा-
“पत्र ! यद्यपि असाध्य है, तथापि निवेदन तो कर जिससे मैंमी उसे असाध्य
मानकर तेरे सग भक्षं प्रवेश करूं क्षणम त्रको. भी तुम्हारा वियोग न सहूंगा
यह मेरा निश्चय है” । कौलिक बोछा-“मेत्र | जो यह कन्या हथिनीपर चढी
उस उत्सवर्मे देखीथी उप्तके दशेन करतेही कामके कारण मेरी यह दसा हुई
सो उसकी वेदना अब नहीं सही जाती । वेसा कह्दा भी हैं- हि
सच्चेभफुम्भपरिणाहिनि कुऊमाद्रे
तस्याः पयोधरयुगे रतखेदखिन्नः ।
दक्षो निधाय शुज पञ्जरमध्यवत्ती
स्वप्स्ये करा क्षणमवाप्य तदीयसंगस् ॥ २२० ॥
मत्त हाथियोके कुम्भकी समान परिणाइवाळे केशरसे गोळे उसके युगळ
स्तमको रतिके खेदसे खिन्न हुआ में सुजा भोके मध्यम कर हृदये रख क्षण
मात्रको उसके भगसंगको प्रात होकर कब सोउंगा ॥ २२० ॥
तथाचच-
तेसही- ,
रागी बिम्वाघरोऽतो स्तनकलशयुगं योवनारूंढठगर्ण
चीना. नामिः शक्त्या कुटिलकमलके स्वल्पकञ्चापि मध्यम् ।
कुर्वन्त्वेतानि नाम मसभामेह मश्विन्तितान्याशु खेदं
यन्म तस्याः कपोल। दहत इति झुहुः स्वच्छको सन्न यक्तम्?
ळाळवर्ण उसका कंदूरीकी समान भधर, कशी समान स्तन, गर्यैको
प्रात यौवन, गम्भीर नाभि, स्वभावसेही कुटिल बाळ, पतली कमर इतनी
वस्तु विचारतेही इठे मने खेद उत्तन कप्तीदी हैं और जो उसके स्वच्छ
विमछ 'कपोळको भें वारंवार चिन्तन करताहूं वह जो मुझे जळाते हैं यह-युक्त
नहीं हें॥ २२१ ॥''
स्थकारेछपि एवं सकःमं तट्टचनमाकण्यः सस्मितमिद-
-माइ-“'बयस्य! यदि एवं तर्हि दिष्टया सिद्ध नः भयोज-
भाषारीकासमेतम् । (टर)
"नम्। तदद्यैव तया सह समागमः क्रिपताम?!. इति । कोलिक
, आह- वयस्य ! यच कन्यान्तःपुरे वायु मुक्का न अन्यस्य
` ब्रदेशोऽस्ति तत्र रक्षापुरुषाधिष्टिते कथं मम तया सह समा-
गम; । तत् किं मां असत्यवचनेन विडम्बयसि ?? । रथकार-
` आह्-““मित्र ! पश्य में चुद्धिवलम्! । एवमभिधाय तत्क्ष-
णात् कीलसक्चारिणं दैनतेयं बाहुयुगलं वायुजबृक्षदारूणा शं-
खचक्रगदापञ्रान्वितं सकिरीटकोस्तुभं अघटयत् । ततः
तस्मिन् कोलिकं समारोप्य विष्णुचिह्नितं कृत्वा कीलसश्रर-
णविज्ञानश्च दर्शयित्वा ्रोवाच-' वपस्य | अनेन विष्णुरूपेण
गत्वा कन्यान्तःपुरे निशीथे तां राजकन्यामेकाकिनी सक्तभू-
मिकणासाद्मान्तगतां सुग्धस्वभावां त्वां ` वासुदेवं मन्यमानां
स्वकी यमिथ्पावक्रो क्तिभिः रखथित्वा वात्स्यायनोक्तविधिना
ज | कोलिकोऽपि तदाकर्ण्य तथारूपः तच गत्वा तामाह-
“शाजपुति ! सुता कि वा जागषिं? अहं तव कृते समुद्रात्
सादुरागो लक्ष्मी विहाय एव आगतः। तत् करियल मया
सह समागमः” इति । सापि गरुडारूढं चतुर्शुजं सायुधं
कोस्तुभोपतमवलोक्य सादिस्मया शयनाइत्थाय प्रीवाच--
“भगवन् ! अहं माहुषी कीटिकाऽशुचिः भगवान् तरैलोक्य-
पावनो वन्दनीयश्च | तत्कथमेतयुज्येत ?? । कोलिक आइ--
“'्लुभगे । सत्यमभिहितं भवत्या परं किन्तु राधा नाम मे
आर्य्या गोपकुलप्रसूता भथममासीत सा त्व॑ अत्र अव-
तीर्णा । तेन अहमच आयातः? । इति उक्ता सा भाह-
“भगवन् ! यदि एवं तत भे तात प्रार्थय सोऽपि अविकल्प
माँ तुभ्यं यच्छाति? । कोलिक आह-सुभगे ! न अहं
दर्शनपर्थ मानुषार्णा गच्छामि। कि पुनरालापकरणम्, त्वं
गान्धवेण विवादेन आत्मानं परयच्छ । नो चेत् शापं दत्त्वा
सान्चर्य ते पितर भस्मसात् करिव्यामि”इति । एवमभिधाय
गरुडादवतीय्ये सब्पे पाणो गृहीत्वा, तां सभयां सल
(८४) पश्चतन्त्रम् ।
ज्जां वेपमानां शय्यायामनयत् । ततश्च रात्रिशेषं यावत्र
वात्स्पायनोक्तविधिना निषेव्य प्रत्यूषे स्वगहमलक्षितो
जगाम । एर्व तस्य तां नित्यं सेवमानस्य कालोयाति। अथ
कदाचित् केचुंकिनः तस्या अधरोष्ठप्रवालखण्डनं दृष्टा
मिथः प्रोङुः- अहो ! पश्यत अस्या राजकन्यायाः पुरुषो-
पसुक्ताया इच शरीरावयवाः विभाव्यन्ते । तत् कथमयं सुरः
क्षितेऽपि अस्मिन् गृहे एवंविधो व्यवहारः। तत् राज्ञे निवेद-
यामः? । एबं निश्चित्य सर्वे समेत्य राजानं प्रोचुः- देव!
वर्थ न विद्यः । परं सुरक्षितेऽपि कन्यान्तःपुरे काश्चित् प्रवि
-शति । तद्देवः रमाणम्? इति । तच्छत्वा राजा अतीव
व्याकालेताचत्ता व्घाचन्तयत् ।
रथकारभी इसप्रकार सकाम उसके वचनको सुनकर हसता भया ।, “मित्र !
यदि ऐसा हे तो माम्यसे हमारा मतोसथ सिद्ध हुआ । सो आजही उसके साथ
समागम करो” | कोलिक बोछा-“मित्र ! जिस कन्याके भन्तःपुरम वायुको
छोड अन्य वस्तुका प्रवेश नहीं है, वहां राजाके पुरुसे युक्त स्थानम मेण उसके साय
केसा समागम होगा । सो वर्यों मुझे असत्यवचनसे बंचित करताहे,”?। रथकार
_बोछा पित्र | मेरी बुद्धि और वर्का देखो” ऐसा कह उसीसमय कोल घुमा-
, नेसे चलनेवाले गरुड जो वायुज वृक्षके काएकी दो भुजा शंख, चक्र, गदा,
पद्म, किरीट भीर कोस्तुमकोमी बनाताहुआ उसपर उस कौलिकको 'चढाकर
केगुचिल्दसे चिन्हितकर कोळ प्रवेशके विज्ञानकोमी दिखाकर बोढा-“मिन्र |
इस (वेण्णुर्पसे जाकर कन्थाके अन्तःपुरमे अर्धरात्रिके समय उस राजकन्याको
जो इकछी. सतमहले मन्दिरं प्राप्त हुई सुग्धस्वभावसे तुझे वासुदेव माननेवार्ली
उसको अपनी कुटिळ उत्तिसे प्रसनकर वात्स्याथत मुनिके कहे कामशाक्षके
विवानसे भोगो” । कौठिकभी यह बचन सुन उस रूपत वहां जाकर उससे
बोला-“राजपुन्नि | सोतीहो या जागती ? में तुम्हारे निमित्त समुद्रसे अनुराग
करनेवाळी छक्ष्मीको त्याग करके आयाडूं । सो मेरे साथ समागम करो” ||
चहमी गरुडपर चढे चार भुजा भायुध लिये कौस्तुभसे युक्त देखकर विस्पयप्रू-
बैक शयनसे उठकर बोढी- मन् | में मानुषी कीटजाति अपवित्नहूं । आफ
भाषाटीकासमेतम्। (८५)
निठोकोके नमस्कार करने योग्य पवित्र करनेवाळ हैं, सो यह केसे होसकता ह!!!
झोडिक बोछा-“घुमों । तुमने सत्य कहा, परन्तु राधा नामक मेरी भार्यो जो
प्रथम गोपकुछमें उत्पन्न हुइंथी, वही तू यहा अवतीण हुई ह । इसीकारण में
यहां आयाहू”” ऐसा कहनेपर वह बोडी,-“भगवन् ! यदि ऐसाहे तो मुझे मेरे
पितासे मांगो वह भी तत्काळ तुमको प्रदान करेंगे” | क्ोडिक बोळा-“सुभगे |
मैं मनुष्योके दशनपथको प्राप्त नहीं होताहू फिर बात करनी तो कैसा! तू गन्धबै-
विवाहसे अपने आपको मुझे प्रदावकर, नही तो शापदेकर कुछसहित तेरे पिताको
ससम करटूगा?? यह कह गरुडसे उत्तर सीधे हाथसे उसे प्रहणकर उस मय
छळास कापत हुइकी शब्यापर ळे जाया शेषरात्रिमँ वात्त्यायन विधिके अनुसार
उसका सेवनकर बहुत प्रभातमे मळक्षितही अपने स्थानको गया। इसप्रकार नित्य
इसका मागत, समय बीतता भया । तब कभी कचुकी उसके अधरोष्ठ रक्त और
' खडित देखकर परस्पर कहने ढगे-''अहो । देखो तो इस राजकन्याके पुरुषसे
( भाग हुए शपरक जगप्रत्यग दोखते हँ । सो केसे यह-सुरक्षित इस घरमे इस
अकारका च्याहारहे, सां हम राजासे निवेदन कर!” | ऐसा निश्चयकर सब मिलकर
। राजासे चोले- “देव हम नहीं जानते परन्तु सुरक्षितमो कन्याके अन्तःपुरे काई
प्रदेश करता है, सा इसमें आपहा प्रमाण हे” यह सुन राजा महाच्याकूळ हो
विचारते छगा.~
पुत्रात जाता महतीह चिन्ता
कर्म देयेति महान्वितकः।
दर्वा सुखं प्राप्स्यति वा न वेति
कन्यापितृत्वं खलु नाम कष्टम् ॥ २२२॥
hn
शस सतारम कन्या होना यह बडी चिन्ता है, कारण यह किसका द यह
०० _“
महान् तक हे, भार भी दवस सुव पावगों था नहीं यहद भा नहा जानाजाता
भपोछिय कन्या पिताके निमित्त एक कष्टहीहै | २२२ ||
नश्च नाय्यश्च सहकप्रभावा-
स्तुल्यान कूलानि कुळाने तासाम् ।
तायश्च दोषश्च निपातयन्ति
नद्यो हे कूलानि कुलानि नार्यः ॥ २२३॥
(८६) , पञ्चतन्त्रम् ।
hea क
नदा आर वार्याका समान प्रभाव हाताइ, उनक दाना किनार आर कम्याके
मातू पत् कुछ समान ह; नदा जळस आर नारा दाषसं अपन कुलका नष्ट
करती हैं ॥ २२३ ॥ हु
तथाच |
अ(र दखा[--
जपनीमनो हरति जातवती परिवद्धेते सह शुचा सुहदाम 7
परसात्कतापि कुदते मलिनं दुरातिकऋना इहितरो विपदः ॥*
कन्या उत्पन्न होतेही माताका मन हरती है, सुदृदजनोंके शोचके सहित
बढ़ती कि पराय आधान करनंपर सा. मळान करता ह, कन्यारूपा ।वपतू त्रा
नहीं जाती ॥ २२४ ॥”
एवं बहुविध विचिन्य देवी रहःस्थां भोवाच-' देवि! ज्ञायता
किमेते कञ्चुकिनो वदन्ति । तस्प कृतान्तः कुपितो येन
एतदेवं क्रिपते?? । देवी अपि तदाकण्यं व्याकुलीभूता सत्वरं
कन्यान्तःपट गत्वा तां खण्डिताधरां नखविलिाखितशरीरा-
वबयवां इुहितरमपश्यत्। आह च-*“आः पापे ! कुलकलड़का-
रिणि ! किमेवं शीलखण्डनं कृतम् । कोऽयं कृतान्तावलो-
कितः त्वस्तकाशमभ्येति । तत्कथ्यतां ममाग्रे सत्यम!' इति
कोपाटोपविशङ्कटं वत्यां मातरि राजपुत्री भयलञज्ञानतानन
पोवाच-“अम्ब ! साक्षान्नारायणः प्रत्यहं गरुडारूढो निशि
समायाति! चेदसत्यं मम वाक्यम् । तत् स्त्रचक्चुषा विलो
कथयतु निगूडतरा निशीथे भगवन्तं रमाकान्तम तत् शुत्वा सा
अपि भहसितवइना पुलकाड्कितसर्वाङ्गी सत्वरं गत्वा राजाः
नमूचे-“'देव ! दिष्टया वद्धेसे । नित्यमेव निशीथे भगवान्
नारायणः कन्यकापारश्वेऽभ्योति तेन गान्धर्वविवाहेन सा विः
वाहिता । तदद्य त्वया मथा च रात्रो वातायनगताभ्यां
निशीथे द्रष्टव्यो, यतोन स मानुषे; सह आलापं करोति”? ।
तच्छत्वा इर्षितस्थ राज्ञस्तदिनं वर्षशतप्रायमिव कथञ्चिव
जमाम। ततस्ठ रात्रो निभृतो भूत्वा राज्ञीसहितो राजा
र
भाषादीकासमेतम् । (८७)
वातायनस्थो -गगनासक्तदष्टिः यावत्तिष्ठति तावत्तस्मिन
समये गरुडारूढं तं शखचक्रगदापग्महरत यथोक्तचिद्वाङ्कितं
व्योस्रोऽवतरन्तं नारायणमपश्यत् । ततः झछुधाप्रह्नावितमिव
आत्मानं मन्यमानः ताङुवाच-* भिये ! नास्ति अन्यो घन्य-
तरो लोके मत्तस्त्वत्तश्च, य्रसूति नारायणो भजते! तत्सिद्धाः
सदेऽस्माकं मनोरथाः। अधुना जामातृप्रभावेण सकलामापि
वसुमती वश्यां करिष्यामि'। एव निश्चित्य सर्वैः सीमाधिपेः,
सह मर्य्यादाव्यतिक्रममकरोत् | ते च त मय्यदाव्यतिक्रमेण
वत्तंमानमालोक्य सर्वे समेत्य तेन सह पिग्रई चक्क; । अत्रा
न्तरे स राजा देवीसुखन तां इहितरङ॒वाच-“ पात्रे ! त्वसि
दुहितरि वर्तमानायां नारायणे भगवति जावातरि स्थिते तत्
किमेवं युज्यते यत् सर्वे पार्थिवः मया सह विग्रह कुर्वन्ति तत
सम्भोष्योऽद्य त्वया निजभर्ता यथा मम शचून् वयापाद् याति’?
ततः तया स कोलिको रात्री सविनयममिदितः-' भगवन् !
त्वायि जामातरि स्थिते मम तातो यच्छड्ठामिः परिभूयते तन्न
युक्तम् । तत्मत्ताद कृत्वा सवान् तान् शान्नून् व्यापाद्य '? )
कोलिक आई- 'सु+गे! कियन्मात्रास्तु एते तव पितुः शत्रवः.
तद्विश्वस्ता भव क्षणेनापि सुदर्शनचक्केग सर्वान् तिलशः
खण्डायिप्या।मे?। अथ गच्छता कालेन सवदेरां शन्नमिः
उद्ठास्य स राजा माकारशेषः कुतः, तथापि वासुदेवरूपधरं
कालिकमजानन् राजा नित्यमेव विशेषतः कर्पूरागुरुकस्त
रिकादिपरिमलविशेषान् नानाधकारवल्लपुष्पभक्ष्येपेयांश्च प्रे-
षयन् ढाहतृमुखन तमूचे-' भगवन् ! प्रभाते नूनं स्थानः
सङ्गो भविष्यति, यतो यवसेन्धनक्षयः सञ्जातः नथा सवोडपिं
जनः श्रहारजजारेतदेहः संऱत्तो योद्धमक्षमः, प्रचुरो मृतश्व।
तद्व जात्या अत्र काले यदुचित भवति तद्विषयम्” इति ।
तच्छत्वा कालकाऽपि अचिन्तयत् । “यत् स्थानभङ्गे जाते मम
अनया सह वियोगो भाविष्यति । तस्मात् गरुडमारुह्य
(८८) पञ्चतन्त्म् ।
सायुधमात्मानमाकाश दरायाम | कदााचत् मा वासुदव
मन्यमानास्ते साशंका राज्ञो योद्ानिः हन्यन्ते । उक्तश-
इस प्रकार बहुत विचार कर एकान्तर्प रानासे कहा-"दोबि ! जानो
तो जो यह कंचुकी कहते हैं। उसपर कालने क्रोध किया हे जो ऐसा करताहे”
दे्वामी यह वचन सुनकर व्याकुलहों शोध कन्याके अन्तःपुरमे जाय खांडेत
अधर नंखोसे चिन्हित दारीरके अवयवधाली अपनी कन्याको देखती हुईं बोली--
“ हृ पावे | कुछकछंककारणी ! यह क्या चारत्र दूषण किया, कोन यह
काळका देखा हुआ तेरे समीप आताहै | सो मेरे आगे सत्य कह” । इस प्रकार _
ऋषके वेगसे निष्ठुर कहती इई अपनी मातासे राजपुत्री भय छजासे शिर झुकावे .
बोली-''माता ! साक्षात् नारायण प्रतिदिन गरुडपर चढ रात्रिमें आतेहे ॥ यदि
मेरा वाक्य असत्य मानो तो अपनी नेत्रासे गूढतर अघरात्रम रमाकान्त भगवान्को
देखी” | यह वचन सुन वह भी प्रहसितवदन हांकर सब अगसे पुळिकेत शरार
हो शीघ्र जाकर राजासे बोली-“देव ! भाग्यसेहों बढतहा । नित्यहा अघरात्रिमे
भगवान् नारायण कन्याके निकट आतेहँ । भोर उन्होने गान्ववेविवाहत उसस
विवाह किया । सो आज इम भोर तुम रात्रिम झरोखोंमें नेठकर भधेरात्रमे देखे
कारण कि, मनुष्योंके साथ वह वातां नहीं करते! । यह सुन प्रसन्नहुए राजाका
वह दिव सौ वर्षकी समान बीता । फिर रात्रिमें एकान्तम प्राप्हाकर शनाक
सहित राजा झरखमें बेठकर आकाशमें दृष्टि ङगापे जबतक चेढा कि, उसा
संमय गरुडपर चढे, शंख, चक्र, गदा, पद्म हाथम लिये, यांक ।पन्हात
युक्त, आकाशसे उतरते हुए, नारायणको देखा | तव भगत धरस छुवितका
समान अपने आपको मानताहुआ उससे बोछा“-प्रिय ! हमसे भाषिक कई धन्य
नहीं जिसकी कन्याको नारायण भजतेहें । सो हमारे सब मनोरथ सफळ हुर।
अब जामाताके प्रमावसे सब प्रृथ्वीकों अपन वरा करूंगा” यह विचार सबद
सीमाधिपतियोंके सांघ मयोदाका अतिक्रम करता मया वे उसकी मयादा भात
क्रमस वतते देखकर सब मिलकर उसके साथ विग्रह करतेहुए, इसा समध राजा
दवाक मुंखसे अपनी कन्याको कहछाताहुआ-- पुत्रि ! तुमसी कन्या हानेपरमा
और मगव'नू नारायणले जामाताहोनेमें मी यह क्यों उचितह कि, सब राजा मेरे
साथ बिप्रहर्को । सो आज यह अपने स्त्रामीसे कहना कि, वह मरें शुक
भाषादीकासमेतम् । (८९)
मारे? | तब उसने उस कोळिकको विनयप्रूपेक रात्रिमें कहा-“मगवन् ! आपसे
जामाता स्थित होनेमें मेरे पिता बन्रुओंसि तिरस्कृत होतेहे, सो युक्त नहीहे, सो
'छुपाकर उनको मारो” | कौलिक बोळा-“सुभगे ! तुम्हारे पिताके वे शु क्या
पदार्थ हैं, सो विश्वास रख क्षणमात्रमें उन सबको सुदर्शनचक्रते तिळवत् खण्ड
खण्ड कर दूगा” । तब कुछ समय बीतनेपर सबदेश शत्रुओोंने तष्टकर वह राजा
परकोट मात्र अवशिष्ट किया ( परकोटमात्र बचा ) तौभी वासुदेवरूपधारी
कौठिकको न जानकर वह राजा नित्यही विशेष कपूर अगर कस्तूरी आदे
सुगन्धित द्रव्योंते नानाप्रकार बल्न पुष्प भक्ष्य पेय आदि पदार्थ भेजकर कन्याके
सुखसे कहछातामया-“भावसे ! कल प्रभात काल अवश्यही स्थान भग होगा,
कारण कि, भव घास इन्धन आदिकामी क्षय इआहे भोर सम्पूर्ण जन प्रहारसे
जजारेत दह हुए युद्ध करनेको भसमहें और बहुत मरगये सो यह जानकर इस
समय जो उचितहो सोकरो” । यह सुन कौढिकमी विचार करने लगा कि
“स्वानभग होनेते अवश्य इसका मेरे साथ विषोंग होगा, इसकारण गरुडपर चढ
भायुधसहित भपनेका भाकाइमे दिखाऊ, काचित् मुझे वासुदेव जानकर वे
डरे हुए राजाके योधाओंसे मारे जाय । कहा भी हे.
निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फणा ।
विषं भवतु मा भूयात्फटाटोपो भयंकरः ॥ २२५ ॥
निर्वप सर्पकोमी महाफणा नौ चाहिये विष हो या नही फणाटोप भय~
कर है ॥ २२५ ॥
अथ यादि मम स्थानार्थसुद्यतस्य मृत्युः अविष्यति तदपि
सुन्दरतरम् । उक्तत्व-
सो यदि मेरी इस स्थानके लिये मृत्यु हो तोमी अच्छाहे । कहाहै-
गवामथ ब्राक्मणाथ स्वाम्यथ स्त्राकते$थवा ।
स्थानाथ यस्त्यजेत्राणास्तस्थ लोकाः सनातनाः ॥२२६ ॥
Nm
गए जाह्मण, स्वामी, ख आर स्थानके निमित्त जो प्राणका स्यागन करते
उनके लिये सचातन छांकह ॥ २९६ ॥
द्रे मण्डलसंस्थे विगहाते राहुणा दिनाधीशः
शरणागतेन साद विपदाप तेजस्विनां छाप्या ॥ २२७”
(९०) पश्चतन्नम्।
( सूर्यके अमावश्याको ) चन्द्र मण्डच्में स्थित होते यदि राइ सूर्य
को ग्रहण करतादे तो यह झरणागतके सँग वित्ति तेमस्यीयोंको इछाघदी-
यह | २१७ ॥”
, एवं निश्चित्य भत्यूषे दन्तधावनं कृत्वा तां प्रोवाच-सु-
भगे ! समस्तः शवुमिहतारन्ने पानं च आस्वादयिष्पामि ।
कि बहुना त्वयापि सह सङ्गमं ततः करिष्यामि । परं
वाच्यस्त्वया आत्मपिता यत् मभाले प्रभूतेन सेन्येन सह
नगरात निष्क्रम्घ योद्धव्यम्, अहं च आकाशस्थित एव
सर्वान् तान निस्तेज कारिष्यामि पश्चाव्छुखन भवता
हन्तव्याः | यदि पुनरहं तान् स्वयमेव सूदयामि तत्तेषां
पापात्मनां वैकुण्ठीया गतिः स्यात् । तश्मात्ते तथा कसेन्या
यथा पलायन्तो हन्यमानाः स्वर्ग न गच्छन्ति’? । सापि
तदाकर्ण्य पितुः समीप गत्वा सर्व वृत्तान्त न्यवेदयत्।
राजापि तस्या वाक्यं श्रद्दधानः प्रत्यूषे संसुत्थाय सुप्तन्नद्ध
सेन्यो युद्धाथ निश्चक्राम । कोलिकोऽपि मरणे कृतनिश्चयः
श्रापपाणि गनगातगरुडारूठो युद्धाय अस्थितः । अत्रान्तरे
भगवता नारायणन अतीतानागतवर्ततमानवेदिना स्मृतमात्रो
वैनतेयः सम्प्राप्तो विहस्य प्रोक्तः-' भो गरुत्मन् ! जानासि
तवं यन्मम रूपेण कोलिको दारुमयगरुडे समारूटो राज-
कन्यां कामयते? । सोऽब्रवीत्-देव! सर्च ज्ञायते तञ्चेष्टितम्।
तत् फि कुर्मः साम्म्रतम'' श्रीमगवानाह-“'अद्य कोलिको
मरणे कृतनिश्चयो 'विहितनियमो युद्धार्थे बिनिगतः । स
नूनं प्रधानक्षत्रियशराहतो निधनमेष्याति । तस्मिन् हते सर्वो
जनो वदिष्यति यत्मभूतक्षत्रियेमिलित्या वासुदेवो गरुडश्च
' निपातितः। ततः परं लोको$्यमावयोः पूजां न करिष्यति ।
ततस्त्वं दुततरं तत्र दारुमयगरुडे संक्रमणं कुरू । अहमपि
कोलिकशारीरे मवेशं करिष्यामि । येन स शचून व्यापाद्-
याति । ततश्च शच्ुवधात् आवयोम!हात्म्यबृद्धिः स्यात” ।
भाषाटी कासमेत्तम् । (९१)
अथ गरुडे तथेति प्रतिपन्ने श्रीमगवाव् नारायणस्तच्छरीरे
संक्रमणमकरोत् । ततो भगवन्माहात्म्येन गगनस्थः सः.
कोलिकः शंख चक्रगदाचापचिद्वितः क्षणादव लीलयेव सम-
स्तानपि प्रधानक्षनियान् निस्तेजसश्चकार । ततस्तेन राज्ञा
स्वलेन्यपरिव्ृतेन संग्रामे जिता निहताश्च ते सर्वेऽपि शत्रवः!
जातश्च लोकमध्ये प्रवादो यथा-' अनेन बिष्णुजा मादुप्रभावेण
सर्वे शत्रवो निहताः” इति ! कोलिको अ्रप तान् हतान् दृष्ठा
प्रसुदितमना गगनादवतीर्णः सन् यावद्राजामात्पपोर-
लोकास्त नगरवास्तव्यं कोलिकं पशयन्ति ततः एष्ट! किमे-
तदिति। ततः सोऽपि मूलादारभ्य सर्वै माग्बृ तान्तं न्यवेदयत
ततश्च कोलिकसाइसाइरञितमनसा शत्रुबधात् अवात्तते-
जपा राज्ञा सा राजकन्या सकलजनप्रत्यक्ष जिवाहविधिना
तस्मे समरिता देशश्च प्रदत्त । कौलिकोऽपि तया. सार्दै
पञ्चप्रकार जीवलोकसारं विषयसुखमतुभवन् कालं निनाय ।.
अतस्तूच्यते- सुप्रयुक्तस्य दम्मभस्य”-इत्ति ।
यह निश्चयकर प्रत.काळ दतोन कर उससे बाछा-'' सुभगे ! भाज सम्पूर्ण शत्रु-
ओको मारकर में भन्नपान सेबन करूगा। बहुत कहनेसे कल तेरे साथ भी समागम
तभा हांगा, परतु तू अपन पितासे कह् ।क, प्रात'काल्हा बहुत सनाक साथ
चगरस [नेकछकर युद्ध कर | और मंजादाशम स्थत हुआहा उव सत्रका नस्तज
करदूगा, फिर तुम पुखसे उनको मागडालना और यदि में स्वयं ही उनको
मारूगा तो वे पापी बैकुण्ठक्ों जाथगें, इस कारण ऐसा करना चाहिये कि,
भागते मारे हुए वे स्वर्गको न जाय” | चहमी यह सुन पिताके समीप जाय सब
वृत्तान्त कहती हुई | राजाभी उसळे वाकयमें श्रद्धा कर प्रातःकाळ उठ सेना
तयार कर युद्धके लिये निकळा, कौढिकमी मरणमें विश्चघकर धनुष छे
आकाइमें गरुडपर बढ युद्धको निकला | इसी अपसरमै भगवान् नारायण
भूतभविष्यवर्तेदान गति जाननेवाले स्मरण करतेही _ प्राप्त गरुडकों
कहने लगे कि-“हे गरुड ! क्या तुम जानतेहो ? कि, हमारे रूपसे' कोड़िक
काठके गरुडपर चढा राजकन्यासे रमताहे'' वह बोळा-“देव ] सब उसकी
(९२) पव्वंतन्नम् ।
चेष्टा विदित है । सो जब क्या करें?” | भगवान् बोळे-““आज कौलिक मरणमे
निश्चयकर नियमकर युद्धके निमित्तं निकळा है वह अवश्यही प्रधान क्षत्रियोंके
बाण ळगनेसे मरजायगा । उसके मरनेमें सब मनुष्य कहेंगे प्रधान क्षत्रियोंने
-मिळकर वासुदेव भौर गरुडको मारडाला तब यह लोक हमारी पंजा न करेगे
सो तू बहुत शीघ्र काठके गरुडमें प्रवेशकर मेंमी” कोलिकके शरीरंमें प्रवेश
करूंगा, जिससे वह शत्रुको मारेगा तब शत्रुवघसे हमारा तुम्हारा माहात्म्य
“बढ़ेगा” | “बहुत अच्छा? यह गरुडकं कहनेपर श्रीभगवान् नारायण उसके
शरी प्रवेश करगये। तब भगवानूके माहात्म्यसे आकाशर्मे स्थित इभा वह
झंख, चक्र, गदा, चापके चिन्हसे क्षणमै छीछासेही उन सम्पूण क्षत्रियोंकी तेज
रहित करताइआ । तब उस राजाने अपनी सेनासे युक्त संग्राममे वे संब शत्रु
जीतकर मारदिये । और सब छोकमें यह चचो फेळी'कि, इस राजाने जामाता
गविष्णुके प्रभाषसे सब शत्रु नष्ट करदिय' । कोलिकभी उनको मृतक देख ज्योहा '
आकाइासे' उतरा कि, तबतक राजाके. अमात्य और -नगरनिवासी लोग उसकी
किक देखते हुए पूछने लगे यह क्या हे £ तन वह जादिसे अपना सब वृत्तान्त
कहता भया । तब कोळिकके सांहससे प्रसन्न मनहो शत्रुवधपे तेजको प्राप्त हुए
राजाने वह राजकन्या सब जनोंके समक्ष विवाहविधिसे उसको समर्पण करदी
र देशमी दिया । कौरिकमी उसके साथ पंचेन्द्रियके भोग्य जीवळोकक्र सार
विषय सुखको अनुभव करता समय बिताता हुआ । इसी कारण कहा हे कि,
मळी प्रकार प्रयोग किया दम्भ” इत्यादि | »
तच्छत्वा करटक आह-भद्र । अस्ति एवम, परं तथापि
सहन्मे भयम् । यतो बुद्धिमान् सश्ीवकः रोद्रश्च सिहः
यद्यपि ते बुद्धिमागल्भ्यं तथापि त्वं पिंगलकात् तं वियोज-
शितुमसमथ एव” । दमनक आह-'““्रातः ! असमथोंऽपि'
सम शव।उक्तश्च- ,
यह सुन करटक बोठा--“ भद्र | यह तो ऐसेही हे तोमी मुझको महाभय हे.
कोरणनके,/से जीवक बुद्धिमान् और सिंह भयंकर हे | यद्यपि तेरी बुद्धि तीव्र हे.
होमी तू पिर्गलकसे,उसे वियुक्त करनेको असमर्थ हे? ॥ दमनक बोला-- "रातः
भसमथमी समथहूं । कहा हे ˆ
भाषारीकासमेतम्। (९३)
4
उपायेन हि यत्कुयातन्न शक्यं पराक्रम; ।
काक्या कनकसूत्रेण कृष्णसर्पो निपातितः ॥ २२८ ॥”
उपायसे जा हांसर्कता है बह पराकमर्स नहा ) काकीने सुचणसुन्रत्त कृष्णस"
एको मारा ॥ २२८ ॥? ॥
करटक आह-*“कथमेतव् १” । सोऽ्रवीत-
करटक वोळा--“यह कैसा {” बह वोला-
कथा ६.
अस्ति कसिमश्वित्मदेशे महान न्यग्रोधपादपः । तत्र वाथ-
सक्म्पती प्रतिवसतः स्म । अथ तयोः ्रसवकाले वृक्षविव-
रात् निष्कम्य कृष्णस५* सदव तर्दपत्यान भक्षयात्त ।
ततस्तौ निर्वेदात अन्यवुक्षमूलनिवासिनं मियसुहद शगालें
गत्वा ऊचतु।-भिद्र ! किमेवोविधि सञ्जाते आवयोः
कत्तव्य भवति । एवं तावत इष्टात्मा कृष्णसपी इक्षविदरात्
निर्मत्य आवयोबोलकाम् भक्षयति । तत कथ्यतां तद्रक्षार्थं
कश्चिडुषायः।
किसी स्यानमें एक बडा वटका इक्ष है वहाँ एक कौभा और काकी रहते
थे । उसके प्रसत्र समयमे बृक्षकी खखोडळसे निकलकर काळा सर्प सदा उनके
सतानको खाजाता | तव वे परम दुःखसे दूरे इक्षकी मूलमे रहनेवाळे प्रिय सुहृद
आगालके निकट जाकर बोळे--“इसप्रकारके त्यो हमको क्या करवा चाहिये,
इसप्रकारसे वह दुष्टामा कृष्णसर्प वक्षकी खखोडलसे निकल कर हमारे बाळक
खाजाता है, सो इसकी रक्षाका कोई उपाय कहो ।
थव्य क्षेत्र नदीतीरे भार्य्या च परसंगता ।
ससपें च गृहे वासः कर्थ स्वात्तस्थ निर्वतिः ॥ २२९॥
जिसका खेत नदीके किनारे है, भार्या परपुरुषगामिनी हे, और सर्वयुक्त '
जिसका निवास है, तिसको सुख केसा अर्थात् सुख नहीं है ॥ ९२९ ॥
अच्यञ्चत
भोरभी-
(९४) पञ्चतन्त्रम्।
सर्पयुक्ते गहे वासो मृत्युरेव न संशयः
यट्गामान्ते वतत्स५स्तस्य र्यात्माणसंशयः ॥ २३० ॥
कहाई के, सपयुक्त चभ उनवाउ हाच तो सत्युम काई संदह नहीं
पजिस ग्रामको समाम सपे रहता हे उसका वद प्राण सशव होता हे १ इसमे
सन्देह, नहीं ॥ २३० ॥
अस्माकमपि तत्र त्थितानाँ प्रतिदिन प्राणसंशय; । ??
स आहु~* न अत्र विषय स्वल्पोऽपि विषादः कार्य्यः ।
जनं स छुब्धो न उपायमन्तरेण बध्यः स्यात् ।
सो वहां रहनेते हमको भी प्रतिदिन प्राणनदेह रहता हे” बह बोछा-इसमें
कुछमी दुःख मतकरो वह लुब्धक उपायके विना न मरेगा |
५डपायेन जयो याहग रिपोस्ताग् न हातेनिः
उपायज्ञोऽहपकायोपि न झूरैः परिभूयते ॥ २३१॥
जिस प्रकार शत्रु उपायत दमन हाता ह इस प्रकार हाथयारास चहा, उपा
यक्षा जानवबाहा छाट शााराळासा शपते तिरस्कत नहा हाता ॥ ९९१ ॥
तथाच-
अरर दखा- हु
२.भक्षायित्वा बहून्मत्स्पाचुत्तमाधममध्यमान् ।
अतिलोल्याद्वरः कश्चिन्मृतः ककेटकप्रहात् ॥ २३२ ॥
उत्तम मध्यम् अनेक मस्स्योको खाकर अति चपळता करनेंस कोई
-बक केकडेसे पकडे जानेके कारण मृतकहुआ। “
ताङ्चतुः- “कयमेतत् ? ?? सो5ब्रवीत--
बे दोनो बाछे,- यह केसी कथा हे ” १ बह ( श्रगाळ ) कहने छगा-
/ कथा ७.
“अस्ति कस्मिश्चित् बनप्रदेशे नानाजलचरसनाथं महत् सरः।
"तत्र च कृताश्रयो बक एको उद्धभावमुपागतो मत्स्यान् व्या-
पादयिठमसमर्थ; । ततश्च क्षुत्ह्षामकण्ठः सरस्तीरे उपविष्टो
सक्ताफलप्रकरसदशः अश्वप्रवाहघरातलमाभाषश्वव ररोद ।
एकः कुलीरक। - नानाजलचरसमेतः समत्य तस्य इभखन
आषाटीकासमेतम्। (९५६)
दुःखित; सादरमिईमूचे,-“माम! किमद्य त्वया न आहार-
वृत्ति; अनुष्ठीयते १। केवलमश्नपूर्णनत्राभ्यां सनिःश्वासेन
स्थीयते'! । स आह-“वत्स ! सत्यसुपळक्षितं भवता; मया
हि मत्स्यादनं अति परमवेराग्यतया साम्प्रतं प्रायोपवेशनं
कृतं, तेनाहं समीपगतानपि मत्स्यान् न भक्षयामि” । कुली-
शकः तच्छत्वा प्राह- माम ! कि तद्रेराग्यकारणस् ??। स
आह, “वत्स | अहम् अस्मिन् सरासे जातो शद्ध गतश्च ।
तत् सया एतत् शुत यत् द्वादरावााषका अनाडी ट सम्पद्यत
लग्ना” । कुलीरक आइ) कस्मात् तच्छुतम् १” बक आह-
“देवज्ञमुखात । यतः शनेश्चरो हि रोहिणीशकटं भित्वा
भाम शुक्रश्च ्रयास्यात ।
किसी बनभ अनेक जल्चऐसे युक्त एक सरोवर है । षहापर रहनेषाळा
एक काळा बृद्ध भात्रकों प्राप्त इभ मछलियोंके खनेको असमर्थ था, वहां
मूंखते झुष्ककंठ नदो ॥ किनारे वेळा मोतियोके समूहकी समान भासुओंके प्रवा-
हते पृथ्वीको मिजोता हुआ रोताथा । एक केंकडा अनेक जळचरोंके साथ उसके
दु.खसे दु खी इभा भादएसे यह बोठा,- मामा ! भाज तुम अपने भाहारमी
वाति क्यो नहीं करते होःकेवल अश्रु वेत्रोको किये स्मत ढेरहे हो” बह बोळा,
“द््म|आपने सत्य देखा,मेंने अब मछलियोके खानेम परम पैराम्यता होनेसे मरने
का त्रत लिया है,इस समय? समीपमे गई हुई मछडियोक्ो भी नहीं खाताहू?कुछी-
रक यह सुनकर बोळा,-“म.मा ! तुम्हारे वेराग्यका कारण क्या है १? बह गोला,-
में इस सरोबरमें उत्तन इआ और यहीं बृद्धिको प्रात इआाह।सो मेने यह सुना है
वारह बर्षकी अनावृष्टि होगी”? । कुछीरक बोछा- “किससे सुना ?” उस वकने
कहा--“ज्योतषीके मुखसे सुता है कारण क्रि, शनैश्वर रोहिणीको भेद्करे मगळ
झुक्रके निकट प्राप्त हांगा ।
उक्तश्च वरादहाताह्रण--
जैसा कि, चराहमिहिरने कहा हैं- ः
यदि भिन्ते सूय्यैपुत्रो रो दिण्याः शकटमिह लोके । ”
द्वादशवषाणि तदा न हि वर्षति वासवो भूमी ॥ २३३ भ
२९% ) पञ्चतन्त्रम् !
जो सूर्यपुत्र ( शनि ) इस ठोकर्मे रोहिणी शकटको भेदन करे तो बारह
` बर्षेतक इन्द्र पृथ्वीमें वषी नहीं करता है॥२३३१॥
तथाच-
आर माळ
भाजापत्थे शकटे भिन्ने कृत्वेव पातकं वखुधा ।
भस्मास्थिशकलकीर्णा कापालिकामिव व्रतं धते ॥ २२०॥
राइणाका शकट शाचस भादत हानस एथ्वाम पातक हाताह । तथा पृश्बो
अस्म ऑस्कर खण्डस व्या हकर कापाळक ततका धारण करता ह॥२३४|॥
तथाच- “ |
आर दुखा--
- ˆ रोहिणीशकटमरकनन्दनश्चोद्गिनात्ति रूधिरोऽथवाशशी ।
कि वदामि तदनिष्टसागरे सवेलाकसुपथाति संक्षयः २३५
जो रोहिणीके शकटको शनि मंगळ अथवा चन्द्रमा भेदनकरे तो इस
अनिष्ट सागरका म॑ क्या कडू संबहा काक क्षय हाजा ॥ २३५॥
रोहिर्णशकटमध्यसंस्थिते चन्द्रमस्यशरणीकृताः, जनाः
क्वापि याति शिशुपाचिताशनाः सूर्य्यतप्तामेदुराम्दुपायिनः।
चन्द्रमाक॑ राहणा शकटम ।स्थत हाचत शरण राहत, हाक मनुष्य बालक-
मारकर खानवाल तर्था सूर्यक तापस भदको माघ इए जलक पानवाळ
कहां जांब ॥ २३६ ॥
तदेतत्सरः स्वल्पतोय वर्तेते । शीघ्रं शोषं यास्यति अ-
स्मिन् छुप्के थः सह अहं दाद गतः सदेव क्रीडितश्च ते सवें
तोयाभावात् नाशं यास्यन्ति । तत् तेषां बियोगं द्रष्टमहमस-
मर्थः । तेनेतत् आयोपवेशनं कतम् । साम्प्रलं स्वेषां स्वल्प
जलाशयानां जळचरा झुरुजलाशयेषु' स्वस्बजनेनीसन्ते,
काचिच्च मकरगोधारशिदशुमारजलहस्तिप्रभुतवः स्वयमेव
गच्छन्ति । अत्र पुनः सरसि ये जलचरास्ते निश्चिन्ताः सरन्ति
तनाइं विशेषात् रोदिमि यद्धीजशेषमात्रमप्यन्न न उद्धरि-
च्याति १ ततः स तदाकण्य अन्येप्रामपि जलचराणां तत् तस्यः
भाषारीकासमेत्तम् । (९७)
बचने निवेद्यामास । अथ ते सर्वे भयत्रस्तमनसो मत्स्यकच्छ-
पप्रभ्रतयस्तमभ्युपेत्य पप्रच्छुः- भाम | अस्ति कश्चिदुपायो
गनास्माक॑ रक्षा भवति!” । बक आइ-''आस्ति अस्थ जला-
शयस्य नातिइूरे प्रभूतजलसनाथं सरः पाझिनीखण्डम-
ण्डितं यञ्चठार्विशत्यापि वर्षाणामवृष्ट्या न शोषमेष्यति।
तद्यदि मम प्रष्ठ कश्चिदारोहति तदहं त॑ तत्र नयामि अथ
ते तत्र विशवासमारन्ना? तात! मातुल | आतः ! इति व्रुवा-
णा अहं पूर्वमहं पूीमिति समन्तात् परितस्थुः । सोऽपि
दुष्टाशयः क्रमेण तान् पृष्ठ आरोप्य जलाशयस्प नातिदूरे
शिलां समासाद्य तस्यामाक्षिप्य स्वेच्छया भक्षयित्वा भूयोपि
जलाशयं समासाद्य जलचराणां मिथ्यावात्तासन्देशकेमेनां-
सि र्जयन्नित्यामिवाहार्ठत्तिमकरोत् । अन्यस्मिन् दिने च
कुलीरकेणोक्तः- “माम ! मया सह ते प्रथमः सेहसम्भाषः
सञ्जातः । तत कि मां परित्यज्य अन्यान्नयसि । तस्मादद्य
मे प्राणत्राणं कुरू”। तदाकण्यं सोऽपि इष्टाशघाश्चिन्तितवान्।
“निर्विण्णोऽहं मत्स्यमांसादनेन | तदद्य एनं कुलीरकं व्यखन-
स्थाने करोमि इति चिचिन्त्य तं पृष्ठे समारोप्य तां वध्यः
शिलामुदिश्य अस्थिः | कुलीरकोऽपि दूरादेवास्थिपर्वतं शि-
लाश्रयमवलोक्य मत्ह्यास्थीनि परिज्ञाय तमपृच्छत--“'माम!
कियट्रे स जलाशय; ? मदीयभारेण आतिश्रान्तस्त्वै तत
कथय” । सोऽपि मन्दधीर्जलचरोऽ्यामिति मत्वा स्थले न
प्रभवतीति सरस्मित्तामेदमाइ-'' कुछारक ! कुतोऽ तो जशा"
शयः मम प्राणयात्रेयम्, तस्मात् स्मय्थतामात्मनोऽभीष्टदे-
वता । त्वामपि अस्यां शिलायां निक्षिप्य भक्षा. ष्यामि? ।
इत्युक्तवाते तस्मिन् स्ववदनदेशद्वथेन मृणालनालधवलायां
भृदुम्रीवायां गृहीतो मृतश्च ल॑ अथ स तां बकऊनावां
समादाय शाने? शनेः तञ्जलाशयमासस।द् । ततः सवेरे
॥ |
(९८ ) पश्रतन्त्रम् ।
जळचरेः पृष्ठ: भोः कुलीरक ! कि निवृत्तस्त्वमू ! स
मातुलोऽपि न आयातः ? तत् कि चिरयति ?, वयं संवे
सोत्सुकाः कृतक्षणास्तिष्ठामः'? । एवं तेरभिहिते कुलीरको-
ऽपि विहर्घोवाच- “मूर्खाः सर्वे जलचरास्तेन मिथ्यावा-
दिना वञ्चयित्वा नातिदूरे शिलातले भक्षिप्य भक्षिताः ।
तन्मया आयुःशेषतया तस्य विरवासघातकर्थ आभिपायं
ज्ञात्वा ग्रीवेयमानीता । तदलं सम्भ्रमेण। अधुना सर्वजलच-
राणां क्षेमं भाविष्यति? अतोऽहं ब्रवीमि-' भक्षयित्वा
बहून् मत्स्यान्” झाति ।
सो यह सरोवर स्वल्प जलूषाला है शीघ्र सूख जायगा और इसके सूखनेसे
जिनके साथ में बृद्धिको प्राप्त हुआ हूं, सदैव क्रीडा की हे ये सब जळलके न
होनेसे बाराको प्राप्त होंगे, सो उनका वियोग देखनेको में असमर्थ हूं । इसी
कारण यह मरनेका ब्रत लिया है इंस समय सबही स्वल्प सरोवरोंके जलचर
बडे २ जळाशयोमे भपने स्वजनों द्वारा लजाये जाते हैं; कोई मकर, गोधा,
घडियाकं; 'जळहरित आदि स्वयमेवही जाते हैं और इस सरोवरके जो जलचर
हे वे निश्चिन्त हैं; इस क्रारण मैं विशेष कर रोताहूं कि, इसका तो वीजमात्र न
चचगा'? | तब वह यह वचन सुनकर और जळचरोंसे उसके वचन निवेदन
करता मया, तव वे सब भयसे व्याकुळ मन हुए मच्छ कच्छ आदि उसके पात
जानकर पूछने छगे-“मामा ! क्या कोई उपाय है £ जिससे हमारी रक्षाहो”
बगळा वोला- इस सरोवरसे थोटी ही दर बहुत जळसे युक्त कमळिनीसे शोमा-
यमान सरोवर हे, जो चोवीस वर्षकी अवाष्टिममी नहीं सुखेगा सो यदि कोई
मेरी पीठपर चढ़े तो में उसे वहां लेजाऊ'?। तब वे वहाँ विश्वासको प्राप्त हुए
तात, मामा, माई इस प्रकार-वोळते हुए प्रथम में पहळे में इस प्रकार उसके
चारों भोर स्थित हुए। वहभी दुष्टात्मा उनको पीठपर चढाय जळाशयके थोडी
दूर शिलापर आंरोपणकर उसमें डाल अपनी इच्छासे भक्षण कर फिरमी
जेंाशंयको प्राप्त होकर जळचरोंकी मिथ्या वातोके सन्देशोंसि मन प्रसन्न करता
इभा इस प्रकार अपनी आजीविका करता रहा । एक . दिन कुळारकच कहा-
“भामा ! मेरे संग पहले तेरा खेह सम्मापण हुआधा, सो क्यों मुझे“ छोडकर
\
भाषाटीकासमेतम् । (९९)
अन्याका ढजाता हे ? सो आज मर प्राणोंकों रक्षा कर” | यह सुनकर
चहमो दुष्टात्मा बिचारने छगा । “मछलियोंके मास खानेसे मेरा जीभी उकता
गयाह, सा भाज में इस कुळीरकको व्यज्ञनके स्थानमें करू” | यह विचार
उत्तको पीठपर चढाकर उस वध्यशिढाके उद्देष करके चछा | कुर्डरक झी
दूरसे ऑस्थिपंचत शिळाआश्रयको देखकर मत्योकी अस्थि पहचानकर उससे
घुछने ढगा- मामा ! वह जळाइाय कितनी दूर है ? मेरे भारसे तुम अधिक
यकगय हो सां कहो |? वहमी मन्दबुद्धि यह जलचर है ऐसा मानकर कि
स्थळम यह बळवान् न होगा हँसता हुआ यह बोढा- कुलीरक ! दसरा
जळारय नहीं ह, यह मेरी प्राणयात्रा हे । सो भव अपने इष्टदेवताका स्मरण
करा, तुझी इस शिलाम डालकर में मक्षण करजाऊगा! । उसके यह कहने-
पर कुछीरकने अपने दोनो दातोंसे कमळनाळका समान उसकी खेत मृदुग्रीवा
पकडी जिससे वह मरगपा, तब वह उस बगढेकी गरदनकों प्रहणकर सहज
सहज उस जढाशयको प्राप्त हुआ, तब समूर्ण जळाशयोंके रहनेवालोने पछा
मो कुछीरक । त किसप्रकारसे लौट आया ? वह मातुळमी ब आया, सो
बर्षा हर करता ह, हम सब बडे उत्काठेत क्षण २ मे वाट दखते स्थितई ।?
उनके ऐसा कहनेपर कुलीरक हँसकर वोछा--“मूखाँ ! सम्पूर्ण जलचर उस
मिध्यावार्दाने ठाकर थोडाही दूर शिछातळपर पटकर खाये | सो में आयुशेष
हानेस उस विश्वासघातकका अभिप्राय जानकर यह उसकी गदेन ढेभायाहुँ,
सा अब उद्दा मत करा । अव सत्र जढचरोका क्षेम होगी” इससे में कहता
हुन बहुतत॑ मत्ताकों खाकर” इत्यादि ।
बायस आह- “भद्र ! तत्कथय कर्थ स ढुष्टसर्पो वधसुपे-
ख्घाति ?” । शृगाल आह-“'गच्छतु भवान् कचित्तंगर॑ राजा-
घिछ्ठानम् । तन्न कस्यापि धनिनो राजामात्यादेः प्रमादिनः
कनकसूत्रं हारं वा गृहीत्वा तत् कोटरे प्रक्षिप येन । सस्त
हुहणेन वध्यते” । अथ तत्क्षणात् काकः काकी च तदा-
कण्य आत्मच्छयोत्पतितो । ततश्च काकी किञ्चित्सरः माप्य
यावत्पश्थात तावत् तन्मध्ये कर्यचिद्वाज्ञाऽन्तःपुर जलासने
ब्यस्तकनकरसूतर झुक्तमृक्ताहारवसाभरण जलक्काडी कुरूते ।
(१००) पञ्चतन्त्रम् ।
अथ सा वायसी कनकसून्रमेकमादाय स्वगहाभिमुखं प्रत-
स्थ । ततश्च कंचाकना वषधराश्व त नायमानमुपलक्ष्य ग्रही-
तलगुडाः सखरमचययुः । काकी अपि सपकोटर तत् कन-
कसूत्रं मक्षिप्य खुदरमवस्थिता । अथ यावद्राजपुरुषास्ते
वृक्षमारुह्य तत् कोटरमवलोकयन्ति तावत्कृष्णसपेः प्रसा-
रितभोगस्तिष्ठति । ततस्तं लणडम्रहारेण हत्वा कनकसूत्रमा-
दाय यथाभिलषितं स्थान गताः | वायसदम्पता आप ततः
पर सुखेन वततः अतोऽहं ्रवीमि-“उपायेन हि यत. कुर्यात”
इति । तत्र किश्ादिह बुद्धिमतामसाध्यमस्ति । उक्तश्च-
कौभा बोल -“मद्र ! सो कहो किसप्रकारसे वह दुष्ट सर्प वधको प्राप्त
होगा?” | श्रुमाळ बोला“ तुम किसी राआके नगरमे जाओ, वहां किसी धनी
राज अमात्यादि किसी अप्तावधानका कनक सूत्र वा हार ग्रहण करके उसकी
खखोडलमें डाळदों जिससे उसके ग्रहणसेभी बह सर्प बध किया जाय” | तव
उसाक्षण वे कोए और कौअन उस वचनको सुन अपना इच्छासे उडे | सो
काकी किसी सरोबरको प्राप्त होकर जबतक देखतीहे तबतक उसके मध्यम कोई
राजाके अन्तःपुरकी छी जळके निकट कनक सूत्र मोती हार तथा बन्न रखकर
जलन्नांडा करता दखा, तब वह काका कवकसूत्रका रवार अपन घरका आर
चली, तब वे कंचुकी और वेषेधर' उसको लेजाता देखकर लकडी ले बहुत
शीघ्र उसके पछि गये, काकी भी सेके खखोडछमे उस कनकसूत्रको डाळ दूर
त्थितहुई । सो जबतक राजपुरुप उस बृक्षमें चढकर उसकी खखोडळको देखते
हे, तबतक काळा सांप फणफेळाये वेठा देखा, तव उसको उडोके प्रहारसे वध-
करं कनकसूत्रछे अपने भमिलषित स्थानको गये । वायसदम्पतीभी परम सुखसे
रहने छगे, इससे में कहताहूं “जो उपायसे शक्य है” इत्यादि । सो बुद्विमानोंको
कुछमी अताध्य नहीं है, कहा हेट
स्य बुद्धिबले तस्य निवेद्धिस्तु कुतो बलम् ।
वने सिंदी मदोन्मत्तः शशकेन निपातितः ॥ २३७ ॥??
जिसको बुद्धे ह, उसी. बढ्दै, ।नवु दको बळ नहीं । देखो ! धनमें
सदोन्मत्त सिह खरगोश मारागया ॥ १३७ ॥ 7
भाषाटीकासमेतम् । (१०१)
कररक आह-“'कथमेतत ?” स आह-
करटक बोळा-“यह कैसी कथा है £? वह बोळा-
कथा ८.
कस्मिंश्विददने भाछुरको नाम सिंहः प्रतिवसति स्म ।
अथासौ वाी्योतिरेकान्नित्यमेवानेकान् ` मृगशशकादीन्
व्यापाद्यन्न उपरराम । अधथान्येद्स्तदनजाः सर्वे सारङ्ग
वराइमहिषशशकादधो मिलित्या तमभ्युपेत्य प्रोचु:-“स्वा-
मिन | किमनेन सकलमृगवधेन नित्यमेव? यतस्तव एकेनापि
मृगेण तृप्तिभवति। तत् क्रियतामस्मामिः सह समयधर्म्मः ।
अद्य प्रभाते तव अत्रोपविष्टस्थ जातिऋमेण अतिदिनमेको
मृगो भक्षणार्थे समेप्यति । एवं कृते तव तावत्माणयात्रा
छश गवना अपि भावप्यात, अस्माकश्च पुनः सवाच्छदन न
स्थात् । तदेष राजधमाऽडुष्ठायताम्। उक्तत्र-
किसीएक वने भाझुरकनाम सिंह रहताया बह पराक्रमकी अधिकतासे
अनेक मृग शशक आदिको मारताइआ उपरामको प्राप्त व होता | तव दूसरे किसी
दिन उस तनके सब जवि मृग शकर मेस शशज्ञादि मिळकर उसके निकट
जाकर बोठे,-“स्व्रामिन् ! इन सब मृर्गोके मारनेसे क्या लाम हे, नित्यहा
तुम्हारी तो एकही मृगसे तृप्ति होजाती हे सो हमारे सग प्रतिज्ञा करको । आजसे
लेकर तुम्हारे यहा वेठेहुएके पास जातिक्रमसे भक्षणके निमित्त एक मृग जावेगा
ऐसा करनेसे तुम्हारी प्राणयात्रा केशके बिना होगी ओर हम सबकासी नाश न
होंगा सो यह राजधमेका अनुष्ठानकरो । कहाहै-
शानः शनश्व या राज्यमुपभुङ्कक यथानलम् ।
रसायनामिव पराज्ञः स पुष्टि परमां ब्रजेत् ॥ २३८ ॥
हे राजन् | जो शनेः २ वछके अनुसार खाताहै बहू प्राज्ञ रसायनकी
समान पुष्टिको प्राप्त होताहै ॥ २३८॥
विधिना मन्त्रयुक्तेन रूक्षापि मथितापि च |
भयच्छाति फले भूमिररणीव इताशनम् ॥ २३९॥
(१०२) पञ्चतन्त्रम्।
बिधि और मन्त्रसे युक्त ( भथोत् सुयुक्ति विधिले ) जोतीहुई कठिन भूमि
भी बहुत फळको देतीहे, जेस अरणी अग्निको मथनेसे देतीहे ॥ २३९ ॥
ज्ञानां पालनं शास्यं स्वर्गकोशस्य वद्धंनम् ।
पीडनं धर्मनाशाय पापायायशसे स्थितम् ॥ २४० ॥
प्रजापाळन राजाओंको प्रशंसनीय है। यहाँ खक कोपका बढ़ानाहे । प्रज्ञाको
पीडा देना धर्मके नाश, पाप और अर्कीतिक्के लिये होताहे ॥ २४० ॥
गोपालेन प्रजाधेनोर्विचढुग्घे शनेः शने? ।
पालनात्पोषणाद्वाह्यं न्याय्यां दृत्ति समाचरेत् ॥ २४१ ॥
गोंपालकों प्रजारूपी गोका दूध शेः २ ग्रहण करना चाहिये, पालन
पोषण और न्यायकी इत्तिसे प्रहणकरे ॥ २४१ ॥
अजामिव प्रजां मोह्दाय्रो हन्यात्ट्रथिवीपातिः ।
तस्येका जायते तृतिने द्वितीया कथन ॥ २४२ ॥
और जो राजा मोइसे बकरी समान प्रजाको नष्टकरताहे, उस एककाही
तापे होती है, दूसरेकी कदाचित् नहीं ॥ २४२ ॥
, फलाथी नृपतिलोकान्पालयेचलमा स्थितः ।
दानमानादितोयेन मालाकारोऽडङ्कुरानिव ॥ २४३ ॥
फळकी इच्छाबाळा राजा यत्वसे लोकोको पाळनकरे जिसप्रकार दान मानके
ज़ंळसे माळी अंकुरोको बढाताहै ॥ २४३ ॥
वृपद्ीपो धनस्नेहं प्रजान्यः संहरन्नपि ।
आन्तरस्थेगुणेः शुभेलेक्ष्यते नेव केनचित् ॥ २४४ ॥
दीपककी समान राजा प्रजासे धनरूपी खेहको ग्रहण करता हुआ अपने
अन्तरमे स्थित श्रेष्ठ गुणोके कारण किसको लक्षित नहीं होताहे ॥ २४४ ॥
यथा गोडुह्यते काले पाल्यते च तथा भजा? ।
सिच्यते चीयते चेद लता पुष्पफलप्रदा ॥ २४५ ॥
जैले समयपर गौ दुही जांतीहे ऐसेही पालीइई प्रजा समयपर दुही जातीहे
सींचीहुई छताही समयपर पुष्प फलादि प्रदान करतीहे ॥ २४५ |
यथा बीज(कुरः सूक्ष्म; ्रयत्नेनाभिरक्षितः !
फलप्रदो भवेत्काले त द्लोकः सुरक्षितः ॥ २४६ ॥
भाषाटीकासमेतम्। (१०३ )
जिस प्रकार सुक्ष्मबीजोके अकुर यव्नोसे रक्षितहुए समयपर फळ देते हैं इसी
प्रकार सुराक्षेत छांकमा ॥ २४६ ॥
हिरण्यधान्यरत्रानि यानानि विविधानि च।
तथान्यदपि यत्किखिलजाम्घः स्घान्महीपतेः ॥ २४७ ॥
सुवर्ण, धान्य, रत्व, विविध यान तथा औरमी जो कुछ हे बह सब राजाको
प्रजासे ही प्राप्त होताहे || २४७ ॥
लोकाजुप्रहकर्तारः प्रवद्धन्ते नरेश्वराः । -
लोकानां संक्षपाचेब क्षयं यान्ति न संशयः ॥ २४८॥ -
लोकोपर अनुग्रह करनेवाळे राजा बृद्धिको प्राप्त होतेहे आर ठोकके क्षय
करनेसे नाश होजातेहे इसमे सन्देह नही ॥ २४८ ॥!?
अथ तेषां तद्वचनमाकण्य भाछुरक आह-अहो | सत्यम-
भिहितं भवाद्विः परं यदि ममोपविष्टस्यात्र नित्यमेव
नेकः -ाषद्ः समागमिष्यति तन्ननं सवानपि भक्षयिष्यामि? ।
अथ ते तथेव प्रतिज्ञाय निशेतिभाजः तन्नेव वने निघाः ९-
य्येटन्ति । एकश्च प्रतिदिनं क्रमेण थालि । बृद्धो वा
वैराग्ययुक्तो वा, शोकग्रस्तो वा, पत्रकळननाशभीतो वा, तेषां
मध्यात्तस्य भोजनार्थे मध्याह्मसमये उपतिष्ठति । अथ कदा-
चित् जातिक्रमाच्छशकस्य अवसरः समायातः। स समस्त-
मृगेः प्रेरितोऽनिच्छन्रपि मन्दं मन्दं गत्या तस्य वधोपाय
चिन्तयन वेलातिक्रर्म कृत्वा व्याकुलितहृदथो यावद्गच्छति
तावत् मार्गे गच्छत्ता कूपः संदृष्टः । यावत्कूपोपारि थाति
तावत्कूपमध्ये आत्मनः प्रतिविम्ब ददर्श । दृष्टा च तेन
हृदये चिन्तितं । “यद्भव्य उपायोऽस्ति, अहं भासुरकं प्रकोप्य
स्वबुद्ध्या अस्मिन् कूपे पातयिष्यामि’ । अथासौ दिन-
शेषे भाखुरकसमीपं प्राप्त: । सिंहोऽपि वेलातिक्रमेण क्ञुत्क्षा-
मकण्ठः कोपाविष्टः सक्किणी परिलेलिहन् व्यचिन्तयत् ।
“अहो ! भातराहाराय निःसत्बं वने मया कत्तव्यम्” । एवं
चिन्तयतस्तस्य शशको मन्दे मन्दे गत्वा प्रणम्प
(१०४) पञ्चतन्त्रस् ।
तस्य अग्रे स्थितः । अथ रतं प्रज्वलितात्मा भासुरको
भत्सेयन्नाह,- रे शशकाधम | एकतस्तावत् त्वं लघु
आक्ोऽपरतः वेलातिक्रमेण, तदस्मादपराधात त्वां नि-
पात्य प्रातः सकलान्यपि मृगकुलानि उच्छेदयिष्यामि” ।
अथ शशकः सविनयं मोवाच, स्वामिन् ! नापराधो
मम,न च सत्वानाम्, तत् श्रूयतां कारणम” । सिंह आह-
“सत्वरं निवेदय यावत् मम दंष्ट्रान्तर्गतो न भवान् भवि-
प्यति” इति । शशक आह-स्वामिन्! समस्तमृगैरद्य जाति-
ऋमेण मम लघुतरस्य प्रस्ताव विज्ञाय ततोऽहं पश्चशशकेः
समं भषितः । ततश्च अहमागच्छनन्तराले महता केनाचि-
दपरेण सिंहेन विवरान्निर्गत्य अभिहितः-' रे ! क प्रस्थिता
यूयम् १ अभीष्टदेवतां स्मरत” । ततो सथासिहितम्-' वं
स्वामिनो भासुरकसिंहस्य सकाशे आहारा्थ समयधर्मेण
गच्छामः” । ततः लेन अभिहितम्- 'यछ्ेवं तहिं मदीयमेत-
दनं मया सह समयधर्मेण समस्तैरपि श्वापदेवत्तितव्यम् ।
चौररूपी स भासुरकः । अथ यदि सोऽत्र राजा ततो विश्वा”
सस्थाने चतुरः शशकानत्र धृत्वा तमाहूय इुततरमागच्छ,
घेन यः कश्चिदावयोर्मध्यात पराक्रमेण राजा भविष्यति स
सर्वानेताव भक्षयिष्यति” इति । ततोऽहं तेनादिष्टः स्वाः
सिसकाशमभ्यागलः, एतत् वेळाव्यतिक्रमकारणम्। तदत्र
स्वामी प्रमाणम्” ! तच्छुत्वा भासुरक आइ- भद्र ! यदि
एवं तत् सत्वरं दर्शय भे तं चौरसिंहम्, थेन अहं मृगकोपं
तस्थ उपरि क्षिछा स्वस्थो भवामि । उक्तश्व-
.तब उनके यह वचन सुनकर भाषछुरक बोळा--'“अहो तुमने सत्य कहा,
परन्तु यदि मेरे बैठेहुए नित्य एक जीव न आवेगा तो भवझ्यही सबको खा
जाङंगा” | तव वे ऐसाही करेंगे यह प्रतिज्ञा करके निर्ट्रेग होकर उस बसे
निर्भय फिरने छगे । प्रति दिन एक कमसे उनके पास जाता वृद्ध या वेराग्यधुक्त
वा शोकम्रस्त वा पुत्र कछत्रके नाशसे भीतहुभा उनके मध्यसे उनके भोजनके
१
भाषाटीकासमेतम् । (१०५)
| निमित्त मध्यान्ह समम प्राप्त होता था । तब कमी जातिके कमस खरगोराकी
| वारी आई वह सव मृर्गॉसे प्रेरित हुआ इच्छा न करनेपरमी शने २ जाता उसके
ह
मारनेके उपायको चिन्ता करता हुआ समयको विताकर व्याकुळ हृदयसे जबतक
जाताहे, तबतक मागेमें जाते हुए उसने कूपदेखा | जव कूपपर गया तब उसमे
अपनी परछाही देखकर उसने मनमें विचार किया कि, “यह एक उत्तम उपाय
हैमें भासुरकको क्रोधित कराकर इस कूपमें गिराऊगा” तब यह कुछ दिनदोषरहे
भासुरकके समाप प्राप्तहुभा । सिहभी समयके वीतनेसे भूखसे शुप्ककठ धर्मे भरा
जीपको चाटता हुआ विचारता था, “अहो प्रमात ही भोजनके निमित्त यह घन
निर्जीव कर दूगा” इसप्रकार उसके विचारते वह खरगोश शन २ जाय प्रणा-
मकर उसके आगे स्थित भया। तव प्रज्वाडित आत्मा भासुरक उसे घुडकता-
हुआ बोढा--'रे नीच खरगोश ! एक तो तू ज्यु दूसरे समयको बिताकर जाया
है इस अपराधसे तुझको मारकर सवेरे समी मृगोका नाश करूरा? । तब
खरगोश विनयएूवैक बोढा--“स्वामिन् | इसमें न मेरा अपराव न अन्यजीोका है
सो कारण सुनिये । सिह बोछा,--'शीघ्र निवेदन कर जवतक तू मेरी डाढोके
अन्तत न होता है?। खरगोश वोळा,-''स्वामित् ! सएणे मृगोने आज जाति-
कमसे मेरा अति छघु कलेवर जानकर पाच खरगोशोंसहित मुझे भापके पास
भेजा । सो में आता हुआ मार्गमे एक अन्य सिंहेन विवरसे निकछ कर कहा,-
“रे तुम कहा जातेहो? अपने इष्टदेवताका स्मरण करो” | तव मैंने कहा-“हिप्
स्वामी भाझुरकके पास उसके भोजनको प्रतिज्ञाथमेसे जाते है” उसने कह! “जो
ऐसा है तो यह घन मेरा है, मेरे साथ प्रतिज्ञासे सव जीवोको वतना चाहिये,
चोर है वह भासुरक । भर जो वह यहाका राजा है तो विश्वासके निमित्त चार
खरगोशोको यहा रखकर उसे घुळाकर बहुतशीघत्र आभा इससे हम दोनोके बाचमें
जो कोई पराक्रमसे राजा होगा वही इन सबको खायगा” सो में उसकी
किन
०७ > 5
आज्ञासे स्वामीके पास भाया हू यह समयके उल्लघनका कारण है सो इसमे
स्वामीही प्रमाण हें””। यह सुतकर मासुरक बोछा,-“भद्र ! जो ऐसा है तो
कक उस वि NF भि क भरै ha Ti, Sn $ _
शत्र मुझे उस चोर सिहको दिखाओ जित्तते में इन मृगोके कोपको उसके उपर
छोडकर स्तरस्य होऊ । कहा हे-
24
(१०६) पञ्चतन्त्रम् ।
भूमिमित्रं हिरण्पश्व विग्रहस्य फलत्रयम् ।
नास्त्येकमपि यद्येषां न तं कुर्यात्कथञ्चन ॥ २४९ ॥
भूमि, वित्र, सुपर्ण यह तीन विम्रहके फळ हैं और जो इनमेंसे एकमी न हो
तो वहां विग्रह न करे || २४९ ॥
यत्र न स्यात्फलं भूरि यत्न च स्यात्पराभवः
न तत्र मतिमान्युद्ध सझुत्पाद्य समाचरेत ॥ २५० ॥”
_ जहां वशप फळ न (मळ भार पराभव हा मातमानका चीहिय के, वहां
युद्ध न करे॥ २९०”
शशक आह- स्वाभिन् ! सत्यमिदम, स्वभूमिहितोः
परिभवाच् युध्यन्ते क्षत्रियाः, परं स दर्गाश्रयः, ढुगान्रिष्क्रम्य
बय॑ तेन विष्कम्भिताः । ततो इगस्थो दुःसाध्यों भवति
रिषुः । उक्तश्व-
खरगोश बोछा,-- “स्वामिन् ! यह सत्य 8, अपनी भूमिके हेतु पारेभवसे क्षत्रिय
युद्ध करते हैं, परन्तु वह दुगेमें रहता हे, दुर्गमंस निकठकर उसने हमको रोक-
छिया, इससे दुगेमें स्थित शत्रु दुस्साच्य होता है । कहाहै कि-
न गजानां सहस्रेण न च लक्षेण वाजिनाम् ।..
यत्कृत्य॑ साध्यते राज्ञां दुर्मेणेकेन सिष्याति ॥ २५१ ॥
जो कार्य सहर हाथी, लक्ष घोडोंसे सिद्ध नही होता है, वह एक दुरगसे
राजाआका कार्य तिद्ध होताहे ॥ २९१ ॥
शतमेकोऽपि सन्धत्ते प्राकारस्थो घनुधेरः ।
` तस्मादुर्ग शंसन्ति नीतिशाख्रविचक्षणाः ॥ २५३ ॥
` किळेमे स्थित एक धनुपधारी सोसे युद्ध करसकता हे, इस कारण नीतिः
शाल्मके जाननेवाले दुर्गकी प्रसंशा करते ह| २५२ ॥
. पुरा शुरोः समादिशाद्धिरण्यकशिपोर्भयात । .
- शक्रेण विदितं दग प्रभावाद्विव्वकर्मणः ॥ २५३ ॥
प्रथम मुध्का आज्ञास हरण्यक्राशपुद भयसं इन्ट्रच ।वेखकमकि सहायतास
दुर्ग निमोण कियाथा | ९९३ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (१०७)
तेनापि च वरो दत्तो यस्य दुर्ग स भूपातिः ।
विजयी स्यात्ततो भूमो दुर्गाणि स्यः सहस्रशः ॥ २५४ ॥
भोर उसनेभी यह वर दिया था कि, जिसके दुर्गे होगा वही राजा विजयी
होंगा इस कारण पृथ्चाम सैंकड़ों दुर्ग होगये ॥ २५४ ॥
दष्टराविरहितो नागो मदहीनो यथा गजः ।
सवेषां जायते वश्यो दुर्गहीनस्तथा नृपः ॥ २५५ ॥
जैसे डाढोत राहित सपे, मदसे हीन हाथी इसी प्रकार दुर्गहीन राजा शीघ्र
अन्योंके बझमें होजाता है॥ २५६ |?
तच्छत्वा भासुरक आइ-''भद्र ! दुर्गस्थमपि दशर्थ ते.
चोरसिहं येन व्यापादयामि । उक्तश्च-
_ यह सुनक्कर भासुरक बोळा,-“भद्र । किलेमे स्थितमी उस चोर सिंहको
दिखाओ जिससे मे उसे मारडाळ। कहा है-
जातमात्रं न यः शं रोगश्च प्रशमं नयेत् ।
महाबलोऽपि तेनेव वृद्धि भाप्य स हन्यते ॥ २५६ ॥
जो उत्पन्न होतेही शत्रु और रोगको अपने वशमे नहीं करता है, वह
महावळी हो तथापि उसके साथ वृद्धिको प्रातहाकर हनन करता है ॥ २५६ ॥
तथाच-
औरभी कहा है-
उत्तिष्ठमानस्तु परो नोपेक्ष्घः पथ्यमिच्छता ।
समो हि शिष्टेराम्राती वरत्स्यन्तावामयः स च ॥ २५७॥
हितकी इच्छा करनवाळे पुरुपको उठे हुए शत्रुकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये,
श्रेष्ठ पुरुपोने वृद्धिको प्राप्त होते इए शत्रु और रोग समान कहे हैं ॥ २५७ ॥
अपिच-
_ और देखो-
उपेक्षितः क्षीणबलोऽपि श्रः
प्रमाददोषात्पुरुषेमदान्धे! ।
साध्योऽपि भूत्वा प्रथमं ततोऽसौ
असाध्यतां व्याधिरिव प्रयाति ॥ २५८ ॥
|
(१०८) पश्चतन्त्रम् ।
उपेक्षा करनेसे क्षीणब्रलवाढामो शत्रु मदान्त्र पुरुषोंके प्रमाददोषसे प्रथम
साध्य होकर मी पाछे व्याधिकी समान असाध्य होजाताहे॥ २५८ |
तथाच-
तसहा-
आत्मनः शक्तिसुद्रीक्ष्य मानोत्ताहभ्व यो व्रजेत ।
बहून् हन्ति स एकोऽपि क्षत्रियान्मारमेवो यथा ॥२५९॥१
जो अपनी राक्तिको देखकर मात और उत्साहको प्राम होता हे, वह
*एकभी बहुतांको मार सकता हे, असे क्षत्रियोको परशुराम ॥ २९९, ॥”
शशक आह-“'अस्त्येतत्तयापि बलवान् स मया दष्टः तत्
न युज्यते स्वामिनस्तस्य सामथ्यमविदित्वा गन्तुस् । उक्त्व-
शशक बोढा-“यह तो हे, परन्तु तोमी वह मेंने बलवान् जाना हे, विना
उसकी सामर्थ्ये देखे स्वामाको घां जाना उचित नहीं है | कहाहै-
अविदित्वात्मनः शक्ति परस्थ च समुत्सुकः ।
गच्छत्राभिसुखो नाशं याति वहाँ पतड़बत ॥ ३६० ॥
जो अपनी और दूसरेकी शाक्तिके विना जाने समुत्सुक होकर सन्सुख जाता
है वह अग्रिम पतंगकी समान जाकर नष्ट होता हे ॥ २६०॥ |
यो बलात्मोन्नत याति निहन्ठुं सबलोऽप्यरिम् ।
विमदः स 'निवत्तेत शीणेदन्तो गजो यथा ॥ २६१॥'?
जो सबळभी बलसे प्रबळ शत्रुके मारनेको जाता हे वह विमद होकर दांत
टूट हाथीकी समान निवृत्त होता हे॥ २६१ !!”
भासुरक आह-भोः ! किं तब अनेन व्यापारेण, दर्शय
मे तं इगेस्थमपि” । अथ शशक आह-''यद्येवं ताद आग
च्छठु स्वामी” । एवमुक्ता अभ्रे व्यवस्थितः । ततश्च तेन आग-
च्छता यः कूपो इष्टोऽभूत् तमेव कूपमासाख भासुरकमाह-
“इवामिनत् ! कस्ते प्रताप सोहुं समर्थः । त्वां दृष्टा दूरतोऽपि
चौरसिंहः प्रविष्ट; स्वं इम्, तदागच्छ येन दशेयामि” इति
-भाखुरक आह- दशेय मे दगम?' । तदनु दाशितस्तेन कूपः
ततः सोऽपि मूर्खः सिंहः कूपमध्ये आत्मप्रातिबिम्मं जलम-
भाषाटीकासमेतम् । (१०९)
ध्यगत्त दृष्ठा सिंहनाद मुमोच । ततः प्रतिशब्देन कूपमध्या-
इिएणतरो नादः सम्रृत्यित। अथ तेन तं शत्रु मत्वा आत्मानं
नस्य उपरि प्रक्षिप्य माणाः परित्यक्ताः । शशकोऽपिः इष्टः
मनाः सवेमृगान् आनन्द ते; सह प्रशस्यमानो यथासुखं
तत्र वने निवसति स्म । अतोऽहं ब्रवीमि-यस्य बुद्धिबेलं
तस्य? इति ।
भापुरक बोजा,-“भो! तुझे इस वातस क्या उस किलेमे स्थितमी उसे मुझे
दिखा”? । तब शशक बोला,-"जो ऐसा हे तो भाओ त्यामी ° थह कहकर
आगे चळा । तव उसने आतेमें जो कूम देखा था उसी कूपको प्राप्त होकर
बह भासुरकसे बोळा,-“स्वामिन् ! आफ्का प्रताप कोन सह सक्ताहे । तुमकों'
देखकर दूरसेही वह चोर [संह अपन दुर्गमें प्रविष्ट इमा है सो आभो मैं
दिखाऊ!” भासुरक बोखा,~ “मुझे वह दुर्ग दिखाओ” तब इसमे वह कूप दिख-
छाया। तब वहभी मर्ख सिंह अपने प्रतिबिम्बको कूयमें स्थित देख सिंहनाद करता
सया उसकी प्रातेन्यानेसे कुएसे दूना नाद उठा | उससे वह उसको शत्रु मानकर
अपनेको उसके ऊपर डालकर प्राण छोडता मया । खरगोशमी प्रसन्न मनहों सब
मृगोको आनदित कर उनके साथ प्रशसितहों ययासुखसे उस वनमे रहने छगा।
इससे में कहताहू “जिसको वुद्धि हे उसको बळ हे
तद्यांद भवान कश्रयात, तचनव गत्वा तयोः स्ववाद्ध-
अभावेण मेत्रीभेदं करोमि? । करटक आह--''भट ! यदि
एन ताह गच्छ, एशावारुत पन्धानः सन्तु, यथा भप्रतमत-
छीयताम'' । अथ दमनकः सञ्जीवकवियुक्तं पिगलकमव-
लोक्य तत्रान्तरे प्रणम्याग्रे सलप्पावष्ट; । 'पगलकोऽपि
तमाह--'भद्र | कि चिरात इष्टः ९! दमनक आह-- न
किख्िदेवपादानामस्मामिः प्रयोजनम्, तेन अहं नाग:
'च्छामि। तथापि राजप्रयोजनाबिनाशमवलोक्य सन्दह्ममान-
दयो व्याकुलतया स्वयभेव अभ्यागतो वक्तम् । उक्तव-
सो यदि आप कहें तो वहा जाकर उनका अपनी बुद्धिके प्रमावसे मैत्री-
भेद करू”? | काटक बोला,=*भद्र | जो ऐसा हे तो जाओ, तुम्हारे मार्ग
६११०) पथ्वतन्चस् ।
संगलकारीहो,अभिलषित अनुष्ठान करो” । तब दमनक संजीषकसे अळग पिंग-
छकको देखकर उसी समय प्रणामकर आगे बैठा, पिगलक उससे बोळा,-
“वद्र ! बहुत दिनोंमें क्यों देखि ? ” दमनक बोळा,-“श्रीमान्के चरणोंका
हमसे कुछमी प्रयोजन नहीं है, इससे में नहीं आताहूं । तथापि राजप्रयोजनका
नाश देखकर संदिग्ध हृदय हो व्याकुळतासे स्वयं ही कहनेको आयाहूं | कहा हे-
भियं वा यदि वा द्वेष्यं शुभं वा यादि वाशुभम् ।
अऽष्टोऽपि हितं वक्ष्येयस्थ नेच्छेत्पराभवम् ॥ २६२ ॥ ”
प्यारा चा इषा शुभ या अशुभ चचा पूछ दतू उतस कह [जसक परासवका
इच्छा नहा ॥ २६२ ॥”
अथ तस्य सामिप्रायं ववनमाकर्ण्य पिंगलक आइ- “कि
वक्तुमना भबान् ? तत्कश्यतां यत्कथनीयमस्ति” स प्राह-
“देव ! सञ्जीवको युष्मत्पादानासुपारे द्रोहडाद्विरिति विश्वा-
सगतस्य मम विजन इंदमाह- भो दमनक ! इष्टा मया
अस्य पिंगलकस्य सारासारता तदहमेनं हत्वा सकलमुगा-
पिपत्य त्वत्ताचिव्यपद्वीसमन्वितं कारिप्यामि' इति।पिंगल-
कोऽपि तहजसारभदारसदशं दारुणं वचः समाकर्ण्य मोह-
मुपगतो न किखिदपि उक्तवान् दमनकोऽपि तस्य तमाकार-
मालोक्य चिन्तितवाव् । “अय॑ तावत्सञ्जीवकनिवद्धरागः
तन्तूनमनेन मन्त्रिणा राजा विनाशमवाप्स्यतीति । उक्तथ-
तब उसके अभिप्राय सहित वचनोको सुनकर पिंगळक वोळा,-“तुम क्या
कहना चाहते हो!,सो जो कथंनीय हो सों कहे!?। वह वोळा,-“देव ! संजीवक
आपके चरणोंमें दोहवुद्धि रखता है, यह उसने मेरेकू बिश्वातसे एकान्तमे कहा हे-
“भो दंमनक ! मैने इस पिंगलक राजाकी सारासारता देखी सो मे इसको मारकर
सब सुगोंका आधिपत्य तुझे मंत्रीपद देकर करूंगा ?? । िंगलकमी वह वन्नसा,
रके प्रहारकी समान दारण वचनको सुनकर मोहको प्राप्त होकर कुछभी न
कहता सया,” दमनक उसके आकारको देख व्रिचारने ढगा | “यह तो संजीवक
अनुराग इ, सा अवश्य इस संत्रास राजा नाशका प्रात हारा । कहासी हन
भाषाटीकासमेतम्। (१११)
एकं भूसिपतिः करोति सचिवं राज्ये भमाणं यदा
तं मोहाच्छ्यते मदः स च मदादास्येन निर्विद्यते ।
निर्विण्णस्य पदं करोति हृदये तस्य स्वतन्त्रस्पुहा
सवातन्व्यस्पृह्या ततः स वृपतेः प्राणेष्वपि टुह्यते ॥२६३॥
जिस समय राजा एकही मत्रीको राज्यभे प्रमाण करता हे, तब उसको मोहसे
मद प्राप्त होता है, वह मदसे दास्यतासे विर्वेदताको प्राप्त होता हे, नि्षेदताको
प्राप्त हुए मनुष्योके हदयमें रूतत्रताकी इच्छा प्रवेश करती हे और उस इच्छाले
मत्री राजाको प्राणेसिमी अळग कर देता ॥ २६३ ||
तत् किमत्र युक्तम्” इाति। पिंगलकोऽपि चेतनां समासाद्य
कथमपि तमाह-दमनक ! सभीवकस्तावत् प्राणसमो
मत्यः स कथं ममोपरि ठ्रोहबुद्धि करोति!”। दमनक आइ”
“दव ! सुत्यो मृत्य इति अनेक्तान्तिकमेतत्। उक्तश्च”
सो यहा क्या युक्त हे” ! पिंगलकभी चेतनाको प्राप्त होकर उससे बोला -
“दमनक ! सजीव तो मेरा प्राणोकी समान प्रिय भृत्य हे वह किस प्रकार मेरे
ऊपर दृष्ट्युद्धि होगा”! दमनक वोछा-* देव मृत्य सदा मृत्य नहीं हो सकता ।
कहा है-
न सोऽस्ति पुरुषो राज्ञां यो न कामयत श्रियम् !
अशक्ता एव सर्वत्र नरेन्द्रं पर्य्युपासते ॥ २६४॥ ”
राजाके यहा वह पुरुष नहीं है जो लक्ष्मीकी इच्छा न करे सवत्र भशक्त
होकर पुरुष राजाकी उपासना करते ह॥ २६४ || ”
पिगलक आह-- भद्र ! तथापि मम तस्थोपरि चित्तव्रत्तिन
विकृति याति । अथवा साधु चेदसुच्यते-
पिंगळक बोछा,- भित्र ! तोभी मेरी उसके उपर चित्तट्रत्ति विकारको नहीं
ग्राप्त होती । अथवा ठीक कहा है--
अनेकदोषदुष्टोऽपि कायः-कस्य न वछभः ।
कुर्वन्नपि व्यलीकानि थः प्रियः मिय एब सं; ॥ २६५ ॥”
अनेक दोषोंसि दुषित होकंरमी अपना शरीर किसको प्यारा' नहीं दे जो
सपने संग अनुचित वर्ताब करके प्रिय हो बही प्रिय हैन २६५३?
(११२) पञ्चतन्त्रम् ।
दमनक आह- अत एव अयं दोषः । उक्तश्व-
दमनक बोळा,-“इसीसे तो यह दोष हे । कहाभी है--
यस्मिन्नेवाधिकं चक्षुरारोपयति पार्थिव; ।
अङुलीनः कुलीनो वा स श्रियो भाजनं नरः ॥ २६६ ॥
राजा जिसके ऊपर अधिक क्षपाइष्ट्रि करता हे अकुलीन हो घा कुलीन वह
मनुष्य रूध्मीका मागी होता है ॥ २६६ ॥
अपरे केन शुणविशेषेण स्वामी सञ्जीवकं निर्डेणकमपि.
निकटे धारयति?। अथ देव ! यदि एवं चिन्तयसि महाकायो
यमतेन रिपून् व्यापादथिष्यामि, तदस्मात् न सिध्यति,
गत्तोऽयं शष्पभ्रोजी, देवपादानां पुनः शत्रवो मासाशिनः।
तत रिपुसाधनमस्य साहाय्येन न भवति। तस्मादेनं दूष-
यित्वा हन्यताम्” इति । पिगलक आहः
इस कारण कौनसे गुणसे स्वामी निर्गुण संजावकको अपन निकट धारण
करते हो? सो देव ! यदि ऐसा विचारते हो कि,यह महाकाययान हे इसके द्वारा
झतुभोको मारूंगा सोसी इससे सिद्ध नहीं होता कारण कि, यह घासमक्षी और
श्रावानके चरणशत्रु मांसभक्षी हें सो इसकी सहायतासे शत्रु साधन नहीं हो
सकता है सो इसको दूषित कर मारिये'' | पिंगलक बोळा-
“उक्तो भवति यः पूर्वे शुणवानिति संसदि !
तस्य दोषो न वक्तव्यः प्रतिज्ञाभंगमीरूणा ॥ २६७॥
“यह युणवान् हे समामे जिसके लिये ऐसा कहा हे प्रतिज्ञाके भंगसे डरते-
वालेको उसके दोप कहने उचित नहीं हैं | २६७॥
अन्यन
और भी-
मया अस्य तव वचनेन अभयदान दत्तम् । तत्कथं
स्वयमेव व्यापादयामि । सदया सञ्जीवकोऽयं खुहृदस्मा्क.
न तं प्राति कश्चित् मन्युरालि । <क्तश्व-
मैंने तो तरे वचनपे इसको अम दिया है कि' कत स्वयं इसको मारू। सव
प्रकार यह सजीवक सुहृत हे हमारा कुछमी उस पर क्रोध नहीं ६। कहा है कि-
भाषाटीकासमेतम् । (११३)
इतः स॒ दैत्यः प्राक्तश्रीनेंत एवार्हति क्षयम्।
विषवृक्षोञ्पि संबद्ध स्वयं छेत्तमसाम्प्रतम् ॥ २६८ ॥
( तारकसुरसे पीडित उसके वधार्धी देवतां प्रति ब्रह्माका वचन है ) कि,
बह दैत्य मुझसे ऐश्वर्य प्राप्त कर चुका है वधके योग्य नहीं हे कारण कि, स्त्र
बढाया हुआ विपद्गक्षमी ( भाप ) नही काठाजाता | २६८ ॥
आदो न वा प्रणयिनां ्रणधो विधेयों
दत्तोऽथवा प्रतिदिन परिपोषणीयः ।
उत्क्षिप्य यत्क्षिपति तत्रकरोति लां
भूमौ स्थितस्य पतनाद्भयमेव नास्ति ॥ २६९ ॥
प्रथम तो प्रणयिजनांको प्रणय ( प्रेम) नहीं करना चाहिये और करे तो
किर प्रतिदिन उसका पालन करे जो करके छोडा जाता हे षह छना करताहे
कारण कि, पृथ्नीमे स्थितको गिरनेका भय नही हे ॥ २६९ ॥
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को शणः ।
अपकारिऽ यः साधुः स साडः सद्धिसच्यते ॥ २७० ॥
जो उपकारियोंका भछा करता है उसके उपक्ारीपनमें क्या गुणहे जो अप-
कारियोमें साच है सखुरुपोने उसीको साधु कहा हे || २७० |
तद्रोहबुद्वेरपि मथा अस्य न विरुद्धमाचरणीयम्’ ।
| दमनक आह-स्वामिन् ! नेष राजधर्मो यहोदहबुद्धेरपि
क्षम्यते उक्तः
सो इस द्रोहबुद्धिपरभी में विरुद्ध आचरण नहीं करूंगा” | दमनक बोला,--
“'चामिन् | यह राजवा नही है कि, द्रोहवुद्धिको क्षमा किया जाय! कहामी है-
तुल्यार्थं तुल्यसामथ्ये ममेज्ञं व्यवसायिनम् ।
अङद्धेराञ्यहरं भृत्यं यो न हन्यात्स हन्यते ॥ ३७१ ॥
तुस्यधन, तुल्य सामय, मर्म जाननेवाळे उद्योगी अर्धराज हरनेवाळे मृत्यको जो
“नहीं मारताहे वह मारा जाता हे ॥ २७१ ॥
अपरं त्वया अस्य सखित्वात सबॉऽपि राजधर्मः परिः
त्यक्तो राजधर्माभावात सोऽपि परिजनो विरक्तिं गतो यह
८
पि
(११४ ] ' सञ्चतन्त्रम्। `
/ सञ्जीवकः शप्पमोजी, अवान् मांतादः तब प्रकृतयश्च ।
यत्तव अवध्यव्यवसायबाद्यो कुतस्तासां मांसाशनम् । यद्र-
हितास्ताः त्वां त्यक्का यास्यन्ति । ततोऽपि त्व॑ विनष्ट एव
अस्य सङ्गत्या पुनस्ते न कदाचित आखेटके मतिर्मवि-
ष्यति । उक्तश्च-
ओर आपने तो इसको मित्रतासे सम्पूर्ण ही राजधर्म व्यागन करदियाहे | राज-
'घमके अभावसे सम्दृणे परिजन विरक्त होकर गये, जो यह संजीवक तृणमोजी
आप मांतभक्षी भोर आपके प्रकृति ( कुटुम्ब ) भी, जो कि अव मांस भक्षण
तुम्हरे पराक्रमसे वाह्य होगया ( तुम उद्योग नहीं करतेहो ) तो फिर बह मांस
कहासे खायँगे इसकारण वे तुमको व्यागन कर चलेजायँगे । इसीसे तुम विनष्ट
होगे । इसकी संगतिस तुम्हारी आखेटमें कमी बुद्धि नहीं होगी । कहाहे-
याइशाः सेव्यते शृत्येर्घाहशांश्वो पसेवते ।
कदाचिन्नात्र सन्देहस्तादम्भवति पूरुषः ॥ २७२॥
जब जो जेते मृत्पोंसे सेबन किया जाता है वा जो जेसोंको सेवन करता है
इसमें सन्देह नही वह पुरुप घेसाही होजाताहै ॥ २७२ ॥
तथाच
जञैतेही- ,
सन्तप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते
मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपत्रस्थितं राजते .!
सवातो सागरशुक्तिक्कक्षिपतितं तज्ञाथते मोक्तिकं
येणा धममध्यमोत्तमशुणः संवासतो जायते ॥ २७३ ॥
तपेइए छोहेपर पडेहुरे जळका नाममात्रभी नहीं :विदित होता हे और
जही कमळपत्रके ऊपर मोतीके आकारम स्थितहुआ शोमा पाता हे, स्वा-
तिनक्षत्रमें सागरम सोपीमें प्रवेशकर वही मोती होजाता है, प्रायः संगतिसे -
अधम; मध्यम, उत्तम गुण होजाते ईं ॥ २७३ | -
तथाच=.
और देखो--
॥
भाषाटीकासमेत्तम् । (११५)
असतां संगदोषेण साधवो यान्ति विक्रियाम् ।
दुग्योधनमसंगेन भीष्मो गोहरणे गतः ॥ २७४ ॥
अपतत् पुरुषोंकी सगतिके दोषल महात्मामी बिकारको प्राप्त होते हैं, दुर्यो-
ध्री सगतिसे भीष्म गोहरनेकों गयेथे ॥ २७४ |
अत एव सन्तो नांचसङ्ग बजयान्त । उक्तश्व-
इसीकारण महात्मा नीच संगति नहीं करते हैं । कहा दै.
(जा हाविज्ञातशीलस्य प्रदातव्यः प्रतिश्रयः। |
मत्कुणस्य च दोषेण हता मन्दाविसपिणी ॥ २७५ ॥”
जिसका झीछस्त्रभाष न जावा हो उसे आश्रय नदे खटमळके दोषसे मन्द्-
बदिसर्विणी मारीगई ॥ २७५ |”
पिगलक आह-“कथमेतत् ?? सोःवीत--
पिंगलक वोरा,-“'यह केसी कथा है ?? घह बोळा-
कथा ९. ,
अस्ति कस्यचिन्महीपतेः कस्मिश्वित स्थाने मनोरमं
शयनस्थानम् । तत्र शुक्कतरपट्युगलमध्यसंस्थिता मन्दवि-
सर्पिणी नाम शेता यूका प्रतिवसति स्म। सा च तस्य मही-
पते रक्तमार्शादयन्ती सुखेन काळं नयमाना तिष्ठति ।
अन्थेश्चुश्च तच शयने कचिइभ्राम्यन् अभ्रिमुखोनाम मत्कुणः `
समायातः । अथ ते दृष्टा सा विषण्णवदना प्रोवाच- मो
अस्निसुख ! कुतस्त्वमत्र अतुचितस्थाने समायातः * तद्यावत्
न कश्चिद्वेत्ति तावच्छीघ्रं गम्यताम् 'इति । स आह-“ भग
बात ! ग्रहागतस्प अ्ताधाराष नतद्यज्यत चकम् । उत्तश्च--
किसी राजाके किसी स्थानमें मनोहर शपनस्थानहै वहा अत्यन्त शुक्ल बल्लमें
सदविसपिणी नाम सेत जे रहती थी वह उस राजाका राधेरपान करती हुई
सुखसे समय वितातीयां । दूसरे दिनम उस शयनपर नमता हुआ आमिमुख-
नाम खटमळ आया | उसे देखकर दुःखी हुईं षह ज्ञ वोढी,- भो अम्निमुख !
चुम केसे अनुचित स्थान आयं हां ! सो जबतक कोई नहीं जाने, तबतक
१ देखो विरारपर्य |
(११६) पञ्चतन्त्रम् ।
शीघ्र जाओ” | वह दोळा,-''बगवति ! घरमै जाये असाधुसेमी कोई ऐसा
नहीं कहताहे । कहाहे- |
एह्यागच्छ समाश्वसासनमिदं कस्माविरादृश्यसे
का वार्तान्वतिइबलोऽसि कुशल प्रीतोऽस्मि ते दर्शनात् ।
एवं नी'चजनेऽपि युज्यति गृहं प्राते सतां सवदा
धर्मोऽयं एहमेधिनां निगदितः स्मात्तैलेघुः स्वगद्ः ॥२७६॥
यहां आभ, यह सुन्दर आसनहे, बहुत दिनोंमे देखा, कहां थे, क्या बात
हे, बहुत कमजोर होगये, कुराळ है ? हम आपके दरशेनस प्रसनहए, इस प्रकार
सत्पुरुष नीचके प्राप्त होने मी कहा करते हं यह गृहस्थी स्मृतिकारोंका रवर्ग
देनेवाला सामान्य धर्म हे॥ २७६ ||
अपरं मया अनेकमाहुषाणामनेकविधानि रुधिराणि
आस्वादितानि आहारदोषात कटुतिक्तकपायाम्लरसास्वा-
दानि न च मया कदाचिम्मञ्ुररक्तं समास्वादितम् । तद्यदि
त्वं प्रसादे. करोषि तदस्य नृपतेविविधव्य्जनान्नपानचोप्यः
लेहास्वाद्ाहारवशादस्य शरीरे यत् मिष्टं रक्तं सञआतं तदा-
स्वादनेन सोख्यं सम्पादयामि जिह्वया इति । उक्तश्च-
. मैने अनेक मनुष्योंके अनेक विधि रुघिर जास्वादन किये हैं । आहार
दोषसे कटु, तिक्त, कषेळे अम्क रसका आस्वाद देखा, परन्तु मैंने कमी
मधुर रसका आस्वादन नहीं किया । सो यदि तू प्रसन्नता करे तो इस राजाके
विविध अन्नपान चोष्य लेल्य स्वादु आहारके बशसे इसके शरीरमें जो मीठा
रस हे उसके आस्तादनसे जिह्वाका सौख्य सम्पादन करूंगा | कहाहै-
रङ्कस्य नृपतेवापि जिद्टासौर्षं समं स्छृतम् ।
तन्मात्रश्च स्मृतं सार यदथ यतते जनः ॥ २७७ ॥
रंक ( कंगाळ ) भौर राजाको जिह्वाका सीख्य समान काहा है, जिसके
सिमित्त मनुष्य यत्न करता है वही इसमे सार है ॥ २७७ [|
यश्चेबं न भवेछोके कमे जिल्वामतुष्ठिद्स ।
तन्न भ्हत्यो भवेत्काश्चित्कस्यन्चिद्ठशागोऽथवा ॥ २७८॥
माषाटीकासमेतम्। (११७)
Le]
जो जिहाकी तुष्टि देनेवाळा कर्म छोकमे नहो तो कोई किसका मृत्य चा
वशीभूत न होता ॥ ९७८ ॥
यदसत्यं बदेन्मत्यो यद्ठासेव्यश्च सेबते |
यद्गच्छति विदेशञ्च तत्सर्वसुदराथतः ॥ २७९॥
जो मनुष्य असत्य कहता है वा असेब्यको सेबन करता है वा जो बिदेशको
जाता है वह सब उदरहीके निमित है ॥ २७९ ॥
तत् मया गृहागतेन बुघ्ुक्षया पीयमानेन त्वत्सकाशाद्धो-
जनमर्थनीयं तन्न त्वया एकाकिन्था अस्य भूपतेः रक्त
भोजनं कु युज्यते'! । तछत्वा मन्दविसर्पिणी आइ- भो
मत्कुण | अहमस्य तृपतेनिद्रावशं गतस्य रक्तमास्वादयामि,
पुनस्त्वम् अभिसुखः चपलश्च, तत् यादि मया सह रक्तपानं
करोषि तत्तिष्ठ । अभीष्टतरं रक्तमास्वादथ’ । सोऽब्रवीत्,
“'ग्रगवति ! एवं करिष्यामि, यावत्वं न आस्वादयसि प्रथमँ
नूपरत्त तावत् मम देचशुरुकृत्तः शपथः स्थाद् यदि तत् आ-
स्वादयामि? । एबं तयोः परस्पर वदतोः स राजा तच्छयन-
मासाद्य प्रसुतः । अथ असो मत्कुणो जिद्दालौह्यप्रकृष्टोत्सु-
क्यात् जाम्नतमपि त महीपतिमदशत् । अथवा साधु
चेदसुच्यते-
सो घरमै आये हुए भूखसे पीडित मुझे आपसे केवळ भोजनकी इच्छा है,
सो इकलेही तुमको इस राजाका रक्त भोजन करना मुनासिब नहीं हे” । यह
सुनकर मन्दविसर्पिणी बोली ,--' 'भो खटमळ ! में निद्राको प्रात इए इस राजाका
ee
रक्तपान करती हू तू अमिमुख और चपल है, सो यदि मेरे लाथ रक्तपात
>
he _ he
करेगा तों स्थितहो, यथेष्ट रक्तको आस्वादन करना? । वह बोळा-"मगवति !
एसाही करूगा, जबतक तू पहले राजाका रक्त नहीं आस्वाटन "करेगी, तवतक
मुझ देव गुरुकी शपथ है, यदि में आस्त्रादन करू” । इस प्रकार उन दोनोके
परस्पर कहनेमे वह राजा खाटपर आनकर सोगया । तब यह खटमछ जिह्याकी
चचछता और बडी उत्कठासे जागते ही इए उस राजाको झाठता भया |
अथवा सत्य कहा है--
(११८) पञ्चतन्त्रम् ।
स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कघुमन्यथा ।
सुतप्तमपि पानीयं पुनर्मच्छाति शीतताम् ॥ २८०॥
उपदेशसेही कोई किसीका स्वमाव अन्यथा नहीं कर सकता है तणया
डुआमी पानी फिर शीतल होजाता है || २८० |
यदि स्याच्छातलो बहिः शीतांशुदहनात्मकः ।
न स्वभावोऽत्र मर्त्यानां शक्यते कतुमन्यथा ॥ २८१ ॥
चाहे आमि शीतळ होजाय, चन्द्रमा जलाने ठगे, तथापि मनुष्योक्ता स्वभाव
hl
कोई अन्यथा नहीँ कर सकता हे ॥ २८१ ॥
अथ असो महीपतिः सूच्यग्राविद्ध इव तच्छयनं त्यक्ता
तत्क्षणादेव उत्यितः । “अहो ! ज्ञायतामच घच्छादनपटेः
मत्कुणो _ यूका वा नूनं तिष्ठाति येन अहं दष्ट इति? । अथ
ये कञ्ज्चाकिनस्तन स्थितास्ते सत्वरं प्रच्छादनपटं गृहीत्वा
सूक्ष्मदष्टया वीक्षाचक्कतः । अनन्तर स मत्कुणः चापल्यात
खट्टान्त नावष्टर सा मन्दाज्न्सापणा आप वच्छसन्ध्यन्तगता
तेरा व्यापादिता च, !अतोऽहं ब्रवीमि, “न ह्यविज्ञातः
शीलस्य इति । एवं ज्ञात्वा त्वया एष वध्यः । नो चेत् त्वां
व्यापाद्थिष्याति। उत्तश्च-
तब यह राजा सूचीके अग्र भागकी समान विद्ध हुआ खाट छोडकर
उसी समय उठ्बेठा । “अहो | देखो तो इस चादरमें खटमळ वा ळी जू
अवश्य है जिसने मुझे काटलिया” । तत्र जो कंचुकी वहां रिथत थे वह बहुत
शीघ्र चादरकों के सूक्ष्म दृष्टिसे देखने लगे । इसी समय वह खटमछ चपछतासे
खाटके नीचे गया और मन्दाबसर्पिणी व्क सळबटमें बेठी हुई उन्होने देखी
और मारडाली, इससे में कहता हूं ” जिसका शीळ स्वभाव न देखाहो उसे न
टिकावे”? । ऐसा जानकर तुम्हे इसको मारवा ही उचित हे, नहीं तो यह आपकी
मार डाळेगा । कहा हे-
त्यक्ताश्चाभ्यन्तरा थेन बाह्याश्चाभ्यन्तरीङ्कताः ।
स एव मृत्एुमाम्रोति यथा राजा ककुद्दुमः ॥ २८२॥''
भाषाटीकासमेतम्। (११९)
जिसने आम्यन्तर जनोको त्याग दियाहै और बाहरी जनोंको अम्तरगमे
लिया है वह ककुदूदुम राजाको तरह नाझ होजाता हे॥ २८२ ॥"
पिड्लक आह-''कथमेतत् !?” सोऽत्रवीत-
पिंगळक बोळा,-“'यह केसी कथा १? बह बोला-
कृथा 9०,
करस्मिंश्चित वनप्रदेशे चण्डरवो नाम शृगालः प्रतिवसति-
स्म | स कदाचित् क्षुधाविष्टो जिहालोल्यात नगशान्तरे
प्रदिष्टः । अथ तं नगरवालिनः सारमेया अवलोक्य सर्वतः
शब्दायमानाः परिधाव्य तीक्ष्णदेष्राम्रेलाक्षिठमारब्धाः ।
सोऽपि ते्भक्ष्पमाणः प्राणमयात् जत्यासन्नरजकगण हैं त्रबिष्टः ।
तत्र च नीलीरसपरिपूर्णमहाभाण्डं सजीकृतमासीत् । तत्र
सारमेयेराक्रान्तो भाण्डमध्ये पातितः। अथ यावत् निष्क्रान्तः
स्तावन्नाळावणः सखातः । तन ऊपर सारमयास्त श्रृगालः
मजानम्तो यथाभीष्टदिशं जश्छुः चण्डर्घोऽपि दूरतरं भदेश-
मासाद काननाभिघुखं प्रतस्ये न च नीलवर्णेन कदाचित
निजरङ्गस्त्यञ्यते । उक्तश्व-
करिसी वनके निकट चण्डरव नामवाळा श्रगाळ रहतावा बह कमी भूखसे
व्याकुळ हुआ जिह्वाके लाळचसे नगरान्तरमे प्रविष्ट भया । तब उसे नगरके रहने-
बाळे कुत्ते देख सब सरसे भोंकते हुए दोडे और तीक्ष्ण डाहोसे खाने लगे)
वहृभी उनसे काटा हुआ प्राणमयसे निकटके घोवीके धरने घुसगवा बहा नीछके
रसे पूर्ण महापात्र (नाद) तयार खखीथी । सो कुचोसे भाक्रात इभा उस माण्डमें
पिरपडा | जब उसमेंले निकला तो नीळा होगया तब कुत्ते उसको गीदड़ न
जानकर यथेष्ट चळ गथ | चण्डरबपी दूरदेशको प्राप्तहो वनके सन्मुख चछा,
नीलवर्ण कभी त्यागा नहीं जाता हे । कदादे-
वद्वलपस्य मूर्खस्य नारीणां कर्कटस्य च!
एको अहस्तु मीनानां नीलीमद्यपयोयथा ॥ २८३ ॥
चज़ळेप मूर्ख, नारी और कर्कट ( कुडीरक ) और मछली इनका नीळ और
मद्यपान करनेवालेकी समान एकही भाग्रह हे ( वन्न छेपकी कदाचित् मुक्ति
(१२०): पञ्चतन्त्रम्। ` `
होजाय-परन्तु कर्कटमीनके दांतसे ग्रहण करनेसे तथा नीलवणके संगमे मुक्ति
कठिन हैं ) ॥ २८३ ॥
अथ तं हरगलगरलतमालसतमघभमपूर्व' सत्वमवलोक्ध-
सर्वे सिंहव्याघट्वी पिद्कप्रभूतयोऽरण्यनिवासिनो भयव्याछु-
लितचित्ताः समन्तात् पलायनाक्कियां कुवन्ति, कथयन्ति च
“न ज्ञायतेऽस्य-कीदर्विचेष्टितं पोरुषश्व । तदरतरं गच्छामः
उक्तश्च -
तव उसको शिवजीके गळेकी विषको समान कान्तिमान् अपूमै जीव देखकर
सब सिंह व्याघ्र भेंड वनवासी भयते व्याकुळ हो सब्र ओरसे पछायन करने
लगे और कहने छगे,--'नहीं। जानते इसको केसा चेष्टा भोर पराक्रम है सो
दूरचलें | कहाहै-
न थस्य चेष्टितं विद्यान्न कुलं न पराक्रमम् ।
न तस्य विश्वसेत्माज्ञो यदीच्छेच्छरियमात्मनः ॥ २८४ ॥
जिसके चेष्टा कुल पराक्रमको न जाने यदि अपना मंगळ चाहे तो बुद्धिमान्
उसका बिश्वास न करे ॥ २८४॥
. चण्डरदोऽपि तान भयव्याकुलितान् विज्ञाय इदमाह-
“भोः भोः श्वापदाः ! कि यूयं माँ ृष्ट्रेव सन्त्रस्ता व्रजथ ? तन्न
भेतव्यम्, अहं ब्रह्मणा अद्य स्वयमेव रुष्ट्राभिदितः- यत श्वाप-
दानां मध्ये कश्चिद्राजा नास्ति, तत्त्वं मया अद्य सर्वेश्वापद-
प्रभुत्वेऽमिषिक्तः ककुद्दुमामिधस्ततों गत्वा क्षितितले
तान् सर्वान् परिपालय’? इति-ततोऽहमचागतः । तन्मम
छत्रच्छायायां सवेरे श्वापदेवतितव्यम् । अहं ककुदडुमो
नाम राजा नेलोक्थेऽपि सञ्जातः? । नच्छत्बा सिहव्या-
घ्रपुरश्सराः श्वाषदाः- स्वामिन् ! प्रभो ! समादिश”
इति बइन्तस्तं परिवछ्ुः । अथ तेन सिंहस्य अमात्यपदवी
अदत्ता, व्याप्रस्प शय्यापालत्बं, द्वीपिनः ताम्बूलाधिकारो,
वृकस्य द्वारपालकत्वम्, ये च आत्मीयाः शृगालाः तेः सह
आलापमात्रमपि न करोति । श्रगालाः सर्वेऽपि अद्भचन्द्र
भाषाटीकासमेतम् । (१२१)
दत्वा निःसारिताः । एवं तस्य राञ्याऋयार्या वर्तेमानस्य
ते सिंहादयो मृगान् व्यापाद्य तत्युरतः प्रक्षिपन्ति। सोऽपि
| प्रथुधमण सवषा तान् प्रावभज्य प्रयच्छति । एवं गच्छाते
काल कदाचित तन सभागतन दरडंशे शब्दायमानस्य त
गालबृन्दस्प कोलाहलीउश्रावि। ते शब्द श्रत्वा पुलकिततबु
आनन्दाश्चपारपूणनयनः उत्याय तारस्वरण पवराइमारन्ध"
वान्। अथ ते सिंहादयस्तं तारस्वरमाकण्यं शृगालोऽयमिति
मत्वा सलजमधोमखाः क्षणमेर्क स्थित्वा मिथः प्रोचुः-भो
वाहिता वयमनेन क्षुद्रश्रगालेन तद्वध्यताम्” इति ! सोऽपि
नदाकण्यं पलायिठुमिच्छन् तत्र स्थाने एव सिंहादिभिः
खण्डशः कृतो मृतश्च। अतोऽहं ब्रवीमि “त्यक्ताश्चाभ्यन्तरा
ग्रेन!' इति!
चण्डरबभी उनको भयसे व्याकु” जानकर यह व्रोळा-"मो मो जीबो !
क्यों तुम मुझे देखकर सब ओरको भागे जाते हो २ सो मतडरो, ब्रह्माने आज
स्पयही सुझको निर्माणकर कहा है कि,- श्वापदोंके मध्यें कोई राजा नहीं है,
सी तुझे मेने आज सब जीवोके भाधिपत्यमें अभिषिक्त किया है, ककुटूटटम तेरा
नाम है, सो जाकर एव्वीपर सबकी पालना करना,” इस कारण में आया
सो मेरी छत्र छापार्म सम्पूण बनके जीर्वोको बतेना चाहिये । में ककुद्डुम राजा
त्रिळोकीका भधिपतिह । यह खु सिंह व्याघ्रादिजीव स्वामिन् । प्रमो ! भाज्ञादी
ऐसा सब ओरसे कहने छगे ! तत्र॒ उसने सिंहको अमात्य पटवी दो, व्यात्रक्षा
ठय्यापाळक, गेंडेको ताम्बूळाधिकारी, भे्थिंक्रो द्वारपालक दिया भौर जो
अपनी जातिके &गाळ थे उनसे वातीसी नहीं काता, सब श्रगाळ गळवाही
देका! विज्वाले गये, इस प्रकार उसके राजक्रियामें वतमान होनेते वे सिंहादिक
मृगोको मारकर उसके आगे फेंकतेथ और वहमी प्रभुधर्मते उन सबको विभाग
कर उनके आगे डाळता । इत प्रकार समय बीतनेपर कभी उसने आये हुए
दुर देशमे शब्द करनेवाछे शगाळसमूहका शब्द सुना । उस शब्दकों सुन
पुलकित शरीर भक्रुपरणचेत्र होकर उठ ऊचे स्वरसे शब्द करना आरमाकिया ।
तव वे सिंहादिक उसके उच्च सरका जानकर “भरे ! यह श्रगाळ है” ऐसा
(१२२) पञ्चतन्त्रस् ।
जानकर ठजासे नीचा मुखकर एकक्षण स्थित हो परस्पा बोले," मो ! इस
क्षुद्र श्रगाळते हमको ठगढिया, सो इसे मार डाळों,”” षह भी यह वचन सुन
भागनेकी इच्छा करता हुआ उस स्थानमै सिंहादिसे ठुकडे किया हुआ मरगवागी
इससे भें कहता हूं “जिसने आम्पन्तर त्याग दिये है इत्यादि! -
` तदाकण्थ पिंगलक आह- मो दमनक ! कः प्रत्ययोत्र
विषये यत् स ममोपार दुष्टब्राद्धि” । स आइ,- “यद्यय ममाग्ने
तेन निश्चयः कृतो यत्मभांत पिंगलर्क वधिष्यामि तदचेव
प्रत्घयः। ्रभातेऽवसरबेलायाम् आरक्तम्ुखनयनः स्फुरिताधरो
दिशोऽवलोकयन अवुचितस्थानोपविष्टस्स्वां ऋरहड्ठया वि-
लोकयिष्धाति । एवं ज्ञात्वा यदुचितं तत्कर्तव्यम् ? इति ।
कथांघत्वा सश्रीवकसकाशं गतः । तं मणम्य उपविष्टः,
सञ्जीवकोऽपि सोद्वेगाकारं मन्दगत्या समायान्तं तसुद्वीक्ष्य .
साद्रतरमवाच,- मो मित्र | स्वागतम, चिराइष्टोऽसि,
अपि शिव मवतः ? तत्कथय येनादेयमपि तुभ्यं गृहागताय
प्रयच्छामि । उक्तश्व-
यह सुनकर पिगलक बोळा,-““मो दमनक ! इसमें क्या प्रमाण हे कि, वह
मेरे ऊपर दुष्टबुद्धि हे” वह बोळा-“कि आजही मेरे आगे उसने निश्चय
किया है कि, प्रातःकाळ पिंगळकको मारूंगा, यही इसमें प्रमाण ६ । प्रातःकाठ
आपके पास आनेके समयमें लाळ मुख नेत्र किये स्फुरायमान अधर इधर उधर ,
देखता अनुचित स्थानमे बैठा तुमको कूर इष्टिते देखया । ऐसा जानकर
जो उचित हो सो करो?' यह कह सजीवकके निकट गया, उसको प्रणाम कर
बैठा । संजीवकभी उद्वेगके आकार मन्दगतिसे जाते हुए उसको देख आदरते
बोळा,-““भो मित्र ! तुमको चिरकाळमें देखा कुशळ तो हो ? सो ब्दो जिससे '
अदेय वस्तुभी तुम घरमै आये हुएके निमित प्रदान करू । कहाहै-
ते धन्यास्ते विवेकज्ञास्ते सभ्या इह भूतले ।
आगच्छान्ति गृहे येषां काय्योर्थ सुहदो जनाः ॥ २८५ ॥"
वे धन्य, येही विवेकज्ञ, सम्य इस भूतलमें है जिनके यहां कार्यार्थी बुद्द
[a त्म “< ११
जत नित्य आत हैं | १८५ |
भाषाटीकासमेतम्। (१२३)
दमनक आह-भोः ! कथं शिवं सेबकजनस्प ।
दमन वोला-“भो सेवक जनोको कुशळ कहा |
सम्पत्तयः परायत्ताः सदा वित्तमनिर्वतम ।
स्वजीबितेऽप्याविश्वासस्तेषां ये राजसेवकाः ॥ २८६॥
सम्पति पराये आधीन, चित्त अशान्त, अपने जानिमेंभी उनको अविश्वास रहता
हे जो राजसेवक हैं॥ २८६ |
तथाच-
भोरमी-
सेवया धननिच्छाद्वेः सेवकैः पश्य यत्कूतम् ।
स्वातरूयं यच्छरीरस्य सृटेस्तदपि हारितम ॥ २८७॥
सेवासे धनका इच्छा करनेवाळे सेवओोने जो किया हे सो देखो कि शर्ररेकी
जो स्वतत्रता थो सोमी मूर्षांचे नष्ट करदी ॥ २८७ ॥
तावज्नन्मातिदुःखाय ततो दुर्भतता सदा ।
तत्रापि सेवया वृत्तिरहो ढुःखपरस्परा ॥ २८८ ॥
प्रथम तो जन्मही ढु खके निमित्त फिर दारेद्रता फिर उप्तमें सेवाशत्ति अहो
ढु'खकी परम्परा हे | २८८ ||
जीवन्तोऽपि मृताः पश्च श्रूयन्ते किछ भाशते ।
दारिद्रो व्याधितो मूर्खः प्रवासी नित्यसेवकः ॥ ६८९ ॥
महाभारत पाच जीते हुए मरे सुने गये है दरिट्र, रागी, मू, प्रबासी और
नित्य सेवक ॥ २८९॥
नाश्नाति स्वेच्छयोत्छुक्याद्विनिङ्रो न प्रधुध्यते ।
न निःश्ड बची बूते सेवकोऽप्यत्र जीवाति ॥ २९० ॥
उत्कदित रहनेसे रच्छासे नहीं खाता ( प्रमुके मयसे ) विनिद्र होकर मी
नहीं जागता निरशक ब्चन नहीं बोलता क्या सेवकभी जीताहे || २९० |
सेवा श्ववत्तिराख्याता येस्तेमिथ्या प्रजल्पितमू ।
स्वच्छन्द चरति श्वात्र सेवकः परशासनात् ॥ २९१ ॥
जिन्होंने सेवा श्वव्वत्ति ( कुत्तेकी गति ) कहाँदे उन्होंने मिव्याजल्पना की है
उत्ता स्वच्छन्द फिरता हैं और सेवकका फिरना आज्ञासे हैं॥ २९१ ॥
(१२४) पञ्चतन्त्रम्।
भूशय्या जह्मचय्येच्व कृशत्ब लब॒भोजनम !
सेवकस्य यतेयेद्वदविशेषः पापधम्मेजः ॥ २९२ ॥
पथ्वी में शव्या ब्रह्मचर्य कृशता ङघुमोजन सेवकका यतिकी समान होतोई
अन्तर यह है सेवकका पापके निमित्त है यतिका धर्मके निमित्तदै ॥ २९२ ॥
शीतातपादिकष्टानि सहते यानि संवकः
धनाय तानि चाल्पानि यदि धमान्न सुच्यते ॥ २९३ ॥
शीत गरमी मे कष्ट जो सेवक धनके निमित्त सहन करताहे वह कष्ट भब्प होते
यदि वह धमेसे न छूटता ॥ २९३ |
सदुनापि सुकृतेन झुिष्टेनापि हारिणा ।
मोदकेनापि कि तेन निष्पात्तियस्थ सेबया ॥ २९४ ॥'?
बड़ मधुर गॉल मताहर उस CEE] भा क्याइजा सवा करवत गात
होताहे ॥ २९४ |!”
सञ्जीवक आइ- अथ भवान् कि वक्तुमनाः ?) सोऊ'
वीत- भित्र ! सचिवानां मन्त्रभेदं कर्ख न युज्यत ।
संजीवक बोळा,-“तो तुम क्या कहना चाहते हो?” वह बोला, मित्र ! मंत्रि
योको मंत्रभेद करना मुनासिव बही ।
उक्तश्च
कहाहे-
यो मन्त्र स्वामिनो मिन्द्यात्साचिव्ये सन्नियोजितः ।
स हत्वा नृपकार्थ तत्स्वयश्च नरकं ब्रजेत् ॥ २९५ ॥
जो मन्त्रीकी पदचीम स्थित मंत्री मत्रमद करद वह राजक कायका
नष्ट करके खयं नरकको जाता हे॥ २९५ ॥
येन यस्य कृती भेदः साचिवेन महीपतेः ।
तेनाशस्त्रवधस्तस्य कृत इत्याह नारदः ॥ २९६.॥
जिस मंत्रीने राजाका मंत्रभेद करादिया है उसने राजाका विनाही राल्नफे वध
किया यह नारदजी कहते हैं ॥ २९६ ॥
तथापि मया तव स्लेहपाशबद्धेन मन्त्रभेदः कृतः । यत-
स्त्वं मम वचनेनात्र राजकुले विश्वस्तः प्रविष्टश्व । उक्तव-
भाषारीकासमेतम्। (१२५)
0) आ
तोमी मैंने तुम्हारे खेहके पाशबद्ध होनेके कारण मत्रभेद किया है, क्योंकि
तुम मेरे धचनसे इस राजकुलमें प्रविष्ट हुए हो | महा हैन -
(.विश्रम्माद्यस्य यो मृत्युमवाभोति कथश्चन !
तस्य हत्या तदुत्था सा प्राहेदं वचनं मनु; ॥ २९७ ॥
जिसके विश्वाससे जो कोई मृत्युको किर्साप्रकार प्राप्त होताहे उसकी हत्या
उसीको लूगतीहै, यह वचन मनुजीने कहा हे ॥ २९७ ॥
तत् नवोपारे पिङ्गलकोऽयं दुष्टबुद्धि! । कथितं च अश्च
अनेन मत्पुरतश्रतुष्कर्णतया “यत्मभाति सञ्जीवर्क हृत्वा सम-
\तमृगपरिवारं चिरात् तृप्ति नेष्यामि? । ततः स॒ मयोक्तः
र स्वामिन् ! न युक्तमिदं यन्मित्रद्रोहिण जीवनं क्रियते ।
उक्तव्व-
सो तुम्हार ऊपर यह पिंगळक दुष्टबुद्धि हे भाज इसने मेरे आगे चारकर्णसे
ऊहाथा ( अबीत् में और वह ) कि, “प्रभात सर्जावकको मारकर समस्त
'पगपरिवारको चिरकाङतक तृप्त करूगा” तव उससे मैंने कहा-“स्वामिन् !
पह युक्त नहीं कि, जो मित्रद्रोहे जीवन किया जाय । कहाहै-
अपि ब्रह्मवर्ध कृत्वा प्रायाश्वित्तेन शुध्यति ।
तद॒दँण विचीर्णेन न कथवित्खहददरहः ॥ २९८ ॥
५. नहवषकर उसके योग्य विज्ञप भनुष्टानका प्रायक्षित्त करनेसे बुद्ध होजाता
है पर मित्रद्रोही शुद्ध नहीं होता ॥ २९८॥
, ततस्तेनाहं सामपेंणोक्तः-“भो दुष्टबद्धे ! सञ्जीवकस्तावत
शष्पभाजा, वय मासाशनस्तदस्माक स्वाभावक वरामोते
कथं रिपुरुपेक्षते। तस्मात् सामादिभिरूपायेहन्यते । न च
हृते तस्मिन् दोषः स्यात् । उक्तश्व~
तब उसने मुझसे ऋधकर कहा,- मो दुष्टबुद्धे ! सजीचक तो घासखामे-
| रेगे, हम मास खानेवाळे सो हमारा उससे समाविक वेरहे कयो रिपुकी उपेक्षा
“करै | इम कारण सामादि उप!यॉसे मारतेहँ, इसके मारनेमें दोप नहीं | कहाहै-
दत्त्वापि कन्यकां वेरी निहन्तव्यो विपश्चितः ।
अन्योपायेरशक्यो-यो हते दोषा न विद्यते ॥ २९९ ॥
के
(१२६) पश्चलन्तम्।'
जो शत्रुको अन्य उपायोंसे नहीं मारसके तो अपनी कन्या देकर भी
मारे क्योकि, उसके मारनेमे दोष नहीं अथीत् किसी प्रकारसेमी शुका मारन
दाषकारक नहा ह ॥ २९९ ||
कृत्याकृत्यं न मन्येत क्षत्रियो यांचे सङ्गतः।
प्रसुप्तो द्रोणपुत्रेण घृष्टञ्स्रः पुरा हतः ॥ ३०० ॥”
युद्ध कस्नेको तेयार हुवा शूरवीर युद्धमें कर्तव्य: और भकतंव्यका विचार
न करे सोही कहते हैं कि, देखो पू्वकालमें दरोणाचार्यके पुत्र मश्चत्थामाने सोता-
इभा भी धृष्टयुन्न मारडाळा ॥ ३०० |
तदह तस्य नश्वय जञात्वा त्वत्सकाशमिहागतः । साम्प्रतं |
जे नर्त ।वश्वादघातकदाष; । मया झछशतमन्तर्तच निवे-
गदतः । अथ यत् त प्रातभात तत्कुरुष्व' ? डति । अथ सञ्जी-
वकस्तस्थ तट्टज्रपातदारुणं वचनं श्रुत्वा मोहसुपागतः
अथ चेतनां लब्धा सवराग्यामदमाह- मो ! साधु चेदः
मुच्यते-
इसलिये में उसका निश्चय करके तुम्हारे समीप आया हूं । अब मेरेको बिश्वास
घातका कोई दोष नहीं । यह गुप्त सलाह मैने तुम्हारे अगाडी निवेदन करदीहे।
इसके अनन्ता तुमको जो श्रेष्ठ प्रतीत होवे सो करो” । पश्चात् संजीवक वञ्च
पातसपेखा तितका वह वचन सुवकर मोहको प्राप्त होगया । इसके अनन्तः
संजीवक बुद्धिको प्राप्त होकर वैराग्यतते यह वचन कहने गा कि,-“मो ! यह
यथार्थं कहाहे-
दुर्जनगम्या नाय्य? प्रायेणास्रेहवान्भवाति राजा ।
कुपणानुसारि च धनं मेघो गिरिइगेबषी च ॥ ३०१॥
नारी प्रायःकरके दुञेनाग्यहें अथोत् अपने दुजनोंसे भी मिळसकतीहे और
राजा सेह रहित होतांहे, धन इपणके पासही रहता है और मेघ प्रायः करके
पर्वत और दुर्गपर बरसते हैं ॥ ३०१ ॥
अहं हि सम्मतो राज्ञो य एवं मन्यते कुधीः ।
बलीबदेः स विज्ञेयो विषाणपारवार्जतः ॥ ३०२॥
भाषाटीकासमेतस् । (१२७)
री राजाका मानाइभाह जो मखें ऐसे मानताहे वह शुगराह्ित वैळ अधोत्
2६.
(शतु है ॥ ३०२॥
`` वरं वनं वरं भेक्ष्य वर॑ भारोपजीवनम् ।
बरं व्याधिमंनुष्याणा नाधिकारेण सम्पदः ॥ ३०३॥
मनुष्योंको वनका निवास श्रेष्ठठे और भिक्षासे भोजन श्रेष्ठठे और भार उठा-
कर जीना प्रष्टै और व्याधिमी श्रेष्ठै परतु सेघाकरक सपत प्रापतहोना श्रेष्ट
नहीं ॥ ३०३ ॥
तद्युक्तं मया कृतं यदनेन सह मेत्री विहिता । उक्तच-
सो मेंने बडा अनुचित किया कि, जो इतके साथ मेत्री करी । कहाहे--
ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं कुलम् ।
तयोंमेंत्री विवाहश्च न ठु पुष्टविपुष्टयोः ॥ ३०४ ॥
जिनका समान धनहे ओर समान कुछहे उनकेही मैत्री भौर बिवाह
होने योग्य हें ओर सब्रलनित्रेलोकि मैत्री बिवाह होने योग्य नहीं ॥ ३०४ |
तथाच- है
भओरभी कहाहे-
मृमा मृगेः सङ्गमनुव्रजन्ति
गावश्च गो भिस्तुरमास्तुरङ्गैः ।
सूखोश्व मूखः सुधियः सुधीनिः
समानशीलव्यसनेन सख्यम् ॥ ३०५ ॥
मुग मुर्गोके साथ सग करते हैं, गौ गोबोंके साथ, अश्व अश्रोंके साथ,
मुखे मूखोंके साथ, बुद्धिमान् बुद्धिमानोंके साथ, क्योकि मैत्री अपने तुर्य स्वभाव
व व्यसनवालोकीही होतीहै | ३०५॥
तद्यदि गत्वा ते प्रसादयामि तथापि न प्रसादं यास्यति ।
उचच ~ ५ 2
इसकारण जो में जाकर तिसको प्रसन्न भी करूंगा तो भी घह प्रसन्न नहीं
होबेंगा । कहहै-
निमित्तमादिश्य हि यः प्रकुप्यति
चबं स तस्यापगमे प्रशाम्पति ।
(१२८) पञ्चतन्त्रम् ।
अकारणद्वेषपरो हि यो भवेत्
कयं नरस्तं परितोषयिप्याति ॥ ३०६॥
जो मनुष्य किसी 'कारणको भनुसरण करके कुपितहो बह तिस
कारणके नष्ट होनेपर निश्चय झांतिको प्राप्त होजाताहे और जो मनुष्य कारणके
विना द्वेष करनेवालाहे उसको मनुष्य केसे प्रसन्न करसकता हे ? अर्थात् नहीं
करसकता ॥ ३०६ ॥
अहो ! साधु चेदमुच्यते ।
हों ! यह सत्य कहाहै-
भक्तानामुपकारिणां परहितव्घापारयुक्तात्मनां
सेवासंव्यवहारतत्वविदुषां द्रोहच्युतानामपि ।
व्यापत्तिः स्खलितान्तरेषु नियता सिद्विभेवेद्वा न वा
लस्मादम्ड॒पतेरिवावनिपतेः सेवा सदा शङ्किनी ॥ ३०७॥
उपकारी भक्त तथा पराये निमित्त व्यापार करनेवाले सेवा ओर व्यवहारके
तस्वजाननेवाळे द्रोहसे रहित पुरुपोकोमी अस्थिर स्वमाववाळे स्तामियोंसे आपत्ति
होतीहीहे कि, सिद्धि हो या नहो इसकारण सागरकी समान राजाभोंकी सेवा
सदा झंकासे व्याप्त है ( जैसे समुद्रसे रत्मळास शंकास्पद है) ॥ ३०७ ॥
तथाच
भौरभी-
भावल्निग्वैरूपकृतमपि द्वेष्यतां याति लोके
साक्षादन्येर पक्रतमपि प्रीतथे चोपयाति ।
दुग्रोह्यत्वान्ट्पतिमनसां नेकभावाश्रयाणां
सेवाधम्मः परमगद्दनो योगिनामप्यगम्धः॥ ३०८॥
मनोहर भावते उपकार कियाहुआभी लोकमे द्वेष्यताको प्राप्त होतांहे और
साक्षात दूसरोके अपकार करनेसेभी प्रीतिको प्रात होताहे एक भावसे न रह-
नेवाळे राजाओंका मन दुर्ग्राह्म होनेसे सेत्राका धर्मे महाकठिन है अर्थात् योगि”
याको मी भगम्यदै ॥ ३०८ ||
भाषारीकासमेतम् । (१२९)
तत्परिज्ञातं मया यत प्रसादमसहमानेः सम्ीपवत्तिमिः
एष पिङ्गलकः प्रकोपितः । तेनायं मम अदोषस्यापि एवं
. वदाति । उक्तश्च-
सो यह मेने जान लिया कि, प्रसादको न सहनेवाळे समीपवर्तियोंने इस
पिंगलककों मेरे उपर क्रुद्ध कर दिया इस कारण यह मुझ अदोषीको भी ऐसा
कहताहे। कहाे--
प्रभोः प्रसादमन्यस्य न सहन्तीह सेवकाः ।
सपत्नध इव संकुद्धाः स्वपत्न्याः सुक्तेरापि ॥ ३०९ ॥
सेवक प्रभुकी प्रसन्नता हानेसे उसको ( मनुष्य ) नही सहसकते हें अपने
आचरण किये भावसे सोत लिये जेसे किसी एकपर किये स्वामीके प्रसादको
नहीं सह सक्तीहँ ॥ ३०९ ||
भवलि चेवं यहुणवत्स समीपवर्तिषु गुणहीनानां न असाः
दो भवति । उक्तव-
यह होताहीदे गुणबाले समीपतरतियोमे युणहानोपर प्रसाद नहीं दोताहे। कहाहे--
गुणवचरपात्रेण छाद्यन्ते शुणिनां गुणा: ।
* रात्रो दीपशिखाकान्तिन भानावुदिति सति ॥ ३१० ॥??
भति गुणशाछि जर्नोसे गाणयोके गुण तिरस्कृत किये जाते है जैसा राजिन
दीपकी सिखा मनोहर छगतीहे सूर्य उदवमे नहीं ॥ ३१० [[?
दमनक आह-*'मो मित्र! यदेवं तन्नास्ति ते भय प्र-
कोपितोऽपि स इुर्जनेः तव वचनरचनया प्रसादं यास्यति” ।
स आइ- भौ ! न युक्तमुक्तं भवता लघनामपि दुर्जनानां
मध्ये वस्तु न शक्यते उपायान्तरं विधार ने तूनं घ्नन्ति ।
उक्तश्च-
दमनक बोछा-“भो मित्र ! जो ऐसाहै तो तुमको भय नहीं क्रोधित कराया
हुआ भी चह दु्नॉंसे तुम्हारी वचनरचनासे प्रसन्न होजायगा” | बह बोळा--
#यह तुमने युक्त न कहा छघुमी दुजेवोके मध्यमें नहीं रद्दाजाता उपायान्तर
विधानकर वे अवश्य मारतेहे । कहादे-
९
(१३०) पञ्चतन्त्रम्, ।
बहवः पण्डिताः क्षुद्रा: सर्वे मायोपजीबिन:।
कुर्युः कृत्यमकत्य वा उष्टे काकादयो यथा ॥ ३११ ॥”
बहुतसे लुग पडित मायाजालसे जीविका करते हैं बे कृत्य अकृत्यकों २
करडालतेहें जैसे ऊटमें काकादिकोंने किया ॥ ३११ |!”
दमनक आह-“'कथमेतत !” सोऽब्रवीव-
दमनक बोछा-“'यह कोस १”? वढ बोळा -
कथा १३.
अस्ति करिमिश्चिद्रनोदेशे मदोत्कटो नाम सिंह: प्रति
वशतिस्म । तश्य च अचुचरा अन्दे द्वीणिवायसगोमायवः
सन्ति । अथ कदाचित् लेः इतस्ततो खमदिः सार्थतः
ऋथनको नाम उष्टो दृष्टः। अय सिइ आइ- अहो ! अपूर्व
मिदं सखम् । तज्ज्ञायला किमेतदारण्यकं यम्यं बा” इति ।
तच्छुत्वा वायस आइ- “मीः स्वामिन्! आम्योष्यमुष्रनामा
जीवविशेषस्तत भोज्यः । तत् व्यापाद्यताम” । सिंह आह-
“पनाह गहमागत हन्मि | उक्तञ्च-
किसी पनमें मदोत्कट नम सिह रहता था उसके अनुचर दूसरे गेंडे,
कौए, गौदड थे । एक समय उन्होंने इधर उधर बनमें घूमते हुए अपने साथरे
अष्ट हुआ एक क्रथनक नामक ऊट देखा । तव सिह बोला-“'अहो | यह”
बडा अएूवे जीव हे। सो जावा जाव यह ग्राम्प है या वनका? | यह सुन
कौआ बोडा-“*भो स्वामिन् ! यह ग्राम्प पशु उष्टून.म तुम्हारा भोज्य हे सो मार
डाको' सिंह बोळा-“मे घर आये हुएको नहीं मारूगा | कहा हे--
गृहे शत्र॒प्रपि घातं उिश्वस्तसकुतोम एम् ।
यो हन्यात्तस्य पाप स्याच्छतत्रा्मणचातजम् ॥ ३१२॥
घरमे विश्वासको प्राप्त मयहीनं शत्रुभी प्राप्त हो तो उसके मारनेसे ब्रह्मह-
त्याका पाप लागता है॥ ३१२ ॥
तदभयप्रदानं दत्ता मत्सकाशमानीयतां येन अस्यागम-
नकारणं पृच्छामि'! । अथ असो सर्वैरपि विश्वास्य अभय-
|
भाषाटीकासभेलम् । (१३१)
अदानं दत्वा मदोत्कट्सकाशबानीतः अणब्धोषबिष्टश्व ।
ततस्तश्य पच्छवस्तेतात्यत्रतान्तः सार्थ्षशतसुद्धबों निवे-
दितः । ततः सिहेनोकम- कोः ऋथनक | गा त्व आमं
गत्वा भूयोऽपि भारोह्इ्नकटटभागी सूयाः । तदजेव अरण्ये
निविशङ्को मरकतसदृशानि शष्पाआणि भक्षयन् मया सह
सदेव बस । सोऽपि तघत्सुवत्या तेषां मध्ये दिचरन् न
कुतोऽपि अयनिति सुखेन आस्ते । तथान्बेशुमेदोत्कटस्ष
महागजेन अरण्यचारिणा सह शुद्धमभ्नवत् | दतस्तस्य दन्त-
मशलप्रहारेव्येया सञ्जाता । व्यथितः कथमपि प्राणेने
वियुक्तः । अथ शशीरासामर्थ्यात न कुत्रचित्पदमपि चलितुं
शक्नोति । तेऽपि सर्दे काकादयोऽमञचुत्वेन क्षुधाविष्टाः परं
दुःखं भेज! । अथ लान् सिंहः माइ- “भो! अन्विष्यतां कुत्र-
चित् किञ्चित् सत्य ब्रेन अहं एताभपि दशां प्रा्तस्तद्वत्या युष्म-
द्वोजनं सम्पादयामि? । अथ ले चत्वारोऽपि त्रसितुमारव्या
यावन्न किञ्चित् रत्वं पश्यन्ति तावद्वायसश्गालो परस्परं
मन्त्रयतः । शृगाल आइ-“' सो वायस ! कि भभूतभान्तेत,
अयमस्माकं प्रभोः कथनको दिश्वश्तरितष्ठाति तदेनं हत्वा
प्राणयात्रां कुस्मः? । बायस आहु-' पुत्तमुर्क भवता, परं
स्वामिना तरय अभमपदानं दत्तमास्ते न वध्योऽयम' इतरा
शृभाळ आइ- यो; बायस ! अहं स्वामिनं बिज्ञाप्य तथा
करिष्ये यथा स्वामी वधं करिष्याति तत्तिष्ठम्लु भवन्तोऽनरेव
यावदहं गई गत्दा प्रथोराज्ञां गहीत्वा च आगच्छामि”। एवम-
भिधाय सत्वर सिहलादिय अस्थित; । अथ सिंदमासत्य इद-
माइ-' स्वामिन्! समस्तवन जातत्वा बयभागताः, न कि-
शित्सन्वमासादितम्, तत् कि कुर्मा वयम् । सम्मति वयं
बुभुक्षया पदमेकमपि ्रचालिठुं न शक्दुमः देवोऽपि पथ्याशी
वर्तते । तद्यदि देवादेशो भवलि तव कथनकरिशितेम अद्य
पथ्यक्रिया क्रियते!! । अथ सिंहस्तस्य तदारुणं वचनमाकर्ण्य
(१३२) पञ्चतन्त्रस् ।
सकोपामिदमाह-' “धिक् पापाधम ! यद्येवं भूयोऽपि वदसि.
ततः त्वां तत्क्षणमेव वधिष्यामि यतो मया तस्य अभये मदा
तम्। तत् कथ व्यापाद्याम । उक्तश्व--
सों भमय दान देकर हमरे निकट लाओ जिससे यहां आनका कारण पळ |
तब यह सबने विश्वास दे अभय दानकर उसको मदोत्कटके निकट लाकर प्रणाम
कर बेठाया । तब उसके प्रूछनेपर उसने अपना इत्तान्त सार्थसे छूटनेका निवे-
दन किया, तब सिहने कहा“-भोः क्रथनक ! अब तू फिर गांवको जाकर भार
उठानेके कष्टका भागी नहो । सो इसी बनमें शंकारहित होकर मरकतमणिके
सदृश तृणके अप्रमागोको भोजन करता हुआ हमारे साथ सदैव निवासकर” %
40८0
वहभी/ बहुत अच्छा”कह उनके मध्यमें विचरता हुआ निर्भय सुवसे रहता था।,
एकदिन मदोत्कटका वनचारी महागजके साथ युद्ध हुआ, तब उसके दांतरूपी
मूझछके प्रहारसे उसको बडी व्यथा हुई | परन्तु व्यथित होकर किसी प्रकार
प्राणोंसे मुक्त न हुआ, परन्तु शरीरकी असामर्थ्यसे सर्वथा चलनेको भी समर्थ
नहींथा । वेमी सब काकादि प्रभुके अशक्त हानेसे क्षुधासे परम दुखको प्रा्तइए।
तब उनसे सिंह बोढा,--भों | कहीं कोई जवकी खोज करो जिससे मे इस
दामे भी प्राप्त हुआ उसे मारकर तुम्हारा भोजन सम्पादन करूंगा? तब के
चारोमी भ्रमण करने छगे जब कोई जीव नहीं पाया तब कोए और गीदड परस्पर
त्रणा करने लगे, श्रगाळ बोळा,-““मो वायस ! बहुत घूमनेसे क्यांहे यह हमारे
प्रभका विश्वासी क्रथनक मोजूदहे। सो इसे मारकर हम प्र।णयात्रा कर”। काक बोलों-
आपने सत्य कहा, परन्तु स्वामीने उसको अभयदान दिथांदे इस कारणसे वह
वघ्यनही है”! । श्रुगाळ बोळा,-“वायस | में स्वामीसे विज्ञति कर ऐसा करूंगा
जो स्वामी उसका ववकरे सो आप यहीं स्थित रहो ज्रतक में घर जाय प्रभुका
आज्ञा लेकर भाऊं” | यह कह वह सिंहकी ओरको चढा । और सिंहको प्राप्त
होकर बोळा,-“स्वामी ! हम सम्पूर्णे बन घुम आये, परन्तु कोई जीव गन
हुआ । सो हम क्या करें अब इम भूखस एक चरणभी नहीं चळ सकते हैं.
कोमी पथ्य व्यापार करना युक्त है । सो यदि स्वामीकी आज्ञा हो तो क्रथनकके
मांसले आज भोजन व्यापार किया जाय” | तब सिंह उसके दारुण वचन सुन”
कर क्रोधसे यह बोढा,-““पापाधम ! धिक्कार है तुझे ! यदि फिर ऐसा कहैगा
भाषाटीकासमेत्तम् ! (१३२)
० "०
तो उसीक्षण तुझको मारडाळ्या कारण कि, मैंने इसको अभयदान दियाहें सो
( किस प्रकार मारू, कहा है-
न गोप्रदानं न महीप्रदान न चानदानं हि तथा प्रधानम।
यथा वदन्तीह दुधा! प्रधानं सर्वेप्रदानिष्यभयभदानम्रे९ ३,
न गोदान, न यूमिदान, न अन्नदान ऐसा प्रधान है जैसे पडितळोग सब
दानोमें अमयप्रदानको श्रेष्ठ कहते हैं || ३१३ |
तच्छत्वा श्रगाल आह- स्वामिन् ! यदि अभयमदानं
दत्वा वधः क्रियते तदा एष दोषो भवाति | पुनय दि देवपादानां
भक्त्या स॒ आत्मनो जीवितव्यं प्रयच्छाति तन्न दोषः,
ततो यदि स स्वयमेव आत्मानं वधाय नियोजयति,
तद्वष्योऽन्यथा अस्माकं मध्यादेकतमो वध्य इति, यतो
देवपादाः पथ्याशिनः श्षुन्निरोधाइन्त्यां दशां यास्यन्ति ।
तत् किमेतेः प्राणेरस्मा्क ये स्वाम्यर्थे न यास्घस्ति।
अपरं पश्चादपि अस्मामिषह्विधवेशः कार्य । यदि स्वा-
भिपादानां किखिदनिष्ट भविष्यति ! उक्तश्च~
यह सुनकर श्रगाळ बोळा-“स्वामिन् ! यदि अमय दान देकर बध किया
जाय तो यह दोष लगे और जो स्त्रमीके चरणमै भक्तिसे अपना जौवदे तो
दोप नहीं है सो यादि वह सवयही अपनको धके निमित्त प्रदान करे तो वध्य
हुँ नहीं तो हममेसे किसी एकको वघकरना । कारण कि, स्वामीके चरण पथ्य-
ब्यापारसें युक्त भूखके कारण मरणावस्थाको प्राप्त हैं । और पीछे भी हमको
आगे प्रवेश करना पडेगा जो स्वामीके चरणाका कुछमी अनिष्ट होगा !
कहा हे कि-
यस्मिन्कुले यः पुरुषः प्रधानः स सर्वयत्नैः परिरक्षणीयः ।
जस्मिन्विनष्टे कुळसारभूते न नाभिषंगे हारयो वहन्ति ३१४?
जिस कुलमें जो पुरुष प्रधान हे उसकी सब थत्नोंसे रक्षा करना चाहिये
उस कुडके सारभूतके नष्ट होनेमें सब ओरसे शत्रु उसको पराभूत करते हें”
तदाकर्ण्य मदोत्कट आइ~* “यद्येवं तत् कुरुष्व यद्रोचते”?
तच्छृत्वा स सत्वरं गत्वा तान् आह-““भोः स्वामिनो महती
( १३४) पञ्चतन्त्र ।
अदस्या वर्तते, तत् कि पय्येडितेततेन बिना कोऽत्र अस्मान्
रक्षथिष्यति । तहत्वा तस्य छुद्रोगात परलोकं प्रस्थितस्य
ऊआत्मशरारदान कुला यन स्वामप्रस्ादरण अनुणताँः
गच्छालः । उक्तस्-
यह सुनकर मदोत्कट बोला,-“जा ऐसा हे तो जो तुम्हारी इच्छा हो सो
करों”? | यह सुनकर वह उनके पास जाकर बोला,-“भो ! भो ! स्वामीकीं
बडी कठिन अवस्था हे सो अब फिरनेस क्या स्वार्माके विना हमारी कौन
रक्षा करेगा, सो चढकर झुधारोगसे परलोक जाते इए उसको अपना शरीर -
प्रदान करे जिससे स्तामाके प्रसादले अनूणताको प्राक्त होजायें, कहा है-
आपदं भाप्तुयात्स्वासी यस्य भत्यस्थ पश्यतः ।
णेषु विद्यमानेषु स भृत्यो नरकं ब्रजेत् ॥ ३१५ ॥?!
जिस मृत्यके देखते स्वामी आपत्तिको प्रात होता हो अपने प्राण होते
उसको रक्षा न करे वह भृत्य नरकके जाता हे ॥ ९१५ ॥?
नद्नन्तरं ते सर्वे बाष्पपूरितदशों मदोत्कटं प्रणम्य उप-
विष्टाः । तार् दष्टा सदोत्कट आह- भो! ! जात दष्टं वा
किखित् सत्वम् ?? अथ तेषां अध्यात काकः प्रोबाच,-
“इ्वामिन् ! बघं तावत् सर्वच पथ्योटिलाः, परं न किखित्स-
त्वमासादितं इष्टं वा | तदद्य मां भक्वयित्वा श्राणान् धारयलु
स्वामी, येन देवस्य आश्वासनं भवति मस पुनः स्वर्गताः
[रात । उक्तव्व-
तब वे सब आंखोंपें आंसू भरे मदोत्कटको प्रणाम कर बेठे । उनको देखकर
मदोत्कट बोला,- मो | कोई जीव प्राप्त हुआ या देखा ?। तब उनके बव्चि-
मेले कोआ बोला,- स्वामिन् ! हम सब स्थानमें घूमे परन्तु न कोई जीव पाया
न देखा । सो आज मुझे भक्षण कर स्वामी अपने प्राणोंको धारण करे जिससे
स्वामोका आश्वासन और मेरी स्वर्गप्राप्ति होगी, कहा है-
स्वाम्यर्थ यस्त्यजेत्माणान्भ्र॒त्यो भक्तिसमन्वितः ।
प्रे स पदमाभोति जरामरणवर्जितम् ॥ ३१६ ॥”
भक्तिमान् जो सेवक स्वामिके निमित्त प्राण त्यागन करता है वह जरामरण
रहित परमपदको प्राप्त होता है॥ ३१६ ॥
माषाटीकासमेतम्। (१३५)
तच्छत्वा शुगाल आहे- मो; ! स्वल्पकायो भवान् तव
भक्षणात् स्वामनस्तावत् पाणयाचा न नवात अपरा दाषश्च
तावत् सम्नत्पद्मत। उक्तत्व-
यह सुनकर श्वगाळ बोळा, आप स्वल्प शारीर हो तुम्हार मक्षणसे खामी-
को प्राणयात्रा न होगी और दोषमी प्राप्त होगा । कहा हे-
काकमांसं शुनोच्छिष्टं रवल्पं तदपि इलेभस् ।
भक्षितेनापि कि तेन ठतिदन न जायते ॥ ३१७॥
एक तो काकका मात दूसरे कुत्तेकी उच्छिष्टतासे बचा इभा भोर फिर
योडा तथा दुष्प्राप उसके खानेस क्या हे जिससे कि, तृत्ि नहो ॥ ३१७ ॥
तदशिता स्यामिभक्तिमेवता, गतं च आृण्यं भन्नेपि-
ण्ड्स्य, घातश्च उभयलोके साधवादः तदपसर अग्रतः अहं
स्वामिनं विज्ञापयामि” । तथानुछिते शृगालः सादरं प्रणम्य
उपदिष्टः माह- स्वामिन् ! भां भक्षावित्वा अद्य प्राणयात्रां
विधाथ मन उमथलाकप्रात कुरु । उत्तश्व-
सो आपने स्मामीभाक्ति दिखादी स्तामीक्की अनुणताकी प्राति की, दोनों
छोकोर्मे साधुआद प्राप्तकिया, सो आगेसे इटो मे ख,मीको कहू,” यह होनेपर
श्वगाल आद्स्से प्रणाम कर बेठा ओर बोळा-“स्व्रामिन् ! मुझ मक्षणकर, आज
प्राणयात्रा कर मेरी उमयलोकप्राति करो । कहाहे-
स्वाम्याथत्ताः सदा प्राणा शत्मानामर्जिता धने? !
यतस्ततो न दोषोऽस्ति तेषां अहणसम्भवः ॥ ३१८ ॥”
प्राण सदा स्वामोके आधीनहें कारण कि, स्वामीने वह धनसे खरीद ळियेहे
सो उनके ग्रहण करनेमे कुछ दोप नही होताहे ॥ ३१८ |”
अथ तच्छ्रुत्वा द्वीपी आइ- भो; ! साइ उक्तं भवता,पुनः
भवानाप स्वल्पकायः स्वजातंश्च, नखायुबत्वात अभक्ष्य
एच । ठक्तश्व-
यह सुनकर गडा बोला,-“भो | तुमने ठीक कहा आपभी ख्रहपकाय भोर
सजातीयहो नखायुध होनेसे अमक्ष्यहों | कहाहै-
९१२६) पश्चलन्त्रम् ।
नाभक्ष्य॑ भक्षयेत्माजञः प्राणेः कण्ठगतेरपि ।
विशेषात्तदपि स्तोकं लोकद्वयविनाशकम् ॥ ३१९॥
बुद्धिमान् कंठमें प्राण भानपरमी अमक्ष्यको न खाय उसमे भी विशेषकर
छघु होनेसे दोनों लोक नष्ट होतेहे ॥ ३१९ ॥
तदशितं त्वया आत्मनः कोलीन्घम्, अथवा साधु वेद
सुच्यत
सा तुमन अपना कुछानता दिखडादा, अथवा अच्छा कहाह--
एतदर्थ कुलीनानां नृपाः कुर्वान्ति संग्रहम् ।
आदिमध्यावसानेषु न ते गच्छन्ति विक्रिषाम् ॥ ३२० ॥”
इसीकारण अच्छे कुल्वानॉको राजा संग्रह करतेहें जो आदि, मध्य, अन्तं
कभी विकारको प्राप्त नहीं होतेहे ॥ ३२० ॥ ?
तदपसर अग्रतो येनाहं स्वामिनं विज्ञापयामि” । तथा-
बिते द्वीपी प्रणम्य मदोत्कटमाह, “स्वामित् ! क्रियतास्
अद्य मम प्राणैः पाणयाचा, दीयतामक्षयोवासः स्वगे, मम
विस्तार्यतां क्षितितले प्रभूततरं यशाः तन्नात्र विकल्पः
कार्य्येः । उक्तथ्व-
सो भागेसे हटो जिससे मै स्ामीसे कह ऐसा होनेपर गेडा प्रणामकर मदो-
त्कटसे बोछा,~-“'स्वामिन् ! आज मेरे प्राणोसे अपना निर्वाह करो मुझे स्वमेमें
अक्षय निवासदो पृथ्वीमे मेरा अत्यन्त यश विश्तार करो, उसमें विक्रस्पकरना
नहीं चाहिये । कहांहे कि-
मृतानां स्वामिनः कार्य्ये झत्यानामनुवतिनाम् ।
भवेत्स्वगेंपक्ष यों वासः कीचिश्च धरणीतले ॥ ३२१ ॥”
जो अनुकूछ मत्य स्त्रामीके निमित्त प्राण त्यागन करते ई उनका स्वरगमेँ
अञ्भयवास ओर पृथ्वीमें कीर्ते होतीहे ॥ ३२१ ॥'”
तच्छुत्वा कऋ्रथनकश्चिन्तयामास,। “एतेः तावत्सर्वेरापि शो-
भनानि वाक्यानि प्रोक्तानि, न च एंकोऽपि स्वामिना विना-
शितः, तदहमपि प्रातकाले विज्ञापयामि, येन मम वचनमेते
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योऽपि समर्थयन्ति’, । इति निश्चित्य प्रोवाच,- भोः !
भाषारीकासमेतम् । (१३७)
सत्यमुक्तं भवता, परं भवानपि नखायुधः तत् कर्थं भवन्तं
स्वामी भक्षयाति। उक्तञ्च-
यह सुनकर ऋथनक विचारनेलगा कि, “इन सवने अच्छे २ बचन कहे
एककोभी स्वामीने च मारा सो मैंमी अब समय प्रातिपर विज्ञत्ति करू जिससे
यह तीनो मेरे वचनको समर्थन करेगे हे”? । यह विचारकर बोळा,-“'भोः !
आपने सत्य कहा परन्तु तुममी नखायुधवालेहो सो केल भापको स्वामी भक्षण
करेंगे | कहाहै-
मनसापि स्वजात्यानां योऽनिष्टानि प्रचिन्तषेत् ।
भवन्ति तस्य तान्धेव इहलोके परत्र च॥ ३२२ ॥
जो मनप्षेमी अपने जातिके अआनिष्टकी चिन्ता करताहे इस ळोकमे ओर
परलोकमे उसको वेही होतेह || ३२२ ||
तदपसर अग्रतो येन अह स्वामिनं विज्ञापयामि” तथा-
सुष्ठिते ऋथनकोऽग्रे स्थित्वा प्रणम्योवाच-“ स्वामिन् !
एते तावदभक्ष्या भवतां तत् मम घ्राणेः प्राणयात्रा विधीयतां
येन मम उमयलोकम्रापिर्भवति । उक्तश्च-
सो आगेसे हटो जिससे में स्वार्माको विज्ञापनादृ” ऐसा करनेपर क्रयनक
आगे स्थितहो प्रणाम कर बोढा,-' स्वामिन् ! यह तो सव अभक्ष्यं आपके,
सो हमारे प्राणोसे प्राणयात्रा करो जिससे मेरी उभयळोक प्राति होगी। कहाहे-
न यज्वानोऽपि गच्छन्ति ताँ गति नेव योगिनः ।
यां यान्ति प्रोज्झितमाणा; स्वाम्यर्थे सवकोत्तमाः॥३२३॥
उस गतिको च यज्गशीळ न योगी जातिह जिस गतिको स्वामीके निमित्त
प्राण त्यागन करनेवाळे उत्तम सेवक जाते हैं ॥ ३२३ ॥
एवमभिहिते ताभ्यां श्रगालचित्रकाभ्यां विदारतोभय-
कुक्षिः । कथनकः मरणाव् अत्याक्षीत! ततश्च तेः क्षद्रपण्डितेः
सवभाश्चतः अतोऽहं ब्रवीमि । बहवः पण्डिताः क्षुद्रा।''इति।
ऐसा कहनेपर श्वगाळ और चीतेसे कोख विदोणे किया हुआ क्रथनक
प्राणत्यागन करता हुआ, तब उन सब श्षुद्रपडितोंने उसको भक्षणकर छिया ॥
Lon ha
~ ङ्भ TS
ससे में कहताहू कि, “बहुत क्षुद्रपडितोनि” इत्यादि ।
(१३८) पञ्चतन्त्र ।
तद्भद्र ! क्षुद्रपरिवारोऽथं ते राजा सया सम्यग् ज्ञातः
सतामसेव्यश्च । उत्तश्च-
सो हे भद्र | यह तुम्दारा राजा क्षुद्दरारेवारवाळा हे यह मैंने भळीप्रकार
जानाळिया इससे सत्पुरपोंको असब्यहे। कहाभीहै-
अशुद्वघक्कतौ राजि जनता नातुरज्यते ।
यथा गूधसमासन्नः कलहंसः समाचरेत् ॥ ३२४॥
अशुद्ध प्रकृतिवाले राजामें प्रजा ( प्रसन्न ) आनद नही होती जैसे गृप्रोसि
युक्त कळहंस श्रेष्ट आचरण नहीं करसकता ॥ ३२४ ॥
तथाच
ओर देखो-
गुधाकारोऽपि सेव्यः स्वाद्वसाकारेः सभासदः ।
हंसाकारोऽपि सन्त्याज्यो गृध्राकारेः स तेनुप; ॥ ३२५ ॥
गृप्रकेसे आकारवाले राजाका हसाकात्वाळे सभासद सेवन करसकतह और
हंसाकार राजा गृध्राकारबाले सभासदोंसे युक्त छो तो त्यागना चाहिये ॥३२५॥
लन्नूनं ममोपारे केनचित् इजनेन अथं प्रदोषितः । तेनेवं
बदति । अथवा भवाति एतत । उक्तश्च-
सो निश्चय मेरे ऊपर किसी दु जतन इसका क्रोधित करादिया इसीसे ऐसा
कहताहे । अथवा यह होताहोहे, कहाहै-
मुहुना सलिलेन खन्यमाना
न्यवधृष्यान्त गगररगप स्थळानं ।
उपजापविदां च कर्णजापेः
किसु चेतांसि सदूति मानवानाम् ॥ ३३६ ॥
कोमळ जलसे घिसे हुए पर्वतके स्थलमौ विस जाते हैं फिर भेदे कुशळ
मनुष्योके कान सरनेसे कोमळ मनुष्योंके चित्तोंकी कोन कह ॥ ३२६ ॥
कर्णविषेण च भग्नः कि कि न करोते बालिशो लोकः ।
क्षपणकतामपि धत्ते पिबाते सुरा नरकपालेन ॥ ३२७ ॥
कान भरनेके विषसे भन्न हुआ मूर्खे छोग क्या क्या नहीं करताहे बहुत क्या
संन्यासीमी होता हे तथा मनुष्यकी खोपडीमें सुरापान भी करता हे ॥ ३९७
आपाटीकासमेतम् । (१३५)
अथवा साधु चेदसुच्यते-
अथवा सत्य कहाहै-
पादाहतो5पि इृडदण्डसमाहतोऽपि
यं दंष्टया स्पृशाति तं किल हन्ति सपेः।
कोऽप्येष एव पिशुनोऽग्रमलुष्यधर्भः
कर्णे परं स्पृशाति हन्ति परं समूलम् ॥ ३२८ ॥
चरणसे इत और दृढ दडसे ताडित सर्प जिसे दष्टासे काटता है वही
मरता हे और यह मनुष्य धर्मका चुगली इस प्रकारकी है कि, मनुष्यको समूळ
नष्ट करतीहे ॥ ३२८ ॥
तथाच-
आरमी--
अहो ! खलक्षुजङ्गस्य विपरीतो वधक्रमः ।
कर्णे गति चेकस्य घाणेरन्यो बियुञ्यते ॥ ३२९ ॥
नहो दुष्ट भार सर्पके वध करनेका धर्म विपर्सत हे , वह कानमें किसीवे
ळगताहे ओर प्राणोंसे कोई ( नष्ट ) पृथक् होता है ॥ १२९ |
तदेवं गतेऽपि कि कत्तव्यमिति अहं त्वां सुदद्गावातः,9च्छाः
मि?! । दमनक आह-''तहेशान्तरगमनं युज्यते न एवं विध
स्य कुस्वामिनः सेवां विधाठुम् । उक्तश्च-
सो ऐसा होनेपरमी क्या करना चाहिये में तुझसे सुहृद्भावसे पूछता हू”
दमचक चोळा,-“आप अन्यस्थानमे चळे जाइये इस प्रकारके कुस्वामीकी सेवा
करनी उचित नहीं कहा हे-
गुरोरप्यवलिक्तस्य कर्याकारर्षमजानतः ।
उत्पथप्रतिपन्नस्प पारित्यागो विधीयते ॥ ३३० ॥ "
उद्धत कार्य अकार्यके न जाननेवाछे उन्मार्गमें प्राप्त गुरुजनका र्भा व्याम
कर देना चाहिये ॥ ३३० |!"
सञ्जीवक आह-“अस्माकमुपरि स्वामिनि कुपिते गन्तुं
नी
न शक्यते न च अन्धत्र गतानामपि निढतिमेवाति । उत्तव-
श्व
(१४०) पञ्चतन्त्रम् ।
संजीवक बोला,- हम स्वार्मीके क्रोधित होनेपर अन्य स्थानमें नहीं जा-
सकते कारण कि, अन्य स्थानर्मे जानेसे मंगळ नही होगा | कहाहे-
महता योऽपराध्येत दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् |
दीषों बुद्धिमतो बाहू ताभ्यां हिंसति हिसकम् ॥ ३३१ ॥
जो बडे पुरुषोका अपराध करता है वह में दूरहूं ऐसा विचार तकरे वुद्धि-
मनकी दा वाहु दूरसेमी उस हिंसककों पकड़कर मारती है ॥ २६१ ॥
तबुद्ध मुक्ता मे नान्यदस्ति श्रयस्करम् । उक्तश्च-
सो युद्धको छोडकर अब और श्रेयस्कर उपाय नहीं है । कहाहै-
न तान हि तीर्थेस्तपसा च लोकान्
स्वगोषिणो दानशतेः सुवृत्तेः ।
क्षणेन यान्यान्ति रणेषु धीराः
प्राणान्सप्रञ्झन्ति हि ये सुशीलाः ॥ ३३२॥
स्वर्गकी इच्छा करनेवाले उन ळोकोको तीर्थ तप सेैंकडो दान और
सुकझतोंसे नहीं प्राप्त होते हैं जहां धेयेवान् सुद्ीळ पुरुष युद्धकर क्षणमात्रे
प्रातहोते हैं ॥ ३३२ ॥
सृतेः सम्प्राप्यते स्वगो जीवद्धिः कीतिरूचमा ।
तडुभावपि झूराणां शुणावेत्ती सुहुलेभों ॥ ३३३॥
मरनेसे स्वर्ग और जावेसे उत्तप कीति प्रात होती हे यह दोनों गुण झूर
पुरुषांके दुळेभ हैं ॥ ३३३ ॥
ललाटदेशे रुधिरं स्रबत्त॒ शूरस्य यस्य प्राविशेज्च वक्ते ।
तत्सोमपानेन समं भवेञ्च संयामयज्ञे विधिवलाडिष्टम्३३४॥
जिस शूरके माथेसे बहता हुआ राधेर मुखमें प्रवेश करता है वह विभिषवेक
संप्रामयजञमें प्राप्त हुआ सोमपानकी समान होता है ॥ ३३४ ||
तथाच-
और देखो-
होमार्थेविधिवत्मदानविधिना सद्विप्रवृन्दाचेनेः
~~
यज्ञेभूरिछुदक्षिणेः छुविहितेः सम्माप्यते यत्फलम् ।
आषाटीकासमेतम् । (१४१)
सत्तीर्थाअमवासहो मनियमैश्चान्द्रायणाद्यैः कृतेः
पुम्मिस्तत्फलमाहवे विनिहतेः सम्माप्यते तत्क्षणात् ॥”
बिधिपूर्क होमार्थे और दानविधिसे सद्राह्मणोकें अर्चनसे तथा बडी.
दक्षिणावाळे यज्ञोंसे ( जो श्रेष्ठ कहे हैं) जो फळ उनसे प्रात होता है तथा तीथ,
आश्रम, वास, होम, नियम, चान्द्रायण भादि करनेसे पुरुषोके जो फल प्राप्त
होता हे वह फळ संग्राममे प्राण त्यणनेसे तत्काल मिळता है || ३३६ ॥ ??
तदाकण्य दमनकश्चिन्तयामास । ` युद्वाय कृतनिश्चयोऽधः
इश्यते दुरात्मा तद्यदि कदाचित् तीक्ष्णञ्लङ्गाभ्यां स्वामिनं
प्रहरिष्यति तत् महान् अनर्थः सम्पत्स्यते । तदेनं भुयोऽपि
स्वबुद्ध्या प्रबोध्य तथा करोमि यथा देशान्तरगमनं करोति"
आह च,-“भो मित्र ! सम्यक् अभिहितं भवता, परं किन्तु
कः स्वामिभृत्ययोः संग्राम; । उक्तश्च
यह सुनकर दमनक विचारते छगा, “यह दुरा तो युद्धके लिये निश्चय
किये हैं सो यदि कदाचित् यह तीण श्ृगेलि स्वामीको प्रहार करे तो महान्
अनर्थ होगा, सो इसको फिरभी अपनी बुद्विसे समझाकर वेसा करू जो यह
देशान्तरको चढा जाय” | बोछाभी-“भो मित्र ! तुमने सत्य कहा परन्तु स्वामी
सेवकका कया सम्राम? कहाहे-
बलवन्तं रिपु दा किलात्मानं प्रगोपयेत ।
बलवद्धिश्व कत्तव्या शरञ्चन्ट्रमकाशता ॥ २३६॥
बलवान् रातको देखकर अवश्यही आत्मा रक्षाकरे और बळ्वानोंको शर-
अन्द्रकी समान अपना प्रकाश करना चाहिये ॥ ३३६ ॥
अन्य
और भी--
शनत्रोविक्रममज्ञात्वा वेरमारभते हि यः।
स पराभवमामोति ससुद्रष्टिट्टिमायथा ॥ ३३७॥”
औरमी जो शत्रुके पराक्रमको न जानकर वेर भारभ करता है वह टिटिमिसे"
समुद्रको समान पराभवको प्राप्त होता हे ॥ ३६७ ॥?
( १४२) - पञ्चतन्त्रम् |
सञ्जीवक आह-“कथमेतद?” सोउ्तरबीव-
सेजीबक बोला,--“यह केस? ? बह बोछा--
कथा १२९,
कस्तिश्चित् समुद्रतीरकदेशे टिद्विवद्म्पती प्रतिवसतः स्मा
ततो गच्छति काले ऋतुसमयमासाद्य टिट्टिभी गर्भभाधत्त।
अथ आसन्नम्रसवा सती सा टि ट्टिपभूदे-''सोः कान्त ! मम
प्रसवसमयो बत्तेते तद्विचिन्त्टतां किसपि निरुपद्रव स्थानं
येन तत्राहमण्डकविमोक्षणं करोमि । टिद्विषः प्राह-“भद्रे !
रस्योऽयं सञुद्रदेशः। त इनेन भरव! छायः? । सा आह- `
“अन्न पूर्णिमादिने ससुट्रबेछा चरति । सा मत्तगजेन्द्रानपि
समाकर्षति लद्दूरयन्यत कित् स्थानमन्तिष्पतास? ।
तच्छत्वा विहृस्प टिम अ हर सत्रे ! युत्त्तसुक्तं भवत्या का
मात्रा ससुद्रस्थ या भम दूषाधिष्याति सूतिर १ किन श्रत
सबत्या ¦
कहीं समुद्रके एक देशम टदीहरी ओर उसका स्तव.मी रहताथा तव समय
वीतनेमें ऋतुसमयको प्रत्त होकर टिट्भेभीन ग धारण किया | तब प्रसवे
समीप होनेस सो चह टटाइरी स्वामीसे बाली,--“भा स्वादिन् ! मरे प्रसवका
समय वतमान हे सो कोई उपद्रव रहित स्थान खोज किया जाय जिससे में
बझ अपने खण्डे त्यागन करू? । टिट्टिन बोळा,-““भन्रे ! यह समुद्रस्थान बहुत
सुन्दर है सो यहाँ बचे उत्पन्न करे” वह वाळी, -“धूर्गमासीके दिन यहां समुद्र-
वेळा प्राप्त होती हे वह और तो क्या मतबाळे हायियोकोमी आकर्षण करतीहे
सो कहीं दूर और स्थान खोज किया जाय'' । यह सुत हँसकर वह टिद्टिम
बोछा,-- तुमने सत्य कहा परन्तु समुद्रकी क्या साध्ये हे जो मेरी सन्त्रानको
दूषित करे क्या तुमने न घुनाहै, कि-
'बद्धाम्बरचरमार्म व्यपगतधूनं सदा महद्गयद्म्।
मन्दमाति$ कः विशति हुताशनं स्वेच्छया मतुजः ३३८
आकाशचारिरयोके मागे रोकनेषाळे, घूमरहित सहामयदायक अझ्िमें कोन
मन्दमाति अपनी इच्छासे प्रवेश करता है || १३८ ॥
आाषाटीकासमेतस | (१४३)
मत्तेभकुम्भविदलनकृतअर्म छुतमन्तकमतिमस् ।
यमलोकदर्शनेच्छुः सिह बोधयति को नाम ९ ॥ ३३९ ॥
मतवाछे हाियोके गण्डस्थळके विदीण करनेमे श्रम किये सोते काकी
समान सिंहको कोन यमडोक देखनेकी इच्छावाळा जगावे ॥ ११९ ||
को गत्वा यमस इन स्रथमन्तकमादेशत्यजातम्थः !
प्राणानपहर मत्तो यादे शिः काचिद्रस्ति तव ३४० ॥
कौन यमळोकको जाकर स्य भयरहित यमराजले कहेगा कि, यादि तुझम
कोई शक्ति हो तो मेरे प्राणोको हर ॥ १४० ॥
घ्रालेबलेशमिश्ने महति भाथातिके च बालि जडे।
गुणदोषज्ञः पुरुषा जलेन कः शीतमपनयति ॥ ३४१ ॥
शिशिएे मिली जड मारी प्रमात वायुके चडनेसे गुण दोषफो जाननेत्राला
कोन पुरुष उस शीतगो जठत्ते दूर करसकनाहे ॥ ३४१ ॥
तस्मात विश्रब्धा अजब गर्भ सुख । उक्तः्व-
इत कारण निरशक हो यही गर्भ त्यागो । कहाहे-
यः पराभवसन्त्रस्तः स्वस्थानं सन्त्यजेन्नरः ।
तेन चेत्पुत्रिणी माता तद्वन्ध्या देन कश्चन ॥ ३४२ ॥?
जो परामवके डरसे मतुप्य अपना स्थान त्यागताहे यदि माता उसके होनेसे
पुत्रिणीहै तो वध्या किससे कही जायगी ॥ ३४२ ।(?
तच्छुत्वा सएद्रश्चिन्तयामास' अहो गः पक्षिकीटस्यास्थ।
अथवा साधु चेदमुच्यते-
यह सुनकर समुद्र विचारने छगा, “भहों इस पाक्षि कीटका यह गेहे । भथवा
सत्य कहाहे-
उत्क्षिप्य टिट्टिभः पादावास्ते मंगनयादिवः !
स्वचित्तकत्पितो गरे; करस्य नात्रापि विद्यते ॥ ३४३ ॥
कीट आकाशके गिरनेके भयसे आकारी ओरको चरण करके सोताह
सहा अपने चित्त कल्पित गर्व किसको नहीं है || ३४३ ॥
तन्मया अस्य प्रमाण कुतूहलादपि द्रृष्टव्यम । कि
मम एषोऽण्डापहारे कृते करिप्यति '? इति चिन्तयित्वा
(१४४) पञ्चतन्त्रम् ।
स्थितः । अथ प्रसवानन्तरं प्राणयात्रार्थ गतायाः टिट्विभ्या
समुद्रो बेलाव्यानेन अण्डानि अपजहार । अथ आयाता स
टिट्टिमी सवस्थानं शून्यमवलोक्य प्रलपन्ती टिट्विभमूचे-
“भो मूर्खकथितमासीत् मया ते यत् समुद्रबेलया अण्डाना
विनाशो भविप्यति,तद्दूरतरं ब्रजावः परं मूढतया अहड्डार-
माश्रित्य मम वचनं न करोषि | अथवा साड चेदसुच्यते-
सो में कुतुइळसे इसका प्रमाण देखगाही । कि, मेरे अण्डहरण करनेपर यह
क्या करेगा । ऐसा चिन्ताकर स्थित हुआ । अण्डेरखनेके उपरान्त प्राणयात्राके
लिये गई हुई टिट्विभीके अण्डोको समुद्रने वेलाके घहानेसे हरण कर लिया ।-
तब भई हुईं वह टिट्टिमी अपने प्रस्ववत्यानको गून्पदेखकर विलापकर टिद्टि-
असे बोढी-“भो मूर्ख ! मेने तुझसे कहाथा कि समुद्रवेलासे अण्डोका नाश होगा
सो बहुत दूर चळकर रकखें तेने मूढतासे अहंकारके आश्रितहो मेरे वचन न किये।
अथवा सत्य कहादे-
सुहदां हितकामानां न करोतीह यो वचः ।
स कूम इव ढुबुद्धिः काष्ठाद्वष्टो विनश्यति ॥ ३४४ ॥7?
हितकारी सुहृदोके जो वचन नहीं करताहे वह दुर्वुद्धि लकडीसे गिरे कछु-
एको समान नष्ट होताहै | ३४४ |"
दिक्षिमि आइ- कथमेतव् ! ?? सा अब्रवीत-
टिद्विमते कहा- यह केसे !” वह बोली-
कृथा ३३.
अस्ति कस्मिश्चित् जलाशये कम्घुग्रीबो नाम कच्छपः तस्य
च संकटविकटनासरी मित्रे हसंजातीये परमस्रेहकोटिमाश्रिते
नित्यमेव सरस्तीरमासाद्य तेन सह अनेकदेवषिमहर्षीणां
कथाः कृत्वा अस्तमयवेलायां स्वनीडसेश्रयं कुरुतः । अर्थ
गच्छता कालेन अवाध्टिवशात् सरः शनेः शनेः शोषमगमत्!
त्ततस्तदूदःखडःखितो तो ऊचलुः-* भो मिच्राजम्बालशषमेत-
ररः सञ्जातं तत्कथं भवान् भाविष्यतीति व्याकुलत्वं नो ददि
भाषाटीकासमेतम्। (१४५)
वसेते'! । तच्छत्वा कम्बुग्रीव आह-भोः! साम्मतं न अस्ति
अस्माक जीवितव्यं जलाभावात। तथापि उपायश्चिन्त्यत्ता-
मिति । उक्तश्च- र
किसी सरोवरमे कम्बुग्रीव नाम कच्छप रहता था उसके संकट विकटनाम-
वाळे इंसजातिके दो मित्र परम स्मेहकी कोटिको प्राप्तहुए नित्मही सरोधरके समीप
रहतेथे । उसके साथ अनेक देवार्ष महर्बियांकी कथाकर सुययोस््तके समय अपने
घोंसलेका आश्रय करते । फिर कुछ दिनोंके उपरान्त भवर्षणसे सरोवर शनेः २
सूखने छगा, तब उसके दुःखसे दुखी इए वोह वोळे,-“हे मित्र ! यह सरोवर
तो कर्दम ( काच ) मात्र अवशेष हे सो आए केसे रहेंगे यह व्याकुळता हमारे
हृदयमें हे”? सो सुनकर कम्बुग्रीव बोळा,-“भो ! इस समय जळके अभासे
हमारा जीवन नहीं होगा तो भी उपाय विचारो । कहाहै-
त्याज्यं न चैय्यै विधुरेऽपि काले
अर्य्यात्कदाचिङ्गतिमाप्तुयात्सः ।
यथा सस॒द्रेऽपि च पोतभङ्गे
सांयात्रिको वाञ्छति त्तमे? ॥ ३४५॥
प्रारूधके विगड जानेमेंभी घेर्य त्यागन करना न चाहिये कदाचित् भैर्यसे
उसकी गति प्राप्त होजाय अर्थात् उपाय प्राप्त होजाय, जैसे सागरमें पोत
(जहाज ) मंग होनेपर पोतवाणिक् धेर्यसे तरनेहीकी इच्छा करताहे ॥ ३४१॥
अपरश्व-
औरमी-
मित्रार्थे बान्धवार्थ च बुद्धिमान्यतते सदा ।
जातास्वापत्छु यत्रेन जगादेदं वचो मलुः ॥ ३४६ ॥
बुद्धिमान् सदा मित्र और वाधवोंके निमित्त यल करे चाहे कैसीसी
विपत्तिहो मुने यह वचन कहाहे ॥ ३४६ ॥
तत् आनीयतां काचित ध्टरच्जुलंघ काएं बा, आत्विष्यतां'
च अभूतजलसनाथं सरो येन मया मध्यमदेशे द्न्तेगुहीते
सति युबा कोटिभागयोः तत्काष्टं मया सहितं _ संगृह्य
१०
(१४६) मञ्चतस्तम् ।
तत्सरो नयथः । तो ङचठुः,- भो मित्र ! एवं करिप्यावः
प्रं भवता मौनव्रतेन स्थातव्यं, नो चेत तव काष्ठात्
पातो भविष्याति” । तथा अछुएिते, गच्छता कम्बुग्रीवेण-
अधोभागव्यदास्थितं कञ्चित् पुरमालाकितं तत्र ये पोरास्ते
तथा नीयमानं विलोक्य सविस्मयामदमूचुः,-' अहो !
चक्काकार किमपि पक्षिभ्यां नीयते, पश्यत पश्यतत? अथ
तेषां कोलाइलमाकण्यं कस्उग्रीव आइ-- भो; | किमेष
कोलाइलः'' इति वक्तमना अद्धोक्ते पातितः पौरेः खण्डशः
कुल । अतोऽहं ब्रवीमि- खुद्दा दितकामानाम्” इति ।
सो कोई च्ढरज्जु वा लघु काष्ट लाचा चाहिये भौर बहुत जलसे युक्त कोई
सरोवर खोज करो जिससे में उसका मध्यभाग भपने दांतोंसे पकडू और तुम
उसके दोनों किनारे पकड मुझ सहित उस सरोवरमें छेजाभो। वह बोले,
“भित्र | एसाही करेंगे परन्तु तुम मौन रहना, नहीं तो आपका काष्टसे पतन हो
जायगा” | तबते तेसा करनेपर जाते हुए कम्बुप्रीबने नीचे कोई पुर देखा |
वहांके पुरवासी उसको वैसा लेजाते देखकर विस्मयपूर्वक बोळे-“भहो ! यह
कया चक्राकार वस्तु पक्षि लिये जाते हैं देखो २? । तव उनका कोळाइळ
सुनकर कम्बुप्रीव बोठा,- भो | केसा यह कोळाहळहे'? ऐसा कहनेकी इच्छासे
आधा कहता इभा गिरा पुरवासियोने खण्ड २ करडाठा | इससे मैं कहताहँ
“हित द्वारी सुहृदोंका इत्यादि ? |
सथाच-
तेसेही-
अनागतविधाता च पत्युत्पन्नमतिस्तथा ।
` दांबेतो खुखमेधत यद्भविष्यो विनश्याति ॥ ३४७ ॥7
अनगतबित्रात्ता ( अन्नुपस्थितकगेको विचारकर करनेवाला ) प्रतयुत्पन्नमति
( उपस्थित विपत्के प्रतिकारमें समर्थ ) यह दोनों सुखसे इृद्धिफो प्राप्त होते हैं
बद्भविप्य ( जो भागमे है सो होगा ) नाश होताहे ॥ ३४७ ॥”
थिट्टिय आहु- कथमेतत् !? सा अब्रवीत्-
टिद्दिस बोळा-"यद्द केसा १? वह वोली-
a
भाषाटीकासमेतम् । (१४७)
कृथा १४.
कस्मिश्चिव जलाशये अनागतविधाता प्रत्युतन्नमतिः
यद्भविष्यश्चेति चयो मत्स्याः सन्ति । अथ कदाचित ते जला-
श्यं दृष्टा गच्छद्धिमेत्स्यजीविभिरुक्त “यदहो ! बहुमत्स्योऽयं
हदः कदाचिदपि नास्माधिरन्वेषित; । तदद्य तावदाहारः
वृत्तिः सञ्जाता, सन्ध्यासमयश्च संततः ततः प्रभाततेड्ञ आग-
न्तव्यनिलि निश्चयः” । अतस्तेषां तत्कुलिशपातोपमं वचः
समाकर्ण्य अनागतबिधाता सर्वान्मत्हमान् आहूय इदसूचे,-
“नहो ! शृतं भवद्विः यन्मत्हणजीविथिरभिहित्तम १ तत्
राजावपि गम्यतां कथश्धिन्निकटं सरः । उक्तश्च
किसी एक सरोवरमे अनागतविचाता प्रत्यच्पन्नमति और यद्भविष्य तीन मत्तस्य
रहतेथे, तब उत जढाशयको देखकर जाते हुए मत्स्पजीचिर्योने कहा-“अहो !
यह हृद बहुतसी मछछियोवाळा हे, हमने कमी इसकी खोज न की ! सो आज
तो आहारइत्ति हो चुकी ओर सन्ध्या भी होगई । सो प्रात काल यहा आओ
यह निश्चय है” । तब वज्पातके समान उनके बचनको श्रवणकर भनागत-
00
विधाता सब मछळियोको वुळाकर यह बोछा,-- भद्दो सुना आपने जो घीमरोंने
DR
कहा ? सो रातमेही किसी निकटके सरोवरमें चलो । कहा है-
अशक्तेबेलिन) शत्रोः कर्तव्यं प्रपलायनम् ।
संश्रितव्योऽथवा दुर्गा नान्या तेषां गलिभेबेत् ॥ ३४८ ॥
असमयोंको बळ्वान् शत्रुओके निकटसे पळायन करना चाहिये अथवा
में स्थिति करे उनको दूसरी गति वहीं है ॥ ३४८ ॥
लन्तूनं भभातसमधे मत्स्यजीविनोऽत्र समागम्य मत्स्यसं-
क्षयं करिष्यन्ति एतन्मम मनासि वर्तते । लन्न सुक्त साम्प्रतं
क्षणमपि अवावस्थाठुल् । उत्तश्व-
सो अवद्यही प्रमातसमय मत्स्यर्जीवी यहा आकर मत्स्योका नाश करेंगे
यह मेरे मतें वर्तता हे सो इस समय क्षणमात्र माँ यहा रहना उचित नहीं है |
कहा है- " |
(१४८) ` पञ्चतन्त्रम्दः.।
विद्यमाना गतियेंषामन्यत्रापि सुखावहा ।
ते न पश्यन्ति विद्वांसो देहभङ्गं कुलक्षयम् ॥ ३४९ ॥”
जिनको अन्य स्थानमें सुखदायक गति विद्यमान है वे विद्वान् दहभंग और
कुछक्षयको नहीं देखते हैं ॥ ३४९ |”
तदाकण्ये मत्युत्पन्नमतिः आह-अहो ! सत्यमभिहितं
भवता,ममापि अभीष्टमेतत, तदन्थत्र गम्यतामिति । उक्तः्व-
यह सुन प्रत्युत्पन्मति बोछा-/ अहो | भापने सत्य कहा, यह मुझकोमी
अभीष्टहे सो अन्य स्थानमें जाना चाहिये | कहाहै- ,
: परदेशभधाद्गीता बहुमाया नएंसकाः। .
|, स्वदेशे निधनं यान्ति काकाः कापुरुषा मृगाः ॥ ३५० ॥ ,
परदेशके भयसे भीत बहुत ममतावाळे नपुंसक काक कापुरुष और मृग
बहीं मृतक होजातेहें || १५० |
यस्यास्ति सर्वेत्र गंतिः स कस्मात्
स्वदेशरागेण हि याति नाशम् ।
तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणाः
क्षारं जलं कापुरुषाः पिबन्ति ॥ ३५१ ॥ ?
जिसको संवेत्रगति विद्यमानहे वह अपने देशके रागसे क्यों नाश होताहै
A) क
पिताका कुआहे एसा बिचार कर खारे पानीको पुरुष पीते हैं || ३५१ ॥ ”
= हन
अथ तत्समाकण्य म्रोचीवहरूप यद्भाविष्यः प्रोवाच,
“अहो ! न भवद्भ्यां मन्त्रितं सम्यगेतादिति। यत्तः कि वाङ"
माञ्जेणापि तेषां पितृपेतामहिक॑ एतत्सरः त्यक्तं युज्यते |
यदि आयुःव्तयोऽस्ति तदन्यत्र गतानामपि मृत्युनंविष्यति
एब । उक्तश्च-
यह वचन सुन ऊच स्वरसे इसकर यद्भविष्य बोला,-“भहो ! आपन,
अच्छा मत्र नहीं किया सा क्या वाणामात्रसंहा उच पता पितामहादका यह
सरोवर त्यामन करदे ? यादे आयुका क्षयहै तो भन्य-स्यान्मे जाकर भी मृत्यु
होगी । कहाहे-
माषादीकासमेतम्। (३४९)
अरक्षितं तिष्ठति देवरक्षितं
सुरक्षितं देवहतं विनश्यति ।
जीवत्यनाथोऽपि वने विजितः
कुतमयत्नोऽपि गहे विनश्याति ॥ ३५२ ॥
अरक्षित पुरु दैब्से राक्षित इआ स्पित रहताई वचत हत होतेते उर
अराक्षत पुरर देव्सं राक्षेत इसा तयित रहता व्वत्त हत हाकत उर
शितमी नष्ट होता है । बनो त्यागत किया सनाथमी जीताहे स्गेर वत्वक्रने
पर घर्मे मी नहीं जीता हे ॥ ३५२ ॥
क अण £]
तदहं न यास्यामे भवद्यां च यत्मतिभाति तत्कर्नव्यम्" ।
अथ तस्य तं निश्चय ज्ञात्वा अनागत्तादिवाता अत्युत्पन्नमतिश्च
निष्क्रान्तौ सह परिजनेन । अथ प्रनाते तेमंत्त्यजीवोभे-
जलिस्तजलाशयमालोह्य यद्गविप्येण सह तत सरो निम"
त्स्यतां नीतम्! अतोऽहं ब्रवीमि “अनागता तिधता च'इति
तव ज्ञात्वा टिट्टिस आइ- भद्रे ? कि मां यह्भविष्यसदशं
सम्भावयसि ? तत्पश्य मे डुद्धिमभावं यावदेनं दृष्टस बुर
स्वचञ्चत्रा शोषयामि" । डिड्चमी आह- अहो ! कस्ते
समुद्रेण सह विग्रह; १ तन्न युक्तमस्योपरि कोपं कुस ।
उत्त्तसव- ः ह॒
तो मैं तो सौर स्वातर्गे त जाऊंगा जो च्याक्षो सच्छा को सो क्र
साम तो सर स्थादचड थे जाऊया जो चापका ऊच्छा रुग था करा ]
~= > ड्स तिश्वपको जानकर केक पकै oS सपे.
तव उत्तन इस नच्पकत जावकर अदागंतदादादा आर शडुसबनात पार
सस सहित वहाते चछेगये | 7 त.काळ डोम्रोने से उस नाते:
जन { लुदुन्त्र ) सहित वहाते चछेमये | प्रात-क्ाऊ गम्सच जालस उस सरो-
ञ्र्को ~ क्ग्डो DO सुरा य्दा > 2000 ट्ट सरोऽर म्च्यरह्ति > दरिया ञे
उर्ा ज्गजीडले वर य्द्वोनयक सग वह सरॉगर मत्वरातत कड्या । इन
CN 20 [ CT NS. Ny Me ee]
म वाहता हू वनागदाववाता अाउचननत [ वह सुव टिंच्य दाला सन.
ञ्या त् न यद्धविष्यकी ~ जानती CF $ hn HE > hs PO SE»
च्या तू उत्त वद्चावसकोा सनान जानता ह £ ता रुणा टुटे प्रमावक्गादळ कि,
इस दुख्न तर अपनी चोचत जोळे हूँ | दिन्टिमी चोळी
इत दुष्ट सछा अरवा चचत झाड डालता हूं ते ननम वाजा
ऽजो! से दुन्दारी कैसी छाई £ सो इसके उपर मोल करना
चहा : सळुळ्स दुन्हाण कासा छाई £ सरा इ अपर ऋ करना
ड =
> पु > क्यै >
पुंसामतमधोनासपद्रवायात्मनो भवेत्कोपः ।
पिठरं ज्वलदतिमात्रं निजपाश्वोनिव दहतितराम् ॥३५३॥
(१५०) पञ्चतन्त्रम् ।
असमर्थ पुरुषोंका कोघ अपने नाशके ही निमित्त होताहे अत्यन्त जळती
हुईं कसेरी अपने निकटकोही जढातीहै ॥ ३९३ ||
तथाच- ह
और देखो-
अविदित्वात्मनः शक्ति परस्य च समृत्छुकः। `
गच्छन्नभिसुखो नाशं याति वही पतंगवत् ॥ ३२५४ ॥?
जो उत्कोठित हो अपनी शक्ति और परकी शक्ति विनाजाने सन्मुख जातांहे
बह अग्निम पतगकी समान नष्ट होजाताहे ॥ २५४ |? )
टिट्टिभ आह-प्रिये ! मामेवं बढ थेषासुत्साहश
सवात त स्वल्पा आप गुरून् विक्लसन्ते । उक्तश्व-
ठिट्लिम बोंला,-/प्रिंये ! ऐसा मत कहो जितको उत्साहशक्ति होतीहे
स्वल्पमा बड बडापर आक्रषण करते ह। कहाहँ--
वबिशषवात्पारपूणस्य यात शतारमघषण) | ,
आलिमुख्यँ शशाङ्कस्य यथाद्यापि विघुन्तुदः ॥ ३५५ ॥
क्रोध राज वराषधकर पारइणकहा सन्सुस जातह् जस राइ अभतिक
चन्द्रमाके सन्मुख ॥ ३५५ ॥
तथाच--
भोरभी देखो- ,
प्रमाणादथिकर्यापि गण्डश्यानमदच्युलेः
पढे साधि समाधत्ते केसरी मत्तदन्तिनः ॥ ३५६ ॥
प्रमाणसेमी अधिक, गण्डस्थलमें इयाम, मदत्यागनेवाले मत्त हार्थाके सिरपर
सिंह चरण रखता हे ॥ ३९६ ॥
तथाच-
तैसेही-- ॥
| : बालस्यापि रवेः पादाः पतन्त्युपरि, भूमताम् ।
तेजसा सहजातानां वथः कुत्रोपयुज्यते ॥ ३५७ ॥
बालक सूर्यकी किरणों पर्वतोके ऊपर गिरती है तेजके साथ उत्पन हुक
अवत्या नहीं देखीजातीहे ॥ ३९७ ॥
भाषारीकासमेतम्। (१५१)
` हस्ती स्थूलतरः स चाइकुशवशः कि हस्तिमात्रोंऽकुशः
दीपे प्रज्वालेते प्रणश्यति तमः कि दीपमान तमः ।
बञ्जेणापि शताः पतन्ति गिरयः कि बञ्रभात्री गिरे-
स्तेजो यस्य विराजते स बलवान्स्थूलेषु का प्रत्ययः ३५८
, हाथी महास्थूलहै वह अकुशफो वाहे क्या भकुश हार्थीकी समान है * दीप-
कके ज्वळित होनेमें भधकार नाश होताहे क्या दीपक भधकारकी समान है ६
वन्नसे सैंकडों पषेत मिरजाते हैं क्या बज्र पर्वतकी समान हे ? तेज जिसमे है
बही बलवान् हे मोटे रारारबालोमे क्या बिश्वास है ॥ ३५८ ॥
तदनया चञ्च्वास्य सकलं तों शुष्कस्थलतां नयामि? ॥
उेट्टेमी आह-भोः कान्त ! यत्र जाहवी नवनदीशतानि
गुहीत्वा नित्यमेष प्रावेशाते तथा सिन्धुश्च, तत्कथं त्वमष्ठा-
दशनदीशतः पूय्यभाणं तं विषुषवाहिन्या चञ्च्वा शोऽथिः
ष्यसि ?। तत् किमश्रद्वेथन उक्तेन? । टिट्टिभ आइ- “मिय!
सी इस चोचसे इतका सम्पूर्ण जळ सुखा बाळगा” टिट्विमी बोली,- मो
स्वासंन् । जहां गया चदा तासा नाद्याको लकर नित्यही प्रवरा करता हं तथा
सिन्धु नदर्भा, सो किस प्रकार तू अठारहसा नदियोसे परयेमाण उस सागरको
जलकण वहन करववाळा च।चस सुखासकंगा * सा अश्रद्धव बचवाप क्या
८०
लाभ है टिट्टिम बोळा, “प्रिये |
अनिर्वेदः श्रियो मूलं चञ्चुमै लोइस्न्निभा ।
अहोरात्राणि दीर्घाणि समुद्र; किं न शुष्यति ॥ ३५० ॥
निवेदका नहाना उद्योग) छक्ष्मीका मूळ है मेरी चोच छोहनिमितसो है दिव
रात दाघह समुद्र कया न सूखंगा ॥ २५९ ॥
दुराधगमः परभागो थावत्युरुषेण पौरुष न तमू ।
जयाति तुलामघिरूटो भास्वानापि जलदपटलानि ३६०॥
प्रायामाग कॉर्ठेवतास ।मेछताहु, परन्तु तभातक, जबतक [क,- पुरुष पुरुषाथे
नहीं करताहे तुळा (सक्रमणोमें प्राप्त हुआ सू्यमी मेघसमुइका जीतताहे ३ ६०४”
टिट्टिग्याह- यदि त्वयावश्यं ससुद्रेण सह बेरानुष्ठार्न
कार्य तदन्यानपि दिहगानाद्वय छुहनसाहत एव समाचर ।
डँ om
(१५२) पश्चतन्त्रम ।
टिट्टिमी बोढी--“अवश्यही यदि समुद्रसे विग्रह करतेहो तो और बिहंगमोको
बुलाकर सुहजतोंके सहित ऐसाकर । कहाहे-
बहूनामप्यसाराणां समवायो हि , दुर्जयः
तृणेरावेष्टचते रज्ज्ञथया नागोपि बध्यत ॥ ३६१॥
बहुत निर्बलोंका समूहमी दुर्जय है तिनकोंसे बनी इई रस्सीमें हाथी घांध
लिये जाते हैं ॥ ३६१ ॥
तथाच-
सोरभी कहते हे-
चटकाकाष्ठकूटेन मक्षिकादडरेस्तथा ।
महाजनविरोधेन कुञ्जरः प्रलयं गतः ॥ ३६२॥
काष्ठ कूटसे चटका, मेडकोसे मक्षिका तथा महाजनोंके विरोधसे हाथी
प्रज्यको प्राप्त हुआ ( नाश होगया ) ॥ ३६२ 0”
` टिट्टिभ आइ- कथमेतत् !” सा भाह-
टिट्टिम बोछा,- यह कैसे १? वह बोछी-
कंथा १५.
कर््मिश्विद्नोदेशे चटकदंपती तमालतरुकृतनिलयों
प्रतिवप्तत। ! अथ गच्छता कालेन संततिरभवत ।
अन्पस्मित्रहानि प्रमत्तो गजः कश्चित्तं तमालवृक्षं घर्मा-
तश्छायार्थी समाश्रितः । ततो मदोत्कर्षात्तां तस्य
शाखां चटकाक्रान्ता पृष्कराम्रेणाकृष्प बभञ्ञ। तस्याः
' भंगेन चटकाण्डानि सर्वाणि विशीर्णानि । आयुः-
शेषतया च चटको कथमपि घाणैर्न विशुक्तो । अथ
साण्डभंगाभिभूता प्रलापान्कुर्वाणा न कथंचिदति-
छत | अत्रान्तरे तस्यास्तान्म्रलापाञ्छृत्वा काष्ठकूटो
नाम पक्षी तस्थाः परमसज्ुहत्तदःखडःखितोभ्येत्य तामु-
वाच-*'भवति ! कि बृथामलापेन । उक्तक्व- `
किसी एक वनके निकट चटक चटकी तमाळवृक्षनें घोंसळा बनाकर रहते
थे । कुछ समयके उपरान्त उनके सन्तान हुईं । किसी दिन मत्त हुआ घनका
भाषारीकासमेतम् । (१५३)
हाथी तमालवृक्षके नीचे धूपसे घबडाया छायाकी इच्छासे भावेठा, मदके उत्क-
पैसे उस दृक्षकी उस शाखाको जिसपर चटक था अपनी सूडके अम्रभागसे
'खैंचकर तोड डाला, उसके टूटनेसे चटकके समूर्ण अण्डे मन्न होगये आयु
शेष रहनेसे किसी प्रकार चटका चटकी प्राणोसे वियुक्त न हुए | तब चटका
निज अंडोके भंग होनेसे तिरस्क्रत हो रुदन करती कुछमी सुखको प्राप्त व इई
उसी समय इसके इस प्रढापको सुन खुटबढई नामकपक्षी उसका परममुहृत्
उसके दुःखे दुःखी हुआ आकर उससे बोला- भगवति ! कयो बधा रुदन
करती हो । कहाहै-
नष्ट मृतमतिक्रान्तं नाहुशोचन्ति पण्डिताः ।
पण्डितानाथ सूर्खाणाँ विशेषोष्ण यतः स्मृतः ॥ ३६३ ॥
नष्ट, मृत भौर विशीर्ण हुएका पडितजन शोच नहीं करते हैं यही पडित
और मूर्खौम विशेष ॥ ३६३ ॥
तथाच-
तैसेही-
अशोच्यानीह भूतानि झो सूठस्तानि शोचति ।
स दुःखे लभते दुःखं द्वावनथों निषेवते ॥ ३६४॥
इस ससार जो मूढ अश्ोच्योंको शोच करताहै वह दु'खरम दुःख दोनों
अनर्थोको सेवन करताहे ॥ ३६४ |
अन्यच्च-
औरमी-- हि
पन Ce ७-0 Lo चान. पि
छेष्माश्वु बान्धवेसक्त भेतो सत्त यतो$वशः ।
~
तस्मान्न रोदितव्यं हि क्रिया; कार्य्याश्च शक्तितः ३६८॥?
बाधवोंके त्यासच किये ३लेम्माश्रु आधुभाकों प्रेत अबशहोकर मोगताहै इस
कारण रोना उचित नहीं शक्तिके अनुसार उसकी क्रियाकरे॥ ३६५ ॥”
चटका भाह- अस्त्वेतत् । परं दष्टगजेन मदाव मम
सन्तानक्षयः कृतः, तद्यदि मम त्वं सुहत् सत्यस्तदस्य
गजापसदस्य कोऽपि वधोपायश्चिन्त्यतां यस्य अतुष्ठा-
नेन मे सन्ततिनाशदुःखमपसरति । उक्तश्व-
(१५४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
~
चटकान कहा,-- यह सत्यहे परन्तु दुष्ट हाथीने मदसे मेरी सन्तान क्षय
करडाली सो यदि तुम मेरे सत्य सुहृद् हो तो इस नीच हाथीका कोई वधोपाय .
चिन्तन करो जिसके करनेसे मेरी सन्ताननाशका दुःख दूरहो । कहाहै-
आएदि येनापकृतं येन च हसितं दशासु विषमाछतु ।
- अपकृत्य तयोरुभयोः पुनरपि जातं नरं मन्ये ॥ ३६६॥”
जितने आपत्तिमें घुरा किया, दुःखदशामें जिसने हास्य किया उन दोनोंका
अपकार करके में मनुष्यका फिर जन्म होना मानता हूं ॥ ६६६ ॥?
काछकूट आह-भगवति! सत्वमभिहितं भवत्या। उक्तच-
खुटबढई बोला--“भगवाति | तुमने सत्य कहा । कहा भी है--
स झुहृद्यसने यः स्थादन्यजात्णुङ्गवोऽपि सन् ।
बृद्धो खवोऽपि मित्रं स्यात्तवेषामेव देहिनाम् ॥ ३६७॥
चाहे अन्य जातिका है पर दुःख जो सहाय करे वही झुहदू है इद्धम सव
देहघारैयोके सव मित्र होते हें ॥ ३६७॥ -
स सुहद्वचसने थः स्यात्स पुत्रों सस्तु भक्तिमान्।
ख़ भृत्यो यो विधेयज्ञः सा भार्य्या यंत्र निरतिः ॥३६८॥
वहीं सुहदू हे जो, दुःखें साथ दे, वही पुत्र हे जो भक्तिमान् है, वही सृत्य
हे जो विधिका जाननेवाछा हे और वही भाय्यी हे जिसे सुख हो ॥ ३६८ |
तत्पश्य मे घुद्वित्रभावं, परं ममापि खुहृदभता वीणारवा
नाम सक्षिका अस्ति । लत तामाहूय आगच्छामि थेन स
दुरात्मा ढुष्टगजो वध्यते] अथ अलो चटकया सह-माक्षि-
कामासाद्य मोवाच-''भद्रे ! मम इष्टा इथं चटका ' केनचिद्
दुष्टगजेन पराभूता अण्डस्फोटनेन लत्तस्य वथोपायमदुतिः
छतो मे साहाय्यं क्ुंमहलि” । मक्षिकापि आइ-"'भद्र !
किसुच्यतेऽत्र विषये । उक्तश्च
सो मेरी बुद्धे प्रमावको देखो, परन्तु मेरी एक, मित्रंभूत वीणारवा नामक `
मक्खी है-उसको बुलाकर आता हूं जिससे षड दुरात्मा दुष्ट हाथी मरे”. तत्र यह
चटकाके सहित मक्षिकाको प्राप्त होकर बोळा,-“मड्े ! मेरी सुहृद् यह घटका
किसी दुष्ट हाथीने- सण्डे नष्ट कर तिरस्कृत की है। सो इसके वघोपायका भनु-
भाषाटीकासमेतम् । (१५५)
छान करनेग मेरी सहायता करो” । मक्षिका बोळी,-“'मद्र | इम विषयमे क्या
आहते हो । कहा है-
पुन; भत्युपकाराय मित्राणां क्रियते प्रियम् ।
यत्पुनमिंच्रमित्रस्य कार्य मिन्नेने कि कृतम् ॥ २६९ ॥
फिर प्रत्युपकारके छिये मित्रोका प्रिय किया जाता है फिर मित्रोका कार्य
मित्रे कोनसा नही करते सब करते हैं | ३६९ ॥
सत्यमेतत् परं ममादि भेको मेघनादो नाम मित्रं तिष्ठाति;
तमापि आहूय यथोचितं कुम! । उक्तख-
यह सत्य हे, परतु मेरा मित्र एक मेघनाद नामक मेडक है सो उसेभी
बुळाकर ययोचितकार्य करें, कहा है-
हितः साधुसमाचारैः शाखत्तेमतिशालिणिः
कथक्चिन्न विकहपन्ते विद्ृद्धिखिन्तिता नयाः ॥ ३७० ॥”
हितकारी भच्छे आचरणवाले शाङ्वज्ञाता बुद्धिमान् विद्वानोका विचारा हुआ
कमी अन्यथा नहीं होता ॥ ३७० |”
अथ ते त्रघोऽपि गत्वा मेघनाइश्य अग्रे समस्तमणि
वृत्तान्तं निवेध तस्थुः | अथ स प्रोबाच-' “क्ियन्मात्रोऽसो
वराको गजो महाजनस्य कुपितस्यामे । तन्मदीयो मन्त्रः
प्रेकत्तेव्य; । मक्षिके । त्वं गत्वा मध्याह्नसमये तस्य मदोद्धतस्य
गजस्थ कर्णे बीणारबसहश शब्दं कुरु, थेन श्रवणसुखला-
लसो तिमीलितनयनो भवति । ततश्च काछङूटचंच्चा स्फो-
टितनयनोऽन्धीमूलः तृषार्तो मघ गर्ततटाश्रितस्य सपरिक-
रस्य शब्दं इत्वा जलाशयं मत्वा समभ्येति । ततो गत्तमा-
साद्य पातिप्याति पञ्चत्वं यास्पाति च । इति । एवं समवायः
न्यो यथा वेरसाधनं भबति?’ । अथ तथा अाडिते स
। मत्तगजो मक्षिकागेयसुखातनिमीलितनेत्रः काछकूटहतचक्षुः
मध्याहसमये भ्राम्यन् मण्डुकशब्दानुसारी गच्छन् महतीं
गर्तामासाद्य पतितो मृतश्च । अतोऽहं ब्रवीमि चटका काष्ठः
कूडेन'' इति ।
वनमा
(१५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
` तब वे तीनों जाकर मेघनादके आगे समस्त ठत्तान्तको निषेदन कर स्थित
इए । तब कहने छगा कि-“क्या वस्तु है यह क्षुद्र हाथी कध किये डू
महाजनोके भागे ! सो मेरी सम्मति करो। मक्षिके! तू जाकर दुपहरके समय उस
मदो'द्धतहार्थाके कानमें वीणाशब्दकी समान शब्दकर जिससे श्रवणघुखकी लाळ-
सासे वह नेत्र माचलेगा, उसी समय यह खुटबढईकी चोंचसे भांख फोडा
हुआ आन्धा हो प्याससे व्याकुळ हुआ खाईके निकट मेरा पारैवार सहित शब्द
अवण कर जलाशय मानकर प्राप्त होगा | तब गतेको प्राप्हो गिरेगा भौर फिर
मरजायगा | इसप्रकार कोशळ करो तो वेरसाधन होजायगाः” तब यही करनेपर
मक्खीक गानसुखते नेत्र मीचतेहा. खुटबढईसे आंखे फोडाइआ मध्यान्ह समय
घूमता मडकके शब्दका अनुसरण करता'बडे गर्तो प्रापतहो गिरकर मरगया |
इससे में कहताहू "चटका ख़टबढईसे इत्यादि”
दिट्टिम आह-भद्रे ! एवं भवठु, सुहृदर्गसमृदायेन समुद्र
शोषाथेष्यामि” इति निश्चित्य बकसारसमयूरादीन् समाहूय
ओवाच- मनो; ! पराभूतोऽहं समुद्रेणाण्डकापहारेण तञ्चि-
न्त्यतामस्य शोषणोपायः”? । ले सम्मन्त्य प्रोचुः{ अशक्ता
वय सक्षुद्रशोषणे, तत् कि दथाअयासेन । उक्तश्व-
टिट्टिम बोळा,- “भदे | यही होगा सुहृद्रगोके सहित सागर झोषद्धग'”
ऐसा निश्चय कर वक सारस झृगादिको बुछाकर बोला-“मो | मुझे अण्डे हरण,
कर इस सागरने पराभूत कियाहे सो इसके सुखानेका कोई उपाय करो” । घे
सम्मति कर बोछे,--/सागर शोषनेमे हम असमर्थ हैं क्यों बृथा प्रयास करतेहो |
-- अबलः प्रोन्नतं शत्र थो याति मदमोहितः ।
युद्धार्थं स निवत्तेत शीर्णदन्तो गजो यथा ॥ ३७१ ॥
» निर्बठ और उन्नत इतुके पास जो मदमोहित होकर युद्धाथ जाताहे वह
शीणेदन्त हाथीकी समान युद्धके लिये निवृत्त होता हे | ३७१ |
. तदस्माकं स्वामी वेनतेयः अस्ति, तत्तस्मै सर्वमेतत् पारे
भवस्थानं निवेद्यतां येन स्वजातिपरिभवज्कुपितो वेरातृण्यं ग-
च्छाति । अथवा अञ्रावलेपं कारिष्याति तथापि नास्ति वो
दुःखम् । उक्तश्व-
भाषाटीकासमेतम् । (१५७ )
सो हमारा स्वामी गरुडहे सो उसके निमित्त यह परिमवका स्थान निवेदन
करो जिससे अपने जातिके परामवसे कोधित हुआ वैरकी अनुणताको प्राप्त
हशा । अथवा जो अवलेप ( गर्व ) करेगा तोमी दुख नहीं है । कहाहै-
सुहृदि निरन्तरचित्ते शुणवति भत्येष्ठवतिनि कलन्ने ।
स्वामिनि शक्तिसमेते निवेद्य दुःखं सुखी मवति ॥३७२ ॥
निरन्तर चित्तवाळे सुहृद, गुणवान् मृत्य, अलुबर्ती खरी, दाक्तिमान् स्वार्मासे
अपना दु.ख निवेदन कर सुखी होता हे ॥ ९७२॥
तद्यामो वैनतेयसकशं यतोऽसौ अस्माकं स्वामी? । तथा
“अदुष्टिते सर्वे ते पक्षिणो विषण्णवदना बाप्पपूरितद्दशः
वेनतेयसकाशमासाद्य करुणस्वरेण फूत्कतुमारब्धाः- अहो
अत्रह्मण्यमत्रझण्यम् ! अघुना सदाचारस्य टिट्टिभस्य भवति
नाथे सति, समुद्रेण अण्डानि अपहतानि । तत् प्रनष्टमघुना
पक्षिकुलम् । अन्येऽपि स्वेच्छया समुद्रेण व्यापादयिष्यन्ते ।
उक्तश
सो हम गरुडके पास जाते हे क्यों कि, यह हमारा स्वामी है” ऐसा करने-
पर सव पक्षी दुःखी मुख नेत्रॉमें आसुभरे गरुडजीको प्रापहो करुणास्वरसे स्त्रां
छेन को । “महो । भवध्य है भवष्यदे |! कि, इस सदाचार टिष्टिमके भण्डे
८कागरने हरण करळिये | सो अत्र पक्षिकुछ नष्ट हुआ । औरोंकोभी सेच्छासे
सागर नष्ट करेगा । कहाहै-
~
एकस्थ कर्म संवीक्ष्य करोत्यन्तोऽपि गर्हितम् ।
गतानुगतिको लोको न लोकः पारमार्थिकः ॥ ३७३ ॥
एकका कुत्सित कर्मे देखकर दूसरेमी वैसा करले हैं ळोककी भेडा चाल्हे
परमार्थकी नहीं ॥ ३७३ ||
पेथाच-
भौर देखो“
चाटुतस्करदुईचेसतथा साहसिकादिभिः ।.
पीव्यमानाः मजा रक्ष्याः कूट च्छय़ादिमिस्तथा ॥३७४॥
( १५८) पञ्चतन्त्रस् ।
| १७००
चाटुकार दुर्त साहासियोसे ( दुर्जन ) तथा कपट छल्वालेसे पीडित
हुई प्रजाकी रक्षा करनी चाहिये || ३७४ ||
प्रजाना धनषडभागो राज्ञी भवात रक्षितुः ।
अधमादपि षडभगो जायते यो न रक्षति ॥ ३७५ ॥
। रक्षा करतस राजाका प्रजाक धर्मका छठाभाग |मढताह आर जां रक्षा नहा
करता उसका अघमका छठा भाग प्राप्त हाता ह॥ ९१७५ |]
श्रजापीडनसन्तापात्समुद्धतो हुताशनः ।
राज्ञः शिथं कुल प्राणान्नादग्ध्वा विनिवत्तेते ॥ ३७६ ॥
प्रजापीडनके सन्तापसे उठीहुई अग्नि राजाकी लक्ष्मी कुछ और प्रार्णोको
दग्ध करकेही विइत्त होती है || ३७६ ||
राजा बन्धरबन्धूना राजा चक्षुरचक्षुषाम् ।
राजा पिता च माता च सर्वेषां न्यायवर्तिनाम् ॥ ३७७॥
अबन्धुओंका राजाही वन्धुहे, अनेत्रोंका राजाही नेत्रै सब न्यायमें बतेने-
चार्लोका पिता माता राजाही है॥ ३७७ ||
फलार्थी पार्थिवो लोकान्पालषद्यत्नमास्थितः।
Lan
दानमानादतायन भालाक्याराऽकुराएनव ॥ ३७८ ॥
फळकी इुच्छावाळा यत्नसे छोकोंकी पाळता करें और उनका दान मानकरे
जसे माळी जलसे अक्ुराका पाळता है ॥ ३७८ ||
यथा बीजाँछुरः सूक्ष्मः मयत्नेनामिरक्षितः ।
फलभदो अवेत्काले तदछोकः सुरक्षित; ॥ ३७९ ॥
जिसप्रकार सूक्ष्म बीजांकुर यत्नसे रक्षा किया हुआ काळम फर देनेवाला
होताहे इसी प्रकार झुराक्षत लाक भा हें ॥ ३७९ ||
'हेर्ण्यधान्यरत्मान यानाने एदोवेधाने च। -
तथान्यदाप यात्काख्चेखजास्यः रूपाञ्पण्य तत् ॥ ३८० |
सुबण, धन, रत्न अनेक ।वेमान और जो कुछभोहेराजाको सब प्रजासे प्राप्त
होताहे ॥ ३८० |” हैं
अथ एबं गढ्ड; सभाकण्य तहु खद॒।खिते कोपाविष्टश्च
इथचिन्तयत्। “अहो ! सत्यपुक्तमेतेः पश्चिमिः तदद्य गत्वा
भाषाटीकासमेतम्। (१५९)
७
तं समुद्रं शोषयामः” । एवं चिन्तयतस्तस्य विष्णुदूतः समा-
गत्य आह- “मो गरुत्मन् ! भगवता नारायणेन अहं तव
थाश्वे प्रेषित), देवकाय्याध भगवान् अमरावत्यां यास्यतीति
तत् सत्वरमागम्धताम्' | तच्छुत्वा गरूडः साभिमानं ध्राह,~
“झो दूत | कि मया कुछत्येन भगवान् करिष्याति । तद्गत्वा
तं बद् यदन्धो भृत्यो वाहनाय अस्मत्स्थाने क्रियताम।
मदीयो नमस्कारो वाच्यो भगवतः । उक्तश्च-
यह वचन गरुड सुन उसके दु'खसे दु.खी हुआ कधकर विचारनें लमा |
“अहो | इन पक्षियोने सत्य कहा सो आज जाकर उस सागरको शोषछेगे? |
उसके यह विचार कारेमें विण्णुदूत भानफर बोला,- भो गरुड ] नारायण
भगवानून सु तुम्हार पास भजाहँ । दवकाव्येक ।नापेत्त भगवान् अपरावतावा
जायगे सो शांत्र आओ!” | यह सुन गरुड असिमानपूवक बोला,- भो दूत !
मुझ कुभृत्यत्ते भगवान् क्या करेंगे । सो जाकर उनसे कहो किसी और शत्यो
मेरे स्थानमै वहनयोग्य करे. । भगवानसे मेरा नमस्कार कहदेना । कहाएईँ-
थो न वेत्ति'शुणांब्यरथ न तं सेवेत पण्डितः ।
न हि तस्मात्फलं (किचित्खुकृष्टा दृष्पाद्व ॥ ३८१ ॥”
जो जिसके गुण नहीं जानता वुद्धिमानकों चाहिये ।के, उसकी सेवा चक्रे
:उससे कुछ फळ नहीं प्राप्त होताहे जैसे जोत्ती हुई ऊपाभूमिस | २८१ ॥?
दूत आइ खो वैनतेय ! कदाचिदपि भगवन्तं प्रति
त्यया न एतदामिहितमीइ ! तत् कथय कि ते भगवता अप-
मानस्थानं कुतस् !''गलड आह -'भगतदाअथभूलेन ससु-
द्रेण अर्माट्विरिशाण्डानि अपहतानि, त्यादि तस्य विग्रहं न
करोलि लदहं भगवतो न वत्य इत्येव निववरत्यम्रा वाच्या!
तेदडतरं गत्वा भअदता भगवत! समीय वक्तव्य” । अथ
ढतमखेनपणयकुपित बेनलेय विज्ञाय भगवान् चिन्वयासाला
“अहो ! स्थाने कोपो लनतेघस्य, तत् रपयमेव गत्या सम्मा-
नपुरशसरं तमानयामि! उ)"
3 ||
(१६० ) पञ्चतन्त्रम् ।
च
त बोछा ,-“भो गरुड ! कभीभी मगवानके प्रति तुमने ऐसे वचन नहीं
कृहेथे सो कहतो भगवानूने तुम्हारा क्या अपमान किया हैं 0” गरुड बाढा,--
““भगवानूके आश्रयमूत सागरने इस टिट्टिमके अण्डे ग्रहण करलिये सो यदि-
सागरको दण्ड न दियागया तो में मगवानका मृत्य नहीं यह मेरा निश्चय तू कह
देना सो तुम शत्र जाकर भागदानसे कहो” । तब दूतसे प्यारसे क्रोधित हुए
गरुडको जानकर भगवान् विचारते ठगे। “अहो ! गरुडका क्रोध सत्यही हे सो,
स्वयं जाकर सन्मानपूर्वक उसको छाऊं। कहा हे-
भक्त शक्त कुलीनश्च न भृत्यमपमानयेत् ।
पुत्रबछाळयेन्नित्यं य इच्छेच्छियमात्मनः ॥ ३८२॥
` भक्त समर्थ और कुलीन सेवका तिरस्कार न करे जो अपना मंगल चाहे तो
पुन्नवत् उसको ळाळन पालन करे ॥ ३८२ ॥
अन्यच्च
औरमी-
राडा. तुष्टोऽपि भत्यानामर्थमात्रं यच्छाति ।
तेतु सम्मानितास्तस्य पाणेरप्युपकुबंते ॥ ३८३ ॥”
राजा मूर्व्योपरः सन्तुष्ट हो घनमात्र देता हे और मृत्य सम्मानित हुए
प्राण तक लगा दते हैं ॥ ३८३ |!”
इत्येवं सम्प्रधाय्य रुक्मपुरे वेनतेयसकाशं सत्वरमगमत्;
वेनतेयोऽपि गृहागतं भगवन्तमवलोक्य 'त्रपाधोस॒खः प्रण-
म्योवाच- भगवन् ! त्वदाश्रयोन्मत्तेन समुद्रेण मम *रत्यस्य
अण्डाान अपहत्य ममापमाचा,वाइतः । पर भगवलछ्जाया
मया विलाम्बत नाचदनमह स्थलान्तरमदब नयाम, यतः
स्टामिभयाच्छुनोऽपि प्रहारो न दीयते। उक्तञ्च ,
. ऐसा विचारकर गरुडकें नगर सुकमपुसें .गरुडके निकट बहुत शीघ्र गये | |
गरुड भी; घर आये भगवानको देख, ळजासे नाचे सुखकर प्रणाम कर बोळा,
“भगवन ! तुम्हो( आश्रयसे उन्मत्त हुए समुद्रे मेरे मृत्यके अण्डे ठेकर मेरा
अपमान किया । सो आपकी छज़ासेही देर करी नहीं तो इसे में आजही शुष्क”
करदूं, परन्तु स्वामीके भयसे कुत्तेको भी नहीं माराजाता | कहा दै“
भाषाटीकासमेतम् । ( १६१)
थेन स्याळघता वाथ पाडा चिते प्रभोः क्चित्।
प्राणत्यागेऽपि तत्कमं न क्ुर्य्यात्कुलसेवकः ॥ ३८४?
जिससे लघुता वा प्रमुके चित्तमें कुछमी पीडाहो कुळसेब्क प्राणके त्यागे
भी वह कर्म न करे ॥ ३८४ ॥”
तच्छत्वा भगवान् आह- भो वैनतेय ! सत्यमभिहितं
भवता । उक्तश्च-
यह सुनकर भगवान् बोछे,-- हि गरुडजी ! आपने सत्य कहा, कहाहे कि-
भृत्यापराधजो दण्डः स्वामिनो जायते यतः ।
तेन लज्जापि तस्योत्था न भ्ृत्यस्थ तथा पुनः ॥ ३८५ ॥
भृत्यके अपराघसे उत्पन्न इभा दण्ड स्वामीको होता है उससे उस स्वामी-
को जो ञञ्ञा होती दै ऐसी सत्यको नहा ॥ ३८५ ॥
तदागच्छ यन अण्डानि समुद्रादादाय टिट्टिमं सम्भाव-
यावः अमरावलीश्व गच्छावः” । तथानुछिते समुद्रो भगवता
- निर्मत्स्थं आग्नेयं शरं सन्धाय अभिहितः, “भो इरात्मन्!
दीयन्तां टिट्टिभाण्डानि नो चेत् स्थलतां त्वां नयामि’ ।
ततः समुद्रेण सभयेन टिट्टिभाण्डानि तानि भरदत्तानि, टिट्टि-
मेनापि मार्य्याये समर्पितानि । अतोऽहं ब्रवीनि, “शत्रोः
लमविज्ञाय” इति ।
सो आओ समुद्रसे अण्डे लेकर टिट्रिभका सत्कार करें और भमरावतीको
जाय । ऐसा करमेपर सागरको भगवानूने घुडक भन्निबाण चढाकर कहा-
*'दुरात्मन् टिट्टिमके भण्ड दे नहीं तो तुझको शुष्क कर दृगा” | तब सागरने
डरकर टिट्टिमके अण्डे थे देदिये । टिट्टिमने अपनी खरको समर्पण किये इससे में
कहता हू “शत्रुका बळ बिना जाने इत्यादि? ||
तस्मात पुरुषेण उद्यमो न त्याज्यः? । तदाकर्ण्य सञ्जीवः
करुतमेव भूयोऽपि पत्रच्छ,- म मित्र ! कथं ज्ञेयो मया असो
दृ्टब॒द्वधिरिति । इयन्तं कालं यावदुत्तरोत्तरस्नेहेम प्रसादेन
-च अहं इष्टो न कदाचित तद्विकृातिदष्टा, तत क"यतां थेना-
११
(१६२) पञ्चतन्त्रम् ।
हमात्मरक्षार्थ तद्वधाय उद्यमं करोमि”। दमनक आह-
“द्ग | किमत ज्ञेयं १ एष ते प्रत्ययः, यादि रक्तनेच्रखि
शिखा छळाट दान सुक्किणी पारलालहनू त्घां ष्ठा भवात-
तदुट्डाद्वरन्यथा सुपतादश्वेति तदाज्ञापघ सास्, गश्रय
भराति गच्छामि । त्वया च यथा अर्थ नन्घभेदो न भवाति तथा
काय्येस् । यदि निशामुखं प्राप्य गर्त शक्नोषि तहेशत्यागः
कार्य्यः । यतः-
इस कारण पुरुपको उद्यम त्यागन करना न चाहिये” यह सुनकर संजीवक
फिर उससे पूछने ठगा-“'भो मित्र ! में केसे जानू कि, यह हुष्टबुद्धि हे
इतने समयतक उत्तरोत्ता बढ़ेहरए खेहसे और प्रसन्नताते उसको देखा कमी
उसका विकार नहीं देखा । सो कह जिससे में अपनी रक्षा उसके पके
निमित्त उद्योग करूं” | दमनक बोळा,-“भद्र | में इसमें क्या जानू । यह
तुम्हारा विश्वास है ! जा छा नेत्र शिखा किये टेढी मीहे जीम चाटता इभा
तुझे देखे तब जानना कि, यह दुष्टवुद्धह नहीं तो प्रसन्न जानना! सो मुझे
आज्ञां दो कि में अपने आश्रमको जाऊ । परन्तु यह हमारा मंत्रभेद न हो ऐसा
तुमको करना चाहिये। भौर जो रात्रिक समय जानेमें समर्थ हो तो यह देश
त्यागन कर । क्योंकि
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे आमस्यांथ कुल त्यजेत् ।
आमं जनपदश्यार्थे आत्माय पृथिवी त्यजेत ॥ ३८६ ॥
कुछके निमित्त एकको व्यार्गन करे, ग्रामके निमित्त कुलको त्यागे, देखे
निमित्त ग्रामको और भात्माके निमित्त एध्वीको मी त्यागे ॥ ३८६ ॥
आपदर्थे धनं रक्षेदारात्रक्षेद्धनेरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद्ारेरपि थनेरपि ॥ ३८७॥
आपतिके निमित्त घनी रक्षाकरे, चियाको धनसे रक्षाकरे, और सात्माको
खनी शौर धनसे सदा रक्षाकरे ॥ ३८७ ॥
बलवताभिभूतस्य विदेशगमनं तदहुम्रदेशो वा नीतिः।
तद्देशत्यागः काय्येः । अथवा आत्मा सामादिभिरुपायेर-
भिरक्षणायः । उक्तश्च-
भाषाटीकासमेतस् । (१६३
बढवानछे तिरस्कृत हो विदेशमगन अथवा उसका आश्रय केरनाही नीति
है सो देशका व्याग करना उचित है। अथवा आत्मा सामादि उपायोंते रक्षाके
योग्य है। कहा है--
अपि पुञकलतेवा मराणात्ररक्षत पंडितः ।
विद्यमानेर्यतस्तेः स्यात्स भूयोऽपि देहिनाम् ॥ ३८८॥
' पडित पुत्र और कठत्रोकेभी जानेते प्राणोंकी रक्षा करे, कारण कि, प्राणो
बहनेले देहघारियोको फिरभी सब होजाते हं | ३८८ ॥
तथाच-
आर दखो-
येन केनाप्युपायेत शुभेनाप्यशुभेन वा ।
उद्धेरदह्ीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥ ३८९ ॥
जिस किसी शुम वा अशुभ उपायसे दीन आवाका उद्दार करवा,
कारण कि, समर्य होकर धर्म करसकेगा ॥ ३८९ ||
यो माथां कुडते सूळ प्राणत्यामे धनादिषु ।
तस्य प्राणाः भणश्यान्ति तेतेटेनष्टमेब तत् ॥ ३९०॥”
जो मूर्ख प्राणत्यागमे भनादिकोमे ममता करता है उसके प्राण नष्ट होते हैं
उनके नष्ट होमेमे बह सब नष्टहैही || ३९० |!
एवमभिधाय दमनकः करटकसकाशमगमत् । दरद”
कोऽपि तमायान्तं दृष्टा प्रोबाच- क्द्र ! कि क्त तत्रः
सवता १ ” दमनक आह-' मया यावत नीरतिबीजनि-”
चोपणं कृतं परतो देवविहितायत्तम्। उक्तश्च यतः-
यह कह दमनक करटकके समीप गया। करठक उसे आया देखकर वोळा-<
“मड | क्या किया आपने |? दमनक बोछा- मैंने तो बीतिबीज बोदिया
आगे करना देवके आधीच दे । क्योंकि कहाहे-
पराङ्मुखेऽपि दैवेऽत्र कृत्यं कार्य्य विपश्चिता ।
आत्मदोषविनाशाय स्वचित्तत्तम्मनाय च ॥ ३९१ ॥
देवके पराड्मुख होनेपरमी अपने दोष नाशकरने और स्त्रचिचके स्तम्भन
करनेके निमित्त घुद्धिमानको काये करना चाहिये ॥ ३९१ ॥
(१६४) 'पश्चतन्तरम् ।
तथाच-
और देखो- ट
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपेलि लक्ष्मी- -
देव हि देवमिति कापुरुषा वदान्ति ।
देवं निहत्घ कुरू पौरुषमात्मशक्तया
यले कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ॥३९२॥
उद्योगो पुरुषसिइ छक्ष्मीकों प्राप्त होते हैं । दब देता हे यह कायर पुरुष
कहते हैं दैवको त्याग आत्मशक्तिसे पुरुषार्थ करो यत्न करनेपर यदि'सिद्ध न हो
तो किसीका क्या दोप हे ॥ १९२ [7
करटक आह-''तत् कथय कीहकू त्वया नीतिवीजं
निर्वापितम्?” । सोऽब्रदीत- मघा अन्योन्यं ताभ्यां
मिथ्याप्रजल्पनेन भेदस्तथा विहतो यथा भूयोऽपि
मन्मयन्तो एकस्थानस्थितो न द्रक्ष्यसि” । करटक
आइ- अहो ! न युक्त भवता विहितं यत्परस्परं तौ
सरेहाद्रहदणो सुखाश्रयो कोपसागरे प्रक्षिप्तो । उक्तञ्च-
करटक बोछा-“सो कहो किस प्रकार आपने नीतिबीज बोया 2” | बह
बोछा- मैने परस्पर उन दोनोंका मिथ्या उक्तियोसे इस प्रकार भेद किया
-हे कि, फिर उनको एक स्थाबमें मंत्रणा करते इए तुम न देखोगे? करटक
-बोळा,-“भहये ! आपने यह युक्त नहीँ किया जो परस्पर खेहसे भादरहृदयवारे `
सुखके, आश्रय उन दोनोंकों कोपसागरमे डाला । कहाहै-
अविरुद्धं खुखस्थ ग्रो इःखमागें निथोजयेत् ।
जन्मजन्मान्तरे इःखी स नरः स्यादसंशयम् ॥ ३९३ ॥
अविरुद्ग और, छुखमे स्पित -इओंको दुःखमार्गे छगाता है वह मनुष्य जन्म
जन्मान्तरमें दुःखी होता है इसमें सन्देह नहीं ॥ ३९३॥
अपरे त्यै यद्गेदमात्रेणापि लुष्ठस्तदपि अंयुक्तं यतः सोऽपि
जनो विरूपकरणे समथो भवति नोपकर्सस । उक्तश्च-
भोर.जो तू भेदमात्रसेही सन्तुष्ट है सोमी भयुक्त ६ जो कि, सम्पूर्ण जन
विरूप करनेमें समर्थ होता हे उपकार करनेको नहीं । कहाहै- ,
भाषाटीकासमेतम । (१६५)
घातयितुमेव नीचः परकार्य्थ वेति न प्रसाधयितुम् ।
पातयितुमस्ति शक्तिर्वायोईकष नवोन्नमितुम् ॥ ३९४ ॥”
नीच परकार्यका नाश करताही जानता है सिद्ध करना नहीं | बायुका शक्ति
वृक्ष उखाडनेकी है जमानेकी नहीं ॥ २९४ ॥”
दमनक आह-'अनभिज्ञो भवान् नीतिशाखस्यतेन एतद् '
अवीषि । उक्तश्च यतः-
दमनकने कहा- आप नीतिशात्रको नहीं जानते इस कारण ऐसा कहते हो ।
-कहाहे-
जातमात्रे न यः शु व्याधिश्च प्रशमं नयेत ।
महाबलोऽपि तेनेव दृद्धि प्राप्य स हन्यते ॥ ३९५ ॥
उत्पन्न होतेही जो व्याधि ओर शह्रुको शान्त नहीं करता है बह महा-
बलभी उसके साथ बृद्धिको प्राप्त होकर नष्ट होता है| ३९५ |
तच्छचुभूतोध्यमस्माक॑ मंत्रिपदापहरणात् । उक्तश्च
सो यह हमारा मंत्रिपद हरनेसे शत्रुभूत है | कहाहे-
पितृपेतामह स्थाने यो यस्यात्र जिमीषते । |
स तस्य सहजः शङ्रुच्छेद्योऽपि प्रिथ स्थितः ॥ ३९६ ॥
जो जिसका पितृ पितामहा स्थान जीतनेकी इच्छा ' करताहे वह उसका
सहज ( स्वाभाविक ) शत्रु है बह प्रियमे स्थितमी नाइके योग्य है॥ ३९६ ॥
तत् मया स उदासीनतया समानीतोऽभयप्रदानेन यावद
जावद॒हमपि तेन साचिव्यात् भच्यावितः। अथवा साधु
चदसुच्यते ।
सो पहले में उदासीनतासे अभयदान देकर उसको छाया था सो उसमे
_ 'पहले मुझेही मन्निपदसे च्यावित किया | अथवा सत्य कहाहे-
दद्यात्साधुर्यदि निजपदे दुर्जनाय भवेशं
तन्नाशाय भवति ततो वाञ्छमानः स्वयं सः ।
तस्मादेयो विपुलमतिभिनीवकाशोऽधमानां |
जारोऽपि स्यादगहपतिरिति श्रयते वाक्यतोऽत्र ॥ ३९७॥
(१६६) पश्चतन्त्रस् ।
यदि साधु अपने स्थानमें दुजेनका प्रवेश करादेताहे सो वह उस पदकी
स्वयं इच्छा करता हुआ उसके नाशके छिपे यत्न करता हे इसकारण बुद्धि-
सानोको चाहिये कि, अधर्मोको प्रवेश न दे यह सुना जाता हे कि, जारमी
गृहपत हाता हैं | ३९७ ॥
लेन मघा तस्योपार बवापाय एप विरच्यते। देशत्यागाय
वा भविष्यति । त्च त्वा छुक्ता अन्यो न ज्ञास्यति, तदयु
कमेवत् स्वाथायालुष्ठितम् । उक्त यतः-
इस कारण सेने उसके ऊपर यह वधका उपाय रचा है । अथवा देशत्याग
होगा । सो यह तुम्हारे सिवाय और कोई न जानेंगा सो युक्तहीहे और यहभी
स्वार्थके निमित्तही अबुष्टान कियाहे । जो कि कहाहै-
नि्निंशं हृद्य कृत्वा बाणी क्षुरसमोपमाम् ।
विकल्पो$च न कर्तव्यों इन्यात्तत्रापकारिणम् ॥ २९८॥ ,
इदयको खन्न सरीखा और वाणीको धुरको समान करके विना विचारें
अपकारीको मारवा चाहिये ॥ ३९८ ॥
अपरे सुतोऽपि अस्माकं खोज्यो भविष्यति, तदेकं ताव-
द्वेरसाधमम् । अपरं साचिव्यश्च भविष्यति तृस्तिश्चेत्ति । तद्
झुणतयेऽस्मिन् उष स्यत कह्मान्मा दषयास त्व जाड्य"
भावात । उक्तश्च-
और मरकरभो वह हमारा भोज्प होगा ।, सो एक तो बेर साधन होगा
और मंत्रिपद तथा तृप्ति होगी । सो तीन गुणोंकों उपस्थित होनेमें मूर्खेतासे तू
क्यों सुझको दूषित करता हे । कहा हे-
प्रस्य पीडन कुवन्स्वाथसिद्धि च पण्डितः ।
मूठब॒द्धिन भक्षेत वने चठुरको यथा ॥ ३९९ र
पंडितजन पराई पाडा करकमा स्वाथासंद्धि करत हं मूढबुद्ध ता मागका
झमर्थ नहीं होता जेसे ब्रनर्म चतुरक ॥ ३९९ [7
करटक आह-**'कथमेतत् ९” स आह-
करटक बोजा-“'यह केसे ?” वह बोळा-
भाषाटीकासमेतम् | (१६७)
कथा १६
अस्ति कस्मित्रिद्ठनोदेशे बञ्दष्टो नाम (सिह! । तस्य
चवलुरकक्रव्यसुखनामानी शवगालब्कों भ्रत्यभूता सदेवालु-
गतो तत्रेव वने प्रतिवसतः । अथ अन्थादिने सिहेन क
चित आसन्नप्रसवा प्रसववेदनया स्वयूथाद् भ्रष्टा उष्टी उप
विष्टा कस्मिश्रिद्रनगहने समासादिता । अथ ताँ व्यापाद
यावडुद्रं स्फोटयति, तावज्जीवछघुदासेरकशिशुनिष्क्रान्त॥
सिद्दोऽपि दासेरक्याः पिशितेन सपरिवारः परां तृतिझुपा- -
गतः परं स्रेहात् बालदासेरकं त्यक्तं गहभानीय इदमुवाच-
“मद्र ! न लेऽस्ति सृत्योर्भयं मत्तो न अन्यस्मादपि | ततः
स्वेच्छया अन्न बने श्राम्यतामिति । यतस्ते शंकुसदशो कणा
ततः शंकुकर्णो नाम भविष्यसि''। एवमतुषिते चत्वारोऽपि
ते एकस्थाने विहारिणः परर्परमनेकम्रकारगोष्ठीसुखमचुभ-
वन्तर्तिट्ठन्ति । शंकुकणोंएपि योवनपदवीमारूढः क्षणमपि
नतं सिहं सवति । अथ कदाचित वज्बदंटरस्य केनचिद्वन्धेन
मत्तगजेन सह युद्धमभवत् । तेन मदवीय्यात् स दन्तप्रहार-
स्तथा क्षतशरीरो विहितो यथा प्रचलितं न शक्गाति । तदा
श्ुतक्षामकण्ठः तान् प्रोवाच- भो ! अन्विष्यतां किञ्चित्सर्वं
येन अहमेद स्थितोऽपि तं व्यापाद्य आत्मनो युप्माकश्च
शुत्मगाश करोनि | तच्छृत्वा ते त्रयोऽपि वने सन्ध्याकालं
यावइश्रान्ताः परं न किचित्सचमासादितम् । अथ चतु
रकः चिन्तयामाल । “यदि शंकुकणोउयं व्यापाचते ततः
सवेषां कतिचिदिनानि ठ्ति्भवति परं ननं स्वामी मित्वा"
- दाश्रवतमाश्रितत्वाश्च तिनाशयिष्याति। अथवा बुद्धिम्रभा-
वेण स्वामिनं अतिबोध्य तथा करिष्ये यथा व्यापाद्यिः
ष्याति । उक्तञच-
किसी बन बज्नदष्नाम सिंह रहताथा उसके चतुरक और ऋब्यसुखनाम-
वाळे श्रगाळ इक मृत्य सदानुगामी उस वनम रहते थे। दूसरे दिन सिंहने एक
(१६८): पञ्चतन्त्रम्। `
समय प्रसव समीपवाळी प्रसववेदनासे अपने यूथसे भ्रष्ट हुईं ऊंउनी वेठी हुई
गहन वनमें देखी ( पाई ) उसको मारकर जबतक पेट फोडता है तवतक
जीता हुआ छोटा ऊंटनीका बच्चा निकला । सिंहमी ऊंटनीके मांससे परिवार-
सहित परम तृतिको प्राप्त हुआ परंतु स्नेहसे बाळक ऊंठनीके त्यागे बचेको घरे
छाकर यह बोला-'“भद्र ! तेरेको मृत्युसे मय नहीं न मुझसे न भन्यसे । सो
स्वेच्छासे अपने घतर्मे अप्रण करो । जो कि, तेरे शंकुकी समान कानहैं इससे
तेरा झंकुक्रण नाष होगा”? । ऐसा अनुष्ठान कर फिर वे चारों एक स्थानम
विहार करते परस्पर अनेक प्रकार गोष्ठीसुख अनुभव करते स्थित थे । शकुक-
णेमी यौवनपदवीको प्राप्त हुआ क्षणमात्रमी इको न छोडता | कभी बज्रदं-
रका किसी दूसरे वनके हाथीके साथ युद्ध हुमा । उससे मदके वीर्यसे षह
दन्तके प्रहारोंसे इस प्रकार क्षतशरीर होगया कि, एक पगभी चळनेको समर्थ
न हुआ । तब भूँखसे व्याकुळ हुआ उनसे बोळा-“मो ! कोई जीव ढूंढों जो मैं
इस दशामें स्थित हुआभी उसको मारकर अपनी और तुम्हारी क्षुधा शान्त करे?
यह सुनकर वे तीनों वर्मे सन्थ्याकाळ पर्यन्त घूमे परन्तु कोई जीव न मिला ।
तब चतुरक विचार करनेळगा “जो यह इंकुकर्ण माराजाय तो सबकी कुछ
दिनोंतक तृतिहो परन्तु मित्र तथा आश्रित होंनेसे स्वामी इसको न मारेगा | अथवा
बुद्धिके प्रभावसे स्वामीझ्षो समझाकर ऐसा करूगा जैसे षह मारडाळे । कहाहे-
अवध्य॑ चाथवागम्यमकृत्यं नास्ति किचन || _
लोके बुद्धिमता बद्धेस्तस्मा्ता विनियोजयेत्॥ ४०० ॥''
इस संप्तारमें बुद्धिमानोंकी कोई अवध्य, अगम्य और भ्षक्षत्य नहीं हे इस
कारण बुद्धिको कार्यमें लगावे | ४०० ॥ -
एव विचिन्त्य शाकुकर्णमिदमाह,-“भोः शंकुकर्णं ! स्वा-
मी तावत्पथ्यं विना क्षुधया परिपीडयते स्वाम्यभावा-
दस्माकमापि घुबं विनाश एवं ततो वाक्यं कश्चित् स्वाः
म्यर्थे वदिष्यामि । तत् श्रयताम्’? । शंकुकण आइ- “भो; !
शार निवेद्यतां थेन ते वचनं शीघ्र निर्विकल्पं करोमि।
अपरं स्वामिनो हिते कृते मया सुकृतशतं कृतं भविष्यति’ ।
अथ चतुरक आइ- “भो भद्र ! आत्मशरीरं द्विगुणलाभेन
भाषाटीकासमेतम् ! (१६९)
स्वामिने भयच्छ, थेन ते द्विगुणं शरीरं भवति, स्वामिनः
पुनः भाणयात्रा भवति” । तदाकण्यं शेकुकणेः माह,“ भद्र !
यदि एबं तन्मदीयप्रयोजनमेतदुच्यताम् । स्वाम्यर्थः क्रिय-
तामिति, परमत्र धर्मः ्रतिभूः'। इति ते विविच्य सर्वे सिंहः
सकाशमाजग्मुः । ततः चतुरक आइ- देव ! न किखित
सत्त्वं प्रातम् । भगवानादित्योऽपि अस्तङ्गतः । तद्यदि स्वामी
द्विएणं शरीरं प्रयच्छति ततः शंङुकणोऽयं द्विगुणब्र॒द्धचा स्व-
शरीरं प्रयच्छति धर्मभातिभुबा'॥ सिंह आह-भो! यदि एवं
` तत् सुन्दरतरम्, व्यवहारस्य अस्य धर्म: म्रतिभूः क्रियता-
म्?इति । अथ सिंहवचनानन्तरं व्रकशगालाभ्यां विदारिः
तोभयक्काक्षिः शंकुकणः पञ्चत्वसुपागत. । अथ वन्रदंष्ट्रः
चतुरकमाइ-*“भोः चतुरक ! यावदहं नदीं गत्वा स्यानं
देदताचेनाविवि कृत्वा आगच्छामि, तावत् त्वया अच अप्र
मत्तेन भाव्यम्”? इत्युक्ता नद्यां गतः । अथ तस्मिन् गते चलु-
रकः चिन्तयामास, कथं मम एकाकिनो भोज्योऽयसुष्टो
भाविष्यतीति विचिन्त्य ऋव्यस॒खमाह,- भो; क्रव्यमुख !
श्लुधाळुर्भवाव्, तद्यावदसौ स्वामी न आगच्छति तावत
त्वमस्य उष्ट्रस्य मांसं भक्षय । अहं त्वां स्वामिनो निदोषं
प्रतिपादयिष्यामि” । सोऽपि तच्छत्वा यावत् किञ्चिन्मांसं
आस्वादयाति तावश्चतुरकेणोक्तम्,-' भोः कव्यमुख ! समाग-
च्छति स्वाभी, तत् त्यक्ता एनं दूरे तिष्ठ येनास्य भक्षणं न
विकल्पर्याते” | तथाडुिते सिंहः समायातो यावदुष्टं पश्यति
तावद्विक्तीकृतह्ृइयो दासेरकः । ततो खुकुटि कृत्वा परुषत-
रमाह- अहो ! केनेष उष्ट्र उच्छिष्टतां नीतो थेन तमपि
व्यापादयामि” । एवमभिहिते क्रव्यमुख; चतुरकमृखं अव-
लोकयति, “किल तद्वद किचिद्ेन मम शान्तिमंवति?? ।
अथ चतुरको विहस्योबाच-“'भो ! मामनाइत्य पिशितं
भक्षायत्वा अधुना मन्ुखमवलोकयसि ! तत् आस्वादय
(१७०) , पञ्चतन्तम् ६.
अस्य ढुर्णयतरोः फलम्” इति । तदाकर्ण्य क्रव्यमुखो जीवना-
शभयाइदूरदेश गतः | एतस्मिन् अन्तेरे लेन मामेण दासे
कसायो भाराक्रान्त समायात । तस्यामसराष्र्य कटं
हता घटा बद्धा तस्या, शब्द इरताञप आकण्य सहो
जम्बूकमाह-- अद्र ! ज्ञायतां किमेप रोहः शब्दः श्रूयतेऽश्रः
तपूव” । तच्छृत्वा चहुरकः किचिद्वनान्तर गत्वा सत्वरम
भ्युपेत्य घोदाच,-' स्थामिन् गम्बतां गम्यतां यदि शक्तोषि
गन्छुम्”। सोऽत्रवीत,~ भद्र ! किमेवं मां व्याकुलयासि, तत
कथय किमेतत् इति । चतुरक आह-* स्वामिन् ! एष धर्म्मः
राजः तवोपरि कुपितः, यदनेन अकाले दासेरकोऽय मदीयो
व्यापादितः तत्सहस्जछुणशुष्टमस्य सकाशाद् ग्रहीष्यामीति
निश्चित्य वृद्न्मानमादाय अभेखरस्य उष्ट्रस्य ग्रीवायां घण्टां
बद्धा वव्यदासेरकसक्तानापि यितुपितामहानादाय वेर-
नियातनाथमायात एद । Tसहोऽपे तच्छत्वा सवतो दूरादेव
अवलाक्य सतसुट्र पारत्यज्य गणनात् नष्टीचठुरकाशप
शनः शनः तथ्य उष्टल्य माल भक्षया नास । अताऽइ ब्रवाम,
“परस्य पीडनं कुन् ' इति ।
यह विचार कर शंकुकणेस बोळा-'“भो झंकुकर्ण ! स्वामी पथ्यके बिना
-शुुधासे पीडित होता हे । स्वामाके न होनेसे इमाराभी अवश्य मरण हो जायगा
सो जो कुछ वाक्य स्वामोके निमित्त कहूँ वह छुन” । झाकुकर्ण बोछा-“भो |
शीघ्र निवेदन करों जो में शीघ्र तुम्हारे वचन वे विचारे करूं औरभी स्वामीके
हित करनेमें मेरे सो सुकृत होंगे” तब चतुरक बोला-“भो मद्र ! अपने शर्रा-
रको दुगुण लामके लिये स्वामिको दो, जिससे तेरा दूना शारीर हो जायगा ।
और स्वामीकी प्राणयात्रा होगी ” । यह खुन शंकुकर्ण बोला-“मद्र ! जो ऐसा
है तो मेरा प्रयोजन यह कहो, स्वामीका अर्थ करो परन्तु इसमे धर्मही साक्षी
है” । इस प्रकार वे सब विचार सिंहके समीप गये । तब चतुरक बोछा-
“देव ] कोई जीष नहीं मिळा, भगवान् सूर्यमी अस्ताचळको प्राप्त इए सो
यदि स्वामी हुगुणशरीर .प्रदान करें तो यह शेकुकर्ण यह द्विंगुणबवद्विसे धर्मका
भाषाटीकासमेतम् । (१७१)
विश्वास कर अपने शरीरको देगा,” सिंह बोळा-“भो ! यदि ऐसा हैं तो यह
(इन्दरतरदै, यह व्यवहारका कर्महे इसमे घमेका प्रतिभू करो” । तब मिहके
वचनको उपरान्त वक श्वगाडॉने उसकी दोनो कोख विदिणे करदी ओर शकु-
कर्ण मरगया | तव वजदष्टू चतुरकसे बोढा- मो चतुरक! जबतक में नदीमें
जाकर स्नान देवतार्चेनविवि करके भाताहू तवतक तुझे यहा साबधान रहना
चाहिये” ऐसा कह नदीको गया । उसके जानेमें चतुरक विचारने लगा ।
“कैसे मुझ इकलेकोही यह ऊठ खानेको मिलै” यह विचार क्रव्यमुखसे बोळा-
“मो क्रव्यमुख ! आप भूखेहो सो जबतक स्वामी न आवे तवतक तुम इस
" ऊटके मासको खामो मैं तुझक्कों खामीसे निर्दोष प्रतिपादन करूगा.? 'वहभी
यह वचन सुन जबतक कुछ मास खाता है तवतक चतुरकने कहा- भो करव्प-
सुख । स्वामी आताहे सो इसको त्यागकर दूरहो, जो इसके भक्षणमे विकर
न हो!” ऐसा करनेपर सिंह भानकर ऊटको देखने लगा तो, रीताहृदय उट
देखा । तब ठेढी माँ करके क्रोधकर वोळा-““अहो | किसने यह ऊंट झूठा
कर दिया, जिससे उसकोमी मारू?! ऐसा कहनेपर क्रव्यमुख चतुरकका मुख
देखने ढगा “निश्चयही उसको कह जिससे मेरी शान्ति हो तब चतुरक हॅसकर.
बोला- “मो ! मुझको भनादर कर मास खाकर अब मेरा मुख देखता हे सो
उस दुर्नीतिरूपी वृक्षका फ़ळ भाख्ादन करो” । यह सुनकर ऋच्यमुख जोवर
नाराके भयसें दूरस्थानमे चढागया, इसी समय उस मागमे ऊटोंका समूह
बोझते छादाहुआ भाया, उसके आगे कटके गळेमें एक बडा घण्टा बॅधाथा ॥
उसके शब्दको दूरसेही सुनकर सिंह जम्बूकसे बोढा-- “भद्र ! देखो तो यह
किसका कठोर शब्द सुनाई देता है जो पहले सुना नहीं था”? । यह सुनकर
चतुरक कुछ दूर वनान्तरमँ जाकर, शीघ्रतासे आकर बोला--“स्वामिन् | जाओ
जाओ यदि जानेंगे समर्थ होतो'! | वह बोढा-““मद्र ! क्यों मुझको ब्याकुछ-
करते हो । सो कहो यह क्या हे.? चतुरक वोळा-“स्वामिन् | ये धर्मराज तुम्हारे
ऊपर क्रोध रिथ हैं कि, इसने अकाळमें यह हमारा ऊट नाश किया सो हजार
गुणा उस ऊटका इससे प्रहण करूगा ऐसा कह महापारैमाण ग्रहण कर आगेको
ऊंटमें घटा बाव टम मन छगाय उसके पितामहादिको ढिये वैर छेनेके
निमित्त भाताही है” । सिहमी यह बचन सुन दूरसे देख मरे ऊटको छोड
( १७२) पञ्चतन्त्रम् ।
आणमयसे भागगया, चतुरकभी सहज २ उसका मांत खाता मया, इससे में
कहता हूं “ परका पीडन करके इत्यादि”? |
अथ दमनके गते सञ्गीवकश्चिन्तयामास, “अहो!
किमेतन्मया कृतं यव्छष्पादोऽपि मांसाशिनस्तस्या-
तुगः संबृत्त। । अथवा साधु इदमुच्यते-
तब दमनकके जानेसे संजीवक विचारने छगा,-“'भहो यह मैंने क्या किया,जो
मैं घास खानेबाळा इस मांसभोजीका अनुगामी हुआ।अथवा यह सत्य कहा है कि-
'अगम्यान्धः पुमान्याति असेव्यांश्च निषेवते ।
स मृत्युस॒पणह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ ४०१ ॥
जो पुरुष अगर्म्योमे गमन करता हे, असेव्योको सेबन करता हे, वह मृत्युको
आध होता है जैसे खचरी गभेके धारण करनेसे ॥ ४०१ ॥
तत् कि करोमि, क गच्छामि, कथं मे शान्तिभीवि-
'ष्याति, अथवा तमेव पिङ्गलर्क गच्छामि, कदाचिन्मां शरणा-
गतं रक्षति माणैने वियोजयति । यत उक्तअ-
सो में क्या करू कहां जाऊं किस प्रकार मेरी शान्ति होगी अथवा उसी
गलके पास जाऊं कदाचित् मुझ शरण आये इएको प्राणोंसे बियुक्त न करेगा
रक्षा करेगा । कहाहै-
धर्म्मार्थ यततामपीह विपदो देवाद्यदि स्युः कचित्
तत्तासामुपशान्तये सुमतिभिः काय्यों विशेषान्नयः ।
लोके ख्यातिमुपागतात्र सकले लोकोक्तिरेषा यतो
दग्धानां किल वह्निना हितकरः सेकोऽपि तस्योद्धवः४०२॥
इस छोकमें धमीर्थ यत्व करनेमें यदि देवात कुछ विपात्तिमी होजाय, तो
उएकी शान्तिके लिये झुमतियॉको विशेष नीति करनी चाहिये कारण कि, सब
कमें यह् वात विख्यात है कि, जलेहुए स्थानपर भस्रिका सेकही हित-
नकारक होता है || ४०२ ॥;
'तथानच~
ओरमी कहाहे- ,
लोके$थवा तत्तभतां निजकमेपार्क
:नित्ये समाश्रितवतां सुहितक्रियाणाम् ।
भाषाटीकासमेतम् । (१७३ )
भावाजितं शुभमथाप्यशुभं निकामं
यद्भावि तद्भवति नात्र विचारहेतुः ॥ ४०३ ॥
इस छांकम शरीरघारियोंको अपन कमका विपाक हाताहा हं जा कं.
नित्य अपने कसैब्यसे अच्छी प्रकार कियाही दै । तथा जो शुम भग्नुमभावसे
अर्जन किया है भोर जो होनहार हे वह होगाही इसमें विचारको भाव-
इयकता नहीं ॥ ४०३॥
अपरं च, अन्यत्र गतस्यापि मे कस्यचित् दुष्टसत्त्वस्थ
मांसाशिनः सकाथान्मृत्युर्मबिण्यति, तद्वरं सिंहात् । उक्तञ्च
और अन्यस्थावमे जाकरमी मेरी किसी माँसमक्षी दुष्ट जिसे मृत्यु होगी
तो उसले तो तिहके हाथते मरना भळा है । कद्ृहि--
महद्धि? स्परद्वमानस्य विपदेव गरीयसी ।
दन्तभह्लोऽपि नागानां छाध्यों गिरिविदारणे ॥ ९०४ ॥
बड़े पुरुषोंसे स्पधा करनेसे विपत्तिमी अच्छी हे पवेतके बिदाण करने
हायियोंका दन्तमामी श्रेयस्कर हे॥ ४०४ ||
तथाच-
तैसेही-
महतोऽपि क्षयं लब्ध्वा छाध्यं नीचोऽपि गच्छति ॥
दानार्थी मधुपो यद्रद्जकर्णसमाहतः ॥ ४०५॥
नीच प्राणी बडे मनुष्योसे क्षयकों प्रा्होकर सछाधताकों प्राप्त होता हे
जेसे दानकी इच्छा करनेवाला हायीकें कर्णसे ताडित हुआ मोरा ॥ ४०५ ||
एवं निश्चित्य स स्खलितगतिमन्दं मन्दं गत्वा सिंहाश्रयं
पश्यन्नपठव, अहो साध इदमुच्यते-
श्या (वश्य कर छत्वाातित सजावक बद मद जाकर सहका आश्रय
देखता हुआ यह छोक पढने ढगा । अहो यह सत्य कहाहै--
अत्तलींनझुजडमं गृहमिव व्यालाकुल वा वनं
आहाकीणेमिवामभिरामकमलच्छायासनाथं सरः ।
नानाहुष्टजनेरसत्यवचना सक्तेरना य्येंकृर्त
दुःखेन प्रतिगम्यते प्रचाकित राज्ञां गृहं वार्धिवत् ॥४०६॥
( १७४) पश्चलन्त्रम् ।
भीतर स्थित है सर्प जिसमें ऐसे घरकी समान, हिंसक जीवोंसे व्याप्त बनकी
समान, ग्राह ( नाकों ) से युक्त मनोहर छायावाळे कमळ खिळे सरोचरकी समान,
अनेक दुष्टजन असत्य वचतोमे रत असाघुओंसे पूर्ण राजाओंका घर सागरके
-समान भीत हुए श्रेष्ठ पुरुषोंसे दुःखले जाया जाता है ॥४०९॥
एवं पठन् दमनकोक्ताकारं पिङ्गलकं रट्टा प्रचकितः संबर-
तशरीरो दूरतरं भजामकूलि विनापि उपविष्टः पिङ्गलकोषपि
तथाविध त विलोक्य दमनकवाक्यं श्रद्धधानः कोपात
तस्योपारे पपात! अथ सशीवकः खरनखराविकार्ततितपष्ठः
शृंगाभ्यां तदुढरमुल्लिख्य कथमपि तस्मादपेतः । श्रंगाथ्यां
हन्ठुमिच्छन् उुद्धायावस्थितः। अथ द्वौ आपि तो पुष्पितप-
खाशप्रलिमो परस्परवधकांक्षिणो इट्टा करटको दमनकमाह-
“जो मूढमते ! अनयोविरोधं वितन्वता त्वया साधु न
कुतम् । न च त्वं नीतितस्वं वेत्ति । नीतिविद्विरुक्तञ्च,-
इस प्रकार पढ़ता हुआ दमनकके कहे आकारकी समान पिगलककों देखकर
चकित ओर रक्षित शरीरसे विनाही प्रणाम किये दूर बेठगया । पिमळकर्मा इस
प्रकार उसको देख दमनकका वाक्य सत्य मानकर कोपसे उसके उपर टूट पडा
तब संजीवक उसके तीक्ष्ण नखोंसे विदीर्ण पौठवाडा; सींगोंसे उसके उदरे
अहार कर किसी प्रकार उससे अळग हुआ; सीगोसे मारनेकी इच्छा कर -युद्धके
'तिवित्त स्थित हुआ, तब दोनोंही वह फुले ढाककी समान इए परस्पर वधकी
आकांक्षासे दोनोंको देख करटक दमनकसे बोला,-“भो मूढमते | इन दोनोंको
विरोध करते हुए तेने अच्छा नहीं किया तू नीतिका तल नहीं जानता | नीति-
जाननेवालोंने कहाहे-
काय्योण्डुत्तमदण्डसाहसफलान्शयाससाध्यानि ये.
शीत्या संशमयन्ति नीतिकुशलाः साक्षेव ते मन्त्रिणः ।
निःसाराल्पफलानि ये त्वविधितवा वाञ्छन्ति दण्डोद्यमे"
स्तेषां इर्णयचेष्टितनरफ्तेरारोप्यते श्रीस्ठुलाम् ॥ ४०७ ॥
जो काय्यै उत्तम दंड साहसके फडघाळे और कृष्टताम्य हैं नौतिकुशल मंत्री
थे कार्य प्रीति और साम उपायसेही निर्वाहित करते हैं भौर" जो अन्याय तथा
१
भाषाटीकासमेतम् । (१७५)
हक
युद्धको उद्योगसे अल्प फलकी बाछा करते हैं उन हुर्मीति चेष्टावाठे राजाकी
छद्मी सनेहम आरोपण की जाती है॥ ४०७ ||
त्यादि स्वाम्थामिचातो भविष्यति तत् कि त्वदीयमन्त्रबु-
द्वचा क्रियते। अथ सञ्जीवको न वध्यते तथापि अभव्यं यतः
प्राणसन्देहात् तह्य च दधः, तन्सूट ! कथं त्यै मन्त्रिपदम-
निळषासि सामसिद्धि न वेत्सि, तद्या मनोरथोऽघं ते
दण्डरुचेः । उक्तश्च
सा यदि स्यामीका नाश होगा तो क्या तेरी मंत्रबुद्धिसे किया जाय | और
संजीवक न मरे तो भी अशुभ होगा, जो कि, प्राणसन्देहसे उसका बध है सों
मूर्ख । किंसप्रकार तू मन्त्रीपदकी अभिळापा करता हे साम तिद्धिको नहीं जानता
सो दण्डरुचि करनेवाले तेरा यह मनोरथ दृथा है । कहा है-
सामादिदण्डपय्येन्तो नयेः झोक्तः श्वथम्डुवा ।
तेषां दण्डस्तु पापीयांस्तं पश्चा द्विनियोजयेत् ॥ ४०८ ॥
सामसे लेकर दण्ड पर्यन्त ब्रह्माने नीति कहाँ है उसमें दड पापी हे उसको
पीछे नियुक्त करना चाहिये ॥ ४०८॥
तथाचत
और देखो-
साम्नेव यत्र सिद्धिर्न तत्र दण्डो बुधेन विनियोज्यः ।
पित्तं यदि शर्करया शाम्याति कोऽथः पटोलेन ॥ ४०९
जहा साम उपायसेही सिद्धि होती है पडितको वहा दड प्रयुक्त नहीं करना
चाहिये, यदि मिश्री शर्करासेदी पित्त दान्त हाजाय तो पटोछ देनेसे क्या
फायदा ॥ ४०६ |
तथाच-
ओर भी-
आदी साम भयोक्तव्य पुरुषेण विजानत्ता ।
सामसाध्यानि कार्य्याणि वाक्रियां यान्ति न काचित्४१०
ज्ञानी पुरुषोकों प्रथम साम उपाय प्रयोग करना चाहिये सामसे सिद्ध
हुए काश्ये विकासको प्रात नहीं होते दे ॥ ४१० ॥
{ १७६) पञ्चतन्त्रम् ।
न चन्द्रेण न चोषध्या न सूर्येण न वाद्विना।
साम्नैव विलयं याति विद्वेषिप्रमबं तमः ॥ ४११ ॥
चन्द्रमा, औषधी, सूर्य, अभिसे विद्वेषतासे उत्पन्न इभा अंधकार दूर नहा" '
होता किन्तु साम उपायसेही दूर होता हे) ४११ ॥ *
तथा यत् त्वं मन्त्रित्वमभिलषसि तदपि अथुक्तं यतस्त्वं
मन्त्रमात न वेत्सि। यतः पश्चाविधो मन्त्रः स च कर्म्मणामा-
रम्भोपायः, पुरुषद्रव्यसम्पत, देशकालदिभागो, विनिपात-
अतीकारः | काय्योसिद्विश्चोति। सोऽयं स्त्राम्यमा त्ययोरेकतमः
स्थ किवां द्रयोरापि विनिपातः समुत्पद्यते लग्नः! तद्यदि काः
चिच्छाक्तिरस्ति तद्विचिन्त्यतां विनिपातप्रतीकारः , भिन्नस-
नधाने हि मन्त्रिणां बुद्धिपरीक्षा, तन्मूख ! तत् कतुमसमर्थ-
स्त्वं यतो विपरीतबुद्धिरसि। उक्ततव-
और जो तू मन्त्रीपदकां अभिलाषा करता है सोमी अयुक्त है जो कि, तू
मन्त्रकी गतिको नहीं जानता है जो कि, पांचप्रकारका मंत्र होताहे-कर्मके आरं-
भका उपाय करना, उपयुक्त कर्मचारियोकी द्रव्य सम्पाति, देश काठका विभाग
( इस समयदान- इस समय दंडका प्रयोग इत्यादि ) अपायका प्रर्ताकार करना
खर कार्यसिद्धि । सो यह पिगळक और संजीवक दोनों स्वामी भृत्यमेंसे एकका
या दोनोंका मरण होना उपस्थितहे । सो यदि कोई शाक्ति हो तो इस अनिष्ट 7
अपायका प्रतीकार करो भिन्न ( १ ) सन्निधानमेही मत्रियोंकी घुद्धिकी परीक्षा
कीजातीहे सो हे मूर्ख ! यह करनेमें त् असमर्थ है कारण के, बिपरीतबुद्धिदै ।
'कहादे-
मोत्रिणां भिन्नसन्धाने भिषजां सात्रिपातिके । .
कम्मेणि व्यज्यते मज्ञा स्वस्थे को वा न पण्डित; ॥४१२॥ |
युधक् इको मिळानेमें मंत्रियोंकी, सञ्चिपात रोगके कर्ममें बैयोकी बुद्धि देखी
नाती हे स्वध्थताम कौन पंडित नहीं है | ४१२॥' :
त ती)
(१) द्वेषियोकामिछाप कराना ।
भाषाटीकासमेतम्। ( १७७}
अन्यश्च
ओरमी--
घातयितुमेव नीचः परकार्थ्य वेति न प्रसाधयितुम् ।
पातयितुमेव शक्तिनाखो रुद्ध्मन्नापिटम् ॥ ४१३ ॥
नांच पराया कार्य नष्ट करना ही जानता हे सिद्ध करमा नहीं।
चूहेकी अन्न पिटारीके गिरा देनेकीही शक्ति हे उठारखनेकी नहीं ॥ ४१३ ॥
अथवा. न ते दोषोऽयं स्वामिनो दोषो यस्ते वाक्यं श्रह-
धाति । उक्तश्च
अथवा यह तेरा दोष नहीँ स्त्रामीका दोष है जो तरे बचने श्रद्धा की, कहाहे-
नराधिपा नीचजनालुवर्तिनी बुधोपदिष्टेन पथा न यान्ति ये।
विशन्त्यतो इरगममागेनिरमेमं समस्तसम्वाधमनर्थपञ्जरम् ४१४
जो राजा नीच जनोंसे सोवित होते हैं वे पडितेंके उपदेश किये मार्गसे नही
चलते हैं, इस कारण बे निकळनेक्षे मार्गसे रोहित समस्त बाधार्भेसि युक्त अन-
थेके समूह दुर्गम मागेम प्रवेश करते हैं ॥ ४१४ ॥
तद्यादे त्वमस्य मन्त्री भविष्यति तदा अन्योऽपि कश्चिन्न
अस्य समीपे साधुजनः समेप्यति! उक्तश्च-
सो यदि तू इसका मन्त्री होगा तो दूसरा कोई साधु पुरुष इसके संर्माप न
आवेगा । कहाहै-
गुणालयोऽप्यसन्मन्त्री नृपतिनाधिगम्षते ।
प्रसन्नस्वाइसलिलो इष्टग्राहो यथा हद! ॥ ४९९॥'
गुर्णाका स्थान राजा भसम्पत्रीजनोसे घिराहो तो उसके निकट कोई नहीं
जाता है प्रसन्न ( निर्मछ ) स्वादिष्ट ज्वाळा सरोबर जैसे नाकेसे युक्त' होनेसे
भगम्य होताहे ॥ ४१९ ॥
तथा च-शिष्टजनरहितस्थ स्वामिनोऽपि नाशो भविष्यति
उक्तः
तथाच--शिष्टजनराहित स्वामीकामी नाश होगा । कहाहै-
वितास्वादक्यशत्येरनायासितकारसुकेः ।
ये रमन्ते नृपास्तेषां रमन्ते रिपवः श्रिया ॥ ४१६॥
२
(१७८) पञ्चतन्त्रम् ।
जो राजा चित्रविचित्र कथाके आस्त्रादवाळे धनुष न चढानेवाळे भूत्योसे
रमण करते हैं ( राजकाज नहीं करते हैं ) झघु उनकी छक्ष्मीसे रमण
करते हैं ॥ ४१६ ॥
तत् कि मु्खोपदेशेन, केवलं दोषो म णुणः । उक्तञ्च-
सा मूखके उपदेशे क्या केवळ दोषही हे गुण नहीं । कहाहे-
नानाम्घ नमत दारू नाश्मान स्थात्क्षराक्रिया |]
सूरचीमुख विजानीहि नाशिप्यायोपदिश्यते ॥ ४१७ ॥
नह झुकने योग्य काष्ठ टेढा नहीं होता, पत्यरका क्षोरकमे नहीं होता,
अशिष्यको उपदेश नदे इसमें सूचीसुखका दृष्टान्त हैं ॥ ४१७॥
दमनक ऊाह-'कथमेतत £? सोएब्रवीर्त-
दमनक बोळा-“यह केसे £ !' वह वोळा-
कथा १७.
आस्ति कस्मिश्चित् पर्वतेकदेशे वानरयूथम् । तच्च कदा-
चित हेमन्तसमये. अतिकठोरवातसंस्पत्रवेपमानकलेवरं
तुषारवषद्वतप्रवषघनधारानिपातसमाहतं न कथञ्चित शा-
न्तिमगमत् । अंथ केचित् वानरा वह्निकणसदृशानि
शुञ्जाफलानि अवचित्य वह्निवाञ्छया फूत्कुवन्तेः समन्तात्
तस्थुः। अथ सूचीस॒खो नाम पक्षी तेषां ते वृथायास
मवलोक्य मरोवाच-' भोः ! सर्वे मूखाः यूय, नत
चह्विकणाः, गुञ्जाफलानि एतानि, तत् किं वृथा श्रमेण,
एतस्मात्. शीतरक्षा भविष्यति | तत अन्विष्यत्तां कश्चित्
निर्वातो वनप्रदेशो रुहा वा गिरिकन्दरं वा । अद्याप
साटोपा मेघा दृश्यन्ते” । अथ तेषामेकतमो इृद्धवानरः तमु-
वाच-“'भो मूर्ख | कि तव अनेन व्यापारेण, तह्गेम्यताम् ।
उतक्तश्व-
किसा परवंतपर चानरांका यूथ ह वह एक समय हृमन्तसमयर्म भाते कठार
धवत्क ठगनंस कापंतशरार शत भार वषास उद्धत घनवपाबा घारानपरातत्त
भाषाटीकासमेतम्। (१७९)
समाहत्त हुभा किसी प्रकार शान्त न इभ । तब कोई वानर अस्रिकणक्की समान
चोंटलियोंको इकट्टाकर अमिको इच्छासे फ्रक मारते इए चारों ओरसे स्थित
हुए । तब सूचीमुख नाम पक्षी उनके उस दुवा परिश्रमको देखकर बोछा-
“मो; | तुम सब मूर्ख हो | यह समिकण नहीं हैं, यह 'चोंटलीहे क्यों इथा
परिश्रम करतेहों | इससे शीत रक्षा न होगी, सो टूढों कोई पवनरहित बन-
स्थान गुहा वा पर्वतकदर अबभी मडळ बागे हुए मेव दीखते हैं? | तब. उन-
मेसे एक बूढा वासर उससे बोळा-“मो सूखे ! तुझे इससे क्या प्रयोजन है
चाजा | कहाहे-
खहुविंत्रितकर्माणं गूतकारं पराजितम |
नालापयेद्विविकेशो यदीच्छेत्सिद्विमात्मनः ॥ ४१८ भ
ˆ वारवार कमें विन्न पानेवाळा, जुभा खेळनेवाला, पराजित इनसे वदि अपरे
आजको इच्छा हा तो बातो न करे ॥ ४१८ ||
तथाच-
सैसेही-
आखेटकं वृथा केश मूर्ख व्यतनसंस्थितम् ।
आलापयति'यो मूढ;ः स गच्छति पराभवम् ॥ ४१९ ॥?
शिकारी दया कैशकारी, मूख, दुर्यसतनम स्वत जा वातां करता ह बहू
पराभवको प्राप्त होता है ॥ 8 १९ ॥?
सोपि तमनाइृत्य भूयोऽपि वानराननवरतमाह”
“धोः ! कि वृथा केशेन”? अथ यावदसौ न कथंचित
अळपन्विरमति तावदेकेन वानरेण व्यर्थश्रमत्वाद्
कुपितेन पक्षाभ्यां गृहीत्वा शिलायामारफालित उपर"
तश्चाअतोऽह बीमि, “नानाम्यं नमते दारु” इत्यादि!
वह मी उसको अनादर कर धारवार बानरोसे वही बचन कहने छपा--
“भो ! इयाक्रेशसे क्या हे” | सो जब यह किसी प्रकार प्रळापसे न शान्त
हुआ तब एक व्रथा रमसे करुद्ध इए धानरने उसके पंख पकड कर शिलापर पट-
ककर मार दिया, इससे में कहता हू “भनमित काठ नहीँ कता इत्यादि” |
(१८०) पञ्चलन्त्रम्।
तथाच-
तैसेही- |
उपदेशो हि मूखोणां कोपाय न शान्तये ।
पयःपानं भुजंगानां केवलं विषवद्धेनम् ॥ ४२० ॥
मुखाका उपदश करना कापक घासते ६ शान्तका नहा सपाँको दूध पपलाचा
केवळ विष बढानक निति है |] ४२० |]
अन्यच-
ओरमी-
उपदेशो न दातव्यो याहशे ताहशे जने।
पश्य बानरसूर्खेण सुगी निंहीकृतः ॥ ४२१ पा”
जैसे तेते मनुष्परको उपदेश देना न चाहिये देखो एक मूर्ख वानरने उचक
गृहस्य घरसे अून्य कर दिया ॥ ४२१ ॥” i
दमनक आहकथमेतत् ?” सोऽब्रवीतं ।
दमनक बोळा-“यह केसे | ” बह बोछा-
कथा १८
अस्ति कस्मिश्चित् वनोदेशे शमीवक्षः । तस्य लम्ब-
गनशिखायां कुतावासो अरण्यचटकदम्पती वसतः
स्म । अथ कदाचित् तयोः छुखसंस्थयो हेमन्तमेघो
मन्दं मन्दं वर्षितुभारब्धः। अत्रान्तरे कश्चित् शाखा-
मगो वातासारसमाहतः प्रोद्धलितशरीरो दण्डवीणां
वादयन् वेषमानः तत शमीमूलमाप्ताद्य उपविष्टः
अथ ते तादशमत्रलोक्य चटका प्राह-'* भो भद्र!
किसी एक बनके स्थानमें शमीका पेड था | उसकी ठम्ममान शिखामें
निवास करमेवाछे” बवेछे चटक चटका रहतेथे । एक समय सुखसे बैठे
इए उन दोनेंके हेमन्त काठका मेघ मन्द २ वषैने ळगा । इसी : समय कोई
शाखापुंग ( घानर ) पवन वर्षात हत हुआ वर्षाके जळसे भीजा शरीरवादा दंडः
'बीणाको वजाता इआ कपित हुआ, उस शेमढके नीचे आकर बेठा उसकी यह
दशा देख चटका ब्रोठी,-“मो भद्र ]
भाषाटीकासमेतम्। (१८१)
हस्तपादसमोपेतो दृश्यसे पुरुषाकतिः ।
शीतेन भिद्यते मूढ़ ! कथं न कुरुषे गुहम् ॥ ४२२ ॥7?
हाथ पैरसे युक्त इए तुम पुरुषाकार दीखते हो और दे मूख ! शीतसे मेदित
होकर मी तू घर क्यों नहीं बनाताहे ॥ ४९२ ॥”
एतच्छत्वा ताँ वानरः सकोपनाह,- अधमे ! कस्मात् न त्व
मौनव्रता भवसि। अहो ! धाष्ट्यमस्याः अ मासपहसति |.
यह सुन क्रोध कर वानर बोल',-“*भधम ! चुप क्यो नहीँ होती, अहो! इस-
का ढाठता एक, मप उपहास करता हक”
सूचीछुखी दुराचारा रण्डा पण्डितवादिनी ।
नाशङ्कते प्रजहपन्ती तत्किमेनां न हन्म्पहम् ॥ ४२३ ॥'›
सूचासुखवाळा दुराचार रण्डा दया अपनंका पडत माननंवांठा बक्षचाद
करती हुई नहीं डरती । सो इसको में क्यों नहीं नष्ट करू ॥ ४२३ ॥?
एवं प्रलप्य तामाह,~ “मुग्ध ! कि नव ममोपरि चिन्तया।
उक्तेच- - वि
~
इस प्रकार जल्पना कर उससे बोळा,-“मुग्धे ! मेरी विन्तासे तुझे क्या
कहा है-
वाच्यं श्रद्धासमेतस्य एच्छतश्च विशेषतः ।
मोक्तं ्दाविहीनस्य अरण्यरुदितोपमम् ४२४॥
श्रद्धासे युक्त पूछते मनुष्यतेही विशेष कर कहना चाहिये श्रद्धाहीनसे कहना
` बचें रोनेकी समान हे ॥ ४२४ ॥
तत् कि बहुना । तावत् कुलायस्थितया तया पुनरपि
अभिदितः स तावत तां शमीमारुह्य तस्याः कुलां शतधा
खण्डश अकरोद् । अतोऽहं ब्रवीमि “उपदेशो न दातव्यः”इति।
सो बहुत कहनेसे क्या हे जब कि, घोंसळेम बेठी हुई उसने फिर कहा तब
_ इसने शमी इक्षपर चढकर उसके घोंसळेके सौ खण्डकर दिये । इससे में कहता
हु कि, “जिस किसीको उपदेश न देना चाहिये”
तन्मूर्ख ! शिक्षापितोऽपि न शिक्षितः त्वम् । अथवा न
तै दोषोऽस्ति} ' यतः साधोः शिक्षा गुणाय सम्पद्यते न
असाधाः | उक्तत्र-
(१८२) पञ्चलन्त्रम् ।
है मुखं ! सिखाया हुआ भी तू सीखा । अथवा तेरा दोष नहीं है साधुमें
he
सा स्व“
शिक्षा गुणके निमित्त होतीहे असाधुमें नहीं । कहाहै-
कि करोत्येव पाण्डित्यमस्थाने विनियोजितम् | .
अन्धकारप्रतिच्छन्ने घटे दीप इवाहितः ॥ ४२५॥
अनुचित स्थाचमें लगाई पंडिताई क्या कर. सकतीहे -जेसे अंधकार पूर्ण
घडेके ऊपर घरा हुआ दीपक ( उसके मीतरका भंधकार दूर नहीं कर
सकता ) ॥ ४२५ ||
तदार्थपाण्डित्यमाश्रित्य मम वचनमश्रण्वन् न आत्मनः
शान्तिमपि वेर्लि, तन्दूनमपजातः त्वम् । उक्तश्च-
सो बृथा पांडित्यका आश्रय कर मेरे बचन न सुते न अपनी शान्ति
जाना सो अवऱ्यही तू विजातीयहे । कहा हेट.
जातः पुत्रोऽइजातश्च अतिजातस्तथेव च । ,
अपजातश्च लोके$स्मिन्मन्तव्याः शास्त्रवादानिः ॥ ४२६ ॥.-
इस संसारमें शाञ्जके जाननेवाळे जात, अनुजात, अतिजात और अपजात
यह चार प्रकारके पुत्र कहते हैं ॥ ४२६ ॥
मातठुल्यगुणो जातस्त्वनुजातः पिठुः समः।
अतिजातोऽधिकस्तस्मादपजातोऽधमाधमः ॥ ४२७॥
माताके तुल्य गुणवाळा जात, पिताके तुल्य गुणवाछा अनुजात, पितासि
अधिक अतिजात भोर भपजात अधमाधम कहाता हैं ॥ ४२७॥
अप्यात्मनो विनाशं गणयति न खलः परव्यसनहृष्टः । . .
प्रायो' मस्तकनाशे समरसुखे नृत्याति कव्रन्यः ॥ ४२८ ॥
पराये दुःखसे प्रसन्न हुआ दुष्ट अपने नाशको नहीं गिनताहै प्रायः मस्तकके
नाझ होनेमेंमी कबन्ध समरमें नृत्य करता है॥ ४२८.॥
अहो ! साधु चेदसुच्यते ।
अहो | यह सत्य कहा हे कि-
-धम्मेबद्धिः कुडद्धिश्न दावेती विदितो मम |... ,
पुत्रेण व्यथेपाण्डित्पात्पिता धूनेन घातित्तः ॥ : ४२९ ।
च
भी
भाषाटीकासमेतम्। (१८३)
hohe Sn. ha [oe i
घमेबुद्धि भोर कुुद्धि इन दोनोंको येने जाना पुत्रकी बृथा पडिताइसे पिता
घूमसे घातित इआ ॥ १२९ |”
दमनक आइ-' कथमेतत् ९” सोऽग्रबीव-
दमनक वोछा,-“यह केली कथा हे!” बह बोढा-
कथा ३९.
कर्िश्चिदधिष्ठाने धर्मेदुद्धिः पापबुद्धिश्व दे मित्रे प्रति-
वसतः स्म। अथ कदाचित पापशुद्धिना चिन्तितम्, अह
तावत् मूर्खो दारिद्योपेतश्च । तदेनं धर्म्मडुद्धिमादाय देशाः
न्तरं गत्वा अस्य आश्रयेण अर्थोपाजनं कृत्वा एनमपि बंच:
यित्वा सुखी भवामे | अथ अन्यस्मित् अहनि पापबुद्धिः
वर्म्मडुद्धि प्राह-भो मित्र! वाद्धकभावे किं तमात्मविचे-
छित स्मरसि । देशान्तरमरष्ट्रा कां शिशुजनस्य बात्ती
कथयिष्यसि ! उक्तश्च
किसी एक स्थानें धर्मतरुद्धि और पापबुद्धि दो मित्र रहते थे । तब कदा-
चित् पापबुदने बिचार किया में मुर्खे और दरिद्र हू सो इस धर्मबुद्धिको लेकर
देशान्तर जाकर इसके भाश्रयसे धन उत्पन्नकर इसको भी वचित कर सुखी
हृगा फिर और एक दिन पापबुद्धि धमेवुद्धिसे बोछा-मो मित्र ! वृद्धावस्थामे
क्या अपनी चेशको स्मरण करोगे देशान्तरको बिना देखे बालकोसे क्य
वातौ कहेगा । कहा है-
देशान्तरेषु बहुविधभाषावेशादि येन न ज्ञातम् ।
भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम् ॥ ४३० ॥
जिसने देशान्तरोमे बहुत भाषावेशादि नहीं जावा हे पृथ्वीतळमे घूमते हुए
_ उसका जन्म वृथा गया ॥ ४९० ॥
तथाच-
तेसेही-
विद्यां वित्तं शिल्पं तावत्राभात मानवः सम्यक ।
यावद्रजति न भूमो देशादेशान्तरं हषः ॥ ४३१ ॥?
( १८४) - पञ्चतन्त्रम्।
विद्या धन कारीगरी तबतक मनुष्यं अच्छी तरह प्रा नही करता है जब-
तक प्रप्तन्न हुआ देश देझान्तरकी सूमिमें नहीं जाता हे ॥ ४३१ ॥१
अथ तस्य तद्वचनमाकर्ण्य प्रहृष्टमनाः तेनेव सह गुरु”
जनावुत्ञातः शुभे अहनि देशान्तरं घस्थितः। तत्र च धम्म
बुद्धिप्रभावेण भ्रमता पापडुद्धिना प्रभूततरं वित्तमासादितम्
ततश्च द्वावपि तो प्रभूतोपाजितद्रव्यो प्रहृष्टो स्वमहं प्रति
आत्छुक्येन निवृत्ती । उत्तश्व-
तब उसके इस वचनको सुनकर उसीके संग गुरुजनोंकी आज्ञा ळेकर
सुन्दर दिनमें देशान्तरको गया वहां धर्मजुद्धिके प्रभावसे भ्रमते हुए पापबुद्धिने
चहुतसा धन प्राप्त कया । तब दाना बहुत घनके उपानसं प्रतन हुए अपने
घरके प्रति उत्कंठाले निदृत्त हुए |कहा हे-
आतविद्याथशिस्पानां देशान्तरानिचासिनाम् । .
ऋशमानोऽपि भूभागः शतयोजनवद्भवेत् ॥ ४३२ ॥/
प्राप्तविद्या धन और कारीगरीवाळे देशान्तर निवास करनेबालोंकों एक
काशमात्र पथ्बा सायाजनका तमान हाता हू { अथातू जब पसद्धकाय हा निज
स्थानमं आते हं तब एक कोश सो योजनसा बीतता हे) ॥ ४३२ ॥”
अथ स्वस्थानसमीपवत्तिना पापडुद्धिना थम्मडाद्धिराभ-
हेतः, मद्र | न सबमेतद्धन गृह घ्राति नेतु युज्यत, यतः
कुटुम्बिनो बान्धवाश्च प्रार्थयिष्यन्ते । तदत्र एव वनगहने
क्कापि भूमो निक्षिप्य किचिन्मात्रमादाय गृहं म्रविशावो
भूयोऽपि प्रयोजने सञ्जाते तन्मात्रं समेत्य अस्मात स्थानात्
नेष्थावः। उक्तश्व-
तब अपने स्थानके समीपत्रती पापबुद्धिने घमवुद्धिसे कहा-“ भद्र ! यह सब
घन घर रुजाना डाचत नहा ह क्या क, वुद्धाम्ब आर बन्धु उसका प्राथना
करगे | सां इसी वनगहनम कहाँ पथ्याय गाडकर उसमस कुछ ळकर घरका
जाय, कि, फिरमी प्रयोजन होनेपर उतनाही परस्पर मिछकर इस स्थानसे
छजायग | कहा ह-
न वित्तं दर्शयेत्माज्ञः कस्यचित्स्वल्पमप्यहो ।.
मुनेरपि यतस्तस्य दर्शनाचलते मनः ॥ ४३३॥
भाषाटी कासदेतम । (१८५ )
बुद्धिमान् अर्ना थोडा धनमी किंतीको न दिखाध कारण कि, उत्तके दर्शन
नस मुनिक्ाभो मन चलायम्रान हांजाता छे ॥ ४१३ ॥
*नथाच-
पमेदी--
यधामिषं जले मत्स्पेमेक्ष्यते शवापदेर्भुवि ।
आकारो पक्षिसिश्चव तथा सदन वित्तवान् ॥४२४॥ ?!
जस मात जल्म मच्टास, प्रश्व मे हाद हतकात, भाधादाम पादपास
राचा जाता हे हसो प्रकार सत्र धनमान खाया जाता ह] ४६४ ॥'
तदाकण्ये घर्मद्ठद्धिः पाह, "भट्ट ! एवं क्रियताम । तथा
अछुछिते द्वावषि तो स्वगृह गत्वा सुखेन संस्वितवन्तो। '
अथ अन्यस्मिन्नहनि पापवुद्धिनिशीयऽरव्यां गत्वा तत सर्व
वित्तं समादाय गत एरयित्वा स्वभवनं जगाम । अध अन्ये-
याः धर्मदाडे समभ्येत्य घोवाच.-“सखे ! बहुकुटम्वा वर्थ
दित्तामावात् सीदामः । तद्रत्वा तत्र स्थाने फिचिन्मार्त
धनमानयावः? । सोऽत्रवीत,- “भद्र | एवं क्रियताम्’? । अथ
ट्रावपि गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतस्तावत रिक्तं भाण्डं
दृष्टवन्ता । अत्रान्तरे पापचुद्धिः शिरस्ताडयन् प्रोवाच-भो
धर्मयुद्धे ! त्वया हनमेतब्रनं न अन्येन, यत्तो भूयोऽपि गत्ती-
पूरणं कृतं, तत प्रयच्छ मे तस्याद्ध, अथवा अहे राजकुले
निवेदयिष्यामि” । स आहइ,- भो इरात्मन् ! मेवे बद,
धर्मबुद्धिः खछु अहम् । न एतश्लौरकर्म करोमि । उक्तश्च
यह सुनकर धर्मचुद्धि कहने ला, ''मड | एसाही करा” ऐसा अनुष्ठान
करनेपर चे दोनोंही अपने घर जाकर सुखस स्थित हुए । तब किसी और दिन
पापवुद्धि भवरात्रमे जाऊर उस सव धनको छ गढको पुर्ण कर अपने धर
आया । फिर दूसरे दिन धरमवुद्धिसे मिलकर चोळा,-“सखे | हम बहुत कुटु-
स्वा हैं इस कारण धनके अमावस दुःखी होते हैं । सो चलकर उस स्थानसे
कुछ धन छावे” | वह बोडा,-“भत्र ! एसाही करो] तब दोनेंही जाकर
जव उस स्थानको खादने ठगे तब वहां बव रीता देखा । तब वह पापबुद्धि
(१८६) पश्चतन्त्रस्।
झिरपीटता हुआ बोठा,-- “भो घमेबुद्धे ! तेनेही यह मेरी धन हरळिया हे किसी
औरने नहीं । जो फिरभी गड्डा मरदिथा सों उसका आधा मुझे दे नहीं तो में
राजकुछमें निवेदन करूंगा” | वह बोला,- मो दुरा्न् ! ऐसा मत - कह
निश्चयही में धर्मबुद्धि छुँ यह चोर कर्मे नहीं करता हूं । कहाहै-
मातृवत्परदाराणि परद्रव्याणि लोष्ठवत्।
आत्मवत्सबैभूतानि वीक्षन्ते धर्मबुद्यः ॥ ४३५ ॥?)
माताकी समान पराई स्री, मट्रोकी समान पराया धन, आत्माकी समान सब
ग्राणियोंको धर्गबुद्धि देखते हैं ॥ ४३५ |!
एवं द्वावपि तो विवद्मानोः धर्माधिकारिणं गतो प्रो-
चतुश्च परस्परं दूषयन्तो । अथ धर्माधिकरणाधिष्ठित-
पुरुषेः दिव्याथे यावत् नियोजितो तावत् पापबुद्धिः
आह, अहो ! न सम्यशदष्टोऽयं न्यायः । उक्तश्च
इस प्रकार वे दोनोंही झगडा करते हुए धर्माधिकारीके पास जाकर बोलते
इए परस्पर दूषण देनेळगे । तब धमीधिकारीसे नियुक्त इए पुरुपेनि ज्यों हो
झपथके निमित्त उसको नियुक्त किया, तबतक पापबुद्धि बोछा,- लिश्चर्य
कि, मलप्रकार न्याय नहीं इभा । कहा है--
विवादेऽन्विष्यते पत्र तदभावेऽपि साक्षिणः ।
साक्ष्यभावात्ततो दिव्य प्रवदम्ति मनीषिणः ॥ ४३६॥
विवादमें पहले पन्न ( लेख ) देखा जाता है, उसके अभावमें साक्षी, साक्षीके
भमावमें शपथ करनी ऐसा बुद्धिमार्नोने कहा हे ॥ ४३६ ॥
तद्त्र विषये मम इक्षद्वत्ताः साक्षिभूताः तिष्ठंति ।
ता अपि आवयोः एकतरं चोरं साधु वा करिष्यन्ति’
अथ तेः सवैः अभिहितम- भोः ! युक्तसुक्त॑ भवता ।
उक्तश्च~ - |
* सो इस विषयमें इक्षदेवता हमारे साक्षी हैं वही हम दोनोंमें एकको चोर
या साधु करेंगे” तघ उन सबने कहा-““मो ! आपने सत्य कहा । कहा हे-
अन्त्यजोऽपि यदा साक्षी विवादे सम्प्रजायते ।
न तत्रःविश्यते दिव्यं कि पुनर्यत्र देवताः ॥ ४३७॥
Ei
भाषाटीकासमेत्तम । (१८७)
जव बिवादम अन्त्यजमी साक्षी होता है वहां शपथ नहीं कीजाती फिर
जहां देवता हों वहाँ शपथ कैसी | ४३७ ||
तदस्माकमपि अत्र विषये महत्कौतुहले वर्तते । प्रत्यूषस--
मये युवाभ्यामपि अस्मामिः सह तत्र वनोदेशे गन्तव्यम्’?
इति । एतस्मिन्नन्तरे पापबुद्धिः स्वग्रहं गत्वा स्वजनकसु-
वाच- तात ! प्रभूतोऽयं मयाथों धर्म्महुद्धे्ोरितः, स च
तव वचनेन परिणतिं गच्छति, अन्यथा अस्माकं माण; सह
यास्यति” ! स आइ“ वत्स ! हृतं बद् येन ओच्य तद्द्वव्यं
स्थिरतां नयामि? पापडुद्धिः आह-तात ! अस्ति तत्मदेशे
महाशमी, तस्यां महत्कोटरमस्ति, तत्र त्वं साम्प्रतमेच
विशा । ततः मनाते यदाहं सत्यश्रावणं करोमि, तदा
त्वया वाच्यं यद्धधर्म्मदद्धिश्वौरः इति । तथा अनुष्ठिते
अत्यूषे खात्वा पापबुद्धिः धम्मेवुद्धिपुरःसरो धर्माधिकरणिकेः
सह् ता शमीमभ्येत्य तारस्वरेण भोवाच-
सो हमकोभी इस विषरमें बडा कुतूहळ है प्रात,क्ञाळ तुम दोनोंकों हमार
साथ उस बनमें जाना चाहिये” | इसी समय पापबुद्धि अपने घर जाव पितासे
दोजा-“हे तात | वडुतसा वह व्मवुद्धिका वन भेले चुरा छिया वह तुम्हारे
बचनसे पचजायगा । नहीं तो मरे प्राणाके साथ जायगा” | बह वाळा-
“वत्स ! शीघ्र कहो जिसे कहकर में उस ऋपको स्थिरताका प्राक | पाप--
बुद्धि वोछा--तात ! इस प्रदेश एक मदा शर्मीका पेड हैं उतकी एक बडी
खखोडछ है वहां तू समी प्रवेश करना, प्रात.क्ाक जव में सत्य छुनाऊ तब
तप कह देना धर्मेदुद्धि चोर है,” ऐसा कर प्रमात स्वात कर पापबुद्धि घमेड--
द्विको आगे किये धमोधिकारियोंके संग उस शमीको प्राप्तहों ऊंचे स्वरसे बोळा-
“'आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलव्च
दयोभूंमिरापो हृद्यं यमश्च। `
अदृश्य रात्रिश्च उसे च सन्ध्ये ` 7
धर्मों हि जानाति नरस्य वृत्तत् ॥ ४३८॥
( १८८ ) ' पञ्चतन्त्रम्। ,
“सूये, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, स्वर्ग, पृथ्वी, जळ, हृदय, यम, दिनरात्रि,
दोनों सध्या और घर्म मनुष्यके कर्तव्यको जानता हे ॥ ४३८॥
भगवति वनदेवते | आवयोर्मध्ये यः चोरः त्वं कथथ''
अथ पापचद्धिपिता शमीकोटरस्थः प्रोवाच-भोः ! श्रणुत
श्रुण्त धम्मंबाळधना हतमतद्धनम् ' | लदाकण्य सब ते राजः
पुरुषा विस्मयोत्कुलोचना यावद्धम्मेजुद्धेः वित्तहरणोचितं
7नसह शास्रदटया अवलाकधान्त तावद्धम्मंबुद्धिना तच्छ-
मीकोटर वाहेभाज्यद्रव्यः पारवेष्टय वाहना सन्दापतम।
अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरेउद्धदग्घशारीर; स्फुट्ति
क्षणः करुण परिदेवयन् पापबुद्धिपिता निश्चक्राम । ततश्च
तेः सर्वः इष्टः“ “भोः ! किमिदम् ?” इत्युक्ते स पापबुद्धिवि-
चाइंत सवासद् निवंदाधत्वा उपरत । अथ त्ते राजपुरुषाः
पापबाद्ध शनाशाखाया आतळम्व्य चम्मदाळ पशस्य इद्
सूचुः- “अहो ! साधु चिइसुच्यते- `
भगवति चनदेवते ! हम दोनोंके बीचमें जो चोरहो उसको तुम कहो?” तब
पापबुद्धिका पिता शमीकी खखोडलमेंसे बोछा--/भो ! सुनो २ यह धन धमेधुद्धिने
हरण किया है”? यह सुनकर वे सब राजपुरुष विस्मयते खिके नेत्रवाछे जबतक
धर्मबुद्धिकों घनहरणके उचित दंडकों श्ाद्धदृष्टिते देखते हैं तबतक घमेबुद्धिले
उस शर्मीकी खखोडछ अग्निमोज्य ( तृणादि ) दरव्यसे ढककर उसमें आग
गादी । तब उस शमीकोटरके जळनेपर अर्धे दग्धदारीरवाला नेत्रफूटा करु
'णास्वरसे चिल्लाता हुआ पापबुद्धिका पिता निकला. तब उन सबने पूछा-
“मोः | यह क्या है ?? । ऐसा कहनेपर बह इस सब पापतुद्धिकी चेशको
निवेदन कर मरगया । तब वे राजपुरुष पापवुद्धिको शर्माशाखामै बांधकर धर्मेबु-
द्विकी प्रशेसा कर यह बोले--“अहो ! यह सत्य कहा है-
उपाय चन्तयेत्आज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् ।
पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हता बकाः ॥ ४२५-॥
बुद्विमान् उपायकी चिन्ता कर अपावकीभी चिन्ता करे । मूखं बगलके दुखत
-नौठेने उसके बच्चे खाळिये ॥ ४२९ ॥”
आषाटीकासमेतम् । (१८९),
धम्मबाद्धिः प्राह-“कथमेतत् ”' ते प्रोच्चः ।
धमैबुद्धि बोळा-''यह केसे ??” चे बोले--
कथा २०.
अस्ति करसिमश्रिद्ठनोदेशे बहुबकसनाथो वटपादपः ।
तस्य कोटरे कृष्णसर्पः प्रातिवसति स्म । स च बकबाल-
कानजातपक्षात् अपि सदैव भक्षयन् कालं नयति ।
अथ एको बकस्तेन भाक्षितानि अपत्याने इष्टा शिक्षु-
वैराग्यात् सरस्तीरमासाद्य बाप्पपूरपूरितनयनः अधोमुख-
स्तिष्ठति । तश्च ताइक्चेोितमबलोक्य कुलीरकः प्रोवाच,-
“माम | किमेवं रुदते भवता अद्या? । स आइ- भद्र ! कि
करोमि, मम मन्दभाग्यस्य बा लकाः कोटरनिवासिना सर्पेण
भक्षिताः, तदइ,खडःखितोऽहं रोदिमि । तव कथय मे यदि
अस्ति कश्चिदुपायः तट्विमाशाथ ?” । तदाकण्थं कुलीरकः
चिन्तयामास । “अं तावत् अस्मजातिततहजदेरी तथा
उपदेशं यच्छामि सत्याबृतं यथान्येऽ५ बकाः सर्वे संक्षय”
मायान्ति । उत्तश्व-
किसी एक वनमें बहुत बगर्छोसे युक्त वटका वृक्ष था उसकी खखोडळलमें
, काढा सांप रहताथा । वह पख न निके घगळेके बच्चाको सदा भक्षण करता
समय बिताता । तब एक बगळा उसके भक्षण किये सन्तानको देखकर बाळ-
कोदे विरागसे नदीके किनारे आकर नेश्रेंमें जळमरे नाचेको सुख किये स्थित
था । उसकी यह चेष्टा देखकर कुलीरक बोढा-- मामा ] भाज तुम क्यो
रोतेही ८77) वह बोळा,-““भद्र ! वया करू मुझ मन्दभाग्यके वारक खखोडलमें
रहनेवाले काले सने खाडये । उसके दुःखसे दुःखी हुआ में रोताह सो मुझसे
कह यदि कोई उस सापके नाशका उपाय हो तो?” यह सुनकर छुळीरक
चिन्ता करने छगा । “यह तो हमारी जातिका सहज वे है ऐसा उपदेश दू
कि, सत्य भोर अनृत हो जिससे सत्र बगले नाश हो जायेंगे। कहाहै-
नवनीतसमां वाणी कुत्वा चित्तं तु निर्दयम् ।
तथा प्रबोध्यते शत्रु! सान्वयो म्रियत यथा ॥ ४४० ॥?”
(१९०) ` पञ्चतन्त्रम् ।
मक्खनकी समानःवाणी ओर निदेय चित्र करके शत्रुको इस प्रकार समझावे
पजिससे वंशसहित शत्रु मरजाय ॥ ४४० ॥
आह च,- माम ! यदि एवं तत मत्त्यमांसखण्डानि
नकुलस्य बिलट्वारात् सर्पकोटर यावत् प्रक्षिप यथा
नकुलस्तन्मार्गेण गत्वा तं दुष्टसप विनाशयाति” । अथ
तथा अलिते मत्स्यमांसाइसारिणा नङुलेन तं कृष्ण-
सप निहृत्य तेऽपि तदुक्षाश्रयाः सर्वे बकाश्च शनेः
शनेभक्षिताः । अतो वयं ब्रमः “उपायं चिन्तयेदिति? ।
बाढामी- मामा | यदि ऐसा ६ तो मत्त्योंके मांसखण्ड नकुछके बिळके
डारस सांपकी खखोडळपर्येन्त डाको जो योळा उसमार्गसे जाकर उस दुष्ट सर्पको
मारेगा” वैसा अनुष्ठान करनेपर मछाल्योंके मांसाबसारी नौळेने उस काढे
सर्पको मारकर ओर, वेभी छस बृक्षपर रहनेवाळे सब बगळे भी शनैः २
Nt ११ |
भक्षण कर ।थय । इससे हम कहते छ उपाय [विचार इत्याद्
तदनेन पापबुद्धिना उपायश्विन्तितों नापायः । ततस्त-
त्फळं मातम ।
सा इस पापद्ठाद्धन उपाय विचारा अपाय नहा सा इसका यह फल ह |
धर्मबुद्धिः कुबुद्धिश्च द्वावितौ विदितो मम ।
_ पुत्रेण व्यर्थपाण्डित्यात्पिता धूमेन घातितः ॥ ४४१ ॥
धर्मबुद्धि भोर कुबुद्धि यह दोनों मेते जाने, बृथा पाण्डित्यसे पिताको धूमसे
पुत्रने मारडाळा ॥ ४४१ ॥
एवं मूठ ! त्वयापि उपायश्चिन्तितो नापायः पापबुद्धिवत्।
तत न भवसि त्वं सज्जनः, केवलं पापबुद्धिरसि, ज्ञातो मया
रवामिनः प्राणसन्देहानयनात् । भकटीकूतं त्वया स्वयमे~,
वात्मनो इष्टत्वं कोटिल्यश्च। अथवा साधु चद्मुच्यते-
सो हे मूढ! तेवेमी उपायको चिन्ता करी भपायकी नहीं । सो तू सजनं
नहीं केवळ पापबुद्धि हे जाना मेने स्वामीके प्राणसन्देहकी अनयसे प्रमट की या
तुमने स्वयंही भनी दुष्टता ओर कुटिळंता । अथवा अच्छा कहा है-
भाषाटीकासमेतम्। (१९१)
यल्लाद्पि कः पश्येच्छिखिनामाहारनिश्सरणमार्गम् । '
यादि जलद॒ध्वानिष्ठदितास्त एव मूढा न नृत्येयुः ॥ ४४२ ॥
यत्नसेमी मोरॉके भोजनके ( बीट ) निकळमेके मार्गको कौन देख सक्ता है
यदि मेघकी ध्वानेसे प्रसन्नहुए वेही मूढ न नृत्य कर ॥ ४४२ ||
यदि त्वं स्वामिनं एनां दशां. नयसि तदस्मद्विधस्य का
गणना । तस्मात मम आसन्नेन भवता न भाव्यम् उक्तञ्च
जो तू स्वामीको इस दामे प्रात करता है सो फिर हम' सरीकोंकी क्या
गणना हे ! इस कारण मेरे समीपमे तुमको रहना उचित नहीं है। कहा हे
` तुलां लोहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषिकाः! `
राजेस्तत्र हरेच्छेयनो बालकं नाच संशयः ॥ ४४३ ॥7?
जहा सहतलोहकी तुलाको चूहे खाजाते हैं हे राजन्! बही बालकको
स्पेन लेजाता है इसमें सन्देह, नहीं | ४४३॥ ?'
दनक आइ,-'' कथमेतत्?! सोऽब्रवी त-
दमनक चोला,--““यह केसी कथा है £” वह बोळा-
न्केथा २१. .
अस्ति कसिमाधिदविष्ठाने जीर्णधनो नाम बणिकुपुत्रः।
स च विभवक्षयात देशान्तरगमनमना व्यचिन्तयतू ।
¬ किसी स्थानमें एक जोणेधन'ज्ञामधाळा वाभिकृपुत्र रहताथा वह घनके क्षयसे
देशान्तरमें जानेकी इच्छासे विज्वारने ख्या | कि, . २
“प्यात्र देशेष्थवा स्थाने भोगान्छुक्त्वा स्ववीर्यतः ।
, तस्मिन्थिभवदीनो यो वसेत्स पुरुषाधमः ॥ ४४४ ॥
“जिस देश वा जित स्थानमें अनेक भोगीको, अपने पराक्रमसे भोगे उस
च्य जो ऐक्वर्यहीन होकर बसे वह पुरुष नीच दे ॥ ४४४'॥
| तथाच- |
तेसेही-
थनाहङ्कारयुक्तेन चिरंबिलसितं ईरा । . , ,
दीनं वदाति तत्रैव यः परेषां स निन्दितः ॥ ४४५ ॥??
(१९२) पञ्चतन्त्रम्।, .
=
जिस अहकारयुकतने प्रथम बहुत सपयतक बिछास किया है और जो उसी
स्थानमें दीन बचन कहे वह निन्दित होता हे | ४४५ |”?
तस्य च गृहे लोहभारघटिता पूर्वेपुरुधोपाजिता तुला
आसीत् । ताश्व कस्यचित श्रो्िनो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा
देशान्तरं मस्थितः । ततः खुचिर काले देशान्तरं यथेच्छया
स्रान्त्वा पुनः स्वपुरमागत्य सं श्रेष्ठिनसुवा च,-“भोः छिन्!
दीयतां मे सा निक्षेपतुला” । स आइ- “भो! नास्ति सा
त्वदीया तुला सषिकेभक्षिता” । जीर्णधन आह-“भोः
ओछिन् ! नास्ति दोषस्ते यादि मूषिकेः भक्षितेति। इंच्ळ -
एवायं संसारः । न किञ्चिद शाश्वतमस्ति, परमहं नद्यां
स्नानार्थ गमिष्यामि, तत् त्वमात्मीय शिशु मेन धनदेवनामानं
मथा सह सरानोपकरणहरस्तं प्रेषय” इति । सोऽपि चोय्यमया-
स्य शङ्कितः स्वपुत्रसचाच-“'वत्ल ! पितृव्पोऽयं तव स्नानार्थ
नद्यां यास्यति तद्गम्पतामनेन सार स्लानोपकरणमादाय ”
ति । अहो ! साधु इदमुच्यते-
उस घरमे लोइमार वाली बृद्ध पुरुषोंकी उपाजित एक तराजू थी उसको
केसी सेठके घरमें धरोहर रखकर देशन्तरको गया । और बहुतकारतक देशा-
न्तरमें यथेच्छ भण कर फिर अपने पुरमें आउार श्रेष्ठीसे बह वोला,-“भो
सेठ! हमारी निक्षेपतुळा ( घराइरकी तराजू ) दो” वह बोछा,-“भो वह तुम्हारी
तराजू नहीं हे चुहोंने खाडी” | जीशंधन बोछा,-''सेठजी | इसमें आपका दोष
क्या यदि चूहोंने खाली, इसी प्रकारका यह संसार हे कोई यहां निरन्तर रह्नेवाला
नहीं है । परन्तु में नदीने खान करने जाऊंगा | सो तुम अपने, इस बाळक धन-
देवको मेरे साथ स्वानीय द्रब्यके सहित भेज दीजिये,” बहमी चोरीके भयसें
डोकित हो भपने , पुत्रसे बोछा--“बत्स ! यह तुम्हारे चचा खानके विमित्त
नदीको जाथंगे सो इनके साथ खानीय पदार्थ लेकर जाओ” इति । अहो | यह
अच्छा कहा है-
न भक्तया कस्यचित्कोऽपि भिय प्रकुरुते नरः ।
सुक्त्वा अयं प्रलोभं वा कास्येकारणनेव वा ॥ ४४६.
भाषादीकासमेतम् । (१९३ )
भक्तिसे कोई मनुष्य किसीका कुछ प्रिय नहीं करता है, भय, छोम वा कार्य-
कारणको छोडकर ( अन्य कारण नहीं हे) ॥ ४४६ ॥
तथाच-
तेसेही-
अत्यादरो भवेद्यत्न कार्य्यकारणवजितः ।
तत्र शङ्का प्रकत्तेव्या परिणामेऽसुखावहा ॥ ४४७ ॥
जहा कार्यकारणको छोडकर बहुत आदर होता है उस स्थानम अवश्य
शंका करनी चाहिये पारणाममें बुरा है | ४४७ ॥
अथ असो वणिक्शिशुः स्रानोपकरणमादाय भहृष्टमना-
स्तेन अभ्यागतेन सह प्रस्थितः । तथानुष्ठिते वणिङ् स्नात्वा
तं शिशुं नदीगहायां प्रक्षिप्य तद्ठारं बृहच्छिलया आच्छाद्य
सत्वरं गृहमागतः पृष्टश्च तेन बणिजा,- भो अभ्यागत !
कथ्यतां कुत्र मे शिशुर्थः त्वया सह नदी गतः? इति स आ-
हु, नदीतटात् स श्येतेन हतः इति । श्रेष्याह,- मिथ्या-
वादिन्! कि कचित् श्येनो बाळं हते शक्काति ! तत् समर्पय
मे सुतमन्यथा राजकुले निवेदायप्यामिः'! इति । स आह,
“भोः सत्यवादिन्! यथा श्येनो बालं न नयति तथा मूषिका
अपि लोहभारघटितां चुला न भक्षयन्ति, तत अपथ भे
ठुलाँ, यादे दारकण प्रयोजनमा । एव तो [वदमानो द्वा-
वापि राजकुलं गतो । तत्र श्रेष्ठी तारस्श्रेण प्रोवाच-''भोः !
अब्रह्मण्यम्रह्मण्यम |! मम शिशुः अनेन चौरेण अपहतः? ।
अथ धर्माधिकारिणः तमूचुः, भोः! समप्यतां श्रेष्ठिसुतः
सं आह,- कि करोमि, पश्यतो मे नदीनटात इषेनेन अप-
हतः शिशुः’? । तच्छृत्वा ते ्ोचुः,- “भो ! न सत्यमभिहितं
भवता, कि श्यनः शिशु हठु समथा भवति?” स आह,
रो भोः ! श्रूयतां मद्वचः
१३
६ १९४) - पश्चतन्त्रम् ।
तब यह वागिकाशिशु खानकी मामग्री छेकर प्रसन्नहो उस अम्यागतके साथ
चला । तब यह वणिक् ऐसा करनेपर खान कर उस वाळकको नदोगुहाम रख
उसके द्वारको एक बडी शिलास ढककर बहुत शीघ्र घर आया तब उस वैः्यमे'
पूछा-/भो अभ्यागत ! कहो कहां हे वह मेरा वाळक जो तेरे साथ नदीखा-
नको गयाथा” वह बोछा-“नर्दीके किनारेसे उसको गिद्ध छेगया” । सेठ
चोढ़ा,- मिथ्या वादिन् ! क्या कोई शिद्धमी बाढकको हरण कर सकता है।
सो मेरे पुत्रको दे नहीं तो राजकुछमें निवेदन करूंगा,” वह बोला,-“ भो
सत्यवादिन् | जसे गिद्ध बालकको नही लेजा सकता इसी प्रकार मूषकभी छोहसे
बनी तराज्ञको नहीं खा सकते हैं । मेरी तराजू दे यदि वाळकसे प्रयोजन है
तो” | इस प्रकार दोनेंही विवाद करते राजकुलमें गये | बहां सेठ ऊचे स्वरसे
चोढा “भो ! बडा अनुचित हे ! बडा अनुचित हे | मेरा वाळक इस चोरने
हरण कर छिया,” तव धर्माधिकारी उससे बोले,-“श्रेष्ठिका पुत्र समर्पण करो)
वह बोला,- में क्या करूं मेरे देखते नर्दातटसे गृध्रने चाळक हरण किया,”
यह सुनकर वह बोछे,-“'भो ! तुमने सत्य नहीं कहा क्या गिद्ध बाळक हरण
करनेको समर्थ हो सकता है १” वह वोडा,- भो ! भो ! | हमारे वचन पुनो-
तुलां लोहसहस्रस्य थत्र खादन्ति मूषिकाः ।
राजव तत्र दरेच्छचेनों बालक नात्र संशयः ॥ ४४८ ॥7
जहां सहल छोहकी तराज्ञको मूपे खा जाते हैं वहां वाळककोमी श्येन हर
लता हे इसम सन्देह नहां ॥ ४४८ ॥९
ते म्रोचुः-*' कथमेतत्?” ततः श्रेष्ठी सभ्यानामग्रे आदितः
सब वृत्तान्त Tनवदयामास । ततः तावहस्य द्वावाप ता
परस्परं संबोध्य ठुलाशिशुअदानेन सन्तोषितो । अतोऽहं
रवीने, “तुलां लोइसहश्जस्य”' इति ।
वह बोछे,- यह केसे १” तब श्रेष्ठी सम्योंके आगे. आदिसे सव इत्तान्त
निवेदन करता मया, तब उन्होने हसकर उन दोनोंहीको तराजू आर बाइक
दिलवाकर सन्तुष्ट किया, इससे में कहताहं “तुळा लोइसहरूकी - इत्यादि” ॥
तन्मूखे ! सञावकमरसादमसहमानेन त्वया एतत कृतम् ।
अहो साधु चेद्झुच्यते-
आषाटीकासमेतम् । (१९५)
ते मुखे ! सजौवककी प्रसन्नता न सहनेवाले तेने यह किया । अहो अच्छा
कहा हे कि--
प्रायेणात्र कुलान्वितं कुकुलजाः श्रीवक्ठम॑ दुभेगा
दातार कुपणा कजनतूजना वित्ते स्थितं iनिधनाः
वछूप्यांपहताश्च कान्तवपुष घमाश्रथ पापना
नानाशासत्रविचक्षणश्च पुरुषं निन्दन्ति सूखा; सदा॥ ४४९
बहुधा इस जगते खाटे कुलमें उत्पन्न इए कुछीनोंकी, दुर्भागी भाग्यवान्
शुरुषोंकी, कणूस दाताओंकी, कुटिछ सीर्घोकी, निर्धनी धनियोंकी, विरूप सुन्द-
राँको, पापी धर्मका औंको, सूखे नाना शाक्षमें चतुर पुरुषोंकी सदा निन्दा
करते हैं ॥ ४४९ ॥
तथाच-
जैसेही-
मूर्खाणां पण्डिता देण्या निर्धनानां महाधनाः ।
व्रतिनः पापशीलानामसतीनां कुलस्त्रियः ॥ ४५० ॥ ,
मूर्ख पडितोसे सदा ढेष करते हैं, निर्धन धनबानोसे, पापात्मा ब्रतयालोसे,
असती कुछल्चियोसे सदा देष करती हैं ॥ ४५० ||
तन्मे । त्वया हितमपि अहितं कुतष् । उक्तश्च-
सो हे मूर्ख | तने हितमी अहित किया. कडा हे-
याण्डितोऽपि वरं शवुने मूर्खा हितकारकः ।
वानरेण हतो राजा विप्राश्चौरेण रक्षिताः ॥ ४५१ ॥
पंडित शत्रुमी अच्छा, हितकारी सूखे मळा नहीँ बानरने राजाको भारा
और ब्राह्मणोंकी चौरते रक्षा की ॥ ४५१ ॥
दमनक आह- कथमेतत्!” सोऽब्रवीव-
दमनक बोछा-“'यह केस १ बह बॉळा-
कस्यचित् राशो नित्यं वानरोऽतिमक्तिपरोऽइसेवकोऽ-
पुरेऽषि अप्रतिAद्वत्रसरोऽतिविश्वासस्थानमभूत् । एकदा
/ निद्रा गतत्य बानर उपजन नात्वा वायुं विदधति
क oN
( १९६) पञ्चतन्त्रम् ।
राज्ञो वक्षःस्थलोपरि मक्षिका उपविष्टा । व्यजनेन मुहुर्मुहु-
निषिध्यमानापि पुनः पुनस्तत्रेव उपविशति । तत-
स्तेन स्वमावचपलेन मूर्खेण वानरेण कुद्धेन सता तीक्ष्णं
खड्गमादाय तस्या उपरि प्रहारो विहितः। ततो मक्षिका
उट्डीय गता तेन शितधारेण असिना राज्ञो वक्षो द्विधा
जातं राजा मृतश्च । तस्मात् चिरायुरिच्छता नृपेण मृखोऽ-
सुचरो न रक्षणीयः । अपरमेकस्मिन्नगरे कोऽपि विभो महा-
विद्वान् परं पूर्वजन्मयोगेन चोरो बर्तते । स तस्मिन् पुरेऽन्य-
देशादागतान् चतुरो बिमान् बहूनि वस्तूनि विक्रीणतो दृष्टा
चिन्तितवान्, “अहो ! केन उपायेन एषां घनं लमे” !।
इति बिचिम्त्य तेषां पुरोऽनेकानि शाख््रोक्तानि सुभाषिः
तानि च अतिमियाणि मधुराणि वचनानि जल्पता तेषां
मनसि विश्वासमुत्पाद्य सेवा कप्तेमारब्धा । अथ वा साधु
चेद्घुच्यते-
किसी एक राजाका नित्य अत्यन्त भक्त एक वानर अंगरक्षक भन्तःपुर-
ममी अनिवारित प्रवेराबाळा भति विश्वासपात्र था, एक समय निद्रित इए
राजाके वानरके पंखा छेकर हवा करनेमें राजाकी छातीपर मक्खी बैठ गई पंखेसे
वारंवार निषेध की इईभी वहीं बैठती | तब उस स्वभावसे चपळ मूर्ख वानरे
क्रोध कर तीक्ष्ण खङ्ग छे उसपर प्रहार दिया | तव मक्खी तो उडाई उस
तीक्ष्ण धारवाली तल्वारसे राजाकी छाती दो खण्ड इई जिससे वह मरगया,
इससे चिरायुकी रक्षा करनेवाले राजाको मूर्ख अनुचर करना उचित नहीं ।
हूसरी वात यह कि, एक नगरमें कोई ब्राह्मण महाविद्वान् था, परन्तु पूर्वजन्मके
योगत चोर होगया, वह उस पुरम और देशोंसे आये इए चार ब्राह्मणोको
बहुतसी चीजे बेचता देखकर बिचारने लगा, “अहो किस उपायसे इनका धन
छू? । ऐसा विचार कर उनके सन्मुख अनेक शाल्लोक्त सुभाषित अतिप्रिय मधुर
बचनोंको कहकर उनके मनमै विश्वास उत्पन्न कर सेवा करनी प्रारम्म की |
अथवा यह अच्छा कहा है-
a)
भाषाटीकासमेतम् । (१९७)
असती नवति सलज्ञा क्षारं नीरव शीतलं भवति ।
दम्भी भवाति विवेकी मियवक्ता भवति धूर्तजनः ॥४५२॥
अवती ढजावती होती हे, खारी पानी ठढा होता है, ज्ञानी पाखडी होता
है और घूर्तमनुष्य प्रियवक्ता होता हे॥ ४५२॥
अथ तस्मिन् सेवां कुर्वति तेः विभः सवेवस्तूनि विक्रीस
वहुसूल्यानि रत्लानि क्रीतानि! ततः तानि जंघामध्ये त-
त्समक्षं प्रक्षिप्य स्वदेशं भति गन्दुमुद्यमो विहितः । ततः स
_धूर्तविश्वस्ताव् विधान् गन्तुमुच्चतान प्रेक्ष्य चिन्ताव्याङ्कालित-
मनाः सञ्जातः । “अहो ! धनमेतत् न किञ्चित् मम चटि-
तम्! अथ एभिः सह यामि, पथि क्कापि विषे दत्वा एता-
न्निहत्य सर्वरत्नानि गहाभि” । हाते विचिन्त्य तेषामग्ने
सकरुण विलप्य इदमाह,” भो; मित्राणि ! यूयं मामेका-
किनं सक्ता गन्तुमुदताः । तन्मे मनो भवद्विः सह खेहपाशेन
बद्धं भवद्विरहनासेव आकुले सञ्जातं यथा धति कापि न
धत्ते । यूयमलुग्रहं विधाय सहायभूतं मामपि सहेव नयत।
तद्वचः श्रुत्वा ते करूणाद्रीचित्ताः तेन सममेव स्वदेशं प्राति
अस्थिताः। अथ अध्वनि तेषां पञ्चानामपि पढ्ठीपुरमध्ये
(अजता ध्वांक्षाः कथायेतुमारब्धा3,- रे रे किराताः !
धावत धावत । सपादलक्षधनिनो यान्ति । एतान् निहत्य
अनं नयत” । ततः किरातेः ध्वांक्वचनमाकर्ण्य सत्वरं गत्वा
से विप्रा लशुडमहारेः जर्जरीकृत्य वख्राणि मोचाथित्वा वि-
लोकित्ताः, परं घने किञ्चिन्न लब्धम् । तदा तेः किरातेरमि-
हितम्- भो; पान्थाः! पुरा कदापि ध्वांक्षवचनमनृतं न
) आसीत्। ततो भवतां सन्निधो कापि धनं विद्यते । तद-
पेयत । अन्यथा सर्वेषामपि वधं विधाय चर्म विदार्य प्रत्यङ्ग
प्रक्ष्य घनं नेष्यामः? | तदा तेषामीदृशं वचनमाकण्यं चौरः
'बिमेण मनसि चिन्तितम्, यदा एषां विप्राणां वधं विधाय
अंगं विलोक्य रन्रानि नेष्यन्ति तदा अपि मां वथिष्यन्ति
(१९८) पञ्चतन्त्रम् ।
ततोऽहं पू्वेमेवात्मानमरल्रं समर्प्यं एतान् मुश्चामि । उक्तश्च-
उसके सेवा कंरनेपर उन ब्राह्मणोंने सब वस्तु बेचकर बहु मृत्य रत्न
खरीदे । और उनको जंघामें उनके सन्मुखही डाळकर अपने देश जानेको”
तयार इए । तब वह त्राण उनको जाता देख मनरमें व्याकुळ हुआ, “अहहो
यह धन कुछमी हमको न दिया सो में इनके साथ जाऊं मागेमे कहीं विष दे
इनको मारकर सव रत्न ग्रहण करळू'? | ऐसा विचार कर उनके आणे करुणासे
विळाप कर यह बोळा,-“भो मित्रो ! तुम मुझ इकलेको छोडकर जानेको.
तयार हुए, सो मेरा मन आपके साथ खेहपादामें बंधा हे आपके वियोगसेही.
मैं व्याकुळ हूं बुद्धि धीरज धारण नहीं करती है । तुम अनुग्रह कर सहायभूत ”
मुझेभी साथ ले चछो” | उसके वचन सुन वे करुणासे आद्रेचित्त हो उसके
साथ ही अपने देशको चले । तब मार्गमे उन पांचोंकि पर्छ पुरमे जाते इए,
काक कहने ळगे,-“ररे किरातो ! दोडो दोडो सबा लाख रुपयेके धनी जाते
हे इनको मारकर घन ढेलो!” । तब किरातोने ध्वांक्षवचन सुनकर शीघ्र जाकर
उच ब्राह्मणोंको छगुडप्रहारसे जर्जर करके बल्ल उतारकर देखा, परन्तु धच
कुछमी न पाया | तव उन किरातोंने कहा,-''भो मुसाफिरो ! पहछे कभी का-
कोंका बचन असत्य नहीं हुआथा । सो तुम्हार पास कहीं धन हे सो दो नहीं,
तो सबका वधकर चर्म विदीण कर प्रत्यंग देखकर धन ळेळेगे 7 । तब उनके
ऐसे घचन सुनकर चोर विप्रने मनमें विचारा “जो यह इन ब्राह्मणोंका वध कर
अंगको देख रत्य लेंगे तो मुझक्कोभी मारेंगे सो पहले में अरत्न भपनेको सम-
पेण कर इनको छुडाऊं। कहा है-
मृत्योविभेषि कि बाल न स भीतं विसुश्चति।
अद्य वाब्दशतान्ते वा मृत्युर्वे ्राणिनां शवः ॥ ४५३ ॥
मूर्ख ! मृत्युसे क्यों इस्ता है यह डरे इएको नही छोडेगी भाज वासौ
बे प्राणियोंको मृत्यु भवश्य होंगी ॥ ४९३ ॥
तथाच-
तैसेही-
गवार्थे बाह्मणार्थे च आणत्यागं करोति यः ।
सूर्य्यस्य मण्डलं मित्वा स याति परमां गतिम् ॥४५४॥ १
भाषाटीकासमेतम्। „ (१९९)
जो गो और ब्राह्ममके निमित्त प्राणत्यागन करता है वह सयैमडळको
मेदकर परमगतिको जाता है ॥ ४५४ ॥??
इति निश्चित्य अभिहितम् ,-''भोः किराताः! यादं एवं
ततो माँ पूर्वे निहत्य विलोकयत । ततः तस्तथादाडत
तं घनरहितमवलोक्य अपरे चत्वारोऽपि झुक्ताः । अताऽह् `
त्रवीमि, ““पाण्डितोऽपि वरं शञ्चः” इाति। अथ एव संवदतो-
सतयोः सञ्जीवकः क्षणमेकं [पगलकेन सह युद्ध कृत्वा तस्य
खरनखरभहाराभिहतो गतासुः बसुन्धरापीठे निपपात । अथ
तं गतासुमवलोक्य पिगलकस्तदरुणस्मरणाद्रहदयः भोवाच-
“भो; ! अयुक्तं मया पापेन कृतं सञ्जीवकं व्यापादयता, यतो
विश्वासघातादन्यत् नास्ति पापतरं कमं । उक्तश्च
ऐसा निश्चय कर उसने कहा,-“हे किरातो | जो ऐसा है तो पहले मुझे
मारकर दो त्र उन्हेंन वैसा करके उसको धनरहित देख शेष चारों छोड-
दिये । इससे में कहताहू “पडितमी शत्रु अच्छा है इत्यादि” । ऐसा उन दोनोंके
कहतेमें सजीवक एकक्षण विंगळकके साथ युद्ध करके उसके तीक्ष्ण नखप्रहारसे
हत इभा प्राणरहित हो प्रथ्वीपर गिरा । तव उसको प्राणरहित देख पिंगळक
उसके गुण स्मरणे भाद्ह्य हो वोळा,-“मो ! सजीवकको मारकर मेंने अयुक्त
पाप किया, कारण कि,विश्वासघातसे अधिक और कोई पापकर्म नही हा कहाहै--
मित्रद्रोही कृतन्नश्न यश्च विश्वासघातकः ।
ते नरा नरकं यान्ति यावच्न्द्रादिवाकरी ॥ ४५५ ॥
मितनद्रोही, कती और जो विश्वासघाती हे घे मनुष्य जवतक सूर्य चन्द्र हैं
तत्र तक नरकको जाते हैं] ४५५ ॥
' भूमिक्षये राजविनाश एव भृत्यस्य वा डुद्धिमतो विनाशे ।
नो य्रक्तमृक्तं ह्ानयोःसमत्वं नष्टापि भूमिःसुलभा न भृत्याश्
भूमिक्षय राजनाझ वा बुद्धिमान् मृत्यके नाशर्म इनका समत्व कहना दुक्त
नहीं हो सक्ता नष्टहई भूमि युङम हे पर मृत्य नहीं मिळते ॥ ४१६ ॥
तथा मया सभामध्ये स सदैव मरशांतितः। तत् किं कथः
यिष्यामि तेषामग्रतः । उक्तख-
(२००) पञ्चतन्त्रम् ।
और मैंने उसकी समामे सदा प्रशंसा की अब उन सबके आगे क्या कहूंगा।-
कहाहि-
उक्तो भवति यः पूर्व गुणवानिति संसदि !
न तस्य दोषो बक्तव्यः प्रतिज्ञाभङ्गभीरूणा ॥ ४५७ ॥ ?
जिसको पहले समामे यह गुणवान् है ऐसा कहा हे प्रतिश्ञासंगर्भारुओंको
फिर उनके दोष कहने उचित नहीं हैं ॥ ४९७ ॥ ?
एवोविध प्रलपन्ते दमनकः समेत्य सह्षमिद्माह-“ देव
कातरतमस्तव एष न्यायो यद्दोहकारिणं शप्पन्नुजं हत्वा इत्थं
शोचसि । तन्न एतडुपपन्न भूठ जाम । उक्तश्व-
इस प्रकारसे प्रलाप करते हुएके निकट दमनक आकर प्रसन्नतासे यह बोला-
“देव ! आपका यह न्याय अत्यन्त कातरतमहे जो इस द्रोहकारी घासमोजीको
मारकर इस प्रकार शोच करते हो राजाओको यह उचित नहीं हे । कहा है-
पिता वा यदि वा त्राता पुत्रो भाय्यांथवा खुहत्।
प्राणद्रोह यदा गच्छेदन्तम्यो नास्ति पातकम् ॥ ४५८ ॥
पिता, आता, पुत्र, खरी वा सुहत जो यह अपने प्राणका द्रोह करें तो इनके
* मारनेमें पातक नहीं हे ॥ ४५८॥
तथाच-
ओर देखो-
राजा घृणी ब्राह्मणः सर्वभक्षी खी चात्रपा इष्टमातिःसहायः
रेष्यःप्रतीपोऽथिङ्कतः प्रमादी त्याज्या अमी यश्च कृतं न वेत्ति
अति दयाळ राजा, सर्वमक्षी आझण, निळेज खी, दुष्टमति सहायकारी,
प्रतिकूळ मृत्य, असात्रधान अविकारी और जो कार्यको नहीं जानता इनको
त्यागना चाहिये ॥ ४५९ ॥ |
आपिच-
भोरभी- -
सत्यावृता च पुरुषा मियवादिनी च
हिल्ला दयाळरापि चार्थपरा वदान्या ।
भाषाटीकासमेतम् । (२०१)
भूरिव्यया अचुरवित्तसमागमा च
वेश्याङ्गनेव दृपनी/तिरनेकरूपा ॥ ४६० ॥
सत्य, झुठ, कठोर, प्रियवादिनी, दिसायुक्त, दया, मय, कभी खा-
सयुक्त, पुरस्कारषाली, बहुत व्यय, बहुत धनकी प्रातिवाळी राजाओंकी नीति
चेइयाकी समान अनेकरूपबाळी होतोहे ॥ ४६० ॥।
अपिच-
आर सा--
अङ्कतो पद्रवः कश्चिन्महानपि न पूज्यते ।
पूजथन्ति नरा नागान्न ताक्ष्ये नागघातिनम् ॥ ३६१ ॥
विना उपद्रवकरे कोई महानूभी पूजित नहीं होता है मनुष्य सेको
पूजते हैं सर्पैघाती गरुडो नहीं प्जते हैं ॥ ४६१ ॥
तथाच-
सैसेद्वी-
अशोच्यानन्वशोचस्त्व॑ प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासनगतासंश्च नाचुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ४६२॥?
नहीं शोचवाोंका सोच करतेहो, ब्रुद्धिमानोंके वचनोंको बोलते हो पडितडोग
जीते मरे किसीकामी शोच नहीं करते || ४६२ |?
एवं तेन सम्बोधितः पिगलकः सञ्जीवकशोकं त्यकत्वा
दमनकसाचिव्येन राज्यमकरोत् ॥
इति श्रीविष्णुशमविरचिते पच्चतन्त्रे मित्रभेदो नास
्रथमं;तन्त्रं समाप्तम ।
इस प्रकार उसले समझाया हुआ पिंगलक सजीवकके शोकको त्यागनकर
दमनकको मत्री बनाय राव्य करता रहा ॥
इति शरीविष्णुदा्विरचिते पचतत्रे कामेश्वरसङ्कतपाठशाडायाः सुख्याध्यापकपडित-
ज्वालाप्रसादमिश्रहतमाषाटीकाया मित्रभेदोनाम प्रथमं तत्र समाप्तम् । छुभमस्तु ।
अथ.
मित्रसम्प्राधिनांम हितीयं तन्त्रम्।
र
अथ इदमारभ्यते भित्रसम्प्रासिर्नाम द्वितीयं तन्त्रं तस्य
अथमाद्यः छोकः-
अब यह आरंभ किया जाता हे मित्रसम्प्राति नामवाळे दूसरे तंत्रकें जिसका-
यह पीहिळा छोक है-
असाधना अपि प्राज्ञा बद्धिमन्तो बडुश्चताः
साधयन्त्याशु काय्याण काकाखुसग्कूमबत् १॥
निरुषायभी विद्वान् बुद्धिमान् बहुत शात्रदर्शी शीघ्र अपने कार्यको काक
चूहे मुग कच्छपकी समान सिद्ध करते हैं ॥ १ ॥
तद्यथा अचुश्वयत्त-
सो यों सुना है-
अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नग-
रम् । तस्य न आतद्रस्थां 'महाच्छायवान् नानावदः
गापमुक्तफल' काटराइतकाटरः छायाशवासतपाथक”
जनससूृदा न्यग्राधपादपा महान् [ अथवा युक्तम-
कि, दक्षिणके देशमै महिँलारोप्य नाम नगर हे, उसके निकंटही बडी छाया-
बाठा अनेक पक्षियोंसे फळ खाया हुआ, कीटौसे मरीखखोडळवाळा छायाम
पथिक जनोंको आश्वासन देनेवाला एक बडा न्यग्रोध (वट) का पेड हे |
अथवा कहा है-
>» छायासुतम्रग* शङुन्तानवहावष्वग् [वळ्तच्छद
कीटेराइतकोटरः कपिकुलेः स्कन्धे कृतप्रश्नयः ।
गवश्रव्ध मधुपानपातकुसम; क्राघ्यः स एव हुम;
सबाङ्गेबहुसरवसङ्गएुखदो भूभारभूतोऽपरः ॥ २॥
भाषाटीकासमेतम् । (२०३ )
जिसकी छायाम मृग सोते हैं, पक्षिसमूहोसे जो चारों ओरसे ढके पत्ते--
बाळा, कीटोसे ढकी खखोडवाला, स्कन्धमे वानरोंसे युक्त, भौरॉंसे बेडर पिये
कूलरसवाळा, सम्पूर्ण अगोसे बहुत जोषोके सगका सुख देनेवाढा, वहही इक्ष
श्छाघतीय है इसके अतिरिक्त इक्ष पृथ्वीके भारभूत हैं ॥ २ ॥
तत्र च लघुपतनको नाम वायसः प्रतिवसति स्म। स
कदाचित् प्राणयात्रार्थं पुरछुंदिश्य मचलितो यावत पश्यति
तावत् जालहस्तोऽतिक्कण्णतद्ुः स्फुटितचरण उद्भेकेशो यम-
किकराकारो नरः सम्घुखो वभूव । अथ तं दृष्टा शंकितमना
_ व्यचिन्तयत् । “यदयं दुरात्मा अद्य मम आश्रयवटपादपस-
म्सुखोऽभ्येति। तन्न ज्ञायते किमद्य बटवासिनां विहङ्गमानां
सङ्क्षयो भविष्याते न वा” । एवं बहुविधं बिचिन्त्य तत्क्ष-
णान्निइत्य तमेव वटपादपं गत्वा सर्वान् विहङ्गमान् प्रोवाच-
“भो ! अयं इरात्मा छुब्धको जालतण्डुलहस्तः समभ्येति ।
तत् सर्वथा तस्य न विश्वसनीयम् । एष जालं प्रसार्य तंडु-
लान् प्रक्षेप्स्याति । ते तण्डुला भवद्धिः सर्वैरपि काळकूटस-
दृशा द्रष्टव्याः”? । एवं वदतस्तस्य स छुब्धकस्तत्र वटतले
चागत्थ जालं प्रसार्य्य सिन्दुवारसहशान् तण्डुलान् भक्षिप्थ
न अतिदूरं गत्वा निग्रुतः स्थितः । अथ ये पक्षिणस्तत्र स्थि-
तास्ते लघुपततकवाक्यार्गलया निवारितास्तान .तण्डुलान,
हालाहलांकुरानिव वीक्षमाणा निभताः तस्थुः । अत्रान्तरे
चित्रग्रीवो नाम कपोतराजः सहस्तपरिवारः धाणयात्रार्थ
परिभ्रमन् तान् तण्डुलान् दूरतोऽपि पश्यत् लघुपतनकेन
निवार्य्यंमाणोऽपि जिह्वालौल्यात् भक्षणार्थमपतत् सपरिः
वारो निबद्धश्व । साधु इद्सृच्यते-
वहा ठघुपतनक नाम काक रहता था, बह कमी प्राणयात्राके निमित्त पुरकी
भरको ज्याँही चछा, तबतक जाळ हाथमे लिये काळा शरीर फटे पैर ऊर्ध-
केश यमदूतकी समान एक मनुष्य सन्मुख हुआ । उसको देख शक्तित मनसे
यह विचार करने रगा | “जो यह दुरात्मा भाज मेरे आश्रित वटके सन्मुख
(२०४) पञ्चतन्त्रम्।
आता है, सो नहीं जानते कि, आज क्या वर्टानिवासी पक्षियाँका संक्षय होगा
या नहीं” । इस प्रकार बहुत प्रकार विचार कर उसी क्षणमें ढौटकर उस
वटबक्षपर जाकर सब पाक्षेयोसे बोला- “भो ! यह दुरात्मा छुन्धक जाल और
'चावळ हाथम लिय आता हे, सो सब प्रकार इसका विश्वास मत करना यह जाळ
फळावर चावल बखेरंगा | वे चाबछ तुम सब काळकूट विपकी समान जानना?!
उसक एसा कहनफ्र बह लुब्धक वटके तळे आय जाळ फेळाकर सिन्धुवारकी
समान चावळोको बखेरकर थोडी दूर जाकर एकान्ते स्थित हुमा, तब वहां
'स्थित हुये षे पक्षी ढ्घुपतनकक्ने वाक्यरूपी अर्गळासे निवारत हुए उन चाव-
खाका इराहळ विभक अकुरोकी समान देखते हुए एकान्तमें स्थित भये । इसी
"समय चित्रग्नीव नाम कपोतराजा सहरूुटुम्बके सहित प्राणयात्राके निमित्त
घूमता इभा उन चाबछोंको दूरसेमी देखता हुआ छघुपतनकसे निवारित होकर
भी जिह्वाके चंचळतासे भक्षणके लिये प्राप्त होकर पारवार सहित बन्धने पडा।
अच्छा कहामी हे-
जिह्वालोल्यप्रसक्तानां जलमध्यनिवासिनाम्।
आचान्तता चधाऽज्ञानां मीनानाभव जायत ॥ ३॥
जिह्वाके लाळचर्म प्रसक्त इए जळके मध्यें रहनेवाळों मच्छियोंकी समान
भज्ञानियोका भचिन्तित बध होता है [| ३॥
अथवा दुवप्रातकूलतया भउति एब, न तस्य दोषोशस्त ।
जक्तंथ्व- `
अथवा देवकी प्रतिकूलतासे ऐसा होता हे उसका दोष नहीं हे। कहा है-
पाळस्त्यः कथमन्थदारहरणे दोष न विज्ञातवान्
रामेणापि कथं न हेमहरिणर्यासम्भवो छक्षितः।
अक्षेश्वापि युथिष्ठिरण सहस मातो हानर्थः कथं
मत्यासन्नविपत्तिमूढमनसां मायो मतिः क्षीयते ॥ ४॥ =
रावणने दूसरेकी ख्ीके इरनेका दोष क्यों न' जाना, रामचन्द्रने सुवर्णके
"हारणकी असंमबता क्यों न जानी, युधिष्टिरने अक्षोंके खेळनेसे एक साथ
अनर्थ क्यों न जाना, प्रायः विपत्ति आनेसे सूढमन होजाने वाछोकी बुद्धि
क्षीण होजाती है ॥ ४ ॥
भाषाटीकासमेतम । (२०५)
तथाच-
ओर देखो-
कृतान्तपाशबद्भानां देबोपहतचेतसाम् ।
बुद्धयः कुब्जगामिन्यो भवन्ति महतामपि ॥ ५ ॥
कृतान्त पाशमे बध हुए, दवस हताचिच, महतपुरपांका वुद्धमा काटलगा-
मिची हांजाती है ॥ ५ ॥
अत्रान्तरे छुब्धकस्ताव बद्धान् विज्ञाय प्रहष्टमनाः प्रोद्यत-
यष्टिः तद्वधार्थ प्रधावितः । चित्रम्रीवोऽपि आत्मानं सपारिः
“बारे बद्धं मत्वा छुब्धकमायान्तं दृष्टा तान् कपोतानूचे-
“अहो! न भतव्यम्। उक्तव-
इस अवसरम वह छुव्वक उनको वबा हुआ जानकर प्रसन्न मन लकडी.
उठाये हुए उनके वघके निमित्त धावमान हुआ, चिन्नग्रीबमी अपनेको बेधा
इभा और छत्घकको आया हुआ देखकर उन कवृतरोसे बोछा,- भो ! डरना
न चाहिय। कहा हे
व्यसनेष्वेव सवेषु यस्य बुद्धिन हीयते ।
स तेषां पारमभ्योति तमभावादसंशयस ॥ ६ ॥
सब प्रकारके व्यसन प्रात होनेमें जिसकी वुद्धि हीन नहीं होती हे उसके
प्रमावते वह निःसन्देह उसके पार होजाता हैं | ६ ॥
सम्पत्ती च विपत्तों च महतामेकरूपता ।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा ॥ ७ ॥
La त
सम्पत्ति भोर विपात्तिम महात्मा एकरूप रहते हैं सूयं उदय और अरतमेंमी
छार रहता ६॥ ७॥
तत्सव वय हल्या उड्डाय सपाशजाला अस्य अदशनं
गत्वा सुक्ति प्राप्तुमः, नो चेद्धघविक्ृवाः सन्तो हेलया सम
त्पात न कारप्यय, तता मृत्युमवाप्सथ । उतक्तश्च-
सो हम सब ढीडासेही उडकर पाराजाळ सहित इसके अदर्शनको प्राप्त
होकर छूटे । और नहीं तो भयसे व्याकुळ हो लीळासेही न उडोगे तो मृत्युको
प्रप्त होंगे। कहाहै-
(२०६) पञ्चतन्त्रस् ।
न्तवोञ्प्यायता नित्यं तन्तवो बहुलाः समाः ।
बहून्बहुत्वादायासात्सहन्तीत्युपमा सताम॥ ८॥
तन्तुभी नित्य विस्तीर्ण हैं और बहुतसे तुल्यरूप॑ तन्तु बहुतसे पारशरमोको”
सहन कर हेते हैं, यही महात्माओंकी उपमा हे ॥ ८ ॥”
तथाचुष्ठेते छुञ्घको जालमादाय आकाशे गच्छतां तेषां
पृष्ठतो भूमिस्थोऽपि पय्येघावत । तत ऊक्कांननः श्लोक-
सेनमषठत्-
वेसा करने पर वह लुव्वक जाळको ळेकर आकाराम जाते हुए उनके पीछे
पृथ्वीम स्थित हुआमी धावमान हुआ। और उपरको सुखकर यह छोक पढने छगा- -
जालमादाय गच्छन्ति संहताः पक्षिणोऽप्यमी ।
यावच्च चिवादिष्धन्ते पतिष्यन्ति न संशयः ॥ ९॥
' मिळे हुए यह पक्षी मेरे जालको लेकर उडते हैं और जब पतित होंगे तब
सब मेरे वशमे हो जांयगे॥ ६ ॥
लघपतनकोऽपि प्राणयान्राक्रेयां त्यक्ता किमत्र भविष्य-'
लीति कुतूहलात् ततऽष्ठलग्नोऽनुसराति । अथ दृष्टेरगोचरतां
गतान् विज्ञाय छुब्धको निराशः छोकमपठन् निवृत्तश्च ।
` छघुपतनकमी आजीविकाको छोडकर इसमें क्या होगा इस कुतूहळसे उसके
पीछे लगा चला | तब उनके दृष्टिपयसे अतीत होनेपर उन्हें गया जानकर
लुब्धक यह छोक पढ़ता हुआ | निवृत्त हुआ--
न हि भवति यन्न भाव्यं भवति च भाव्यं प्रयत्नेन ।
करतलगतमपि नश्यति यस्य हि भवितव्यता नास्ति १०॥
“जो नहीं होनहार है यह नहीं होती जो होनद्वार हे वह यत्नसे होत्तीही*
है जिसकी भाषी ( होनहार ) नहीं हे हाथमे स्थित हुआ भी षह पदार्थे नष्ट
हो जाता हे॥ १० ॥
तथाच-
- सही
` 'पराडूसखे विधो चेत्स्यात्कथश्चिष्रविणोद्घः ।
तत्सोऽन्थद्पि संगृह्य याति शंखानिधिर्यथा ॥ ११॥
भाषाटीकासमेतम्। (२०७)
विधिके पराड्मुख होनेमें किस प्रकार धनका उदय हो सकता है वह
औरकोमी ग्रहण कर शखानीधि ( न ठिपाई ) की समान नष्ट हो जातीहै॥१ शा
तदास्तां तावत् विहङ्ानिषलोभो यावत् कुटुम्बवत्तनो-
पायभूतं जालमषि मे नष्टम्? । चित्नम्रीवोऽपि छुब्धकमद्श-
नीभूतं ज्ञात्वा ताउवाच-*'भो ! निवृत्तः स दुरात्मा हुब्घकः ।
तत्सवैरपि स्वस्यैगम्यतां महिलारोप्यस्य प्राशुत्तरदिग्भागे
तत्र मम सुहत् हिरण्यको नाम मूषकः सर्वेषां पाशच्छेदं
करिप्याति। उक्तश्च-
पिक्षयोंके मासका लोभ तो अल्या रहा कुटुम्वकी आजीत्िकाका उपायभूत
मेरा जाङमी नष्ट हुआ?” | चित्रप्रीवमी छुन्पृकको नेत्रोसे भढाक्षेत देखकर
उनसे बोढा,-- सो ! बह दुरा छुब्धक बिइत्त हुआ । सो सब स्त्रस्थ होकर
मदिकारोप्यके उत्तर दिशाकी ओर चलो बहा, मेरा सुहृत् हिरप्यक नाम मूष-
कराज सबके पाश छेदन करेगा । कहाहे--
सर्वेषामेव मरत्यांनां व्यसने समुपस्थिते ।
वाङ्मात्रेणापि साहाय्यं सिधादन्यों न सन्दधे ॥ १२ ॥”
सम्पूण मनुष्योको व्यसन उपस्थित होनेमे धाणीमात्रकीमी सहायताको
मित्रके विवा कोन कर सकता है॥ १२ ॥०
एवं ते कपोताः चित्रम्रीवेण सम्बोधिताः महिलारोप्ये
“नगरे हिरण्यकाविऊ॒दुर्ग प्रापुः । हिरण्यकोऽपि सहस्रमृख-
बिलदुगे प्रविष्टः सन् अकुताअयः सुखेन आस्ते, अथवा
साधु इदमुच्यते ।
इस प्रकार चित्रप्रीवसे कहें हुए वे कबूतर 'महिलारोप्प नगरमे दिरण्यकके
विल्दुर्गको प्राप्त हुए। हिरण्पक भी सहसः मुखके विळदुर्गमें प्रविष्ट हुआ निर्भय
सुखसे रहताथा | अथवा अच्छा कहाहे कि-
अनागतं भयं दृष्टा नीतिशास्त्राविशारदः ।
अवसन्मृषकंस्तत्र कृत्वा शतमुखं बिलम् ॥ १३ ॥
बे आये हुए भयका देखनेवाला बीतिशाल्नमें पडित पषिक सौ सुखका विळ '
चनाकर भानदसे रहताया॥ ३॥ '
(२०८) पञ्चतन्त्रम्।
दष्टराविराहितः सपो मदहीनो यथा गजः ।
सर्वेषां जायते वश्यो इर्गहीनस्तथा नुपः॥ १४ ॥
डाढसे रहित जेसे सर्प, मदसे हान जेसे हाथी, इसी प्रकार दुर्गहीन राजो
सबके वर्शाभूत हो जाताहे ॥ १४ ॥
तथाच-
तेसेही-
न गजानां सहस्रेण न च लक्षेण वाजिनाम् ।
तत्कर्म सिध्यते राज्ञां इर्गेणेकेन यद्रणे ॥ १५ ॥
न सहख हाथेयॉसे न छाख धोडांसे बह काये सिद्ध होता हे जो युद्धमं
ef
एक किलेसे सिद्ध होताहे ॥ १९ ॥
शतमेकोऽपि सन्धत्ते प्राकारस्थो धनुर्धरः ।
तस्माद्दुग प्रशसन्ति नीलिशासतरबिदो जनाः ॥ १६ ॥?
किलेमे स्थित घनुषधारी एकही सोसे युद्धकर सकता हे इस कारण नीति-
झाल्लके ज्ञाता दुगेका प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥ '?
अथ च्वित्रग्रीवो भिळमासाद् तारस्वरेण प्रोवाच-*'भो भो
मित्र हिरण्यक ! सत्वरमागच्छ । महती मे व्यसनावस्था
बर्तते” । तच्छूत्वा हिरण्यकोऽपि बिलदुर्गान्तर्गतः सन् प्रोवा-
नच, भोः ! को भवान् ? किमर्थमायातः ९ कि कारणम् !
कीदृक् ते व्यसनावस्थानम्? तत् कथ्यताम्? इति । तच्छुत्वा
चित्रग्रीव आह.-' भोः! चित्रग्रीवो नाम कपोतराओोऽहं ते
सुहृत् । तत् सत्बरमागच्छ झुरूतरं प्रयोजनमास्त? । तत
आकण्यं पुलकिततलुः हृष्टात्मा स्थिरमनाः त्वरमाणो नि-
ष्क्रान्तः। अथवा साड इदमुच्यते-
तब चित्रप्नीव विळके निकट जाय ऊंचे स्वरसे बोळा,-““मों मो मित्र
हिरण्यक ! श्ीघ्रभाभों मुझे बडी कष्टक अवस्था वर्तमान है” । यह सुनकर
हिस्ण्यकभी बिळ्दुर्गने प्राप्त इभा ही बोला,-“मो आप कोन हो ? क्यों
माये हो | वया कारण हे ! कैसी तुमको विपत्ति है सो कहो” | यह सुनकर
भाषाटीकासमेतम्। (२०९)
चित्रत्रीव बोळा,-“भो ! चित्रश्रीव नामवाळा कपोतोका राजा मैं तेरा
सुद्दद ह । सो झीघ्र आओ । मेरा बहुत्त वडा कार्य है? । यह सुनकर पुलका-
वयमान शरीर प्रसनात्मा स्थिर मन शीघ्रता करता हुआ निकळा । अथवा यह
अच्छा कहा है-
सुहृद! खेहसम्पन्ना लोचनानन्ददायिनः ।
गुहे गहवतां नित्यं नागच्छन्ति महात्मनाम् ॥ १७॥
सुइत् ( मित्र ) खेहसे सम्पन्न नेत्रोके आनन्द देनेवाछ महात्मा गृहस्थियोके
घरोमे नित्य नहीं आते हैं ॥ १७ ॥
आदित्यस्योदयं तात ताम्बूलं भारती कथा !
इष्टा भाय्थों सामित्रं च अपूर्वाणि दिने दिने ॥ १८ ॥
हे तात ! सूर्यका उदय, ताम्बूळ, महासारतकी कथा, इष्ट खी, सुन्दर मित्र
यह दिन दिन अपूर्वही होत हैं ॥ १८॥ "
सुहृदो मवने यस्य समागच्छान्ति नित्यशः ।
चित्ते च तस्य सौख्यस्य न किञ्चित्मतिमं सुखम् ॥ १९ ॥
जिसके घरमें निग्यडटी सुहृद आते हे उसके चित्तमे उसके बराबर और कुछ
सुख नहीं है ॥ १९ ॥
अथ चित्र्रीबं सपरिवारं पाशवद्भमालोक्य हिरण्यकः
.सविषादमिदमाह-*' भोः वित्मेतत् ९१? स आह- भो!
जानन्नपि कि एच्छसि ? उक्तच यतः-
तब चित्रध्रीबको परिवारसहित पाशमे वन्बा हुआ देखकर हिरण्यक विषाद-
पूर्वक यह बचन बोछा,- भो | यह क्या हे 27 वह बोला,- भो ! जानकर
मी कया पूछता हे! कहा है कि-
यस्माञ्च येत च यदा च यथा च यञ्च
याव यच च झुभाशुभभात्मकम ।
तस्माश्चतेन च तदा च तथा च तञ्च
ताव तच च कुतान्तवशाद्पेति ॥ २० ॥
१४
(२१०) - पश्चतन्नम्:)
जिससे जिस करके जब जैसा जो जितना जहां घुम अशुभ भपना कर्म
किया है तिससे तिसकरके तब तेसा सो तितना तबतक तहाही काठको . प्रेर-
णास प्राप्त हाता है [| २० ॥
तत् प्राप्त मया एतद्वन्धन जिह्वालौल्यात् । साम्मतं त्वं
सत्वरं पाशविमोक्षं कुरू" | तदाकर्ण्य हिरण्यक आह-
सो यह मुझे बन्धन जिह्वाकी चंचळतासे प्राप्त हुआ हे, इस कारण तू शीध्रं
पाश मोक्षण कर” । यह सुनकर हिरण्यक बोळा
“अध्यद्धाद्योजनशतादामिषं वीक्षते खगः ।
सोऽपि पाश्वस्थितं देवादन्थनं न च पश्चाते ॥ २१॥ .
आधे ( अधिक) १५० सो योजनसे जो पक्षी मांसकों देखता है बहमी
प्रारूधसे निकट स्थित हुए बन्वको नहीं देखता है ॥ २१ |
तथाच-
तैसेही-
रविनिशाकरयोग्रेहपीडनं
गजसुजङ्गविहगमवन्धनस्।
मतिमतां च निरीक्ष्य दरिद्रतां
विधिरहो बलवानिति मे मातिः ॥ २२ ॥
सूर्य चन्द्रमी प्रहसे पीडित होते हें, हाथी सर्प पक्षि वन्धनमें पडते हें, तथा
बुद्धिमानोंफों दारिद्र देखकर देवही बलवान है यह मेरी बुद्धि है॥ २२ ॥
तथाच-
मारभा-
व्योमेकान्तविचारिजीञपि विहगाः सम्प्राप्तुवन्त्यापदं
बध्यन्ते निपुगेरगाधसलिलान्मीनाः समुद्रादपि ।
डुणींतं किमिहास्ति कि च सुक्कत कः स्थानलाभे गुणः
कालः सर्वेजनान्मसारितकरो गृह्णाति दूरादपि ॥ २३॥
एकान्त, आकाशमै विचरनेवाछे पक्षीमी आपत्तिको' प्राप्त होते हैं,
चतुर पुरुषोद्वारा अगाध जछवाले समुद्रसे मछळीमी बांध ळी जाती हैं । इस
संसारे दुनेय क्या है ! सुकृत क्या है १ स्थान लामों भी क्या गुण दे काळ
हाथ फैठाये हुए दूरसे सबको प्रहण करता है ॥ २३ ||
॥
भाषाटीकासमेतम् । (२११)
एवमुक्ता चित्रम्रीवस्य पाशं छेएसुद्यतं स तमाह- भद्र
मा मेवे कुछ, प्रथमं मम भृत्यानां पाशच्छेदं कुरु तदलु
ममापि च” । तच्छुत्वा कुपितो हिरण्यकः प्राह- भो! न
युक्तमक्त भवता यतः स्वामिनोऽनन्तरं भृत्याः? । स आइ,
“भद्र | मा मेवं वद, मदाश्रयाः सर्वे एते वराकाः, अपर स्व-
कुटुम्ब परित्यज्घ समागताः । तत् कथमेतावन्मात्रमपि
सम्मानं न करोति । उक्तश्व-
ऐसा कह चित्रग्रीवके पाश छेदन करनेको उद्यत हुए उससे बोछा-“'मदर !
ऐसा मतकरो, पहले मेरे भुत्योंके पाश छेदन करो पीछे मेरे मी” यह खुन क्रोध
कर हिरण्यक बोछा-“'भो ! आपने युक्त नहीं कहा कारण कि, स्वामीके अन-
न्तर मत्य होते हँ” । वह बोळा-“भद्र ! ऐसा मत कहो यह सव क्षुद्र मेरे
चशे हैं ओर यह अपना कुटुम्व त्याग कर मेरे साथ आये हैं । सो कैसे इत-
नाभी इनका सन्मान च करू। कहा हे-
यः सम्मानं सदा धत्ते भृत्यानां क्षितिपोऽधिकम् ।
बित्ताभावेऽपि तं दृष्टा ते त्यजन्ति न कर्हिचित् ॥ २४ ॥
जो राजा मत्योका सदा अधिक सन्मान करता है वे घनके अमावमें सीं
उसको कभी त्यागन नहीं करते हैं ॥ २४ ॥
सथाच-
और देखो-
, विश्वासः सम्पदां मूलं तेन यूथपतिगेजः ।
सिंहो मृगाधिपत्धेऽपि न मगेः परिवारय्यंत्त ॥ २५ ॥
विश्वासही सम्पत्तियोकी जड है इससेहा हाथी यूथपति कहळाता हे
"सिँह मृगाधिपति होकरमी मृगोसे परिवारित नहीं होता है ॥ २५ |
अपरं मम कदाचित' पाशच्छेदं कुर्वतस्ते दन्तभंगो भवति
अथवा दुरात्मा लुब्धकः समभ्षेति । तत् चूनं मम नरकपात
एव । उक्तश्च
और फिर कदाचित् मेरे पाश छेदन करनेम तेरे दात भग होजाय अथबा
यह दुशत्ता उन्बकही भाजाय तो अवशय मेरा नरके पतन होगा | कहा है--«
(२१२) पञ्चतन्त्रस्।
सदाचारेषु भृत्येषु संसीदत्सु च यः प्रभुः।
सुखी स्थान्नरकं याति परत्रेह च सीदति ॥ २६ ॥.
जो प्रभु सदाचारताळे भृत्योंके दुःखी होनेमं झुली होता है वह परलोके;
नरकको जाता और यहांभी दुःखी होता हे ॥ २६॥
तच्छूत्वा प्रहृष्टो हिरण्यकः प्राइ-“ भोः ! वेक्षि अहं
राजधम्मंम्। परं मया तव परीक्षा कृता | तत् सर्वेषां
पूव पाराच्छेदं करिष्यामि । भवानपि अनेन विधिना
बहुकपोतपरिवारो भाविष्यति । उक्तश्व-
यह सुनकर प्रसन्न हो हिरण्यक बोछा- भो | में राजघम जानता हूं परंतु
मैंने तेरी परीक्षा की थी । सो पहले अन्य सबोके पाश छेदन करूंगा, आपमी-
इत बिविसे बहुत कपोतके पारेवारवाळे होंगे | कहा हे-
कारुण्य संविभागश्च यस्य भरत्येपु सवेदा ।
सम्भ्वित्स महीपालस्रेलोक्यस्यापि रक्षणे ॥ २७॥
जिसकी मत्योमें सदा करुणा समविभाग है वह राजा न्रिछोकीके रक्षण
करनेमें मी समथ होता हे || २७ |
एवमुक्ता सवेषां पाशच्छेदं कृत्वा हिरण्यकःचिचग्री-
वमाह- “मित्र | गम्यतामधुना स्वाश्रयं शति भूयोऽवि
व्यसने प्राते समागन्तव्यम” । इति ताव् संप्रेष्य पुन
रपि दुर्ग विष्टः । चित्रप्रीवोऽपि सपरिवारः स्वाश्रयम
गमत् । अथवा साध इदसुच्यते-
यह कह संबकहा पारा छदन करक ।ईरण्यक्न पचन्रग्रीबस बॉळा= मत्र |
अब अपने स्थानको पघारा फिरमी दुःखप्रातिभ आचा,” इस प्रकार उनका
संजकर अपन दढुगम प्रवश करगया, चन्रग्रावर्भा परिवारसहित अपने झात्नयका
गया । अथवा यह सत्य कहा इ~
मित्रवान्साधयत्यथान्दुःलाध्यानपि वे यतः!
तस्मान्मित्राणि कुवीत समानान्येव चात्संनः # २८॥
मित्रवान् [जसस क, कोठन कायाका साध लत इ इसकारण अपन समान
पमत्रोंकों करना चाहिये || २८॥ | |
आषाटीकासमेतम् । (२१३)
लघुपतनकोऽपि वायसः सर्व तं चित्रग्रोवबन्धमोक्ष-
मवलोक्य विस्मितमना व्यचिन्तयत् । “अहो ! बुद्धि"
रस्य हिरण्यकस्य शक्तिश्च दुर्मसामग्री च तत् इंदगेव
विधिः विहगानां बन्धनमोक्षात्मकः । अहं च न
कस्यच्चित् विश्वसिमि चलप्रकृतिश्व । तथापि एनं
मित्र करोमि । उक्तश्व-
लघुपतनक कोआ समूर्ण उक चित्रप्रीबके बन्ध मोक्षणको देख
बित्मितमनसे विचार करने लगा, “अहो! इस हिरप्यककी घुद्धि शक्ति और
दुगेसामग्री देखो इस प्रकार बधन मोक्षात्मक् विहामोंकी विधि देखो में क्षितीका
विश्वास नहीं करता चचडम्रक्कति हृ । तो भी इसको पित्र करूगा। कहा हे-
अपिक्लम्पूर्णतायुक्तेः कत्तेव्याः सुहृदो बुधैः ।
नदीशः परिपूर्णोऽपि चन्द्रोदयमपेक्षते ॥ २९ ॥
सम्पूर्णता युक्त होकरमी पडितोंको खुहद बनाने चाहिये पारपूर्ण सागरभी
नन्क्रोद्यकी अपेक्षा करता है ॥ २९ |
एवं सम्प्रधार्यं पादपादवतीय्यै बिलद्वारमाश्रित्य चित्र-
औीवबच्छव्देन हिरण्यर्क समाहूतवान् । “पाहि एहि भो
हिरण्यक | एदि'' । तच्छब्दं थुत्वा हिरण्यको व्पचिन्तयत् ।
'क्मन्योऽपि कश्चित् कपोतो बन्धनशोषस्तिष्ठति येन माँ
च्याहराते'! । आह च,- भो; को भवान !” स आह,- अहँ
लघुपतनको नाम वायसः” । तत् श्रुत्वा विशेषादन्तलीनो
हिरण्यक आइ,” भोः ! इतं गम्यतां अस्मात् स्थानात्’?
रायस आह- तब पार्श्वे युरुका्य्येण समागतः, तत् कि
न क्रियते भया सह दशनम्?” हिरण्यक आह,- न मेऽस्ति
, त्वया सह सङ्गमेन प्रयोजनम्” होति स आह, “भोः ! चित्र
वस्य मया तव सकाशात् पाशमोक्षणं इष्टं तेन मम महती
प्रीति! सञ्जाता । तत् कदाचित् ममापि बन्धने जाते तव
पाश्वोत् झुक्तिर्भेविष्यति । तत् क्रियतां मया सह मेत्री” ।
हिरण्यक आह.-''अहो ! त्वे भोक्ता अहं ते भोज्यभूतः! तत्
(२१४) पञ्चतन्त्रम् ।
Ne ४02
का त्वया सह मम मेती तत गम्यतां, मेती विरोधभावात्
कथम् : उक्तश्व- ,
एसा विचार बृक्षसे उतर कर विळके द्वारे आय चित्रप्रीवकी समान शब्द ¬
करके हिरण्पकको चुलाता हुआ “आओ २ भो हिरण्यक | आओ! | उस
शब्दको सुनकर हिरण्यक विचार करने छा “क्या भर कोई कबूतर बंधा
रहगघा, जिससे मुझे बुळाता है" | और बोछा-“भों ! आप कोन हो ??।
बह वोळा-“में ङघुपतनक नाम काकडे । यह सुन अन्तर लीन होकर हिर-
ण्यक बोळा-“'भो ! इस स्थानसे बहुत शीघ्र गमन करो” काक बोला,-"'बड़े
कार्यकेलिये तुम्हारे पास आया हू, फिर मुझे दशन क्यों नहीं देते हो” |
हिरण्यक वोळा-“तुम्हारे साथ मिळनेसे मेरा कुछभी प्रयोजन नहीं है”
काक बोळा,-''चित्रप्रीवका भेंने तुमसे पाशमोक्षण देखा हे उस कारण
मुझको वडी प्रीति हुई हे, सो कदाचित मेरा बंधन होनेसे हुम्हार विकटे
छुटकारा होगा, सो मेरे साथ मित्रता करो!” । हिरण्यक बोढा- सो ! आश्चर्य
है कि, तू मेरा भोजन करनेवाला और में तेरा भोज्य पदार्थ हूँ । सो केसी
तुम्हारे साथ मेरी मित्रता १ सो जाओ विरोधभावसे मित्रता केप्ती १ कहा हेट
ययोरेव समं वित्तं ययोरेब समं कुलम् ।
तयोमेंत्री विवाहश्च न तु पुष्टविएष्टयोः ॥ ३०॥
जिनका समान धन, जिनका समान कुछहों उन्दीकी मित्रता और बिवाह
होना उचित है विरुद्धका नह | ३० ||
तथाच-
और देखो-
यो मित्रं कुरुले मूढ आत्मनोऽसहशं कुधीः ।
हीनं वाप्यधिकं वापि हास्यतां यात्यसौ जनः ॥ रे१ ॥
जो मूढ छुबुद्धि अपने असद्दश मित्रोंको करता है हीन वा अधिक करता;
है वह हास्यताको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥
` तत् गम्यताम”इति। बायस आह,- भो हिरण्यक !
एषोऽहं तव दुर्गद्वारे उपविष्टः । यदि त्वं मैत्री न करोषि
ततोऽहं. माणमोक्षणं तवाग्रे करिष्यामि । अथवा प्रायोपवे-
भाषाटीकासमेतम् । (२१५)
शनं मे स्थात” इति । हिरण्यक आइ- “भो; ! त्वया वैरिणा
सह कथं मेती करोमि १ उक्तश्च
सो जाओ''कौआ बोला-“भो हिरण्यम । यह में तुम्हारे बिळद्वारमें पडाहू |
जो तुम मेरे साथ मित्रता न करोगे तो तुम्हारे आगे इसीक्षण प्राण त्यागन
करूंगा | अथवा मेरा बैठता प्राण त्यागनेके लिये होगा,” हिरण्यक बोळा,
भो | तुझ वेरीके साथ मेरी केसी मित्रता ? कहा हेट
वरिणा न हि सन्दध्यात्छुल्लिष्टेनापि सन्धिना ।
सुतप्तमपि पानीयं शमयत्येव पावकम् ॥ ३२ ॥ 7
मनोहर ओर सन्धिकी इच्छा करनेवाले वैरीसे सन्धि न करे अच्छा तत्त
पानीमी अग्निको शान्त करही देता हे ॥ ३२ ॥” _
वायस आह,-“'मोः! त्वया सह दर्शनलपि नास्ति .
कुतो बेर तत किमतुचितं बदासि,”' हिरण्यक आह-
“द्विविधं वैरं भवति सहजं कृत्रिम । तत् सहजबे-
री त्वमस्माकम् । उक्तश्व-
काक बोळा,-'“'तुम्हार साथ दर्शनमी नहीं हे वेर केसे सो कैसे अनुचित
कहतेहो”? | हिरण्यक बोला,-“दो प्रकारका वैर होता हे ( एक सहज ) स्वाभा-
विक एक ( कृत्रिम ) कर्मसे किया, सो तुम हमारे स्वाभाविक वेरीहो ।
कहा है-
कृत्रिमं नाशभभ्याते वेरं द्वाक्कृनिमेंश णेः ।
प्राणदानं विना बेरं सहजं याति न क्षयम् ॥ ३३ ॥?
कृत्रिम पैर झटही क्षत्रिम गुणोसे जाता रहता हे स्वाभाविक वैर प्राणदानके
विना नही जाता हे ॥ ३३ ॥? हैं
वायस आह,-“भो! द्विविधस्य वेरस्य लक्षण श्रोतु-
मिच्छामि । तत् कथ्यताम्? । हिरण्यक आह,-भोः!
कारणें न मिवृत्त कत्रिमम् । तत्तदहोपकारकरणादरच्छ-
ति। स्वाभाविकं पुनः कथमपि न गच्छति .। . तद्यथा
नकुलसपोर्णा, शप्पशुङ्नखाधुधानां, जलब शोः “-
देत्यानां, सारमेयमार्जाराणाम्, ईश्वरदरिद्राणां, सप- `
(२१६) पञ्चतन्त्रम् ३
त्नीनाँ, लुब्धकहरिणानां, श्रोतियन्रष्टकरियाणां, मूर्ख"
पण्डितानां, पतिब्रताकुलदानां, सञ्चनदुर्जनानाम्।
न कश्चित् केनापि व्यापादितः, तथापि प्राणान् सन्ता-
पयान्ति ।
काक बोळा-“'भो ! दो प्रकारके वेरके लक्षण सुननेकी इच्छा करता हूं सो
कहो!) हिरण्यक बोला,- भो ! जो कारणसे निष्पन्न होजाय वह कृत्रिम हे
उसके योग्य साधनोंसे वह निवृत्त हो जाता है । और स्वाभाविक फिर किसी
ग्रकारसे नहीं जाता है । सो जैसा न्योळे सर्पका, तृणमोजी नखायुर्धोका, जल
अमिका, देव देत्योंका, कुत्ते बिछलीका, महान् ओर दारिद्रीका, सोतोंका, _
लुब्धक हारेणोंका, वेदपाठी और शष्ट क्रियावालोका, मूर्ख पंडितोंका, पतित्रता
कुछठाओंका, सजन दुजेनोंका । सो किसीकों किसीने मार नहीं डाछा तोभी
प्राणोंको तो सन्ताप देते हैं ।
वायस आह,-
कौभा बोळा
“कारणान्मित्रतां याति कारणादेति शचुताम् ।
तस्मान्मत्रत्वमेवात्र योज्य वर न धोमता ॥ ३४॥
कारणसेही मित्र और कारणसेही शत्रु होजाता हे इस कारण घुद्धिमातको
भित्रताही करनी चाहिये वेर नहीं ॥ ३४ ॥
तस्मात् कुरू मया सह समागमं मित्रधमार्थम् ।'?
हिरण्यक आह,-'' भोः ! श्रूयतां नीतिसवेस्वम्-
इस कारण मेरे साथ मित्रधम अथात् मित्रता करो” हिरण्यक बोढछा,- मो!
नीतिका सवसव सुनो-
सकृदद्ष्ठमपीष्ठं यः पुनः सन्धातुमिच्छति ।
स मृत्युमुपणह्वाति गभमश्वतरी यथा ॥ ३९॥
जो एकवारही दुष्ट हुए मित्रके साथ फिर सन्धिकी इच्छा करता हैं षह
मृत्युका ही ग्रहण करता हे जसे गमकां खञ्चरं ॥ ३५ ॥
अथवा गुणवानहं न में कश्चित् वेरयालनां
करिष्यति एतदपि न सम्भाव्यम् । उक्तश्च
भाषाटीका समें तम् । (२१७)
सथवा में युणवानहूं मुझको वैर यातना कुछ नही करेगा यह सम्भावना न
करनी । कहाहै-
सिहो व्याकरणस्य कर्त्र हरत्माणान्मिधान्पाणिनेः
मीमांसाकृतसुः्ममाथ सहसा हस्ती मुनि जेमिनिम् ।
छन्दोज्ञानानियि जघान मकरो वेळातरे पिगलम्
अज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणेः ॥३६॥”
सिहने व्याकरणके निर्माता पाणिनीके प्रिय प्राणोंको नष्ट किया और मीर्मा-
साके ववानेवाळे जैमिनि मुनिको सहता हाथीने मार डाळा ओर छन्दःशाल्लके
ज्ञाता पिंगळक ऋषिको सागरके कितोर नाकेने निगल छिया, अज्ञानसे आए-
तबित्त अति क्रोधी कीटादिको गुणोस कया प्रयोजन हे ॥ ३६ ॥?
वायस आह,-* अह्त्येतत तथापि श्रूयताम् ।
काक बोछा,-पह तो योही है तथापि सुनो-
उपकाराच्च लोकानां निमित्तान्एृगपक्षिणास् ।
भयाछोभाच मूखोणां मैत्री स्यादर्शनात्सताम् ॥ ३७॥
उपकारसे ठोकोंकी निमित्तसे मृगपक्षियोकी, भय ओर छोमसे मूर्खोकी और
दर्शन करतेही सत्पुरुषोकी मित्रता होतीहे ॥ ३७ ||
मृद्वट इव सुखमेद्यो दुःसन्धानश्च दुजनो भवाति ।
सुजनस्ठु कनकघट इव इनदः सुकरसन्धिश्च ॥ ३८ ॥
मट्टीके घटकी समान सुखसे तोडने बोग्य ओर फिर जुडनेके अयोग्य दुर्जन
होता हे सुजन सोनेशे घडेकी समान दुरभय भोर शत्र जुड जानेवाला हो-
ता ह॥ ३२८ ॥
इक्षोरयत्क्रमशः पर्वणे यथा रसविशेषः ।
तद्वत्सञ्जनमैत्री विपरीतानान्ठु बिपरीता ॥ ३९॥
इंखके अप्रभागमें क्रमते जैसे रसविशेष होता जाता हे इसी प्रकार सुजनों-
की मित्रता होती है दुर्जनोंकी इसके विपरीत होती है ॥ ३९ ॥
त्तथाच-
Ne
तस्तह—
आरम्भगुर्वी क्षयिणी क्रमेण
लघ्वी पुरा वृद्धिमती च पश्चात्!
(२१८) पश्चलन्त्रम् ।
दिनस्य पवोद्धेपराद्धभिन्ना
छायेव मेन्नी खलसजानानाम् ॥ ४० ॥
प्रारम्भर्मे बहुतं फिर क्रमस न्यून, पहळे थोडी क्रमसे बढती हुई दिनके पूर्वाह्न” '
ओर पराधसे भिन्न हुई छायाकी समान दुष्ट और भछोंको मित्रता होती है॥४ ०]
तत् साघुरहमपर त्वां शपथादिभिनिर्भयं कारिष्पामि!! ।
स आह,-“न मे अस्ति ते शपथे; प्रत्यय! । उक्तश्च-
सो में साधु हूं और तुझको शपथादिसे निर्भय करूंगा”' वह बोढा,-
“मुझे शपथका विश्वास नहीं हे) कहाहै-
शपथे? सन्धितस्यापि न विश्वासं ब्रजेद्विपोः।
श्रूयते शपथं कृत्वा बृत्रः शक्रेण सूदितः ॥ ४१ ॥
शपथसे सन्धिको प्राप्त इए इाजुके विश्वासर्मे ब जाय सुना जाता है कि,
शपथ करकेभी इन्द्रने वृत्राषुरको मार डाळा ॥ ४१॥
न विश्वास विना शब्चुदेवानामपि सिद्धयति ।
विश्वासात्रिदशन्द्रेण दितेगरमो विदारितः ॥ ४२॥
विश्वासके बिना शत्रु देवताओंकोमी सिद्ध नहीं होता हे, विश्वाससेही
ुन््रने दितिका गर्भै नष्ट करादिया ॥ ४२ ॥
अन्यश्च
औरभी-
बृहस्पतेरपि प्राज्ञस्तस्मान्रेवात्र विश्वसेत ।
य इच्छेदात्मनो वृद्धिमायुष्यं च सुखानि च ॥ ९३॥
जो बुद्धिमान् अपनी बुद्धि, आयु और सुखकी इच्छा करे वह वरहस्पतिके
विश्वासमेभी न जाय ॥ ४३ ॥
तथाच-
और देखो-
सुसूक्ष्मेणापि रन्ध्रेण प्रविश्याभ्यन्तरं रिपुः ।
नाशयेञ्च शनेः पश्चात्मुवं सालिलपूरवत् ॥ ४४॥
शत्रु बहुत सूक्ष्ममागेसे भीतर प्रवेश कर "शनेः २ नाश. करे जिस प्रकार
ज्जळका पूर शनेः २ भरकर वावको पूणे करता हे ॥ ४४ ॥
भाषाटीकासमेंतम । (२१९)
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत ।
विश्वासाद्वयस्चत्पन्नं मूलान्यपि निकुन्ताते ॥ ४५ ॥
भविश्वासीका विश्वास न करे, विश्वाप्तीकाभी बहुत विश्वास न करे, कारण
कि, विश्वाससे उत्पन्न हुआ भय मृख्तहित नष्ट कर देता हे॥ ४९ ॥
न बध्यते ह्यविश्वस्तो इवेलोऽपि बलोत्कटैः ।
विश्वस्ताश्चाश्ञ वध्यन्ते बलवन्तोऽपि ढुबेलेः ॥ ४६ ॥
अविश्वासी दुबैळकोमी बलवान् बळी नहीं बाघ सक्ता, विश्वासी वलबानूमी
ुर्बेळोसे वावळिये जाते हैं॥ ४६ ॥
सुक्कत्यं विष्णुगुप्तस्य मिञ्रातिभार्गवस्य च । ह
बहस्पतेरविश्वासों नीतिसन्धिख्िधा स्थितः ॥ ४७॥ `
तीन प्रकारकी नीति सधी होती है चाणक्यका सम्पक् कार्योनुष्ठान करना,
पर्चुरामका मित्रलाभ और बृहस्पतिका मत हे विश्वास न करना यह तीन
प्रकारकी नातिसघी है | ४७ ॥
तथाच-
तेसेही-
महताप्थर्थंसोरेण यो विश्वसिति श्रूपु ।
भाय्यासु सुविरक्तासु तदन्तं तस्य जीबितम् ॥ ४८ ॥”
बडे अर्थसार परमी इत्रुका जो विश्वास करता है और विरक्त भायोका
जो विश्वास करता हे उनके अन्ततक ही उसका जीवन हे | ४८ |”.
तच्छुत्वा लघुंपतनकोईपि निरुत्तरः चिन्तयामास ।
*“अहो ! बुद्धि्रागलम्धमस्य नीतिविषये । अथवा स॒ एव
अस्योपारि मेच्रीपक्षपातः। स आइ-''भो हिरण्यक !
_ यह सुन ढघुपतनकभी निरुत्तरहों बिचारने छगा, “अहो चीतिविषयमें
कितनी तीक्ष्ण इसकी वुद्धि है, अथत्रा वह इसपर मित्रताका पक्षपात हे” और
बोळा--“भो हिरण्यक !
सतां सात्तपदं मेत्रमित्याहुविंबुधा जनाः ।
तस्माच्वं मित्रता भ्राप्ती वचनं मम तच्छृणु ॥ ४९॥
(२२० ) पञ्चतन्त्रम् ।
पंडित जन कहते हें कि, सत्पुरुषोंकी सातपग संग चळनेसेही मित्रता होती
“है इस कारण मित्रताको प्राप्त हुआ तू मेरा वचन सुन ॥ ४९ ||
दुर्गस्थेनापि त्वया मया सह नित्यमेब आलापो
गुणदोषसुभाषितगोष्ठीकथाः सर्वदा कर्तव्या यद्येवं न
विशधासिषि” । तच्छुत्वा हिरण्यकोऽपि व्यचिन्तयत् ।
विदग्धवचनो$्यं हश्यते लघुपतनकः सत्यवाक्यश्च,
तद्यक्तमनेन मेत्रीकरणम् । परं कदाचित् मम दुर्ग चर-
णपातोऽपि न कार्य्यः । उक्तश्च
दुर्गेस्थानम स्थित इएही तेरा मेरे साथ नित्यह्दी घार्तालाप, गुणदोष सुन्दर
बचन गोष्ठीकी कथा सदा करनी चाहिये । जो इस प्रकार विश्वास नहीं करता
हे तो” यह सुनकर हिरण्यकमी विचारने छगा । “चतुर वचनवाळा यह
छघुपतनक दीखता हे और सत्यवादी हे सो इसके साथ मित्रता करना भढा हे,
“परन्तु कमी मेरे दुर्ग चरणभी न सकले, कारण कि,-
भीतभीतः पुरा शज्ञर्मन्दं मन्दं विसर्पति ।
भूमो महेलया पश्चाज्नारहस्तोऽङ्गनास्बिव ॥ ५० ॥??
प्रथम भयभीत शत्रु भूमिमे मन्द मन्द चलता हे पीछे छीछासे शीघ्रतासे
-गमन करता है जैसे ज़ियोंके अंगपर जारका हाथ ॥ ५०॥”?
तच्छुत्वा वायस आइ- भद्र ! एवं भवतु” । ततः
प्रभ्माति हा ता आप सुभाषतगाछाछुखमचुभवन्ता
गततः | परस्पर कृतोपकारा काल नयतः | लघुपत-
नकोऽपि मांसशकलानि मेध्यानि बलिशेषाणि
अन्यानि वात्सल्पाहतानि पक्कान्नविशेषाणि हिरण्य-
कार्थमानयति । हिरण्यकोऽपि तण्डुलान् अन्यांश्च
अक्ष्यविशेषान् लघुपतनकार्थ रात्रो आहत्य तत्का-
लायातस्य अर्पयति । अथवा युज्यते योरपि एतत् ।
उक्तव्व-
यह सुन काक बोळा-“भद्र ! ऐसाही हो” उस दिनसे ठेकर बे दोनों
-सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभव करते स्थित रहे, छघुपतनकभी मांसखण्ड पवित्र
भाषाटीकासमेतम् । (२२१)
बिशेष अन्य पदार्थ प्रेमसे लाये हुए बिशेष पकान्न हिरण्यकके वास्ते छाकर
देता, हिरण्यक तन्दुङ ओर भक्ष्यविशेष लघुपतनकळे निमित्त रान्निमें लाकर
तत्काळ रात्रिम आये हुएके निमित्त भर्पण करता । अथवा दोनोकी यह बात युक्त
हे । कहा है-
ददाति प्रतिगूहाति गुह्यमाख्याति एच्छति ।
शुक्ते भो जयते चैव षडिधं प्रीतिलक्षणम् ॥ ५१ ॥
देता हे, ग्रहण करता है, गुत कहता हे, एछता हे, भोजन करता खबाता हैं
यह छ.प्रकार प्रातिका लक्षण हं || ५१ ॥
नोपकारं विना भीतिः कथञ्चित्कस्यचिद्गवेत् ।
डपयाचितदानेन यतो देवा अभीष्टदाः ॥ ५२ ॥
कहीं भी किंसीकी प्रीति उपकारके बिना नटीं होती हे उपयाचित दान
( अर्थात् मेरा यह कार्य सिद्ध होगा तो यह दूगा ) से देवता भी अभीष्ट
देते हैं॥ ५२॥
तावत्प्रीतिभवेछ्लोके यावदान प्रदीयते ।
वत्सः क्षीरक्षयं दृष्टा परित्यजति मातरम् ॥ ५३ ॥
ठोके जवतक दान दिया जायगा तभीतक प्रीति होती हे बछडा दूधका क्षय
देखकर माताको त्याग देता है ॥ ५३॥
पश्च दानस्य माहात्म्यं सद्यः मत्ययकारकम् ।
यत्मरमावादाप दूषी मित्रतां याति तत्क्षणात् ॥ ५४ ॥
दाचका माहात्म्य तत्काळ विस्वास [देढानेवालाहे देखा जिसके प्रभावस्ते द्व्षी
उसी क्षण मित्रताको प्राप्त होता हे ॥ ५४ ॥
पुत्राइपि प्रियतर खछु तेन दानं
अन्ये पशोरपि बिवेकविवर्जितस्य ।
दत्त खले तु निखिल खलु येन दुग्ध
नित्य ददाति महिषी सल्लुतापि पश्य ॥ ५ ॥
गर्वेबेकवा जंत पहुकाभा दान पुत्रस आघकतार प्रिय मानता ह जस कि.
nw ह
वेत्य खडक टनपरमां सपुत्र भस पाळकको नित्य दूध देती है | ५९ ||
(२२२) पञ्चतन्त्रम् ।
किबहुना-
बहुत कहनेसे क्या हे-
प्रीति निरन्तरां कृत्वा दुर्भेद्यां नखमाँसवत् ।
मूषको वायसश्रेद गतौ क्त्रिममित्रताम ॥ ५६ ॥
दुरच नख मांसकी समान निरन्तर प्रीति करे देखो मूषक और वायस
कृत्रिम मित्रताको प्राप्त हुए ॥ ९६ |
एवं स मृषकस्तदुपकाररज्ितः तथा विश्वस्तो यथा तस्य
चक्षमध्ये प्रविष्टः तेन सह सर्वदेव गोष्ठी करोति | अथ अन्य-
स्मिन्नहानि वायसोऽक्रपूर्णनयनः समभ्येत्य सगदूदं तसुवाच,--
“भद्र हिरण्यक ! विरक्तिः सञ्जाता मे सांप्रतं देशस्य अस्य
उपरि, तदन्यत्र यास्यामि’ । हिरण्यक आह,- भद्र ! किं
विरक्तेः कारणम् ?” स आह,- भद्र! श्रयताम् । अत्र देशे
महत्या अनावृष्ट्या दुर्भिक्षं सञ्जातम् । इभिक्षत्वात् जनो
बुभुक्षापीडितः कोऽपि बलिमात्रमपि न प्रयच्छति । अपरं
गृहे गहे बुझ्चाक्षितजनेः बिहङ्गानां बन्धनाथ पाशाः प्रणुणी-
कृताः सन्ति। अहमपि आयुःशेषतया पारोन बद्ध उद्वरितो-
ऽस्मि | एतद्विरक्तेः कारणम्तेनाहं विदेश चलित इति बा-
ष्पमोक्षं करोमि हिरण्यक आह- अथ भवान् क प्रस्थितः!”
स आह,-“ अस्ति दक्षिणापथे वनगहनमध्ये महासरः
तत्र त्वत्तोषचिकः परमसुहत् कूमों मन्थरको नाम!स च
भ मत्स्यमाँसखण्डानि दास्यति तद्वक्षणात् तेन सह सुभा-
षितगोष्टीसुखमबुभवन् सुखेन काळं नेष्यामि । न अहमत्र
विहङ्गानां पाशबन्धनेन क्षयं द्रष्टमिच्छामे । उक्तश्च-
इसप्रकार बह मूषक उसके उपकारसे रंजित हुआ ऐसे विश्वासको प्राप्त हुआ
कि,उसके सहित सदा गोष्ठी करता | फिर किसी एक दिन काक आंखेंमें आंसूमरें
उसके निकट आय गदूगद् स्त्ररसे उससे बोढा,-“भद्र हिरण्यक ! इस देशपर
अब मुझे वेराग्य इजाहे सो ओर स्थानर्मे जाऊंगा”, हिरण्यक बोला, !
वेराग्पका कारण क्याहे १? वह बोळा,-“'मठ ! सुनो इस देशमें बडी अना-
आषाटीकासमेतम् । (२२३)
वृष्टिसे दुर्गिक्ष होगयाहे दुभिक्षसे भूखसे पीडित कोई मनुष्य बढिमात्रमी नहीं
देताह और घरघरमें भूखे ज्नोने पक्षियोंके बाधनेकों पाशे छगा रक्खेहँ मेंभी
ज्आयुके शेष रहनेते पाशसे वधकर निकळ आया, यह वैराग्यका कारण है
इससे में विदेशको चछा इसकारण आसू व्यागताहू” । हिरण्यक वोळा,-“तो
भाप पाहा जायगे!!१हू बोछा-“दक्षिणदिशार्म गहनववके मध्यमें वडा सरोवर हे!
वह्या तुमसेमी अधिक परम सुहत् कूमे मन्थरक नामवाळाहे, पह मुम्ने मत्त्योके
मातखण्ड देगा | उनकी भक्षण करता उसके सग सुन्दर भाळापका सुख
अनुमव करता सुखन समय बिताऊगा, में यहां पक्षियोकी पाश वधनासे क्षय
-डेखनेको असमर्थ हू | कहादे- म
अनावृष्टिहते देशे शस्ये च रलयं गते ।
घन्यास्तात न पश्यन्ति देशभङ्गं कुलक्षयम् ॥ ५७ ॥
देशके भनाबाशिते क्षय होनेमें; धान्यके नष्ट होनेमें, तथा देशमा और कुछके
क्षपको नह देखते वेही हे तात! धन्यदें ॥ ५७ ||
कोऽतिमारः समर्थानां कि दूरं व्यवसायिनाम् ।
को विदेशः सावेयानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥ ५८ ॥
समर्थ पुरुषका क्या महत्कार्य छ, व्पापारयाका क्या दूर, विद्ञन(कां कॉन-
स विदेशहै थोर प्रियवादियोंकों कौन दूसराहै कोई नहीं हे ॥ ५८ ॥
विद्वखश्व वृपत्बश्च नेव ठुल्यं कदाचन ।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान्सवेत्र पूज्यते ॥ ५९॥ ”
बहता आर राजापच कमा बरावर नहा हासक्त राजा भपन देशम हा पाजत
होताहे और बिद्वान् सवत्र पूजित होतांहे ॥ ५९ |?”
हिरण्यक आह,- यादि एव तदहमपि त्वया सह गभि-
ष्यामि ममापि महहखं वर्तते” । वायस आह,-“भोः! तव
कि दुःखम्? तत्कथय” । हिरण्यक आह,-“'भोः ! बहु-
वक्तवघमस्ति अत्र विषये । तत्र एवं गत्वा सर्व सावि-
स्तर कथयिष्वामि” । वायस आह, “अहं तावत्
आकाशगातः तत्कय भवतो मया सह गमनम्”? ।
स आइ यदि में प्राणान् रक्षसि तदा स्वप्ृष्ठमा'
(२२४) पञ्चतन्त्रम् । , ,
रोप्य मां तत्र घापयिष्यासे । नान्यथा मम गातिः अस्ति” ।
तत् श्रत्वा सानन्दं वायस आइ,- यदि एवं तद्धन्योपह
अद्भवताप सह तत्र काल नथामे । अह सम्पातादइकान्+
अष्टो उड्टीनगतिबिशेषान् वेञ्मि । तत्समारोह मम पृष्ठं, थेन
सुखेन त्वां तत्लरः प्रापयामि!? । हिरण्यक आह,- 'उड्डी-
नानां नामानि ओठुमिच्छामि” । स आह,
हिरण्यक बाळा,-*“'जो ऐसाहे तो में भी तुम्हारे साथ जाऊंगा, मुझे भी बडा
;खहे'” काक चोळा,-“'मो तुमको क्या दुःखहे । सो कहो” हिरण्यक बोछा,-
“स विषयमें बहुत कुछ कहनाहे वहीं जाकर सब तितत्तारूवेक कढुगा?
काक बोला,--' में तो आकाशगतिङ्ग सो आप केसे मेरै साथ चछोगे” | वह
बोळा-““यदि मेरे प्राणीकी रक्षा करताहे तो मुझे भी पीठपर चढाकर अपने
साथ छेचछ । भन्यथा मेरी गति नहीं है” ] यह सुन आनन्दसे वायस बोढा,-
“जो ऐसाहे तो में धन्यह जो आपके साथमें समयको व्यतीत करूं में सम्पा-
के
त्तादि आठ उडनेकी गतिविशेष जानताहू । सो मेरी पाठपर चढो जिससे सुखसे
बज
Loin ०,
तुझे उस सरोवरको प्राधकरू? | हिरण्यकन कहा-“उडतेकी गतियोंके नाम
सुननेकी इच्छा करताहू” वह बोला,--
सम्पातं विप्रपातश्च महापातं निपातनम् ।
वक्र तिट्धक् तथा चोव्वेमष्टमं लघुसंज्ञकम् ॥ ६०॥”
`
सम्पात, विप्रपात, महापात, निपात, वक्रगति, तिथेकू, ( तिस्छीगति ),
ऊध्वेंगाते, आठवा लघुसंज्ञक गति | ६० ॥”
तच्छ्रत्वा हिरण्यकः तत्क्षणादेव तदुपारे समारूढः
सोऽपि शान्तेः शनेः तमादाय सम्पातोङ्डीनप्रास्थितः
ऋमेण तत्सरः प्राप्त । ततो लघुपतनकं मूषका घिष्ठत
बिलोकय दूरतोऽपि देशकालवित् असामान्यकाकोऽ ,
यमिति ज्ञात्वा सत्वरं मन्थरको जले प्रविष्ट! | लघुपतन-
कोऽपि तीरस्थतरुको टेर हिरण्यकं मक्ता .शाखाअमा-
सूह्य तारस्परेण प्रोवाच,- “भो मन्थरक ! आगच्छा-
गच्छ तव मित्रमह लघुपतनको नामं वायसः चिरात्
भाषाटीकासमेतम् । (२२५)
सोत्कण्ठः समाथातः । तदागत्य आलगय माम्!
उक्तञ्च
यह सुनकर हिरण्यक उप्ती क्षण उसके ऊपर चढ बैठा वहमी शमेः शनेः
उसको ळे सम्पात उडानकी चाळके कमसे उस सरोवरें प्रात हुआ । ढघुपत-
नकके उपर चूहेको अधिष्ठित देख दूरसेही देशकाळका ज्ञाता वह मन्थस्क
कोई बडा काक हे ऐसा मानकर जलें प्रविष्ट हुभा। छघुपतनक भी तटके वृक्षका
खखोडळमें हिरण्यको छोडकर शाखाके अग्नसागमें आरोहणकर ऊचेस्वरसे
बोळा-“'भो मन्थरक ! भाओ आओ ! तेरा मित्र में छघुपतनक चाम घायस हू
सो आकर मुझे आछिंगनकर । कहाहै-
कि चन्दने? सकपूरेस्ठुहिनेः किञ्च शीतलेः ।
सवें ते भित्रगात्रस्य कलां नाइन्ति षोडशीम् ॥ ६१॥
चन्दन, कपूर, हिम और शीतळ पदार्थसे क्या है घे सव मित्रके शरीरी
सोळहवीं कळाकी बरावर न हिं॥ ११ ||
तथाच-
तेसेही-
केनामुतमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम्।
आपदा परित्राणं शोकसन्तापभेषजम् ॥ ६२ ॥
अमृतकी समान मित्र यह दोनों अक्षर किसने चनायेद जो भापत्तिक
. रक्षक और शोक सन्ताप ( नारक ) ओषध हैं ॥ ६२ ॥
तच्छुत्वा निपुणतरं परिज्ञाय सत्वरं सालिलान्निष्क्रम्य
पुलाकेततनुः आनन्दाश्रुपूरितनयनो मन्थरकः धरोवाच,
“एहि एहि मित्र! आलिङ्गय माम्, चिरकालात् मया त्वंन
सम्यक परिज्ञातः, तेन अहं सलिलान्तः प्रविष्टः। उत्तश्च-
यह सुव अधिकतर निपुणजान जळसे निकळ पुळकायमान शरीर आनदके
“आस नेत्रमे भर मन्धरक बोछा,- आओ २ मित्र | मुझे आलिंगनकरो चिरका-
लो दीन होनेते मेंने तुझको न जाना इसकारण मैं जलूमें प्रविष्ट हुआ | कहा रै-
यस्य न ज्ञायते वीर्य्यं न कुलं न विचेष्टितम् ।
न तेन सङ्गातें कुय्यादित्युवाच बृहस्पतिः ॥ ६३ ॥ ?
१७
६ २२६) पञ्चतन्त्रम् ।
जिसका पराक्रम, कुछ और चेष्टा न जाने उसकी संगति नकरे ऐसा
चूहस्पतिने कहा है ॥ ६३ |
एवभुक्ते लघ्रपतनको वृक्षात अवतीय्ये तमालिङ्गितवान्
अथवा साउ चदछुच्यते-
ऐसा कहनेपर छछुउतनक वृक्षले उतरकर उसे आलिंगन करता मया |
अथवा अच्छा यह कहा है--
' अमृतस्य घवाहेः कि कायक्षालनसम्भवेः।
चिरान्मित्रपरिष्बङ्गो योऽसौ मूल्यविवित्तः ॥ ६४ ॥”
शरीरके धोनेमात्रसे उत्पन्न अमृतके प्रबाहाते क्या है, चिरकालमें भित्रका
आलिंगन मूल्यवर्जित है | ६४ |”
एवं द्वौ अपि तो विहितालिङ्गनो परस्परं एुलकितशरीरो
वृक्षादधः समुपविष्टो प्रोचतुः आत्मचरित्रद्वत्तान्तम् । हिर-
ज्यकोऽपि मन्थरकस्घ प्रणामं कृत्वा वायसाभ्यासे सघुपविष्ठः ।
अथ तं समालोक्य मन्थरको लघुपतनकमाह)- भो; !
कोऽयं मूषकः ? कस्मात् त्वया भक्ष््नूतोऽपि एष्ठमारोप्य
आनीतः १ तन्न अत्र स्वल्पकारणेन भाव्यम्?’ । तत् ढुत्वा
लघुपतनक आह,- “भोः! हिरण्यको नाम मूषकोऽयम्, मम
सुहृत् द्वितीयामिव जीवितम् ! तत् कि बहुना,-
इस प्रकार वे दोनों हौ भारिंगनकर परस्पर पुर्ठाकत शरीर हो इक्षके नीच
बैठे अपना इत्तान्त कहने लगे । हिरण्यकमी मंथरको प्रणाम कर वायसके निकट
बैठा, तब उसको देखकर मन्थरक लघुपतबकसे बोछा-“मो ! यह मूघा
कोनहे ? क्यों यह तुमने भक्ष्य पदार्थ अपनी पीठपर बेठाकर छाया ३ १ सो
इसमे छघु कारण न होगा,” यह छुनकर ब्घुपतवक बोळा-,'“मो ! यह
हिरण्यक मृषोंका राजा है मेरा मित्र दूसरा प्राण है | बहुत कहनेसे क्या है-
पर्जेन्यस्य यथा धारा यथा च दिवि तारकाः ।
सिकता रेणवो यद्वत्संस्यया परिवजिताः ॥ ६५ ॥
जैसे मेघकी धारा जेते स्घर्गमँ तारे जैसे रेणुकी संख्या नहीं हो सक्ती) १५॥
१
भाघाटीकासमेतम् । (२२७)
गणसंख्या परित्यक्ता तद्ददस्य महात्मनः ।
परं निर्वेदमापन्नः सम्प्रात्तो$ये तवान्तिकम् ॥ ६६ ॥"
इसी प्रकार इप्त महात्माके गुणोंकी सख्या नहीं है यह बहुत निर्वेदको
आत्त होकर आपके समीप आया हे || ६६ ॥”
मन्थरक आइ किमस्य देराग्यकारणम्!'' बायस
आह्,-“पृष्टो मया परमनेन अभिहतम्, यद् बहु वक्तव्य-
मस्ति तत् तत्र एव गतः कथयिष्यामि । ममापि न निवे-
दितम् । तत् भद्र हिरण्यक ! इदानी निवेद्यतासञभयोः अपि
” आवयोः तदात्मनो वराग्यकारणम्' । सोऽब्रवत-
मन्थरक बोछा,-“इसके वैराग्यका करण क्या हे ?” वायस बोछा-* मैंने
पूछा था परन्तु इसने कहा इसमे बहुत कुछ कहना हे इस कारण वहाँ जाकर
कहूगा, मुझसेमी न कहा । सो भद्र हिरण्यक ! इस समय प्रेमी हम दोनोसे अपने
बेराग्थका कारण वरेन करो” | बह बोळा-
कथा 3.
अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरुम्।
तस्य नातिदूरे मठायतनं भगवतः श्रीमहादेवस्य । तत्र
-च तास्रवूडो नाम परिव्राजकः प्रतिवसतिस्म । ख च नगरे
.. भिक्षाटनं कृत्वा माणयात्रा समाचरति । भिक्षाशोषश्च तत्रे
भिक्षापात्रे निधाय तद्भिक्षापात्रं नागदन्ते अवलम्ब्य पश्चात्
राची स्वापिति । प्रत्यूषे च तदन्नं कर्मकराणां दर्वा सम्यक
तत्रेव देवतायतने सम्माजनोपलेपमण्डनादिकं समाज्ञाप-
यति । अन्यास्मन् अहनि मम वान्धवः निषेदितम्,-“स्वा-
मिन्! मठाथतने ` सिद्धमन्नं सूषकभयात् तत्रेव भिक्षापात्रे
उनिहेत नागद्न्तेऽवम्मित्तं. तिष्ठाति सदा एव, त्तद वयं
अक्षयिठ न शक्नुमः । स्वामिनः पुनरगम्यं किमपि नास्ति।
तत् कि बृथाटनेन अन्यत्र अख तत्र गत्वा यथेच्छं शुञ्ामहे
तब म्रसादात”। तदाकण्य अहं सकलयूथपरियत्रतः तत्क्षणा-
देव तत्र गतः । उत्पत्य च तर्मित् भिक्षापात्रे समारूढः
( २२८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तत्र मक्ष्यविशेषाणे सेवकेम्यो दत्वा पश्चात् स्वयमेव भक्ष
यामि, सर्वेषां तृत्तौ जातायां भूयः स्वग॒ह गच्छामि । एवं
नित्यमेव तदन्नं भक्षयामि । परित्राजकोऽपि यथाशक्ति
रक्षति । परं यदा एव निद्रान्तारितो भवति, तदा अहँ तत्र
आरूह्य आत्मक्ृत्यं करोमे। अथ कदाचित् तेन मम रक्ष
णाथ महान् यत्नः कृतः ! जजरवंशः समानीतः । तेन सुप्त
ऽपि मम भयात् भिक्षापात्रं ताडयति ! अहमपि अभक्षितेऽपि
अन्ने भ्रहारभयात् अपसपामे । एवं तेन सह सकलां रात्रि
विग्रहपरस्य कालो ब्रजति । अथ अन्यस्मिन्नहनि तस्य मठे
बृहतस्फिडनामा परिव्राजक! तस्य खुहत तीर्थयात्राप्रसङ्गेन
पान्थः प्राछुणिकः समायातः, ते दृष्टा प्रत्युत्यानावाधिना
सम्भाव्य मरतिपत्तिपूर्वकमभ्यागताक्रियया नियोजितः
ततश्च रात्रौ एकत्र कुशसंस्तरे द्री अपि प्रसुतो धर्मकथां
कथयिदुमारब्यौ । अथ वृहत्स्मिक्षथागोष्ठीषु स ताम्रचूडो
मूषकत्रासार्थं व्याक्षितमवा जजेरवंशेन भिक्षापात्रे ताउयंन्
तस्य शून्यं भतिवचनं अयच्छाति तन्मयः न किञ्चित् उदाह-
रात । अथ असो अभ्यागतः परं कोपसुपागतः तसुवाच,
भाः तास्नचूड ! पारज्ञातः त्वं सम्यक् न सुहृत्, तन मया सह
साह्वादइ न जल्पासे । तत् राचा आपि त्वदीय मठ त्यक्ता
यत्र मठे यास्यामि । उक्तश्व-
दक्षिण देशं एक महिलारोप्प नाम नगर है। उसके थोडीही दूर श्रीमगबान्
महादेवका मठ है । वहां ताम्रचूड नामक संन्यासी रहत्ताथा | षह नगरमे मिक्षा-
टन करके प्राणनिर्वाह करता, बची भिक्षा उसी भिक्षा पात्रमें रख उस भिक्षा"
पात्रको खूंटीपर छटका' कर फिर रात्रीमें सोजाता । प्रमातमें उसको वहाँके
कर्मकारोंको देकर मळी प्रकार उस देवस्थानमें बुहारी लीपना मंडन आदिमौ।
आज्ञा देता था । किसी एक दिन परे बन्धुआओंने कहा-'हे स्वामी | इस मठम
सिद्ध अन मूषिकके भयसे उसी भिक्षापात्रमें धरा हुआ खूडीपर टँगा हुआ
सदाही है उसे भक्षण करनेकों हम समर्थ नहीँ हो सकते | स्वार्माको कुछ माँ :
आषाटीकासमेतम् । ( २२९ )
सम्य नहीं हे । सो आप क्यों इथा और स्थानमें अटन करते हो | आज
इम वहां जाकर आपके प्रादसे यथेच्छ भोजन करे” यह घुबकर में सम्पूण
खुधके साथ उसी क्षणर्मे वहा गया और कूदकर उस भिक्षापात्रमें आरूढ
इभा । उसके भक्ष्य पदार्थ सेवकांको देकर पीछे में भी मक्षण करू । सबकी
तृत्ति होनेमें फिर अपने घर्मे आऊ । इस प्रकार नित्यशी उस अन्नको खाऊ
संन्यासी भी यथाशक्ति रक्षा करता था । परन्तु जब वह सोता, तब मै उसपर
चढकर आपना काम करू । एक समय उसने मेरी रक्षाके लिये बडा यत्न
किया । फठाबांत झाया, उससे सोतेमे मी मेरे मयसे मिक्षापात्रको ताडन
करता मैमी बिना अनके भक्षण कियेही प्रहारके भयसे वहाते चढ़ा जाऊ | इस
प्रकार सव रातका समय उसके साथ विग्रह करते बीता । किसी दिन उसके
मठपें चृहत्र्फिकू नामवाळा सन्यासी उसका मित्र तीर्थयात्रा प्रसंगसे पान्थ
अतिथि प्राप्त हुआ। उप्तको देख प्रत्युत्यान बिधिसे सम्भावित कर सन्मान
वेक अतिथि सत्कारमे नियुक्त किया । फिर राजिरमे एकही कुशके बिछोनेमें
दोनो ठेटे हुए घर्मकधा कहने छो । तब वृहृतूत्किकूकी कथा गोष्ठीमें वह
°
र:
ताम्रचूड मुषेके डरानेतें व्याक्षित मनवाळा जर्जेरवशासे भिक्षापात्र ताडन करता
हुआ उसको शून्य इकारा देताथा परन्तु मूषेके ध्यानसे कुछ नहीं कहता, तब
यह अम्यागत परम क्रोधको प्रप्त हुआ उससे बोळा,-“भो ताम्रचूड! अच्छी
प्रकार मैंने जाना कि तू हमारा सुहृत् नहीं हे इसी कारण भानदस तू हमसे
नहीं बोळ्ता है । सो रात्रिमेंद्दी तुम्हारे मठको त्यागवकर और मळ
जाऊंगा | कहा है- .
- एह्यागच्छ समाश्रयासनमिदं कस्माचिराइृश्यसे
कावात्तों अतिइुर्बलोऽसि कुशलं प्रीतोऽस्मि ते दशनात् ।
एबं ये समुपागतान्प्रणयिनः प्रह्मादयन्त्यादरा-
तेषां युक्तमशङ्टितिन मनसा हम्योणि गन्छुं सदा ॥ ६७ ॥
। यहा भाओ, वेठो, यह आसन है, किसकारण बहुत दिनोमें दीखेहो १ क्या
चाती हे ? वहत दुबळे हो | कुशळ है ? में भाएके दशवसे कुशल्हू इस प्रकार
जो प्रेमी आये इए अपने सुद्ददोंको आदरसे आनदित करते हैं उनके घरमै
अशकित मनसे सदा जाना चाहिये ॥ ६७ |
(२२०) पञ्चतन्त्रम् ।
गही यत्रागतं दृष्टा दिसो वीक्षेत वाप्यधः । `
तत्र थे सदने यान्ति ते श्रंगरादिता दृषाः ॥ ६८ ॥
जो गृही अपने यहां अतिथिको आया इभा देखकर दिशाको अधवट
नीचेको देखता है उनके घर जो जाते हैं वे विना सींगके बेळ हे ॥ ६८॥
नाभ्युत्यानक्तिया यन्न नालापा मडुराक्षराः।
गुणदोषकथा नेव तत्र हम्यें न गम्यते ॥ ६९ ॥
जहां उठनेकी क्रिया नहीं हे ( बढेको देख छोटोंका उठना ) मधुर अक्ष-
रॉसे बातचीत महाँ हे तथा गुण दोषकी कथा जहां नद हे उनके स्थान
जाना उचित नहीं हे ॥ ६९॥
तदेकमठप्राध्या अपि त्यै गर्वितः, त्यक्तः सुहत्लेहः ।
न एतत् वेत्ति यत् त्वया मठाश्रयव्याजेन नरकोपाजनं
कृतम् । उक्तश्व-
सो एक मठको प्राप्त होकरमी तू गर्षित हुआ हे और सुहृतका लेह त्याग
दिया हे यह नहीं जानता कि मठ भश्रयके बहानेसे तेने नरककी प्राति की।
कहा हेट
नरकाय मतिस्ते चेत्पोरोहित्यं समाचर ।
वर्ष यावत्किमन्येन मठचिन्तां दिनत्रयम् ॥ ७० ॥
नरक जानेकी इच्छा हो तो पुरोदिती कर्मे कर सो एकही वर्ष बहुत है '
आर मठपाते होवकों चिन्तासे तीना दिनम नरक होता है ॥ ७० ॥
तन्मूख ! शाचतव्यः त्व गव गतः | तदह त्वदीय मठं
परित्यज्य यास्यामि’? । अथ तत श्रत्वा भयत्रस्तमनाः ताम्र-
चूड़! तमुवाच,- भो भगवन् ! न त्दत्समोन्यो मम सुहृत्
कश्चिदर्ति, परं तत् श्रयतां गोष्ठाश्ाथल्धकारणम् । एष
दुरात्मा मूषकः प्रान्नतस्थान घृतमाप मभिक्षापात्रम्नत्प्ठ्त्व
आराहात भिक्षाशेषश्च तत्रस्थ भक्षयात। तदभावात् एव मठ
माजनाक्रेया आप न भवति। तन्मूषकत्रासाथमतन वशन
१भक्षापात्र सझुङुसुहुः ताडयाम नान्यत् कारणामात ।
अपरमेतत कुतूहल पश्य अस्य इरात्मना यन्माजारमर्कटा”
भाषाटीकासमेतम्। (२३१)
दथोऽपि तिरस्कृता अस्य उत्पतनेन” । बृहतस्फिक् आह
“अथ ज्ञायते तस्य बिळं कर्मिश्चित् अदेशे ?” ताम्रचूड
»आह- भगवन् ! न वेशि सम्पक?? । स आह- नून निधा-
नस्य उपारे तस्य बिलम्। निघानोष्मणा प्रकूदते । उक्तव-
सो मूर्ख ! गर्नेको प्राप्त होनेसे तू शोचनीय हे सो में तुम्हारे मठको त्याग
जाऊगा” | तब यह सुन भयले घवडाया हुआ ताम्रचूड उससे बोछा-''भो
भगवन् ! ऐसा मत कहो तुम्हारा समान मेरा धन्य प्रिय छुहृत् नहीं हे । परन्तु
सुनो जिस कारणते तुम्हारे वचनके मुझसे उत्तर नहीं दिये जाते । यह दुरात्मा
मूषक ऊचे स्थानमें घरे हुएमी मिक्षापात्रपर वूदकूद चढ जाता हे. जोर उसमे
रम्खी इई शेष भिक्षाको खाजाता हे इस कारणसे मठमे माजन ( बुहारी ) भी
नहीं लगती, सो मुपकके डरानेको इस वाससे बारबार भिक्षापात्रको ताडन
करताहू । और कारण नहीं है! भौर इस दुरात्माका यह कुतूइळ तो देखो जो
विलत वानर आदिभी इसने अपने कूदनेके आगे तिरस्कार कर दिय” । बृह-
स्हिफिक वोला-किप्त देशम उसका बिळहे सो जानत हो? ताम्रचूड बाला-"
#सगवन् में अच्छी प्रकार नहीं जानताह” । बह बोछा-“अवश्यहीं धनके
ऊपर उसका विळ हे । धनका गरमीसे कूदता है | कहा है--
उप्मापि वित्तजो' वाई तेजो नयति देहिनाम् |
कि पुनस्तस्य सम्भोगस्त्यासकमेसमन्वितः ॥ ७१ ॥
घनक्षी गरमी मञुष्यके तेजको बढ़ाती हे और यदि उसका भोग भोर त्याग
हो तो क्या कहना | ७१ ॥
तथाच-
और देखो-
नाकस्माच्छाण्डिलीमातर्विक्रीणाति तिलेस्तिलान् ।
लुखितानितरेयेन हेतुरत्र भविष्यति ॥ ७२ ॥!?
हे मात' | भकमक्षात् शाण्डिळी ब्राह्मणी घुले तिळोसे काळें नहीं बदलती हे
इसमें भवश्य काई कारण हांगा ॥ ७२ ॥ ।
ताम्रचड आइ)-“कथमेतत् '” स. आह-
ताम्रचूड बोला,- “यह केसे'' बह बोढा-
(२३२) पञ्चतन्त्रम् ।
कॅथा २
यदा अह कास्माश्वत स्थानं शभावदकाल व्रतप्रहणनिमित्तं
काञ्चत् ब्राह्मण वासाथ म्राथतवान् । ततश्च तहचनात
तेनापि शुश्राषितः सुखेन देवार्चनपरः तिष्ठामि । अथ
अन्यास्मिन्नहानि प्रत्यूषे प्रबुद्धो ऽहं बराह्मणत्राह्मणीसंवादे दत्ता-
वधान; झणोमि। तत्र ब्राह्मण आइ,- ब्राह्मणि! प्रभाते दालि-
णायनसंक्रान्तिः अनन्तदानफलदा भाविष्यति। तदहं प्रतिग्र-
हार्थ ग्रामान्तरं यास्यामि । त्वया बाह्मणस्य एकस्य भगवतः
सूर्य्यस्य उदेशेन किचिद्गोजनं दातव्यम्’’ । अथ तच्छृत्वा
ब्राह्मणी परुषतरवचनेः ते भर्त्सथमाना प्राह,-“कुतः ते
दारद्र्यापहतस्य भोजनप्राति १ तत् ।क न लजसे एव
बुवाणः। अपि च न मया तव हस्तलश्रया क्कचिदपि लब्धं
सुखे, न मिष्टान्नस्थ आस्वादनं, न च हस्तपादकण्ठादिमू'
षणम्?? । तत् श्रत्वा भयत्रस्तोऽपि विप्रो मन्दं मन्दं प्राह,-
“ब्राह्माणि ! न एतद्यज्यते वक्तुम्। उत्त्व-
जब म किसी एक स्थानमै वषोके समय किसी नियम प्रहणके निमित्त किसी
ब्राह्मणसे निवासको प्राथीना करता हुभा | तव उम वचनसे उससेमी शुश्रूषित हुआ
सुखसे देवाचेनमें तत्पर रहता था | तब एक दिन प्रातःकालमे जागतेही ब्राह्मण '
ब्राह्मणीके सम्बादमें मन लगाकर सुनने छगा । तब ब्राह्मण बोला,- ब्राह्मणि !
प्रभात दक्षिणायन संक्रान्ति है इसमें दान करनेसे अनन्त फळ होता है। सो में
दान छेनेको ग्रामान्तरे जाताहूं तूमी एक ब्रह्मणको भगवान् सूर्यके उद्देशसे दु
भोजन देना” । थह सुन ब्राह्मणी उसको कठोर वचनोंसे घुडकती इई बोली,-
“तुझ महादरिद्रत मोजनकी प्रालि केसे हो सकती हे इस प्रकार कहनेमें तू
ठान्नित नहीं होता मैंने तो तेरे हाथसे कभी सुख नहीं पाया न कभी मिष्ठ-
नका स्वाद जाना । न हाथ पेर कण्ठका भूपण पायो? | यह सुन मयमत
इभा ब्राह्मण मन्द मन्द बोछा,-“्राझणी ऐसा कहना तुमको उचित नहीं
है। कहा है-
भाषाटीकासमेतम् । (२३३)
आसादपि तदद्धेच कस्मान्नो दीयतेऽथिडु ।
इच्छाइुरूपो विभवः कदा कस्य भविप्यति ॥ ७३ ॥
अपने ग्रासमेंसे भी आघा अतिथिको क्यों न दिया जाव सदा इच्छाके
अनुसार ऐश्वर्य किसको होसकताहे ॥ ७३ ॥
_ इश्वरा भूरिदानेन यछभन्ते फलं किल ।
दरिद्रस्तञ्च काकिण्या धाप्तुयादिति नः श्रत्तिः ॥ ७४॥
वडे ढोग जो फर बड़े बडे दानत पातेंहें दारिद्र वह फळ एक कोडीसे प्राप्त
करताह यह श्रृतिहे | ७४ ॥
दाता लघुरापे सेव्यो भवति न कृपणो महानपि समृद्धचा।
कूपोऽन्तः स्वाइजलः प्रीत्ये लोकस्य न समुद्रः ॥ ७५ ॥
खघु दाताभी सेवन करना चाहिये समृद्धिमान् कृपणको सेवा न करे कूपके
अन्तरका स्वादुजछ मनुष्यको प्रसन्न करता नकि सागर ॥ ७५ ॥
सथाच-
सैसेही-
अङ्कतत्यागनहिम्चा मिथ्या कि राजराजशब्देन ।
गोत्तारं न निधीनां कथयन्ति महेश्वरं विदुधाः ॥ ७६ ॥
विनाधन त्याग किये राजराज शब्दस क्या है ? निधियोंके रक्षा करनेवाले
कुवेरो पडित जन महेश्वर नहीं कहतेदे॥ ७६ ॥
` अपिच-
ओरमी--
सदा दानपरिक्षीणः शस्त एव करीश्वरः ।
अदानः पीनगात्रोऽपि निन्य एव हि गर्दभः ॥ ७७॥
सदा दानसे परिक्षीण एक करीधरही छाघनीय है विना दानके पुष्ट गात्र-
वाळे गधेकी निन्दा होतीहे ॥ ७७ ||
सुशीलोऽपि सुब्गत्तोऽपि यात्यदानादधो घटः ।
पुनः कुब्जापि काणापि दानाइपारे कर्कटी ॥ ७८ ॥
सुइ भोर सुर्शाळ घटमी विदादानके नीचेको जाता है कुबडी कानी ककडी
भी द'नत ऊपरही भाती है | ७८ ॥
(२३४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
यच्छश्षलमपि जलदो बछभमतामेति सकललोकस्य ।
नित्यं प्रसारितकरो मित्रोऽपि न वीक्षिठं शक्यः ॥ ७९ ॥ `
जळदानस भी मेघ सक्कल छोकका प्यारा होताहे नित्य हाथका फेळानबाळा
मित्रमी देखनेको अशक्य होजाताहे॥ ७९ ॥
एवं ज्ञात्वा दारिद्रचाभिभूतेः अपि स्वल्पात् स्वल्पतरं
काले पांचे च देयम् । उक्तश्व- ,
इस प्रकार जानकर दारदचस [परसस््छत इुरका भा दशकाछ पाः कि तू
दना चाहिये | कहाहू-
सत्पात्रं महती श्रद्धा देशे काले यथोचिते ।
खदीयते विवेकशेस्तदानन्त्याय कल्पते ॥ ८० ॥
सत्यात्रको बडी श्रद्धासे देश काळ पात्रमे ज्ञानियोंद्वारा जो दिवाजाताहे वह
अनन्त होताहे ॥ ८० ॥
तथाच-
ओरभी-
अतितृष्णा न कत्तेव्या तृष्णां नेव परित्यजेत् ।
अतितृष्णामिभूतस्य शिखा भवति मस्तके ॥ ८१ ॥”
अधिक तृष्णा न करे स्था तृष्णाक्षा त्यागमी नकरे । भत्यन्त तृष्णाबालेके
मंस्तकमें शिखा होतीहे ॥ ८१ ॥?
ब्राह्मणी आह-''कथमेतत्? ” स आह-
ब्राह्मणी बोळी-''यह केसे £”' बह बोळा-
कथा ३
अस्त कस्मिंश्चित् बनोदेशे कश्चित् पुलिन्दः स च पापाद्ध
कर्ते वन प्रति प्रस्थितः । अथ तेन प्रसपेता महान् अञ्चनपवे-
तशिखराकारः कोडः समासादितः । तं दृष्टा कर्णोन्ताकृष्ट-
निशितसायकेनं समाहतः,तेनापि कोपाविष्टेन चेतसा बालि-
न्ह्द्यतिना दंशंभेण पाटितोदरः पुलिन्दी गतासुः भूतले5१-
तत् अथ ढुब्धक व्यापाद्य झूकरोऽपि शरप्रहारवेदनया पश्च-
व्व गतः । एतस्मिन्नन्तरे कश्चित आसन्नमृत्यः -शगाल इत
भाषाटीकासमेतम् । (२३५)
स्ततो निराहारतया पीडितः पारेखमव् ते प्रदेशमाज”
गाम । यावत् वराहपालिन्दी द्वौ अपि पश्यति तावत् प्रहृष्टो
व्यचिन्तयत्। ''भोः ! सानुकूलो मे विधिः । तेन एतद्वापि
अचिन्तितं भोजनसुपास्यतम् । अथवा साधु इदसुच्यते-
किसीएक वनमें कोई पुिन्द पापकी सम्पत्ति करनेकी वनमें गया । तब
जाते हुए उसने बड़े अजन पर्वतके शिखरको समान एक शूकर प्राप्त किया ।
उसको देख कर्णपर्यन्त खेंचे हुए सायकसे मारा तब उसने ताडित हो कोधित
चित्तस बाङचन्द्रवत् कान्तिमान् डाढोंसे उसका पेट फाड डाळा जिससे बह
म्छेच्छ प्राणरहित हो एृथ्वापर गिरा । तब छुन्धकको मारकर झूकरभी बाणप्र-
हारको वेदनासे एचलकों प्राप्त हुभा, इसी अवसरमे कोई निकट मृत्युवाला
झगाळ इधर उवर निराहार होनेसे पीडित इभा, घूमता हुआ उस स्थाने
आया | जवतक्र शूकर भोर पुछिन्द दोनोंहीको देखता है तबतक प्रतनहे
विचारनेछगा “महो मेरे ऊपर विधाता प्रसन्न है इस कारण यह अचिन्तित
भोजन प्राप्त हमाहे । अथवा यह अच्छा कहाहे-
अकृतेऽप्युद्यमे पुँसामन्यजन्मकृत फलम् ।
झुमाशुमं समभ्येति विषिना सन्नियोजितम् ॥ ८२॥
बिना उद्यम किये भी पुरु्षोकी अन्य जन्मका किया हुआ शुभ वा अशुभ फळ
विधाताके नियोगले प्राप्त होताहे ॥ ८२ ॥
तथाच
और देखो--
यस्मिन्देशे च काले च वयसा याहशेन च ।
कृतं शुभाशुम कमे तत्तथा तेन सुज्यते ॥ ८३॥
जिस देशकाकमे जेसी अवस्थामे जिसने जैसा झुभाञझुभ कर्म किया हे वह
- बैसाही भोगताहे ॥ <३॥
तदहं तथा भक्षयामि यथा बहूनि अहानि मे माणयात्रा
भवाति | तत् तावदेवं ख़ायपाशं धनुष्कोटिगतं भक्षयामि ।
उक्तञ्च-
हि
(२३६) पश्चतन्त्रम्।
८ सो में इस प्रकारसे भक्षण करू जैसे बहुत दिनतक मेरे प्राणोंकी यात्रा
-होगी । सो प्रथम खायु बंधन जो इसकी धनुषकोटिमें ळगाहे उसे भक्षण
करूं । कहाहे-
शनेः शनेश्च भोक्तव्यं स्वर्य वित्तमुपाजितम् ।
रसायनमिव माजेहेंळया न कदाचन ॥ ८४ ॥?
बुद्धिमानोको स्वयं उपाजेन किया घन शनेः शनेः खाना चाहिये जैसे
रसायन उसमें खेळ करना नहीं चाहिये ॥ ८४ |”
इत्येवे मनसा निश्चित्य चापचटितकोटिं मुखमध्ये
प्रक्षिप्य खायु भक्षितुं प्रवृत्तः । ततश्च चुडिति पाशे ताठुदेशं
विदार्य चापकोटिमंस्तकमध्येन निष्क्रान्ता । सोऽपि तद्-
वेदनया तत्क्षणात सृतः । अतोऽहं ्रवीमि-
ऐसा मनसे विचारकर चापकी बंधी कोटिको मुखमै डाळकर चबाने लगा |
तब उस पाशके टूटतेही ताठुदेशको विदीणकर घन्नुषका शिरा उसके मस्त-
कर्मे निकळ आया, वहभी उसकी बेदनासे तत्काळ मरगया। इससे में कहताहूँं-
अतितृष्णा न कत्तव्या तुष्णाँ नेव परित्यजेत् ।
अतितृष्णाभिभूतस्य शिखा भवति मस्तके ॥ ८५ ॥
अति तृष्णा नकरे और तृष्णा त्यागन भी न करे अतिदृष्णासे अभिमूत
इएकी मस्तकमें शिखा होती है ॥ ८९ ॥
स पुनरपि आह-“ बाह्मणि ! न शतं भवत्या ।
बह फिर बोला-ब्राह्मणी ! तुमने न सुगा कि-
आयुः कमच वित्तश्च विद्या निधनमेव च |
पञ्चैतानि हि रज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः॥ ८६ ॥?
आयु, कमे, धन, विद्या भोर मरण यह. पांच वस्तु देहके गर्ममे निर्धारित
-कीजातीहे ॥ ८६ ॥?
अथ एर्व सा तेन प्रबोधिता ब्राह़्णी आह,- यदि एवं
तदस्ति मे गृहे स्तोकं तिळराशिः । ततः तिलान् छुचित्वा
तिळचूर्णेन आझणं भोजयिष्यामि’ इति । ततः तद्ठचनं श्रत्वा
“ब्राह्मणों ग्रामं गतः । सापि तिलान् उष्णोदकेन संम
भाषाटीकासमेतम् । (२३७)
कुटित्वा सृय्यातपे दत्तवती । अत्रान्तरे तस्या गृहकर्मव्य-
आयाः तिलानां मध्ये कश्चित् सारमेयो सूत्रोत्समै चकार । तं
दृष्टा सा चिन्तितवती, “अहो ! नेपुण्यं पश्य पराइमुखीभू-
तस्थ विषः यदेते तिला अभोज्या! कृताः । तदलमेतान्समा-
दाय कस्पचित गृहं गत्वा ठञ्चितेः अछुखिताव् आनयामि ।
सोऽपि जनोऽनेन विधिना मदार्याति” इति । अथ यस्मि
न्मुदेऽदं भिक्षार्थं प्रविष्टः तत्र गृहे सापि तिलान् आदाय
प्रविष्टा विक्रयं कत्तम। आह च,~' गृह्णातु कश्चित् अलु-
श्चितेः छुश्चितान् तिलान् । अध तढ्गुहगुहिणी ग्रह
प्रविष्टा यावत् अलुखितेः ठुचितान्मह्वाति तावत् अत्याः
पुत्रेण कामन्दकीशाखं दृष्टा व्घाइतम्,- “मातः ! अग्राह्याः
खलु इमे तिलाः । न अस्या अलुखितेः लुखिता ग्राह्याः ।.
कारणं किचित् भविष्यात, तेन एषा अछुश्चितेः लुखिता-
न्मयच्छति” तत् कत्वा तया परित्यक्तास्ते तिला; । अतोऽहं
ब्रवीमि-
इसप्रकार उससे प्रवोषित की हुई वह ब्राह्मणी बोडी-“जो ऐसा है तो मेरे
घरें कुछ तिलहें | उनको छडकर ( हुकडे उतारकर ) तिळ चर्णेसे ब्राहमण
भोजन कराऊंगी” तब उसके यह वचन सुन ब्राह्मण गावको गया | षहभी
तिलको गरमजळमे भिजोय मळकर कूटकर धूपमें सुखाती हुई, इसी समय
उसके गृहकमे छगनेपर तिमि किसी कुरेने आकर मूत्र करदिया । यह
देखकर वह विचारने ठगी | “अहो निपुणता देखो पराड्घुख हुए विधाताकी
जो यह तिळ अभोज्य कर दिये । सो जो हो इनको ठेकर किर्साके घर जाकर इन
बुडे तिठोसे बेघुछे तिळ छाऊ | सब मनुष्य इस प्रकारसे देदेगे” | फिर जिस
_ घसं में भिक्षाके वासते प्रविष्ट हुआ था उसी घरमे पहमी तिलोंकों ढेकर प्रविष्ट'
इई बोटीमी-“कोई धुळे तिलोंसे बेधुळे तिळ बदछो हो” | सो उस घरकी
ल्ली घए प्रबेश कर जबतक कासे घुळे तिंछ बदछती है तब्रतक उसके
सुत्रने कामन्दकी नीतिशाल्न देखकर कहा- माता ! यह तिळ ग्रहण करनेके
योग्य नहीं हैं । इसके धुळे अपने वेधुकोंसे मत प्रहण करो कुछ इसमे कारण
६२३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
होगा इस कारण बिना घुछोंसे यह धुळे बदरूती है?” यह सुनकर उसेने वह
"तिल त्याग दिये । इससे में कहताह-
“नाकस्माच्छाण्डिली मातः विक्रीणाति तिलेस्तिलान् । `
ठुञ्चितानितरेयेन हेतुरच भविष्याति ॥ ८७ ॥”
“हे मातः अकस्मात् ही यह झाण्डिळी घुले तिछोंसे काळे तिळ नहीं ग्रहण
करती है इसमें कोई कारण होगा ॥ ८७ |”
एतदुका स भूयोऽपि प्राह,- अथ ज्ञायते तस्य क्रमण-
जागेर? । तामचड आह,-'भगवन् ! ज्ञायते यत एकाकी न
सन्ञागच्छति।किन्तु अलेख्ययूथपरिवृतः पश्यतो में परिश्रमन्
इतस्ततः सवेजनेन सह आगच्छति थाति च । अभ्यागत
आह,-' अस्ति किचित् खनित्रकम्!” स आह-“बाउम स्ति,
एषा सर्वळोहमयी स्वहरस्तिका”। अभ्यागत आइ)" तहिं
अत्यूष त्वया मयासह स्थातव्यं येन दौ अपि जनचरणमलि-
नायां भूमी तत्पदाचुसारेण गच्छावः” । मया अपि तद्वचनः
माकण्ये चिन्तितम् ।' अहो ! विनष्टोऽस्मि यतोऽस्घ साभिप्रा-
-यवचासि श्रूयन्ते । तूनं यथा निधानं ज्ञातं तथा इर्गमपि
अस्मार्क ज्ञास्यति एतदाभिप्रायादेब ज्ञायते । उक्तंच- |
यह कह कर फिर वह बोंळा,-''उसके निकळनका मागे जाना जाय”? ।
ताम्रचूड बोठा,--“भगवन् | जाना जाता हे कि वह इकला नहीं जाता है |
किन्तु असंख्य यूथप युक्त देखते इए मेरे घूमता हुआ इधर उधर सब जनेंके साथ
आता जाता हे''।अभ्यागत बोछा,- है कोई खोदनेका छुदाऊ[वह बोछा,- हां
है । यह सब छोहमयी खनित्र? | अभ्यागत बोळा,-“'तो सबेरे तुझे मेरे साथ
बहना चाहिये दोनोही उसके जनचरणसे मलीन हुईं भूमिर्मे उनके पदके अनुसरण .
कप्वढें” | भेंनेमी उसके वचन सुनकर विचार किया। “भहो नष्ट हुआ कारण
कि इसके बचन अभिप्राय थुक्त सुत्त जाते हैं | निश्चपही जैसे धन जान लिया
इसी प्रकार हमारे -हुगेकोमी जानढेगा यह इसके अभिप्रायसे बिदित होता
है। कहा है- -
भाषाटीकासमेतम्। (२३९)
सकृदपि दृष्टा पुरुष विबुधा जानन्ति सारतां तस्य |
हस्ततुलयापि निपुणाः पलप्रमाणं विजानन्ति ॥ ८८ ॥
एक चारही पुरुषको देखकर पडित उसकी सारता जानलेते हैं कुश पुरुष
हाधकी तोल्सेही पलके प्रमाणको जान लेते हैं ॥ ८८ ॥
वाञ्छैव सूचयति पूवतर भविष्यं
पुंसां यदन्यतबुजँ त्वशुभं शुभं वा ।
विज्ञायते शिशुरजातकलापचिह्वः
मरत्युहतेरपसरन्सरसः कलापि ॥ ८९॥
ित्तकी इच्छाही पूर्वे भविष्यको सूचित करती हे जो पुरुषने दूसरे शर्रारमें '
झुभ या अशुभ किया है क्यों कि कळाएका चिह विता निकळेसी मोरा बच्चा
चाळसें पहचान लिया जाता हे ॥ ८९ ॥ .
ततोऽहं भयत्रस्तमनाः सपरिवारो दुर्गेमाग परित्यज्य
अत्यमार्गण गन्तु प्रवृत्त। सपरिजनो यावदग्रतो गच्छाः
मि तावत् सम्झुखो बृहत्कायो मार्जारः समायाति ।
स च सूषकदुन्दमवलोक्य तन्मध्ये सहसा उत्पपात ।
अथ ते मूषका मां कुमार्मगानिनमवलोक्य गहयन्ता
दतशेषा रुधिरषात्रितवसुन्धराः तमेव दुर्ग प्रविष्टाः ।
अथवा साधु इद्घुच्यत-
तब में भयसे व्याकुळ मन हुआ परिवारसहित दुर्ग मार्गको छोडकर और
मागेमै जानेको प्रशत हुआ जोर परिजन सहित जब आगे चछा तब तो साम”
नेसे एक बडे शरीराला बिछाव आया । वह सूषकसमूहको देख एक साथ
उनपर टूट पडा | तब घे मूपक मुझ कुमार्गगार्माकों दोष देकर निन्दा करते
मरनेसे बचे रुघिरते गीळी बसुन्धराकों करते उसी दुगेमे प्रविष्ट इए । अथवा
यह सत्य कहा है-
छिस्वा पाशमपास्थ कूटरचनां भडक्ता बलादागुरां
पय्यन्ताग्रिशिखाकलापजटिलान्निगत्य दूर दनात् ।
व्याधानां शरगोचरादपि जवेनोत्पत्य धावन्मृगः
कूपान्तः पतितः करोतु बिधुरे किया दिध पॉरुषम्९०ा
(२४०) पञ्चतन्त्रम्।
पाश छेदन कर कूट ( कपट ) रचनाको त्याग बळसे बन्धनशत्तिको तोड
निकट चारों ओर अमिशिखाके समूहसे युक्त वनसे दूर जाकर तथा व्याधोके
बाणके अगोचर होकरभी दौडता मृग कूपमें गिरगया विधाताके रुष्ट होनेगें
पुरुषार्थ क्या कर सकता है || ९० |
अथ अहमेकोऽन्यन्न गतः शेषा मूढतया तत्रैव दुर्गे
आविष्टा; । अत्रान्तरे स दष्टपरित्राजको रुधिरबिन्द्चचितां
भूमिमवलोक्य तेनेव इुर्गमार्गण आगत्य उपस्थित: । ततश्च
स्वहस्तिकया खनितुमारब्धः । अथ तेन खनता प्राप्त तन्नि-
धानं यस्य उपारे सदा एवाहं कृतवसतिः यस्य उष्मणा महा"
दुर्गमपि गच्छामि) ततो हृष्टमनाः तास्रचूडमिदमूचेऽभ्यागतः
“मो भगवन् ! इदानी स्वापिहि 'निःशङ्कः अस्य उष्मणा
मूषकस्ते जागरणं सम्पादयाति ” एवसुक्ता निधानमादाय
मठाभिसुखं प्रस्थितो दो अपि । अहमपि यावत् निधानर-
हितं स्थानमागच्छामे तावत् अरमणीयसुद्ेगकारकं तत्
स्थानं बीक्षिठुमपि न शक्नोमि आचिन्तयं च । “किं करो-
ममे! क गच्छामि ! कथं में स्यात् मनसः प्रशान्तिः? एबं
चिन्तयतो महाकष्टेन स दिबसो व्यतिक्रान्तः । अथ अस्तः
मितेऽके सोद्रिगो निरुत्साहस्तस्मिन् मठे सपरिवार? प्रविष्ट!
अथ अस्मत् परिअहशब्दमाकण्य तास्रचूडोऽपि भूयो
भिक्षापात्रं जजेरवेशेन ताडयितुं प्रवृत्तः । अथ असो अभ्या-
गतः घाह-''सखे ! किम् अद्यापि निःशङ्को न निद्रां गच्छः
सि” । स आह,- भगवन् ! भूयोऽपि समायातः सपरिवारः
स दुष्टात्मा मूषकः । तद्भयात् जजरवंशन भिक्षापात्रं ताड"
यामि” । ततो विहस्य अभ्यागतः प्राह- 'सखे ! मा भैषीः ।
वित्तेन सह गतोऽस्य कूर्दनोत्साइः । स्वेषामपि जन्तूनाम्!
इयमेव स्थितिः । उक्तव्व-
सो में इकछाही अन्यत्र गया शेष मूढतासे उसी दुर्गमें प्रविष्ट हुए ।
इससिमय वह दुष्ट पारत्राजक राभिरकी वूंदोसे चार्चत पृथ्वीको देख उसी दुग”
भाषाटीकासमेतम् । (२४१)
मार्गेसे आकर उपस्थित हुआ । भोर फिर अपने हाथसे खोदना प्रारंभ किया ।
तव खोदते इए उसने वह निधि पाई जिसके ऊपर में भहंकारसे निवास करता
"था, जिसकी गरमीसे महादुर्गकोमी जा सक्ता था । तव प्रसन्न होकर ताम्रचूडसे
अभ्यागत बोळा,-*'भो भगवन् ! भव विश्यक रायन करो) इसकी गरमीसे यह
मूषक आपको जगाताहे' । यह कह दोनो धनको ले मठकी ओरको चळे और
सेंमी जवतक निधान रहित स्थानको प्राप्त होताहू तवतक भशोमित उद्देगकारक
उस स्थानको देखनेमें भी समर्थ न होकर विचारते छगा' क्या करू कहा
जाऊ केसे मेरे मनकी शान्ति हो ? 7] इस प्रकार महाकष्टसे बह दिन वाता ।
फिर सूर्यके अस्तम उद्देगसे उत्साहहीन होकर उस मठमें परिवारसहित प्रविष्ट
हुआ तव हमारे पारवारके शब्दको सुनकर ताम्रचूड फिरमी मिक्षापात्रको जजेर
वाससे ताडन करने लगा | तब यह अभ्यागत बोछा-“सखे ! क्यों अब भी
निशशंक होकर नहीं सोता है ? ? | बह वोळा-''सगवन् ! फिर सी आया वह
दुष्टात्मा मूरक पारेवार सीदित | उसके भयले जमेर वाशमे मिक्षापात्रका ताडन
करता हू"? । तइ हसकर अभ्यागत बोळा,~"सखे ! मत्त डर धनके सहितही
इसके कूदेनका उत्साह नष्ट हुआ है सब जन्तुओकी यही स्थितिहे, कहाहे. ।
यहुत्ताही सदा मत्यः पराभवति यञ्ञनान्।
यदुद्धतं बदेद्राक्थ तत्सवं वित्तजे बलम् ॥ ९१॥
जो प्रनुष्य सदा उच्साही हे भौर मनुरष्योको परामब करता है जो उद्दत
वाक्य कहता हे वह सब धनका उत्पन्न हुआ बळ जानो | ९१ |
- अथ अहं तत श्रृत्वा कोपाविष्टो भिक्षापात्र दिश्य विशे"
षाइुत्कू्दितोऽप्राप्त एब भूमो निपतितः । लत श्चुता
अली मे शद्चार्विहस्य तामदूडभुवाच-'' भोः पश्य पश्य
कोतूहलम् ” । आह च-
तब में यह सुन क्रोधित हो ,मिक्षापात्रकी ओरको विशेष कूदने ल्मा
पर वहा न पहुंचकर भूमिमें शिरा यह सुच यह मेरा झु हसकर ताम्रचूड-
से बोछा-* मो ! देखो २ कुतूहुल- “बोळा मी-
१६ i
(२४२) पञ्चतन्त्रम् ।
, अर्थेन बळवान्सवों अर्थयुक्तः स पण्डितः ।
पश्येनं मूषकं व्यर्थ स्वजातेः समतां गतम् ॥ ९२॥
घनसे ही सब बळ्यान् हैं धनवान् ही पंडित हें भब इस व्यर्थ पुरुषार्ध
सूषक्रा अपना जातिम समान हुआ देखो ॥ ९९ ॥
तत स्वापाहे त्व गतशकः । थदस्घ उत्पतनकारण तत
आवयांहस्तगत जातम् । अथवा साघु चंदमुच्यतं-
सो तुम निएशक होकर शयन करो । जो इसके कूदनेका कारण था सो
हमारे हाथमें प्राप्त हुआ है । अथवा यह अच्छा कहा हे-
दष्टाविराहुतः सपा मदहीनो यथा गज; ।
तथाथन बिहानोऽत्र पुरुषो नामधारकः ॥ ९३ ॥'?
डाहरहित सर्प मदहीन जेसे हाथी इस प्रकार घनके विना पुरुष नाम-
मात्रकाहे ॥ ९३ |?
तत् श्रत्वा अह मनस्तां "वाचान्ततवान् | यताऽइ्शुः
लिमात्रमपि कूदनराक्तिनास्ति तत् पिरू अथहीनस्य पुरु-
षस्य जीवितम् । उक्त
यह छुनक्र म मनम [कचारत लगा कि अब्र ता भगुाठमात्र भा कृरनका
शक्ति नहीं हे सो अर्थहीन पुरुषके जीवनको धिक्कार हे । कहाहे-
अथन च बहांनस्य पुरुषस्याहपमघस
उच्छिद्यन्ते क्रियाः सवो ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ ९४॥
अर्थते हीन अप्पबुद्धिमान् पुरुषकी सब क्रिया ऐसे नष्ट होजाती हैं जैसे `
ग्रीभमें कुनदी ॥ ९४ ||
यथा काकयवाः पोक्ता यथारण्यभवास्तिलाः ।
नाममाचा न सिद्धौ हि धनहीनास्तथा नराः॥ ९५ ॥
' जैसे काक यव और जेते बनके तिळ नाममात्र हैं उनसे कुछ सिद्धे नहीं
इसी प्रकार घनहीन मनुष्य हैं ॥ ९५॥
` सन्तोऽपि न हि राजन्ते दरिद्रस्येतरे गणाः
आदित्य इव भूतानां औीरुणानां प्रकाशिनी ॥ ९६ ॥
दरिदके दूसरे गुण हों तो -भी उनकी शोभा नहीं होती जेते सूर्यसे पदा-
थोंका प्रकाश होता है इसी प्रकार लक्ष्मी गुणोका प्रकाश करती है ॥ ९६ ॥
|]
माषाटीकासमेतम ! (२४३ )
न तथा बाध्यते लोके प्रकृत्या निर्धनो जनः ।
यथा द्रव्याणि संप्राप्य तोर्विहीनः सुखे स्थितः ॥ ९७ ॥
प्रकतिसे निषेध मनुष्य इस प्रकार नहीं क्ेसित होता है जैसे द्रव्यको प्राप्त
होकर फिर उसके बिना दुःखमें स्थित होता है॥ ९७ ॥
शुष्कस्य कीटखातस्य वह्विदगधस्य सर्वेतः ।
तरोरप्यूषरस्थस्य वरं जन्म न चार्थिनः ॥ ९८ ॥
सूले कीडके खाये इए सब प्रकार भमिमे जले ऊषरमें स्थित वृक्षका भी
जन्म सफळ है भिक्षुका नहीं ॥ ९८ ॥
शङ्कनीया हि सर्वत्र निप्प्तापा दरिद्रता ।
उपकत्तुमषि भ्रात निःस्वं सन्त्यज्य गच्छति ॥ ९९ ॥
प्रतापहीन दरिइतासे सदा शका करनी चाहिये, उपकार करनेको प्रतत,
हुआ भी निर्धन जनको छोडकर चछा जाता हे ॥ ९९ |)
उन्नम्योन्नम्य त्रैव निर्धनानां मनोरथाः ।
हद्येष्वेव लीयन्ते विधवासतरीस्तनाबिव ॥ १०० ॥
निर्षेनी पुरुषोंके मनोरथ उठ उठकर वदी ळय हो जाते हैं, अर्थात् विध-
बाके कुचोकी समान मनोरथ मनमेंही छीन हो जाते हैं ॥ १०० ॥
व्यक्तेषपि वासरे नित्यं दोरगेत्पतमसावृतः ।
- अम्रतोऽपि स्थितो यत्नाच केनापीह इश्यते॥ १०१ ॥”
प्रगट दिनर्मेभी नित्ही दुर्गेतिरूपी भधकारसे आर्त इभा, आगे स्थित
इआभी किंसीको दिखाई नहीं देता | १०१ |”
एव Iवळप्य अह भग्नोत्साहस्तन्निधानं गण्डापधानाकुल
दृष्टा स्व दुग प्रभाते गत; । ततश्च मदभ्हृत्याः प्रभाते गच्छन्तो
भियो जल्पन्ति-/अहो ! असमथोँऽयुदर पूरणेऽस्माकम् ।
केवलमस्य पृष्ठलय़ानां बिडालादिविपत्तयः तत् किमनेन
आराधतेन । उक्तश्च- ,.
इस प्रकारसे विळापकर में मग्रोत्साह होकर उतत धनको केके नीचे धरा
देखकर प्रभात समय अपने दुर्गम गया, तब मेरे मृत्य प्रातःकाल जाते हुए
परस्पर कहने छगे--/अहो! यह हमारे उदरपू्ण करनेंगे भसमर्थ - हे ओर अब
(२४४ ) पश्वतन्चस् ।
कती के
- इसके पीछे चढनेसे बिडालादिकी निपाति होती हे सो अब इसको-आराधनासे
क्या है । कहा है- *
यत्सकाशात्र लाभः स्यात्केबलाः स्युविपत्तयः ।
स स्वामी दूरतस्त्याज्यो विशेषादनुजीविभिः ॥ १०२ ॥?
जिसके निकट रहनेसे छाम न हो केवळ विपचिही हों वह स्वामी दुरसेही
त्यागने योग्य है विशेष करके भनुर्जीवियोंकोमी त्यागने वोग्य है ॥ १०२ ॥७”
एवं तेषां वचांसि श्रत्वा स्वदुर्ग माबिष्टोऽहम् । यावन्न
कश्चित् मम सन्सुख अभ्येति तावत मया चिन्तितम्
“घिगिय दारिद्रता । अथवा साधु इद्सुच्यते-
तब उनके वचन सुनकर में अपने दुर्गेनें प्रविष्ट हुआ । जब कोई मेरे सन्मुख
न प्रा हुआ तब में विचारने लगा, “इस दारद्रताको धिक्कार हे | अथवा यह
अच्छा कहाह-
मतो दारिद्रः पुरुषो मृतं मेथनमप्रजम् ।
मृतमश्रोत्रियं शराद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिणः ॥ १०३ ॥ -
दारिद्रपुरुष मृतकहै सन्तान नहो ऐसा मेथुन (ल्लीपुरुप समागम) मृतकहदै वेदके
विना पढे ब्राह्मणका श्राद्ध कराया मृतवतूहे विनादक्षिणाकाक्रश मृतकहे ॥१०३॥
एवं मे चिन्तयतः ते भृत्या मम शात्रूणां सेवका जा“
ताः ते च मामेकाकिनं इष्टा विडम्बनां छुवन्ति,। अथ ”
मया एकाकिना योगनिन्द्रां गतेन भूयो विचिन्तितम् ।
४ यत् तस्य कुतपस्विनः समाश्रयं गत्वा तदृण्डोपधानव-
तिंकृतां वित्तपेटां शनेः शनेः विदाथ तस्य निद्रावशं
गतस्घ स्वडुर्गे तद्वित्तं आनयामि. थेन भूयोऽपि मे विः
तभ्रभोवेण आधिपत्य पूइवद्भाविष्यति । उक्तश्च-
इस प्रकार मेरे विचार करनेपर वे मेरे सेवक रात्रुसेबक होगये । बे सका
इकळा देखकर विडम्बना. करच छग त ]फेर एक समय मुझ इकर यागानेद्रका
प्राप्तहुए मैंने विचार किया कि, उस कुतपस्वीके आश्रुयको प्राक्त होकर उसके
तकियेमें छप्रेटी हुई वित्तपेटिकाको शनैः २ विदीर्ण करके उसको निद्राम प्राप्त
माषाटीकासमेतम्। (२४५)
2. LA
इएपर अपने दुर्गगे उसके घनकों के आऊ जिससे फिरभी मेरे धनके प्रमावसे
पूर्ववत् आधिपत्य हो जायगा, कहादे कि-
व्यथयन्ति परं चेतो मनोरथशतेर्जनाः । -
नाउड्ानेर्घनेहीनाः कुलजा विधवा इव ॥ १०४॥
सैंकडो मनुष्य मनोरथोंसे चित्तको व्यथित करते हैं, परन्तु धनहीनोके
अनुष्ठान नहीं होतेई जेते अच्छे कुछमें उत्पन्न हुई विबवा | १०४ ॥
दोभत्यं देहिनां दःखमपमानकरं परम् ।
चेन स्वेरपि मन्यन्ते जीवन्तोऽपि मृता इव ॥ १०५ ॥
दुर्गतिही देहवारियोंका परम दु ख ओर परम अपमान करनेचाळीहै जिसके
कारण जाते इएही उसको बन्धु मृतघत् मानते हैं ॥ १०५ ॥
देन्यस्फ पात्रतामोति पराभूतिः परं पदञ्च ।
विपदामाश्रयः शश्वदोर्गत्यकङ्षीकृतः ॥ १०६ ॥
दुर्गेतिस प्राप्त हुआ मनुष्य पराभवके स्थान और विपत्तिके परम आश्रयको
निरन्तर प्राप्त होताहै॥ १०६ ॥
लजम्ते बान्धवास्तेन सम्बन्ध गोपयन्ति च ।
मित्राण्यानित्रता यान्ति यस्य न स्युः कपदेका। ॥ १०७॥
उससे बाध्रव ळाजित होतेहे तथा उससे अपने सम्बन्धको छुपातेहे बहुत
क्या उसके मित्र भमित्र होजातेहें जिसके पास कोडी नहीं होतीदे | १०७॥
मूर्ते लाघवमेवेतदपायानामिदं गहम्।
पस्यायो मरणस्यायं निर्धनत्वं शरीरिणाम् ॥ १०८ ॥
दारिदकी यही मुर्ति, विपत्तियोंका यही घर है, यही मरणका दूसरा प्योयहै,
जो शर्रारधारेयॉका निर्धवताहे ॥ १०८ ॥
अजाधूलिरिव नस्तेर्माजनीरेशुवज्नेः ।
दीपखश्योतछायव त्यज्यते निर्धनो जनेः ॥ १०९ ॥
, बकरीकी शारकी समान घबराये इए तथा घुहाराकी घूरिकी समान दीष
और पटत्रीजनेकी छायाकी समान दारद्रको सब कोई त्याग देतेई ॥ १०९ |
शोचावशिष्टयाप्यास्ति किवित्काय्थे कचिन्मृदा ।
निर्धनेन जनेनेव न तु किश्चित्रयोजनम ॥ ११० ॥
(२४६ )' पञ्चतन्त्रम् ।' `
- शौचसे अधशेष रद्दी यृन्तिकासेभी'कुछ कार्य सिद्ध हो सकताहै, परन्तु निर्धन
मनुष्य किसी कामका नहीं होता ॥ ११०॥
अधनो दातुकामो5पि संप्राप्तो धनिनां गृहम । -
मन्यते याचचकोड्यं धिग्दारिद्र्यं खळ देहिनाम् ॥ १११ ॥
अधन (दारद्री) देनेकी इच्छा करके घियोंके घरमें आवे तोमी वह उतफो
याचकही मानते हैं देहघारियोकी अवित्तताको धिक्कारहै ॥ १११ ॥
अतो वित्तापद्दारं विद्धतो यदि मे मृत्युः स्यात् तथापि
शोभनस्। उक्तत्व-
` यदि चौर्य्य कर्म करते मेरी मृत्यु हो जाय तोमी अच्छाहै । कहाहै-
स्ववित्तहरणं दृष्टा यो हि रक्षत्यसून्नरः ।
बितरोऽपि न गृहस्ति तइत्तं सलिलाअलिम् ॥ ११२॥
जो अपने धनको हरण होता देखकर प्राणोंकी रक्षा करताहे उसकी दीहुई
अंजाछिको पितर ग्रहण नहीं करते हैं॥ ११२ ॥
तथाच-
~
तसहा~
गवार्थे ब्राह्मणार्थं च स्तरीवित्तहरणे तथा |
आणाँस्त्यजति यी युद्धे तस्थ लोकाः सनातनाः ॥११३॥”
गो, ब्राह्मण, स्री तथा घनके हरण करनेमे और युद्धे ओ मनुष्य प्राणों-
को त्यागता है उसको सनातन लोक प्राप्त होते हे ॥ ११३” |
एवं निश्चित्य रात्रौ तन्न गत्वा निद्रावशं उपागतस्य पेटायां
मया छिद्रं कुलं यावत् तावत प्रबद्धी दुष्टतापसः ततश्च
ज्जररवंशप्रहारेण शिरसि ताडितः कथञ्चित् आयुःशेषतया
निर्गतों$हं न मृतश्च । उक्तंच- ,
यह विचार रात्रिमें उत्त स्थानमै जाकर ज्योहीं मैने उस गठरीम छिद्र किया
~ टन
त्योही चह दुष्टात्मा जाग उठा और उस जजेर वंशसे मेरे शिरसे प्रहार किया
किसी प्रकार आयुके शेष होनेसे निकळगया मरा नहीं | कहा है- |
-आप्तव्यमर्थ लभते मतुष्यो |
देवोऽपि तं ' लंघयिठुं न शक्तः ।
3
आषाटीकासमेतम् । (२४७)
तस्मान्न शोचामि न विस्मधो में
यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ॥ ११४॥
प्राप्त होने योग्य घनकोही मनुष्य प्राप्त होताहै देवभी उसको छंघन करनेको
समर्थ नही है इस कारण न में शोच करताहू न मुझे विस्मय हे कारण कि, जो
हमारा हे वह दूसरोंका नहीं हे॥ ११४ |!
काककूर्मों प्रच्छत+-“कथमेतत् |” हिरण्यक आह-
काक कूर्म बोले,-यह कैसे ”” बह हिरण्यक बोळा-
कथा ४.
अस्ति कस्मिश्विन्नगरे सागरदत्तो नाम वाणिक,तस्सूतुना
रूपकशतेन विक्रीयमाणः पुस्तको गृहीतः । तस्मिश्च लि-
खितमस्ति । र
किसी नगरमें सागरदत्त नामक एक वणिक् रहताथा इसके पुत्रने सौ रुपयेमे
बिकती हुईं एक पुस्तक खरीदी । उसमे छिखाथा-
पात्तव्यमथ लभते मनुष्यो
देवोऽपि तं लंघयितुं न शक्तः ।
तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे -
यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ॥ ११५ ॥
प्राप्त होनेयोग्य अर्थकोही मनुष्य ढता है उसको उल्लघन करनेको देवभी
समर्थ नहीं है इस कारण न में शोच करता हू न मुझको विस्मय है जो हमारा है
वह दूतरोका नहँ ॥ ११५९ |
तहृष्ठा सागरदत्तेन तनुजः पृष्टः,“ “पुत्र ! कियता मूल्येन
एष पुस्तको ग्रहीतः!'' सोऽब्रवीव,-' रूपकदातेन” । तच्छु-
त्वा सागरदत्तोऽब्रवीत,- धिक् मूर्ख ! त्वे लिखितेकक्गोकं
रूपकशतेन यदगुहासि एतया ब॒द्धचा कथं द्रव्योपाजनं करि-
ष्घसि | तत् अद्य प्रभ्टृति त्वया मे शृहे न भ्रवेष्टऽ्यम्” । एवं
निर्मेत्ह्थ गहात् निःसारितः! स च तेन निर्वेदेन विप्रकृष्ट
देशान्तरं गत्वा किमपि नगरमासादय अवस्थितः । अथ कति-
पयादिवसेः तन्नगरनिवासिना केनचिदसो ५ष्टः+- “कुत्तो भवा-
(२४८) पञ्चतन्त्रस् । ,
नागतः कि नामघेयो वा! इते । असावबबीत्,- प्राप्तव्य-
म+ लभते मनुष्यः?! अथ अन्येनापि पृष्टेन अनेन तथा एव
उत्तरें दत्तम् । एवं च नगरस्य मध्ये प्राप्तव्यमर्थ इति तस्य `
प्रसिद्धं नाम जातम् । अथ राजकन्या चन्द्रवती नाम
अभिनवरूपयोवनसम्पन्ना सखीद्वितीया एकस्मिन् महो-
त्सवादिवसे- नगरं निरीक्षमाणा अस्ति । तत्र एव च
कश्चिद्राजपुत्रोऽतीवरूपसम्पन्रो मनोरमश्च कथमपि तस्या
इष्टिगोचरे गतः । तदशेनसमकालमेव कुसुमवाणाहतया
तथा निञसखी अभिहिता,-''सखि | यथा केल
अनेन सह समागमो भवति, तथा अद्य त्वया यतितव्यम् ।
एवश्च श्रुत्वा सा सखी तत्सकारां गत्वा शीत्रमत्रवीत-यदह
चन्द्रवत्था तवान्तिकं प्रेषिता, भणितञ्च त्वां प्रति तया;
यन्मम त्वदशेनाव मनोभवेन पश्चिमावस्था कृता । तद्यदि
शीघ्रमेव मदान्तिके न समेष्यसि तदा मे मरणं शरणम्? ।
इत्नि श्रुत्वा तेन अभिहितम्- यदि अवश्यं मया तत्र आगः
न्तव्षं तत्कथय केन उपायेन प्रबेष्टव्यम्''। अथ सख्याभिः
हितम,- रातों सोधावलळम्बितया हृटवरत्रया त्वया तत्रा-
रोठव्यम्' । सोऽब्रवीत,~ “यादि एवं निश्चयो भवत्याः तदः
y
हमव करिष्यामि’? इति निश्चित्य सखी चन्द्रवत्तीसकाशं
गता । अथ आगतायां रजन्यां स राजपुत्रः स्वचेतसा व्य-
चिन्तयत् “अहो ! महुदक्ृत्यमेत्तत् । उक्तश्च-
यह देख सागरदत्तने पुत्रस पूछा,-“पुत्र ! कितने मूल्यर्मे यह पुस्तक तुमने
खरीदी” | षहू बोळा-'' सौ. १०० रुपयेमें” | यह सुनकर सागरदत्त बोला,-
“धिक् मुखे | जो तेने लिखे हुए एक छोकको सौ रुपयेमे खरीदा इस बुद्धिसे किस
प्रकार घन उपार्जन करेगा, सो आजसे तुम हमारे घरमै प्रवेश न करना” । इस
प्रकार घुडर्ककर घरसे निकाल .दिया । वह उससे दुःखी हो दूर देशान्तरे
जाकर स्थित हुआ, तब कितने एक दिनोमें बहांके निवासियोंने पूछा,- आप
कहांसे आये हो आपका वाम क्या है (” इस प्रकार यह बोला, मनुष्य प्राप्त होने-
भाघाटीकासमेतम् । (२४९)
[9
योग्य अर्थको प्राप्त होता है” इत्यादि । फिर औरभी किंसीके पूछनेपर उसने
यही कहा । इस प्रकार नगरमे उसका नाम प्राप्तव्यमर्य हुमा । तब राजकन्या
` चन्द्रवतीवाम नये रूपयोबनसे सम्पन्न दूसरी सखीको साथ ळिये एक महो-
त्सवके दिनम नारको देखती इई आई, वहाही कोई राजपुत्र अत्यन्त रूप-
सम्पन्न मनोहर किप्तीप्रका। उसके दृष्टिगोचर हुआ, उसके दशेनकरतेही कुछुम-
चाणसे हत हुई उसने अपनी सखीसे कहा-“सखि । जवश्यही जिसप्रकार इससे
समागम होजाय ऐसा तुम क्ल करो” | यह सुन वह सखी उसके पास जाकर
शीघ्र बोली- मुझे चद्रवतीने तुम्हारे पास भेजाहे और उसने तुमसे कहा
कि, तुम्हारे दर्शनसेही कामदेवने मेरी मृथ्युदशा करदी सो यदि शीमही
हमारे निकट न जाओगे तो में मरणको शरणछूगी,” यह सुनकर उसने कहा-
“यदि अवशय में बहा भाऊ तो बताओ किस उपायसे आऊ” | तव सखीने
कहा-“रात्रिमें महळपरसे लम्बायमान कठिन रस्सीके सहारे तुम यहा चढि
आवा? | वह बाठा," जो तुम्हारा यह निश्चय हें तो मं यही करूगा,?
ऐसा निश्चयकर सखी चन्दावतीके समीप गई। तव रात होनेपर बह राजपुत्र
अपने मनमें विचारने छ्या ! “अहो यह बडा कुकर्म है। कहाहै-- हि
गुरोः सुतां मित्रभाय्यां स्वामिसेवकर्गोहिनीम ।
यो गच्छति पुमाछोके तमाहुव्रेझ्घघातिनम् ॥ ११६ ॥
युरक्न्या, मित्रको भार्या, स्वापि सेवककी छी इनसे जो पुरुष ससारसे गमन
करता है उसे ब्रह्मघाती कहतहे ॥ ११६ ॥
अपरश्व-
औरभी--
अयशः प्राप्यते येन येन चापगतिभवेत् ।
स्वगोच्च भ्रश्यते येन तत्कम्म न समाचरेत् ॥ ११७ ॥?!)
जिससे अयशहों जितकमेसे दुर्गतिहो जिसकर्ससे खर्गसे अष्टदो वह
के नकरे॥ ११७ |? '
डति सम्यग्विचार्य तत्सकाशं न जगाम । अथ आए
व्यमर्थः पर्य्यटन् धवलगहपार्श्वे राचावलम्वितवरां दृष्टा
कोलुकाविष्टहद्यः तामालम्ब्य अधिरूटः | तया च राज-
(२५०) पश्चतन्त्रम् ।
पुळ्या स एवायमिति आश्वस्तचित्तया छानखादनपानाच्छा-
दनादिना सम्मान्य तेन सद् श्यनतलमाश्ितया तढङ्गसं-.
स्पश त्ातहषरोमाश्चितगात्रया उक्तम्.- युष्मदशनमात्रा्चर-
क्त्या मया आत्मा शरदत्तो5षम् । त्वद्ज अन्यो भत्ता मनासे
अपि मे न भविष्यतीति । तत् वस्मात् मया सह नज-
बीषि”। सो ब्बीत-“ आप्तव्यमर्थ लभते मनुष्यः?। इत्युक्तेतयाऽ-
न्योऽयमिति मत्वा घवलगहादुत्ताय्ये मुक्त: । स तु खण्डदेवकुले
गत्वा सुप्त । अथ तच कयाचित् स्वेरिण्या इततसंडेतको यावत्
दण्डपाशकः म्रातरतावदसो पूर्वतः तेन दष्टो रहस्यसंरक्षणा-
र्थमनिद्दितश्व- को भवान् ९” सोऽब्रवीत्, प्राप्तव्यमर्थ
लभते मछष्यः” । इति खुत्वा दण्डपाशकेन अभिहितम्,-
यच्छून्यं, देवगहमिद्म । तदत्र मदीयस्थाने गत्वा स्वपि-
हि” तथा प्रतिपद्य स मत्तिविपय्योौसाव् अन्यशयने सुन्तः ।
अथ तस्थ रक्षकस्य कन्या नियमबती नाम रूपयौबनस-
म्पन्ना कस्यापि पुरुषस्य अतुरक्ता सङ्केतं दत्वा तत्र शायने
सुत्तासीत्। अथ सा तमायातं दृष्टा स एव अघमर्मद्लम
इति रात्रो घनतरान्धकारव्यामोदिता उत्थाय भोजनाच्छा-
दनादिक्रियां कारयित्वा गान्धर्वविवाहेन आत्मानं विवाह-
यित्वा तेन सम॑ शयने स्थिता बिकसितवदनकमला
तमाह,-““किमद्यापि मया सह बिश्नन्धं भवान् न ब्रवीति”
सोऽत्रवीत,-' प्राप्तव्यमथ लभते मनुष्यः’? इति श्रृत्वा तया
चिन्तितम्, यत्काय्थमसमीक्षितं ्रिघते तस्य इंदक्फलबि-
पाको भवति” हाते । एवं विमुश्य'सविषादया तया निशसा
रितोऽसो । स च यावद्वीथीमागेंण गच्छति तावद्न्यविषय-
बासी वरकीतिनाम वरो महता वाद्यशब्देन आगच्छति ।
आत्तव्यमर्थोऽपि तेः समं गन्तुमारव्धः । अथ यावत्मत्यासन्ने
समये राजमागासन्नश्रेष्ठिगुहद्वारे रचितमण्डपवेदिकाया
कृतकातुकमड़लवेशा बणिकूछुता अस्ति तावत् मदमत्तो
भाषाटीकासमेतम । (२५१)
इस्तो आरोहकं इत्वा प्रणश्यजनकोंलाहलेन लोकमाकुल-
यन् तमेव उदेशं भाक्तः । तं च हृष्ठा सर्वे वरालुयायिनो वरेण
' सह प्रणश्य दिशो जग्मुः | अथ अस्मिन्नवसरे भयतरललो-
चनामेकाकिनी कन्यामवलोक्य “मा मेषीरहं परित्राता”
इति सुधीर स्थिरीकृत्य दक्षिणपाणो संगृह्य महासाहासिक-
तथा प्रातव्यमधः परुषवाक्येः हस्तिनं निर्भत्सितबान् ।
ततः कथमपि देवयोगादपयाते हस्तिनि ससुहट्रान्धवेन
_ अतिक्रान्तलग्रसमथे वरकीत्तिना आगत्य तावत् तां कन्याः
मन्यहरुतगतां दष्ठा अमिहितम्-' “भोः चघुर ! विरुद्धमिदं
त्वया अनुष्ठितं यन्मह्यं धदाय कन्यामन्यर्मे पदत्ता? इाति।
सोऽत्रवीत,-' भो ! अहमपि हस्तिभयपलायितो भवद्भिः
सह आयातो न जाने किभिदं वृत्तम्” । इति अभिधा
ढुहितर भष्टुमारव्धः, “वत्से ! न त्वया सुन्दर कुतम् ।
तत्कश्धतां कोऽयं वृत्तान्तः !? साऽब्रवीत्, “यदहमनेन
घाणसंशयात् राक्षिता तदा एनं मुक्का मम जीवन्त्या नान्या
पाणि ग्रहीष्यति” हाते । अनेन दार्त्ताव्यतिकरेण रजनी
व्युष्टा । अथ प्रातस्तत्र सञ्जाते महाजनसमवाये बात्ताव्य-
तिकरं श्रत्वा राजइहिता तझुंदेशमागता। कर्णपरम्परया
शरुत्वा दण्डपाशकसुतापि तत्रेव आगता । अथ तं महाजन-
समवायं श्रृत्वा राजा अपि तत्रेव आजगामाघाप्तव्यमर्थ प्राह-
“मो ! विश्रब्धं कथय, कीइशोऽसौ बृत्तान्तः,'' अथ सोएत-
बीत,- आत्व्यमर्थ लभते मङुष्यः? इति । राजकन्या स्मृत्वा
आह,- देवोऽपि तं लंघयिलुं न शक्तः? । ततो दण्डपाशक-
"सुता अत्रवीत्,- “तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे” इति ।
` तमखिललोकड़त्तान्तिमाकण्यं वणिकदछुताधबवीत,- यिद्-
, स्मदीर्यं न हि तत्परेषाम्? इति । अभयदान दत्वा राज्ञा
_ पृथक् इृथग् वत्तान्तान ज्ञात्वा अवगततत््वः तस्मे प्राप्तव्यम-
' थाय स्वदुहितरं सबहुमानं ्रामसहस्रेण समं सर्वाले-
(२९२) पञ्चतन्त्रम् ।
-कारपरिदारयुतां दत्त्वा त्वं मे पुत्रोऽसीति नगरविदितं
त यावराज्यशभाषक्तवाच । दण्डपाशकेनाप स्वढाहता
स्वशक्त्या वस्त्रदानादना सम्भाव्य प्रातव्यमथाय प्रदत्ता ।
अथ आातव्यमथनाप स्वायापतमातरा समस्तङुट्म्वावृत्ता
तस्मिन्नगरे सम्मानपुरःसरं समानीतो । अथ सोऽपि स्वगो-
त्रेण सह बिविधभोगाठुपशुञ्जानः सुखेन अवस्थित अतोऽ-
त्रवी!मि-
यह विचारकर उसके पास न गया, उस समय बह ( प्रासव्यमर्थवाळा )
घूमता हुआ श्वेत घरके निकट रात्रिमे ढम्बायमान रस्सी ( कमन्द ) को देख-
कर कोतुकयुक्त हृदयस उसको पकडकर गया । उस राजपुत्रीने यह वहीहे इस
प्रकार जान सम्तुष्टचित्तसे ज्ञान भोजन पानाच्छादनादिसे सन्मान किया उसके
संग झाय्यामें सोती हुई उसके भंगस्पर्शसे प्राप्त इए हसे रोमांचित शरीर हो
उतने कहा-“ तुम्हारे दशनमात्रसे अनुरक्त हुई मैंने अपना आत्मा तुमको दिया.
तुमको छोडकर और स्वामी स्पप्नममी मेरे न होगा, सो मेरे साथ आछाप कया
नहीं करते” | वह बोळा,-“मनुष्य प्राप्त होनेयोग्य भर्थकोह प्राप्त होताहे? ।
एसा कहनेपर यह और हे ऐसा उसने विचार अपने धबळगृहसे उतारकर छोड-
“दिया, वह किसी टूटे देवमंदिरमें जाकर सो गया । तब वहां किसा ङुछटाका
संकेत किया हुआ जवतक नगररक्षक प्राप्त हुआ, उससे पहलेही यह सोगयाधा
उसने देखकर इस गुप्तमेद छिपानेके लिये पूछा,-'आप कौनहे ” । बह वोला “
“मनुष्य प्राप्त होने याग्यहो अथका प्राप्त होताह! | यह सुनकर वह दण्डपादाक
बोछा-“यह देवगृह झन्यहै । सो मेरे स्थानमै जाकर सोरह” | “बहुत अच्छा
ऐसा कह बुद्धिको विपरीततासे भन्य स्थानर्मे सोगया, उस रक्षककी कन्या नियम-
चती नामवाली रूपयावनसे सम्पन्न किप्ती पुरुषमें अनुरक्त हुई संकेत देकर उस
स्थानों सोगईथा तब यह उसको आया देख यही मेरा प्रियह ऐसा रारत्रीके घने
अंधकारस मोहित इई उठकर भोजनाच्छादे क्रियाको कराकर गान्चर्वरीतित
अपना विवाहकर उसके संग शयने स्थित हुदै खिळे सुखकमळ्से उससे बोडी
+अबभी क्यों निडर होकर तुम मुझसे नहीं बोल्ते!! | बह बोका-* मनुष्य प्रा
-व्य अर्थको प्राप्त होताहै” | यह सुन उसने विचार किया, “जो बिना विचार
गा
भाषारीकासमेतम्। (२५३ )
कार्थ किया जाताहै उसका ऐसाही फळ होताहे” । यह बिचार दुःखी हो उसने
इसे निकाल दिया, सो वह जबतक मागमे जाता हे तबतक वरकीतिनाम वर
और देशका रहनेवाळा बडे बाजे गाजेसे आया । प्रापतव्यमर्थमी उनके साथ जाने,
छा, सो जबतक लप्नसमय प्राप्त हो कि, राजमागेमे स्थित श्रेष्ठीके ग्रहढोरमे
कि, जहा रत्नमण्डपकी वेदीमें विवाहके निमित्त मगळका वेश किया बणिकू पुत्री
स्थित थी, तबतक मदमत्त हाथी आरोहकको मारकर नष्ट होते जनोके कोडाहल-
के साथ टोकको व्याकुळ करता हुआ उसी स्थानमे प्राप्त हुआ। उसको दखकर
सब वराती वरक सग प्रनष्ट होते दिशाओमे गये | उसी समय भयसे चचळ नेत्र-
वाली इकळी कन्याको देखकर 'मतडरो भै रक्षक” इस प्रकार घारतापूैक
निश्चय करके दक्षिण हाथ पकडकर महा साहसपनसे प्राप्तव्यमर्थ कठोर बाक्यांते
हार्थीको घुडकता इभा, तब किसी प्रकारसे देवयोगसे हाथीके हट जानेसे छुइ-
द्वान्धवोंके साथ रमसमय बति जानेले बस्कीपिने आकर तब्रतक उस कन्याको
अन्यके हार्थमें प्राप्त हुई देखकर कहा,--“मो ख्शुर | यह आपने विरुद्ध किया
जो मुझको देकरके कन्या औरको दी”? बह बोला,-'मों ! ममी हार्थाके उरसे
मागा हुआ, आपके सग आयाहू न जाने यह क्या हुआ” | ऐसा कह बेटीसे
पूछने लगा, “वत्से ! यह तेने अच्छा न किया, सो कह यह क्या वृत्तान्त हे?”
चह बोली-“ इसने मेरी प्राणसकटसे रक्षा की है सो इसको छोडकर मुझ जीती
हुईका हाथ कोई न ग्रहण करेगा” । इस बातमे रात बीतगई । तब प्रात.काळ
होनेपर महाजनेंके समूहे इस वार्ताका व्यतिकर सुनकर राजदुहिता उत स्थानमे
आई । कर्णपरपरासें सुनकर दण्डपाशकी कन्याभी उस स्थानमें आई। तब उस
महाजनके समूहको सुनकर राजाभी उस स्थावर्मे आगया । तब प्रापतव्यमर्थले
चोला,-“'मो । निडर कहो यह केसा इत्तान्त है? । तब वह बोछा,-“मलु--
ष्य प्रातव्य अर्थकों प्राप्त होताहे” राजकन्या बोली,--देवभी उसको रूघन
करनेको समर्थ नहीं है” | तब दण्डपाशकसुता बोछी,-इस कारण न में
“कुछ शोचती हू न कुछ मुझे वित्मय है” इस भब्बिङ लोकके इत्तान्तकों सुन-
कर बणिकूसुता बोली,--जो हमारा है सो दूसरेका नही” । अभयदान
देकर राजाने पृथक् २ इतान्त पूछा उस इत्तान्तकों जान प्रात्तव्यमंथेके वास्ते
अपनी कन्याको बहुत मानके सहित सम्पूर्ण अळकारसे पारवारसे युक्त देकर“तू
(२५४) पञ्चतन्त्रम् ।
-सेरा पुत्र है” ऐसा नगरमें विदित कर उसको युवराज्यमें अभिपिक्त कर दिया ।
दंडपाशकनेमी अपनी कन्या निजशक्तिके अनुसार चल्नपानादिसे सत्कृत कर
प्रा्तन्वमर्षको दी प्राप्तव्यमर्यने भी अपने पिता माताको समस्त कुटुम्वके सहित "+
उस नगरतमें सम्मानपूर्वक बुढाया, वहभी अपने गोत्रोके सहित अनेक भोगोंको
भोगता हुआ छुखसे रहा | इससे में कहत्ता इं-
“प्रात्ब्यमथे लभते मनुण्यो
देघोऽपिते लंघयितुं न शक्तः ।
तस्मान्न शोचामि न विस्मयो म
यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम् ॥ ११८ ॥??
मनुष्य प्राप्य अर्थको प्राप्त होता हे, उसे देवभी उल्लंघन करनेको समथ
नहीं, इस कारण न में शोच करता हूं, न मुझको विस्मय है, क्यों कि, जो हमारा
हे वह दूसरोंका नहीं | ११८॥”
तदे तत्सकलं सुखदःखमतुभूय परं विषादमुपागतोऽनेः
न “मित्रेण त्वत्सकाशमानीतः। तदेतत् मे वैराग्यकारणम्” ।
मन्धरक आएइ,-* भद्र ! भवति सुहृदयसन्दिग्धे यत्
श्षुतक्षामोऽपि शचुभूत त्वां भक्ष्यस्थाने स्थितमेवं पृष्ठमारोप्य
आनयति न मारेऽपि भक्षयति। उक्तश्च यतः-
सो यह सम्पूर्ण दुःख सुख अनुभव करके परम विषादको प्राप्त हुए मित्रने '
मुझे तुम्हारे पास प्राप्त किया हे । यह मेरे वेराग्यका कारण है” । मन्थरक
बोळा,-“'मद्र | यह काग असंशय मित्रहीहे, जो भूखसे व्याकुळ भी शत्रुभूत
तुमो मक्ष्यस्थानमें स्थिती पीठपर आरोपणकेर छाया मा्गमौ भक्षण न
किया । कारण कहा है-
विकार याति नो चित्ते वित्ते यस्य कदाचन ।
पमिन्रे स्थात्सवेकाले च कारयेन्मिचसुत्तमम् ॥ ११९ ॥
जितका चित्त कभी धनसे विकारको प्राप्त नहीं होता हे वही भित्र दै सदैव
रसे भित्रको करे || ११९, ॥
आषाटी कासमेतम् । (२५५)
विद्राद्विः सुद्ददामच चिह्वेरेतेरसंशयम् ।
पसैक्षाकरण भोक्त होमाग्रोरिव पण्डितः ॥ १२० ॥
विद्वान् पडितोको इन चिहोंसे अवश्यही होमामिकी समान सुहृदोंकी परीक्षा
` करवी कही है ॥ १२० |
तथाच-
सेसहा--
आपत्काले तु संप्राप्ते यन्मित्रं मित्रमेव तत्।
वृद्धिकाले तु संपाते दुर्जनोऽपि सुहद्भवित् ॥ १२१ ॥
आपत्तिका समय प्राप्त होनेपर जो मित्र है बही मित्र हे बृद्धिका समय प्राप्त
हॉनेपर ती दुजन माँ सुहृद हॉजाता है ॥ १२१ ॥
तन्ममापि अद्य अस्य वषय विश्वास ससुत्पन्ना यता
नीतिविरुद्धा इयं मेत्री मांसाशिमिबायसः सह जलचरा-
जाम । अथवा साधु इदसुच्यते-
सो भाज मेरामी इस विपयमें विश्वास हुआ हे कि, नीतिविरुद्ध यह मित्रता
टि, पाटि हक Yn
गास खावबाल काआंक साथ जळचरीका ह] अथवा अच्छा कहा ई-
मित्रं कोऽपि न कस्यापि नितान्तं न च वेरऋत |
दश्यते मित्रविध्वस्थात्काय्याद्वेरी परीक्षितः ॥ १२२ ॥
कोई किसीका न भित्रै न अत्यन्त चेरी हे मित्रके विपरीत कार्यको परीक्षास
दरों दोखता हे || १२१ ॥
तत् स्वागतं भवतः । स्वगृहवदास्यतामन सरस्तीरे ।
यश्च वित्तनाशो विदेशवासश्च ते सञ्जातस्तत्र विषये
सन्तापो न कत्तव्यः। उक्तश्च
सो आपका मगळहो । अपने घरकी समान इस सरोवरके किनारे स्थित रहो
आर जा आपका घननार आर [वढरवात हुआ हूं इस नपयम सन्ताप करवा
न चाहिये । कहा है-
अभ्रच्छाया खलप्रीति? सिद्धमन्नश्च थोषितः।
किचित्कालोपभोग्यानि योवनानि धनानि च ॥ १२३ ॥
वादळोंकी छाया,दुश्शेकी प्रीति,पक्रान,श्िये,यौवन भौर धन यह किचित्कार
पर्यन्त भोग्य होते हैं॥ १२६ ॥
(२५६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अतएव विवेकिनो जितात्मानो धनस्पुहाँ न कुर्वेन्ति ।
उक्तश्च
इसी कारण ज्ञानी और आत्माके जीतमेवाले पुरुष घनमें स्पृहा नहीं करते
क
हैं। कहा है-
सुसखितैरजीवनवत्सुरक्षिते
निजऽपि देहे न वियोजितेः कचित् ।
पुंसो यमान्तं व्रजतो5पि निष्टुरे-
रेतेर्धनेः पश्चपदी न दीयते ॥ १२४ ॥
अति कष्टसे संचित किये प्राणकी समान रक्षित अपनी देहसे किसी प्रकारमी
न नियुक्त किये निष्टरधन यमळोकको जाते मनुष्यके पीछे पांच पदभी गमन नहीं
करते हैं ॥ १२४॥
अन्यच
औरमी--
यथामिषं जले मत्स्येमक्ष्यले श्वापदेखेवि।
आकाशे पक्षिभिश्चैव तथा सर्वत्र वित्तवान् ॥ १२५ ॥
जैसे मांस जलन मच्छोसे, पृथ्वीम हिंसक जीवोति, भाकाशर्मे पक्षिर्योते खाया
जाता हे । इसी प्रकार सबेत्र घनवान् खाया जाता हे॥ १२५ ॥
निर्दोषमपि वित्तादर्थ दोषेयोंजयते वृपः ।
निर्धन; प्रात्तदोषोऽपि सवत्र {निरुपद्रवः ॥ १२६ ॥
निर्दोपी धनीकोभी राजा दोषसे दूपित करता हे, और निघेनी दोषको प्राप्त 7
दोकरमी सदा उपद्रघसे हीन रहता हे ॥ १२६॥
अर्थानामर्जने इःखमजितानां च रक्षणे ।
नाशे दुःखं व्यथे दुःखं थिगर्थान्कष्टसंश्रयान् ॥ १२७॥
धनके इका करनेमे दुःख, इकट्ठा कियेके रक्षा करनेमें दुःख, नामै दुःख,
खचैमै दुःख, कष्टके भाश्रयवाळे धनको धिक्कार हे ॥ १९७॥
अर्थार्थी यानि कष्टानि म॒टोऽयं सहते जनः।
शतांशिनापि मोक्षार्थी तानि चेन्मोक्षमाप्ठयात ॥ १२८॥
यह मृहमनुष्य घनके निमित्त जितना कष्ट सहता है मोक्षको इच्छाबाठा
उसके सौ वें भंश परिश्रम करे तो मुक्त होजाप ॥ ११८,॥
आषाटीकासमेतम् । (२५७)
अपरं च-
औरभी-
विदेशवासजमापि वेराग्यं त्वया न कार्य्यम । यतः-
विदेशके निवात करनेसे उत्पन्न हुआ वैराग्यभी तुमको करना न चाहिये |
क्यो किट
को धीरस्य मनस्विनः स्वविषयः को वा विदेशः स्मृतो
ये देरा श्रयते तमेव कुरूते बाहुप्रतापाजितम् ।
यद॑ंष्टानखलांगुलप्रहरण: सही बन गाहते
तस्मिन्नेव हतदिपेन्द्रहघिरैरुतृष्णां छिनत्यात्मनः ॥१२९॥
धीर बुद्धिमातूको अपना देश क्या है २ विदेश क्या है £ बह जिस देशमै
निवास करता हे उसको मुजाओके प्रतापे जीत लेता है जो कि, डाढ नख
पूछके प्रहारसे सिह वतम फिरता हे, उसी वनवे मारे इए हाथाके रुधिरसे अपनी
तृष्णाक्षो दुर करता हे ॥ ११९ ॥
अर्थहीनः परे देशे गतोऽपि यः मज्ञावान् भवति स कथ-
खिद्पि न सीदलि। उक्तश्च
धनहीन परदशमे गया हुआसी यदि बुद्धिमान् हो तो किसी प्रकार दुःखी
नहीं होता हे । कहा हे-
>,
को5तिभारः समर्थानां कि दूरं व्यवसायिनाम् !
को विदेश; सुविद्यानां कः परः मियबादिनाम् ॥ १३० ॥
शक्तिमा्नोको भतिभार क्या है ! व्योपारियोको दूर क्या हे ? बिद्यावानोको
विदेश क्या है ? प्रियवादियोंकों पर कया है? || १३० ॥
तत् प्रज्ञानिधिभेवान् न प्राक्रतपुरुषठुल्यः, अथवा-
सो आप तो बुद्धिके सागर हे साधएण मनुष्यके तुल्य नहीं हैं । अथवा-
उत्साइसम्पन्नमदीर्घसूं
क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम् ।
शुरं कृतज्ञं हटसोहदख
लक्ष्मीः स्वयं मार्गति वासहेतोः ॥ १३१ ॥
१७
(२५८) पञ्चतन्त्रम् ।
उत्साहसे युक्त, भाळस्यरहित, क्रियाविधिका ज्ञाता, व्यसन न छागनेवाले,
शूर, कत्यको जाननेवाळे, दृढ सौह्वार्देवाले पुरुषको लक्ष्मी निवासके ल्रिये स्वयं
ढुंढती हे॥ १३१ ॥
अपर प्राठो5पि अर्थः कमेप्राध्या नश्याति तद् एतावन्ति
दिनानि त्वदीयमासीत् । मुहूर्तमपि अनात्मीयं भोकं न
लभ्यते । स्वयमागतमपि विधिवापद्वियते ।
ओरभी यह कि, प्राप्त हुआ घन कर्मबशते नष्ट होजाता हे सो इतने दिन-
तक तुम्हारे निकट घन रहना था, पराया धव कोई एक मुहूर्त नहीं भोग सक्ता।
स्वयं आया हुआ भी प्रारव्यले हरण होजाता है।
अर्थस्यो पाञ्जेनं कत्या नेव ओगं समश्नुते ।
अरण्यं नहदासाछ मूढ! सोमिलको यथा ॥ १३२ ॥१?
कोई धन उगाजन करकेभी उतो नहीँ भोग सकता जेस महाधनको
प्राप्त होकर मूढ सोमिछक ॥ १११ |!
हिरण्यक आह, कथमेतत्??? सोऽन्रदीत-
६4
हिरिण्यकने कहा," यह केसी कथा ?? बह बोळा-
कथा ५.
कर््मिश्विदरविष्ठाने सोमिउको नाम कौलिको वश्धति
रूम स च अनेकविधप््रचनारजितानि पार्थिबोचितानि
सदा एक यस्त्राणि उत्पादयति । परं लष्थ च अनेकविधपठ्ट-
रचनानिइणस्यापि न ओोऊताच्छादनाभ्यथिकं कथमपि
अर्थमात्रं सम्पद्यते । अथ अन्ये तत्र सामान्यकोलिकाः
स्थूळकसम्पादनविज्ञानिनो भहद्धिसम्पन्नाः तानवलोक्य
स स्वभाय्योमाह,- भिये ! पश्य एतान् स्थूछपट्टकार- |
कान् धनकनकसमुद्धान्। तदघारणक मम एलत्स्थानं तद- ˆ
न्घत्र उपाजेनाथ गच्छःमि? । सा आह-“भोः धिवतम !
मिद्यानळपिलमेतद्यदन्धच गतानां धनं भवति, स्वस्थाने
न भवति । उक्तञ्च-
भाषाटीकासमेतम्। (२५९)
किती स्थानमै सोमिङक नाम कौज्कि रहता था, वह अनेक प्रकार पटर-
खनासे रजित राजाओोंके योग्य वस्न सदा बनाता था भौर उसके भनेकाविध पट-
'इचनामें निपुण होकरभी सोजनाच्छादनसे अधिकधन न प्राप्त होता और दूसरे
साधारण जुळाहे मोटे बल्न घुनना जानने चाले बडे घनवाळे ये । उनको देखकर
यह अपनी मार्यासे बोळा,-“प्रिये | इन मोटे कपडे बनाने वाठोंको देखो जो
घन सुवर्णसे सम्पन्न हें । सो यह स्थान हमको छेना फागना नहीं है | सो और
स्थानमै घन ठपाजेनके निमित्त जाताहू ? । वह बोली,--“ भो प्रियतम | यह
सव मिथ्या प्रछाप हे जो और स्थानमें जाकर घन होता हे अपने स्थानमे नहीं
होता । कहा है-' |
उत्पतन्ति यदाकाशे निपतन्ति महीतले ।
पक्षिणां तदपि प्राप्त्या नादत्तघुपत्तिष्ठति ॥ १३३॥
जो आकाश उडते पृथ्वीने गिरते हैं उन पशियांकोमी विवादिया अन्न
प्रात नरा होता है ॥ १३३ |
तथाच-
तैसेही-
न हि भवति यन्न भाव्यं भवाति च भाव्ये विनापि यत्वेन !
करतलगतमपि नश्यति यर्थ तु भवितव्घता नास्ति१३४॥
जो होनड्वार नहीं हे वह नहीं होता हे जो होनहार हे वह यत्नके पिनोही
होजाता दे जिमकी प्राप्ति नहीं हे वह हावे प्राप्त हुआ भी नष्ट होजाता है? ३४
यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम् ।
तथा पुरा कृतं कमे कत्तारमतुगच्छति ॥ १३५॥
जेते सहल घेनुभोमे बछडा माताको पहचानता हे इसी प्रकार पर्व किसा
कमे कर्ताको पहुचता हे || १३५ |
शेते सह शयानेन गच्छन्तमचुगच्छति ।
नराणां प्राक्तनं कर्म तिछेत्वथ सहात्मना ॥ १३६ ॥
सोतेके साथ सोता है,चछतेके साथ चळता हे, वहुत क्या मनुष्योक्का किया
कमे आत्माके साथ रहता है ॥ १३६ ॥
यथा छायातपौ नित्यं खुसम्बद्धो पर्परम्।
एवं कमे च कत्ता च संश्षिष्टाबितरतरम् ॥ १३७ ४६
(२६० ) पश्चतन्त्रम ।
जैसे छाया और धूप परस्पर सम्बद्ध हैं इप्तो प्रकार कर्मे भौर उसका कती
पर्पर संघटित हैं ॥ ११७ |
तस्मादत्र एबं व्यवसायपरों भव ” । कौलिक आह-
6 जिये ! न सम्यगभिहितं भवत्या, व्यवसायं विना कमे
न फलति । उक्तश्च-
इस कारणसे यहीं रोजगार करो ?' कोछिक बोळा,--“ग्रिये ! तुमने अच्छा
नहीं कहा । रोजगारके दिना कमसिद्धि नहीं होती । कहा दे-
ययेकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्मते ।
तथोद्यमपरित्यक्त न फलं कर्मणः स्प्रतम ॥ १३८॥
जैसे एक हाथते ताळी नहीं बजती इसी प्रकार उद्यम व्यागनेसे कर्मफ
नहीं होता है ॥ १३८ ॥
पश्च कर्मवशात्माप्तं भोज्यकालेऽपि भोजनम् ।
हस्तोद्यन्नं विना वक्रे मविशेन्न कथश्वन ॥ १३९॥
देखो भोजनक समय प्रात इभामी अन्न हाथके उच्चमक विना मुखर्म किसी
प्रकार प्रवेश नहीं करसक्ता ॥ १३९ ॥
तथाच-
-तेसेही-
उद्योगिन पुरुषसिंहमुपेति लक्ष्मी -
Do) La an ~,
दवामात काएुरुषा वदान्त ।
बं निहत्य कुरु पोरूषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिद्धति कोऽत्र दोषः ॥ १४०॥
उद्योगी पुश्षलिइको लक्ष्मी प्राप्त होती है देव देता है यह कायर कहते हैं
देवको पृथक् कर आत्मशक्तितते पुरुषार्थकर यत्न करनेसेमी यादि सिद्धि न हो तो
किसका क्या दोष है ॥ १४० ॥
तथाच
ओऔरभी-- |
उद्यमेन हि सिद्धचन्ति कार्य्याणि न मनोरथेः ।
न हि सिंहस्य सुतस्य प्रविशन्ति सखे मुगाः ॥ १४१॥
5
द्व
च्छ
च्
भाषाटीकासमेतम | (२६१)
काम उद्यमसेही सिद्ध होते हैं मनोरथोंसे नहीं। सोते हुए सिंहके सुखमें
मृग प्रवेश नहीं करते हैं ॥ १४१ ॥
उद्यमेन विना राजन्न सिद्धयेति मनोरथाः।
कातरा इति जल्पन्ति यद्भाव्यं तद्भविष्यति ॥ १४२ ॥
हे राजन् ! उद्यमसेही मनोरथ सिद्ध होते हे जो होनहार हैं सो होगा यह
“कायर कहा करते हें ॥ १४२॥
. स्वशत्तया कुर्वतः कर्म न चेत्सिद्धि भयच्छति ।
_ नोपालभ्यः पुमांस्तत्र देवान्तरितपोरुषः ॥ १४३ ॥
जो कमे अपनी शक्तिसे करनेपरभी सिद्ध नहों उसभ पुरुषका तिरस्कार
नहीं होता कारणं कि, वह पुरुषार्थ तो देवसे हत होगया हे ॥ १४३ ॥
तन्मया अवश्यं देशान्तरं गन्तव्यम्’? । इति निश्चित्य
चद्धमानपुरं गतः । तत्र च वर्षत्रयं स्थित्वा सुवर्णशतत्रयो-
पाजेन कृत्वा भूयः स्वशृहं प्रस्थितः। अथ अद्वेपथे गच्छतः
तस्य कदाचिद्टव्यां प्घटतो भगवान् रविरस्तसुपागतः !
तदा असो व्यालभयात स्थलतरवटस्कन्धमारूह्य यावत्
असुत तावान्नशाथ स्वन द्वा पुरुषा राद्राकारा परस्पर
प्रजल्पन्तों अञ्चणोत् । तत्रेक आह,-' भोः व्हत! ! त्वं कि
स॒म्धक न वेत्सि? यदर्थ सोमिलकस्य भोजनाच्छादनाभ्य-
थिका समृद्धिनास्ति । तत् कि त्वया अस्य सुवर्णशतत्रं
म्रदत्तम्? | स आह-' 'भोः कर्मन् ! मया अवश्यं दातव्यं व्य-
ससाथिनां तच च तस्य परिणतिः त्वदायत्ता इति !'?
सो भवइयहो में देशान्तरको जाऊ!" । यह विचार बद्धेमानपुरको गया ।
चहा तीन वर्ष रहकर तीनसो भशरफी उत्पन्न कर फिर अपने घर आया, भागे
भागेमें आते हुए उसके एक समय वनमें चळते २ भगवान् भास्कर अस्त
होगये । तब यह सर्पके मयसे स्थूळवटग्रक्षके स्कधपर चढ़कर जबतक सोता है
कि, सबतक भर्धरात्रिके समय स्वप्तमें दो पुरुष रौद्र जाकारवाले परस्पर बात
करते छुने गये । उनमें एक बोला,-*मो प्रमो! क्या तू भली प्रकारसे नहीं
नता कि, इस जुछाहेके भाग्यमे मोजनाच्छादनसे अधिक धन नहीं है सो
(२६२ )' पञ्चतन्त्रम् ।
जैने कैसे इसको तीनसो मुद्रा दी” । बह बोला~“'भों कर्मन् ! रोजगारियोंको
में अवश्य देता हूं उसकी स्थिति तुम्हार अधीन है? ।
अथ यावदसौ कौलिकः प्रबुद्धः सुवर्णग्रन्थिमबलोकयति,
तावत् रिक्तं पश्यति । ततः साक्षेप चिन्तयामास,- “अहो !
किमेतत्! महता कष्टेन उपाजित वित्तं हेलया क्वापि गतम्
तदार्थश्रमोऽकिचनः कथं स्वपत्न्या मित्राणां च सुखं द्शयि-
ष्यामि” । इति निश्चित्य तदेव पत्तनं गतः । तत्र च वर्षमान्रे-
णाएि सुदर्णशतपंचकशुपार्ज्यं भूयोऽपि स्वस्थानं प्रति प्र-
स्थितः। यावत् अद्धेपथे भूयोऽटवीगतण्य भगवान् भाइुरस्तं ˆ
जगाम । अथ सुवणेनाशभयात सुश्राम्तोऽपि न विश्राम्यति
केवलं कृतगहों त्कण्ठः सत्वरं त्रजति । अत्रान्तरे द्वौ पुरुषो
ताइशो रट्टिदेश समागध्छन्तो जल्पन्ती च श्रुणोति । तत्रेकः
प्राह,- भी कत्तः! कि त्वया एतस्य सुवर्णशतपश्चकं प्रद-
तम्। तत् कि न वेत्ति? यद्गोजनाच्छादनाभ्यघिकमस्य
किश्चित् नास्ति । स आह-''भोः कभेन् ! मया अवश्यं
देयं व्यवसायिनाम् । तस्य परिणामः त्वदायत्तः । तव कि
मासुपालम्भयसि !'! तत श्रृत्वा सोभिलको यावद्रन्थिमब-
लोकयति तावत् रुबण नास्ति । ततः परं इुःखमापन्नो व्य-
चिन्तयत् ।' “अहो ! कि मम धनरहितस्य जीवितेन । तदन
वटवृक्षे आत्मानसुद्वव्य प्राणान् त्यजामि” । एवं निश्चित्य
दभमर्यी रज्जं विधाय स्वकण्ठे पाशं नियोज्य शाखायामा
त्मानं निवध्य यावत् प्रक्षिपति तावदेकः पुमान् आकाशस्थ
एव इद्माह,-''भो भोः सोमिलक ! मा एवं साहसं कुरू ।
अहे ते वित्तापहारको, न ते भोजनाच्छादनाभ्याविकां वरा-
टिकामपि सहामि । तद्गच्छ स्वग्हे प्राति । अन्यश्च भवदी
यसाइसेन अहं तुष्टः। तथा मे न स्यात व्यथ दशनम् । तद्
मार्थ्यतामभीष्टो वरः कश्चित? । सोमिलक आइ- “यढिँ
एवं तदहि भे मभूतं घनम” । स आह-भोः ! कि करिष्यसि
भाषारीकासमेतम् । (२६३ )
भोगरहितेन धनेन?! यतः तव भोजनाच्छादनाभ्यविका
आतिरपि नास्ति । उक्तश्च-
सो जबतक यह कौलिक जागकर उस मोहरोंकी गांठको देखता हे तबतक
रोती देखकर खेदसे विचारने छगा । “अहो यह कया है? बडे कसे उपाजेन
ब [a nn
किया धन लीळासेही कहां गया । सो व्यर्थ श्रमवाळा निर्धेनी में किस प्रकारसे
अपनी ल्ली और भित्रोको सुख दिखछाऊगा” । ऐसा निश्चय कर उसी स्थानके
गया । बहा तीन वर्षमै पाचसो अशरफी उत्पन्न कर फिरमी आपचे स्थानकों
चळा | जव कि, जाते हुए अधेमागमें सूर्ये अस्त हुए तब सुवर्णके नाश
होनेके मयसे थककर मी बह न सोया थोर केवळ घरमे मन ढगाये शीमतासे
चछा | तब दो पुरुष सामनेसे आते चार्ता करते उसने छुने । उनमेसे एक
चोठा-“ो प्रभो । तुमने कयो इसको पाचसौ सुबर्ण दिये । सो कया तू नहीं
जानता है कि, भोजनाच्छादनसे अधिक इतके माग्यमे कुछ नहीं है? | व
बोडा-“'भो कर्मन् ! उ्योगियोंको में अवश्य देताहू । उसका परिणाम तुम्हारे
अधीनहे । सो क्यों मेरा तिरस्कार करते हो” । यह सुनकर सोमिलक जबतक
गाठको देखता है तबतक छुबणे नहीं पाया, तव तो परम दुःखको प्रात्त होकर
विचारने लगा, “अहो धनहीन मेरे जीषनसे क्या हे £ सो इस वढट्वक्षमें अपनेको
चाधकर प्राणव्यागन करू'') ऐसा मिचार कुशकी रश्सी बनाय भपने कठमे पाश
डाळ शाखामे अपनेको वाध जबतक भपनेको छोडता है तबतक एक पुरुष
आकाशे स्थित हुआ यह बोळा,-“भो मे सोमिलक ! इस प्रकारका साहस मत
कर मैं तेरे धनका हरण करनेबाळ। | मोजनाच्छादनस आधिक एक कौडी भी
सेरेपास नहीं रहने देता । सो अपने घरक जा,तुम्हारे साहससे में सुष्ट इभाहू ।
मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं होता सो कोई अभीष्ट बर माग,” सोमिळक वोळा-“'जो
ऐसा है तो मुझको बहुत घन दो” । वह बोळा,-“सोगरहित धनको लेकर क्या
करेगा क्यों कि तुझको मोजनाच्छादनसे अधिक प्राति नहाँ हे । कहा है-
कि तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला ।
या च वेश्येव सामान्या पथिकेरूपछुज्यते ॥ १४४ ॥
उस सम्पत्तिसे बया है जो पुत्रबधकी समान केवळ असोग्य हे जो साधा
रण वेश्याकी समान पथिकोसे भोगी जाती है वही अच्छी है ॥ १४४ ॥ र
(२६४) पञ्चतन्त्रम् ।
सोमिलक आह- यद्यपि भोगो नास्ति तथापि तद्ग
वठु । उक्तश्व- -
सोपिळक बाढा-- यद्यपि भोगनही ढे तथापि धनहो । कहा है-
कूपणोऽप्यकुळीनोऽपि सत्जनेवॉर्जतः सदा ।
सेव्यते स नरो लोके यर्थ स्याद्वित्तसश्चयः ॥ २४५ ॥
कृपण, अकुर्डान, सजनोंसे सदा वर्जितमी घनी मनुष्यको छोकमें सब कोई
सेवन करते हैं ॥ १४५ ॥
तथाच-
अर दखा-
शिथिलो च सुबद्धो च पततः पततो न वा!
निरीक्षितो मया भद्रे ! दश वर्षाणि पञ्च च॥ १४६॥
हे भरे ! मेंने पन्द्रहबर्षतक शिथिल दढ पातित होते अपतित वृषण
देखे हैं ॥ १४६ ॥
पुरुष आह- किमेतत्?” सोऽत्रवीत-
पुरुष बोळा,-“'यह कैसी कथा १? चह बोळा<
कथा ६.
करिमिश्चित् अभिष्ठाने तीक्ष्णविषाणो नाम महाद्वषभः
मतिवसति स्म, स च मदातिरेकात् परित्यक्तनिजयूथः
ऽङ्काभ्यां नदीलटानि विदारयन् स्वेच्छया मरकतसहश्चानि
शष्पाणि भक्षयन् अरण्यचरो बभूव । अथ तत्र एव वने
्रलोभको नाम शगालः प्रतिवस्तति स्म । स कदाचित् स्वभा”
य्येया सह नदीतीरे सुखोपविष्टः तिष्ठति। अत्रान्तरे स
तीक्ष्णविषाणो जलार्थं तदेव पुलिनमबतीणेः । ततश्च तस्य
लम्बमानो वृषणो अवलोक्य शगाल्या श्गाळोडमिहितः- ,
*स्वामिन् ! पश्य अस्य वृषभस्य मांसपिण्डी लम्वमा ।
यथा स्थितो । तदेतो क्षणेन भहरेण वा पतिष्यतः। एव
जञात्वा सवता पष्ठमनुयायिना भाव्यम्? । श्र्याळ आह-
La
“'त्रिये ! न ज्ञायते कदा एतथोः पतनं भ
Ed
अष्याति वा न वा।
भाषाटीकासमेतम् । (२६५ )
तत् कि वृथा श्रमाय मां नियोजयसि । अत्रस्थः तावज्नला-
शैमागतान् मूषकान् भक्षयिष्यामि समं त्वया मार्गोऽयं यतः
तेषाम् । अपरं यदि त्वां मुक्त्वा अस्थ तीक्ष्णविषाणस्य दृष-
भस्य पुछे गामष्याम तदा आगत्य अन्य कश्चिदेतत् स्थान
समाश्रयिष्यति । न एतत् युज्यते क्तम् । उक्तव-
किसी एक स्थानमें तौक्ष्ण श्रुगनामबाका बेळ रहता था वह मदकी अघि“
कतासे अपने यूथको त्यागने किये शगासे नदीतटको बिदीर्ण करता इभा
अपनी इच्छासे मरकतमणिकी समान घास खाता वनचारी भया । उसी वननर्मे
` प्रडोमक नाम श्रृगाळ रहता था । वह कमी अपवी भाग्योके महित नदीके
किनारे सुखसे वैठाथा, इसी समय तीक्ष्गश्ृग जलपानके निमिच नदीके तटपर
आया | तब उसके ढम्बायमान अण्डकोष देखकर श्वंगाडीने श्रगाळसे कहा,--
*सापिन् ! इस दृषमके मासपिण्ड ठम्बायमान होते हुए देखो । सो यह एकही
क्षणसे अथवा प्रहारसे गिर जाये । ऐसा बिचार कर तुम इसके पीछे फिरो” ।
ज्ञगाल बोळा -“'प्रिये | नहीं जाना जाता फि, कव इन दोनोका पतन होगा
वा नहीं । सो क्यों बृथा ममे मुझको नियुक्त करती है | यहीं पर स्थित हुआ
जळपानके निमित्त आये हुए मूपक्रोको तेरे साथ भक्षण करूगा कारण कि, यह
उनका मार्ग हे । और यादि तुझको छोडकर इस तीक्ष्णशुगवाले दृपके पाँडे
जाऊगा तो, आनकर ओर कोई इस स्थानको ग्रहण कर छेगा, सो यह करना
उचित नहीं । कहा हे-
यो धुवाणि परित्यज्य अधुवाणि निषिवते। `
घवाणि तस्य नश्यन्ति अधुवं नष्टमेव च ॥ १४७ ॥ 7
जो बिद्यमानको छोड़कर अविद्यमानका सेवन' करता हे उसके धुव कार्य नष्ट
होते हें ओर अघुत्र नष्ट हैं हीं ॥ १४७ ||"
श्रमाली आह भोः कापुरुषस्त्व यत्किखित प्रात तेनापि
न्तोषं करोषि । उक्तश्व-.
क) AN क च ७ ७००५
गाळी बोढो,-- मो ! कापुरुष (डरपोक) तू जो कुछ प्राप्त हुआ हैं उसीसि
सन्तोष करता है। कहा है--
ई २६६), ' पञ्चतन्त्रम्।
खुपूरा स्यात्कुनदिका सुपूरो मूषिकाञ्जलिः
सुसन्ठुष्टः काठुरुषः स्वस्पकना १ तुष्पात ॥ १४८ ॥
कुनदी जल्दी परां होजाती है, मूषिककी अंजली शीघ्र भर जाती हे, का
पुरुष शीघ्र थोडहीसे सन्तुष्ट हो जाते ईं | १४८॥
तस्मात पुरुषण सदा एव डत्साइवता भाव्यम् । उत्तथ्व-.
इस कारण पुरुषको सदा उत्साहसे रहना चाहिये । कहा है-
यत्रोत्ताइसमारम्भौ थचालस्यविहीनता ।
नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला बस् ॥ १४९ ॥
जहां उत्साहसे आरम्भ होता है, जहां आलस्य हीनता होती हे, जहां नीति
और विक्रमका संयोग है वहां अचळ लक्ष्मी रहती है ॥ १४९ ॥
तदैवामिति सञ्चिन्त्य त्वजेन्नोद्योगमात्मनः
अङुयोग बिना तेलं तिलानां नोपजायते ॥ १५० ॥
याहा हांगा एता विचार कर अपना उद्यांग त्यागच करना बहा चाहिये
अनुयोगके विना तिलोमेसे तेळमी नहीं निकछता हे ॥ १९० ॥
अन्यव्व-
आरसा-
यःस्तोकेनापि सन्तोषं कुरुते मन्दधीर्जनः ।
*, तस्य भाग्यविहीनस्य दत्ता श्रीरपि माञ्येते ॥ १५१ ॥
जो मन्दबुद्धि पुरुष थोड़ेमेंही सन्तोष करता हे उस भाग्यहीनकी दूसरोंकी
दी हुई लक्ष्मीमी नष्ट हो जाती है ॥ १६१ ॥
यच्च त्वं वदासि, एतो पतिष्यततो न वेति, तदापि अयुः
। उत्तश्च~
और जो तुम कहते हो एकि, यह गिरेंगे या नहीं सोभी अयुक्त हे । कहांहै-
कृतनिश्चयिनो वन्द्यास्तुङ्गिमा न प्रशस्यते ।
चातकः को वराकोऽयं यस्येन्द्रो वारिवाहकः ॥ १५२ ॥
कारण, कि कार्य सिद्चिम उत्साहवाळे पूजनाय हैं हमारी उच्चामिकाषा प्रशंसाको
आन होती है यह चातक दीन क्या वस्तु हे जिसके उत्साइते देवराज जळ
देता है (उस झुद्रके निश्पको जानकर देवराजभी उसके मनोरथको णै
करता हे) ॥ १५२ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (२६७)
अपरं मूषकमांसस्य निर्विण्णा अहम्, एतो च मांस-
पिण्डौ पतनप्रायौ हृश्येते,तत्सवेथा नान्यथा कत्तेव्यम्” इति
~ अथ असो तदाकर्ण्य मूषकप्रासतिस्थानं परित्यञ्य तीक्ष्णवि-
बाणस्य पृष्ठमन्वगच्छत्। अथवा साधु इदमुच्यते
औरमी मूपकमात खाते २ मेरा जी उकता गया हे और यह मासपि०्ड-
प्रायः गिरजॉयमे ऐसा विदित होता हे । सो सब प्रकारसे अन्यथा करना उचित '
नहीं!” । तव यह ऐसे वचत श्रवण कर मूपकप्रासि स्थानको त्यागन कर तीक्षण-
विषाणके पीछे पीछे गया । अथवा यह अच्छा कहा हे-
ताघत्स्पात्सवेकृत्पेपु पुरुषोऽत्र स्वयं प्रभु; ।
ख्रीवाक्याइशविक्षण्णी यावन्नो द्भ्रियते बलात् ॥ १५३ ॥
तभीतक यह पुरुष समरण कायम स्वाधीन होता हे जबतक बलपूर्वक
ल्लोके वाक्यरूपी अकुशसे ताडित नहो होता ॥ १९३ ॥ '
अकृत्यं मन्यते कृत्यमगम्घं मन्यते खुगम्।
अभक्यं मन्यते भक्ष्यं खीवाक्यमेरित्तो नरः ॥ १५४ ॥
ज्लीके वाक्यसे प्रेरित इभा मनुष्य अकार्यको कार्य, अगम्य ( दुर्गम) को
सुगम और अमक्ष्यको भक्ष्य मानता है | १५४ |"
एवं स तस्य पृष्ठतः समाय्य; परिश्रमन् चिरकालमन-
सत् । न च तयोः पतनमभूत् ॥ ततश्च निर्वेदात पञ्चदशो
बर्षे श्रगालः स्वभाय्यामाह+-
इस प्रकार धह उसके पीछे ज्लीसहित परिभ्रमण करता २ बहुत समय
बिताता हुआ परन्तु अण्डफोशोका पत्तन न हुआ तब बैराग्यसे पन्द्रहवें वषे
अपनी भार्यासे बोळा,-
“शिथिलौ च खुबद्धो च पतततः पततो नः वा ।
निरीक्षितो मया भद्रे दश वर्षाणि पञ्च च ॥ १५५ ॥
“झिथिछ हैं घुदढ हैं गिरेंगे वा नहीं भद्रे १५ पर्षतक में बराबर देखता
रहा ॥ १५५ |
तयोः तत्पश्चादपि पात्तो न भविष्यति । तद् तदेव स्व-
स्थानं गच्छावः। अतोऽहं प्रवीमि-
६२६८ ) , पञ्चतन्त्रम्।
इन दोनोंका इसके पीछे भी पात न होगा । सो आओ अपने स्थानको
चळे । इससे में कहता हूं-
शिथिलो च सुबद्धो च पततः पततो न वा ।
निरीक्षितो मथा भद्रे दश वर्षाणि पञ्च च ॥ १५६ ॥??
शिथिळ भौर सुदृढ़ हैं गिरगे था नहीं हे भद्रे | यह मैंने बराबर पन्द्रह वर्षे-
तक देख ॥ १९६ ॥”
पुरुष आह- “यदि एवं तद्गच्छ भूयोऽपि वद्धमानपुरम् ।
तंत्र द्वौ वणिक्पुत्रो वसतः, एको शुप्तघनः, द्वितीय उपभु-
क्तथनः । लतः तथोः स्वरूपं बुद्धा एकस्य वरः मार्थनीयः ।
यदि ते धनेन प्रयोजनम् अभक्षितेन ततः त्वामपि शुत्तधनं
करोमि । अथवा दत्तमोग्येन धनेन ते प्रयोजनं तढुपञ्जुक्तधन
करोमि” दाते । एवसुक्ता अदर्शनं गतः। सोमिलकोऽपि
विस्मितमना भूयोऽपि वद्धेमानपुरं गतः । सथ सन्ध्यासमये
श्रान्तः कथमपि तत्पुरं प्रातो गुत्तथनगुहं पृच्छन्कच्छात्
लब्ध्वा अस्तमितसूर्धे प्रविष्ट; । अथ असो भार्य्यापुत्रसमे-
तेन शुप्ततनेन निर्भत्स्यमानो हठात्णृहं प्रविश्य उपविष्टः ।
ततश्च भोजनवेलायां तस्यापि भक्तिवजितं किञ्चिदशरन
दत्तम् । ततश्च युक्त्वा तत्र एव यावत् सुतो निशीथे
पश्यति तावत् तो अपि द्वौ पुरुषो परस्परे मन्त्रयतः ।
तत्र एक आह-*'भो? कर्तः ! किं स्वया अस्य गुत्तवनस्य
अन्थोऽघिको व्यथो निम्मितो यत् सोमिलकस्य अनेन
-भोजनं दत्तम । तदयुक्तं त्वया कुलम्? । स आह- भो+
कम्मेन् ! न मम अन्न दोषः मया पुरुषस्य लाभप्रापति
दातव्या । तत्परिणतिः पुनः त्वदायत्ता” इति । अथ असो
यावदुत्तिष्ठति तावत् शुत्तधनो विषचिकया खिद्यमानो
रूजाभिभूतः क्षणं तिष्ठति । ततो द्वितीयेऽद्नि तदोषेण
कुतोपवासः सञ्जातः । सोमिलकोऽपि अभाते तद्गृहाव्
निष्क्रम्य उपसुक्तधनगह गतः । तेनापि च अभ्युत्यानादिना
भाषाटीकासमेतम् । (२६९) _
सतकतो विदितंभोजनाच्छादनसंमानः तस्य एव गृहे भव्य-
शय्यामारुह्य सुष्वाप । ततश्च निशीथे यावत्पश्यति तावत्
तौ एव द्वी पुरुषौ मिथो मन्त्रयतः । अथ तयोः एक आह-
““भोः कर्तः ! अनेन सोमिलकस्य उपकारं कुर्वता प्रभूतो
व्यय; कुतः, तत् कथय कथमस्य उद्धारकविधिः भविष्यति ।
अनेन सर्वेमेतदव्यवहारकगहात् समानीतम्” । स आह-
“भोः कम्मेन् मम कत्यमेतत । परिणतिः त्वदायत्ता” इति ।
अथ मभातसमये राजपुरुषो राजप्रसादजं वित्त आदाय
समायात उपशुक्तधनाय समर्पचामास। तद दृष्टा सोमिलकः
चिन्तयामास ।“सश्वयरहितो5पि वरमेष उपभुक्तथनी न असो
शुत्तधघनः । उक्तश्च
पुरुप बोळा-“जो ऐसा हे तो फिर वद्धमान पुरको जा वहा दो बणिकूपुत्र
रहते हैं एक गुप्ततन दूसरा उपसुक्तवन ( धनका भोगनेवाला ) है उन दोनोका
आशय देखकर पीछे बर मांगना, और जो केवळ तेरा भी शुक्षधन ( धनरक्षा )
से प्रयोजन होगा तो तुझे भी गुप्तधन करदूगा | भथवा दत्तभोग्य धनसे तेरा
प्रयोजन होगा तो वेसा करदूगा” । यह कहकर वह अन्तित हुआ ।
सोमिळक आश्चर्ययुक्त होकर फिर बद्धमानपुरको गया, सन्ध्या समय थका हुआ
किसी प्रकार उस पुरें प्राप्त हो मुप्ततनके घरको पूछता हभा कठिनताप प्राप्त
होकर सूर्योस्तम प्रविष्ट हुआ तब यह भया पुत्रके सहित इए गुप्तथनसे घुड-
काया हुआ मी इठसे उसके घरें प्रवेश कर बेठगया, तब भोजनके समय
उसको भा मक्तिसे हीन कुछ भोभन दिया, तब यह भोजन कर जबतक सो
कर आधीं रातमे देखता हे कि, बढी दोनों पुरुष परस्पर मत्रणा कःते हें | तब
एक बोडा- “ मो प्रमो क्यों तुमने इस गुप्तवनका अधिक ब्यय किया, जो
सोमिळकको इसने भोजन दिया, सो यह तुमने अयुक्त किया” | बह बोळा--
“ सो कर्मन् इसमें मेरा दोष नहीं मुझे तो पुरुषको छाम प्राप्ति देनी है |
उसका परिणाम तुम्हारे आधीन हे” | सो यह जबतक उठता हे तबतक गुप्तधन
विषूचिका (उवान्त ) रोगसे खेदको प्राप्त इभा एणहो क्षणमात्रकों स्थिक्
इआ । सो दूसरे दिन उस दोषसे उसने रघन किया । सोमिळक भी प्रभात
(२७०) पश्चतन्त्रम् ।
समय उसके घरसे निकछ उपसुक्तवनके घरको गया । उसने अम्युत्यानादिसे
सत्कार कर मोजनाच्छादनका सम्मान करा और उसीके घरमें मनोहर सेजपर
सोगया । सो रात्रिमें जबतक देखता हे तबतक दोनों पुरुष सम्मति करते हैं उन"
दोनें।में एक बोछा,--“ भो ! स्वामिन् ! उसने सोमिलकका उपकार करके बहुत
व्यय किया । सो कहो केसे इसका उद्धार होगा इसने यह सब व्योपारीके घ्ररसे
ग्रात किया है? । चह बोढा-“ भो ! कम्मेन् ! यह सब मेरा इत्य है |
पारणाम आपरे आधघीनहे” | तब प्रभात समय राजपुरुष राजाकी प्रसन्नता
(इनाम ) के धनको लेकर उपञुक्तधनको समर्पण करते भये | यह देखकर
बह सोमिळक विचारने छगा-संचयसे रहित यह उपसुक्तवन अच्छा है न कि
यह गुत्थव | कहा हैन |
अग्निहोत्रफला वेदाः शीलवित्तफले श्वतम ।
रतिएचफळा दारा दत्तमुक्कले धनम् ॥ १५७ ॥
वेद यज्ञानुष्ठानके फळवाले हेँ,शाब्नपढना देखनेका फळ शील घन सुना है,
ह्लिय रति पुत्रफळके निमित्त हैं, धनका दान और भोगही फळ है || १९७॥
तद्विघाता मां दत्तभुक्तधन करोतु, न का्यय मे
शुद्दघनेन” । ततः सोमिलको ढत्तथुक्तधनः सञ्जातः
अतोऽहं बदीमि- ।
सा विधाता 'सुझको दत्तभुक्त धव करे । गुप्तघनसे मेरा कुछ कार्य नहीं है?
व्तब सोमिङक्र दत्तभुक्तवन होगेया | इससे मे कहता हूं-
“अथस्योपाजनं कृत्वा नेव भोगं समश्ठुते ।
अरण्यं बहदालाद्य मृटः सोमिलको यथा ॥ १५८ ॥?
“अर्थ उत्पन करके भी उसको भोग नहीं सकता जैसे बड बनमे प्राप्त
होकर मूढ सोमलिक न भोगसका | १५८ |”
_ तद्वद् हिरण्यक ! एवं ज्ञात्वा धनविषये सन्तापो
न कार्य्यः । अथ विद्यमानमपि धनं भोज्यवन्ध्यतया
तत् आवेद्यमान मन्तव्पम् । उक्तश्च-
सो हे भद्र ! हिरण्यक ! ऐसा जानकर धनके विषयमें सन्ताप मतकरो ।
- सो बिद्यमान मी घन सोगनेकी अशक्यतासे उसको नहीं की बराबर मानना
चाहिये । कहा ह~
भाषाटीकासमेतम् ! (२१७१ 9
*“गहमध्यनिखातेन धनेन धनिनो यदि ।
भवाम कि न तेनेव धनेन धनिनो बयम् ॥ १५९॥
^, “घरमे गाडे हुए घनस ही यदि धनवान् धनी हो तो उसी धनसे हम क्यों न
घनी गिने जायें १॥ १५९ ||
तथाच
तैसेही-
उपाजितानामर्थानां त्याग एवं हि रक्षणम् ।
लडागोद्रसंस्थानां परीवाह इवाम्भखास्॥ १६० ॥
- उपार्जेव किये धर्नोंका त्याग ही रक्षा है जैसे सरोवरके मध्यमे स्थित जढोंका
निकळ्ना ॥ १६० ॥ `
दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये सञ्चयो न कर्तव्यः ।
पश्येह नथुकरीगां सञ्भितभर्थ हरन्त्यन्ये ॥ १६१ ॥
देना चाहिये, भोगना चाहिये, परन्तु धवका सचय न करना देखो मघुम-
किखयोका सञ्चित शहत अन्य जन हरण करते हे ॥ १६१ ॥
अन्यच्च
सौरभी-
दान मगो नाशस्तिल्लों गतयो भषन्ति वित्तरय ।
यो न ददाति न छक्ते तस्थ ठलीया गतिभेषति ॥१६२॥
दान, भोग और नाझ यह घवकी तीन गति होती हैं जो न देता न खाता
हे उसकी तीसरी गति ( घनका वाश ) होती है ॥ १६२ ॥
एबं ज्ञात्वा विवेकिना न स्थित्यर्थं वित्तोपालेन कत्तव्य
यतो दुःखाय तत् । उत्तख--
ऐसा जानकर ज्ञानयोंको जोडनेके निमित्त धन उपार्जन करना न चाहिये
„ जिससे कि वह दु खके निमित्त होतांद । कहाहैं-
घना दिकेडु उद्यन्ते येऽत्र मूर्खाः खुखाशयाः ।
तत्तग्रीप्मेण सेवन्ते शेत्यार्थं ते हुताशनम् ॥ १६३ ॥
सुखकी आशासे जो महासू घतादिमे विद्यमान रहते, वे त्त गरमीसे
आतेहुए शीतके निमित्त अमिकी खोज करतेहें ॥ १६३ ॥
(२७२) पञ्चतन्त्रम् ।
सर्पाः {पिबन्ति पवनं न च ढुवेलास्ते
शुष्केस्तुणेबनगजा बलिनो भवन्ति ।
कन्देः फलैसुनिवरा गमयन्ति कालं
सन्तोष एष पुरुषस्थ परं निधानम्॥ १६४ 0
सर्प पवन पीतेहे परन्तु वे दुबळ नहीं हैं सूखे तृण खाकरही वनके हाथी
बली हो तहें,मु निश्रेष्ठ कन्द और फलते समयको बितातेदै इससे सन्तोषही पुरुषका
परम निधान ( आश्रय ) है ॥ १६४ ॥
सन्तोषामूतततानां यत्छुखं शान्तचेतसाम्।
कुतस्तद्वनलुब्यानामितश्चेतश्च धावताम् ॥ १६५ ॥
सन्तोषर्पी भमृतसे तृप्त हुए शान्त चित्तवालॉको जो सुखहै वह धनके
ऊोभसे इवर उधर धावमान होते हुए पुएषोंको कहां है ॥ १६५ ॥
यीयूषमिव सन्तोषं पिबतां निर्देतिः परा ।
दुःखं निरन्तरं पुंलामसन्तोषवतां पुनः ॥ १६६॥
अमृतकी समान सन्तोषञ्चो पान करनेते परम शान्ति होतीहे असन्तोष
पुरुषांको निरन्तर दुःख होताहे॥ १६६॥
निरोधाब्चेतसोऽक्षाणि निरूद्धान्यखिलान्यपि।
आच्छादिते रवो मेघेराच्छन्नाः स्युर्मभस्तयः ॥ १६७॥
पवैत्तके रुकनेसे सब इन्द्रिय रुक जाती हैं जसे मेघके ठकनेते सूर्यकी किर्णमी ”
ढकजातीहें ॥ १६७॥
वाञ्छाविच्छेदनं प्राहुः स्वास्थ्यं शान्ता महर्षयः ।
वाञ्छा निवत्तते नाथैः पिपासेवाग्निसेवन्नेः ॥ १६८ ॥
शान्त चित्तवाळे महर्षि ब्रासनाके विच्छेदको सुख कहते अमिके सेयनसे
प्यास जैसे निउत्त नहीं होती ऐसेही धनसे बांछा निवृत्त नहीं होती ॥ १६८ ॥ _
अनिन्द्यमपि निन्दन्ति स्तुवन्त्यस्तुत्यसुञ्चकेः ।
स्वापतेय ङ्गते मर्त्याः कि कि नाम न कुर्वते ॥ १६९ ॥
मनुष्य धनके निमित्त भनिन्दितकी भी निन्दा करते हैं स्तुतिके अयोग्यकी
अलीप्रकार स्तुति करतहे बहुत क्या | कया क्या नहीं करतेहें ॥ १६९ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (२७३)
धर्माध यस्य वित्तेहा तस्यापि न शुभावहा ।
प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादर्पशनं वरम् ॥ १७०॥
_ निस मनुष्यका घर्मके निमित्त धव उपाजेन करनाहै वह चेष्टा भी भी
नहीं हे क्योंकि कीचके घोनेसे तो दूरसे उसका न छूनाही सळा है ॥ १७० ॥
दानेन तुल्यो निधिरस्ति नान्यो
लोभाञ्च नान्योऽस्ति रिएः पृथिव्याम् ।
विभूषणे शीलसमं न चान्यत्
सस्तोषतुल्यं धनमस्ति नान्यत् ॥ १७१॥
दानकी तुल्य दूसरी निधि नहींहै, छोमसे अधिक पृथ्वी कोई शन नहीं है,
शीळकी समान दूसरा गहना नहीं और सन्तोषकी समान दूसरा घन नही है॥ १७१॥।
दारिद्रयस्य परा शूतिर्यन्मानद्रविणाल्पता ।
जरद्गवधनः शर्वस्तथापि परमेश्वरः ॥ १७२॥
मानरूपी घनकी असताही दारिद्यका ऐखये है । शिव जोणे दृपमक धन-
वाळे होकरमी परमेश्वरहें ( मानसे उन्नत )॥ १७२ ॥
सक्कत्कन्डुकपातेन पत्त्याय्य: पतन्नपि |
तथा पतति स्ूखेस्ठु सत्पिण्डपतनं यथा ॥ १७३ ॥
श्रेष्ठ मनुष्य गेदकी समान गिरकरभी फिर उपरको उछलताहे भौर मुखे तो
ऐसे पतित होताहे कि जैले मुखिण्ड गिरकर फिर नहीं उठताहे ॥ १७३ ॥
एवं ज्ञात्वा यद्र | त्वया सन्तोषः कायय! ?? इति । मन्थ"
रकवचनमाकर्ण्थं वायल आहु-''मङ्र ! मन्थरको यत् "एवं
वदलि तत् त्वया चित्ते कत्तव्यम् । अथवा साध इदसच्यते-
ऐसा जानकर हे भद्र | आपको सन्तोप करना चाहिये” । मन्थरकके वचन
सुनकर बायस बोछा-“भद्र | मन्थरक जो कहतांहे वह तुझको चित्तमे करना
चाहिये | अथवा यह सत्य कहाहै-
सुलभाः पुरुषा राजन्सततं म्रियवादिनः ।
अभियस्य च पथ्थस्य वक्ता ओता च इलेभः ॥ १७४ ॥
हे राजन् | निरन्तर प्रियबोळनेवाळे पुरुष बहुत हैं परन्तु सुननेमें अप्रिम
चास्तवर्मे हितकारी बचनक्रे कहने झुनमेबाळे दुेेभह ॥ १७४ ॥
१८
(२७४) पञ्चतन्त्रम् ।
आप्रयाण्याप पथ्यान य बदान्त तूणांमह ।
त एव सुहृदः रोक्ता अन्ये स्खुनामधारकाः ॥ १७५ ॥ ??
इस संसारमै ओ मनुष्य अप्रिय तथा हितकारी वाक्योंको कहतेहे वेही सुहृ-_
दूद दूसरे नामधारीहें ॥ १७६ ॥ ?
अथ एवं जल्पतां तेषां चित्रांगो नाम हरिणो छुब्धकन्रा-
सितः तस्मिन् एव सरसि मबिष्टः । अथ आयान्तं ससम्भ्रम-
मवलोक्य लघुपतनको दृक्षमारुटः । हिरण्यको निकटवत्तिनं
शरह्तम्बं प्रविष्टः । मन्थरकः सालिलाशयमास्थितः। अथ
लघुपतनको छुगं सम्यक परिज्ञाय मन्थरकं उबाच,-*एाहि
एाहू सखे मन्थरक ! झुगाऽय लुषात्ताऽन्न समायातः सरास
ग्रविष्ठः । तह्य शब्दोऽयं न मानपसम्प्रद:ः हात । तच्छत्वा
मन्थरको देशकाछोचितमाह,- भो लघुपलनक ! यथा अयं
सुगी इझ्यले त्रभूल उच्छास उद्ददन उदख्रान्तहृष्टया पृष्ठतो5
दराकयात सून तयात एष बन सब्यकन्रासला । तज्जाच-
तामस्य पूछे लुब्धका आगच्छान्ति न वा इति । उक्तव-
इत प्रकार उनके वचन कहनेपर चित्राङ्ग नामक एक हरिण ढुब्धकसे
घबडाया हुआ उस सरोघरमे प्रविष्ट हुआ | तव उसको भयसे व्याकुल आया
हुआ देखकर ळघुगतनक इक्षपर चढा, हिरण्यक समीपवर्ती सके स्तम्ममे
प्रविष्ट हुआ, मन्थरक सरोवरमे घुस गया । तब लघुपतनक मृगको अच्छी प्रकार
जानक्षर मन्धरकसे बोला,-आओ आओ सखे मन्थरक ! यह मग तपासे ”
ध्याकुछ यहां आकर सरोवरें प्रविष्ट इुआहे । यह उलीका शाब्दहे यहां मनु-
ध्यक्षा सम्भव नहीहे'' । यह सुनकर सन्थरक दशकाळ उचित धचच वोचा,
“मा छघुपतनक ! जिसप्रकार यह मुग दीखताहे, बडे श्वास छताइआ चाक्षेत
दृष्टिले पछिको देखतांहे सो यह प्यासा नहाहे अवश्यही व्याधेसे मीतहै। सो
जायाजाय कि इसके पछि लुब्धक आते हैं या नहीं । कहा हेट
भयन्रस्तो-नरः शासं मभूत कुरूते सुहः ।
दिशोऽबलोकयत्पेड न स्वास्थ्यं ब्रजाति क्वाचित् ॥ १७६ ॥
सयले च्याकुछ हुआ मनुष्य वारंवार इवास लेताहै चारों ओर दिशाशोंकों
दखता रहता है और स्वास्थ्यको प्राप्त नहीं होताहे ॥ १७६ ॥
भाषाटीकासमेतम । (२७५)
तच्छ्रुत्वा चित्राद्ठ आह, भो मन्थरक ! ज्ञातं त्वया
सम्यकू म न्रासकारणसू । अह छुब्धकशरम्रहाराइद्वा-
अरत कृच्छण अन्न समायातः । मम यूथ त, लुब्धकः
व्यापादत भविष्यति । तत शरणागतस्य म दशय किञ्चित्
अगम्यं स्थानं लुब्धकानाम्!” । तदाकर्ण्य मन्थरक आह,
«भो; चित्राङ्ग श्रयतां नीतिशास्त्रम्
- यह चुन चित्रण वोळा,-“भो मन्थरक ! तेने मेरे त्रासका कारण मर्तप्रकार
जानळिया । में व्याधेफे शरभ्रहारसे वचकर कठिनतासे यहा भायाहू मेरा यूथ उन
- छुब्पकोंने मारडाळा होगा | सो शरणमे आये इए मुझे कोई स्थान वत्ताओ
जहा दुब्धक न पहुचसके” । यह सुतकर मन्थरक बोल्न मो चित्राग |
नातिशात्र सुनो- व त
द्वावुपायााचह माक 'वखुको शचुदशले |
हरतयोश्रालनादेकों दितीयः पादवेगजः ॥ १७७ |
दुक दीखनेम छूटनेकेलिय दोही उपाय है एक हाथ चलाना दूसरा चरणोमें
वेग होना ॥ १७७ |
तद्गम्यतां शीघ्र सघन वनं, यावत् अद्यापि न आग-
छन्हि ते दुरात्मानो ठछुव्बकाः!! । अत्रान्तरे लघपतनवय
सत्वरमध्युपेत्य उदाच,- मो सन्धरक ! गतास्ते छुः्धव्माः
स्वग्रहोत्मुखाः प्रचुरभांसपिण्डधारिणः । तत् चित्राङ्ग !
त्वं विश्वव्दो बनात बहिभंव?' ततस्ते चत्वारोऽपि बित्रदा-
बमाश्रतास्तास्मन्सरास मध्याह्सबंथ वृक्षच्छायाया आड”
स्ताव रुभाषितगाष्ट्रीहखमतुभवन्तः सुखेन काले चयन्ति ।
अथवा खुक्तमेतढुच्यते-
सा शत्र सघव वनका चर्ड जाआ जवतक अब ब छामा दुर् पमा चे
१-भापइच” | इसी अवसरे छघुप्तनक गघ्रतासे आकर बंला- भो मन्यग्क ?
गय ध व्याधं अपने घरका भार बहुतसे मास पण्डका ल्यि हुए (सां } मनाङ्ग |
निमय होकर तू बमस वाहूरही'' तब चे चारा भित्रभावका प्राप्त हुए उत्त
सरोवरमे ढुपहरके समय इशकी छायाके नीचे सुभाषित गोष्ठीका युख अलुमच
करते हुए सुंखसे समय जिताने छगे । अथवा यह युक्त कहा हैन
(२७६ ) पश्चतन्त्रस्।
सुभाषितरसार्वादवद्धरोमाश्चकञ्चुकाः ।
विनापि संगमं स्त्रीणां शुषिः सुखमासते ॥ १७८॥
सुभाषित गोष्ठीके रसरूपी स्वादसे जिनके रोमाञ्वरूप बखतर बंधे हुए-
हं घे बुद्धिमान् छ्लियोंके संगके विनाही सुखको प्राप्त होते हैँ॥ १७८ ॥'
सुभाषितमयद्रव्यसंग्रह न करोति थः ।
स ठु भस्तावयज्षेषु का दास्यति दक्षिणाम्॥ १७९॥
जो सुन्दर वचनरूप द्वव्यका संग्रह नहीं करता हैं वह परस्पर आळा-
पके यज्ञमें किस दक्षिणाको देगा (अर्थात् सम्योंको किस प्रकार सन्तुष्ट कर
सकेगा) | १७९ |
तथाच-
तेसही-
सक्कदुक्तं न गह्णाति स्वर्थं वा न करोति यः ।
यस्य सम्पुटिका नास्ति कुतस्तस्य सुभाषितम् ॥ १८०॥
जो एकही वार उच्चारण किये वचनको नहीं ग्रहण करलेता वा स्वये
नहीं करता हे और जिसको ( १) आवरण भेद नहीं है उसको सुभाषित
किस प्रकार आ सकता हे || १८० ॥
अथ एकस्मिन्रहानि गोष्ठीसमये चित्राङ्गो न आयातः ।
अथ ते वघाङ्ुली भूताः परस्परं जल्पितुं आरब्धाः-' अहो !
किम सुहन्न समायातः ? कि सिहादिभिः कापि व्यापा-
दितः ! उत लुब्धके+ ! अथवा अनले प्रपतितो गर्ताविषमे
वा नबतृणलोल्यादिति । अथवा साधु इद्सच्यते- है
तब एक दिन गोष्ठीके समय चित्रांग न आया तब वे सब व्याकुळ हा
परस्पर कहने लगे-/भहो | आन हमारा सुहृद् क्यों न आया ? क्या कहीं
सिंहादिने मारडाळा वा व्याधोमे अथवा अग्नि वा कठिन गड्डेमें गिरगया वा
नव तृणके छोभसे ( कहीं गिरा ) £ अथवा सत्य कहा है-
स्वग्होद्यानगतेडपि स्मिग्धेः पाप विशळूचते मोहात्।
१ थारणा-बावधानीतियावत् |
भाषाटीकासमेतम | (२७७ )
-प्रिय घुहृदू लेहके कारण घरके उद्यान (बगीचे ) में गयेमी प्रियमे अनि-
एकी शंका करते हैं और बहुत आपत्तिवाळे भययुक्त दारुण वनमें जानेसे
तो क्या कहे | १८१ ॥”
अथ मन्थरको वायसमाह- भो लघुपतनक ! अहं हिर-
ण्यकश्व तावद द्वा आप अशक्ता लस्य अन्वषण क़ मन्दग-
तित्वात् । तद्गत्वा त्व अरण्य शाधय याद् कुत्राचत् त
जीवन्तं पश्यसि” इति।तदाकर्ण्यं लघुपतनको नातिदूरे याव-
दगच्छति तावत् पल्बलतीरे चित्राङ्गः कूटपाशनियन्त्ितः
तिष्ठति | तं दृष्टा शोकव्याकुलितमनाः तमबोचद? भद्र!
किमिदं !” चित्राङ्गोऽपि वायसमदलोक्य विशेषिण इःखित-
मना बभूद। अथवा युक्तमेतत्-
तब मन्थरक वायससे बोळा,-““मो लघुपतनक । में ओर हिरण्यक दोनोही
उसके ढूनेमें असमर्थ हैं कारण कि हम मन्दगति हैं । सो जाकर तू बनमें शोधन
कर यदि काई उसको जीता देखे ( उपायहो ) तो” । यह सुनकर ढघुपतनक
थोडीही दूर गया तो छोटे सरोवरके किनारे चित्राङ्ग कपट जाळसे वेधा मिला ।
उसे देख शोकसे व्याकुळ मन होकर उससे बोडा,--भिद्र ! यह क्या हे १?
चित्राङ्गमी बायसको देखकर वडा दुःखी हुआ । अथवा यह युक्तही दै-
अपि मन्दत्वमापन्नो नष्टो दापीष्टदर्शनात्।
प्रायेण माणिनां भूयो इःखावेगोऽधिको भवेत् ॥ १८२ ॥
लघुताके प्राप्त होनेपर वा नष्ट होनेमे अपने सुहृदोके देखनेसे प्राणियोंको
दुःखबेग अधिक होजाता हे ॥ १८२॥
ततश्च वाक्यावलाने चित्रांगो लट्टपतनकमाह-*'भो
मित्र ! सञ्जातोऽयं तावन्मम मृत्युः । तत युक्तं सम्पन्नं यद्
. भवता सह मे दर्शनं सञ्जातम् । उक्तश्व-
.. उसके वचनके अन्तमै चित्राह्न छघुपतनकसे बोळा-“भो ! मित्र यह मेरी
मुत्यु उपस्थित इई है सो अच्छाही इभा जो आपका दर्शन सुझे हुआ | कहा है--
प्राणात्यये समुत्पन्ने यदि स्यान्मित्रदर्शनम् ।
तट्टभ्यां सुखद पश्चाज्जीवतोऽपि मृतस्य च ॥ १८३ ॥
(२७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
प्राण नाश उपस्थित होनेमें जो मित्रका दर्शन हो जाप तो दोनोंदी प्रका-
रसे अर्थात् मित्रके कौशढसे जीवन और मृतक होनेते उसके संस्कारसे सद्गति
दोनोंही सुख होते हैं ॥ १८३ ॥
तत् क्षन्तव्यं यन्मया प्रणयात् सुभाषितगोष्ठीषु अभिहि-
तम् । तथा हिरण्यकमन्थरको मम वाक्याद्वाच्यौ-
सो क्षमा करना जो मन प्रणयसे वार्ताछापमें यादि कुछ ( भनुचित ) कहा
हो और हिरण्यक मन्थरकसेमी मेरी ओरसे कहना-
अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि दुरुक्तं यदुदाहृतम् ।
तत्क्षन्तव्यं युवाग्यां मे कृत्वा प्रीतिपरं मनः ॥ १८४९ ॥?
अज्ञान वा ज्ञानेसे जो मने कमी तुम्हारे वचनको छौट दिया हो सो मेरे
ऊपर प्रीति करके तुमको क्षमा करना चाहिये ॥ १८४ ।!'
तत् श्रत्वा लघ॒पतनक आह-“भद्र ! न भेतव्यं अर्मः
द्वियेमिने्विद्यमानेः, यावदहं इततरं हिरण्यकं गृहीत्वा
आगच्छामि । अपर ये सत्पुरुषा भवन्ति ते व्यसने न व्याकु-
लत्वसुपयान्ति । उक्तश्च-
यह सुनकर लघुपतनक वोला,.-“भद्र हमसरीखे मित्रोंके विद्यमान होनेंगे
भय मतकरो । जबतक में शीत्रतासे हिरण्यकको लेकर आऊं। भोर जो सत्पु-
रुष होते हैं वे व्यसन उपस्थित होनेमें घबडाते नहीं हैं | कह्दा है-
सम्पदि यस्य न दुषो विपदि विषादो रणे न भीरुत्वम् ।
तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम्॥१८५॥'
जो सम्पत्तिमें हर्षे, विपत्तिमें दुःख, युद्धमें भीरुता नहीं करता है उस
तीनों भुवनके तिळक किसी एकही पुत्रको कोई माता उत्पन्न करती है॥१ ८५॥?
एवसुक्ता लघुपतनकः चित्राङ्ग आश्वास्य यत्र हिरण्यकः
मन्थरको तिष्ठतस्तत्र गत्वा सर्व चित्रांगपाशपतनं कथित-
वान् । हिरण्यकश्च चित्राँङ्गाशमोक्षणं प्रति कृतनिश्चय पृष्ठ"
मारोप्य भूयोऽपि सत्वरं चित्रागसमीपे गतः । सोऽपि
मूषकमवलोक्य किश्चित जीविताशया संछिष्ट आइ-
~
भाषाटीकासमेत्तम् । (२७९)
यह कह ळघुपतनक चित्रांगको समझाकर जहा हिरण्यक मन्थरक थे वहा जाकर
सम्पूर्ण चित्रागके पाशका बंधन कथन किया । चित्रागके पाश छेदनमे निश्चय
' करे इए हिरण्यकको पीठपर चढा कर बहुत शीघ्र चित्रागके समीप गया।
वहभी मूषकको देख कुछ जीनेकी आशासे युक्त हो बोळा--
“आपन्नाशाय विबुधः कर्तव्याः सुदृदोऽमलाः।
न तरत्यापदं कश्चिद्योऽत्र मित्रविवर्जित्तः ॥ १८६ ॥”
“पडितोकों आपत्तिके नाझ करनेको निळ सुहृद करने चाहिये जों
किक
पित्रोसे वर्जित है वह कभी भापत्तिको नहीं तर सक्ता है ॥ १८६ ॥!!
हिरण्यक आह,- भद्र ! त्बं तावत् नीतिशास्त्रज्ञो दक्षः
मतिः | तत् कथमत्र कूटपाशे पतितः” स आह,-''भो न
कालोष्यं विवादस्घ । लन्न यावत् स पापात्मा लुब्धकः सम-
भ्थेति तावत् डुततरं कर्तेय इमे मत्पादपाशमर । तदाकण्ये
विहस्य आह,-हिरण्यक/-' “कि. मयि अपि समायाते
लुब्धकात बिभेषि । ततः शास्त्रं प्रति महती मे विरक्तिः
सम्पन्ना यद्भवाद्विथा अपि नी श्ख्विदः एनामवस्थां
आप्लुवन्ति । तेत त्वां पृच्छामि? । स आह-भद्र ! कर्मणा
बुद्धिरपि हन्यते । उत्तश्च-
हिरण्यक बोका भद्र तुम तो नीतिशाल्लके ज्ञाता चतुर बुद्धिवाके हो। सो
किस प्रकार इस कूटपाशमे फसगये”' बह बोळा,-“'मो ! यह समय विवा-
दका नहीं दे सो जबतक वह पापात्मा छुब्घक् नहीं आता तबतक शीप्रताते
मेरे चरणोंकी पाशी काटो” । यह सुन हिरण्यक हसकर वोळा-“क्या मेरे आने
पर भी छुन्धकसे डरता है। अव शाल्नते सुझे बडा भारी विराग प्राप्त इभ ।
जो आप सरीखे नीतिशा्रके ज्ञाता इस अवस्थाको प्राप्त होते हें इस कारण
तुझसे पुछताहू?? । बह वोढा--“मद्र ! कमेते बुद्धि क्षीण होजाती है । कहा है-
कृतान्तपाशवद्धानां दैवो पहतचतसाम् ।
बुद्धयः कुब्जगामिन्यो भवन्ति महतामपि ॥ १८७॥ '
काठपाइा्मे बेंघेहओंकी देवसे हत चित्तवाळे मह्दात्माभोकी बुद्धि मी
कुठिलगामिनी होती हे ॥ १८७ ॥ ना
(२८०) पञ्चतन्त्रसू ।
विधात्रा रचिता या सा ललाटेऽक्षरमालिका ।
न तां मार्जयिठं शक्ताः स्वघुद्धयाप्घतिपण्डिता; ॥१८८॥११
विधात्तानं जा अक्षरमाद्ा मत्तकम छदा हैं पाइत जब उसका अपनो
चुद्धित कोई मट नहीं सकता है | १८८ ॥”?
एवं तयोः प्रवदतो: सुहृदरयसनसन्तप्तदृदयों मन्थरकः शनेः
शनेः ते प्रदेशमाजगाम । तं दृष्टा लघुपतनको हिरण्यक-
माह-, अहो ! न शोभनमापतितं'' । हिरण्यक आह-
“कि स छुब्यकः सघायाति ?!। स आह-“आस्तां तावत्
लुब्धकवार्ता । एष मन्थरकः समागच्छति । तत् अनीतिः `
अदुष्ठिता अनेन यतो वयमापे अस्य कारणात् नूनं व्यापा-
दनं यास्यामो यदि स पापात्मा छुब्यकः समागमिष्यति,
तदहं तावत खसुत्पातिष्यानि । त्वं एुनाबेलं प्राविश्य आ-
त्मानं रक्षयिष्यांसे । चित्रांगोऽपि देगन दिगन्तरं यास्थति।
एष पुनजेळचरः स्थले कर्थ भविष्याति इति व्याकुलोऽस्मि? ।
अत्रान्तरे प्राप्तोऽयं मन्थरकः । हिरण्यक आइ- भद्र! न
युक्तं अनुष्ठितं भवता, यदत्र समाघातः तद् भूयोऽपि दुत"
तरं गम्यतां, यावत असो छुब्धको न समायाति” । मम्थरक
आह-“मद्र ! कि करोमि ? न शक्कोमि तत्रस्थो मिन्नव्यस- _
नाञ्निदाहं सोदुस् । तेनाहमत्रागतः। अथवा साधु इदसुच्यते ।
इस प्रकार उन दोनोंके कथनमें मित्रके दुःखसे तापित हृदय मन्थरकभी
शनैः २ उस स्थाने आया । उसे देख खघुपतनक हिरण्यकसे बोछा,-
“अहो ! यह अच्छा न हुआ” हिरण्यक बोछा,- क्या बह छुब्घक आया!” |
वह बोछा- “ब्याधेक्ी बात तो रहने दो । यह मन्थरक आरहा है । सो भनु-
चित किया इसने, हम भी इसके कारणत अवश्य नाशको प्राप्त हग याद वह,
पापात्मा छुब्धक भागया तो । सो में तो आकार्म उड जाउगा, तू ।बळम
प्रचरा कर जायगा, ।चत्राङ्ग दिशान्तरम पायन कर जायगा, इस जळचरका
स्थलमै क्या दशा होगी इस कारण में व्याकुल हो रहाई'? । इसी समय मन्थरक
प्राप्त हुआ । हिरण्यक बोढा-- भद्र आपने अच्छा नहीं किया, जो यहाँ भागय
मापाटीकासमेतम् । (२८१)
सो बहुत शौप्रवासे चछे जाओों जबतक वह छुन्धक न भावे” मन्थरक
बोढा,- “मद्र मैं क्या करू? वहा स्थित हुआ में मित्रके दुःखरूपी अधि-
दाह सहनेको समर्थ नहीं हू । इस कारणसे में यहा आगया | अथवा अच्छा
कहा हे-
दयितजनविप्रयोंगो वित्तवियोगश्व केन सह्याः स्युः ।
यदि खुमहोषधकल्पो वयस्थजनसंगमो न स्यात् ॥१८९॥
प्रिय जर्नोका वियोग और धनका वियोग कोन सह सकता हे! जो यह
महौषधिकी समान मित्र जनका संगम न हों ॥ १८९ |]
वरं प्राणपरित्यागो न वियोगो भवाहशैः ।
प्राणा जन्मान्तरे भूयो न भवन्ति भवद्विधाः ॥ १९० ॥??
प्राण त्यागन करना अच्छा हे परन्तु आपसरैखंका वियोग अच्छा नहीं
है। प्राण तो जन्मान्तरमे भी हो सक्ते हैं परन्तु आपसरीखे सुत्दद् नहीं
मिलते है ॥ १९० 7
एवं तस्य प्रवदत आकणपूरितशरासनो छुब्घकोऽपि
उपागतः, ते इष्टा मूषकेण तस्य स्नाएुपाशस्ततक्षणात् ख-
ण्डिनः । अत्रान्तरे चित्रांगः सत्वरं पृष्ठमवलोकयन् प्रधा-
वित्तः । लघुपतनको बक्षमारूठ! । हिरण्यकश्च समीपवति
बिलं प्रविष्टः, अथ असो लुब्धको झृगगमनात् विषण्णबद्नो
व्यर्थश्रमः तं मन्थरकं मन्दं मन्दं स्थलमध्ये गच्छन्तं दष्टवान्
अचिन्तयश्च | “यद्यपि कुरंगो धात्रा अपहतः तथापि अये
कूम आहाराथ सम्पादितः | तदघ अर्घ आमिषेण भे कुट-
मघस्य आहारनिदृत्तिः भविष्यात? एइं विचिन्त्य ते दमै:
संच्छाद्य धनुषि समारोप्य स्कन्धे कृत्वा शह प्रति मस्थितः,
अतान्तरें तं नीयमानमवलोक्य हिरण्यको इःखाकुलः पर्य्य
देवयत्। “कष्ट भोः! कष्टमापतितम्-
इस प्रकार उनके बचन कहते कर्णपर्यन्त धनुष चढाये झुब्वक भी आया |
उसको देखकर मूषकने उसके तातके बधन उसी क्षण छेदन कर दिये । उसी
ह क
समय चित्राग बहुत शीघ्र पीछे देखता हुआ धावमान हुआ । ळघुपतनक पेड
(२८२) पञ्चतन्त्रम् ।
पर चढ़गंया । दिरण्यक समीपवर्ती बिलमें प्रविष्ट हुआ । तब यह छुन्धक मृगके
व्यमनसे दुःखीसुख व्यर्थश्रम होनेसे उस मन्धरकको मन्द मन्द स्थल्म जाता
देखकर विचारने लगा । “यद्यपि विधाताने हरिणको हरण कर लिया है तथापि
यह कूर्म भोजनके निमित्त प्रात्त ढुआ है। सो भाज इसके मांससे हमारे कुटु-
म्बकी भाहारत्त्ति होगी” । ऐसा विचार उसको कुशोंसे बांधकर धनुषपर
आरोपण कर कंधेपर रख घरकी ओरको चला । इसी समय उसको ले जाता
इभ देख हिरण्यक दुःखसे व्याकुळ हो विछाप करने ढगा । “भो! बडा
कष्ट आपडा-
एकस्य दुःखस्य न यावदन्त
गच्छाम्यहं पारमिवाणेवस्य ।
तावट्टितीयं समुपस्थितं मे
छिड्रेष्वनयो बहुलीभवन्ति ॥ १९१ ॥
सागरकी समान जवतक एक दुःखके पारको प्राप्त नहीं होता हूं तबतक
Nn me क =
दूसरा मुझे उपस्थित हुवाहे विपत्तिमे भनर्थकी प्रात्ती बइत करके होती है॥१९ १॥
तावदस्खलितं यावत्लुखं थाति समे पथि।
स्खलिते च समृत्पन्ने विषमश्च पदे पदे ॥ १९२॥
तमीतक नहीं गिरता हे जबतक समान मार्गेमें गमन करता है और पतन
होनेमें पद पदमे विषम मार्गही उपस्थित होता है॥ १९२ ॥
यन्नम्रं सरळञ्चापि, तञ्चापत्छ न सीदति ।
अर्छुमित्रं कलत्रं च दुलैभं खुद्धवंशजम् ॥ १९३॥
जो नम्र भोर सरछ है वह आपत्तिमें भी विकारकों प्राप्त नहीं होता है,
थवित्र कुछ ( शुद्धबंशा ) से उत्पन्न धनु, मित्र और स्री दुलम हैं ( यह भापदामें
मी विक्त नहीं होते )॥ १९३॥
न मातरि न दारेषु न सोदय्यें न चात्मजे ।
३० ० oo 0०७८
विश्रम्मस्ताहशः पुंसां यादइमित्रे निरन्तरे ॥ १९४॥
माता, खरी, 'सगेमाईँ, पुत्रमे भी पुरुषका ऐसा विश्वास नहीं होता जैसा निरन्तर
मित्रमें होता हे ॥ १५४ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (२८३).
यदि तावत् कृतान्तेन मे धननाशो विहितः तन्मार्ग-
आन्तस्य मे विश्रामभूतं मित्रे कस्मात् अपहृतम् ?
' अपरमपि मित्रं परं मन्धरकसमं न स्यात् । उक्तश्च-
जो दैवने मेरा धन नाश कर दियाहे तो मागें थके हुए मेरे विश्रामभूत
मित्रको क्यों हरण कियाःऔर भी मन्धरककी समान कोई दुसरा मित्र न होगा|कहाहै--
असम्पत्तौ परो लाभो गुहास्य कथनं तथा ।
- आपाद्विमोक्षणं चेव मित्रस्येतत्फलत्रयम् ॥ १९५॥
मिधनतामें धनका महान् छामहै, गुह्य ( रहस्य) बातका कथन और भापाक्ति
दूरकरना यहही भित्रताके तीच फल्हे ॥ १९५ ॥
तदस्य पश्चान्नान्यः सुहत मे।तत् किमम उपारे अन"
वरतं व्पसनशारेवेषाति हन्त विधि! ! यत आदो ताव-
द्वित्तनाश, ततः पारिवारश्रेशः, ततो देशत्यागः, ततो
मित्रवियोग इति । अथवा स्वरूपमेतत् सर्वेषामेव
जन्तूनां जीवितधर्मस्य । उत्त॑ंच-
सो इससे अधिक श्रेष्ठ मेरा और कोई मित्र नहीं दे सो क्यो मेरे ऊपर निर”
न्तर दुःखरूपी बाणोकी वर्षी विधाता करताहे १ ( इन्त ) खेदहै । जो आदिमं
धनका नाश, फिर परिवारभ्रश्च, फिर देशत्याग, पछि भित्रबियोग हुआ । अथवा
सम्पूर्ण जन्तुओंको जीवित धर्मका यह दक्षणहिाह | कहाहे-
कायः सत्निहितापायः सम्पदः क्षणभंराः।
समागमाः सापगमाः सर्वेषामेव देहिनाम् ! १९६ ॥
शरीर क्षाणमात्रमे विष्व होनेवाळा है, सम्पत्ति क्षणमात्रमे नाश होनेवाळीः
हे, सम्पूर्ण देहधारियोंके संयोग वियोंगवाळे हें ॥ १९६॥
तथाच-
'पैलेही-
क्षते महारा निपतन्त्यभीक्ष्णं
धनक्षये दीव्यति जाठरास्रिः ।
आपत्छु वराणि समुल्लसन्ति
छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति ॥ १९७ ॥
(२८४) पञ्चतन्त्रम् ।
घाववाळे स्थानम वारंवार प्रहार पडते हैं, धनक्षय होनेसे जठरानळ ( भूंख )
दी्त हो जाताहे, भापत्तिमें वेर प्रगट होतेहे, छिद्रमै अनेक अनर्थ होतेहे॥ १ ९७
अहो ! साधु उक्त केनापि-
अहो किसीने अच्छा कहाहै-
आते भये परित्राणं मीतिविश्रम्भभाजनम् ।
केन रत्नमिदं रुष्टं मित्रामित्यक्षरद्रयम् ॥ १९८ ॥”
भय प्राप्तिमें रक्षा, प्रीति विश्वामके पात्र मित्र यह रत्वरूपी दो अक्षर किसने
निर्माण कियेहें । १९८॥।”
अत्रान्तरे च आक्रन्दपरो चित्रांगलघुषलनको तत्र एव
समायातो | अथ हिरण्यक आइ,- अहो ! किं वृथा
प्रलपितेन । तद्यावदेष मन्थरको दृष्टिगोचरात् न
नीयते तावदस्य मोक्षो पायश्चिन्त्यताम् । इति ।
इसी समय रुदन करते हुए चित्रांग भौर ठघुपतनक उस स्थानम आये ।
तब हिरण्यक बोला-““वथा रुदन करनेते क्या हैं सो जबतक यह मन्थरक
डष्टिके सामनेसे न जाय तबतक इसके छुडानेका उपाय करो |
, व्यसनं प्राप्य यो मोहात्केवलं परिदेवथेत्।
क्रन्दनं वद्धयत्येव तस्यान्तं नाधिगच्छति ॥ १९९ ॥
जो दुःखको प्रात होकर मोहसे केवळ रुदनही करताहे उसका रोनाही बढता ”
हे वह दुःलके अन्तको प्राप्त नहीं होता ॥ १९९ ||
केवलं व्यसनस्योक्तं भेषजं नयपण्डितेः ।
तस्योच्छेदसमारम्भो विषाद्परिवजेनम् ॥ २०० ॥
नीतिमे कुशळ पंडितोंने विपत्तिकी एकही मुख्य औषधि कही है उस दुःखके
-नाश करनेका उपाय करना और विषाद त्यागना ॥ २००॥
अन्यच-
-औरभी- |
अतीतलाभस्य खरक्षणाथे
भविष्यलाभस्य च संगमार्थम्।
भाषाटीका समेतम । (२८५) `
आपत्मपन्नस्य च मोक्षणार्थं
यन्मन््घतेऽसौ परमो हि मन्त्रः ॥ २०१ ॥”
उपार्जित धनकी रक्षाके निमित्त और भविष्य छामकी प्रातिके निमित्त प्राक्त
आपत्तिके दूरकरनको जो सम्मति करताहे बढी परम मत्रहे ॥ २० १ ॥?
तच्छृत्वा वायस आइ,- “भो! यदि एव तत् क्रियतां
महचः। एष् चित्रांगोऽस्य माग गत्वा ।काश्वत् पल्व-
लमासाद्य तस्य तार निश्वतनां भूत्वा पततु । अहः
मपि अस्य शिरसि समारुह मन्दैः चंचुमहारेः शिर
उल्लेखयिष्यामि । येन असो इष्टळ्न्घकोऽसुं भृतं मत्वा
मम चंचुप्रहरणप्रत्ययेन मन्थरकं भूमो क्षिस्वा मृगाथ
परिधाविष्यति । अत्रान्तरे त्वया दुर्भभयाणि पारानि
खण्डनीयानि। येन असी मन्थरको द्वततर॑ पह्वलं
प्रविशति” । चित्रांग आह,- भो ! अद्रोऽघं त्वया
इष्ठो मन्त्रः लूनं मन्थरकोऽथं छुक्तो सम्तव्य इति ।
उत्त्वे
यह सुनकर काक बोळा-““भो ! यदि ऐसाहे तो मेरा वचन मानो।यह चित्राम”
इसके मागेर्मे प्रात होकर किसी अस्य सरोवरके निकट प्राप्त हो उसक्के किनारे
चेतनारहित हा गिरजाय । में भी इसके शिरपर चढ मन्द २ चु प्रहारसे
शिरको ( ङुरेदू ) खुजाऊ । जिससे यह दुष्ट छुन्त्रक एसको मराहुआ मानकर
भेरी चाँचप्रहारके विश्वाससे ( कि यह मरगया है ) मन्थरको प्रथ्वीपर छोडकर
मृगके निमित्त धावमान होगा । इसी अवसरमें तुम कुशके पाश खडित कर
देना । जिससे यह मन्थरक शीघ्रतासे छोटे सरोबर प्रवेशकर जायगा” | चित्राग
बोळा-“भो ! अच्छा यह तुमने मत्र विचारा अवश्य ही अब मन्थरकको छुटा
इभा जानो | कहाहै-
“(सिद्ध वा यदि वासिद्वं चित्तोत्साहो निवेदयेत् ।
थमं सर्वजन्तूनां तत्माज्ञो वेत्ति नेतरः ॥ २०२ ॥
सिद्ध या असिद्ध कार्यको चित्ता उत्साहही पहले सब प्राणियोको सूचनाः
ताहे बुद्धिमान् उसको जान केतहैं अन्य पुरुष नहीं ॥ २०३ |)
( २८६) पश्चतन्त्रम्।
तत् एवं क्रियताम्”? इति । तथा अनुष्ठिते स ङुब्धकः
तथा उब मार्गासन्नपल्वलतीरस्थं चित्राङ्ग वायससनाथमप-
श्यत । तं दृष्ठा हर्षितमना व्यचिन्तयत् । “'नूनं पाशबन्धनवे-?
दत्तया वराकोऽयं मृगः सावशेषजीवितः पाशं चोटयित्वा
कथमपि एतद्वनान्तरं यावत् भविष्टः त्तावन्मृतः तद्वश्योऽयं
मे कच्छपः सुयन्त्रितत्वात् । तदेनमपि तावदुह्णामि’? इति।
इति अवधाय्य कच्छपं भूतले प्रक्षिप्य मृगमुपाद्रवत । एत-
एस्ननन्तर ॥हरण्यकन वञ्रोपमदटाभ्रहरणन तहभवष्टन
खण्डशः कुतम् । मन्थरकोऽप तणमध्यात गनिप्क्रम्य समी- ¬
यवान पल्वल श्रावेष्टः । चित्राङ्गोऽपि अभाप्तस्थापि तस्य
सले उत्थाय वाण्लेन सह पलायितः । एतस्मिन्नन्तरे विलक्षो
गवषादपरा लुव्घका इनइचा यावत् पश्यात तावत् कच्छपॉऽ-
- उन: ततश्च तव उपावेश्य इस छाकमंपठत्-
सो ऐसाही करा! ॥ ऐसा करनेपर बह ढुब्चक पैसेही मम आते हुए
छोटे सरोवरके किनारे चित्रांगको कौए सहित देखता भया । उसको देख
भतनहो विचारले ढगा । “अवस्यही पाशवंबनके दुःखसे यह क्ुद्रमुग कुछ
जवशेष जीवनवाछा पाश छेदवकर किसी प्रकार इसी वनान्तरमें व्याह प्राप्त
हुआ के, साह मरगया सो सम्यक् बद्ध होनेसे यह कच्छप तो मेरे वशमेहै |
सो अब इस (मृग) को भी प्रहण करूं” | ऐसा विचार कछुएको पृथ्वीम
पटक मृगको ओर घावमान हआ | इसी समय हिरण्यकने वज़की समान डाढोके
प्रहारसे वह कुशका बंणन खण्ड ख°्ड करदिया। मन्थरकभी तृणके मध्यसे
निकळकर समीपवर्ती नल्पसरोबरमे प्रविष्ट हुआ । चित्रांगमी उसकेन पहुंचते २
्रभ्दीतळ्से उठकर काकके साथ पढाचन करगया । इसी प्रकार विलक्ष ( विस्मित,
बा जित ) बिषादको माघ इभा ठुव्वफ लौटकर जबतक देखताहे तवतक ;
कच्छपभी गया । तब वहां बैठकर यह छोक पढने छगा-
मातो बन्धनंमप्णयं गुरुसुगस्तावत्थया मे इतः
स्म्म्रात्त; कमठः सा चापि नियतं सष्टस्तावादेशतः ।
भाषाटीकासमेतम । (२८७)
क्षुत्क्षामोच्त्र वने श्रमामि शिशुकेस्त्यक्तः समं भार्य्यया
यच्चान्यन्न कृतं कृतान्त कुरु ते तञ्चापि सहयं मया ॥२०३॥”?
हे इतान्त | बन्घनमे प्राप्त इभाभी बडा मृग तेने मेरा हरण कर लिया,
ओर प्राह आ यह कच्छपमी तुम्हारी आज्ञासे निश्चित नष्ट होगया। अब क्ुघासे
घबराया हुभा इस बनें भाव्योपुत्रत्ते त्यागन किया हुआ अमण करता हू जों
भीर अनिष्ट नहीं किया सोमी कर बह में तेरा सब सहन करळूगा ॥ २०३ |
एवं बहुविधं विलप्य स्वगृहं गतः । अथ तस्मिन्व्याघे
दूरतरं गते सर्वेऽपि ते काककूमंमृगमूषकाः परमानन्दभाजः
परस्परमालिङ्कच पुनजातमिव आत्मानं मन्यमानाः तदेव
सरः सम्माप्य महासुखेन सुभाषितकथागोष्ठीविनोदेन कालं
नयन्ति सम । एवं ज्ञात्वा विवेकिना मित्रसंत्रहः कार्य्यः । दे
न मित्रेण सह व्याजेन वर्तितव्यन । इति । उक्तश्च यतः-
त्म प्रकार अनेक विधि बिछाप कर ध्मे घर् यया! ] तव उस व्याधेके
अति दूर जानिपर वे काक कूम मृग मूपक परमानन्दको प्राप्त हुए परस्पर
आलिंगन कर अएनेको पुनः जन्मत्राला मानकर उसी अपने सरोवरको प्राप्तो
प्रहासुखपूर्वक्त सुबचन कथा गोष्टीके आनदसे समयको बिताते भये। एषा
जानकर बुद्धिमानकों मित्रोंका सप्रह करना चाहिये मित्रके सग कपठते वर्त्तना
न चाहिये । कहा है कारण-
यो मित्राणि करोत्यत न कौटिल्येन बलेते ।
तैः समं न पराभूतिं सम्प्रामोति कथञ्चन ॥ २०४ ॥
इति श्रीविप्णुशसबिरचिते पश्चतन्त्रक्े सिञ्रसम्म्राप्तिनोस
द्विती तन्त्र सनात् ।
जो इस ससारमे मित्र करता हे और उनके साथ कुटिळतासे नहीं वर्तता हैं
गह उनके साथ कमी परामवको प्रास नहीं होता है ॥ २०४ ||
` ते धीविष्णुदार्मविरचिते पञ्चतन्त्रे पण्टितच्याडाप्रचादमिश्रहतभाषाटीकाया
मित्रसम्प्राप्रिनीम द्वितीय तन्त्र सन्तूर्णम् |!
अथ काकोलुकीयं तृतीयं तन्त्रम्।
आथ इदमारभ्यते काकोलूकीयं नाम तृतीय तन्त्रम् ।
तस्य अयमाद्यः छोकः-
भाषाटीकासहित यह तीसरा तंत्र काकोळूकीय नामक प्रारंभ किया जाता
है जिसकी आदिम यह छोक हे-
न विश्वसेत्पूवेविरो धितस्य शत्रोश्च मित्रत्वछुपागतस्य ।
दग्धां गुहां पश्य उछकपूर्णा काकप्रणीतेन हुताशनेन ॥१॥
प्रथम विरोध किये ओर पीछे मित्रताको प्राप्त हुए शत्रुका विश्वास नहीं
करना चाहिये उछकसे पुर्ण गुहाको काकद्वारा अग्नि दो हुई देखो | १ ॥
तद्यथा अनुश्रूयते । अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिला-
रोप्य नाम नगरम्। तस्य समीपस्थः अनेकशाखासनाथोऽ-
तिघनतरपत्रच्छदो न्यग्रोथपादपो$स्ति, तत्र च मेंघवणों नाम
वायसराजोऽनेककाकपरिवारः प्रातिवसाति स्म । स तत्र
विहितइर्गरचनः सपरिजनः कालं नथति स्म। तथा अन्धोऽ-
रिमदंबो नान उळ्कराजोऽसंख्थोळूकपरिवारो गिरिगुहादु-
गोश्रथः प्रातिवसाति स्म। स च रात्री अभ्येत्य सदा एव
तस्य न्यग्रोधस्य समन्तात् परि्रमलि । अथ उलूकराजःः
पूर्दविरोधवशा्यं .कशिद्ायसं समासादथति तं व्यापाद्य
गच्छाति । एवं नित्वाभिगमनात् शनेः शनेः तत् न्यग्रोधपा-
दपढुग तेन समन्तात् निर्वायसँ कुतम् । अथवा भवत्येवम् ।
उक्तश्च-
सो ऐसा सुना जाता है । दक्षिण देशम एक महिळारोप्य नाम नगर्दै ।
उसके निकट अनेक शाखावाला आति घने पत्रोंसे व्याप्त न्यप्रोधका वृक्ष हे ।:
वहाँ मेघवणेनाम काकोंका राजा अनेक काकोंके साथ रहताथा । वह वहां दुर्ग
रचना किये कुटुम्बसहित समय बिताताथा । और दूसरा अरिमर्दन नाम उळ्क-
राज असंख्य उछकोंके सहित पर्वतकी गुह्यके दुर्गमे आश्रय किये रहताथा । वह
भाषाटीकासमेतम् । (२८९)
रात्रिमें आकरे सदाही उस न्यप्रोधके चारों ओर घूमताथा | और यह उद्धकराज
पूर्वे विरोधके वशसे जिस किसी वायसको पाता उसे सार जाता इस प्रकार
०नित्यके आगमनले शनेः २ वह न्यग्रोधका इक्ष सब शरसे उसने वायसरहित कर
दिया भथवा ऐसा होताही हे, यह कहा भी है-
य उपेक्षेत शा स्व॑ प्रसरन्तं यदृच्छया ।
रोगं चालस्यसंयुक्तः स शनेस्तेन हुन्धते ॥ २ ॥
जो अपनी इच्छासे बृद्धिको प्राप्त हुए शत्रु और रोगको उपेक्षा करताहे ।
आस्य युक्त रहता है पह शने. २ उससे हनन होता हे || २ ॥
तथाच--
तैसेही--
जातमात्रं न यः शर व्याविश्व घशमं नयेत् ।
अतिएष्टाङ्युत्तोऽपि स पश्चात्तेन हन्यते ॥ ३ ॥
जो उत्पन्न हातेही शत्रु और व्यार्घाको शान्त नहीं करता हे अति पुष्ट अग
होकरभी पीछे वह उसासे मारा जाता हे॥ ३ ॥
अथ अन्धः स वायसराजो सवीन् वायससचिवानाहूय
प्रोवाच-भो ! उत्कटः तावदस्माकं शः उद्यमसम्पन्नश्व
कालवशात् नित्यमेव निशागमे समेत्य अस्मत्पक्षकदनं करो-
ति, तत् कथमस्य प्रतिविधानम् ? बयं तावद्राची न पश्या-
मः। न च तस्य दिवा दुर्ग विजानीमः थेन गत्वा बहरामः।
तदच विषये कि युज्यते, सन्धिविग्रह घानासनसंश्रयद्वेधीभावा-
नामेकतमस्य क्रियमाणस्य । तद्विचाय्ये शीघं कथयन्तु
भवन्तः? अथ ते प्रोच्चः-* यृक्तमभिहितं देवेन यदा एष प्रश्नः
कुतः । उक्तश्च
तब ओर दिन वह काकराज समूर्णे वायस मत्रियोको बुलाकर बोळा,--“े
` हमारा शत्रु तो बडा बळी और उद्यमसम्पन्न हे । काळवशसे नित्यही रात्रिम
भाकर हमारी जातिका नाश करताहे, सो किस प्रकार इतका प्रतिकार करें।
हम तो रात्रिम देख नहीं सक्ते और दिनमें उसके दुर्गको नही जानते जिससे
१९
( २९०) भश्चतन्त्रम् ।
जाकर प्रहार करें । सो इस विषयमें क्या करें सन्धि, विग्रह, यान ( चढाई ),
आसन, संश्रय, द्वैवीसावमेंसे कोई एकका आश्रय करो । सो विचार कर आप
शीघ्र कहो”? तब घे बोले-- आपने युक्तही कहा है जो ऐसा प्रश्न किया। कहाहै-..
अपृष्टेनापि वक्तव्यं सचिवेनात्र किश्वन ।
पटेन तु ऋतं पथ्यं वाच्यश्च प्रियमापियम ॥ ४॥
इस जगते श्रष्ठमंत्रीको बिना पूछे भी कुछ कहना चाहिये और पूछनेपर
सत्य हितकारक प्रिय अप्रिय कहनाही चाहिये ॥ ४॥ “|
यो न पृष्टो हितं बति पारिणामे सुखावहम् ।
सुमन्त्री मियवक्ता च केवलं स रिपुः स्मृतः ॥ ५ ॥
जो एछनेपर पारणाममें सुखदायक हितके वचन नहीं कइता है वह सुमन्त्र
प्रियवक्ता केवळ झन्रु जानना ॥ ५ ||
तस्मादेकान्तमासाछ कार्यों मन्त्रो महीपतेः।
छेन तस्य वथ कुर्मो निर्णय कारणं तथा ॥ ६ ॥”
इस कारण एकान्त स्थानको प्राप्त होकर राजाको सम्मति करनी चाहिये
जिससे हम उस मंत्रका निर्णय तथा कारण कर सकें ॥ ६ ॥”
अथ स मेघवर्ण; अन्वबागतोज्ीवि-सञीदि-अहुजीबि-
अज्ञीवि-चिरज्ीविनास्रः पंच सचिवान् भत्येक प्रष्ठमारब्धः ।
तत्र एतेषासादी तावङ्ज्ीविडं बुष्ठवान्- अद्र ! एबं स्थित
किं मन्यते भवान!। स आह- राजन !बलवता सह विग्रहो -
नन काय्येः | थथा स बलवान् कालप्रहृर्ता च । उत्तश्व-
सत्त
. तब वह मेघतरण बंशक्रमसे प्राप्त हुए उज्जीवि, संजीवि, अनुजीवि, प्रजीवि,
और चिरंजीवि नामवाळे पांच मंत्रियोमे प्रत्येके पूछने लगा । तहां पहिले उ्जाविसे
पूछा-४ हे मद्र ! ऐसा उपस्थित होनेमे आप क्या मानते हो?! | वह बोडा-
“राजन् बलवानके साथ विग्रह करना उचित नहीं, क्यो कि बह बलवान् समय- ”
पर प्रहार करता हे । कहा है कि-
बकीयसे प्रणमतां काले प्रहरतामपि ।
सम्पद नापगच्छन्ति घत्तीपामिव निगा ॥ ७ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (२९१)
चळवान् शत्रुको प्रणामसे सान्त्वया करनेवाले तथा समयपर प्रहार करनेवाले
मनुष्योंकी सम्पत्ति निश्नवाहिनी नदीकी समान प्रतिकूल होकरमी नष्ट नहीं
९ होतोहे ॥ ७ ॥
तथाच-
तैसेही- -
सन्त्याज्यो धा्मिकश्वाय्यो श्रातसंघातवान्ब॒ली ।
अनेकाविजयी चेव सन्धेयः स रिएुर्भवेत् ॥ ८ ॥
धर्मात्मा श्रेष्ठ बहुत भाइयोंसे युक्त बढी बहुतसे संप्रामका जीतनेबाळा शत्र
- च्यागना चाहिये अर्थात उससे विग्रह न करे ॥ ८ ॥
सन्धिः का्योऽप्यनाय्येण विज्ञाथ प्राणर्सशयम् ।
आणेः संरक्षितेः सर्वं यतो भवति रक्षितम् ॥ ९॥
प्राणसद्चय प्राप्त होनेपर अनाडीके साथमी सांधे करना उचित है क्योंकि
प्राणरक्षास सवाँ रक्षा होती है ॥ ९ ॥
येन अनेकयुद्धविजयी स तेन विशेषात् सन्द्धनीयः ।
उत्त्वे
जिससे कि वह अनेक युद्ध बिजयी है इस कारण उससे साधि करळो ।
कहाहे कि-
अनेकथुद्धाविजयी सन्धानं यस्थ गच्छाति ।
तत्मभावेण तस्याशु वश गच्छन्त्यरात्तयः ॥ १०॥
अनेक युद्धविजयीकी जिसले सावि होजातीदे उसके प्रभावसे वहुतसे श्न
उसके आधीन होजाते हैं ॥ १० |
सन्धिमिच्छेत्समेनापि सन्दिग्धो विजयो घि ।
न हि सांशयिकं झर्यो दित्युदाच बृहस्पति: ॥ ११ ॥
जो युद्धके विजयमें सन्देह हो तो समानसेभी साधे करके परन्तु संदिग्ध कार्य
न करे ऐसा बृहत्यातिने कहा है ॥ ११ ॥
सन्दिग्धो विजथो युद्धे जनानामिह युध्यताम् ।
उपायन्रितयादूई तस्माशुद्धं समाचरेत् ॥ १२॥
५
(२९२) . पथ्वतन्चम्।
युद्ध करनेवाले जनोंकों युद्धवें संदेह रहता है इसकी योजना साम, दान,
भेद तान उपायोंके पश्चातूही करे ॥ १२ ॥
असन्द्धानों मानाद्यः समेनापि हतो भ्वृशम् ।
आमकुम्ध इवान्येन करोत्युभयसंक्षयम् ॥ १३ ॥ `
जो अभिमानस संधि न करके समानसे अत्यन्त ताडेत होताहै, बह कच्चे
चडेकी समान दोनों ( मान ओर प्राण ) सेही ध्वंस होताहे | १३ ॥
समं शक्तिमता युद्धमशक्तस्य हि मृत्यवे ।
इषत्कुम्ण यथा भित्त्वा तावत्तिष्ठति शक्तिमान् ॥ १४॥
समथेके साथ दुबेळको युद्ध मृत्युके छियेही होताहे शाक्तिमान् पाषाण घटकी ˆ
समान ठुर्बेछको तोडकर आप स्थित रहता है ॥ १४ ॥
अन्थञ्च- `
ओरमी-
भूमिमित्रं हिरण्यं वा विग्रहस्य फलन्रयस् ।
- नास्त्येकमपि यथेषां विग्रहं न समाचरेत् ॥ १५ ॥
पृथ्वी मित्र वा सुवर्ण यह विग्रहके तीन फळ हैं जो इन्मेंसे एकमी न हो तों
विग्रह च करे ॥ १५ ॥
खनन्नाखुबिलं सिंह; पाषाणशकलाकुलम् ।
आप्नोति नखभङ्गं वा फलं वा मूषको अवेत् ॥ १६॥
सिह यदि पत्थरसे निर्मित चूहेकी बिङ खोदे तो नख टूटनेको प्राप्त होता
हे वा मूषिक ढामका फळ होता है ॥ १६ ॥
तस्मान्न स्थात्फळं यत्र दृष्टं शुद्वन्लु केवलन् ।
न तत्ह्वयं सस॒त्पाद्यं कत्तेव्य न कथञ्चन ॥ १७॥
इस कारण जहां कुछ फळ नहो भौर केरळ दुष्ट युद्धही हो तो उस कार्यको
स्वयं उठाना उचित नहीं है || १७ ॥ :
बलीयसा समाक्रान्तो वेतसी वृत्तिमाचरेत् ।
वाञ्छन्नत्राशिनी लक्ष्मी न भोजङ्गी कदाचन ॥ १८॥
बळवानूसे आक्रान्त होनेमे वेततम्बन्धी बत्तिको अबलम्बन करे जो अक्षय
लक्ष्मीकी इच्छा करे न कि सबैकी समान चेचळ | १८ ॥
माषाटीकासमेतम् । (२९३)
कुर्वन्हि वेतसी बृत्ति भामोति महती अयम्।
सुजङ्गरत्तिमापन्नरो वघमईति केदलम् ॥ १९ ॥
बेतसी बृत्तिकों प्रात होकर बडी दक्ष्मीकों प्राप्त होता है, भुजगदृत्तिको
प्राप्त होकर केवल वधके योग्य होता है ) १९ ॥
कौम संकोचमास्थाय प्रहारानपि मर्षयेत् ।
काले काले च मतिमानुत्तिष्ठित्कृष्णसपेंबत् ॥ २० ॥
सकोचको प्राप्त होकर कूरमत्तिके समान प्रहारोकोभी सहन करे समय २ पर
कृष्ण सर्पकी समान बुद्धिमान् उठे || २० ॥
आगतं विग्रहं मत्वा खुसास्ना शमं नयेत ।
विजयस्य ह्यनित्यत्वाद्रमसश्च समुत्सजेत् ॥ २१ ॥
जाये हुए विग्रहको देखकर बुद्विमान् सामउपायसे शान्त करे विजयके
अनित्य होनेमें वेग ( युद्धक उद्योग) को त्याग दे ॥ २१ ॥
तथाच-
तसहा--
वलिना सह योद्धव्यमिति नास्ति निद्शेनम् ।
प्रतिवातं न हि घनः कदाचिहुपसप ति ॥ २२ ॥7?
बढबानूके संग युद्ध करना चाहिये इसमें दृष्टान्त नही है कर्मी मेघ पवनके
सामने नहीं अति हैं ॥ २२ ॥?
एवसमुजीवी साममन्त्रं सस्थिकार क्कतवन् । अथ तच्छुत्वा
सञ्जीविनमाह,- भद्र | तव अभिप्रायमपि श्रोतुभिच्छामि”? |
स आह,- देव ! न मम एतत प्रतिभाति यच्छचुणा सह
सन्धि; क्रियते । उक्तश्च यतः-
इस प्रकार उजीवीने साममन्त्रसे सम्मति करनेको समर्थन किया । यह
* सुनकर सजीवीसे बोळा,-''मद्र । तुम्हारे अमिप्रायके सुननेकी इच्छा करता
हू?! । वह वोळा- देव | मुझे यह वात अच्छी नहीं छगती जो शत्रुके साथ
संधि कीजाबे । कारण कहा है--
- शब्चणा न हि सन्दध्यात्छुश्किष्टनापि सन्धिना ।
सुतप्तमपि पानीयं शमयत्येव पावकम् ॥ २३ ॥
(२९४) पञ्चतन्त्रम् ।
~
सुमधुर संधिकी इच्छा करनेवाले शत्रुसेमी संवि न करे क्योंकि तत्ता
पानीमी अग्निको शान्तही कर देता है ॥ २३ ॥
अपरं च स कूरोऽत्यन्तलुन्धो धर्भरहित$ । तत् त्वयाः
गवशाषात् न सन्धयः । उक्तञ्च यतः
औओरभी बह क्र अत्यन्त लोमी धर्मरहित हे विशेषकर सन्धिके योग्य
नहीं । कारण कहा हे-
सत्यधर्मविहीनेन न सन्दध्यात्कथश्चन ।
सुसान्धितोऽप्यसाउत्वादचिराद्याति वायाम् ॥ २४ ॥
सत्य धमेसे हीनके साथ कभी सन्धि नहीं करनी चाहिये अच्छी प्रकार संधी
किया हुआ भसाघु हनेस शाघ्र ।वकारका प्रात हाता हे ॥ २४ ॥
तस्मात् तन सह थाद्धव्यानात मे मातिः । उक्तश्च यतः
~ ७७
इस कारण उसके साथ युद्ध करना चाहिये ऐसी मेरी मति है। कहा है कि-
कूरो लुब्धोऽलसोऽसत्यः प्रमादी भोरूर स्थिरः । _
मूढो युद्धावमन्ता च सुखोच्छेद्यो भवेद्रिएः ॥ २५ ॥
खोटा, छोसी, आळसी, असत्यवादी, प्रमादा, डरपोक, चंचळ, मूढ, युद्धमे
उत्साह न करनेवाला झात्र सुखसे नाशके योग्य होता है ॥ २५ ||
अपर तन पराभूता वयम् । तद्याद सन्धानकात्तन कार”
'ष्वामः स भूयोऽत्यन्तं कोपं कारिष्याति । उक्तक्च-
ओर उसने हमारा तिरस्कार किया है । सो यदि संधि होनेकी बात करेंगे -
तो वह फिर अत्यन्त क्रोध करेगा । कहा है-
„ „ चलुथापायसाव्य ठ रपा सान्त्वसपाङ्गया ।
स्वेद्यमामज्वर प्राज्ञः कोऽम्भसा पाराषचाति ॥ २६॥
, जो शत्रु चोथे उपाय ( युद्ध ) से साध्य होनके योग्यहों उससे साम प्रयोग
करना कोपबृद्धिका कारण है, पर्सानसे साध्य नवीन ज्वरको कोन बुद्धिमान् ,
जऊसे सींचता है ॥ ९६ ॥
सामवादाः सकापस्य शातः प्रत्युत दापकाः
म्रततस्येव सहसा सपिषस्तोयबिन्दवः ॥ २७ ॥
क्रोधित शत्रुसे साम वचन कहना उसके क्रोधका बढ़ाना है, और तचे
घृतम एक साथ जळ बिन्दु डाळनेकी समान हे ॥ २७ ॥
भाषाटीकासमेतम ) (२९५)
यदेव एतद्गदाति रिपुबेलवान् तदप्यकारणम्। उक्तश्च यतः-
जो ऐसा है यह कहते हैं कि शत्रु बळ्वान् हे यहमी अकारण है। कहा है कि-
सोत्साइशक्तिसम्पन्नो हन्याच्छच्ं लघुगुरूम् ।
यथा कण्ठीरवो नागे खुसाम्राज्यं प्रपद्यते ॥ २८ ॥
उत्साह शक्तिसे सम्पन्न क्षुद्र मनुष्यमी बडे शत्रुको मार सकता है, जैस
छोटे देइवाला सिंह बडे देहवाळे हावीपर स्वामित्व कर केता हे॥ २८ |
माथया शात्रवो वध्या अवध्याः स्युबेलेन ये ।
यथा ख्रीरूपमास्थाय हतो भीमेन कीचकः ॥ २९ ॥
जो शत्रु बसे अवघ्यहो तो मायासे उचको वरामें करे जैसे ल्लौरूप धारण
कर भीमछनने कीचकको मारा ॥ २९ ||
तथाच-
तेसेही-
सत्योरिवोग्रदण्डस्य राज्षों यान्ति वशं द्विषः ।
शप्पतुल्य हि मन्यन्ते दयालुं रिपवो नृपम् ॥ ३० ॥
मृत्युकी समान उप्रदडचाळे राजाके वशमे शत्रु होजाते हे और दयालु राजाको
शत्रु तृणकी समान मानते हैं ॥ ३० |
न याति शमनं यस्य तेजस्तेजस्वितेजसा ।
वृथा जातेन कि तेन मातुयोबनहारिणा ॥ ३१॥
जिसके तेजस्वी तेजसे तजशत्रुका तेज शान्त नही होजाता है उस माताके
यौवन इरनेवारेको दया उत्पन्न होनेसे क्या छाभ है ?॥ ३१ ॥
या लक्ष्मीर्नातुलिप्तांगी वेरिशोणितङकुमेः ।
कान्तापि मनसः प्रीति न सा धत्ते मनस्विनाम् ॥ ३२॥
जो छथ्मी शत्रुओंके रुघिररूपी कुपकुमसे अनुङि्त अगवाळी नहीं है बह
- मनोहर होकरभी चीरोंके मनको आनद नहीं देती॥ ३२ ॥
रिपुरक्तेन संसिक्तारिख्रीनेत्राम्बुभिस्तथा ।
न भूमिर्यस्य भूपस्य का छाघा तस्य जीवने ॥ ३३ ॥??
' शन्नुके रुधिरसे तथा इन्रुओकी ज़ियोंके नेत्रोके जळसे जिस राजाकी भूमि
नहीं सींची गई उसके जानिसे कया इछाथा है ॥'३३ ॥[?
(२९६ ) पश्चलन्त्रस् ।
एवं सञ्चीवाो पवेशहमन्त्र विज्ञापयामास । अथ तच्छत्वा
अद्नुजीविनसपच्छत्- अद्र ! त्वमपि शवाभिप्रायं निवेदय”।
सोऽन्रवीत-“'देव | इष्टः स बलाधिको निर्मय्यादश्व तत्
लेन सह सन्धिविग्रदी न युक्तो केवलं यानमई स्थातारक्तत्व-
इस प्रकार संजीवीने चिप्रह मंत्रकी सम्मति कही । यह सुन (उसने)
अनुजीर्वासे पूछा । “भद्र | तुमसी अएन अमिप्रायको कहो” । वह बोछा-
“देन | वह दुष्ट अधिक बढी और मर्यादा रहित है । उसके साथ सेधि विग्रह
युक्त नहीं केवल यानही योग्य हे । कहा है"
बलोत्कटेन इष्टेन भर्यर्यादारहितिन च ।
न सन्धिकिशही नेव विना यानं भशस्यते ॥ ३४ ॥
वळसे उत्कट, दुष्ट मर्थीदा रहित इनत्रुते यानके विना संधि विग्रह प्रजित
नहीं हैं ॥ ३४ ॥
दिधाकार भवेद्या्न भयचस्तपरक्षणम् ।
एकमन्यञ्जिगीपोश्च यात्रालक्षणशुच्यले ॥ ३५ ॥
दो प्रकारका यान होता हे एक तो भथसे व्याकुछ हुएकी रक्षा कर्ती दूसरे
जीतनेकी इच्छा करमेत्रालका शश्चुक्े प्रति यात्रा करती ॥ ३५ ॥
कातिके वाथ चन्ने वा विजिगीषोः प्रशस्यते ।
यानसुत्कृ्टवाय्यल्य शचछदेशे न चान्यदा ॥ ३६ ॥
कार्तिक अथवा चैत्रमें जीतनेवाळेको यात्रा करनी श्रेष्ठ है बढ्वानूकोही
इन्रुके देशमें गमन करना उचित दे अन्यथा नहीं ॥ ३६ ॥
अवस्कन्दपम्रदानस्य सर्वे कालाः प्रकीत्तितताः ।
व्यसने वर्तमानस्य शत्रोश्छिद्रान्वितस्य च॥ ३७॥
व्यसनमें प्राप्त हुए और छिद्रताको प्राप्त इए शत्रुपर आक्रमण करनेके समूणे
काळ कहें हैं ॥ ३७ ॥
स्वस्थानं सुटढं कृत्वा शूरेश्वासैमंहाबलेः ।
परदेशं ततो गच्छेत्नणिधिव्याप्तमम्रतः ॥ ३८॥ `
ˆ अपने स्थानको विश्वस्त शूर महाबलियोंसे दढ करके भागे दूर्तोको करके
परदशको गमन करं | ३८ | हु है
भाषाटीकासमेतम् । (२९७)
अज्ञातविविधासारतोयशस्यो ब्रजेत्त यः ।
परराष्ट्रं छ नो भूयः स्वराष्ट्रमाथेगच्छाते ॥ २९ ॥
सुहृदळ, जळ, खरता इनका (बवा जाच जा परपुरुषर्क राज्यम चढ जाता
हे वह फिर अपने राय्यर्म बही भाता हे ॥ ३९ ॥
तत्ते युक्त कत्तेमपसरणम् ।
सो तुम्हारा यहासे पयानही करना युक्त है|
अन्प-
जआारभसा--
न विग्रह न सन्धाने बलिना तेन पापिना ।
काय्येछाममपेक्ष्यापसरणं क्रियते बुघेः ॥ ४० ॥
उस पापी बळीके संग विग्रह ओर सावे करनी नहीं चाहिये कार्यके लाभको
देखकर पडितको भपसरण करना चाहिये || ४० ॥
उक्तश्च यत्तः-
कारण कहा है-
यदपसरति मेषः कारणं तत्महतु
मृगपतिरपि कोपात्संकुचत्युत्पतिष्णुः ।
हृदथविदितवैरा यूढमन्वोपनचाराः
किमपि विगणयन्तो डुद्धिमन्तः सहन्ते ॥ ४१ ॥
जो मेष अपसरण करता हे इसमें शत्रुको प्रहार करनेकाही कारण है,
सिंहभी क्रोघसे जब हाथीके उपरको धाषमाव होता हे तब सकुचित होता
है, हयम वेर रखक्ताठ ke मत्रके डपचाखाले महात्मा बुद्धिमान् कुछ
विचारसेही शत्रुम उप्र सहन करते हैं || ४१ ॥
अन्धञ्च-
अारसा=
वळवन्तं रिएं इषा देशत्यागं करोति यः
युधिष्ठिर इवामोति पुनजीकुन्स मेदिनीम् ॥ ४२॥ `
बळवान् शत्नुका देखकर जा देश त्यागन करता हे वह युधिष्ठिरकी समान
जतिहाजा पृथ्वाका प्राप्त हाता हे ॥ ४२ |
(२९८) पञ्चतन्त्रस्। .
युद्धयतेःहेकति कृत्वा दुबेलो यो बलीयसा ।
स तस्थ वाञ्छित कुर्यादात्मनश्च कुलक्षयम् ॥ ४३ ॥
जो दुबेळ जहंकारसे प्रबळ शत्रुके साथ युद्ध करता हे वह उस (शत्रु ) का '
मनोरथ पूर्ण और अपना कुछक्षय करता है॥ ४३॥ ,
तद्वलवतामियुक्तस्थ अपसरणसमथो5य न सन्धेविग्न-
हस्य च । एवमतुजीविमन्त्री,पसरणस्य', । अथ तस्य
वाक्यं समाळण्ये प्रजीविनमाह- भद्र ! त्वमपि आ-
स्मनोऽभिप्राय वद १! साऽब्रबीत्+- देव! मम सन्धि-
बिग्रहथानानि त्रीणि अपि न प्रतिभान्ति विशेषतश्च
आसनं प्रतिभाति ।” उक्तश्च यतः- |
सो बलवानसे अभियुक्त होनेसे यह तुम्हारे पयानका समथ हे । सन्धि विग्र-
इका नहीं इस प्रकार अनुजीवीका मन्त्र अनुसरणका है” | तव उसके वाक्य
सुनकर ( वायसराज ) प्रजीवीसे बोळ।,-““मद्र ! तू भी अपने अभिप्रायको
कथन कर बह बोढा,-- देव ! मुझको सन्धि, विग्रह, यान ( समयको प्रतीक्षा
करनेको आसन कहते हैं) ( १) तीनोंही नहीं रुचते हैं विशेष कर आसन
अच्छा बिदित होता है। कारण कहा है कि-
नक्रः स्वस्थानमासाद्य गजेन्द्रमपि कषति ।
स एव प्रच्युतः स्थानाच्छुनापि परिभूयते ॥ ₹४॥
अपने स्थानमें स्थित नक्र गजेन्द्रकोभी खैँचळेता है और अपने स्थानक्ष
च्युत्त हुआ बही कुत्तेसे भी तिरस्कृत हो जाताहे ॥ ४४ ॥
अन्यख-
सौरभी-
अभियुक्तो बलवता दुर्गे तिष्ठेत्मयत्नवान् ।
तत्रस्थः सुहृदाह्वानं प्रकुर्वीतात्ममुक्तये ॥ ४५ ॥
जो बल्वानूसे अभियुक्त होकर यत्नसे अपने दुगेमे स्थित रहता है भोर
No बा "८
बबुहाँ स्थित होकर अपने छुटकारेके निमित्त सुद्ृदांको बुछावे || ४५ ॥
१ अचुके प्रति यात्रा करमना | ।
भाषाटीकासमेतम् । (२९९)
यो रिपोरागमं श्रत्वा भयसन्त्रस्तमानसः ।
स्वस्थानं सन्त्यज्ञेत्तत्र न स भूयो वसेन्नरः ॥ ४६॥
जो शत्रुक्न आगमन सुनकर, भयले सन्त्रस्तमन होकर अपने ' स्थानको
व्यागन कर देता है वह बहा फिर नहीं वस सकता है ॥ ४६॥
देष्टाविरहितः सपो मदहीनो यथा गजः ।
स्थानहीनस्तथा राजा गम्यः स्यात्सवजन्तुषु ॥ ४७ ॥
Se
डाढ़से हान जसं सपे, मदसत हान जस्त हाथो तएहा स्थानश्रष्ट राजा सब
. जन्तुञांक गम्य हाता है) ४७ ॥
च्छ
नेजस्थानास्थती5प्यकः शत याळ सहन्नरः
शक्तानामाष शत्रूणां तस्मात्स्थान न सन्त्यजेत् ॥ ४८ ॥
अपन स्थानम पियत हुआ एकह सो समथ रात्र भोका युद्धम सहन कर.
सकता हे इस कारण अपना स्थान त्याग न करे || ४८ ॥ वि
तस्मादुर्ग दं कृत्वा सुभटासारसंयुतस् ।
प्राकारपरिखायुक्त शखादिभिरलेकतम् ॥ ४९ ॥
इस कारण किलेको दृढ अपने वोधाओक्े बल्से सयुक्त पर कोटा खाईसेः
युक्त शल्लादिसे भठकृत कर ॥ ४९ ॥
तिष्ठ मध्यगतो नित्य युद्धाय कृतनिश्चयः !
जीवन्सम्माप्स्यसि क्मान्तं मृतो वा स्वर्गमेष्यसि ॥ ५० ४
युद्धके निमित्त निश्चय करके उसके मध्यम नित्यही स्थित हो जीनेसे
सम्पूर्ण पृथ्वीकी प्राति ओर मरनेपर खै प्राप्त होगा ॥ ९० ॥
अन्यच
औरमी-
बलिनापि न बध्यन्ते लघवोऽप्येकसंश्रयाः ।
विपक्षेणापि मरुता यरथेकस्थानवीरूधः॥ ५१ ॥
कहा हे कि, यादे लघु एकताको प्राप्त हो जावे तो बळवानसे नहीं बध सक्ते-
जैसे प्रतिकूळ वायसे एक स्थानके दक्ष ॥ ५१ ॥
~ महानप्येकजो वृक्षो बलबान्छुमतिष्ठितः। -
भसह्य इव वातेन शक्यो धषेषितुं यतः ॥ ५२ ॥
(३००) पश्चतन्त्रम्।
महान् इकळा वृक्ष बळवान् ओर प्रतिष्ठित हो उसको भी वळसे वायु सहसा
घर्षण कर सकती है | ५२॥ ,
अथ थे संहता वक्षाः सवतः सुप्रतिष्ठिता3 ।
न ते शीघ्रेण वातेन हन्यन्ते झोकसंश्रयात् ॥ ५३ ॥
और जो मिले इए वृक्ष सब ओरसे प्रतिष्ठित हैं उन्हे इकड़े होनेसे एक साथ
वायु प्रहार नहीं कर सकती ॥ ५३ ॥
एवं मन्नुष्यमेक च शोय्येंगापि समन्वितम् ।
शक्यं द्विषन्तो अन्यन्ते हिंसन्ति च ततः परम् ॥ ९४ ॥
इपी प्रकार झूरतासे युक्त इकळे मनुष्यको शत्रु तिरस्कारके योग्य मानते
2 ४८. घय
ह आर उसका वमा करलेते ह ॥५४॥
एवं प्रजीविमन्त्र इदमासनसंज्ञकम । एत्समाकण्ये चि-
रश्नीविनं माह्,-“'भद्र ! त्वमपि स्वाभिप्रायं वद!” । सोध्ज-
वीत- देव ! षाड्गुण्यमध्ये मम संश्रयः सम्पक् प्रतिभाति ।
तत् तस्य अनुष्ठान कार्य्यम् । उक्तश्च-
इस प्रकार प्रजीवीका यह मंत्र आसनसंज्ञक है”, | यह सुनकर वह चिरं”
जीवीसे बोछा,-“मद्ग | तुम भी अपना अभिप्राय कहो?? | वह बोळा, “देव!
(सन्धी आदि ) छः शुणोंके बोचमें मुझे ( १ ) संश्रयही भजा, विदित होता ह।
सो उसकाही अनुष्ठान करना चाहिये १ कहा है-
असहायः समर्थोऽपि तेजस्वी कि कारिष्याति ।
निर्वाते ज्वलितो वह्निः स्वयमेव-प्रशाम्घति ॥ ५५॥ `
समर्थ तेजस्वी यदि असहाय हो तो क्या कर सकता है वातराहित स्थान
-अज्वालित आगे आपही शान्त हो जायगी ॥ ५५ ॥
सङ्गतिः श्रेयसी पुंसां स्वपक्षे च विशेषतः ।
ठुषेरपि परिश्रष्टा प्ररोहन्ति तण्ड्लाः ॥ ५६ ॥
पुरुषोंकी अपने पक्षको संगति करनी विशेष कर कल्याणकारक, हे भूपि
राहत इए चावळ उगवकां समथ नहीं हात ॥ ५६ ॥
१ बलबानसे अभियुक्त हो प्रचलको आश्रय करना | , .
भाषाटीकासमेतम्! (२०१)
वदतैव स्थितेन त्वया कश्चित् समर्थः समाश्रयणीयः ।
यो विपत्मतीकारं करोति ! यदि पुनस्त्वं स्वस्थानं त्यक्ताः
“अन्यत्र यास्यसि, तत कोऽपि ते वाङ्मात्रेणापि सहायस्वंः
न करिप्याति । उक्तश्च यतः-
सो यहां स्थित होकर तुम किसी, समर्थका आश्रय करो जो विपत्तिका
प्रतीकार करे । और जो तुम अपने स्थानको त्यागनकर अन्यत्र चळे जाओगे ।
तो कोई तुम्हारी वाणी मात्रसें भी सहाय न करेगा | कहा है-
वनानि दहतो वहेः सखा भवति मारुतः ।
स एब दीपनाशाय कुशे कस्यास्ति सोहदम ॥ ५७ ॥
आभिके घन जळानेमे पवनःउसका संखा होता हे और दीपका वही नाझ
करता हैं दु्ेलतामें कौन किसका मित्र होता है ॥ ५७ ॥
अथवा न एतत् एकान्तं यद्वालिनमेकं समाश्चयेत् ।
लघूनामषि संश्रयो रक्षायै एव भवाति । उक्तश्च यतः-
और यही सिद्धान्त नहीं कि, बढीका आश्रय किया जाय लघुओका मी
आश्रय रक्षाके निमित्त, होता हे । कारण कहा हे-
संघातवान्यथा वेणुनिबिडो वेणुभिबतः ।
न शक्घः स समुच्छेडुँ दुनेलोछपि तथा वृपः ॥ ५८ ॥
बासोसे आकीर्णे समूहका अवढम्वी सघन वेणु जैसे उच्छेदन नहीं हँ
सकता तेसेही दुर्बळ राजा ॥,५८ ॥
यदि पुनरुत्तमसंश्रयो भवति तत्किमुच्यते । उक्तश्च-
और जो फिर उत्तम पुएषका आश्रम हो तो क्या कहना । कहा है-
महाजनस्य सम्पर्कः कस्य नोन्नतिकारकः ।
पञ्चपत्रास्थितं तोंयं धत्ते मुक्ताफलश्ियम् ॥ ५९ ॥
महाजनोंका सम्प५ किसको उन्नति नहीं करता है पदमपत्रमें रखा हुमा
जळमी मोतीकी समान कान्ति धारण करता है॥ ५९ |]
तदेवं संश्रयं विना न कश्चित् प्रतीकारों भवाति।
तस्मात् संश्रयः कायय इति मेऽभिभायः । एवं चिरश्जी-
विमन्तः?? । अथ एवमभिहिते स मेधवेणी राजा चिर-
£ ३०९) पश्चतन्त्रम् ।
' - न्तनं पितृत्ताचेबं दीर्घाषुषं सकलनीतिशाख्पारङ्गतं
स्थिरजीविनाभानं प्रणम्य भोवाच- लात ! यत् एते
मयाः पृष्टाः सांचिवाः तावदत्र स्थितस्यापि तव परी-
क्षार्थ, येन त्वं सकलं शृत्वा यडचितं तन्मे समादिशसि।
तत यद्युक्त भवाति तत्समादेश्यम?' । स आह-' “वत्स!
संवरपि एतेरनीतिशास्त्राअ्रयसुक्तं सचिदेः । तढुपयुज्यते
स्वकालोचितं सवमेव, परमेष देधीभावस्य कालः।
उक्तश्व- ण ,
सो संभ्रयके मिना किसीका प्रतीकार नहीं होता । इस कारण संश्रय करना,
चाहिये एस्ता मेरा अभिप्राय है । यह चिरज्ञीवीका मंत्र है?” - ऐसा कहनेपर घह
मेघवर्णं राजा पुराने पिताके मंत्री दीर्घआयुबाळे सकळ नातिशास्रके पारगामी
स्थिरजीविनामवालेको प्रणाम कर बोळा,-“'तात ! इतने मंत्रियोंसे जो आपके
'स्यतने मने इछाहे, सो पर्राक्षाक निमित्त जिसस तुम सब घुनकर जो मेरे "र
हो सो कहो जो युक्त हो सो तुम आज्गादो”बह बोला-“ब्स इन सबों मंत्रियोंने
ही बीतिशाद्नका भाश्रव कहाहे । सो अपने काळके अनुसार सबही उचित हँ
परन्तु यह द्वैधी ( १ ) भावका समय हे । कहाहै-
अविश्वास सदा तिष्ठेत्लन्धिना विग्रहेण च ।
द्वेधीमावं समाश्रित्य नेव शत्रो बळीयासि ॥ ६०॥
संधि ओर मिग्रहसे सदा भविश्वाससे स्थित रहे किन्तु प्रबळ शवुम दवेघीमा-
वको प्राप्त बोकर अविश्वासमे स्थित नरहे ( दवेधीमावसे शत्रु ) जीते जाते है॥६ ०॥
तच्छत्वे विश्वास्य अविश्वईतेलोमं दर्शयाद्विः सुखेन उच्छि-
झले रिपुः । इक्तश्व- ”
सो शत्रुको विश्वास देकर "लोमे 'दिखानेवाले अविश्वासियोसे शत्रु सुखे
उच्छदक्षो प्रापतहोताहै, कहांहे-
उच्छेद्यमपि विद्वांसो वद्धेयन्स्यारिमिकदा ।
गुडेन बद्धितः छेष्मा झुखं बुद्धया निपात्यते ॥ ६१ ॥
2 सोदेग्धहोकर खित रहना ।
शा
भाषाटीकासमेतम् । (३०३)
पडित जन नाश करने योग्य शत्रकोमी बढाते हैं कारण कि, गुडसे इद्धिकों
प्राप्त इआ कफ सुखसे निपातन किया जाताहे ( इसी प्रकार प्रथम विश्वासकों
अठत्पन्न कर शत्रुको बढावे पछि मार डाळे )॥ ६१ ॥
तथाच-
तैसेही-
स्त्रीणां शत्रोः कुमित्रस्य पण्यस्रीणां विशेषतः ।
यो भवेदेकमावेन न स जीवाति मानवः ॥ ६२॥ -
ल्लीका, शत्रुका, कुमैत्रका विशेषकर वेश्याओंका जो मित्र होता हे वह मलुष्य
“जीता नही हे ॥ ११ ॥
कृत्यं देवद्षिजातीनामात्मनश्व गरोस्तथा ।
एकभावेन कत्तेव्षं शेषं द्वेषं समाभितम् ॥ ६३ ॥
देवता द्विज भपना और गुरु इनसे निरन्तर एकमावते रहना चाहिये और
ङ हृत्य देघीमादसे करना चाहिये ॥ १३ ॥
एको भावः सदा शस्तो यतीनां भावितात्मनाम!
खीलुब्धानां न लोकानां विशेषेण महीभ्ताम् ॥ ६४॥
ज्ञानीयतियोंको सदा एकभावसे रहना चाहिये ओर विशेषकर खली छुन्धक
तथा राजाओंको एकभाव नहीं करना चाहिये || ६४ ॥
तट्टैधी नावं संश्रितस्य तव स्वस्थाने वासो भविप्यति
लोभाश्रयाच्च शश्ञसुञ्चाटायिष्यसि। अपरं यदि किञ्चित्
छिद्रं तस्य पश्यसि तद्गत्वा व्यापादाथिप्यासि? मेघवर्ण
आइ- "तात! मया सीऽविदितसश्रयः, तत् कथं तस्य
छिद्रं ज्ञास्यालि” । स्थिरजवी आइ-“वत्स न केवलं
स्थानं छिद्राण्यपि तस्य प्रकटीकरिष्यामि अणि-
विभिः । उत्तश्व-
सो दैथीभावको प्रा होकर तुम्हारा इसी रथानमे निवास होगा लोभके
आश्वयसे शत्रुको उच्चाटन करसकोगे । और यदि पिसी प्रकार उसका छिद्र
देखो तो जाकर मार डालना” | मेववश वोडा- तात मुझे उसके भाश्रयकी
{ ३०४) पञ्चतन्त्रम् ।
hn, has
खबर नहीं । सो कैसे उसका छिद्र जानू?!) स्थिरजीवी बोला--“वत्स | स्थानही
नहीं उसका ढिद्रभी दुर्तोद्वारा प्रगट करूंगा । कहाहै-
गावो गन्धेन पश्यन्ति वेदैः पश्यान्ति वे द्विजाः ।
चारैः पश्यन्ति राजानश्चक्षुम्थामेतरे जनाः ॥ ६५ ॥
गो गन्धसे देखती हैं, ब्राह्मण वेदसे देखते हैं, राजा दूतोंसे देखते हैं, दूसरे
जन नेत्रोंसे देखते हैं ॥ ६५ ॥
डक्तश्वात्न विषये,-
इस विषयमै कहाहे- |
यस्तीथानि निजे पक्ष परपक्षे विशषतः ।
गुविश्वारेनंपों वोचि न स इगोतिमाप्लुयात्॥ ६६ ॥
जो दूतों द्वारा अपने पक्षके तथि ( अठारह स्थान ) जानता है षह राजा
दुर्गतिको प्राप्त नही होता ॥ ६६ ॥”
नघवर्ण आइ-''तात ! कानि तीर्थानि उच्यन्ते कति
संख्याति च, कीदशाः गुक्तचराः, तत्सर्वे निवेद्यताम्
इति। स आइ- अन्न बिषय भगवता नारदेन सु-
विष्टिरः प्रोक्तःयच्छडपक्षेऽछादशतीथानि स्वपक्षे पञ्चः
दश। निभिः निभिः गुतचरेस्तानि ज्ञेयानि । तेः ज्ञातेः
स्वपक्षः परपक्षश्च वश्यो भवाति। उक्तत्व नारदेन युधि-
ष्ठिरं प्रति-
मेघवर्ण बोला,--“तात | तीथ किनकी कहते हैं ? उनकी कितनी संख्या
है £ गुप्तचर केसे होते हैं सो आप काहिये”? बह बोळा-““इस बिषयमे भगवाज्न्
नारदने युविष्ठिरसे कहाहे । कि, शत्नपक्षमें अठारह तीथे आपने पक्षमें पन्द्रह
होते हैं । तीन २ गुप्त चरोंसे जानने चाहिये । उनके ज्ञानसे अपना पराया पक्ष
चश्मे होता हे । नारदने युधिएिरसे कहा हे-
कचञ्चिदष्टादशान्येषु स्वपक्षे दशपंच च ।
निमिस्त्रिभिरविज्ञातेर्वेत्ति तीर्थानि चारकेः ॥ ६७॥
तीन २ गूढ दूवोंसे श्रुपक्षमें अठारह और अपने पक्षमें पन्द्रह तीष
जानना ॥ ६७॥
माषादीदासमेतय । (३०५)
तीर्थशब्देन अयुक्तकर्माभिधीयले तद्यादि तेषां कुत्सितं भव"
गत तत्स्वामनोशभघाताय भवात | रधान अवाच तद्वृद्धय
क्थादात । तद्यया-मन्त्रा पुराहत्तः सनापातयुवराजो दावा-
Tरकऽन्तवाासकः प्रशासक समाहठसान्नथादमदटञञापक्ाS
साधनाध्यक्षा गजाध्यक्षः काशाध्यक्षा दमपारकरपालसा”
सापाळमात्कटम्टत्या१ एषो सदन द्राक ।रपुः साध्यत स्वपध्ल
नच देवी जननी कडकी मालिक! शय्यापालकः स्पशाध्यक्षः
सांवत्सरिको मिषजलवाहकः ताम्बूलबाहकः आचायोंऽ-
रक्षक! स्थानचिन्तकः छनघरो विछालिनी एषां वेरद्वारेण
स्वपक्षे विघातः । तथा च-
तीथेशब्दसे शत्रुके जय करनेका उपायरूप कर्मे जानना । सो यदि घह कर्म
उनका कुत्सितहों तो स्यामौके नाइके निमित्त होताह । प्रधान हो तो उसकी
द्विके निमित्त होता ६। सो जेते मत्री, पुरोहित, सेनापति, युवराज, द्वारपाल,
अन्त पुरचारी, झासनकती, करसम्रहकती, सदा निकटवर्ती, प्रदेश ( प्रदशेक १,
ज्ञापक ( सवादछेजानेवाळा ), साघनाभ्यक्ष ( सेनापति ), गजाव्यक्ष, खजानची,
दुगरक्षक, कररक्षक, सीमापालक, प्रबळ कर्मचारी इनके भेदसे शीत्रही शत्र
वशीभूत होजाताहै। ओर अपने पक्षमें रानी, माता, कचुकी, अन्त.पुरचारी इद्ध,
` ( विग्रगुणोंसे युक्त ), मालाकार, ` सेजकी रक्षाकरनेवाळा, स्पर्शाष्यक्ष ( हुगधिः
छगानेषाळा ), व्योतिषी, वैद्य, पनिहारा, ताम्बूळदाता, गुरु, शरीररक्षक,
स्थानके सदू असदूका ज्ञाता, छत्रधारण करनेवाळा, वेश्या इनके वैरविरोध॑से
निजपक्षका घात होताहे । तयाच-
वेद्यसांदत्सरिकण्वाय्याः स्वपक्षेऽथिकताश्वराः !
, यथाहिठुण्डिकोन्मत्ताः सर्वे जानन्ति शज ॥ ६८॥ `
वेय, ज्योतिषी, गुरु, अपने पक्षके अधिकारी चर, आहिहुण्डिकासे उन्मत्त
विपनैद्य गूढचारी शत्रुफा सत्र मेद जानतेहे ॥ ६८ ॥ ,
तथाच
तैसेही-
ध
३०
(३०६) पञ्चतन्त्रम् ।
कुत्पाकृत्यविदस्तर्थेष्वन्तःप्रणिधयः पद्म्
विदांङुवेन्ठु महतस्तलं विद्विषदम्भसः ॥ ६९ ॥”
कार्यके जाननेबाळे गूढ चर उक्त मंत्रादि अठारह स्थानेंमें अन्तर पदकरके
महान् शत्रुरूपी जळके तळको जाने |! ९९ |!
एवं मन्निवाक्यमाकण्ये अत्रान्तरे मेघवणे आह,-“तात!
अथ कि निमित्तमेवंविधं प्राणान्तिकं सदेव वायसोलकानां
वेरम् १”। स आह,-““बत्स ! कदाचित् हंसशुकबककोकि-
लचातकोलूकमयूरकपोतपाराबतविष्किरंमभ्॒तयः सर्वेऽपि
पक्षिणः समेत्य सोद्वेगं मन्त्रथितुमारब्घाः । “अहो !
अस्माकं तावद्वैनतेयो राजा-स च वासुदेवभत्हः न कामपि
चिन्तामस्माकं करोति। तद् कि तेन वृथा स्वामिना यो
छुब्घकपाशे: नित्यं निवध्यमानानां न रक्षां विधत्ते। उक्तश्व-
इसप्रकार मेत्रिके वाक्यको सुनकर इसी समय मेघवर्ण बोछा,-“तात !
किस निमित्त इसप्रकार प्राणहारी सदाका वायस उळूकॉका वैरहे ! ” षह
बोका,- बत्स ! एक समय हंस, तोत, बगळे, कोकिल, चातक, उदक,
मयूर, कपोत, पारावत, विष्किर ( चिडिया ), आदि ,सब पक्षी मिलकर उद्वे
सहित सम्मति करने ठगे “महो | हमारे गरुड़ राजाहे, वह वाझुदेवके भतत
हमारी कुछमी चिन्ता नहीं करतेहे, सो उस दथा स्त्रामीसे क्याहे जो ठुब्धकोके
जालसे नित्य बंधेहुए हमारी रक्षा नहीं करते । कहाहै-
यो न रक्षति वित्रस्तान्पीह्यमानान्परेः सदा ।
जन्तून्पार्थिवरूपण स कृतान्तो न संशथः ॥ ७० ॥
जो शन्रुसे पीडित हुए भत्योंकी रक्षा नहीं करताहे तथा भयमीत जनोंकों
जो रक्षा नहीं करता इसमें सन्देह नहीं बह राजा कारूरूपहै ॥ ७० ||
सदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजाः ।
अकर्णधारा जलधो विषवेतेह नोरिब ॥ ७१ ॥
जो राजा मळीप्रकार शिक्षाकरनेबाळा न हो तो प्रजा बिना माहे साग-
समे नाषकी समान पीडित होतीदै ॥ ७१ ॥
भाषादीकासमेतम् | (२३००).
घडिमान्पुरुषो जह्याद्भिन्नां नावमिवार्णवे ।
अप्रवक्तारमाचार्य्यमनधीयानमसृत्विजम् ॥ ७२ ॥
अरक्षितारं राजानं भार्य्या चामिथवादिनीम्।
आमकामं च गोपालं वनकामं च नापितम् ॥ ७३ ॥
` पुरुष सागसं टूटी हुदै नावकी समान इन छ;को व्यागदे प्रकृष्ट वाक्यसे
रहित आतार्य, अध्ययनसे रहित ऋत्विज, अरक्षिता राजा, अप्रिय वचन
चोखनेबाळी आयी, ग्रामछुब्ध गोपाळ और बनको इच्छा करनेपाछे नापित ये
अबस्य त्याज्य हैं ॥ ७२ ॥ ७३॥
`. तत् सञ्चिन्त्य अन्यः कश्चित् राजा विहङ्गमानां क्रियता-
म? इति। अथ तेः मद्राकारसुल्कमबलाोक्य सर्वेरभिहि-
तम् । “यत् एष उलूको राजा अस्माकं भविष्यति तदानीय-
न्तां वृपामिषेकसम्बन्धिनः सम्भाराः? इति । अथ साधिते
'विचिधतीथोद्के, प्रगुणीकृतेऽष्टोत्तरशततमालिकासंघाते, प्रदत्ते
सिंहासने, वरत्तिते सप्तद्वीपसम॒द्रभूधरविचित्रे धरित्रीमण्डले,
प्रसारिते व्याघ्रचमीणि, आपूरितेषु हेमकुम्भे दीपेषु बाद्यु
न सज्जीकृतेषु दर्पणादिषु माङ्गल्घवस्ठुषु, पठत्सु बन्दिमुख्येघु,
वेदोचारणपरेषु ससुदितमुखेषु बराह्मणेषु, गीतपरे युवतीजने,
_ आनीत्ायामग्रमहिष्यां कूकालिकायासळूकोऽमिषेकार्थ
यावत् सिंहासने उपविशाति तावत् कुतोऽपि वायसः समा-
"यातः । सोऽचिन्तयत, “अहो ! किमेष सकलपक्षिसमागमो
महोत्सवश्च’ अथ ते पञ्षिणः ते इष्टा मिथः भोञः- “पक्षि-
"णाँ मध्ये वायसः चतुरः श्रूयते । उक्तश्च~
„ सो विचारकर और कोई विहगमोका राजा करो” ] तव उन सबने शोभन
| अगबाछे उळूकको देखकर कहा-- कि यह उछक हमारा राजा होगा, सो
राज्याभिपेक सम्बन्धी सामग्री ठाओ” | तब अनेक तीथॉके जल ळावेपर और
२०८ एझसो आठ औषधियोंके प्रात होनेपर, दिये सिंहासनमें वर्तनेमे, सात
द्वीप समुद्र पबेतके विचित्र घरणीमण्डळमे व्याप्रचर्मके फेखानेमें, भरे खुवर्ण
कुम्मोके घरे जाने तया दीपक बढ्ने भोर बार्जोके बजनेमें, तथा दण भादि
(३०८) पञ्चतस्त्रम् ।
कप
|
ष
मे, वंदी सु के पढने, वेदोचारणम तत्पर उदित
वेळ
मंगळ वस्तुभोके स ख्य
सुख ब्राह्मगोंके होनेमें, ख्रीजनेंके गीत गानेमें, प्रधान पटरानी कृकालिकाके
ठाने मे, उद्क अभिपेकके निमित्त जवतक सिंहासनपर वेठताहे, तवतक कहाते
एक वायल आगया वह विचारनेढगा । “अहो ! क्या यह सम्पूर्ण पक्षिय
समागमका महोत्सवह”' । तत्र यह पक्षी उसे देखकर परस्पर कहनेठगे-पक्षि-
योक मध्यमे वायस चतुर सुता जाताहे । कहाहे-
नर्णां यापिलो धूत्तः पक्षिणां चेव बायलः ।
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ऐमे नाउ, पत्चियोंधे बायत, डाढवाळोमें खगाळ, तपस्विोमें खेतमिश्षु 7
॥ ७४ ॥
दस्यापि बचन याह्मम् । उक्तश्च-
इतका वचनभा अहणकरना चाइव | कहाई--
बहुधा बहुनिः साहू चिन्तिताः खुनिरापिताः ।
कथशिन्न विलीयन्ते विदृद्धिश्चिन्तिता नयाः ॥ ७५ ॥?
अनेक प्रक्तार वहुर्तोके साथ विचारकर निरूपण की तथा विद्वार्नोते विचारी
हुई नीति किसी प्रकारसेमी बिकारको प्राप्त नहीं होती | ७५ ॥?
अथ वायस+ समेत्य तानाह, “अहो ! कि महाजनस-
मागमोऽ्यं परमनदहोत्सबश्व ' । ते मोड“ मो ! नास्ति
कश्चिद्विइङ्गनाना राजा । तदस्य उलकस्य विहङ्गराज्याभिः
वेको निरूपितस्तिष्ठति समस्तपक्षिभिः । तत् त्वमपि स्वः
मतं देहि, स्तादे समागतोऽसि” । अथ असो काको
विहस्य आह-“ अहो ! न युक्तमेतत् यन्मयूरहंसकोकिलच-
ऋवाकरुकव्दारण्डवहारीतसारसादिए पक्षिमधानेदु विद्य”
खानेषु दिवान्धस्य अस्य करालवक्कस्थ अभिषेकः क्रियते ।
लन्न-एतत् मन मतम् । यतः , «
तव काक मिळकर उनसे बोढा- अहो ! यह क्या महाजरनोका समागम
परम महोत्सवहे ? ” | वे बोळे<“मो ! कोई पक्षियोका राजा नहीं है। सो
me
डस उद्रको (दगबाक राज्यम आभषेक निद्यण किया हं समस्त पादयसि
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भाषाटीकासमेतम् । (३०९)
२ सत्कृत ) स्थित है । सो तूमी अपना मतदे | कारण कि, प्रसगके प्रारममे
भायाहै”” । तब यह काक हसकर बोढ[-“अद्दो | यह तो बात ठीक वहीं
"जो मोर, हस, कोकिला, चक्रवाक, छक, कारण्डव, हरियळ, सारस आदि
प्रधान पक्षियोक्षी विद्यमानतामे दिनमें अन्धे इस भयकर मुखको अभिषेक कर-
तेहो ! सो मेरी इसमें सम्मति नहीं ।
वक्रनासं सुजिह्माक्षं करममियदर्शनम् । -
अकुद्धस्येद्रश वञ्च भवेत्क्द्वस्य कीदृशम् ॥ ७६ ॥
कुटिळ नासिका, कूरनेत्र, स्वमावसे कुटिळ, भग्रिय दीन, विना रोष किये
भी इसका मुख ऐसाहे, क्रोध करेगा तो केसा होगा ॥ ७६ ॥
तथाच-
सैसेही-
स्वभावरोद्रमद्युग्रै कूरममियवादिनम् ।
उलूकं नृपति कृत्वा का नः सिद्धिमेविष्याति ॥ ७७॥
समावसे रोड, भतिउम्र, कूर, भप्रियशदी उछफकों राजा करके हमारी क्या
सिद्धि होगी १ || ७७ ॥
- अपर वैनतेये स्वरामिनि स्थिते किमेष दिवान्धः क्रियते
राजा, तत् यद्यपि गुणवान भवति तथापि एकस्मित् स्वा-
सिने स्थिते नान्यो भूपः भशस्यते ।
ओर फिर स्वामी गरुडके स्थित होनेमे क्यों यह दिनका अधा राजा किया
NA 4८७
जाता ह, याद युणवानूमा हा तथाष एक साबाक स्थित हातर्प दूसरा राजा
चहा छापरवाष हसकता-
एक एव हितार्थाय तेजस्वी पार्थिवो भुवः ।
युगान्त इव भास्वन्तो बहवोऽत्र विपत्तय ॥ ७८ ॥
तेजली राजा एकही एध्वीके हितकरनेमें नियुक्त होताहै बइतोके परस्पर
| देतसं प्रजाका उच्छेद होताहे | ७८ |
तत् तस्य नाम्नापि सर्य परेषामगम्धा अविष्यथ । उक्तश्च
ए क.
सा तुप उचक नामस शुभक हुधर्प होरहे हां । कहा हन
रुरूणां नाममान्नेऽपि गृहीते स्वामिसम्भवे ।
इष्टानां पुरतः क्षेमं तत्क्षणादेव जायते ॥ ७९ ॥
(३१०) पञ्चतन्त्रम् ।
स्वामा सम्बन्धा बड पुरुषाका नाममात्र ग्रहण करनममा दुष्टोक आग उसा
समय क्षेम होजातीहे ॥ ७९ ॥
तथाच-
तसहा--
व्यपदेशेन महतां सिद्धिः सञ्जायते परा ।
शशिनो व्यपदेशेन वसन्ति शशकाः सुखम् ॥ ८०॥”
तथा बडे पुरुषोंके ब्याजसे बडी सिद्धि होतीहे चन्द्रमाके नामसे खरगोश
प्रसन्न ( सुखी ) रहते हैँ | ८० |”
ते ञचुः-“कथमेतत् ?? स आह-
वे बोठे-“यह कसी कथाहे १? वह बोला-
कथा ३.
कस्मिश्चित् वने चतुर्दन्तो नाम महागजो ग्रथाधिपः
प्रतिवलति स्म । तत्र कदाचित् महती अनात्रष्टिः सञ्जाता
प्रभूतवर्षाणि यावत् । तया तडागद्वदपल्वलसरांसि शोषसु-
पगतानि । अथ तेः समस्तगजेः स गजराज; परोक्तः देव!
पिपासाङला गजकलभा झृतप्राया अपरे भृताश्च । तत्
अन्विष्यतां कश्चित् जलाशयो यत्र जलपानेन स्इस्थताँ
ब्रजन्ति’ । ततश्चिरं ध्यात्वा तेन असिहितम्- अस्ति
महान् हदो विविक्ते प्रदेश स्थलमध्यगतः पाताळगङ्गाजलेन
सदेव पूर्ण; । तत् तत्र गम्यताम्” इति । तथानुछिते पश्चरा-
चसुपसपद्धिः समासादितः तेः स हः । तत्र स्वेच्छया
जळमवगाह्य अस्तमनवेलायां निष्क्रान्तास्तस्य च हृदस्य
समन्तात् शशकबिला असंख्याः खुकोमलभूमो तिष्ठन्त ।
“कपि समस्तेरपि तेर्गजेरितस्ततो भ्रमद्भिः परिभञ्नाः बहवः
शशका अश्नपादशिरोमोबा विहितः केचिन्मृताः केचिज्जी
वशेषा जाताः । अथ गते तस्मिन् गजछूथे शशकाः सोगा
गजपादक्षुण्णलमाबासाः केचिद्धञ्मपादा अन्ये जजरितकले
भाषाटीकासमेतम् । (३११)
वरा रुधिराप्छुता अन्ये हतशिशवो बाष्पपिहितलोचनाः
समेत्य मिथो मन्त्र चछः । “अहो ! विनष्टा वयम्, नित्य
"मेव एतट्वजग्चथमांगमिष्यति यतो नान्यब जलमास्न | तत
सवषा नाशा भावष्यात । उक्तश्व-
कसी एक वने 'चतुदेन्त नामक महागज यूथाधिपति रहताथा । वहा कभी
बडी अनावृष्टि कितने वर्षोतक रही । उससे तडाग, हृद छोटे सरोवर सूख-
गये । तब उन सम्पूर्णे हाथियोंने उस गजराजसे कहा--“देव ! प्याससे व्याकुळ
हाथियोंके बच्चे मृतवत् हो गये हैं और कुछ मरगये हैं । सो कोई जढाशय
` खाजा जहा जळ पानकर स्वस्थताको प्राप्त हो जाय । तत्र चिरकाळतक ध्यान-
कर उसने कहा-- “दै एक महान् हद एकान्त स्थानमें स्थळके मध्यदेशमें पाताळ-
गगाके जळते सदा एणे रहताहे सो वहा चलो?” ऐसा करने पर पाच राते
उस सरोवरे प्राप्तहए । वद्य स्वेच्छासे जरम भवगाइन कर सन्ब्यासमय उसमैसे
निकले । उस हदके चारो ओर झशकोके-भसख्य बिल कोमळ मू मिमे स्थित ।
वे सपूर्ण इधर उधर घूमते हुए मम होगये बढते खरगोश ममपाद शिर गर्दै
नवाळे होगये कोई मरगये कोई जीवनशेषवाले दोगये | तव उस गजयूथके
जानेमै खरगोश उद्देगयुक्त हाथीके पेरोसे दळित सश्रयवाळे कोई भनम्नचरण कोई
जर्जेरित शरारवाळे रुघिरसे व्याप्त कोई बाळझोके मरनेते नेत्रोषे आसूमरे मिल-
कर परस्पर सम्मति करने छगे | “अहो ! हम नष्ट हुए जो नित्यद्दी यह गज-
समुह यहा आवेगा क्योकि ओर जगह जळ नहाहे । कहाहै-
~
स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजङ्गः ।
हसन्नपि नृपो हन्ति मानयन्नपि दुर्जनः ॥ ८१ ॥
हाथी सर्श करते ही मारता है, सर्प सूवतेही मारता है, हेसतेही राजा
मारता है मान करतेही दुर्जेन मारता हे ॥ ८१ ॥
तञ्चिन्त्यतां कश्चिइपारथः, तत्रेकः भोवाच- गम्पता
दशत्यागन, (कमन्यत, उक्तव मडुना व्यासन च~
सो कोई उपाय विचारों” उसमेसें एक बोढा,-+ दिशत्याग कर चरे जाओ
भोर क्या है। मनु ओर व्यासने कहा है--
(३१२) ` पञ्चतन्त्रस्।
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुल त्यजेत्
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ ८२ ॥
कुळके वास्ते. एकको त्यागन करे, ग्रामके वास्ते कुळको त्यागदे देशके वास्ते
ग्रामको त्यागेद अपने निमित्त पृथ्वीको त्यागदे | ९२ ॥
। क्षेम्यां शस्यप्रदां नित्य पशुद्ाद्धिकरीसपि ।
परित्यजन्तृपो सूमिमात्मार्थमविचारयन् ॥ ८३ ॥
कस्याणबाळी, शस्य देनेवाळी, नित्य पशुकी बृद्धि करनेवाळी भी भूमिको
राजा विना बिचारं अपने Iनिसित्त ब्यागदे | ८३॥
आपदर्थं धनन रक्षेदारानक्षेद्धनेरपि ।
आत्मान सततं रक्षदाररापि घनेरपि ॥ ८४ ॥
आपत्तिके निमित्त धनका रक्षा करे, घनोसेभी खी, रक्षा करे, अपनी
आत्माको सदा त्री ओर धनसे रक्षाकरे ॥॥ ८४ ॥”
ततश्च अन्ये प्रोचुः-भोः ! पित्पेतामह स्थानं न शक्यते
सहसा त्यक्तम्। तत् करियतां तेषां छुते काचित् विभीषिका
यत् कथमपि दैवात् न समायान्ति । उक्तश्च-
तब और बोळे-" मो ! पितृ पितामहका स्थान एक साथ त्यागन नहीं हो
सक्ता हे सो उनके निमित्त कोई भय देना चाहिये जो किसी प्रकार भाग्यसे व
आवे । कहा हे-
निर्विषेणापि संपण कतेव्या महती फणा ।
विषं भवतु मा वास्तु फणाटोपो भयङ्करः ॥ ८५ ॥!
निर्वाय सपंकाभी बड़ा फण करना चाहेय बिष हो या नहा फणाठाप
भयंकर हे ॥ ८५ |!
उत्थ अन्ये प्रोचुः-'* यदि एवं ततः तेषां महद्दिभीषिका-
स्थानमस्ति येन न आगमिष्यन्ति । सा च चतुरदूतायत्ता
विभीषिका । यतो विजयदत्तो नाम राजा अस्मत्स्वामी
शशकः चन्द्रमण्डले निवसाते तत् भेष्यतां कश्चित् मिथ्या
दूतो यृथाधिपसकाशं यत् “ चन्द्रस्वामत्र हदे आगच्छत
निषेधयति यतोऽस्मत्परिप्रहोऽस्य समन्ताद्वसति’ एवमा”
आषाटीकासमेतम् । (३१३)
दिते श्रद्वेयवचनात् कदाचिब्रिव्तेते ”। अथ अन्ये ओचुः-
4: यादि एवं तदस्ति लम्बकर्णो नाम शशकः । स च बचन-
'रचनाचतुरो दूतकमेज्ञ; । स तच प्रेष्यताम् इति । उक्तञ्च-
तब और वोळा-“ जो ऐसा हेतो उनको महा विर्भाषिकका स्थान हे जिससे
बह न आगे वह भय चतुर दूतक आधान है जो कि, विजयदः्त नामक राजा
हमारा स्वामी खरगोश चन्द्रमण्डक्में निवास करता हैं | सो भेजो कोई मिथ्या-
दूत यूथपतिके पास कि, “ चन्द्रमा तुमको इस हदें भनेका निषेध करता है,
जिस कारण कि, हमारे आश्रित इसके चारों ओर विवास करते हैं” । ऐसा
` कहनेपर श्रद्धावाळे वचनसे कदाचित् विशत्त हो जाया । भोर बोढे-- जो
ऐसा है तो यहा रम्बकर्ण चामवाळा खरगोश रहता है, वह वचबरचनामें चतुर
दूतके कर्मका जाननेवाळा है, इसीको वहा भेजो | कहा है- <
साकारा [नॅःस्प्हा वारमा नानाशसत्राचिचक्षणः ।
परचित्तावमन्ता च राशो दतः स इष्पते ॥ ८६ ॥
सुन्दर, अवयवसम्पन्न, लोभरहित वाक्पटु नाना शाक्व चतुर पराये चित्तकीं
बात जाननेबाछा दूत राजाभोंकों करता चाहिये ॥ ८६ ॥
अन्ध
आरमी-
यो मूर्खे लोल्यसम्पन्नं राजद्वारिकमाचरेत्।
मिथ्यावादं विशेषेण तस्य काय्थे न सिद्धयति ॥ ८७॥
जों मूख डुब्तर मिथ्बाबादो दूतको करता है उसका कार्य सिद्ध नहीं होता ॥ 2७
तदन्विष्यतां यदि अस्मादासनादात्मनां सुनिर्शुक्तिः? ।
अथ अन्ये प्रोचुः,-*' अहो ! युक्तमेतत्। न अन्यः कथ्िदु-
पायोऽसमाकं जीवितस्य, तथा एवं कियताम्” अथ लम्बक-
णो गजयूथाधिपसमीपे निरूपितो गतश्च । तथाइष्टिते लम्ब-
` कणोऽपि गजमार्गमासाद्य अगम्ये स्थलमारुह्य तगजसुवाच-
“भोभो इष्ट गज ! ।केमेच लालया पत शङ्कतमा अन्न चन्द्र”
हदे आगच्छसि। तन्न आगन्तव्यं निवत््यताम” इति। तदाकर्ण्य
विस्मितमना गज आह-'' भोः ! कस्त्वम् !!'! स आह-
(३१४) पन्वतन्नस । .
अहँ लम्बकर्णो नाम शशकः चन्द्रमण्डले वसामि । साम्मतं
भगवता चन्द्रमसा तब पार्श्वे रहितो दूतो जानाति एव
भवान्, यथार्थवादिनो दूतस्य न दोषः करणीयः दूतमुखाः -
हि राजानः सर्व एव, उक्तश्व-
सो इस दुखःसे अपना छुटकारा विचारा जावे? । तब और बोले,-/जहो !
यह तो सत्य है और कोई हमारे जीनेका उपाय नहीं हे सो यही करो” | तब
ळम्बकणे हस्तियूथपतिके निकट जानेम नियुक्त कियागया और गयामी । तैसा
करनेपर लम्वकर्णभी हायीके मागेको प्राप्त होकर दुर्गम स्थानमै चढ़कर उस
हाथीसे बोळा-''रे दुष्टाज ! क्यों इस प्रकार छीछासे निरशंक हो इस चन्दन -
आता हे सो अब मतआना छोटजा'? यह सुन विस्मित मन हों हाथी बोडा-
“मो ! तू कौन हे 0! वह बोळा,-“में लम्बकर्ण नाम खरगोश चन्द्रमण्डरमे
रहताहूं । इस समय भगवान् चन्द्रमाने तुम्हारे पास दूत बनाकर भेजा हे सो
तुम जानते हो । यथार्थवादी दूतका दोष नहीं होता हे। सब राजा दूतमुखबाछे
होते हैं । कहा है-
उद्यतेष्वपि शस्त्रेषु बन्डुवभवधेष्वपि ।
परुषाण्यपि जल्पन्तो वध्या दूता न भूमुजा ॥ ८८ ॥”
शल्लके उठानेपर, बन्धुकीके वध होनेपर, कठोर वाक्य कहते हुएमी दूतको
राजा न मार || ८८ ॥”
तत् शृत्वा स आइ-' भोः शशक | तत्कथय भगवतश्चन्द्र" `
मसः सन्देशं, येन सत्वरं क्रियत’! स आह-*'मवता अत्ती-
तदिवसे यूथेन सह आगच्छता घभूताः शशका निपातिताः
तत् कि न वेत्ति भवान्, यत् सम परिग्रहोऽयम्? तद्यदि
जीवितेन ते प्रयोजन तदा केनापि प्रयोजनेन अत्र ह्रदे न
'आगन्तव्थमिति सन्देशः] गज आह- “अथ क्क वर्तते भग-
वान् स्वामी चन्द्रः? । स आइ “अन्न हदे साग्मतं शशकानां `
-भवद्यूथनथितानाँ ' इतशेषाणां समाश्वासनाथ समायातः
तिष्ठाते । अहं पुनः तबान्तिक भेषितः?! । गज आइन यदि
गर्व तदशेय मे तं स्वामिनं थेन प्रणम्य अन्यत्र गच्छामि” ,
भाषाटीकासमेतम् । (३१५)
शशक आइ,- भो ! आगच्छ मया सह एकाकी येन
दशंयामि” । तथाठाडिते शशको निशासमये त गजं द्ृदतीरे
“नीत्वा जलमध्ये स्थितं चन्द्रबिम्बमदर्शघत् । आह च,-भो !
एष नः स्वामी जलमध्ये समाधिस्थः तिष्ठति तत् निशत
अणम्य सत्वरं ब्रजोति, नोचेत् समाधिभङ्गाद्ध्योऽपि प्रभूतं
कोपं करिष्यति’ । अथ गजोऽपि त्रस्तमना; तं प्रणम्य पुन-
रनागमनाय प्रस्थितः । शशकाश्च तदिनात् आरभ्य सपरि-
_ वाराः सुखेन स्वेषु स्थानेषु तिष्ठन्ति स्म । अतोऽहंत्रवीमि-
यह सुनकर वह वोळा,-“भो शशक ! सो भगवान् चन्द्रमाका सदेशा कहो
जिससे शीघ्र किया जाय” । बह बोळा,-''आपने कल दिन यूथके सहित
आकर बहुतसे खरगोश मार दिये, सो भाप क्या नहीं जानते कि, यह मेरा
परिग्रह हे सो यदि जीबनसे तुम्हारा प्रयोजन हे तो फिर इस हुदर्मे न आना यहीं
सन्देशा है” | हाथी वोळा,-“अब स्वामी चन्द्रमा कहा है'स् वह वोढा,- इसी
हृदं इस समय तुम्हारे वूथसे मयित हुए खरगोशोंके जो मरनेले शेष रहे ईं उनको
समझानेको यहा आये स्थित हैं। और मुझे तुम्हारे निकट भेजा हे'![गज बोछा;- “जो
ऐसा तो मुझे उन स्वामीको दिखाओ जिससे प्रणाम करक में अन्यत्र जाऊ?!
खरगोश बोळा-“मो ! मेरे साय इकळे आइये जिससे में दिखाऊ" तेतता करने-
पर खरगोश रात्रिके समथ उस यूयतिकू हृदके निकट ळेजाफर जलमे चन्द्र-
विम्वक्तो दिखाता हुआ | और वोळामी-“भो ! यह हमारा स्वामी जळके मध्य
समाधिमे स्थित हे सों एकान्तर्म प्रणाम कर शांत्र जाओ | नहीं तो समाधिके
मगसे फिर बडा क्रोध करेगा” | तव हाथी व्याकुळ मनसे उसे प्रणाम कर
चछा गया । खरगोश उस दिनसे लेकर परिवारसहित सुखसे अपने त्यानोमे
रहने लगे, इससे में कहता हू कि-
व्यपदेशेन महतां सिद्धिः स्यते परा!
शशिनो व्यपदेशेन वसन्ति शशकाः खुखम् ॥ ८९ ॥
वडोंके नामसे वडी सिद्धि होती ६, देखे चन्द्रमाको नामसे खरगोश सुखसे
रहने छगे ॥ ८९ ॥
(३१६) पश्चलन्त्रस्।
अपिच-
ओऔरभी-
अकृतज्ञ कापुरुषं व्घसनिनमलसं तथा सदा क्षुद्रम्।
पृष्ठ्ळपनशीळं स्वामित्वे नामियोजयेञ्ञाठु ॥ ९०॥
क्षुद्र आळसी कायर व्यसनी अकृतज्ञ ( उपकारका न माननेवाळा ) पीछे
'निन्दाका करनेवाला हो ऐसे पुरुषको स्वामी न करे ( जिसको जीनेकी
इच्छा है) ॥ ९० | |
क्षद्रमथपात प्राप्य न्यायान्वषणतत्परा ।
उभावपि क्षयं आप्तो पुरा शशकॉपिअळी ॥ ९१ ॥'
न्यायकी खोजकरनवाळे रारा कपिञ्जल नामक दोनों पि क्षुद्र अधर्पतिको
प्राप्त होकर- दोनोही मरगये | ९१ ॥'?
क
ते प्रोचुः,“ कथमेतत् ?” स आइ-
५ पिक
वे बोळ,-“यह केसी कथा हे १”? वायस बोला-
कथा २
कस्मिश्चिद्बृक्षे पुरा अहं अवसम्। तत्र अधस्तात् कोटरे
कपिञ्जलो नाम चटकः प्रतिवसति स्म। अथ सदेव अस्तम-
नवेलायामागतयोः द्वयोः अनेकसुभाषितगोष्ठया देवषित्र
सर्षिराजर्षिपुराणचरितकीत्तेनेन च परय्यटनदृष्टानेककौतूइ-
लप्रकथनेन च परमखुखमबुभवतोः कालो ब्रजति। अथ
-कदाचित् कपिश्षलः' भ्राणयात्रार्थमन्धेः चटकेः सह अन्य
पक्कशालिप्रायं देशं गतः! ततो यावत् निशासमयेऽपि न
आयातः तावदहं सोदेगमनाः तट्वियोगडुःखितः चिन्तित
वान् । “अहो ! किमद्य कपिलो न आथातः । कि केनापि
पाशेन बद्धः । उताहो स्वित् केनापि व्यापादितः । सवथा.
-यदि कुशलो भवति तन्मां बिना न तिष्ठति”?! एबं मे चि
न्तयत्तो बहूनि अहानि व्यतिकान्तानि'। ततश्च तत्र कोटरे
कदाचित् "शीघ्रगो नाम शशकोऽस्तमनवेलायामागत्य
प्रविष्ट मया अपि कपिश्नलनिराशत्वेन न निवारितः । अथ
भाषाटीकासमेतम् ! (३१७)
अन्धीस्मन्नहनि कॉपेजलू शालिभक्षणादतीव पीवरततु>
स्वमाशय स्मृत्वा भूयोऽपि ततेव समायातः । अथवा साइ
इृदसुच्यते-
प्रथम किसी बक्षके नीचे में रहता था। उसके वोचेकी खखोडळमे कार्पेजळ
नाम चटक रहता था । सदाही सूर्यके अस्तसमय भागे हुए हम दोनोकी अनेक
सुभापित गोष्टीर्य देवाण अहमपि राजषियोके पुराण चरित कीतनसे तथा पर्य्यट--
नके समय देखे हुए अनेक कोतूहळके कथनसे परम सुख अनुभव करते समय
बीतता । तब एक समय कर्पिजल प्राणयात्राके निमित्त दूसरे पक्षियों ( चटक )
7 के साथ और पके हुए धान्यके देशमे गया | सो जत्रतक यह रात्रि समयमे भी
नहीं आया, तबतक में उद्दिग्ममनसे उसके वियोगसे दु'खी हुआ विचारने-
लगा | “अहो | आज कर्पिजळ क्यों नआया, क्या कहीं पाझासे बन्ध गया, वा
कही किसीने मारडाळा ९ सदेथा यदि कुशळ होती तो मेरे पिया न रहता! |
इसप्रकार मरे बिचार करने पर बहुत दिन बीतगय । तब उतकी खखोडलमे
कदाचित् शीघगनामक खरगोश सुध्यासमप आकर प्रविष्ट इभा । मैनेमी
कपिजलसे निराश होनेके कारण निवारण न किया तब और दिन कपिळळ
शाळिमक्षणसे अतिपुष्टशरीर होकर अपने अश्चयक्रो यादकर फिरभी वहां आया,
अथवा यह अच्छा कहाहै-
न तादृग्जायते सोख्यमपि स्वर्गे शरीरिणाम् ।
दारिद्रयेऽपि (हे याचक स्थात्ह्वदेश स्वपुरे गदै ॥ ९२॥
शरीरधारियोंको ऐसा सुख स्वर्गेसे भी नहीं हे जेसे दारी अपने पुर देश
घरम सुखा हाताइई ॥ ५२ ॥?
अथ असा कोटरान्तगर्त शशक इष्ठा साक्षेपमाइ-''भोः
शशक ! नत्वया सुन्दर कुल यत् मम आवसथस्थाने प्रचि-
छागल, तव शार निष्कम्यताम्”? । शशक आह,-“'न तब
इद् गह कन्तु मस एवं । तत क मध्या परूषाण जल्पसि ६
उक्तश्व-<
तब यह कोटरक अन्तगत झशकको देख आक्षेपएर्वक बोछा,- सो शशक !
तुमने अच्छा नहीं किया, जो मेरे रहनेके स्थानमें तुम प्रविष्ट हुए । सो शत्र
(३१८) पञ्चतन्त्रम्।
क
इनेकल जाओ” शशक बोळा,-''यह तेरा नहीं किन्तु मेरा घर है । सो क्यों
मिथ्या कठोर वचन कहता है । कहा है-
वापीकूपतडागानां देवालयकुजन्मनास् ।
उत्सगांत्परतः स्वाम्यमपि के न शक्यते ॥ ९३॥
बावडी कुर् तडागोंको देवालय तथा इक्षोंको छोडकर फिर इनपर कोई
आअपवा प्रमुख नहीं कर सक्ता ॥ ९३॥
तथाच-
तैसेही-
अत्यक्षै यस्य यद्भक्तं क्षेत्राद्यं दश वत्सरान्।
तत्र शुक्तिः प्रमाणं स्यान्न साक्षी नाक्षराणि वा॥ ९४ ॥
दश वषतक जिसन प्रत्यक्ष क्षत्रादका भाग किया हैं उसम भागहा प्रमाण
= रोक्षी भोर ठेखकी आवश्यकता नहीं है॥ ९४ ॥
मातृुषाणामर्थ न्यायो सुनिभिः पारिकीत्तितः।
तिरश्षाश्च विहङ्गानां यावदेव समाश्रयः ॥ ९५ ॥
मनुष्योंका यह न्याय मुनियोने कहा है पशु और पक्षियोंकी जबतक जहां
स्थिति हे तबतक वह वक्षंदा भधीश्वर हे ॥ ९९॥
तन्मम एतदहं न तव” इति । कपिञ्जल आह,- “भो!
यदि स्मृति माणीकरोषि तदागच्छ मया सह थेन स्मति-
पाठक पृष्ठा स यस्थ ददाति स शहालु | तथालुष्ठिते मया
अपि चिन्तितम् । “किमत्र भविष्यति । मया द्रष्टव्योऽयं
न्यायः” । ततः कोठुकादहमपि तावदु प्रास्थितः। अत्रा-
न्तरे तीक्ष्णदंष्टो नाम अरण्यमार्जारः तयोरविंवादं क्षत्वा
मार्गासन्नं नदीतटमासाद कुतकुशोपमदो निमीलितनयन ,
ऊ्ध्वंबाहुरद्वपादस्पष्ठभूमिः श्रीसुय्योभिमुख इमां धमोंपदेः `
शनामकरोत् । “अहो ! असारोऽयं संसारः क्षणभंशुराः
प्राणाः स्वप्ततदशः भियंसमागमः। इन्द्रजालवत् कुटुम्बष-
रि्होऽयम्। तत् धर्म मुक्ता नान्या गतिः अस्ति । उक्तश्च
भाषादीका समैतम् । (३१९)
सो यह घर मेराहे तेरा नहीं" । कर्षिजठ बोडा- भो ! यदि स्म्रृति प्रमाण
,करता है, तो मेरे साथ भाओ जो स्मृति पाठकसे पूछकर घह जिसको दे वह
उससे ग्रहण करें | ऐसा भनुष्टान करनेपर मैंने भी विचार किया “इसमे क्या
होगा । मैंमी यह न्याय देखूगा” । सो कोतुकसे मेंमी उनके पीछे चला ।
इसी समय तौदषगदष्टावाला वनका बिछाव उनका विवाद सुनकर नदीके किनारे
प्राप्त होकर कुशा विछाये आले मीचे उपरको भुजा किये भाषे चरणसे
पृश्वीको छुटे हुए सूर्यक्षी ओर सुख किये इस धर्मकी वार्ताको करताथा “अहो !
यह ससार असार है । प्राण क्षणमगुर हैं । प्रियलमागम रघप्की समान हैं।
इन्र जाळकी ( मायावत् ) यह कुट॒म्बका परिप्रह दै । सगे धर्मको छोडकर और
गति नहीं हे । कहा है-
अनित्यानि शरीराणि विभवो नेव शाश्वतः ।
नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्घो ध^संग्रहः ॥ ९६॥
शरीर अनित्य है ऐश्वर्य भी सदा नहीं रहेंगे मृत्यु सदेव विकट स्थित हे इस
कारण धमका संग्रह करना चाहिये ॥ ९६ ॥
यस्य धर्मविहीमानि दिनान्यायान्ति यान्ति च ।
स लोहकारमश्लेव श्वसन्नपि न जीवति ॥ ३७॥
घर्मके विना जिसके दिन भाते जाते हँ वह ढुद्दारकी घॉकनाकी समान
रासळेता हुआभी नहीं जीता हे ॥ ९७ ॥
आच्छादयाति कोपीनं यो दंशमशकापहम् !
शुनः पुच्छमिव व्यर्थ पाण्डित्यं धर्मवजितम्॥ ९८ ॥
जो मनुष्य [ इन्द्रिय दमन न कर केवळ ] दश मशक चिवारणकेलिये
कोपीनका आवरण करते हे उनका कुत्तेकी पकी समान धर्मवित पाण्डित्य
इथा हे॥ ९८॥
अन्यञ्च-
आरमा--
पुलका इव धान्येषु पूतिका इद पक्षिषु ।
मशका इव मत्त्ये येषां धर्मा न कारणम् ॥ ९९ ॥
(२२०) , पञ्चतम्त्रम् !
[ohn hn
धान्योम तुच्छ धान्य जसे पक्षियामं पुत्तिका ( क्षुद्र ) पक्षि जसे मरण
आमियाम मशक जस् हं इर्सा- प्रकार जा मनुष्य वक्षा प्रमाण करक व्यवहार
नहीं करत ह वे है| ९९ ॥ , 7
श्रेयः पुष्पं फल ब्रक्षादश्नः अयो छतं स्पृतम् ।
ओषस्तेलक्च पिण्याकाच्छ्रेयान्धर्मस्ठु मादुषात् ॥ १००॥
दृक्षस पुष्प फळ श्रेष्ठ है दहीसे ब्त अच्छा हे तिळ्चूर्णसे तेल अच्छा है
मनष्पसे धर्मे अच्छा, हे || १०० ॥
रुष्टा सूनरपुरीषार्थशाहाराय च केदलम् ।
घमदीयाः पराथाय एुरूषाः पशवों यथा ॥ १०१ ॥
[अस प्रकार कावळ मुत्र पुराप करन आर साजन करनवाळपर प्रयोजनके
लिये विधाताने प्लु बनाये हैं इसी प्रक्जार धर्महीन पुरुष हैं॥ १०१ ॥
स्थेय्थे सवेषु कृत्येषु शंसन्ति नयपण्डिताः ।
बह्वन्तराययुक्तस्य घर्सस्य त्वरिता गतिः ॥ १०२
राजनीतिके पंडित सव कांयेमें स्थिरताकी प्रशंसा करते हैं बहुत विर्न्नोते
युक्त धमकी बडी शीत्र गति है ( अथात घंमेका शाप्रही अनुष्ठान करना
चाहिये ) | १०२ ॥
संक्षेपात्कथ्यते धमा जनाः एकि बिश्तरेण वः ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥ १०३ ॥
हे मनुष्यों ! तुमसे संक्षेपम घमे कहते हैं विस्तारसे क्या है परोपकार पुण्य |
के निमित्त हे । और दूसरेको पीडा देवी पापके निमित्त है || १०३॥
श्रूयतां घर्मेसर्वर्वं श्रुत्वा चेबादधाय्यताम ।
- आत्मनः भतिदूलानि परेषां न समाचरेत् ॥ १०४॥
घर्मका सर्वस्व छुनकर मचर्मे उसको धारण करो अपने और दूसरोके छै
कर काम नकरे ॥ १०४ ॥ ,
अथ तस्य तां धर्मोपदेशनां शत्वा शशक आह; मो
भो कपिञ्जल ! एष नदीतीरे तपस्वी धमेबादी तिष्ठाति तदेन
पृच्छावः”?! कपिञ्जल आह,- 'नडु स्वभावतोऽस्माक शब॒भू'
तोऽयमस्ति । तदूरे स्थितो एच्छावः। कदाचिदस्य ब्रतदेकर्ल्य
भाषाटीकासमेतम् । (३२१)
सम्पद्यते” । ततो दूरस्थितावचठः- भो भोः तपर्विन्
धर्मोपदेशक ! आवयोविंवादो वर्तते । तद्धर्मशाख्रद्वारेण
"अस्माकं निर्णय कुछ यो हीनवादी सते भक्ष्म इति” । स
आह,-“भद्रौ ! मा मेँ वदतम् । निवृत्तोऽहं नरफपातक-
मार्गादहिलेव धमेमार्मः । उक्तव-
इस प्रकार उसके धर्मोपदेशको सुनकर खरगोश बोळा,-“भो कपिजळ !
यह नदीके किनारे धर्मवक्ता तपस्वी स्थित है । सो इससे पूछे” । कर्पिजछ
चोळा;-“यह तो स्त्रभावसे हमारा झन्रुभूत हे । सो दूरसे स्थित होकर पूछे ।
- कदाचित् इसका ब्रतमग होजाय” । यह दोनों दुर स्थित होकर बोले,-“मभो
मो तपस्वी धर्मोपदेशक ! हम दोर्नोका विवाद हो रहा है । सो धर्मशाख्रके दाग
हमारा निर्णय करो जो हारे वह तेरा भक्ष्य होगा”? | वह बोला,-“*मद्रो ! ऐसा
मत कहो । अब मे वरकपातके मार्गसे! निवृत्त हू अहिसाही परम भर
हे । कहा हे- ।
अहिँसापूर्वको धमो यस्मात्सद्धिरुदाहतः ।
यूकमत्कुणदंशादीस्तस्मात्तानपि रक्षयेत् ॥ १०६ ॥
जिस कारण कि, महात्मा पुरुषोंने अहिसा प्रधान धर्म कहा है इस कारण
ज़, खटमछ, डासादिकोमी रक्षा करे || १०९ ॥
- हिसकान्यषि भूतानि यो हिंसति स निर्घणः ।
स याति नरक घोरं कि पुनर्यः शुभानि च ॥ १०६॥
जो हिसक प्राणियोंको मारता हे वहभी निर्दयी हे वहभी घोर नरकको
जाता है और जो अच्छे { भहिसक ) जीवोंको मारता है उसकी तो क्या
कहें | १०६ ॥ `
एतेऽपि ये याज्ञिका यज्ञकर्मणि पश्चन् व्यापाद्यन्ति ते
मुर्खा; परमार्थे श्रेतेने जानन्ति । तत्र किल एत्तङक्तमजे-
यष्टव्यम् । अजा ब्रीहयः तावत् सप्तवार्षिका; कथ्यन्ते न पुनः
पशुविशेषाः । उक्तव-
और जो यह यज्ञ करनेवाले यज्ञमे पछुओंको मारते हैं बे मूर्ख हैं थथार्थसे
१
(३२२) पञ्चतन्त्रम् । -
श्रुतिका अर्थ नहीं जानते । बहां तो ऐसा कहा हे भोसे यज्ञ करना चाहिये |
सो भज नाम सप्तवर्षीय ब्रीहिधान्यका है नकि पशुविशेषका | कहा हैं-
वृक्षांश्छित्वा पशून्हत्वा कृत्वा रुधिरकर्दमम् ।
यद्येव गम्यते स्वर्गे नरकः केन गम्यते ॥ १०७॥
वृक्षांका छेदन, पशुओंका माएण कर उनके रुघिरकी काच करनेसे यदि
स्वमे होता हे तो नरक कौनसे कमसे होता है ॥ १०७॥
तन्न अहं भक्षथिष्यामि । परं जयपराजयनिर्णय
करिष्यामि । किन्तु अहं वृद्धो द्राद्यवयोः भाषान्तर
सम्यक् नञ्चणोमि । एवं ज्ञात्वा मम समीपवत्तिनो ,
भूत्वा मम अभ्रे न्यायं बदतम । थेन विज्ञाय विवादपरमार्थ
वचो वदतो मे परळोकबाधो न भवति । उक्त यतः-
सो में भक्षण नहीं करूगा । परन्तु जय पराजयका निर्णय कर दूंगा।
किन्तु में बृद्ध इँ दूरसे तुम दोनोके भाषणको सळी प्रकार नहीं सुन सकता ।
ऐसा जानकर मेरे निकटवर्ती होकर मेरे आगे अपना न्याय कहो जिसको जान-
कर विवादका परमार्थ वचन कहते इए मुझे परलोककौ बाधा नहों । कहाहै-
मानादा यादे वा लोमात्क्रोधाद्वा यदि वा भयात्।
` यो न्यायमन्यथा ब्रूते स याति नरकं नरः ॥ १०८ ॥
मान, लोभ, क्रोध या सयत जो न्यायको अन्यथा कहताहै वह मनुष्य नर-
कको जाता है॥ १०८ ॥
पञ्च पश्चतृते इन्ति दश हृन्ति गवावृते ।
शतं कन्थावृत हन्ति सहस्रं पुरुषावृते॥ १०९ ॥
` मनुष्यके पशु विषयक झूठ बोळनेमें पांच पुरुषकी, गौके निमित्त दशकी,
कन्याके निमित्त सोकी, पुरुष विषयक मिथ्या कहनेमें सहल पुरुषको हत्या
ङगतीहे ॥ १०९ ॥
उपविष्टः सभार्मध्ये यो न वक्ति स्फुटं वच: ।
तस्मादरेण स त्याज्यो न्यायो दा कीर्तयेदृतम् ॥ ११०॥
- समाके वीच स्थित होकर जो पुरुष स्पष्ट बचन नहीं बोळता है उसको
नहाते निकारदे अथवा बह सत्य कहदे ॥ ११० ॥
भाषाटीकासमेतम् । (३२३)
तस्मादिश्रब्धो मम कणोपान्तिके स्फुट निवेदयतम्
कि बहुना, तेन क्षुद्रेण तथा तो तूर्ण विश्वासितो) यथा तस्य
उत्सङ्गवातिनो सञ्जातो ततश्च तेनापि समकालमेव एक;
पादान्तेन आक्रान्तः, अन्यो दंष्टाककचेन च । ततो गत-
शाणी भक्षितो इति । अतोऽहं ब्रवीमि-
- इस कारण निडर होकर मेरे कानके निकट स्फुट वचन कहो” । बहुत
कहनेसे क्या उस क्षुद्र उन दोनोंकों शीघ्र इस प्रकार विश्वासमें कर लिया कि,
घे उसकी गोदीमें भा बैठे । तब उसनेभी एकही समय एकको चरणमे आक्रमण
किया और दूसरेको डाढरूपी केंचीमे । इस प्रकार प्राणरहित कर दोनोंको
खागया । इससे मैं कहता हु-
्ुद्रमर्थपातिं प्राप्य न्यायान्वेषणतत्परो ।
उभावपि क्षं माप्तो पुरा शशकपिज्ञली ॥ १११ ॥
रुद्र भर्थपतिको प्राप्त होकर न्यायक्ी खोजमे तत्पर शकक ओर कर्पिजल
दोनही क्षयको प्राप्त हर ॥ १११॥
-भवन्तोऽपि एनं दिवान्धं श्वुद्रमर्थपातिमासाग्र राञ्यन्धाः
सन्तः शशकपिञ्चलमागेण यास्चन्ति । एवं ज्ञात्वा यड्चितं
लद्विषियमतःपरम्”? अथ तस्य तत् वचनमाकण्यं “साधु
अनेन अभिहितम”। इति उक्त्वा भूयोऽपि पार्थिवार्थं समेत्य
मन्त्रयिष्यामहे” इति ब्रुवाणाः सर्वे पक्षिणो यथाभितं जग्मुः
केबलमवशिष्टो मद्रासनोपविष्टः आभिषेकामिलुखो दिवान्धः
कृकालिकया सह आस्ते । आह च~“ क; कोऽत्र भोः !
किमद्यापि न क्रियते ममाभिषेकः "१ इति श्रुत्वा कृकालि-
कया अभिहितम् भद्र! तव अभिषेके कृतोऽयं विननो वाय-
सेन । गताश्च सर्वेऽपि विहगा यथेप्तिताछु दिक्षु केषलमेकोऽयं
वागसोऽवशिष्टः केनापि हेठुना तिष्ठति तत् व्रितमुत्तिष्ठ
चेन त्वां स्त्राश्रयं प्रापयामि’? । तत् श्त्या सविषादमुळको
वआयसमाह,- भो भो दुष्टात्मन्! कि मया ते अपकृतम्!
<
( ३२४ ) पन्क्तन्चस ।
यत् राज्यामिषेको मे वित्चितः । तद अद्य माति सान्वयमा-
वयोवेर सञ्जातम् । उक्तश्च-
तुममी इस दिनके अन्धे क्षुद्र अथपातिकों प्राप्त हो रात्रिके अन्धे होकर
शरक कार्पजछके मागेको जाओगे । ऐसा जानकर जो उचित हो सो करो 7
तद उसके इस वचनको सुनकर कि “इसने अच्छा कहा” ऐसा कह
“किमी राजाके निमित्त मिलकर सम्मति करेगे? ऐसा कह कर सब पक्षि
यथेष्ट स्थानम गये, केवळ यही मद्रासनमें वेठा भमिपकमें अभिमुख कृकाढि-
काके साथ रहगया । बोळामी-“मा | कोई यहां हे ? क्यों अबतक मेरा अमि-
पेक नहीं करते |? यह सुनकर कलाने कहा-` मद्र | तुम्हारे अभि-
पेक्में काकनें विध्न किया हे । गये सब पक्षी येथेच्छ दिशा्ोंमें । केवळ यह
एक घायसही किसी निमित्तत यहां स्थित है । सो जळदी उठो जिससे में तुम्हारे
आश्रयमं तुमको प्राप्त करूं?! | यह सुन विषादपूर्वक उळूक घायससे बोढा-'
“मो ! मो ! दुष्टात्मन् ! मैंने तेरा क्या अपफार किया है £ जो मेरे राष्य-
मिषकमे तेने विध्न किया सो आजसे हमारा तेरे वशके सहित वेर इआ।कहा है-'
रोहति साथकेषिद्ध छिन्नं रोहति चालिना ।
वचोदुरुक्ते बीभत्सं न श्रोहालि वाकक्षतम् ॥ ११२ ॥ ”
शरसे बिद्धइए इक्षादि फिर जमते हैँ तळवारसे छिन्न हुआमी फिर उत्पन्न
होताहै ( भथवा इन ,दोनोके घाव भर जातेहे ) परन्तु घाणीके वेध अथवा
वणित बचनके वेध फिर नहा मरतहे ॥ ११२ ॥"
इति एवमभिधाय ककालिकया सह स्वाश्रयं गत; । अथ
सयव्याकुलो वाथसो व्यचिन्तयत् । “अहो ! अकारणं वेर-
मासादितं मया 4 किमिदं व्याहतम् । उक्तश्व-
यह कह कृकळाके साथ अपने आश्रयकों गया । तब मयसे व्याकुळ हों
जायस विचारने लगा ।“अहो मैने अकारण बेर किया। यह क्या कहा। कहा है“
अदेशकाळजमनायातिक्षमं
, यदप्रियं लाघवकारि चात्मनः। `
योऽत्रात्रवीत्कारणबजितं वचो
न तद्वचः स्याद्विषमेव तद्वचः ॥ ११३ ॥
भाषाटीकासमेतम्। (३२५)
देशकालके न जाननेवाळे परिणाममे कटु जो अप्रिय अपनेको छघु करने-
बाळा कारण रहित बचन बोलता है वह बचन नही किन्तु विष है ॥ ११३ ॥
बलोपपन्नोऽपि हि बृद्धिमान्नरः वि
परं नयेन्न स्वयमेव वेरिताम् ।
मिषडूममास्तीति विचिन्त्य अक्षये-
दकारणात्का हि बिचक्षणो विषम् ॥ ११४॥
बुद्धिमान् मनुष्य बलका प्राप्त हुआभी खय दूसरेको अपना शत्रु न वाळे
मेरा चिकित्सक हे ऐसा विचार कोई अकारण विषको नहीं खाता है॥ ११४ ॥
परपरिवादः परिषदि न कथखित्पण्डितेन वक्तव्यः ।
सत्यमपि तन्न वाच्यं यहुक्तमसुखावह भवति ॥ ११५॥
मभामे पराई निन्दा पडितको किसी प्रकार कहनी उचित नहीं है जो कहने-
से दूसरेको वूरी छो बह सत्य हो तो भी न कहे॥ ११९ ॥
सुहद्विरातेरसकदि चारितं
स्वयञ्च बुद्ध्या प्रविचारिताश्रयम् ।
करोति कार्य्य खलु यः स बुद्धिमान्
स एव लक्ष्या यशसाश्च भाजनम्॥ ११६॥ 7
सुद और आप्त पुरुषोंसे वारवार विचार किये हुए तथा अपनी बुद्धिसे
विचार कर जो कार्य करता है बही बुद्विमान् है चही ळक्ष्मी और यशका
पात्र होता है॥ ११६॥ !!
एवं विचिन्त्य काकोऽपि प्रयातः । तदा भभ्ट्रति अस्माभिः
सह कौशिकानाम् अन्वयमतं वेरमस्ति १ ” मेघवर्ण आह-
“तात ! एवं गते अस्मामिः कि कृत्यमस्ति । स आह;
“वत्स ! एवं गतेऽपि षाइ्शुण्यात् अपरः स्थूलोऽभिप्रायोऽस्ति
तमङ्ीकृत्य स्वयमेव अहं तद्विजयाय यास्यामि रिपन वस्वः
थिबा वधिष्यामि । उक्तश्च यतः-
ऐसा विचार कर काकमी चछागया | उस दिनसे हमारे साथ उछकओंका
जंदाक्रमागत वेर है” मेघवर्ण बोढा,-“तात ऐसा होनेमे हमको क्या कर्तव्य है
वह बोढा--/बत्स ऐसा होनेमे भी पटू सन्धि आदिके सिवाय एक महान् अन्य
(३२६) पञ्चतन्त्रम्। _
कौशळ है । उसको अंगीकार करके स्वयही मे उसके विजयके निमित्त जाऊंगा
और शत्रुको वचित कर वध करूंगा | कहा है कि- -
बहुइद्धिसमायुक्ताः सुविज्ञाना बलोत्कटान् ।
शक्ता वश्चथितु धूर्ता ब्राह्मणं छागलादिव ॥ ११७॥”
बहुत घुद्धिसे युक्त, अच्छे विज्ञानवाळे बळसे उत्कट पुरुषोंको वचन करनेमे
समथ होते हैं जैसे धूतोने ब्राह्मणको ठग उससे बकरा हरण किया ॥१ १७१"
मेघवर्ण आह,-''कथमेतत् ?” सोऽत्रबीव-
मेघवर्ण बोळा,-“यह केसी कथा है ?? वह बोळा-
कथा ३.
कस्मिश्चित् अधिष्ठाने मित्रशर्मा नाम ब्राह्मणः कृतात्नि-
होतपरिग्रहः प्रतिवसति स्म । कदाचित् माघमासे सौम्या-
निले प्रवाति, मेघाच्छादिते गगने, मन्ड मन्द प्रवर्षति पर्ज-
न्ये,पशुमार्थनाय किश्चिद ग्रामान्तरं गत्वा कश्चिद् यजमानों
याचितः । “भो ,यजमान ! आगामिन्याममावस्थायामहं
यक्ष्यामि यज्ञम् | तत् देहि मे पशुमेकम्'?। अथ तेन तस्य
शास्त्रोक्तः पीवरतनुः पशुः प्रदत्तः। सोऽपि तं. समथोमितश्रे
तश्च गच्छन्तं विज्ञाय स्कन्धे कृत्वा सत्वर स्वपुराभिमुखः
प्रतस्थे । अथ तस्य गच्छतो मागें त्रयो धूत्ताः क्षुतक्षामक-
ण्ठाः सम्सुखा बभूवुः । तेश्च ताहशं पीवरतनं स्कन्धे आरूः
ठमदलोक्प मिथोऽभिहितम,- अहो ! अस्य पशोः भक्षणाद
अद्यतनीयो हिमपातो व्यथां नीयते तत् एनं वञ्चयित्वा
पशुम् आदाय शीतत्राणं कुर्मः” । अथ तेषामेकतमो वेशप-
रिवर्तनं विधाय सम्स॒खो भूत्वा अपमार्गेण ते आहिताम्निमं
ऊचे-भो ! भो ! वालाम्निहोत्रित् ! किमेवं जनविरुद्ध
हास्यकाय्यमतुष्ठीयते । यदेष सारमयोऽपावत्नः - स्कन्धा"
घिरूटो नीयते । उक्तश्च यतः
कसा स्थानम मन्रशमा ब्राहमण अस्निहोत्री रहताथा । बह एकबार माघके
महीनेनें मन्द पवनके बहन करते मेघाच्छादित आकाशसे यन्द मन्द वर्षाके
भाषारीकासमेतम्। (३२७)
होनेमें पशु छेनेके छिये किसी ग्रामान्तरे जाकर किसी यजमानसे याचना की
मो यजमान ! आनेवाली अमावास्थाको में यज्ञ करूगा सो मुझे एक पञ्च दो”!
तब उसने उसको शाल्लोक्त पुष्ट शरीर एक पशु दिया । वह भी उसे समर्थ इघर
उधर जाता देखकर कन्धेपर रख शीघ्र अपने पुरकी ओरको चळा। तव उसके
मार्गमें जाते तीव धूत भूखसे व्याकुळ सन्सुख हुए । उन्होंने इस प्रकार पुष्ट
शरीर स्कन्येपर आरूढ उसको देखकर परस्पर कहा,-“भहो ! इस पझुके
भक्षणसे भाजका जाडा व्यर्थ किया जाय । सो इसको वचित कर पुळे
शीतसे ( अपनी ) रक्षाकरे'' | तब उनमेंसे एक अपना वेश बदलकर सामने
उसकीओर कुमार्गसे आकर उस समिहोत्रीसे बोछा,-भो भो निरोध समि-
क्षेत्री | क्यो यह सज्नोंके विरुद्ध हास्यका कार्य करते हो जो यह भपवित्र
सारमेय कन्धेपर चढाये लिये जाते हो । कहा है किट
श्वानकुबकुटचाण्डालाः समस्पर्शाः प्रकीत्तिताः ।
रासभोष्ट्रौ विशेषेण तस्मात्तान्नेब संस्पृशेत्॥ ११८ ॥!?
श्वान, कुक्कुट, चाण्डाल यह समान स्पशेबाले हूँ विशेष कर गधा और उटमी,
इस कारण इनको स्पशै न करे || ११८ ॥”!
ततश्च तेन कोपामिभूतेन अभिदितस,- अहो! किमन्धो
भवान्? यत् पशुं सारमेयं प्रतिपादयासि? । सो$नवीत,-'
“ब्रह्मन् ! कोपः त्वया न काथः यथेच्छया गम्यताम् 'इाति।
अथ यावत् किञ्चित अध्वनोऽन्तरं गच्छति, तावत् द्वितीयो
धत्तः सम्सुखे समुपेत्य तमुबाच,~“'भो ब्रह्मन् ! कष्टं कष्टं
यद्यांपे वळभोष्ये ते मृतवत्सः, तथापि स्कन्धमारोपयि-
ठमयुक्तम्। उक्तञ्च थः-
तब उसने क्रोध कर कहा--“अरे | कया तू अन्धा है ? जो पशुको कुत्ता
कहता है” । वह वोढा,-“अहान् आप क्रोध न करो यथेच्छ जाइये”? | जबतक
वह कुछ भौर दूर गये तबतक दूसरा धूर्त सामनेसे आकर उससे बोळा,--“मो
ब्रह्मन् | खेद हे २ यद्यपि यह मरा हुआ गौका बच्चा तुम्हारा प्रियहै तो मी कन्धेप
रखता अयुक्त है । कहा भी है--
(३२८) पञ्चतन्त्रम् ।
तिय्यश्व॑ मानुष वापि यो मृतं संस्पृशेत्कुधी: ।
पञ्चगव्यन शुद्धिः स्यात्तस्य चान्द्रायणेन वा ॥ ११९ ॥7!
पछ ननुष्य भादि मृतक हुएको जो कुबुद्धि स्पर करता है उसकी शुद्धि
पंचगव्य वा चन्द्रायणसे होतीह ॥ ११९ |!”
अथ असो सकोपमिदमाइ-' “मोः! किमन्धो भवान् ! यत्
पशु बृतवत्लं वदास १!) । सोऽत्रवीत्-भगवन् ! मा कोपं कुरू
अज्ञानात् मया आभिहितं तत् त्वमात्मरूचि समाचर? इति।
अथ यावत् स्तोक वनान्तरं गच्छति तावत् ततीयोउन्यवेश-
थारी धूर्त; सम्सुखः सखुपेत्य तम्ुवाच- “मो ! अथुक्तमेतत्। -
यत् त्व रासन र्कत्थाथरूठ नयाल तत् त्यज्यताम् एष
उक्तस
तत यह कध करके बोला-“भो ! क्या तुम अन्धे हो | जो पशुको मृत-
वत्स कहते हो !?? वह बोळा-“भगबन् ! क्रोध मत करो । अज्ञानसे मेंने कहाथा
सो जो तुम्हारी इच्छाहो सो करो” | सो जबतक कुछ और दूर बनमें जाताहे
तंबतक और तीसरा धूर्त सामनेसे आकर बोला,-“मों | यह अयुक्त है । जो
तृ गधेक्रो कंधेपर रखकर लिये जाता हे। कहाहे-
यः स्पशेद्रासनं मप्धा सानाद्जानत्ताशप वा ॥
सचेलं खानमादष्ट तस्य पापप्रशान्तय ॥ १२० ॥ है
जो गधेको ज्ञानसे था अशानसे स्पर्श करता हे उस पापकी शान्तिके लिये
'वल्लेकि सहित खात करना उचित हे ॥ १२० ॥
लत त्यज एनं थावदन्यः कश्चित् न पश्यति’ । अथ असो
-त पशु रासभं मन्यमानो अयात् भूमो प्रक्षिप्य स्वगृहसुदिश्य
प्रपलायितः। ततः ते नयो 'निलित्वा तं पशुमादाय यथेच्छया
भक्षितुमारब्धाः । अतोऽहं ्रवीमि-
सो इसे त्याग जबतक कोइ दूसरा इसे न देख” तब यह उस पशुका गधा
मानकर भयस पृथ्वीम डालकर अपने घरका आएको चला । त्र यह ताना
मिलकर उस पशु लेकर यथेच्छ खाने ळगे। इससे में कहता हूं-'
वहुबुद्धिसमायुक्ताः सुविज्ञाना बलोत्कटान्। ,,
शक्ता चञ्चथिलु घूर्ता आमण छागलादिव ॥ १२१॥
भाषाटीकासमेतम्। ( ३२९ )
“कि--बहुत बुद्धिते युक्त, विज्ञानवाले, बल्से उत्कट शत्रुके वचन करने
समर्थ होजाते हैं जसे ब्रह्मणसे छाग लेळिया ॥ १२१ |" हे
अथवा साधु इदछच्यत्ते-
अथनतो यह साधु कहाह [क~
अभिनवसेवकविनयैः प्राधुणकोक्तेविंलासिनीरिदिते! । .
धूर्तजनवचननिकरेरिह कश्चिदवाचितो नास्ति ॥ १९२ ॥
नये सेवकोकी बिनयसे, आगन्तुकके बचमोंसे, कौ जनोंके रोनेसे, धूर्त
जतके वाकू प्रपचसे इस जगतमें कौन नहीं चित इआ हे॥ १२२ ॥
किञ्च, दर्बलेः अपि वहुभिः सह विरोधो न युक्तः।
उक्तश्व-
किच बहुत दुर्वडोके साधमी विरोध करना उचित नहीं हे । कहाह-
बह्वी न विरोंद्धव्या इया हि महाजनाः ।
स्फुरन्तमपि नागेन्द्रं भक्षयन्ति पिपीलिकाः ॥ १२३ १
कि बहुतोंके साथ बिरोध नहीं करना चाहिये महाजन दुर्जय होते हैं क्यों
"कि चाटी तेजस्वी सपैकोमी भक्षण करगई ॥ ११३ ॥"
मेघवर्ण आइ-“कथमेतत् १! स्थिरजीवी कथयति-
मेघबण बोळा-''यह केसे ?” त्थिरजांवी कहने ठगा-
कथा ४.
अस्ति करिमांश्रित वदभकि महाकायः कृष्णसर्पो5तिदर्पों
नाम । स कदाचित बिलाहुसारिमागमत्खज्य अन्येन लघु
दरेण निष्क्रमिचुमारब्धः।निप्क्रामतश्च तस्य महाकायत्वात
देववशतथा लघुविवरत्वाच शरीरे ब्रणः समुत्पन्नः । अथ ब्रण-
शोणितगन्बालुसारिणीमिः पिपीलिकाभिः सर्वतो व्याती
+व्याकुलीकततश्च । कत्ति व्यापादयति कति वा ताड्यति।
अथ भभूतत्वात् विस्तारितवहुबणः क्षतसवीङ्ोऽतिदर्षः पञ्च"
त्वम्रपागतः । अतोऽहं बवीमि-
किसी वल्मीकर्म महा कायाबाळा काळा साप अतिदर्पे नामवाछा है। बह
एक समय विछानुसार मार्गको छोड़कर और ल्घुडारस निकलने छगा | निकळते
(३३० ) पश्चतन्त्रस्।
पो २० आहे he hn महा
हुए उसक महाकाय हातस दव वरास ळघृ।ववर हानछ उसके शरारम { छळ
नस ) त्रण हांगव | तब त्रणक॑ आर शाणतका गन्वक अनुसरण करनवाल |
चीटियान सबभारस व्यात कर उसका व्याकुळ करादंया। फिनकां मारे किनका
ताडन कर | तब उनके आघक हांनत तण बढ़गयं सवाङ्गम घाव हानंसे जाते
दर्पे पंचलवकों प्राप्त होगया । इससे में कहता हूं कि-
बहवो न विरोद्धव्या दुजया हि महाजनाः
स्फरन्तमपि नागेन्द्रं भक्षयन्ति पिपीलिकाः ॥ १२४ ॥१
०७00
बहुत।क साथ ।चराध न कर महाजन दुजप हात है चाटया चजछा सपे
को भक्षण करगई ॥ १२४ ॥” |
तत अत्रास्ति किखित में वक्तव्यमेव। तदवधार्य यथोक्त-
मलुषछीयताम् '? मेघवणे आह-'तत् समादेशय-तबादेशो
नान्यथा कत्तव्यः” । स्थिरजीवी प्राह-“ वत्स ! समाकर्णय
तहिं सामादीनतिक्रम्य यो मया पञ्चम उपायो निरूपितः।
तन्मां विपक्षभूतं कृत्वा, अतिनिष्ठरवचनेः निभत्स्य, यथा
विपक्षप्राणिधीनां प्रत्ययो भवाति, तथा समाहतरूधिरेः आ-
लिप्य, अस्यैव न्यम्नोधस्थ अधस्तात् प्रक्षिप्य माँ गम्यतां
पवेतस् ऋष्यमूके भति, तत्र सपरिवारस्ति्ठ । यावदहं समः ।
स्तान् सपत्नान् सुपणीतिन विधिना विश्वास्य अभिरुखान्
कृत्वा. कृताथों ज्ञातदुर्भभध्यः दिवसे तान् अन्धतां प्राप्तात्
ज्ञात्वा व्यापादयामि, ज्ञातं मया सम्यक, नान्यथा अस्माकं
सिद्धिरिति । यतो इुगमेतत् अपसाररहितं केवलं बधाय
अविष्द्रति । उक्तश्च यतः
. सो इस विषयमे मुझे कुछ वक्तव्य हे । सो यह निश्चय करके यथोक्त अहु
करो” | मेघवर्ण बोछा-- तुम्हारा आदेश अन्यथा नही होगा!” स्थिरजीवी वोढा-
“वत्स ! सुनो जो सामादि उपायोको छोड़कर मैंने पांचवा उपाय निरूपण किया
है । तू मुझे अपना शन्नुरूप कर निठुर घचनांसे घुडक जिससे इात्ुपक्षा दूताक
विश्वास हाजाय | और कहींसे छाये इए रुधिरसे आलिप्तकर इसी न्यग्रोधक नाग
भाषादीकासमेतम् ! (३३१)
मुझको डालदे | और तू ऋष्यमूक पर्षेतके निकट जाकर वहा परिवारके सहित
हिधत हो । जबतक मै सब शत्रओंकों अपने आचरणको विधिसे विश्वासी कर
सन्मुख कर कृताथहो दुगेको जानकर दिनके मध्यम अधताको प्राप्त हुए उनका
जानकर मार डाळू । जाना है मेंने भळी प्रकार । हमारी सिद्धि अन्यथा न होगी |
कारण कि हमारा आवास. दुरम निकलनेके उपायत शून्य केवळ बधक लिये
होगा । कारण कहा है कि--
अपसारसमासुक्त नयज्ञहगमुच्यत।
अपसारपारत्यक्त इम व्याजन बन्धनम् ॥ १२५॥
नीति जाननेवा्ोने निकळनेके उपायसे धुक्त ही दुर्गकी प्रशसा की हे (१
अपसारके विना दुर्ग कारावासकी समान है ॥ १९५ |
न च त्वया मदर्थे कृपा कार्यो । उक्तश्च-
तुझे मेरे विमित्त कृपा करनी नहीं चाहिये । कहाहे-
अपि माणसमानिष्टान्पालिताँछालितानपि ।
ञ्रत्यान्युद्धे ससत्पत्ने पश्वेच्छुष्कमिदेन्धनम् ॥ १२६ ॥
प्राणोकी समान प्यारे पालित और लालित मर्त्योको युद्धकें उत्पन्न होने
सूखे काठको अग्तिमे जसे प्रेरण करे ॥ १२६ ॥
तथाच-
आर दखा-
अणवद्रक्षयद्गत्यान्स्वकायामेव पोषथेत् ।
सद्कादवसर्पाथ यन्न स्वाद्रपुसगमः ॥ १२७ ॥
भत्योको प्राणकी समान रक्षा करे अपने कायाको नाई पुष्ट करे यह उसी
/ एक दिनके निमित्त है जब शत्रुका सगमहो ॥ १९७ |
तत् त्वपा अहं न अत्रबिषये मतिषिधनी यः” इत्युक्तवा तेन
सह शुष्ककलहं कठेमारब्धः । अथ अन्ये तस्य भृत्याः स्थिर-
जीविनस॒च्छुंखलवचनेजल्पन्तमवलोाक्य तस्य वधाय उद्यताः
मेघवणन आभाहेताः-' अहो ! निषतष्वं यूयम् | अहमेज
अस्य शघ्नुपक्षपातिनो इुरात्मनः स्वयं निग्रहं करिष्यामि” ।
५ १-निकलमेका मार्ग |
(३३२) पश्चतन्न्रम्।
इत्यभिधाय तस्योपरि समारुह्य लएुभिश्चञचुमहारेस्तं महत्य
आहतश्धिरेण छावयित्वातडपदिष्टं ऋष्यमूकपवेतं सपरिः
वारो गतः। एतस्मिन्नन्तरे कुकालिकया द्विषतHाणिधिभूतया
तत् संघ मेघवर्णस्य अमात्यस्य व्यसनसुळूकराजस्य निवे
_ दितम् । “तत् तव अरिः सम्प्रति भीतः कचित् प्रचलितः
सपरिवार इति’? । अथ उलूकाघिपः तदाकण्य अस्तमन-
वेलायां सामात्यः सपरिजनो वायसवधार्थ प्रचालितः प्राह
च,- त्वर््यताम् त्वय्थताम् । भीतः शशः पलायनपरः पुण्रे
लभ्यते । उक्तश्व- -
सो तुम इस विषयमें मुझे निषेध मतकरो”? | ऐसा कह उसके साथ सूखा
केश करना प्रारम्भ किया १ तब दूसरे उसके मत्य स्थिरजीवीको उच्छुखढवच-
नोंसे जस्पना करते देखकर उसके वधके निमित्त उद्यतहुए मेघवर्ण द्वारा कहेगये
“अहो! तुम निवृत्त हो में इस इात्रुपद्षपाती दुरात्माका आपही निग्रह करूंगा!
ऐसा कह उसके ऊपर चढ, ठघुचोचके प्रहारोंसे उसको प्रहार कर छाये हूर
रुधिरसे रंगकर उसके उपदेश किये ऋष्यमूक पर्वतम पारेवार सहित गया । इसी
-समय शनरुके प्रणिधिभूत दूती हुई ककाछिकाने उस सब मेधवर्णके भमात्यका
दुःख उदक राजाके आगे कह दिया । कि, तुम्हारा झन्नु इस समय डरा इभा
पारेवार सहित कहीं चछागया” । तब उळ्कराज यह सुनकर मस्तक समय
अमात्य पारेजन सहित वायसके धघके निमित्त चला । और बोळा- “करता
करो । शीघ्रता करो । डराहुआ शत्रु भागनेधें तत्पर पुण्यसेही प्राप्त होता है।
कहाहै--
शत्रोः प्रचलने छिट्रमेकमन्यच्च संश्रयम् |
कुवाणी जायते वश्यो व्यग्रत्वे राजस्तावेनाम् ॥ १२८ ॥
शत्रके पळायनमें एक, छिद्रका भवलम्बन होनेस तथा राजसेविर्याके यगो
उनके वर्शाभूत होजाताहे (राजा प्रियकारी सेवकांके भार्धान होजाताहे) ११८
एव बुवाणः समन्तात न्यम्राघपादपमंघः पारवेष्टय व्यव
स्थितः | यावत् न कश्चित् वायसो दृश्यते । तावत् शाखाग्रम
घिरूढो हृष्टमना बन्दानिः आभष्ट्यमानाजरमदनः तान् परि
माषाटीकासमेतम्। (३२३)
जनान् प्रोवाच- अहो १ ज्ञासता तेषा माग; । कतभन मागण
अनष्टा। काका; | तत् यावत न दभ समाश्रयात्त, तावत् एव
'वुष्ठतो गत्वा व्यापादयाम । उक्तश्च”
ऐसा कह चारों ओससे न्यप्रोध बृक्षके नीचे घरकर स्थितहुआ।जब कि,कोई
कभा न देखा तव शाखाके आगे आरूढ होकर प्रसन्न मन बन्दी जनोंसे स्तुतिं
को प्राप्त होकर शबुमदैन वह उन पारेजनोको बोळा,-<“'अहो ] उनका मार्गे
जाना जावे किस मागेसे वे काक मागे हें । सो जबतक बे किसी दुगेका आश्रय
नकरें तवतक उनके पीछे जाकर उन्हे नष्ट करू, कहाहै-
दृतिमप्याश्रितःशबुरवध्यः स्याजिगीपुणा ।
कि पुनः संश्रितो दुर्म सामम्र्या परया युतम् ॥ १२९॥ ??
आवरणमे रियत हुआ शत्रु जीतनेकी इच्छा करनेवाळेको अवध्य होता है
फिर सम्पूर्ण सामग्रीसे युक्त दुगेमे स्थित हुआ तो ( अवध्य हेही ) ॥ १२९ ॥??
अथ एतस्मिन् प्रस्तावे.स्थिरजीबी चिन्तयामास ''यत
एते अस्मत शत्रवाऽइपलब्धास्मदवत्तान्ता यथागतमेव यान्ति
ततो मथा न किचित् कृतं भवाति | उक्तंच-
तव इस प्रस्तावके होनेमें स्थिरजीवी विचारते छगा ''जो यह हमारे शत्रु हमारे
बृत्तान्तकों न जानतेवाळे यथेच्छ गमनकरेंगे तो मेरा कुछ भी इत्य न
हुआ | कहाहे-
अनारम्भो हि काय्यीणां थमं डुद्धिलक्षणम् ।
आरव्धस्यान्तगमनं द्वितीयं बुद्धिलक्षणम् ॥ १३०॥
कार्यका भारम्भ न करनाहा प्रथम बुद्धिकी चिन्हे ओर भारम्म कर उसके
अन्त गमनकरना यह ढुमरा बुद्धिका चिन्हे ( हुद्धिमान् प्रथम तौ कार्य आरम्भ
नहीं करते ओर भारभकर पूरा करते हें यह भाबहे ) ॥ १३० ॥
तइ्रमनास्म्ना न च आरम्वायवातः | तदहमत्ताव् शब्द
संभाव्य आत्मान दृशयामेइाते । विचाय्य मन्दे मन्द् शब
मकरोत्! तत श्रत्वा त सकला आप उळकाः तदधाय प्रजग्मुः
अथ तनोक्म अहो ! अहं स्थिरजीवी नाम मेघवर्णस्य
मन्त्री । मेवबर्णेन एव इंदशीमबस्थां नीतः । तन्निवेदयल
(३२४) पञ्चतन्त्रम् ।
आत्मस्वाम्यग्रेतेन सह बहु वक्तव्यमस्ति'॥अथ तेःनिवदितः
स उळूकराजो विस्मयाविष्टस्तत्क्षणात् तस्य सकाशं गत्वा
ओवाच- भो भो! ! किमेतां दशां गतस्त्वम् १ तत्कथ्यताम्’?
स्थिरजीवी आह- देव ! श्र्यता तदवस्थाकारणम्। अती
तादंनं स दुरात्मा मघवणा युष्मदव्घापादेतमरभूववायसानां
पीडया युष्माकमुपरि कोपशोकम्रस्तो युद्धा थे प्रचलित
आसीत् । ततो मया अभिहितम्-' स्वामिन् ! न युक्तं भवत-
रुतडुपरि गन्तुं बलवन्त णते, बलहीनाश्च वयम्। उक्त्च-
सो आरंभ न करना अच्छा परन्तु आरंभ कर उसका विघात करना अच्छा.
नहा । सो में इनको शब्द सुना कर अपनेको दिखाऊ” ऐसा बिचार कर मन्द
मन्द शब्द करता हुआ | यह सुनकर वे सब उळूक उसके मारनेको आये | तब
उसने कहा-““अहो | में स्थिरजीवीताम मेधवर्णका मंत्रीहूं । मेघवणेने मेरी थह
०४7 करदी । सो अपने छामौके आये निवेदन करो । उससे बहुत कुछ कहना
हे” । तब उनसे कहा हुआ बह उद्धकराज विस्मयको प्राप्त हो उसी समय उसके
निकट जाकर बोळा-“'मो ! तू क्यों ऐसी दशाको प्रात इभाहै ? सो कहो” ।
ईश्यरजीवी बोळा-“देव | इस अवस्थाका कारण सुनो । पिछले दिन वह दुरात्मा
येघवणे तुम्हारे मारे हुए बहुत बायसोंकी पीडाले तुमपर क्रोध शोकसे प्रस्त
होकर युद्ध करनेको चछा । तब मैंने कहा--स्वामिन् ! तुमको उनपर ' चढाई
करनी उचित नहीं यह बळीहे और हम बलहौनहैं । कहाहे-- -
he च
बलीयसा दोनबली विरोधं
न भूतिकामो मनसापि वाञ्छेत् ।
वष्यतऽत्यन्तबला हं स्मात्
व्यक्तं प्रणाशोऽस्ति पतङ्कडत्तेः ॥ १३१ ॥
` ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाले हीनबछ बळ्वानूके साथ मनसे भी बिरोध नकं
कारणि अत्यन्त बरवाला नष्टतो नही होता परंतु पतंगत्तिकी समान हीनब
छकाही प्रणाश होताहै ॥ १३१ ॥ | “ हि
तत् तस्य ठपायनमरदानन सान्धरत युक्तः उक्तश्व-
सो भेंट देकर उससे सन्धि करनाही युक्त हे । कहाहे कि-.
भाषादीकासमेतम् । (३२३५)
, बळवन्तं रिपुं इष्ट्वा सबेस्वमपि बुद्धिमान । -
दत्त्वा हि रक्षयेत्ताणान रक्षितेस्तैधन पुनः ॥ १३२ ॥
, बुद्धिमानको उचित हे कि, बळ्वान् शत्रुको सवेस्व देकर प्राणोंकी रक्षा करे
'कारणकि उनके रक्षा करनेसे धन फिर होजाताहै || १३२ ॥
तच्छत्वा तन ढुर्जनप्रकोपितेन त्वत्पक्षपातिन माम आश-
हुमानेन इमा दशा नातः । तत् तव पादा साम्प्रत थे शर-
णम्, ।क बहुना वन्न । यावत अह भचाललु शक्राम,
तावत् त्वां तस्य आवासे नीत्वा सवेवायसक्षयं विधास्यामि
इलि” । अथ अरिमईनः तदाकण्यं पितपितामहकमागलम-
न्विभिः सार्द्ध मन्त्रयाञ्चक्रे । तस्य च पश्च मन्त्रिणः । तद्यथा
रक्ताक्षः-क्कराक्षो-दीपाक्षो-वक्नासः-प्राकारकर्णश्चेति ।
सत्रादो रक्ताक्षमपच्छत-''भद्र ! एष तावत् तह्य रिपोमन्त्र
एल हूस्तगतः। तत कि क्रियताम्” इति । रक्ताक्ष आह-
“दव ! किमत्र चिन्त्यते । अविचारितमशं हन्तव्यः । यतः -
यह सुन उप्त दुर्जनने क्रोधकर मुझे तुम्हारे पक्षपातीकी शका जानकर मेरी
यह दशा करदी । सो इस समय तुम्हारे चरणही मेरे शरण हैं बहुत कहने से
क्या हे जवतक में चळमेको समर्थ हू तब तुमको उसके स्थानमै केजाकर सपण
बायतोका क्षय कराऊगा!! । तब भरिमर्दन यह वचन सुन पित्ता दादाके ऋमसे
झाये हुए मँत्रियांके साथ मन्रणा करने ढगा | उसके पाच मत्री थे रक्ता, कराक्ष,
दाघाक्ष, वक्रनास ओर प्राकारकण, भादिभ रक्ताक्ष से पूछा-/भद्र ! मह उसके
क्षत्रुका मत्री मरे हस्तगत हुआ हे | सो म्या किया जाय!”| रक्ताक्ष बोला-- दिवा
क्या विचार कियाजाय । विवा विचारे इसे मारडाछो । जिसदे-
हान' शब्रानहन्तव्या यथावन्न बलवान् भवत् |
प्राप्तस्वपोरूषबलः पश्चाद्भवति इर्जयः ॥ १३३ ॥
. होन शत्रु जबतक वह चळ्यान् न हो मारडाळा जाय, पुरुषार्थ, बळ प्राक्त
होने पर पीछे शत्रु दुय हो जाता हे || १३३ ॥]
किख-स्वयप्तुपागता श्रीस्त्यज्यमाना शपतीति लोके
अवाद् [य उत्त
4३३६) ' पश्चलन्त्रम्।
ओर-स्त्रयं आई इई छक्ष्मी त्यागन की जायतो शाप देतो है वह लोक
प्रसिद्ध है । कहा हे कि-
काला हि सक्रदभ्यात थन्नर कालकाङक्षणम्।
इुळभः स पुनस्तन काळकमाचकाषता ॥ १३४ ॥
जो समय सुसमयके चाहने वाले मनुष्यको एक वार प्राप्त होता हे सकाळ
कर्मके समान कृत्य न करनेपर वह समय दुर्म होजाता हे || १३४ ॥
श्रूषते च यथा-
` ऐसा सुना भी है कि-
चितिकां दीपितां पश्य फटां भञ्नां ममैव च ।
-निन्नक्िष्टा तु या भीतिर्व सा स्लेहेन वद्धेते॥ १३५॥
( हे ब्राह्मण ) जळती हुई इस चिता और फटे हुए इस मेरे फनको देखो
९ तेरे .पुत्रने मरे फण पर प्रहार किया उससे फटा मेरा फण देख और मेरे काटेते
मरे अपने पुन्रक्षी चिताको देख) इससे अल्ग होकर फिर जोडी हुई प्रीति
स्नेहसे नहीं बढती [ १३९॥
अरिमदनः धाह, कथमेतत् १ रक्ताक्षः कथयति
अरिमर्दन बोळा-““यह कैसे १? रक्ताक्ष बोढा--
कथा «. |
अस्ति कस्मिश्चित् अधिष्ठाने हरिदत्तो नाभ ब्राह्मणः
तस्य च कृषि कुबंतः सदा एव निष्फलः कालोऽलिबत्तते अथः
एकस्मिन् दिवसे स ब्राह्मण डष्णकालावसाने घर्मात्तः स्वक्षे-
अमध्ये वृक्षच्छायायां प्रलुतः अनतिदूरे वढ्मीकोपरि प्रसारितं
ब्हत्फटायुक्ते भीषणं शुजङ्गमं दृष्ठा चिन्तयामास । “बून-
मेषा क्षेत्रदेबता मया कदाचिदपि न पूजिता । तेन इदं में
कृषिकर्म विफलीभवति । तदस्या अहं पूजामद्य करिः,
ष्यामि’ इति अवधाय्यं कुतोऽपि क्षीरं याचित्वा, शरावे
निक्षिप्य वल्मीकान्तिकसुपागम्छ उदाच- भो क्षेत्रपाल !
मया एतावन्तं कालं न ज्ञातं यत् त्वं अच वससि, तेन पूजा
न कृता, तत् साम्प्रतं क्षमस्व? इत्येवमुक्ता, डुग्धश्च निवेद्य)
भाषाटीकासमेतम्। (३३७)
गृहाभिमुखं प्रायात्। अथ प्रातः यावत् आगत्य पश्यति,
तावत् दीनारं एकं शरावे दृष्टवान् । एवं च प्रतिदिनमे-
काकी समागत्य तस्मे क्षीरे ददाति, एकेकच दीनार
’
गहाति । अथ एकस्मिन् दिवसे वल्मीके क्षीरनयनाध पुन्न
निरूप्य ब्राह्मणो ग्रामान्तरं जगाम । पुत्रोऽपि क्षीरं तत्र
नीत्वा संस्थाप्य च पुनगंहं समायातः । दिनान्तरे तत्र गत्वा
दीनारमेकश्च दृष्टा गहीत्वा च चिन्तितवान् । “नूनं सौवर्णः
दीनारपूर्णोऽयं वल्मीकः । तत् एनं हत्वा सवेमेकवारं अही-
ष्यामि” इत्येवं सम्मधाययं अन्येद्यः क्षीरं ददता त्राह्मणपु-
न्रेण सपो लशुडेन शिरसि ताडितः ततः कथमपि दैववशात
अभुक्तजीवित एव रोषात् तमेव तीब्रविषदशनेः तथा अद्-
शत्, यथा सद्यः पञ्चत्वमुपागतः । स्वजनेश्च नातिदूरे
क्षेत्रस्य काछसश्चयेः संस्क्रतः । अथ द्वितीयादिने तर्य पिता
समायातः । स्वजनेभ्यः सुतविनाशकारणं श्रत्वा तथेव सम-
थितवान् । अत्रवीच्च-
किसी स्थानमे हरदत्त नाम ब्राह्मण रहताथा । खेती करते इए उसको सदा
निष्फळ समय बीतता । एक दिन वह ब्राह्मण उष्ण काळके अन्तमे धूपसे धव-
डाया इआ अपने खेतमे इक्षकी छायाके नीचे सोया थोडीदूर वेंबईके ऊपर
फेळाये इए बडे फणासे युक्त मीपण सर्पको देखकर विचारने लगा । भवश्यही
यह क्षेत्रकी देवता दे मैंने यह कमी नहीं एजी । इस कारण मेरी खेतीका फळ
नष्ट होता हे । सो इसका आज में पूजा करूगा ऐसा विचार कहीसे दूध
छाकर सिकोरेमे डाळकर बल्मीकके निकट पहुंच कर बोळा,-“मो ! क्षेत्रपाळ
मैंने इतने समयतक न जाबा कि तुम यहा रहते हो इससे प्रजा न की। सो अब क्षमा
करो ऐसा कह दूध निवेदन कर घरकी ओर आया फिर प्रात,काळ जब आकर देखा तौ
एक सुबण मुद्रा लिकोरेमें देखी । तब प्रतिदिन इकला आकर उसको दूध
देता ओर एक दीनार ग्रहण करता | तब एक दिन वॅबईमे क्षीरळे जानेके लिये
पुत्रसे कहकर ब्राहमण प्रामान्तरको गया । पुत्रमी क्षीरको वहा ठेजाय स्थापन
२२
(३३८) पञ्चतन्त्रम् ।
कर फिर घर आया दूसरे दिन वहां जाय एक दीनार देखकर ग्रहण कर विचारत
ल्गा-''अवश्यही यह वांद्रा सुवणेक दावारस पणं हे | सा इसे मारकर सबको
एकही घार ग्रहण करूं!” । ऐसा विचार दूसरे दिन दूर देते हुए ब्राह्मगपुत्रने”
सर्पके रिरमें छकडीसे प्रहार किया । वह कितो प्रकार देववशसे प्राणसे विमुक्त
नहोंकर रोषसे उसे तीत्र दांतोंसे इत प्रकार काठता हुआ कि वह शीघ्र पंचलको
ग्राप्त हुआ । खजनोने थोडीही दूर खेतपे काष्ठ संचय कर संस्कार किया ।
दुसरे दिन उसका पिता आया | अरव जनोंते पुत्रके नाशक्ा कारण सुनकर
बेसाही समर्थव करता हुआ । बोळा भी-
“भूतान्यो नावगहाति ह्यात्मनः शरणागतान् ।
अूताथोस्तस्थ नश्यन्ति हंसाः पद्मवने यथा ॥ १३६॥'?
जो प्राणियोंपर अनुग्रह नही करता और जो भपने शरणमे आये हैं उनको
नहीं रखता उसके निश्चित अर्थ इस प्रकार नष्ट होजाते हैं जैसे पक्षवनमें हंस १ ३६
पुरुषेरक्तम्- कथमेतत् (ब्राह्मण: कथयति-
पुरुषोने कहा- यह कैसे ?”ब्र,ह्मण कहने छगा-
कथा ६.
आस्ति कर्स्मिश्चिद्धिष्ठाने चित्ररथो नाम राजा। तस्य
योधेः सुरक्ष्यमाणं पद्चसरो नाम सरस्तिष्ठति ।तन्र च प्रभूता
जाम्वूनदमया हंसास्तिष्ठन्ति । षण्मासे षण्नासे पिच्छमेकेक -
परित्यजन्ति । अय तत्र सरसि सोवर्णों बृहत् पक्षी समा-
यातः तेश्चोक्तः- अस्माकं मध्ये त्वया न बस्तव्यस्। येन का
रणेन अहमामिः षण्मासान्ते पिच्छेकेकदानं कृत्वा गहीतमे-
तत्सरः” । एवं च कि बहुना परस्पर द्वेध्चुत्पन्नमः । स॒ च
राज्ञः शरणं गतोऽत्रवीत्-' देव | एते पक्षिण एवं वदान्त-
"यत् अस्माकं राजा कि वारेप्याते। न कल्यापि आवास”
दुः । मया च उक्तं, न शोभनं युप्मामेः अभिहेतम् ।
अहं गत्वा राज्ञे निवेदयिष्यामि। एवं स्थिते देवः रमाणम्
ततोराजा भृत्यान् अत्रबीत)- मो भो ! गच्छत, सवाब
भाषाटीकासमेतम् । ( ३३९ )
पक्षिणो गतासून् कृत्वा शीघरमानयत्त” । राजादेशानन्तर-
_मेव प्रचिळुस्ते । अथ लणशुडहस्तान् राजपुरुषान् दृष्टा तत्र
॥ एकेन पक्षिणा बद्धेन उक्तं, भोः स्वजनाः! न शोभनमाप-
तितम्। ततः सवैः एकमतीभूय शाघमुत्पातितव्यम्' । तेश्च
तथाबुडितम् । अतोऽहं अवीमि-
किसी स्थानमे एक चित्ररथ नाम राजा था) उसके योधाभोसे रक्षित पत्मसरनाम
एक सरोषर था वहा बहुतसे सुवणमय हसथे । छठे २ मद्दौनेसे एक एक पख
- त्याते रहे तब उस सरोवरे सुवर्णमय बडा पक्षी भाया | उन्होने कहा,“ हमारे
बचत तुमको रहना न चाहिये । जिस कारणस कि हमने छःमहानेमे एक २
पदान करके यह सरोवर प्राप्त किया है | ऐसा बहुत कहनेसे परस्पर उनका
देष उत्पन्न हुआ । वह राजाकी शरणमे जाकर कहने ळगा,-“देव यह पक्षी इस
प्रसारसे कहते हैं कि,- हमारा राजा क्या करेगा १ | किसीको हम स्थान न
दमे” मैंने कहा-“ तुमने अच्छा नहीं कहा । में जाकर राजासे कहूगा” । इस
* कामे स्वामीही प्रमाणे? | तब राजा भुत्योंसे बोळा-“भो मो ! जाओ सब
पक्षियोंकों प्राणरहित करके शीघ्र लाओ ” | चे राजाकी आज्ञा पातेही चळे ।
तव गुड हाथमें लिये राजपुरुषोकों देख एक बृद्ध पक्षीने कहा,--भो सुजनो
भलीबात न हुई सो सत्र एकमत होकर शीघ्र उडो” और उन्होंने वेताही अनु-
छान किया इससे में कहताहँ-
भूतान्यो नाइणहाति ह्यात्मनः शरणागताव्। ,
भूतार्थास्तस्य नश्यन्ति हसाः पद्मवने यथा ॥ १३७ ॥7
कि अपनी शरणमे आये हुए मृत्यॉपर जो अनुप्रह नहीं करताहे उसके भूत
अर्थ नष्ट हो जातेहे जैसे पद्मजनमें हस ॥ १३७ |?
इत्युक्ता पुनरपि ब्राह्मणः प्रत्यूषे क्षीरं गृहीत्वा, तत्र गत्वा
तारस्वेण सर्पमस्तोत् । तथा सर्पश्चिरं वल्मीकदारान्त-
लीन एव ब्राह्मणं प्रत्युवाच त्वं लोमादच आगतः पुत्रशोकमपि
बिहाय | अतः परं तब मम च प्रीतिनोंचिता । तव पुत्रेण
यौदनोन्मदेन अहं ताडितः । मया स दष्टः | कथं मया लश
४
a
(३४० .) पञ्चतन्त्रम् )
डप्रहारों विस्मत्तेव्यः, ९ त्वया पुत्रशीकढुःखँ कथं विस्मत्ते-
व्यस् !?? । इत्युक्ता बहुमूल्खं हीरकमणि तस्मे दत्वा “अत;
परं पुनस्त्वया न आगन्तव्यम्” इति पुनरुक्ता विवरान्तर्गतः
आझणश्च मणि गृहीत्वा पुत्रबुद्धि निन्दन् स्वगृहमागतः ।
अतोऽहं ब्रवीमि
यह कह फिरभी ब्राह्मण प्रातःकाल दूध ग्रहण कर वहां जाकर ऊंचे स्तररसे
सर्पकी स्तुति करने लगा । तब सर्प अधिक वल्मीकके भीतर छीन हुभाही ब्राहम-
णसे बोछा- तू लोमसे यहां आया है पुत्रशोक भी छोड दिया ॥ अब तेरी
और मेरी प्रीति उचित नही । योवनके मदसे तेरे पुन्रने मुझे ताडन किया है ।
मैंने उसे काट छिया । किस प्रकार में ळयुडप्रहार भूछ जाऊंगा ? और तू
पुत्रशोकका दुःख किस प्रकार भूळ'सकता है ?” | ऐसा कह एक बहुत
मोळका हीरा उसे देकर “बस अब तू यहां न आना” यह फिर कह वित्ररके
भीतर गया । ब्राह्मणभी मणिको ठे पुत्रकी बुद्धिकी निन्दा करता अपने घा
आया । इससे में कहता हूं-
“'चितिकां दीपितां पझ्थ फटां भग्नां ममेव च ।
भिन्नछ्रिष्टा ठु या मीतिर्ने सा स्नेहेन बद्धेते ॥ १३८॥”
“प्रज्बलित चिता और फटा हुआ मेरा फन देखकर जावळे कि भिन्न
होकर जुडी प्रीति स्नेहसे नहीं बढती ॥ १३८ ॥? |
तदस्मिन् हते यत्नादेव राज्यमकण्टकं भवतो भवति’' !
लस्य एतद्वचनं श्रत्वा क्कराक्षै पप्रच्छ,~ भद्र ! खै तु किं
न्यसे ९” सोऽब्रवीत,-* देव ! निर्दयमेतत, यदनेन अभि-
गहेतम् । यत् कारण शरणागता न वध्यत सुष्ट खु
इढ्नाख्यातम्- , कि
सो इसके मारनेसे यत्नपूवेकुःतुम्हाश अकंटक राज्यहो” उसके यह अचन
सुन क्रूराक्षते पूछा-“भद्द ! तुम इसमें क्या मानते ? ” | वह बोळा-“देव यह
निर्दया हे जो इस मन्त्रीने कहा है । कारण कि शरणमें आया हुआ नहीं
मारा जाता । यह सत्य कहा गया है कि-
भाषाटीकासमेतम् । (३२१ )
श्रूयते हि कपोतेन श्रुः शरणमागतः ।
पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसेनिमन्तरितः ॥ १३९ प?
सुना है कि, कबूतरने शरणमें आये हुए शत्रुको यथायोग्य हजन कर
अपने मासले तिमत्रित किया ॥ १३९ |?
अरिमरदैनोऽत्रवी व-* “कथमेतत् ?” । क्रराक्षः कथयति
अरिमर्दन बोळा-“यह केसे ?" क्रूराक्ष कहने छगा-
कथा ७.
कशथ्चित्ुद्रसमाचारः भाणिनां कालसन्निभः ।
विचचार महारण्ये घोरः शकुनिङुब्धकः ॥ १४० ॥
कोई छुद्र आचाखाला प्राणिथोको कालकी समान घोर पदियोका छुन्मक
ववे विचरता था ॥ १४० ||
नेब कश्चित्सुहत्तएय न सम्बन्धी न बान्धवः ।
स तेः सवैः परित्यक्तस्तेन रौद्रेण कमणा ॥ १४१ ॥
न कोई उसका सुहृत्, न सम्बन्धी, न वाधत्र था, उसके कूर कमेसे सबने
उसे त्याग दिया ॥ १४१ ॥
अथवा-
अथवा- ।
ये नृशंसा इरात्मानः प्राणिनां प्राणनाशकाः !
उद्वेजनीया भूत्तानां व्याला इव भवन्ति ते ॥ १४२॥
जो कूर दुरात्मा प्राणियोंके प्राण नाशक हैं वे भूतोंके उद्रेगकारक काकी
समान होते हैं ॥ १४२ ॥
स पञ्चरकमादाय पाशं च लगुडं तथा !
नित्यमेव वनं याति सर्व्राणिविहिसकः॥ १४३ ॥
वह् सब प्राणिर्योकी [इसा करनेवाला पिंजरा पाश भर ळगुड लेकर
तित्यही वनको जाता | १४३॥ "
अन्येदुञ्रेमतस्तस्य वने कापि कपोतिका ।
जाता हस्तगता तां स माक्षिपत्पञ्ररान्तरे ॥ १४४ ॥
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(३४२), पञ्चतन्त्रम् ।
एक दिन उसके बनमें घूमते हुए कोई कवृतरी हाथ आई उसने उसे पिज
डाळ किया ॥ १४४ ॥
अथ कृष्णा दिशः सर्वा वनस्थर्घाभवन्धनेः ।
वातवृष्टिश्च महती क्षयकाल इवाभवत ॥ १४५ ॥
तब उस वनका सब दशा मधात इयाम होगई क्षय कारुको समान ब ई
पवन चढी और वषा हुई ॥ १४९ ॥
ततः सन्त्रस्तहृदयः कम्पमानो सुसं ।
अन्बेषयन्परिचाणमाससाद वनरुपतिम् ॥ १४६॥
तब संत्रस्त हृदय होकर वारम्वार काम्पित हुआ वह पार्त्राण (रक्षा ) खोजता
हुआ बृक्षके नाचे प्रात हुभा॥ १४६ ॥
सुहूर्त श्रश्यते यांवद्वियद्विमलतारकम् ।
प्राप्य वृक्ष वदत्येव योऽत्र तिष्ठति कश्चन ॥ १४७ ॥
जब सुते मात्रै आकाश निर्मेछ तारेबाला हुआ तब वृक्षको प्राप्त होकर
बोला,- जो कोई यहां स्थितहो ॥ १४७ ॥
तस्याहं शरणं प्राप्तः स परित्राठु मामिति ।
शीतेन भिद्यमानश्च क्षघया गतचेतसम्॥ १४८ ॥
उर्साकी में शरणम प्राप्त हु मेरी वह रक्षा करे में शीतसे भेदित और भूखसे
ब्याकुछ ह ॥ १४८॥ -
अथ तस्य तरो! स्कन्धे कपोतः छुचिरोषितः ।
भाय्याविरहितस्तिष्ठन्बिललाप सुदुःखितः ॥ १४९ ॥
उसी वृक्षकी शाखामें कबूतर बहुत काळसे रहताथा वह उस समय ब्लीके
बिना विछाप कर रहा हुःखी था ॥ १४९ |
वातवर्षो महानासान्न चागच्छति मे मिया ।
तया बिरहितं ह्येतच्छून्यमच शह मम ॥ १५०॥
बडी बात और वर्षो हुई हे अभातक मेरी प्यारी नहीं आई उसके विना आज
यह मेरा घर सूना है | १९०॥ °
पातित्रता पतिप्राणा पत्युः मियहिते रता ।
यस्य स्यादीदृशी. भार्या, घन्यः स पुरुषी, स्वि ॥१५१॥
माषाटीकासमेतम् । (३४३ )
पतिव्रता पतिक प्राण पतिके प्रिय भौर हितमे तत्पर जिसके ऐसी भार्या है
इह पुरुष पृथ्वी धन्य हे ॥ १५१ ॥
न गह ग्रहमित्याहुगददिणी गहसुच्यते ।
गुहं हि गहिणीहीनमरण्यसदशं मतम् ॥ १५२ ॥
घरका नाम धर नहीं किन्तु खीका नाम गृह हे, गृहर्णाके विना घर वनकी
समान हे ॥ १५२ ॥
पञ्जरस्था ततः श्रत्वा भतुदेःखात्वितं वचः ।
कपोतिका सुसन्तुष्टा वाक्यञ्जेदइमथाह सा ॥ १५३ ॥
तव पींबरेमें स्थित हुई कवूतरी उसके दुःखभरे वचन सुनकर इस प्रकार
सन्तुष्ट होकर कहने छगी ॥ १९३ ॥
न सा स्रीत्यभिमन्तव्या यस्याँ भत्ता न तुष्यति ।
तुष्टे सतारे नारीणां तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥ १५४ ॥
उसमें ख्रीपन मत मानो जिससे कि स्वामी प्रसन्न नहीं होता नारियोंके पति
प्रसन्न होनेमें सव देवता उसपर प्रस्न होजाते हैं ॥ १५४ |
दावासिना बिदग्धेब सपुष्पस्तवका लता ।
भस्मीभवतु सा नारी यस्यां भर्त्ता न तुष्यति ॥ १५५ ४
दावाभिंसे दग्ध हुई फल गुच्छेवाडी लताकाी समान वह स्री भस्म होजातीहै
_ जिसपर स्वामी प्रसन्न नहीं होता ॥ १९५ ॥
मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मित सुत;। *
अमितस्य हि दातारं मत्तारं का न पूजयेत् ॥ १५६ ॥
पिता माता पुत्र पारमित सुख देते हैं, इससे आहत दान देनेवाले भर्ताका
पूजन कौन न करे ॥ १९३ ॥
पुनश्च अब्रवीत-
फिरमी बोर्छा-
शृणुष्वावदितिः कान्त यत्ते वक्ष्याम्यहं हितम् ।
आणेरंपि त्वया नित्यं संरक्ष्ः शरणागतः ॥ १५७ ॥
हे स्वामी ! सावधान होकर सुनो जो में तुमको" हितकर वचत कहतीह
शरणमे आया पुरुष प्राणोंसे भाविक रक्षा करना चाहिये ॥ १५७ ||
( ३४४) पञ्चतन्त्रम् ।
एष शाकुनिकः शेते तवावासं समाश्रितः
शीतासंश्र क्षुधात्तश्च पूजामस्म समाचर ॥ १५८॥
यह पक्षीका पकडनेवाळा तुम्हारे स्थानें प्रात इभा सोता हे भौर भूखसे
व्याकुल है तू इसका सत्कार कर ॥ १५८ ॥ .
श्रयते च-
सुना है कि-
यः सायमतिथि प्राप्तं यथाशक्ति न एजथेत।
तस्यासौ इप्कृतं दत्वा सुकृतं चापकर्षति ॥ १९९ ॥
संध्याके समय प्राक्त हुए अतिथिको जो यथाशक्ति पूजन नहीं करता हे '
उसको यह अपना पाप दे उसका पुण्य लेकर चछा जाता है | १५९ || -
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मा चास्मे त्वं कृथा द्वेषं बद्धानेनोत मात्मा ।
स्वकृतेरेव बद्धाहं प्राक्तनः कमबन्धनः ॥ १६०॥
इसने मेरी प्रिया बांधली हे इस कारण इसस देय मत करो में अफव कि ये
व जन्मके कमोचुसारही बन्धी हूं ॥ १६० ॥ |
दारिद्रयरोगदुःखानि वन्धनव्यसनानि च ।
आत्मापरा धदक्षस्य फलान्पेतानि देदिनाम॥ १६१ ॥
दारं, राग, दुःख, बन्धन, न्यसच यह आक्ाअपराधदृक्षक फळ देह
घारियाँको होते ४ ॥ १६१ ॥
तस्मास्व देषम॒त्सज्य महन्धनसमुद्धवम् ।
धर्म मनः समाधाय पूजयेनं यथाबिधि ॥ १६२॥
इस कारण तू मर वघतत उत्पन्न हुए छपका त्वायच कर घे मनका
छगाय यथाबिधिसे इसको पजनकर ॥ १६२ ॥
तस्यास्तद्वचनं श्रत्वा धर्मयुक्तिसनन्वितम् ।
उपगम्य ततोऽधृष्टः कपोतः प्राह छुव्धकम् 0१९३ ॥
उसके घम जार युफ़क वचन झुनकर छुब्रच्धकक पास जाप नत्रतात
कपात बाला । १६३ ॥
सुखागतं भद्र तेऽस्तु प्रहि कि करवाणि ते ।
सन्तापश्च न कत्तेव्यः स्वह वर्तते मवान् ॥ १६४ ॥
शी
|
भावाटीकासमेतम् । (३४५)
हे भड! आपका झुभागमनहो कहो मे तुम्हारा कया प्रिय करू दु ख मत मानना
तुम अपने घरेही प्रात हो ॥ १६४ ||
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा पत्युवाच विहंगमम् ।
कपोत खछु शीतं मे हिमत्राणं विधीयताम् ॥ १६५॥
उसके यह वचन सुन ( वह व्यावा ) पञ्चासे बोळा हे कबूतर, मुझे जाडा
चहुत लगता है जाडेसे बचाओ ॥ १६५९ ॥
स गत्वाक्गारकं नीत्वा पातयामास पावकम् ।
ततः शुष्केषु पर्णेषु तमाशु समदीपयत् ॥ १६६॥
तव वह जाकर ( चोंचर्मे ) अगारेकी लकडी ढाकर अझ्निको गिराता हुआ
और फिर सूखे पत्तोमे उसको जढाता इभा || १६६ ॥
सुसन्दीत्तं ततः कृत्वा तमाह शरणागतम् । -
सन्तापयस्व विश्रब्धं स्वगानाण्यन्न निर्भयः ।
न चारित विभवः कश्चिन्नाशये थेन ते क्षुधम १६७॥
अग्निको दीतकर उस शरणते भागे हुरऐ बोळा अब निर्भय होकर तुम
अपने गछाकों तपाओ और कुछ वैभष तो हे नहीं जिससे तुम्हारी क्षुधा निशत
करूँ ॥ १६७ ॥
सहस्रं भरते कश्चिच्छतमन्यो दशापरः !
मम त्वकृतपुण्यस्य क्षद्रस्यात्मापे इममरः ॥ १६८-॥
कोई तहलका, कोई सौको, कोई दशकों पाळत करताहे अपुण्यकारी मुज
रुद्रका शरीर तो एककी तृतिके निमित्त भौ पूर्ण नहाहे | १६८ ॥
एकस्याप्यतिथेरन्नं यः प्रदातुं न शक्तिमान् ।
तस्यानेकपरिक्केशे गहे कि वसतः फलम् ॥ १६९॥
जो एक अतियिको मौ भन्नदेनेकी साम्य नहीं रखता उसका अनेक छेश-
-धाळे घरमे रहनेसे क्या फलहे ? ॥ १६९, ॥
तत्तथा साधयाम्थेतच्छरीरं इःखजीवितम् ।
यथा भूयो न वक्ष्यामि नास्तीत्पर्थिसमागमे ॥ १७०॥
सो इस दुख जीवित शरीरको इस प्रकारते सांधन करूगा एदि जो फिर
अर्थीके समीप मेरे पास कुछ नहीं ऐसा न कहसकू ॥ १७० ॥
(३४६) पञ्चतन्त्रम् ।
स निनिन्द किलात्मानं न तुतं छुब्धक पुनः ।
उवाच तपेयिष्ये त्वा सहूर्त प्रतिपालय ॥ १७१॥
वह अपनी ही निन्दा करके न कि उस लुब्धकेकी इस प्रकार वह (कवृतर)
ढुन्धकसे बोला एक सुहूतैतक तू ठहर ॥ १७१ ॥
एवमुक्ता स धर्मात्मा प्रहष्टेनान्तरात्मना ।
तमञ्नि सम्परिक्रम्य प्रविवेश स्ववेश्मवत् ॥ १७२॥
ऐसा कह बह धमीत्मा प्रसन्न मनसे उस अभिकी पारिक्रमाकर भपन घरकी
समान उसमें प्रवेशा: करगया ॥ १७२ ॥ ,
ततस्तं लुब्धको दृष्ट्रा कृपया पीडितो भृशम् ।
कपोतमग्नौ पतितं वाक्यमेतदभाषत ॥ १७३ ॥
तब यह लुब्चक उसको देख पासे अत्यन्त पीडितहो आगमं गिरते कवूत-
रसे यह वचन बोला ॥ १७३ ॥.
सः करोति नरः पापं न तस्यात्मा धुवं मियः।
आत्मना हि कृतं पापमात्मनेव हि स्ुज्यते १७४॥
जो मनुष्य पाप करता है अवश्यही उसको भात्मा प्रिय नहीं हे आत्माके लिये
पापको आत्माही मोगता है ॥ १७४ ॥
सोऽहं पापमतिश्चैव पापकर्मरतः सदा ।
पातिष्यामि महाघोरे नरके नाच संशयः ॥ १७५॥
वृह सं पापमाति पापकमंम सदा रत महाघार चरकम पडूगा इसम कुछ सन्द
नहीं || १७९ |
नूनं मम नृशंसस्य प्रत्यादर्शः सुदा्शितः
प्रयच्छता स्वमांसानि कपोतेन मद्दात्मना ॥ १७६ ॥
अवइयही अपना मांस देते हुए इस महात्मा कपा्तने मुझ निदयीको शिक्षा
दी हे॥ १७६ ॥
अद्य प्रभाते देह् स्वं सवेभोगाबिवजितम् ।
तोयं स्वरपं यथा भीष्मे शोषयिष्याम्यहं पुनः ॥ १७७॥
आजस सम्पूर्ण भागराहत इस दहका गरमीमं थोडे जळकी ' समान सुखा
डाळूंगा ॥ १७७ ॥ * है
भाषाटीकासमेतम् ! (२४७)
शीतवातातपसहः कृशाङ्गो मालिनस्तथा ।
उपवासेबेहुवियेश्चरिष्ये धर्मसुत्तमम् ॥ १७८ ॥
) शीत वात गरमीका सहनेषाळा कृश भंग मळीन भें अनेक उपवोस कर धर्म
करूंगा ॥ १७८ |
ततो यष्टि शलाकाश्च जालकं पञ्रं तथा ।
बभञ्ज लुब्धकोपीमां कपोतीश्च मुमोचह ॥ १७९॥
तब वह टुन्धक लकडी शळाका जाल पींजरा तोडकर" उस दीन कपोर्ताको
भी छोड देता हुआ || १७९ ॥
लुब्धकेन ततो स॒क्ता दृष्ठात्रो पतितं पतिम् ।
कपोती विललापार्ता शोकसँन्तत्तमानसा ॥ १८०॥
वह ळुव्धकसे छोडी इई कपोती भाग्नेम पतिको गिरा देख शोक सन्ताप
मनसे व्याकुळ हो विलाप करने लगी || १८० ॥
न काय्यंमद्य मे नाथ जीवितेन त्वया विना ।
दीनायाः पतिहीनायाः किं नाय्या जीविते फलम्॥१८१॥
हे नाथ ! तुम्हारे बिना मुझे जीनेसे अब काम नहीं है दीन पतिहीन खोके
जावेसे क्या फळ है! ॥ १८१ ॥
मनोदर्पस्त्वहङ्कारः कुलपूजा च वन्धुषु।
दासमत्यजनेष्वाज्ञा वैधव्येन प्रणश्याति ॥ १८२ ॥
मनका हर्ष, अहकार, बन्चुओम कुछ गोख, दास तथा भुत्यजनांमे भाजा
यह सब वैधव्य होनेमें नष्ट होजाता है ॥ १८२॥ *
एवं विलप्य बहुशः कृपणं भृशहुःखिता ।
पातिन्रता सुसन्दीत्तं तमेवाग्निं विवेश सा ॥ १८३॥
इस प्रकार बहुत विळाप कर दीन दुखी हो वह पतिब्रता उस प्रदत्त अभिने
प्रवेश कर गई | १८३ ॥ ,
ततो दिव्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता
भत्तार सा एवमानस्थ ददश स्व कपाातका ॥ १८४ ॥
तब दिव्य बल्न पहरे दिव्य गहनोंसे भूषित वह कपोती विमानमें अपने खा-
माको देखने छगी ॥ १८४ ॥
(३४८) पञ्चतन्त्रम् ।
सोऽपि दिव्यतलुभूत्वा यथार्थमिदमन्रवीत्।
अहो मामदुगच्छन्त्या कुतं साथ शुभे त्वया ॥ १८५॥
और वह मी दिव्य शरीर हो यथार्थ ऐसा कहने छगा हे शुभे ! मेरे पछि!
आइ यह तुमने अच्छा किया ॥ १८ |
तसः काटयाऽद्वकाटा च यान रांमाण मानुष ।
तावत्काल वसेत्स्वग भत्तार यानुगच्छात ॥ १८५ ॥
साढेतीन करोड जितने रोम मनुष्पके हैं इतने समयतक वह खी स्वगमे
विवास करती हे जो अपने स्रामीको पीछे अनुगमन करतीहै॥ १८६ ॥
कपोतंदेवः सूर्यास्ते प्रत्यहं सुखमन्वभूत् ।
कपोतदेहवत्सासीत्माक्पुण्यप्रभवं हि तत्॥ १८७॥
बह कपोतदेव सूर्यास्तमे प्रतिदिन सुख अनुभव करता था और वह कपोती
दू्रजन्मक पुण्यप्रभावत कपात देहवत् हांगई ॥ १८७ ॥
हर्षाबिष्टस्तती व्याधो विवेश च बनं घनम् !
माणिहिसां परित्यज्य बहुनिर्वेद्वान्द्शम् ॥ १८८॥
तब प्रसन्न हो वह व्याधा गहन बनमें प्रवेश करगया । और प्राणीकी हिंसा
त्यागन कर बहुत निवेंदवाळा होकर ॥ १८८ ॥
तत्र दावानछं दृष्टा विवेश विरताशयः ।
निदुंग्धकल्मषो भूत्वा स्वर्गसोर्यमवासवान् ॥ १८९॥
वहां दावानळ ठगी देखकर उसमें प्रवेश करगया और पापराहित होकर
स्वगंका सुख सोगने लगा ॥ १८९ ॥ '
अतोऽहं बवीमि-
इससे भें कहता हुं-
“'श्रूयते. हि कपोतेन शचः शरणमागतः ।
पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसेनिमनन्त्रितः ॥ १९० ॥”
“सुनाहै कि, कपोतने शरणमे आये शत्रुको यथायोग्य पूजन कर अपने
मांसले निमंत्रित किया | १९० |!"
तत श्रृत्वा अरिमर्दनो दीप्ताक्षं एष्टवान-“ एवमवस्थिते
ईक भवान् मन्यते!” सोच्नवीद)- देव ! न हन्तव्य एवायम्।
-
भाषाटीकासमेतम् । (३४९)
ti
यह सुन अरिमर्दनने दोताक्षसे पूछा-“ऐसा कहनेपर आप क्या मानते'
हो १” | वह बोळा-“देव ! इसको मत मारो-
सत
जिससे-
या ममोद्विजते नित्यं सा मामद्यावशूइते ।
प्रियकारक भद्र ते यन्ममास्ति इरस्व तत्॥ १९१॥
जो निरन्तर मुझसे कळेश मानती थी बह आज मुझे आलिंगन करती है
हें प्रियकारक ! तुम्हारा मगछ हो जो मेरा हे उसे ग्रहण कर ( चोरके प्राति
गृहत्यीका बचत है ) ॥ १९१ ॥
चौरेण चापि उक्तम्-
तब चोरने भी कहा-
“(हु्तव्यं ते न पश्यामि हृ्तेव्धं चेद्धविष्याति ।
पुनरप्यागमिष्यामि यदीयं नावगूहते ॥ १९२ ॥?
तेरे हरने योग्य धनको नहा देखता हू जो हरने योग्य होगा तो फिर भा
आउगा जो यह खरी आछिंगन न करेगी || १९२ ॥”
अरिमर्दनः पृष्ठवान,- का च नावगूहते ? । कश्चाथं
चोर इति विस्तरतः श्रोठुभिच्छामि? । दीक्षाक्षः कथयति-
आरैमर्देन पूछने छगा-“कौन नहीं आछिंगन करती ! कोन यह चोर है ?
यह विस्तारसे सुननेकी इच्छा करता हू”? । दीताक्ष कहने । ठगा--
कथा <.
अस्ति कस्मिचिदधिष्ठाने कामाठुरो नाम बृद्ववणिक,
तेन च कामोपहतचेतसा मृतभार्येण काचिन्निद्धेनवणिकू-
'खुता प्रभू्त धनं दत्त्वा उद्वाहिता । अथ सा इःखाभिभूता
तं बृद्धवणिजं द्रष्टुमपि न शशाक । युक्तश्चैतत्-
किसी एक स्थानमे कामातुर नाम बृद्ध घणिक् रहता था, उसने कामे
-उपहत चित्त हो भायोके मृत होजानेसे कोई निधन वणिकपुत्री बहुतसा घन
देकर विवाह । बह दुःखसे व्याकुळ हुई उस इद्ध बिकको देखनेको भी समर्थ
न हुई । यह युक्तही हे-
€ ३५०) पञ्चतन्त्रम् ।
श्वेतं पदं शिरसि यज्ञ शिरोरुहाणां
स्थानं परं परिभवस्य तदेव पुंसाम ।
आरोपितास्थिशकलं परिहृत्य यान्ति
न्चाण्डालकूपमिव दूरतरं तरुण्यः ॥ १९३ ॥
जो कि शिरपर श्वेत बालोंका स्थान हे यह पुरुषोंके तिरस्कारका परम स्थान
हे तरणी चाण्डाळके कूपकी समान आरोपित अत्थिखण्डकी समान उसे
त्यागकर चढी जाती हैं ॥ १९३ ॥
तथाच-
ओर देखो-
गात्रं संकुचितं गतिविंगालिता दन्ताश्च नाशं गता
दाष्टिश्रांम्पति रूपमप्युपहतं वक्ष्त्रञ्च लालायते ।
वाक्यं नेव करोति बान्धवजनः पत्नी न शुश्रषते
धिक कष्टं जरयाभिभूतपुरुषं पुनोऽप्यवज्ञायते ॥ १९४॥
शरीरम झिल्ली पडी, गति हीन हुई, दांत नाशको प्राप्त इए, दृष्टि घूमने
लगी, रूप नष्ट हुआ, सुखसे छार गिरने छा, वन्धुजन उसके वचन नहीं
मानते तथा पत्नी भी नहीं सुनती । जरासे तिरस्कृत पुरुषको घिकू तथा कष्ट है
कि जिसकी पुत्र भी भवज्ञा करन्ना हे ॥ १९४ ||
अथ कदाचित् सा तेन सह एकशयने पराइसुखी यावत
तिष्ठति, तावदगहे चोरः ्रविष्टः। सा अपि तं चौर दष्टा
भयव्याकुलिता वृद्धमपि तं पतिं गाढं समालिलिङ्ग। सोऽपि
दिस्मयात् पुलकांकितसर्वमात्रः चिन्तयामास ) “ अहो!
किमेषा मामद्य अवगूहते'' । यावत् निपुणतया पश्यति,
तावत गुहकोणेकदेरो चोरं दृष्टा व्पचिन्तयत् । “नूनं एषा
अस्य भयात मामालिड्राति'” इति ज्ञात्वा तं चोरमाह-
एक समय जब वह उसके साथ एक ही शयनर्म मुख फेरे स्थित थी उसके
घरमै उस समय चोर घुसा । वह भी उस चोरको देख भयसे व्याकुळ चित्त
हो उस इद्धकोही आलिंगन करती इई । वह भी विस्मयसे सब शरीर पुलकित
हो विचारवे लगा | “ अहो | भाज यह कैसे मुझे आलिंगन करती हैं” । जब
भाषाटीकासमेत्तम् । (२५१)
अच्छी प्रकारसे देखा तो घरके एक कोबे चोरको देख विचारने छगा | “अव-
इपद्दी यह इसके भयसे मुझे आरिंगन करती है” ऐसा बिचार चोरसे बोछा-
या ममोद्विजते दित्यं सा मामद्यावगृहते !
प्रियकारक भद्रं ते यन्ममास्ति हररू तत् ॥ १९५॥ ??
जो मुझसे सदा हेश मानती थी षह आज मुझे आछिंगन करती है हे
प्रियकरनेवाले ! जो मेरा है उसे हरण कर || १९५ ॥ ”
तत् कृत्वा चोरोऽपि आह-
यह सुनकर चोर मी बोळा-
हर्तव्यं हे न पश्यामि हत्तेव्य चेद्धभविष्यति ।
पुनरप्यागमिष्यामि यदीयं नावगूहते ॥ १९६ ॥
तेरे हरमे योग्य नहीं देखताहू जो हरने योग्य होगा तो फिर आउंगा जो
यह न आंगन करेगी ॥ १९६ ॥
तस्मात् चोरस्यापि उपकारिणः श्रयः चिन्त्यते, कि पुनन
शरणागतस्य! अपि च अं तैः विभक्ृतोऽस्माकमेव पुष्टये
भावष्यात तदायरन्प्रदुशानाय चति । अनन कारणन अय-
मवध्य? इाते। एतदाकण्ये अरिमदनोऽन्यं सचिवं वक्रनासे
प्रच्छ,- भद्र ! साम्प्रतमेवं स्थिते कि कत्तेव्यम ९” सोऽ-
बवीव,- * देव | अवध्योऽयम् । थतः
इस कारण उपकारो चोरका भी मगछ बिचारा जाता हे फिर शरण
आयेका तो क्या । और फिर यह उनसे तिरस्कृत हुआ हमारी पुष्टिके निमित्त
ही होगा उसका रघन दिखानेको । इन कारणोंसे यह अवध्य है” | यह सुनकर
अरिमर्दन दूसरे मन्त्री बक्ननाससे धूछने छगा-" मद्र | इस स्थिति क्या करना
चाहिये” बहू बोछा- यह अवध्य हे । क्यों कि-
शन्वोऽपि हितायेव विवदन्तः परस्परम्।
चौरेण जीबितं दत्तं राक्षसेन तु गोयुगम् ॥ १९७॥??
परस्पर विवाद करते इए शत्रुमी दितके निमित होते हैं चोरत जीवन और
राक्षसने दो गौ दीं॥ १९७॥
ल
(३५२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अरिमर्दनः प्राह, कथमेतत्! वक्रनासः कथयति-
अरिमर्दैन बोछा,- यह केसे ?” वक्रनास कहने छगा-
कथा ९.
अस्ति कर्मिश्चिदिष्ठाने दरिद्रो द्रोणनामा ब्राह्मणःप्रति
ग्रहधनः सततविशिष्टवस्तराबुळेपनगन्धमाल्यालङ्कारताम्ब-
लादिभोगपारेवजितः भ्ररूटकेशश्मश्रनखरोमो पाचितः शीतो
प्णवातवर्षादिभिः पारिशोषितशरीरः । तस्थ . च केनापि
यजमानेन अबुकम्पया शिशुगोयुगं दत्तम बाझणेन च बाल”
भावात् आरभ्य याचितघृततलयवसादिभिः संवद्धंच सुपृष्ट
कृतम् । तञ्च दृष्टा सहसा एव कश्चित् चौरः चिन्तितवान्,
“अहमस्य ब्राह्मणस्य गोयुगमिदमपहरिष्यामि” । इते
निश्चित्य निशायां बन्धनपाशं गृहीत्वा यावत् प्रस्थितःताव
दद्धमार्ग प्रविरलतीक्ष्णदन्तर्पक्ति; उन्नतनासावंशो प्रकट-
रक्तान्तनयन उपचितल्मायुसन्ततिनेतगात्रः शुष्ककपोलः सुहुः
तहुतवहपिङ्गलश्मश्रकेशशरीरः कश्चित् इष्टः दृष्टा च तं
तीव्रभयत्रस्तोऽपि चारोऽत्रवीत्-को भवानिति ?”'स आह-
*“सत्यवचनो5हं ब्रह्मराक्षसः । भवान् अपि आत्मानं निवेद-
यछु''सोऽब्रवीत- “अहं कूरकमां चोरः दरिद्रम्रा्मणस्य गोयुगं
हतु मस्थितोऽस्मिः?? । अथ जातप्रत्ययो राक्षसो$त्रवीत-
«भद्र ! पष्ठाहकालिकोष्यं, अतः तमेव बराह्मणम भक्षयि-
ष्यामे । तत् सुन्द्रामिदमेककाय्यों एव आवाम । अथ ता
तत्र गत्वा एकान्ते काळमन्वेषयन्तो स्थितो । प्रसते च ब्राह्मणं
तद्गक्षणार्थे प्रस्थितं राक्षस दृष्ठा चोरो$जबीत- सद्र | तष
न्यायः, यतो गोयुगे भया अपहत्ते पश्चात् _त्वमेनं ब्राह्मण
भक्षय ” । सोऽब्रवीत्; कदाचिदयं ब्राह्मणो गोशब्दन
बुध्येत, तदा अनर्थकोऽयं मम आरम्भः स्यात” । चोरो5पि
अब्रवीत~''तव अपि यदि भक्षणाय उपस्थितस्यान्तर एकप
भाषांटीकासमेतम् । ( ३५३
अन्तरायः स्यात तदाहमपि न शक्कोमि गोयुगमपहत्तुम्।
अतः प्रथमं मया अपहते गोयुगे पश्चात् त्वया ब्राह्मणो भक्ष-
"यितव्यः? । इत्थं च अहमहमिकया तयोविंबदतोः समुत्पन्ने
द्ध प्रतिरववशाद ब्राह्मणा जजागार! अथ त चाराऽत्रवीत्-
“ब्राह्मण ! त्वामेव अपं राक्षसो भक्षयिठुमिच्छति’"। राक्षसो-
ऽपि आह~* “ब्राह्मण ! चोरोऽयं, गोयुग ते अपहठमिच्छाति'
एव श्रत्वा उत्याय ब्राह्मणः सावधाना भूत्वा इष्टद्वतामन्ना-
व्यान आत्मान राक्षसाइउगूणळडुडन चारात् गायुग ररक्ष।
` अतोऽहं बवीमि-
किसी स्थानमे दारिद्र द्रोणनाम ब्राहमण प्रतिग्रह मात्र जीविकाषाळा दिरन्तर
श्रेष्ठ वल्लानुलेपन गंध माळा अळकार ताम्वूढादि भोगसे हीव बढेहुए केश
डाढी मुछ नखरोमसे युक्त शीत उष्ण धात वर्षासे शोषित शरीर था । उसको
किसी यजमानने कृपाकर दो बछडे दिये । नाझणने उन दोनो बछडोंको बाळक-
पनसेही मागे इए घी तेळ घास आदिसे बढ़ाकर पुष्ट किया | उनको देख सह=
साही कोई चोर विचारने छगा-- भै इप ब्राह्लणके दोनो बछडे चुराऊमा” |
ऐसा विचार रात्रिम बन्यनरज्छु छेकर जन चरा तब तक आाधे मार्गे पृथक्
तीक्ष्ण दातोंकी पक्तिवाळा, ऊचे नासिका बशसे युक्त, उज्ज्वल छाळ नत्र, पुष्ट हैं
नाडीसमूइ जिसका ऐसा, नत शर्रर, सूखे कपोल, सम्पक् इत हुए अमिके सदृश
पिङ्गल डाढी मूछों और शरारवाळा कोई देखा । देखतेही उसको बडे भयसे
व्याकुळ हुआभी चोर चोरा,-- तुम कोनहे १!” बह बोला-“ में सत्य वचन
ब्रह्मराक्षस हू । घुममी अपनेको कहो” | धह वोडा-''में कूर कमी चोर इ) दरिद्र
ब्राह्मणके दो चेल चुराने जाता हु” | तव विश्वासको प्राप्तो राक्षत बोळा
“भद्र | में छठे समय मोजन करनेवाला इ । इप्त कारण भाज उसी ब्राह्मणको
भक्षण करूगा । यह अच्छी वात हे जो इम तुम दोनो एकही कार्ये हैं” |
तब वे दोनों बहा जाकर एकान्तम समय देखते स्थित रहे ग्राणके सोविपर
उसके भक्षणके निमित्त जाते हुए राक्षसको देखकर चोर वोळा,-“भद्र ! यह
न्याय नहीं है । जो कि मेरे वैलंको हरण करनेके पीछे तुम इस ब्राह्मणको भक्षण
३
(३५४) पञ्कतन्त्रम्।
कर जाना” । बह बोळा-“जो यह ब्राह्मण गोके शब्दसे जाग जाय तो यह
मेरा आरम्म अनर्थक होजायगा”। चोर बोछा,-“वदि तुम्होर भक्षणमै कोई विध्न
उपस्थित होजावे तो में भी दोनों बछडोंके इरणको समर्थ न हूंगा | तब पहले '
मेरे गोयुगके हरण करनेके पीछे तुम ब्राह्मणको भक्षण करना” | इस प्रकार में
एहळे में पहले ऐसे परस्पर विवाद करते उन दोनोंके वेछश उत्पन्न होनेमें शाब्द
दोनेके कारण ब्राह्मण जाग उठा । तब उससे चोर बोला- ब्राह्मण | यह
राक्षस तुझे खानेकी इच्छा करता है”? राक्षस बोछा,- त्राह्मण | यह चोर तेरे
दोनो बछडे चुराना चाहता है?” यह सुनकर ब्राह्मण उठ सावधान हो इष्ट देव-
ताके मन्त्र उच्चारणसे अपनेको राक्षससे और लकडी उठाकर चोरसे दोनो -
बछडोकी रक्षा करता भया । इसमें में कहता हूं-
“शत्रवोऽपि हिताथेव विवदन्तः परस्परम् ।
चोरेण जीवितं दत्तं राक्षसेन तु गोयुगम् ॥ १९८ ॥”
“परस्पर विवाद करते शत्रुभी हितके निमित्त होते हैं चोरने जीवित और राक्ष
सने इस प्रकार दो बछडे दिये ॥ १९८ ॥”
' अथ तस्य वचनमवधारय्यं अरिमदनः पुनरपि माकारक-
णेमपुच्छत्,- “कथय किमत्र मन्यते भवान् १ ?' सोऽब्रवीत्,
“ देब! अवध्य एवायं, यतो रक्षितिन अनेन कदाचित पर"
स्परप्रीत्या कालः सुखेन गच्छति। उक्तश्च-
तब उसके धचनको सुन आरेमदेन फिर प्राकारकणेसे पूछने छगा-“ कहो
तुम इसमें कया मानते हो ?”” वह बोळा,-“देव | यह अवध्य हे । जो इसको
A
रक्षा करनेसं कदाचत् प्रीतिसे सुखस समय बॉतंगा । कहा इ~
` परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः। .
त एव निधन यान्ति बल्मीकोदरसपवत ॥ १९९ ॥
जा प्राणा परस्पर एक दूसरक मर्मका रक्षा चह करते वह वदरी
ओर पेटके भीतर सपंकी समान नष्ट होते हे ॥ १९९ ||
अरिमर्देनो5बवीत,”““कथमेतत् ! ” घाकांरकर्णः कथयति-
आरेमदन बोढा,- यह केसे {” प्राकारकर्ण कहता हे-
भाषारीकासमेतम्। ( ३५९ )
कथा 9०.
__ अस्ति करिंमश्चित्नगंरे देवशक्तिनोम राजा, तस्य च
पुत्रो जठरवल्मी काश्रेयण उरगेण प्रतिदिन भत्यङ्गं क्षीयते ।
अनेकोपचारैः सदेदेः सच्छास्त्रोपदिष्टोषधयुक्तयापि चिकि-
त्स्यमानो न स्वास्थ्यमामोति । अथ असो राजपुत्रो निर्वे-
दात् देशान्तरं गतः । कस्मिश्विन्नगरे भिक्षाटनं कृत्वा
महति देवाले काळं यापयति । अथ तत्र नगरे वालिर्नाम
राजा आस्ते, तस्य च हे दुहितरो योबनस्थ तिष्ठतः । ते च
मतिदिवसमादित्योद्ये पितुः पादान्तिकमागत्य नमस्कारं
चक्रठुः। तत्र च एका अबवीत,-““विजयस्व महाराज
यस्य प्रसादात् सबै सुखं लभ्यते? । द्वितीया छ, “विहितं
सुइक्ष्व महाराज !” इति बवीति । तच्छुत्वा प्रकुपितो राजा
अत्रवीत,-भो मन्त्रिन् ! एनां इुष्टभाषिणी कुमारिका
कस्यचिद् वेदेशिकस्थ प्रयच्छत येन निजविहितमियमेव
सुङ्क्ते” । अथ तथेति प्रतिपद्य अल्पपरिवारा सा कुमा-
रिका मन्त्रिभिः तर्ष देवकुलाओशितराजपुत्रस्य मतिपादिता।
सा अपि प्रहष्मानसा तं पति देववत् प्रतिशद्य आदाय च
अन्यविषयं गता । ततः करिमिश्चिदूरतरनगरभदेरे तडा-
गतटे राजपुत्रमावासरक्षाये निरूप्य, स्वयं च घृततेललबण-
तण्डुला दिक्रयनिमित्तं सपरिवारा गता । कृत्वा च ऋयवि-
ऋध यावदागच्छति, तावत् स राजपुत्रो वल्मीकोपरि-
कृतसूर्धा प्रसुप्तः । तस्य च सुखात् सुजगः फणां निप्क्राम्य
वायुमश्नाति। तत्र एव च वल्मीकेऽपरः सपो निषप्क्रम्थ
तथा एव आसीत् । अथ तयोः परर्परदशनेन कोधसंरक्तलो-
चनयोः मध्यात् वल्मीकस्थन सर्पेण उक्त,- “भोभो इरात्मन्!
कथं सुन्दरसर्वाङ्गं राजएुत्रमित्यं कदर्थयासे ?” सुखस्थोऽहिर-
त्रवीत,-“'भो भोः ! त्वया अपि इरात्मना अस्य वल्मीकस्य
मध्य कथमिदं दूषितं हाटकपूर्ण कलशयुगलम्” इति।एवं पर-
(३५६) पञ्चतन्त्रस् |
स्परस्य मर्माणि उद्धाटितवन्तो।पुनः वर्मीकस्थोऽहिरबवीत-
“हो इरात्मव ! भेषजामिदं ते कि कोऽपि न जानाति।
यत् जीर्णोत्कालितकाञिकाराजिकापानेन भवान् विनाशमु-
पथाति” । अथ उद्रस्थोऽहिरञंबीत्-'' तवापि एतद्वेषज
गक का्चदोप न बत्ति ५ यंत उष्णतलन वा महोण्णोदके
न तव विनाशः स्यादाते ” । एवश्च सा राजकन्या
विटपान्तरिता तयो परर्परालापान् मर्ममयान् आक
ण्थ॑ तथा एव अहुष्ठितवती । विधाय अव्यङ्ग नीरोगं
भर्तारं निथिश्च परमभासाद्य स्वदेशाभिधुखं प्रायात् ।
पितमाठस्बजनेः प्रतिपाजिता विहितोपभोगं प्राप्य सुखेन
अवस्थिता । अतोऽहं बबी मि-
किसी नगरमे देवशक्ति नामवाळा राजा रहता था उसका पुत्र उदररूप (१)
बरमीकमें रहनेवाळे सर्पसे प्रतिदिन प्रत्यंगसे दुबळा होता था, भनेक उपाथांसे
सद्दैयों द्वारा सच्छा्रोमें कही ओषधीसे युक्तमी चिकित्सा करा हुआ सस्थः
ताको न प्राप्त होता । तब यह राजपुत्र निर्वेदसे देशान्तरको गया किसी एक
नगरमें भिक्षाटच कर बडे देवाळयमें समय बिताता था । उस नगरमे बलिवाम
राजा हे उसकी दो कन्या जवानथों । वो प्रतिदिन सूर्योदयमें पिताके निकट
आकर नमस्कार करती इई | उनमेंसे एक बोली- महाराजको जय हो ।
जिसके प्रसादस सब सुख प्राप्त होता हे” । दूसरी-/'महाराज ! अपने कमसे
उत्पन्न हुआ भोगो,” ऐसा बोडी । यह सुन क्रोध कर राजा बोछा,- मो |
मंत्रिन् इस दुष्ट बोळनेवाळी कुमारिकाको किसी विदेशी पुरुपको दे दो।
जिससे अपना किया हुआ यही भोगे?! । तब “बहुत अच्छा” कहकर थोडी
सल्वियोंके सहित वह कुमारी मत्रियोंने उस देवमंदिरमें रहनेवाळे राजपुत्रको
देदी । वह भी प्रसन्नमनसे उस पतिको देववत् प्राप्त हो ळेकर भोर देशको
गई । तब किसी अत्यन्त दूर नगर देशमें सरोवरके तट राजधुत्रको स्थान
रक्षाके लिये नियुक्तकर स्वयं घी तेळ ळवण तम्डुळादिक ळेनेके निमिच परिवार
सद्दित गई । क्रय विक्रय कर जब आने ठगी तबतक् वह राजपुत्र वत्मीकके
१ उसके पेठे सर्प रहताथा |
भाषाटीकासमेतम् । (३५७ )
ऊपर शिर घरकर सो गया । उसके मुखसे सपे फण निकाङकर वायुभक्षण
>करता था । उसी बॅबईसे दूसरा सर्प निकळ कर भी इसी प्रकार करता । तब
उनके परस्पर दर्शनसे क्रोधसे छाळ नेत्र कर वल्पीकमे स्थित सपैने कहा-“भो
भो दुरात्मन् ! किस प्रकार संबीगघुन्दर इस राजपुत्रकों केश देता हैं १”
सुखमें स्थित सं बोढा,-भो ! भो | तुम दुरात्माने भी इस वल्मीकके मध्यमे
कित प्रकार यह सुवर्णसे पर्णे दो कलश दूषित किये दे £” इस प्रकार परस्पर
दोनों भेद खोळते भये । फिर वल्मीकमे स्थित सर्प बोछा,- मो दुरात्मन् | यह
तेरी औषधी क्या कोई नहीं जानता है ? जो कि पुरानी आठोडित राजकां-
जीके पानसे तू नाशको प्राप्त होगा” । तव वह सुखे भीतरका सर्पे बोला-
“क्या तेरी यह औषधी कोई नहीं जानता हे £ जो गरम जर घा गरमतेळसे
तेरा नाझ होगा”? । इस प्रकार वह राजकन्या रक्षी आरसे उन दोनोंके पर-
स्पर भेदके बचन सुनकर, पैसाही करती हुई अव्या और निरोग स्वामीको
करके परम धनको प्राप्त हो अपने देशको चढी । पिता माता सुजनोंसे पूजित
हो यथेच्छ भोर्गोको प्राप्त होकर सुखसे रही । इससे में कहता ह-
परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः ।
त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पधत् ॥ २०० ॥”
जो प्राणी परश्परममोंको रक्षा नहीं करते हैं वह वरमीक भौर उदरे
सर्पेकी समान नष्ट होते हैं॥ २०० |
त्च श्रुत्वा स्वयमरिमदेनोऽपि एबं समर्थितवान् । तथाच
अहष्ठितं इष्टरान्तलींनं विहस्य रक्ताक्षः पुनरब्रवीत्;
“कष्टम्! विनाशितोऽयं भवद्धिः अन्यायेन स्वामी । उक्तव-
यह सुनकर स्वय अरिमदेन भो इस वातको पुष्ट करता इभा इस प्रकार
( शरणागत रक्षा ) के अनुष्टानकों देखकर अस्पष्ट स्त्रसे हसकर रक्ताक्ष
फिर बोळा,-“कष्ट हे कि तुमने अन्यायसे स्त्रामीका नाश किया | कहा हे-
अपूज्या थन पूज्यन्ते पल्यानान्ठु विमानना ।
चीणि तत्र प्रवर्तन्ते दुसिक्षे मरणं भयम् ॥ २०१ ॥
जहा अपूज्य पूजे जाते हैं पज्योका निरादर होता है वहा तीन होते हैं
डुभिक्ष, मरण और भय ॥ ३०१॥
( ३५८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तथाच
और देखो-
मत्यक्षेऽपि कृते पापे मूख? साम्ना प्रशाम्याति ।
रथकारः स्वकां भाय्यो सजारां शिरसाऽऽवहत्॥२०२॥”
प्रत्यक्ष दोष होनेपर भी ( पापीकी ) विनयसे मूले शान्त होता है रथकारने
अपनी भार्याको जारसहित झिरपर उठाया ॥ २०२ ॥7
मन्त्रिणः प्राहुः-* “कथमेतत् १” रक्ताक्षः कथयति-
मंत्री बोले,- यह केसे १” रक्ताक्ष कहता है-
कथा ११.
अस्ति कस्मिश्रिद्धिष्ठाने वीरघरी नाम रथकारः,
तस्य भाय्यों कामदमनी । सा च पुंश्वली जनापवादसं-
युक्ता । सोऽपि तस्याः परीक्षणार्थ व्यचिन्तयत् ।- “अथ
मया अस्थाः परीक्षणं कर्तव्यम् । उक्तश्च यतः-
किसी एक स्थानर्मे वीरधर नामवाळा बढई रहता हे । उसकी सार्या काम-
दमनी । वह व्यभिचारिणी लोकापबादसे युक्तथीं । वह भी उसकी परीक्षा कर-
नेका विचार करताथा कि''किस प्रकारमें इसकी परीक्षा करूँ | कहांहै-
यदि स्यात्पावकः शीतः घोष्णो वा शशलाञ्छनः!
खीणाँ तदा सतीत्वं स्यादि स्याद्दुर्जनो हितः॥२०३॥
यदि भन्नि शीतळ होजाय बा चन्द्रमा गरम होजाय वा दुर्जेन हित होजाय
तो ल्लियोंके सतीपनका विश्वास हों ॥ २०३॥
जानामि च एनां लोकवचनात असतीम् । उक्तश्च-
छोकप्रवादसे मैं इसको असती जानता हूं । कहा है-
यच्च वेदेषु शास्रे न हृष्टं न च संश्रतम्।
तत्सर्वे वेत्ति लोकोऽयं यत्स्याद्रह्मण्डमध्यगम् ॥ २०४ ॥
जो बेदशास्त्रम न देखा न सुना हे और जो कुछ इस संसारके मध्यम स्थित है
उसको हनी छोक सब जानते हैं | २०४ ॥
एवं सम्प्रधाय्थ भा्यामवोचत्-' “भिये ! प्रभाते5ह आमा"
~
न्तरं यास्यामि । तत्र कतिचिदिनानि लगिष्यान्ति । तत्
भाषाटीकासमेतम्। (३५५)
त्वया किमपि पाथेयं मम योग्यं विधेयम्?’ । सापि तद्वचनं
शुत्वा हर्षितचित्ता औत्सुक्यात् सर्वेकाय्यांणि सन्त्यज्य
सिद्धमन्नं घृतशर्करामायमकरोत्। अथवा साधु इदसुच्यते-
ऐसा विचार कर भार्यासे बोळा-“प्रिये | प्रभात समयमें ग्रामान्तरको जाऊं-
गा बहा कुछ दिन ळगेंगे सो तू कुछ भोजवादि बनादे”। वह भी यह वचन सुन
बडे हार्षित चित्त उत्कठासे सब कार्य त्याग कर सिद्ध अन्न ( पूरी आदि ) शृत
शकरासे युक्त बनाती हुईं। अथवा यह भच्छा कहा है-
दुर्दिवसे घनतिमिरे वर्षति जलदे महाटवीप्रभ्गती ।
पत्युर्विदेशगनने परमसुखं जघनचपलायाः ॥ २०५ ॥
दुर्दिन घने अन्धकारमै मेषके बऽ्नेमें महाजगलमें पतिके विदेश जानेमें
चपर जघावाळी ( कामिनी ) परम सुख मानती हे ॥ २०५ ॥
अथ असो प्रत्यूषे उत्थाय स्वशृहात् निर्गतः । सापि तं
प्रस्थितं विज्ञाय प्रहसितवदना अङ्गसंस्कारं कुर्वाणा कथाञ्चित
तदिवसमत्यवाहयत्। अथ पूर्वपरिचितविटगहे गत्वा तं भत्यु-
क्तवती । स दुरात्मा में पतिग्रोमान्तरं गतः । तत् त्वया अ-
स्मदुगहे सुते जने समागन्तव्यम्। तथा अनुष्टित स रथका-
रोऽरण्ये दिनमतिवाह्य प्रदोषे स्वग्हेपरद्वारेण प्राविश्य शय्या-
घस्तले निभ्तों भूत्वा स्थितः । एतस्मिन्नन्तरे स देवदत्तः
समागत्य तत्र शरण उपविष्टः । तं दृष्टा रोषाविष्टचित्तो रथ"
कारो व्यचिन्तयत् “किमनं उत्याय हन्मि, अथवा हेलया
एव प्रसुप्तौ द्री आपि एतौ व्यापादयामि । परं पश्यामि ताव-
दस्याः चेष्टितम्। श्रणोमि च अनेन सह आलापान् ”। अत्रा-
न्तरे सा गृहद्वारं निभतं विधाय शयनतलमारूढा । अथ त-
स्यास्तत्र आरोहन्त्या रथकारशरीरे पादो विलग्नः । ततः
स्रा व्यचिन्तयत् । “नूनमेतेन इुरात्मना रथकारेण मत्परीक्ष-
णाथ भाव्यम् । ततः सत्रीचारित्रविज्ञानं किमपि करोमि” एवं
तस्याः चिन्तयन्त्या स देवदत्तः स्पशाँत्जुको बभूव। अथ तया
कृताअलिपुटया अभितं-“भो महानुभाव!नमे शरीरं त्वया
१९६०) पथ्वतन्त्म् ।
स्पशेतीयं यतोऽहं पातित्रता महासती च। न चेत् शापं दस्वा
त्वां भस्मसात करिष्यामि) सआहु-''यदि एवं ताहि त्वया
किमहमाहूतः?” ला. अत्रवीत.-* “भो! "एणुष्व एकाग्रमनाः ।
अहमध्यप्रत्यूषे देवतादर्शनार्थं चण्डिकायतनं गता, तत्र अक-
मात् खे बाणी सञ्जाता- “पात्रे! कि करोमि, भक्तासि मे
त्ब, परं षण्मासाभ्यन्तेरे विधिनियोगाद विधवा भविः
प्घसि’”। ततो मथा अभिहितं, भगवति | यथा स्वम्
आपदं वेत्सि, तथा तत्मतीकारमपि जानासि । तत् अस्ति
-कश्चिइपायो येन मे पातिः शतसंवत्सरजीवी भवति ९?। `
ततः तया आभिहितम्-“'वत्ते ! सन्नपि नास्ति | यतः तब
आयत्तः स प्रतीकार! तच्छृत्वा मया अभिहितम्,~“ देवि!
यादे तत् मम माणेभवति, तत् आदेशय येन करोमि” ।
अथ देव्या अभिहितम्,- “यदि अद्यदिने परपुरुषेण सह
एकस्मिन् शयने समारुह्य आलिङ्गनं करोषि, तत् एव भे
सक्तोऽपमृत्युः तस्य सञ्चरति भर्त्तापि पुनः वर्षशतं जीवति’
तेन त्वं मया अभ्यर्थितः । तद्यत किञ्चित् कठुमनाः तत्
कुरुष्व। न हि देवतावचनमन्यथा भविष्यति । इति निश्चयः
-ततोऽन्तर्हासविकाशसुखः स॒ तड्चितमाचचार । सोऽपि
रथकारो सूख तस्थाः तह्वचनमाकण्ये पुलकाङ्कितततः
शय्याधस्तलात् निष्क्रम्घ ताझुवाच,- “साधु पतिव्रति ! साधु
कुलनन्दिनि अहं दुजनवचनशॉकितहृदयः त्वत्पर्रीक्षा निमित्तं
ग्रामान्तरव्याजं कृत्वा अन्न खटाधस्तळे निभतं लीनः । तव
एाहे आलिङ्गय मां, त्वं स्वभत्तेभक्तानां मुख्या नारीणां यत्
एव अझव्रतं परसङ्गशपं पालितवती । मदायुदीद्वकतऽपम्
-त्याविनाशाथश्च त्वमेवं कुलवत्ती?? । तामेवसुक्ता सस्नेहमाळ
ङ्गतवान् । खस्कन्ध ता आराप्य तर्माप दवदत्तमुवाच)
“भो महानुभाव! मत्पुण्येः त्वामिह आगतः, त्वत्मसादात्
-मदा प्राप्त वर्षशतप्रमाणमायुः। तत् त्वमपि मामाछिग्य मतः
भाषाटीकासमेतम् ! (२६१)
कन्धे समारोह? । इति जहपन् अनिच्छन्तमपि देवद॑त्त-
माळगय बलात स्वर्कायस्कन्ब आरा पतवाच् । ततश्च दत्य
' कुत्वा,- “हे ्रह्मत्रतघराणां धुरीण ! त्वयापि मयि उपकृत '
इत्याद उक्ता स्कन्धात् उत्ताय्य, यन्न यन्न रुवजनशहद्वारा-
गदेषु बच्चाम, तत्र तत्र तयोः इभयाराष् तदयुणबणंननकरात!
अता5ह बवा[म-
तब यह सबेरेही उठकर अपने घरसे निकळा | घहमी उसको गया जान
आ्गारकर किती प्रकार दिन बिताती हुईं भोर परवेपाशावेत जारके घर जाकर
उससे मिली ( बोली ) -“वह दुरात्मा मेरा पति प्रामान्वरको गया है तू हमारे
घर जनोंके सोजानेपर आजाना” । वैसाही हुआ | भोर वह रथकार बर्नमेही
दिन व्यतीतकर रात्रिकों अपने घरमें दूसरे द्वारसे प्रवेश कर सेजके नीचे मौन
होकर स्थित हुआ । इसी समय देवदत्त ( जार ) आकर उस सेजपर आया |
उसको देख कधएूणीचित्त वढई विचारते लगा“कया इसको उठकर मारू अथवा
ठोठासे सोते इए दोनोहीको मारू । अच्छा इनकी चेष्टा तो देख । इनके
साथको बात छुन”? । इसी समय वह घरका दरवाजा मूदकर सेजपर आरूढ
इई । तव उसके उसपर चढ़नेमे रथकारके शरोरमें पाव ळगा । तव वह
विचारते रुगी अवश्य यह दुरात्मा रथकार मेरी पर्शक्षाके निमित्त स्थित दै सो
कोई ल्लीचरित्रका कोशळ करू” | इस प्रकार उसके विचारनेपर वह देवदत्त
उसके स्पर्म उत्कठित हुआ । तव उसने हाथ जोडकर कहा- मो ! महाचु-
साव | तुम मेरा शरीर मत छुओ, जो कि में पातित्रता महा सती हू । नहीं तो
झाप देकर तुमको भस्म कर दूंगी” । वह बोडा,--“जो ऐसा हे तो तेने सुने
क्यों बुलाया ९7) षह वोली-“'मो ! एकाग्र मनसे सुनो । में आज सबेरे देवता
दर्शनका चण्डीक मन्दिरमे गई बहा अकस्मात् भाकारावाणी हुई-पुत्री ! में
क्या करू तू मेरी भक्त हे परन्तु छ; महीनेके वीचमें प्राख्यके कारण तू
विधवा होगी?” तब मैंने कहा-/भगवाति ! जो तू आपत्तिको जानती है, तो
उसका निवारणभी जानती है क्या हैं ऐसा कोई उपाय है जिससे मेरा पति सौ
वर्षतक जिवे १ तब उसने कहा-“वत्से | होता इंआमी नहीं है । क्यों
के उसका उपाय जर अर्घान है? | यह सुनकर मंत कहा,-दोवे ! यादि
व.
(२६२) पञ्चतन्त्रस् ।
वह मेरे प्राणोसेमी हो, तो आज्ञा दे जिससे में करू” | तब देवीने
कहा जो भाजके दिन परपुरुषके साथ एक खाटपर आरूढ हो भाछिगन
करे तो तेरे भताकी अपमृत्यु उस परपुरुषमें चळी जाय तेण मतमा
फिर सोवर्षतक जिये ” । इस कारण भैने तुमको घुळाया हे । तो
जो कुछ करनेकी इच्छा हो सो कर । देवताका वचन अन्यथा न होगा यह
निश्चय है,” तब भीतर हँसीसे खिळे मुखवाळा वह उससे उचित भाचरण
करता हुभा । वह मूख रथकारभी उसके षचन सुन पुळकित शरीर हो श्याके
नीचेसे निकळ उससे बॉळा,-*'घन्य पतित्रते धन्य ! कुळकी आनन्द देनेबाठी
धन्य | में दु्जनोंके वचनॉसे शंकित हृदयहो तेरी परीक्षाके निमित्त प्रामान्तर
जानेका बहाना करके इस खाटके नीचे एकान्तर्मे छिपगया था | सो भा मुझे
आलिंगन कर, तू अपने स्वामीकी भक्ति करनेवाली ल्ियोमें मुख्य हे ऐसा तप"
रूप ब्रत परपुरुषके संग करती हुई । मेरी आयुके बढानेके निमित्त तथा अप-
मृत्यु नाशके निमित्त तेने ऐसा किया” | उससे ऐसा कह स्नेहसे भाडिंगन
करता हुआ अपने कन्धेपर उसे चढाकर उस देवदत्तसे वोडा-“भो महा-
नुभाष ! मेरे पुण्यसे तुम घहां भये तुम्हारे प्रसादसे मैंने सी वर्की आयु
प्रात की । सो तू भी मुझे आरिंगन कर मेरे कन्येपर चढ'! | एसा कह नहीं
इच्छा करनेपरभी देवदत्तको भाछिंगन कर वळसे अपने कन्येपर बढाता
हुआ । फिर नरस करके हे त्रह्मत्रत धारण करनेवार्ळोमिं अग्रणी तुमनेभी मेस _
उपकार किया ऐसा कह कर कन्धेसे उतार जहां तहां अपने स्वजनोंकें गृहद्वारे
घूमने छगा । वहां वहां उन दोनोके ही उन गुणोंका वर्णन करता भया। इससे
में कहताहूं कि-
भत्यक्षपपरि कृते पापे मूर्खः साखा प्रशाम्यति ।
रथकारः स्वकां भाय्यों सजारां शिरसावहत.॥ २०६॥
कि पाप देखकर मौ मूर्ख साम उपायसे शान्त हो जाता हे स्थकास्ने (इस ।
प्रकार ) जारसहित अपनी भायीको शिरपर उठाया ॥ २०६ ॥
तत सर्वथा मूलोत्खाता बयं विनष्टाः स्मः । सु्ठ खछु
इद्सुच्यते-
माषाटीकासमेतम्। (२६२)
सो सर्वथा मूळ उखडनेसेही हम नष्ट हुए । यह अच्छा कहा है-
मित्ररूपा हि रिपवः सम्भाव्यन्ते विचक्षणः ।
ये दितं वाक्यखुत्सज्य विपरीतोपसेविनः ॥ २०७ ॥
जो मनुष्य हित वाक्य छोडकर विपरीत सेवन करते हैं चतुर पुरुषों द्वारा
बे यथायेमें बधुरूपधारी शत्रु माने जाते हैं ॥ २०७ ॥
तथाच-
और देखो-
सन्तोऽप्यर्था विनश्यन्ति देशकालविरोधिनः ।
अपाज्ञान्मन्त्रिणः माप्य तमः सूय्योद्य यथा ॥२०८॥?”
देश कालके विरुद्ध आचरण करनेवाछोंके प्रज्ञारहित मत्रियोंको प्राप्त
होकर विद्यमान वस्तु भी ऐसे नष्ट होती हैं जेसे सूयोंदयमें अघकार [२०८॥
ततः तद्टचोऽनादत्य सर्वे ते स्थिरजी विनञुस्क्षिप्य स्वढुर्ग-
मानेठुमारब्धाः । अथ आनीयमानः स्थिरजीवी आह-
“देव ! अद्य आकिख्चित्कोण पतदवस्थेन कि मया उपसंगु”
हीतेन यत्कारणभिच्छामि दीत्तं वद्विमदवेष्ट तत अईसि
मामय्िम्रदानेन समुद्धत्तेम”” । अथ रक्ताक्षः तस्य अन्तर्गत-
भावं ज्ञात्वा अन्रवीत-*“'किमर्थमस्िपतनमिच्छसि” । सोऽ
ब्रबीव,- अद तावद् युष्मदर्थे इमामापदं मेघवर्णेन
प्रापित्तः । तदिच्छामि तेषां वेरयातनार्थसुळू्कताम्' इति ।
तञ्च श्रत्वा राजनीतिकुशलो रक्ताक्षः प्राह-“'भदर ! कुटि-
लस्त्वं कृतकवचनचतुरश्व । तत् त्वसुळकयोनिगतोऽपि
स्वकीयामेव वायसयोनि बहुमन्यसे । श्रूयते च एतदा-
ख्यानकम्-
तत्र उसके वचनोंको अनादर करके सबही स्थिरजीवीको उठाकर अपने
दुगेमें लेजाने छगे । तम छेजाया हुआ स्थिरजीवी बोढा- देव ! अव कुछ
मी करनेमें असमर्थ मेरे ग्रहण करनेसे क्या टे । इस कारणसे अब में प्रदी
अस्मे प्रवेशकी इच्छा करता हू | सो मुझे अग्नि प्रदानते उद्धार करनेको
आप योग्य हो” । तव रक्ताक्ष उसके अन्तर्गत भावको जानकर बोढा- क्यों
(३६४) पश्चतन्त्रस्।
८६ ~
अम्रिपतनकी इच्छा करता है ?” | बह बोळा-“मेरी तो तुम्हारे निमित्त मेघ-
चर्णते यह आपत्ति की । सो में उप्तसे वेर निकाळनेको उळूकत्क्की इच्छा
करता हूं” । यह सुन राजनीतिमें चतुर रक्ताक्ष बोढा,-- भित्र | तुम कुटिल
और बनाषटी वचन कहनेमे चतुर हो । जो तू उदक योनिम प्राप्त इभा भी
अपनी बायस योनिकोही बहुत मानेगा । इसमें यह आख्यान सुना जाता है-
खुय्यै भत्तारसुत्खुज्य पर्जन्यं मारतं गिरिम् ।
स्वजाति मूषिका प्राता स्वजातिइरतिक्रमा ॥ २०९॥४
माषका स्व सघ वायु पर्वत मताका छाड त्यागनक अयाय अपनों जात
को प्राप्त हुई ( जातिका खमाव अतिक्रम नहीं हो सकता) | २०९ ॥ 7
मन्त्रिणः प्रोचुः, कथमेतत् !?? रक्ताक्षः कथयति-
मंत्री वोले-“यह केसी कथा हे ?' रक्ताक्ष कहने लगा
कथा १२.
अस्ति विषमाशिलातलह्खालिताम्डुनिघोषश्रवणसन्त्रस्त-
अत्ह्यपरिवत्तनस्ञञ्जनितश्वेतफेनशवलतरङ्गाया गङ्गायाः तटे
जपनियमतपःस्वाध्यायो पवासयोगक्रियालुष्ठा नपरायणेः प-
रिपूलपरिमितजलजिधृक्षान्िः कन्दमूलफलशेवलाभ्यवहार
कदर्थितशरीरे; बह्कलकतकोपीनमातप्रच्छादनेः तपास्वाभेः
आकीणमाश्रनपदस् । तत्र याञ्चवल्क्यो ,नाम कुलपातिः
आसीत् । तस्य जाद्वर््या स्नात्वा उपस्मष्टमारूधस्य करतले
श्येनमुखात् परिश्रष्टा सूषिका पतिता | तां दृष्टा न्यमोधपत्रे
ऽइस्थाष्य, पुनः स्रात्दा उपस्पृश्य च, प्रायश्ित्तादिक्रियाँ
कृत्वा च, मूषिकां तां स्वतपोबलेन कन्यकां कृत्वा समादाय
स्वाश्रमं आनिनाय । अनपत्याश्च आयामाह,~' भद्रे ! एह्य"
तामियं तव इहितोत्पन्ना मयत्रेन संवद्धनी या” इतिततः तया
संवद्धिता लालिता पालिता च यावत् द्वादशवर्षा संजाता!
अथ विवाहयोग्यां तां दृष्टा भर्त्तारमेव जाया उवाच,- “भा
मत्तः | किमिद न अवज्ुध्यसे यथा अस्याः स्वढादिवाववाद
समयातिक्रमो भबति” असो आह- । “ साधु उक्तम!
उक्तश्च-
भाषादीकासमेतम । (२६५)
5 ऊचे नीचे शिळातळमं गिरनेके जढसे शब्द्रायमान, उसके श्रवणमात्रसे
-व्याकुछ मरस्योके कूदने आदिसे प्रगट खेतफेनलस मिश्रित तरंगवाली गगाके
- &ुटमे जप नियम तप स्वान्याय ब्रत योग क्रिया अनुष्ठानमें परायण बिशुद्ध
- अल्प जर्लोके प्रहणकी इच्छावाले कन्द मूल फळ शेवळ ( सिवार ) के भक्षण
-से क्लीशत शरोरवाळे वल्कछ ( वृक्षको छाळ ) को बनाई कोपीन मात्रसे शरीर
ढकनेवाळे तर्पस्वयोसे युक्त आश्रम ( तपोवन ) स्थान है । वहां याज्ञदव्ययनाम
कुलपति ( तपस्वियोके स्वामी ) रहते थे । उनके गगाजीमें स्नासकर आचमन
, करनेको आरम्म करते हुए हाथमें स्येनके सुले मिरी एक मूपिका आपफ्डी ।
, उसे देख वटपत्रमें रखकर फिर स्मान भाचमन कर ( अपवित्र स्पशीते उत्पन्न
२ हुई ) प्रायश्चित्त क्रियाको कर, उत्त मूषिकाको अपने तपोबळसे कन्या बनाय
अपने आश्रममे छेआये । और सन्तान रहित अपनी ल्लीसे बोछे-“भद्वे ?
ग्रहण करो यह तुम्हारी पुत्री उत्पन्न हुई है यत्नसे इते बढाओों ” | तब उससे
बढ़ाई ठाङन पान की हुई बह जब बारह वरैकी हुईं तब विवाहके योग्य
उसको देखकर वह जाया लामसि बोडी-भो स्वामिन् | आप क्या नहीं
जानते ? कि यह इस कन्याके विवाहका समय बीतता है। यह ( याज्ववल्क्य )
बोले- तुमने सत्य कहा । काहामा हेन"
खिय? पूर्व खुरेसुक्ताः सोमगन्धर्ववह्विमिः ।
अर्जते मानुषाः पश्चात्तस्मादोंषों न विद्यते ॥ २१० ॥
पहले ब्ले देवतोंते भोगी जाती हैं, जो सोम गधवे और अग्नि नामबाळे
देवता हैं, पीछे मनुष्य भोगते हैं इस कारण दोष नहीं है ( १) ॥ २१०॥
सोमस्तासां ददो शोचं गन्धर्वाः शिक्षितां गिरम् ।
पावकः सर्वमेध्यत्वं तस्मान्निष्कहमषाः स्ियः ॥ २११ ॥
चन्द्रमाने उनको भोगर्मे पवित्रता, गन्ध्षोने शिक्षित वाणी और आशेने
[साङ्ग उनको पवित्रता दीहे, इस कारण लिये पापरहित हैं ॥ २११ ॥
असम्मात्तरजा गोरी माते रजासि रोहिणी ।
अव्यञ्जना भवेत्कन्या कुचहीना च नस्निका ॥ २१२ ॥
१ इमास बनाया दयानन्द तिमिरभास्कर देखो ।
{ ३६६) पञ्चतन्त्रम् ।
जिसके रज प्राप्त यहो वह गोरी, रज प्राप्त होनेमे रोहिणी जबतक चिन
अगट न इएहों वह कन्या, कुच उदय न होनेतक नमिका कहाती है [११२]
व्थञ्जनेस्तु समुत्पन्नैः सोमो शक्ते हि कन्यकाम् ।
पयोधराभ्यां गन्धवा रजस्याग्नेः प्रतिष्ठितः ॥ २१३॥
ममन्द्ाक उत्पन्न हाचपर चन्द्रमा कन्याका सागता ह पयाघर होनप
गंधे और रज उत्पन्न होने पर अभि उसको भोगता है ॥ २१३॥
तस्माडिवाहयेत्कन्यां यावन्नत्तमती भवेत् ।
विवाहश्चाष्टवर्षायाः कन्यायास्तु प्रशस्थते ॥ २१४॥
इस कारण जबतक ऋतुमता नहा तबतक कन्याका [बेवाहू द आठ षष
कन्याको विवाह करना अच्छा हं॥ २१४ |
व्यज्न हन्त व पूव पर चब पयाघरा ।
रातारष्टास्तथा लोकान्हन्याच पितर रजः ॥ २१५॥
खरीमविन्ह प्रगट होनेपर ५ पुण्यको नाइते हैं, स्तनप्राततिपरभी विवाह न
होने पर परत्र छम्य पुण्यका नाश होता है सुरत योग्य होनेसे स्व्गोदिलोकोकी
और रजोवती होनेसे पितरोको नरकमे डालती है खरी व्यंजन (चिन्ह) से पह-
छेही कन्यादान करना चाहिये ॥ २१५ ॥
ऋतुमत्यां तु तिष्ठन्त्यां स्वेच्छादानं विधीयते ।
तस्मादट्वाहयेन्नन्नां मनु; स्वायम्भुवोऽत्रवीत् ॥ २१६॥
ऋतुमती कन्याके होनेमें कन्याकी अनुमतिसे दान करे इस कारण नमा (रजो-:
रहित) कन्याक। विबाह करं एंसा स्वायभुमचुचे कहा हे [| २१६ ॥
गषतवश्मानं या कन्या रजः पश्यत्यसस्कृता ।
अविवाह्या तु सा कन्या जघन्धा वृषली स्मृता ॥ २१७॥
जो कन्या पिताके घर बिनाविवाहित हुई रज दर्शन करती है षह कन्या
विषाहके अयोग्यं शद्गावत् होती है ॥ २१७॥
श्रेष्ठेम्यः सहशेभ्यश्च जघन्धेभ्यो रजस्वला ।
पित्रा देया विनिश्चित्य यतो दोषो न विद्यते ॥ २१८॥
रजस्वला कन्या जिस प्रकार दोष नहो सो विचार कर श्रेष्ठ सदरा भोर भष
माम, ( बहा ) जा भ्रष्ट हा उनका देनी चाहिये (१)॥ २१८॥ _ (नहा) जा श्रेष्ठ हा उनका देनी चाहिये (१)॥ २१८ ॥
१ एक नव युवकाम्यासी बृथा उपाधि धारीने ऐसे -छोकोका आशय और पल्ल ये
जानकर च्वथाही जल्पना प्रकाशकी है सो त्याज्य है |
भाषादी कासमेतम् । (३६७)
अतो5हमेनां सहशाय प्रयच्छामि न अन्यस्मे ।
उक्तश्वना
- सो मैं इसको समानके छिये दूगा न भोर किसीको । कहा है-
यथोरेव समं वित्तं ययोरेव समं कुलम् ।
तयोविवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः ॥ २१९ ॥
जिन दोनोंका समान धन और जिन दोनोंका समान कुछहों उन्हाका बिवाह
आर मित्रभाष हाना नचाहरय घनी निधवोका नहा ॥ २१९० ॥
तथाच-
¬ और देखो-
कुछ शीलञ्च सनाथता च
विद्या च वित्तश्च वपुर्वयश्च ।
एतान्शुणान्सत्त विचिन्त्य देया
कन्या बुयेः शोषमाचिन्तनीयम् ॥ २२०॥
कुळ, शीळ ( चरित्र ), सनाता ( सहाय ), बिद्या, धब, शरीर, भवस्था
यह सात गुण विचार कर बुद्धिमान्को कन्या देनी चाहिये इसके उपरान्त भवि-
तब्यका विचार न करे || २२० ||
तत यदि अस्था रोचते तदा भगवन्तमादित्यमाहूय
तस्मं यच्छामि? । सा माइ," इह को दोषः ? क्रियतामे-
त” । अथ सुनिना रविराहूतः । वेदमन्त्रामन्त्रणमभावात
तत्क्षणादेवाभ्युपगम्यादित्यः प्रोवाच,-' भगवन्! किमहमा
हूतः ?” सोऽब्रवीत्,“ एषा मदीया कन्यका तिष्ठति । यदि
एषा त्वां वृणोति ताह उद्दहस्वो? इति । एवमुक्ता स्वइहितर-
सुबाच,- पुत्रि ! कि तव रोचते एष भगवान् त्रेलोक्यदीपको
भावुः ?” पुत्रिका अन्रबीत)- तात ! अतिदहनात्माकोऽयं
न अहमभनमभिलषामि । तस्मात् अन्यः प्रकृष्टतरः कञ्चित
आहूयताम्?’ । अथ तस्याः तद्वचनं शुत्वा सुनिः भास्करः
स॒वाच,-**भगवन् ! त्वत्तोऽधिकोऽस्ति कश्चित्! ” भास्करः
प्राह्,~''अस्ति मत्तोऽपि अधिको मेधो थेन आच्छाडितोऽ-
(३६८) पञ्चतन्त्रम्।
हमहश्यो अवामि” | अथ झुनिना मेघमपि आहूय कन्या
अभिहिता, “पुत्रिके ! अस्मे त्वां प्रयच्छामि १ सा प्राह,-
“'छुष्णवर्णोऽयं जडात्मा च । तद्स्मात् अन्यस्य मधानस्यः
कस्यचित् माँ भयच्छ'! । अथ झुनिना मेघोऽपि पष्ठः-“'भो
भो मेघ ! त्वत्तोऽपि अधिकोऽस्ति कश्चित्?” मेघेनो क्तं, “मत्तो-
ऽपि अधिकोऽस्ति वायुः । वायुना हतोऽहं सहस्रधा
यामि” । तच्छत्वा सुनिना वायुराहूतः । आह च,- पुत्रिके !
किमेष वायुस्ते विवाहाय उत्तमः प्रविभाति ९” सा अत्र-
वीत- तात ! अतिचपलोऽपं तदस्मादपि अधिकः कश्चित.
आनीयताम्” । झुनिराह,- वायो ! त्वत्तोऽपि अधिकोऽ-
स्ति कश्चित् ९” पवनेन उक्तं, मत्तोऽपि अधिकोऽस्ति
पर्वतो थेन संस्तभ्य बलवानपि अहं प्रिये” । अथ मुनि;
पर्वेतमाहूय कन्यासुवाच-*“ “पुत्रिके ! त्वामस्मे प्रयच्छामि!"
सा प्राह,-तात ! कठिनात्मकोऽयं स्तब्धश्च । तत् अन्यस्मे
देहि मां” झुनिना पर्वतः पष्टः-' भोः पर्वतराज ! त्वत्तोऽपि
अधिकोऽस्ति कश्चित” । गिरिणा उक्तम्-““मत्तोऽपि
अघिकाः सन्ति मृषिका ये मच्छरीरं बलात् विदारयन्ति” ।
ततो झुनिः मूषिकमाहूय तस्या अदर्शपत् । आह च“
“पुत्रिके ! त्वामस्मे प्रयच्छामि क्रिमेष प्रतिभाति ते मूषिक-
राजः १”? । सापि तं दृष्टा स्वजातीय एष इति मन्यमाना
पुलकोद्भषितशरीरोवाच--“तात ! माँ मूषिकां कृत्वा अस्मे
प्रयच्छ । येन स्वजातिविहितं शहधर्मम अङतिष्ठामि' ।
ततः सोऽपि स्वतपोबलेन तां मूषिकां कृत्वा तस्मे प्रादात् ।
अतोऽहं ब्रवीमिः-
सो यदि इसको अच्छा ठगे तो भगवान् सूर्यको बुलाकर उन्हे प्रदान करूं! |
बह् बोढी-/ इसमें क्या दोष है । यही करो!” तब सुनिराजने सूर्यको बुळाया ।
वेदमंत्रके, उच्चारणप्रभावसे उसी क्षणमें सूये जानकर बोळे-“भगवन्, मुझे क्यों
हती,
बुलाया है!” । वह बोके-“यह मेरी कन्या है । जो यह तुमको वरण करे तो
भाषाटीकासमेतम्। (३६९)
इसके सग विवाह करो?! | ऐसा कह अपनी कन्यासे वोले-“पुन्नि | क्या यह
त्रिकोकीके प्रकाशक भगवान् सूर्य तुमंको रुचते हैं £” । पुत्रिका बोळी-“पित. !
यह अधिक प्रज्वळित् है । में इनकी अभिळाषा नहीं करती । सो इनसे अधिक
उत्कृष्ट कोई बुढाभो” तब उसके यह वचन सुत मुनि सूयसे वाळे-“भगवन् !
कोइ तुमते भी अधिक शक्तिमान हे £' सूय बोढ- मुझ सा आघेक् मघ
है जिससे ढक कर में अदृश्य होता हू !! । तब मुनिने मेघदवताको बुळाकर
कन्यासे कहा-“पुन्निके [ इसके निमित्त तुझे दू (?? । वह बोळी | =
कृष्णवर्ण जडात्मा है । सो इतसे अधिक किसी प्रधानके निमित्त सुझे दो” ।
-तब सुनिने मेघसे धूछा-“मो मेघ ! तुझसे भी अधिक कोई हे ??! मेघने कहा
मुझसे मी अधिक वायुहे बायुसे हत हुआ में सहस्रधा हो जाता हू''। यह सुनकर
सुनिने वायुको बुळाया । बोळे भी-“पुत्रिक | क्या यह वायु विवाहके निमित्त
तुझे अच्छा लगता दे !? वह बोळी-““तात ! यह अधिक चपल हे । सो इससे
भविक कोई भौर बुळाओ” । सुनिने कहा--“बायो | क्या कोई तुमसे भी
अधिक है ९” | वायुने कहा- मुझसे अधिक पवेत हे जिससे निश्चळ होकर बढ-
वान् भी में घारित होता हू? । तब मुनि पर्वतको बुळाकर कन्यासे बोळे-
“पुत्रिके ! तुमको इसके निमित्त दु ”” | वह बोढी- वात | यह कठिनात्मा
ओर निश्चळ है, सो और किसके निमित्त मुझे दो” । झुनिने पर्वतसे एछा,-
“ओ पर्वतराज ! कोई तुमसे मी अधिक है १”। पर्वतने कहा- मुझसे अधिक
: मूषे हें जो मेरे शरीरको बळसे विदीणे करते हैँ” | तब सुनिने मुषकराजको
बुळाय उसे दिखाया और बोछे-“पुत्रिके ! क्या इसके निमित्त तुझे दू यह-
मूषिकराज तुझको अच्छा लाता है £” षह भी उसको देख यह स्वजातीय हैं
ऐसा मानकर पुळकावछीसे अळकृत झारीरवाळी उतसे बोळी,-- "तात ! मुझे
मूषिका करके इसके निमित्त दो। जिससे अपनी जातिके योग्य गृहधर्मका अनु-
छान करू” । तब बह भी अपने तपोबळसे उसे मूषिका करके उस ( मूषक-
_ राज ) को देते भये । इससे में कहता ह-
सूर्य्ये अर्तारमुत्सज्य पर्जन्यं मारुतं गिरिम्।
स्वजातिं मूषिका प्राता स्वजातिडेरतिक्रमा ॥ २२१ ॥!?
२२
(३७०) पञ्चतन्त्रम् ।
सूर्य, मेघ, पवन, पवतको ( इस प्रकार) भतो बनाना छोडकर मूषिका अपनी
जातिको प्राप्त हुई जाति भपनी नहीं छोडी जाती ॥ २२१ ॥?
अथ रक्ताक्षवचनमनाहत्य तेः स्वबंशाविनाशाय स स्वदु--?
गंसुपनीतः । नीयमानश्च अन्तर्लीनमवहरस्य स्थिरजीवी
वपचिन्तयत--
तब रक्ताक्षके वचनकों अनादरकर उन्होंने अपने बंशको नाश निमित्त ही
उस ( वायस मंत्री ) को भपने दुगमें प्राप्त किया । छेजाया इभा भीतर बैठ
हँसकर स्थिरजीवी मनमै सोचने छगा--
“(हन्यतामिति येनोक्तं स्वामिनो दितवादिना ।
स पवेकोऽनर सबेषां नीतिशास्रार्थतत्ववित् ॥ २२२॥
स्वामीका हित करनेवाले जिसने कहाथा कि इसे मारडाठो वही एक
इन सबमें नीतिशास्रके तत्वका जानेवाला हे॥ २२२ ॥
तद्दि तस्थ वचनमकरिष्यन् एते, ततो न स्वल्पोऽपि
अनथोऽमविष्यत् एतेषाम्? । अथ इुमेद्वारं प्राप्य अरिम-
दनोऽब्रवीत्+- “मो ! भोः! हितेषिणोऽस्ख स्थिरजीविनो यथा
समीहितं स्थानं यच्छत’? । त्च श्रत्वा स्थिरजीवी व्यचि-
न्तयत्, “मया तावत एतेषां वधोपायः चिन्तनीयः, स मया
मध्यस्थेन न साष्यते । यतो मदीयभिङ्गितादिकं विचारः
यन्त; तेऽपि सावधाना भविष्यन्ति, सद्इगद्वारमाधाश्रेतो-
ऽभिप्रेत साधयामि? इति निश्चित्य उळूकपतिमाह,- देव !
युक्तमिदं यत् स्वामिना प्रोक्तै परमपि नी तिज्ञस्तै अहितश्च ।
यद्यपि अङुरक्तः शुचिस्तथापि इर्गमध्ये आवासो न अहः ।
तत् अहमत्र एव दुर्मद्वारस्थः प्रत्यहं भवत्पादपञ्चरजःपवित्री-
कृततलुः सेवां करिष्यामि” । तथेति प्रतिपन्ने प्रतिदिनसुलक'
पतिसेवकास्ते प्रकाममाहारं कुत्वा उळूकराजादेशात प्रकृष्टः
मांसाहारं स्थिरजीविने प्रयच्छन्ति । अथ कतिपयेः एव
अहोभिः मयूर इव स बलवान् संवृत्तः । अथ रक्ताक्षः स्थिर-
जीविनं पोष्यमाणं दृष्टा सविस्मयो मन्त्रिजनं राजानश्च
भाषाटीकासमेतम् । ( ३७१ )
अत्याह- अहो ! मूखोंऽघं मन्त्रिजनो भवांश्च इति एवमहमव-
गच्छामि । उक्तश्व-
सो यदि यह उनका वचन करते तो थोडासा भी अनर्थ इनका न होता?”
तब दुगीद्वारको प्राप्त होकर भारिमर्दैन बोळा-“भो | हितकारी इस स्थिरजी-
चौकी जहा चाहे बहा स्थान दो” । यह सुनकर स्थिरजीवी बिचारने छगा ।
“मुझे तो इनके षघका उपाय करना हे | सो मध्यम रहनेसे बह मुझसे सिद्ध
न होगा, कारण कि यह मेरी चेष्टादिकका विचार कर सावधान हो जायगे |
सो दुगेद्वारमे स्थित होकर आपना अभिप्राय सिद्ध करू” । एसा विचार उळूक-
पतिसे वोढा- देव युक्त ही हे यह जो स्वामीने कहा हे । परन्तु मैंमी नीतिः
शाल्रका ज्ञाता तुम्हारा भहित हू । यद्यपि तुमने प्रीतिमान् भोर पवित्र ३
तथापि दुर्गके मध्यमे रहना उचित नहीं । सो में यहा दुगे द्वारम स्थित
हुआही प्रतिदिन स्वामीके चरणकमलकी रजसे पवित्र झरीरवाळा सेवा
करूगा” | बहुत भच्छा ऐसा कहने पर प्रतिदन उळ्कपतिके सेवक बे
सम्यक् आहार करके ठळूक राजकी आज्ञासे प्रचुर मातत मोजन स्विरजीवीको
देते । तव कितने एक दिनोमें मयूरकी समान बछवान् हुआ । तब रक्ताक्ष
ख्थिरजीषीको पुष्ट देखकर विस्मयपूर्वक मत्रिजन और राजासे बोछा-“भद्दो !
मत्रिजन और तुम सब मूर्ख हो ऐसा में जानता हू | कहा है-
पूर्व तावदहं मूखों द्वितीयः पाशाबन्धकः ।
ततो राजा च मन्त्री च सव थे मूर्खमण्डलम् ॥ २२३॥
पहले तो में मूर्ख, दुसरे पाशबधक, फिर राजा और मत्री सबही मूर्ख
मडळ हे ॥ २२३ ॥?
ते प्राहुः, कथमेतत् ९” रक्ताक्षः कथयति
वे बोले" यह कैसी कथा ”” | रक्ताक्ष कहने छगा-
कथा १३.
अस्ति कस्मिंश्चित् पर्वतेकदेशे महान् दृक्षः । तत्र च सि-
स्थुकनामा कोऽपि पक्षी प्रतिवसति स्म । तस्य पुरीषे सुव-
णेसुत्पद्यते । अथ कदाचित् तमुद्दिश्य व्याधः कोऽपि समा-
ययो! स च पक्षी तइग्रत एव पुरीषशुत्ससर्ज । अथ पातस-
(२७२) पश्चलन्त्रम् । `
मकालमेव तत् खवणींभूतं दृष्टा व्याधो विस्मयमगमत् ।
“अहो ! मम शिशुकालात आरभ्य शाङुनिबन्धव्यसनिनः
अशीतिवर्षाणि समभूवन् । न च कदाचित् अपि पक्षिपुरीषे -
सुवर्ण दृष्टम्” । इति विचिन्त्य तत्र वृक्षे पाशं बबन्ध । अथ
असो आपि पक्षी मूर्खेस्तत्रैद विश्वरतचित्तो यथापूवेसुपविष्टः
तत् कालमेव पाशेन बद्धः । व्याधस्तु तं पाशाइन्मुच्य
पश्ररके संस्थाप्य निजावासं नीतवान् । अथ चिन्तयामास ।
किमनेन सापायेन पक्षिणा अहं करिष्यामि, यदि कदा-
चित्कोऽपि असुमीदशं ज्ञात्वा राज्ञे निवेयिष्याति, तत् नूनं
आणसंशयो मे भवेत्, अतः स्वयमेव पक्षिणं राजे निवेदया-
मि”? । इति बिचार्य्य तथेब अनुष्ठितवान । अथ राजापि तं
पाक्षिणं दष्टा विकसितनयनवदनकमलः परां तुष्टिसुपागतः,
भाह च एवं- “हंहो ! रक्षापुरुषाः ! एनं पाक्षेणं यत्रेन रक्षत
अशनपानाादैकं च अस्य यथेच्छं प्रयच्छत” | अथ मन्त्रिणा
अभिहितम्,-' “किमनेन अश्रद्वेयव्याधवचनप्रत्ययमात्रपारि-
गहीतेन अण्डजेन । कि कदाचित् पक्षिपुरीषे सुवर्ण सम्भ-
बति १ तन्मुच्यतां पञ्जरबन्धनाद्यं पक्षा” । इति मन्त्रिवच-
नात् राज्ञा मोचितोऽसो पक्षी उत्रतद्वारतोरणे समुपविश्य
सुवर्णसयां विष्ठां विधाय, “पूर्वे तावत् अहं सूखे' हाते छोकं
पाठित्वा यथालुखमाकाशमार्मेण प्रायात् । अतोऽहं ब्रमीमि-
किसी एक पवेतके एक देशमें महान् वृक्ष हे । वहां सिम्सुक नामक कोई
पक्षी रहता या । उसकी बीटमें सुधर्ण उत्पन्न होता था । एक समथ उसके
उद्देश्यसे कोई व्याधा वहां आया वह पक्षी उसके सम्सुख ही पुरीष करता भया
उसे सोना हुआ देख व्याधा विस्मयको प्राप्त हुआ । “अहो ! मुझे बाढकपनसे
छेकर पदि पकडनेक्ता कार्य करते अस्सी वर्ष बीतगये । परन्तु कभी पक्षीके
पुर्राषमे घुवर्ण न देखा””ऐसा बिचार उस बृं पाशको बांधता हुआ । तब यह
मूर्ख पक्षी बिश्वस्त चित्तसे वहां पूर्वकी समान बैठा रह | और उसी समय पाशं
४४,
बंधगयां] ब्याधामी उसको पाशेसे खोलकर पाँजरेमे डाळ भषनें घर लाया भोर
भाषाटीकासमेतम् । ( ३७३ )
विचार करने छगा इस विपतयुक्त पक्षीको लेकर में क्या करू । जो कदाचित्
कोई इसको ऐसा जानकर राजासे निवेदन करे तो भवइयही मेरा प्राण सदेह उप-
स्थित होगा । इससे सवयही पक्षीको राजाके पास लेजाकर निवेदन करू”? |
ऐसा विचार कर वही करता हुभा | राजामी उस पक्षीको देख खिले नयन-
कमळ मुखबाळा परमसतोषको प्राप्त हुमा बोळा, भी-““भहो रक्षा पुरुषो ! इस
पक्षीको यत्नसे रक्षा करो भोननपानादिक इसको यथेच्छ दो”? । तब मत्रीने
हा- यह विासके अयोग्य व्याधके वचनसे इस पक्षीको ग्रहण करसे क्या
हे । क्या कहीं पक्षीके पुरीषमें सुवर्ण हो सक्ता है! सो पंजरके बधनसे इस पक्षीको
छोडदे”? । इस प्रकार मनत्रके वचनसे छोडा हुआ यह पक्षी ऊची द्वारका तोरण
पर बैठकर सुघर्णमयी वोट करके “ पहले में मुखै ” इस छोकको पढता इभा
यथासुख आकाशमै चठागया । इससे में कहताहू कि-
पूर्व तावदहं मूर्खो द्वितीयः पाशवम्धकः |
ततो राजा च मन्त्री च सवै वे सू्खेमण्डलम् ॥ २२४ ॥ ?
पहले में मूर्ख दूसरा पाशवंधक फिर राजा भौर मत्री सबही मूखेका मंडल
है ॥ ३२४॥ ”
अथ ते पुनरपि प्रतिकूलदेवतया हितमपि रतक्ताक्षवचन-
मनाहत्य भूयस्तं ्रभूतमाँसादि विविधाहारेण पोषयामासुः
अथ रक्ताक्षः स्ववर्गमाहूय रहः प्रोवाच,-“अहो ! एतावदेव
अस्मद् भूपतेः कुशलं दुर्ग । तडपदिष्टं मथा यत् कुलक्रमा-
गतः सचिवोऽभिधत्ते । तद्वयमन्यत् पर्वेतढुगै सम्प्रति समाश्र-
यामः । उक्तश्च यतः-
चे फिरमी प्रतिकूल देवत होनसे रक्ताक्षके घचन अनादर करके फिरवी
उसको अनेक मासके भाहारसे पुष्ट करते इए। तब रक्ताक्ष अपने भोरके
{ उळ्कों ) को बुढाकर एकान्तमें बोला,-''अहो ! यहातक हमारे राजाकी
कुशळ और दुर्गकी स्थितिहै | बह उपदेश दिया जो कुछ क्रमते आया हुभा
मत्री उपदेश करता है । सो इस समय हम दूसरे पर्वत दुर्गका आश्रय केणे
कहा है कि-
(३७४) पञ्चतन्त्रस्।
अनागतं यः कुरूते स शोभते
स शोच्यते यो न करोत्यनागतम् ।
वनेऽत्र संस्थस्य समागता जरा
बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रता ॥ २२५ ॥ ?
नहीं उपस्थित हुई ( भावि ) विपदका प्रतिकार जो करता है वह
शोमित होता है भोर जो न आई विपतका प्रतिकार नहीं करता बह कष्ट पाता
है इस वनमें रहते २ में बूढा होगया परन्तु बिळकी वाणी कभी मैंने न
सुनी ॥ ९२२५ |?
ते प्रोुः-, “कथमेतत् १” रक्ताक्षः कथयति-
घे बोळे-“यह केसे ?? रक्ताक्ष कहने छगा--
कथा १४.
कस्मिश्चित् वनोदेशे खरनखरो नाम सिंहः प्रतिवसति
स्म स कदाचित् इतश्चेतश्च परिश्रमन शुतक्षामकण्ठो न
किञ्चिदपि सत्वं आससाद ! ततश्च अस्तमनसमये महती
मिरिशहां आसाद्य प्रविष्ट चिन्तयामास । “नूर्न एतस्यां
` गुहायां राजो केनापि सत्तेन आगन्तव्यम् । तत् निम्तो
भूत्वा तिछ्ामि' । एतस्मिन्नन्तरे तत्स्वामी दाषिपुच्छा नाम
गारः समायातः, स च यावत् पश्यति, तावत् सिहपदप-
द्वतिशहायां प्रविष्टा न च निष्क्रमणं गता । ततश्च अचिन्त
यत्, “अहो ! विनष्टोऽस्मि । नूनमस्यामन्तर्मतेन सिंदेन
भाव्यम् । तत् कि करोमि १ कथं ज्ञास्यामि १! एवं विचिन्त्य
द्वारस्थः फत्कर्तमारब्धः- अहो बिल ! अहो बिल ! ”
इत्युक्ता तूष्णीम्भूय भूयोऽपि तथा एव प्रत्यमाषत,~' “भोः!
कि न स्मरसि यत् मया त्वया सह समयः कृतोऽस्ति । यत
मया बाह्यात् समागतेन त्वं बक्तव्यः त्वया च अहमाकार"
णीय इाति । तद् यदि मां न आद्वयसि ततोऽहं द्वित्तीयं बिल
यास्यामि? । अथ तच्छत्वा सिंहः चिन्तितवान् नून एषा
आषाटीकासमेतम् । ( २५९)
गुहा अस्य समागतस्य सदा समाद्वानं करोति । परं अद्य
मद्भयात् न किञ्चिद् जूते । अथवा साधु इदमुच्यते-
किसी एक वनके निकट तीक्ष्ण नखवारा सिंह रहताथा । बह् कदाचित्
इधर उधर घूमता क्षुवासे द्युष्ककंठ किसी जीवको भी प्राप्त न करता इभा |
तब सुरयास्तके समयमें बडी मिरियुहाको प्राप्त हो उसमें प्रवेश कर विचारने
छगा । “अवश्य इस गुदामे रात्रीके समय कोई जीव आवेगा । सो निस्तब्ध
होकर बहू” । इसी समय उसका स्वामी दघिपुच्छ ( दहीकी समान खेत पूंछ-
वाळा ) नामक शगाळ भाया, वह ज्योही देखता है त्योंही सिंहके पगचिन्ह
गुद्दामें प्रवेश कर गये हैं नाकि निकळेके । तब बिचारने छगा । “महो में नष्ट
इभा । अवश्यही इसके भीतर सिंह हे मों क्या करू ? केसे जानू ”” ऐसा
विचार कर दवरेसे पुकारने गा “अहो विळ ! अहो विक !!' ऐसा कह मौन हो
फिर भी उसी प्रकार बोठा-“मो | क्या भूठगई जो मेरे साथ तेने प्रतिज्ञा की
थी । जो कि में वाहरसे आकर तुझको पुकारा करूंगा । तव तू मुझे घुळाया
करना । सो यदि मुझको नहीं बुळाती है तो में दूसरे बिछको जाताहू”' | यह
सुनकर सिंह विचारले ढगा “अवश्य यह गुहा इसके आनेपर सदा बुलाया
करती हे परन्तु भाज मेरे भयसे कुछ नहीं बोडती | भयमा अन्छा कहा है-
भयसन्तस्तमनसाँ हस्तपादादिकाः क्रियाः ।
प्रवर्तन्ते न वाणी च वेपथुश्चाधिको भवेत ॥ २२६ ॥
सपसे व्याकुळ मनवार्डोकी इस्त पादादिक क्रिया तथा वाणी प्रवृत्त नहीं
होती और कंप अधिक होता हे ॥ २२६ ॥
तत् अहमस्य आह्वानं करोमे थेन तदनुसारेण भविष्टोऽयं
मे भोज्यतां यास्यति । एवं सम्प्रधाय्य सिंहः तस्याद्वानम-
करोत् । अत्र सिंदशब्देन सा गुहा घतिरवसम्पूणां अन्यान्
अपि दूरस्थान् अरण्यजीवान् नासयामास । शृगालोऽपि
पलायमान इमं क्वोकमपठत्-
सो में इसको पुकारू | जिससे यह उसका-अनुसरण कर इसमें प्रवेश कर
मेरे मोजनको प्रात होगा । सो ऐसा विचार कर सिंहने उसका आद्वान किया |
( ३७६ ) पञ्चतन्त्रस् ।
तब सिंहके शब्द और उसकी प्रतिध्वनिसे वह गुहा पूर्ण होकर अन्य भौ वनके
स्थित जीवोको त्रास देती हुई । शगाळ भी यह छोक पढता मागा-
अनागतं यः कुरुते स शोभते
स शोच्यते यो न करोत्यनागतम् ।
वनेऽत्र संस्थस्प समागता जरा
बिलस्य वाणी न कदापि मे शता ॥ २२७॥”
कि जो अवागत विपात्तिका उपाय करता हे वह सुखी होता हे जो अना-
गतका विचारही नहीं करता बह कष्ट पाता है, इसी वनमें रहते में बूढा होगया .
A ऑफ
परन्तु बिलकी वाणी मेंने कमी नहीं सुनी ॥ २२७ ॥”
तदेवं मत्वा युष्माभिमेया सह गन्तव्यम्''इाति। एवमभि-
धाय आत्माहयायिपरिवारावुगतो दूरदेशान्तरं रक्ताक्षो
जगाम ।
सो ऐसा विचार कर तुमको मेरे साथ चछना चाहिये” ऐसा कह अपने
अनुगामी परिवारके साथ रक्ताक्ष दुर देशको चळगया ।
' अथ रक्ताक्षे गते स्थिरजीवी अतिहष्टमनाः व्यचिन्तयव,
“अहो ! कल्याणमस्माकसुपस्थितं यत् रक्ताक्षो गतः ! यतः
स दीघदशी, एते च मूढमनसः ततो मम सुखघात्याः सञ्जा-
ताः। उक्तश्च यतः-
रक्ताक्षके जानेपर स्थिरजीवी प्रसन्न हो विचारने लगा “अहो -] कल्याण
उपस्थित हुभा है जो रक्ताक्ष गया । जो कि वह दाविदशी हे और यह मूढ़
मनषाळे हें सो मरे सुखसे घातके निमित्त इए हैं । कहहि. कि-
न दीघेदशिनों यस्य मन्त्रिणः स्युर्महीपतेः । ..
ऋमायाता धुर्वे. तस्य न चिरात्स्यात्परिक्षयः ॥ २२८ ॥
जिस राजाके यहां दीदी मंत्री नहीं होते हें और वंशक्रमके नहीं हैं उसका
शीप्रही विनाश हो जाता है॥ २२८ ॥
, -अथवा साधु इदसुच्यते-
अथवा यह अच्छा कहा -हे-
भाषाटीकासमैतम् । (३७७)
मन्तरिरूपा हि रिपवः सम्भाव्यन्ते विचक्षण; ।
ये सन्तं नयसुत्सुज्य सेवन्ते भतिलोमतः ॥ २२९ | ?! '
जो श्रेष्ठ नीतिको छोडकर प्रतिकूल सेवन करते हैं वे बुद्धिमानोंने मन्त्रिरूप
शत्रु कहे हैं ॥ २२९ |!"
एवं विचिन्त्य स्वकुलाचे एकैकां वनकाष्ठिकां उहादी पनाथ
दिने दिने प्रक्षिपति। नच ते मूर्खा उळूका विजानन्ति ।
यत् एष कुलायमस्मदाहाय वाद नयति । अथवा साधु इद-
सुच्यते-
एसा वचार कर अपन घॉसळम एक एक पतका लकडा रुहा प्रदात करव
को दिन दिन डाळता | उसको उन मूखे उळ्कोने न आना । कि यह हमारे
जळानेकोही घोसळा बढ़ाता है | भथवा यह अच्छा कहा हे
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्र देष्ठि हिनस्ति च !
शुभं वेत्यशुभं पापं भद्रं दैवहतो नरः॥ २३०॥
जो अमित्रको मित्र करता है मित्रसे द्वेष करता तथा उसे मारता है
झुसको अशुभ जानता हे पापको भरा मानता हे बह पुरुष भाग्यसे नष्ट हुआ
जानना | २३० ॥
अथ कुलायव्याजेन इुमेद्वारे कृते काछनिचये सञ्जाते सूर्य्यो-
- दयेऽन्थतां पातेषु उळकेषु सत्छु स्थिरजीवी शीघं गत्वा मेघवणे
माह, “स्वामिन् ! दाहसाध्या कृता रिपुशुहा। तत् सपरिवारः
समेत्य एकैकां बनकाछिकां ज्वलंतीं गृहीत्वा गृहाद्वारे अस्म-
त्कुळाये प्रक्षिप थेन सवै शत्रवः कुम्भीपाकनरकमायेण दःखेन
म्रियन्ते’ । तत श्रृत्वा प्रहष्टो मेघवर्ण आह-तात ! कथय
आत्मडृत्तान्तम्। चिरात् अद्य इष्टोऽसि!” स आह-वत्स !
“नायं कथनस्य कालः । यतः कदाचित् तस्य रिपोः कश्चित्
णिधिमंम इह आगमनं निवेदयिष्याते । तजज्ञानात्
अन्धोऽन्यतन् अपसरणं करिष्यति | तत् त्वय्यत्ताम्। उत्तश्च-
घोंसळे बढ़ानेके छरुसे दुगे इारमें काष्टसमूह होनेपर सूर्योदयमे उळ्कोके
अन्धे होनेमें स्थिरजीवी शीघ्र गातिसे जाकर मेघतरणसे बोळा | “सामिन् !
(२०८) पञ्चतन्त्रम्। |
पर्वत गुहा नळानेसे जीतने योग्य करदी । सो अब पाखखार सहित मिलकर
एक एक घनकी छकडी जळती हुई लेकर शुहाके द्वार मेरे घोसळेगे .
डाळदो जिससे वे सब शत्रु कुम्मीपाक नरककी समान दुःखसे मरजायंगे” | यह
सुनकर प्रसन्न हो मेघवणे बोळा,-“तात ! अपना इत्तान्त तो कहो | । बहुत
दिनोमें आज देखा” | वह बोळा--“'वत्स यह कथनका समय नहीं है जो कदा-
चित् उस इत्रुका कोई प्रणिधी मेरा यहां आगमन कहदे । सो जानकर अन्धा
भी कहीं अन्य स्थानमै चलाजाय सो शीप्रता करो । कहा है-
शीघ्रकृत्येषु काय्येषु विळम्बयाति यो नरः।
तत्क्रत्यं देवतास्तस्य कोपाद्विघ्नन्त्यसंशयम् ॥ २३१ ॥
शीघ्रकरने योग्य कार्योर्मे जो मनुष्य बिलम्ब करता है देवता उस कोपसे
उसके कुलको अवश्य नष्ट कर देते हैं ॥ २३१ ॥
तथाच-
और देखो-
यस्य यस्य हि कार्यस्य फालितस्थ विशेषतः ।
क्षिममक्रियमाणत्वं कालः पिबति तत्फलम् ॥ २३२ ॥
जिस जिस विशेष फळवाळे कार्यको शीघ्र नहीं किया जाय तो विठम्बरूप
[छ उसका फल पानकर जाता हे॥ २३२ ॥
तद्शुहायां आयातस्य ते हतशन्रोंः सवे सविस्तारं .
निव्याकुलतया कथयिष्यामि” । अथ असो तदट्टचनमाकण्य
सपरिजन एकेकां ज्वलेती वनकाष्ठिकां चञ्च्वम्रेण गृहीत्वा
तदगहाद्वारं आप्य स्थिरजीविकुलाथे माक्षिपत्। ततः सर्वे
ते दिवान्धा रक्ताक्षवाक्यानि स्मरन्तो द्वारस्य आवृतत्वात्
अनिः्सरन्तो गुहामध्ये कुम्भीपाकन्यायमापन्ना मृताश्च!
एवं शत्रन् निःशेषतां नीत्वा भ्रूयोऽपि मेघवणः तदेव न्यम्री---
अपादपदुग जगाम । ततः सिंहासनस्थो भुत्वा सभामध्ये
प्रमुदितमना? स्थिरजीविनमऽएच्छत-* "तात ! कथं त्वया
शत्नुमध्ये गतेन एतावत् कालो नीतः १ तदत्र कॉठुकम"
स्माकं वर्तते । तत् कथ्यताम् । यतः”
भाषाटीकासमेलम् ! (३७९)
सो गुहासे छौटनेपर शत्रु मारनेवाले आपसे सब इचान्त विस्तारपूर्वक
'डुपाकुछतारादित होकर कहूगा”। तब यह उसका वचन छुन परिजनसहित एक
एकजळती बनकी लकडी चोचमें ग्रहण कर उस गुहाके द्वारमे प्राप्त हो स्थिरजी
वीके घोंसलेमें डालते हुए | तब वें सब दिनके अन्धे रक्ताक्षके वचनोंकों स्मरण
करते द्वार रुकनेसे न निकळतेके कारण गुहाके मध्ये कुम्मीपाककी समान दग्ध
होकर मरगये । इस प्रकार शन्रुओंकों निःशेष कर फिरभी मेघवणे उस न्यग्रोध
वृक्षरूपी ढुगमे प्राप्त इआ । तब सिंहासनपर स्थित हो सभाकें मच्यमें प्रसन्न मन
-इआ स्थिरजीवीसे पछने छगा-“तात ! किसप्रकार तुमने शनुओंके मध्यवें जाकर
इतना समय विताया ९ सो इसमें हमको कोतुक हे । सो कहिये कारण-
चरमओ भदीते ठु भपातः पुण्यक्र्णणाम् ।
न चारिजनसंसगों मुहत्तेमपि सेवितः ॥ २३३ ॥?
पुष्यकर्मा पुरुष एक साथ अग्निप गिरजाना अच्छा जानते हैं परन्तु झन्नुसंग
एक मुहूत मात्रभी अच्छा नहीं ॥ २३३ ”
तत आकर्ण्य स्थिरजीवी आह,--'मद्र ! आगामिफलवा-
ञ्छ्या कष्ठमपि सेवकों न जानाति । उक्तश्व यतः--
यह शुन स्थिरजीबी बोळा-“मद्र | आनेवाळे फलकी आकाक्षासे सेवक कष्टको
कुछ नहीं गिबता । कहा हे--कारण कि
उपनतभययो यो मार्गों हितार्थकरो भवे-
त्तस निपुणया दुद्धचा सेव्यो महान्कूपणोऽपि बा ।
करिकरनिभो ज्याधातांको महार्थविशारदो
रचितवलयः खत्रीठद्वद्धो करा हि किरीटिना ॥ २३४॥
अयके प्राप्त होने जो जो मागे हितकारी होवे, चतुराई घुद्धिसे वह वह
मागे उत्कृष्ट वा अधमहो सेबन करना चाहिये, जिस कारणसे कि अर्जुनने
“हाथीकी सूडकी समाव ज्याधातके चिन्हवाळी बिपुठ अर्थके साधन विख्यात
दोनों सुजा क्लीकी समान कपटनिर्मित कंकण पह्रनेवाळी कोथीं ( अज्ञात चास
विराटके यहा रहनेके समयकी कया हे हरिणोइत्त है) ॥ २३४ ॥
शक्तेनाप सदा नरन्द्रावदषा कालान्तरापाश्चणा
वस्तब्य खळु वाक्यवज्ावषमे धुद्रेशपे पापे जने ।
(३८०) -पञ्चतन्त्रम् ।
दर्वीव्यम्रकरेण धूममलिनेनायासयरुक्तेन च
भीभनातिबलेन मत्स्थभवने कि नोषितं सूदवत ॥ २२५
हे राजन् | समयकी अपेक्षा करनेवाले समर्थ विद्वानकोभी वाणीरूपी वत्से
विषम क्षुद्र पापी जनके समीप बसना चाहिये कारण कि पाकसाधन द्रव्य हाथो
लिये घृमसे मळिन पारश्रमते युक्त महाबळी भीमसेनन रसेइयेकी समान विराटके
घरम क्या निवास न किया | किन्तु किया ('अथान्तर न्यास भळकार शादूळ-
HA
विक्रीडित वृत्त ) | २१५ |
यद्वा तद्वा विषमपतितं साधु वा गर्हितं वा
काळापेक्षा हृदयानिहितं बुद्धिमान्कर्म कुण्यांत्।
कि गाण्डीबर्फुरडरूघनार्फाळनळरपाणि-
नाँसीलछ्वीलानटनविलसन्मेखली सव्यसाची ॥ २३६ ॥
विषम आपत्ति पडनेपर समयकी प्रतीक्षा करता हुआ बुद्धिमान् जैसा होते
सो सळा या घुरा मनके कर्तव्यले निरूपित कर्मे करें, क्या शजुनने गाण्डीव
घनुषसे स्फुरायमान बडी सघन मोर्वी चढावेसे कठिन हाथवाळा होकरभी कॉपनी
( मेखला ) धारण कर ळीळा नाव्यक्ा बिढाप्त न' किया १ कियाही ( मन्दा
क्रान्ता दत्त) ॥ २३६ ॥
सिद्ध प्राथयता जनन ।वेदुघा तेजा Iनगझ्य स्वक
सच्वोत्ताहवताप दंवावोघषु स्थय्थ प्रकाय्य कमात।
दुवन्द्रद्रावणश्वरान्तकसमरप्याच्वता जातान*
कि क्लिष्टः सुचिरं त्रिद्ण्डमवहच्छ्ी मान्न घर्मात्मज; २३७॥
सिद्विकी प्रार्थना करनेवाळे चतुर पुरुष अपना तेज ग्रहण कर चछ और
उत्हाह होनेपरभी दुरवैपत्तिम वैेका आश्रय करते हैं. कारण कि श्रीमान् धर्मत
थुधिष्टिर इन्द्र कुबेर यमकी समान बढी भाइयोंसे युक्त होकरभी दाधिकाळतक”
विपात्तिमे पडकर क्या त्रिदण्डधारी ( वनवासी ) न इए । (शादूढ वि ०अयोन्त
सन्यास अळकार हे ) ॥ १३७ ॥
रूपामिजनसम्पन्नो कुन्तीपुत्रो बलान्वितौ ।
गोकर्मरक्षावयापारे विराटप्रेष्यतां गतो ॥ २३८ ॥
द
भाषाटीकासमेतम् । (३८१ )
रूपवान् अतिवली कुन्तीपुत्र ( नकुछ सहदेव) गोपाळनके कर्ममें क्या विराट
नगरमें दास न हुए १॥ २३८ ॥
-रूपेणामतिमेन यौवनगुणेः श्रेष्ठ कुले जन्मना
कान्त्या श्रीरिव यात्र सापि विदशां कालक्रमादागता।
सेरन्त्रीति सगर्वितं युवतिभिः साक्षेपमज्ञातया
द्रौपद्या नड मत्स्यराजभवने धृष्टं न कि चन्दनम् २३९
इस जगतर्भे जो छक्ष्मीकी समान अप्रतिमरूप, स्थिर यौवन गुण, तथा श्रेष्ठ
कुळके जन्म भौर काम्तिसे प्रकाशित थी, वहभी नारी काळवशसे बिपरीत
»अरस्थाको प्राप्त होगई ( मत्त्यराजके भवन ) की गर्वीली ल्लियोके भहकारभरे
सेरनत्री ( नायन ) ऐसे तिरस्कारके वचन अञ्ञातवासवाळी द्रौपदीने विराटभव-
नमें सुनते इए क्या चदन नहीं विसा ( किन्तु विसाही ) ॥ ९३९ ॥”
मेघवर्ण आह,“ तात! असिधाराब्रतामिदं मन्ये यत
अरिणा सह संवासः” ! सोऽब्रवीत्-* देव ! एवमेतत् परं न
ताइडसूखसमागमः कापि मया दृष्टः । न च महामज्ञमनेक-
शाखेषु अप्रतिमबुद्धि रक्ताक्षं विना धीमान यत्कारणं तेन
मदीयं यथावस्थितं चित्तं ज्ञातव्घम् | थे पुनः अन्ये मन्त्रिण-
स्ते महामूखा मन्त्रिमात्रघपदेशो पजीविनोऽतत्वक्कशला येः
,इदमपि न ज्ञातस् । यतः
मेघमर्णवोळा,-“तात | यह तो मे असिधारा ब्रत मानताहू जो शतके संग
निवास करना हे” वह बोछा,- देव ! ऐसेही हे परन्तु ऐसा मूर्ख समागम मैंने
- कहीं नहीं देखा भौर न महापण्डित अनेक शाज्लोंमें अळौकिक बुद्धिमान् रक्ता-
क्षके विना कोई विद्वान् देखा । कारण कि उसने ज्योंकी त्यो मेरे चित्तकी अव-
' स्था जावळी । और जो उसके मत्री थे वे महामूर्ख मत्रिमात्रके ब्यपदेशसे जीनेवाळे
;तावज्ञानसे हीन ये जिन्होंने यह सी न जाना । िससे-
अरितोऽभ्यागतो भृत्यो इष्टस्तत्सङ्गतत्परः ।
अपसप्यः स धम॑त्वान्नित्योद्वेगी च दूषितः ॥ २४० ॥
झजुपक्षते आयाडुभा मृत्य तथा शत्रुके साथ रहनेमें उत्साही दुष्ट नीतिके
( २८२) प्चतन्त्रम् ।
चर्मानुसार उसका सम्बन्ध नहीं करना चाहिये तथा सदा उदासीन और सधर्मा-
चरणसे दूषित मनुष्य अळग रहना चाहिये || २४० |
आसने शयने याने पानभोजनवस्तुषु ।
इष्टाटइममत्तेषु प्रहरन्त्यरयोऽरिषु ॥ २४१ ॥
आसन, शयन, यान, पान, मोजनकी वस्तुम तथा दृष्ट भदृमें प्रमत्त इए
झन्नुम शत्रु प्रहार करतेहे || २४१ ॥
तस्मात्सवेप्रयत्रेन त्रिवर्गनिलय बुधः ।
आत्मानमाहतो रक्षेत्ममादाद्धि विनश्यति ॥ २४२ ॥
इसकारण पंडित यत्नवान् होकर सब प्रकार धर्म अथे कामके आश्रयवाळे/
आत्माकी रक्षाकरै कारण कि असावधानतासे नाश होता है॥ २४२॥
साधु चेदसुच्यते-
यह अच्छा कहाहै-
सन्तापयन्ति कसपथ्यसुजं न रोगा
दुर्मन्त्रिणं कसृपधान्ति न नीतिदोषाः ।
क॑ श्रीने दर्षघति के न निहन्ति मृत्युः
के सत्रीकुता न विषयाः परिपीडयन्ति ॥ २४३ ॥
किस अपथ्य मोंजी ( षद परहेजी ) को रोग नहीं सन्ताप देते १ किस कुमं-
त्रिको नीतिके दोष प्राप्त नहीं होते? लक्ष्मी किसको दपै(गबे) बाळा नहीं क्ली
मृत्यु किसको नहीं मारती! छ्लीके किये व्यापार किसको पीडित नही फरतेः२४६ ”
लुब्धस्प नश्यति यशः पिशुनस्य मैत्री
नष्टक्रियस्य कुलमर्थपरस्य धर्भः ।
विद्याफलं व्यसनिनः कृपणस्य सोख्यं
राज्यं ममत्तसाचिवस्य नराधिपस्य ॥ २४४॥ ५
लोमीका पश, चुगळका मित्रता, नष्ट क्रियावाळेका कुछ, लोभीका he
कामासक्त पुरुषका विद्याफळ, कपणका सुख तथा प्रमत्तमंत्रीवाले राजाका रांड
नष्ट होजाताहे ॥२४४॥ -
तत् राजन् ! असिधाराव्रतै मया आचारितमरिसंसर्गाः
दिति, यद्भवता उक्तं तन्मया साक्षात् एवातुभूतम्। उक्त"
भाषाटीकासमेतम् । (३८४)
सो हे राजन ! मेंने यह असिधाराव्रतका आचरण किया, जो शजुके सगर्म
रहा | जो तुमने कहा वह मैंने साक्षात् अनुभव किया | कहा है कि-
अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा ठु पष्ठतः ।
स्वार्थमन्युद्धरेत्माज्ञ: स्वार्थश्रंशों हि मूर्खता ॥ २४५ ॥
अपमानको आगे मानकों पछि कर बुद्धिमान् आपना कार्य साधे स्वार्थका
भ्रष्ट होजानाही सूखेता हे ॥२४५|
स्कन्धेनापि बहेच्छचु कालमासाद्य बुद्धिमान् ।
महता कृष्णसर्पेण मण्डूका बहबो हताः ॥२४६॥
समय प्राप्त होनेपर बुद्धिमान् शमुको कवेपर चढावे एकू बढे काठे सापसे
बहुत मेंडक मारे गये ॥२४ ६॥
मेघवर्ण आहे- कथमेतत् १” स्थिरजीवी कथयति-
र
मेघवर्ण बोळा-''यहू कैसे !'7 स्थिरजीवी कहने छगा-
कृथा १५.
अस्ति वरुणाद्विसमीपे एकस्मिन् प्रदेश परिणतवया मन्द
विषो नाम ळृष्णसर्पः, स एबं चित्ते सञ्चिन्तितवात् “कथं
नाम मया खुखोपायदृत्त्या वत्तितव्यम्” इति । ततो बहुमंडूकं
हृदसुपगम्य घुतिपरीतमिद आत्मानं दशितवान्। अथ तथा
स्थिते तस्मिन् उदकप्रान्तगतेन एकेन मण्डूकेन पष्ट!,- माम!
किमदय यथापू्वमाहारार्थ न विहरासि १” सोऽब्रवीत्, भद्र!
कुतो मे मन्द॒भाग्यस्घ आहाराभिलाषः। यत्कारणमद् रात्री
प्रदोष एव मथा आहारार्थ विहरमाणेन दृष्ट एको मण्डूक; ।
तद्ग्रहणार्थं मया क्रमः सजितः सोऽपि मां दृष्ठा मृत्युभयेन
,स्वाध्यायप्रसक्तार्ना त्राह्मणानामन्तरमपक्रान्तो न विभा-
वितो मया कापि गतः। तत्सदशमोहितचित्तेन मया कस्थ”
चिद् ब्राहमणस्य सूनोः द्रदतटजलान्तःस्थोऽड्शष्ठो दष्टः ।
ततोऽसौ सपदि पञ्चत्वमुपागलः । अथ तस्थ पित्रा दुःखितेन
अहं शक्तः, यथा “'इरात्मन् ! त्वया निरपराधो मत्सुतो
(३८४) पञ्चतन्त्रम् ।
दष्टः। तद अनेन दोषेण त्वं भण्डकानां वाहनं भविष्यसि,
तत्मवादळन्धजीविकया वर्तष्यसे'' इति । ततोऽहं मुस्माकं
वाहनाथेमागतो5स्मि?' । तेन च सवमण्ड्कानामिदमावेदिते
तत त; महृष्टमना म: सवरव गत्वा जलपादनाम्रांदहररा
जस्य वर्वेज्ञतम । अथ असा आष भात्वपारंदृता5त्यद्धतामंद
मात सन्यमानः ससम्त्रस ददात उत्ताय्थ मच्दाचषर्थ
फाणन; फणत्रढेशमाघरूठ)। शेष आप यथाञ्घछ तत्पृष्ठोपरि
सभारुरूदुः । के बहुना तडुपार स्थान मातवन्तः तस्य
अतुपद घावान्त | मन्दावषाजप तर्षो तुध्यथमनंकप्कारान् .
गतिविशेषान् अदर्शयत् । अथ जलपादो लब्धतदड्डसंस्पशे-
सुखः तमाह,
बरुण पवतकके समीप एक स्थानमें बूढा मन्दविषः नाम कृष्णसर्प था | वह
इस प्रकार चित्तम विचारने लगा कि “किस प्रकार भें सुखके उपायसे जीवन
निर्वाह कस”? | तव बहुतस मेंडकवाले हृदके समीप प्राप्त होकर भेयेशाछीकी
समान अपनेको दिखाता हुआ | तब उसके ऐसा स्थित होनेपर जढके समीप
आये एक मेडकने पूछा “मामा ! क्यों आज यथायोग्य पूर्वा समान भोजनके
निमित्त नहीँ विचरते हो??? वह बोळा-“भन्र ! मुझ मन्दभाग्यको मोजनका आभे-
छाषा कहाँ | कारण कि आज रात्रिम प्रदोषके समय आहारके निमित्त विचरते
हुए मैंने एक मण्डूक देखा । उसके पकडनेको मैने उद्योग किया । वहभी मुझे
देख मृत्युके सयसे वेदपाठमें रत म्राझणोके बीचमें गया हुआ मुझे विदित न हुआ,
कि कहां गया । उस मण्डूककी सब्शतासे मोहित चित्तवाळे मैंने किसी जाह्मणके
पुत्रका हृदकें किनोर जळान्तमें स्थित झगूठा काट छिया तब वह शीघ्रही मर
गया । तब उसके पिताने दुःखी होकर मुझे शाप दिया! “दुरात्मन् तैने निरपराध
मेरे पुत्रको काटा इस दोषसे तू मेंडकोंका वाइन होगा । उनके प्रसादसे प्राप्त
हुईं जीविकासे निर्वाह करेगा”? ( इस प्रकार ) सो में तुम्हारे वाहनके निमित्त
जायाहूँ” | उसने यह बात सब मण्डूकोंसे कही । तब उन प्रसन्षमनवाढे सवने
जाकर जळ्पाद्नामवाले मेडकराजसे कहा तब यह भौ मंत्रियोंसि युक्त यह
अतिचमत्कार हुआ ऐसा मानता हुआ । सम्भ्रम इप्तसे निकछकर मन्दविष
भाषाटीकासमेंतम् | (३८५)
सर्पेके फणापर चढगया शेषभी ज्येष्ठक्रमाबुसार उसकी पीठपर चढगये । बहुत
क्या उसपर स्थानको न प्राप्त करते धावमात होते उसके पीछे चळे । मन्दविष
»भी उनके सन्तोषफे निमित्त अनेकप्रकारकी गतिविशेष दिखाता हुआ । तब
जलपाद् उसके अगके स्पशेसुखकों प्राप्त हो बोळा-
न तथा करिणा यानं तुरगेण रथेन वा ।
नरयानेन वा यानं यथा मन्दविषेण मे ॥ २४७ ॥
न ऐसा हाथीसे, न घोडेसे, न रथसे, न मनुष्य यानके गमनमे सुख है जसा
मुझे मदाबिपसे है || २४७ ॥
अथ अन्येद्युः मन्दविषः छम्मनना मन्दं मन्द् विसर्पति । तञ्च
दृष्टा जलपादोऽब्रवीत्,- भद्र मन्दविष ! यथापूर्वं किमद्य
साध नोह्यते ९” मन्दविषोऽ्रवीत्,- “देव! अद्य आहारवे
कल्यात् न मे वोटुं शक्तिरस्ति? । अथ असो अब्रबीत,-
“भद्र ! सक्षय क्षुद्रमण्ड्कान्” । तच्छ्रुत्वा प्रहषितसवेगाचो
मन्दाविषः ससम्श्नममबवीत्,- मम अयमेव विप्रशापो$स्त।
तत् तव अनेन अततज्ञावचनेन प्रीतोऽस्मि” । ततोऽसो
नेरन्त्य्येण मण्डूकान् भक्षयन् कतिपयैः एटाहोभिः बलवान्
संवृत्तः । प्रहृष्टश्च अन्तळींनमवहस्य इदमम्जवीत्,¬
तब दूसरे दिन मन्दषिष शनेः २ छलसे चछा । यह देख जळपाद बोळा,
“भद्र मन्दाविप | पहळेकी समान मली प्रकार अब क्यों नहीं वहन करता
है” । मन्दविष बौळा,-“देब | आज भोजन प्राप्त न होनेके कारण मुझे बहन
करनेकी शक्ति नही दै तब यह बोका," भिद्र | कुद मण्डूकोको भक्षण करो”
यह सुन सम्पूर्ण शरीरसे प्रसन्न हो मन्द विष सम्भमसहित बोला,-“ मुझको
यही आाह्मणका शाप है | सो इस अनुज्ञा वचनसे प्रसन्न हु” तब थह निर-
न्तर मण्ड्कोंको भक्षण करता इभा कितने एक दिनोमें बलवान् होगया | और
प्रसन्नहों मनमें हसकर यह बोछा--
*“मण्डूका विविधा हेते छलपूर्बोपसाधिताः ।
(केयन्तं कालमक्षीणा मवेयुः खादिता मम ॥२४८॥?!
२५
(२८५ ) पय्क््तन्त्रम् ।
यह अनेक मेंडक मैंने छछसे साधे ई, मुझसे भक्षण किपेमी कितने काल-
-तक अक्षीण होंगे ( दीघिकाल्मे खा चुकंगा )॥ २४८ ॥
जलळपादोऽपि मन्दविषेण कृतकवचनव्यामोहितचित्त:,
“किमपि नावबुध्यते । अत्रान्तरेऽन्यो महाकायः कृष्णसर्प:"
तसुदश समायातः | तश्व मण्डुकः वाहाभान इष्टा विस्मय-
सगमत् । आह च,“ वयस्य ! अस्माकमशनं तेः कथं वाह्मसे
विरुद्धमेतत्’ । मन्दविषी$नवीत-
और जल्पादर्भी मन्दविष सर्पके बनावटी वचनोसे मोहित चित्त होकर कुछमी
न जानता हुआ , इसी समय और महा शरीरवाळा कृष्ण सर्प वहां आया |
उस पहले सर्पेकों मण्डूकांसे वाह्यपान देखकर विस्मयको प्राप्त हुआ । बोळाभी
मो मित्र ! जो हमारा भोजन है उसे केसे शिरपर बहन करतेहो ? | यह तो
निरुद्ध है” | मन्दविष बोला-
“'सर्वमेतद्विजानामि यथा वाह्योऽस्मि ददुरेः ।
किजित्कालं प्रतील्यो5हं घृतान्धो ब्राह्मणो यथा २४९॥"
“यह सब में जानता हूं जिस कारण मेडकोंको वहन करता हूं में घृतमुने
ड्रब्पसे अन्ये ्राझणकी समान कुछ काकी प्रतीक्षा करता हूं ॥ २४९ ॥
सोऽत्रदीत्,-` कथमेतत् ! ?? मन्दविषः कथयाति-
वह बोछा,-“यह कैसे १”? मन्दविष कहने छगा-
कृथा १६. -
अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने यज्ञदत्तो नाम ब्राह्मणः, तस्य
आय्या पुश्वला अन्यासक्तमना अजस्न विटाय सखण्डघताद्
यंतप्रान् कृत्वा भवुश्वारकया प्रयच्छात ।
किसी स्थानमें यज्ञदत्तनामबाला ब्राह्मण रहता था उसकी मायाँ व्यसिचा-
उरेणी औरमे मन छगाये हुए निरन्तर मित्र ( जार ) के लिये खाँडयृतके
सहित घ्रृतपूर बनाकर स्वामीसे चुराकर उसे देती । ः
अथ कदाचित भर्त्ता दृष्टा अब्रवीत॒,-“ भद्रे ! किमेतत्
परिदृश्यते ९ कुत्र वा अजखं नयसि इद्म्! कथ्यं सत्यम?
सा च उत्पन्नप्रतिभा कृतकबचनेः अर्तारमत्रवीत- अस्ति
भाषाटीकासमेतम् । (३८७)
अत्र नातिदूरे भगवत्या देव्या आयतनम, तत्र अहमुपोषिता
सती बलि भक्ष्याविशेषांश्च अएवीन नयामि” । अथ तस्य
पश्यतो गृहीत्वा तत् सकलं देव्यायतनाभिझुखी प्रतस्थे ।
यत्कारणं '' देव्या निवेदित्तन अनेन मदीयो भत्ते मंस्थते
यन्मम ज्राह्मणी भगवत्याः कृते भक्ष्याविशेषान् नित्यमंव नय-
ति”इति। अथ देव्यायतने गत्वा स्नानार्थ नद्यामवतीय्ये
यावत् सनानक्रिधां करोति, तावत् भत्ता अन्यमार्गान्तरेण
आगत्य देव्याः एतोऽदश्योऽवतस्थ । अथ सा ब्राह्मणी स्ना
"त्वा देव्यायतनमागत्य सानावलेपनमाल्यधृपबालिक्रियादिक
कुत्वा देवी प्रणस्प व्यजिज्ञपत- भगवति ! केन प्रकारेण
मम भत्ता अन्धो भविष्यात! ! तच्छत्वा स्वरभेदेन देवीपृष्ठ-
स्थितो ब्राह्मणों जमाद,-“यादि त्वमजसत्र घृतपूरादिभिक्ष्यं
सरून अत्र यच्छसि ततः शीघमन्यो भविष्यति? । सातु
बन्धकी कूतकजचनवव्वितमानसा तस्मे ब्राह्मणाय तदेव नित्यं
ददो । अथ अन्येशुः ब्राह्मणेन आमिहितं,- भद्रे ! नाहं
झुतरां पश्यामि’ । तच्छ्रत्वा चिन्तितमनया, देव्याः प्रसा-
दोऽयं प्राततः’? इति । अथ तस्या हदयवछुभो विटस्तत्सका-
शमन्थीभूतोऽयं बराह्मणः कि मम करिष्यतीति निः
` शङ्खः प्रतिदिनमभ्षेति । अथ अन्पेदयुस्तं ्रविशन्तमभ्या-
शगतं दृष्टा केशेः गृहीत्वा लगुडपार्षिणप्रबातिमहारेः तावद-
साडयद। यावदसी पश्चत्वमाप तामपि इष्टपत्री छिन्रनासिकां
कृत्वा विससर्ज । अतोऽहं ्रवीमि-
तव एक समय उसके स्वामीने देखकर कहा-“भद्रे ! यह क्या दीखता हे,
रोज इन्हें कहा छेजाती है £ सत्य कह! । वह तत्काळ बात वनानेमें चतुर थी
चनावटी घचनोंसे स्वामीसे बोली-“यहाते थोडीही दूर भगवती देवीका स्थान
हं । बहा म् नता हांकर बाळ भक्ष्य पदाथ मधून ळूजाता हू ? | तब उसके
देखतेही प्रहण कर वह सब देवीके स्थानकी ओर चढी । कारण यह कि “है
निवेदन किये इस पदार्थेत्ते मेरा स्वामी यह बात मान जाय कि यह मेरी ब्राह्मणी
( ३८८ ) - पञ्चतन्त्रम् ।
भवानीके निमित्तही नित्य भक्ष्य विशेषोंकों ढेजाती है” । तब देवीके स्थानों
जाय खानके निमित्त नदीमें उतर कर जवतक खानक्रिया करती है तबतक
उसका स्वामी और मागेसे आकर देवीके पीछे अदृश्य होकर वेठगया । तत्र वह
ब्राह्मणी खानकर देवीके मन्दिरमें आय खान अनुलेपन माळा धूप वाळे क्रिया-
दिक कर देवको प्रणाम कर कहती हुईइ-““भगवाति ! किस प्रकारसे मेरा स्वामी
अन्वा हो जायगा !? यह सुनकर स्वर बदळकर देवीके पीछे वेठे इए ब्राह्मणमे
कहा जो तू निरन्तर ब्ृतसे पूर्ण पदार्थ अपने स्त्रामीको देगी, तो शीघ्र अंधा
हो जायगा”? । वह व्यमिचारिणी बनावटी चचनोसे बंचितमनवाळी उस ब्राहम-
णको वही पदार्थ नित्य देती हुईं । तब एक दिन ब्राह्मणने कहा-“भद्रे ! मुझे"
अच्छी तरह नहीं दीखता” । यह सुन इसने विचार किया क्रि “देर्वाका प्रस-
जता हुए” । तव उसका हृदयवलम जार उसके निकट यह ब्राह्मण तो अंघ है
मेरा क्या करेगा ऐसा जान निश्शंकहो प्रतिदिन आता तब एक दिन प्रवेश
करते उस समीप आयेको देख उसके बाळ पकड डंडेसे पार्ष्णि ( पसी )
आदिमे प्रहारकर उसको ताडन करता हुआ । जव यह मरगया तव उस दुष्ट
:ह्लोकी नाक काटकर त्यागन करता हुआ । इससे में कहता हं-
सबवेमेताद्विजानामि यथा वाह्योऽस्मि ददरेः ।
'किचित्कालं प्रतीक्ष्योऽहं घृतान्धो ब्राह्मणों यथा॥२५०॥”
"कि मे यह सब जानता हूं जिस कारण सुझपै मेडक चढे हैं कुछ समयकी.
अतीक्षा करता छू जैसे घृत पदार्थसे ( कमित्र) अघे ब्राह्मणने प्रतीक्षा की॥२ ५ णा?
- अथ मन्दविषो$न्तलींनमवहस्य पुनरपि ““मण्डूका विवि
धास्वादाः'' हाते तमेवमत्रवीव् । अथ जलपादः तच्छ्रत्वा
सुतसं- व्यग्रहदयई “किमनेन -अभिदितम्ः? -इति ,तमएं-
च्छत+- भद्र - कित्वया अभिहितमिदं. विरुद्ध वचः ने
-अथासो.- आकारभप्रच्छादनाथ - “न: किश्चित्' दाते. अत्र
बीत: ,तथेव- कृतकवचनव्यामोहिताचित्तो जलपाद्स्तस्प
ढुद्टामिसन्धि न 'अवबुध्यते । कि बहुता, तथा तेन, सवऽ
अक्षिता यथा बीजमात्रमपि न अवशिष्टम्। अतो5ह बवीमि-
भाषाटीकासमेतम् । (३८५)
«ty
तब मन्दविष सक्ने मने हसकर “मेडकोंमे अनेक प्रकारका खाद है”
सा उससे कहा । तब जळपाद अत्यन्त दु'ली हृदय होकर “इसने क्या कहा
हा उससे पूछता हुआ--“भद्र ! क्या तुमने यह विरुद्ध बचन कहा” तब यह
आकारछिपानेके निमित्त “कुछ भी नहह” ऐल बोळा । इसतीप्रकार बनावटी
वचनोसे मोदितचित्त जळ्पाद उसके दुष्टभसिप्रायको न जानता इभा । बहुत
कहनेते क्या उसने इत्तप्रकार वे सब भक्षण किये जो बीजमानभी न वचा इससे
में कहता हु
*“स्कन्थेनापि वहेच्छचु कालमासाद्य बुद्धिमान्।
महत्ता ळृष्णसपण मण्डूका बहवो हताः॥ २५१ ॥? |
समयको प्रात हो वुद्धिमान् शत्रुभांक्नो कन्येपर चढ़ावे जैसे बडे काळे
सापचे ( शिरपर चढाय ) बहुतसे मेडक मारे ॥ २५१ ॥?
अथ राजन् ! यथा मन्दावेषिण बुद्धिभलेन मण्ड्का नहः
ता तथा मयााप सवप वारण डात । साथ चदसुच्यते-
मो राजन् जैसे मन्दविपने बुद्धिके वळसे मेडक मारे इसीप्रकार मैंने भी सव
चरी ( मारे ) | यह अच्छा कहा है कि-
“बने प्रज्वलितो वद्निर्दहन्सूलानि रक्षति ।
समूलोन्मूलनं कुय्योद्ायुर्यों मुदुशीतलः ॥ २५२ ॥?
* वनमे प्रचलित अमि जळाती हुईमी मूछोंकी रक्षा करतीहे परन्तु जो मृदु
आर शीतळ वायुहे षह जडसेही ( वृक्षादि ) का उन्मूळच करदेतीहे ॥२५ २॥”
मेघवर्ण आह-तात ! सत्यमेवेतत् । थे महात्मानो
भवान्त त मदासच्पा आपदूता आपे प्रारब्ध न त्यजन्ति t
उक्तश्च यतः
मेववर्ण बोडा,-““तात | यह सत्यहै जो महात्मा होतेई वे महाबली आपत्तिको
गरात होकरमो प्रारब्धको नहीं छोडतेदै । कहा है कि-
महरवमेतन्महत्तां नयालङ्रारधारिणामं।
न मुश्चान्ति यदारब्धं कृच्छेऽपि व्यसनोदये ॥ २५३॥
नीतिका भूषण धारणकरनेवाळे महात्माओंका यही महत्वहैं जो अति कष्ट-
छौ विपतर्मे भी आरम्मको नहीं त्यागते हैं॥ २५३ ॥
(३९०) पञ्चतन्त्रम् !
तथाच
आर दाल
आरभ्यते न खलु विघ्नभयेन नी चेः
भारभ्य विज्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विद्वः सहस्रणुणितेरपि हन्यमानाः
प्रारब्धमुत्तमगुणा न परित्यजन्ति ॥ २५४॥
नीचपुरुष व्यसनोके भयले कार्येको प्रारम्म नहीं करते, मध्यम पुरुष कार्यको
प्रारम्मकर विश्नके आनेपर भयभीत होके वीचमें कायको त्याग देतहैं, सहसवि-
भोसे हन्यमान होकर मी उत्तमगुणवाले प्रारम्भ किये कार्यको नहीं त्याते हैं ६४
तत् कृतं निष्कण्टकं मम राज्यं शत्वन् निःशेषतां नयता
त्वया, अथवा युक्तमेतत् नयवेदिनाम्। उक्तश्च यतः-
_ सो मेरा राज्य तुमने शत्रुको निश््शेषकर निष्कंटक कर दिया अथवा चीति-
वालोंको यह युक्त हीहे । कारण कहाहे कि-
ऋणशेषं चाञ्निशेषं श्ुशेषं तयव च ।
व्याधिशेषं च निःशेषं कृत्वा आज्ञो न सीदाति ॥२५५॥
ऋणका रष, आज्ञा राणे, राजका शष तथा रागका रोष [चइशषकरके
बुद्विमान् फिर कष्टको प्राप्त नहीं होता ॥ २५५ ||
सोऽत्रवीत्+-' देव ! भाग्यवान् त्वमेवासि यस्य आरब्ध
सवेमेव संसिध्यति, तत्र केवलं शाय्ये इत्यं न साधयाते,
किन्त अज्ञया यत् क्रियते तदेव विजयाय भवति । उक्तत्व-
बह् (मंत्री) बोढा,- “देव ! आपही भाग्यवानूहा ।अनव सव भारम्स सिद्ध
होतेहे सो केवळ झूरताही कृत्यताधन करतीहे सो नहीं, किन्तु बुद्धि जा किया
जाता हूं वह विजयक्र [चीमतं हॉताह । कहा € प~
शख्रेहता न हि इता रिपवो भवंति
मज्ञाहतास्तु रिपवः सुहता भवन्ति ।
शस्त्रं निहन्ति -पुरुषस्य शरारमेकं. -
प्रज्ञा कुलश्च विभवश्च यशश्च हन्ति ॥ २५३ ॥
x
yes
भाषाटीकासमेतम्। (३९१-)
प्र ~ ee त्य च्छु त् ७
शात्नते मारेहुए भी शत्रु नहीं मरते घुद्धिसे मारे इए शत्रु अच्छत्तिरह मरते
शज््र पुरुषके एकही शरीरको मारताहे, वुद्धि कुळ, ऐेखये और यशका नाश!
' करती है ॥ २५६ ॥
तदेवं प्रज्ञापुरुषकाराभ्यां युक्तस्य अयत्नेन काय्येसिद्धयः
सम्भवन्ति ।
सो वुद्धि और पराक्रमसे युक्त पुरुषकी बिनाही यत्नके कार्यासेद्धि होतीहे--
प्रसराते मातिः कार्य्यारम्भे हटीभवति स्मृतिः
स्वयझुपनयन्नर्थान्मन्त्रो न गच्छाति विष्ुवम् ।
स्फुरति सफलस्तर्केश्चित्तं समुन्नतिमश्चुते
भवति च रतिः श्लाघ्ये कृत्ये नरस्य भविष्यतः ॥२५शा
शुभ होनेवाले ममुष्पके कार्य प्रारम्भ करनेको बुद्धि दढ होती है और स्वये कृत्य
चस्तुओंको प्रगट करता हुआ मत्र विपरीतताको प्राप्त नहीं होता, विचार सफळ
होता स्फुरायमाव होता हे, चित्त उत्साहको प्राप्त होता है और प्रशसनीय-कार्यमे
अनुराग होता है ॥ २५७ ॥
ताच -
और देखो-
>
ह
नयत्यागशोय्यसम्पन्ने पुरुषे राज्यमिति । उक्तश्च-
नय, त्याग भोर झूरता सम्पन्न पुरेषमेही राज्य होता है । कहा हे-
त्यागिनि शूरे विडषि च संसमेरुचिजनो शुणी भवति।
गुणवति धनं धनाच्छ्रीः श्रीमत्याज्ञा ततो राज्यम॥२५८'
त्याग युक्त शूर और पडितजनकी सगातिमें राचि करनेवाळा पुरुष गुणी होता
। गुणवाळेमें धन, धनसे लक्ष्मी, लक्ष्मीवालेमे आज्ञा, आज्ञावाळे जनमे राज्य
स्थित रहता दै ( आर्या वृत्त ) ॥ २५८ ||?
Ei
मेघवर्ण आह,-बून॑ सद्यःफलानि नीतिशाख्राणि थत्
त्वया अलुकृत्येन अतुम्राचिश्य अरिमदनः सपारिजनो निःशे-
षितः’? । स्थिरजीवी आइ, -
~ 0 र, 4 he TT, न NS 0७
मघवण बाढा)-- सतुका अवश्यहा नाइशाल्न शांप्रफलवाछ हुं, (जनक मत-
ची तुमने उनके अन्तरे प्रवेश कर पारवारसहित आरमंदेनको निशेष करदिया??
स्थिरजीवी बोळा- -
( २९२) पञ्चतन्त्रम् ।
“दीक्ष्णोषायप्रातिगम्घो5पि यो$थॅ-
स्तस्याप्यादी संश्रयः साधुयुक्तः ।
उत्तुडमः सारभूलो वनानां
मान्याभ्यच्येश्छिद्यते पादपेन्द्रः ॥ २५९ ॥
“जो वस्तु तीक्ष्ण उपायसे प्राप्ति होनेके योग्य हे उसके पहळेभी श्रेष्ठता युक्त
संश्रय करना चाहिये, अति उन्नत अग्रमागवाला वनोमे श्रेष्ठ इक्ष सत्कारसे पूजित
हुमा छदित होताहे ( बनस्पति छेदनमें पहले उसका सम्मान होताहै इसी प्रकार
पहले शत्रुसे सान्ना पीछे उसमें प्रवेश करे यह भावहे) ॥ २५९ |
अथवा स्वामिन्! कि तेन अभिहितेन यत् अनन्तरकाले
क्रियारहितिमसुखसाध्यं वा भवति । साधु चेदसुच्यते ।
अथवा स्वामिन् उस कथनसे क्या हे जो समयके अनन्तर क्रियारहित वा
ससुख साध्य होजावे । यह अच्छा कहाहै-
अनिश्चितेरध्यवसायभीरुभिः
पदे पदे दोषशतानुदाशिभिः
फलावसवादसुपागता एगरः
मयान्ति लोके परिहासवस्तुताम् ॥ २६० ॥
अनिश्चित उद्योगले डरे इए तथा पदपदमें सेकडो दोषके दिखानेवाले फर्छोसे
विपर्रातताको प्राप्त हुई वाणी लोकमें परिहासके स्थानको प्राप्त होतीहे ( विफल
चागाडम्यरसे केवळ अपनी छघुता प्रकाश होती दे वंशस्थ वृत्त) ॥ २६० |
न च लघुषु अपि कत्तव्येषु घीभाद्विः अनादरः काय्ययतः-
लघुकर्तेब्य्मे भी बुद्धिमानको भनादर करना न चाहिये । जिससे-
शक्ष्यामि कठुमिदमह्पमयत्नसाध्य-
माद्रः क दांत कत्यमुपक्षमाणा;
काचत्म्रमत्तमनसः पारतापड्ःख-
मापत्प्रसंगसुलभं पुरुषाः प्रयान्ति ॥ २६१ ॥
मैं इसके करनेको समर्थे हूं, यह अल्प और बिना यत्नके ही साध्य हे, इस
कार्यमें यत्न करना क्या इस प्रकार कार्यकी उपेक्षा करनेवाले प्रमचचिच पुरुष
सपात्तक आगमम सुळम परितापरूपी दुःखका प्राप्त हात हैं || २६१ ॥
भाषाटीकासमेतम । (३९३)
तदद्य जितारेः महिमोः यथापूर्व लिद्रालाभों माविष्याति।
उच्यते चेतद-
सो आज शत्रुके जीतनेवाळे मेरे प्रभुको प्रवैकी समान निद्राकी प्राप्ति होगी !
कहा है कि-
निःसपे वद्धे वा भवने सुप्यते सुखम् ।
सदा दृष्टशुअंगे ठ निद्रा इःखेन लभ्यते ॥ २६२ ॥
सपेहीन वा सर्पके पकडे जानेपर घरें निइ्क सोया जाता हे जहा सदा
सर्प दीले वहा दुःखले निद्रा प्राप्त होती हे । २६२ ॥
“ तथाच-
और देखो-
विस्ती ्णव्ययसायसाध्यमहतां स्तिग्धोपश्ुक्ताशिषां
कार्याणा नयसाइसोन्रतिमतामिच्छापदारोहिणाम्।
मानोस्लेकपराक्रमव्यसानिनः पारं न यावद्वताः
सामर्ष हृदयेऽवकाशविषया तावत्कथं निरतिः ॥ २६३ ॥
बडे मानसे उन्नत पराक्रम आसक्त मनुष्य जवतक बंडे उद्योगसे साध्य
हान् लिग्धोंके आशीवीद युक्त बधुओंसे चिन्तित नीति साहस उन्नतिबाळे
अभीष्ट पदपर आरोहण करनेवाले कायोंको करनेबाळे जबतक अभिलषित कार्यके
पार नहीं गये हे तवतक कोधवाळे हृदयर्मे सुख किस प्रकार ठहर सक्ताहे २६३
तदवासिनकार्य्यारम्भस्य विश्राम्यतीव ने हृदयम् । तादि-
दमुना निहतकण्टकं राज्यं जापालनतत्परो भूत्वा पुत्रपो-
चादिकमेण अचळच्छतासनश्रीः चिर सुडूकूव, अपि च,-
सो आरम किये कार्यको एराकिया जिसने ऐसे मेरा हृदय विश्रामको प्राप्त
होताहे सो यह अत्र तिष्कटक प्रजापाळनमें तत्पर होकर पुत्र पोत्रादिके कमसे
अचल छत्र आसन ब्धूमी चिरकाळ तक भोंगो। औरमी- : 7
प्रजा न रखयेद्यस्तु राजा रक्षादिमिर्गुणेः ।
अजागलस्तनस्येव तस्य राज्यं निरथेकम् ॥ २६४॥
जो राजा रक्षा आदि गुर्णोसे प्रजाको प्रसन्न नहीं करता है बकरीके गढेके
स्तञ्क्ी समान उसका राज्य निर्थक है || २६४॥
(३९४) पश्चत्तन्नम् ।
गुणेषु रागो व्यसनेष्वनादरो
रतिः सुभृत्येषु च यस्य भूपतेः ।
चिरं स सुङ्क्ते चलचामरांशुकां
सितातपत्राभरणां नृपश्रियम् ॥ २६५ ॥
युणोमे प्रीति व्यसनोंमें अनादर सुमर्त्योमे प्रीति जिस राजाकी होती है महः
चछायमान चेवरही अंशुक ( वन्न ) जिसके खेत छत्रही जिसका आभरण ऐसी'
राज्यलक्ष्मीको चिरकाळतक भोगता है ॥ २६५ ॥
न च त्वया भातराज्याऽहामात मत्वा आमदेन आत्मा
व्षसायतव्यः, यत् कारण चला हि राज्ञा वभूतथः । वंशा-
राहणवत् राज्यलक्ष्माः दराराहा, क्षणावानपातरता, प्रय-
त्नशत्तराप धाय्यभाणा दुधरा, प्रशस्ताराधितापि अन्त
बिमलाम्भना, वानरजातारव पवेद्रतानेकाचत्ता, पक्मपत्नी
दकभिवाघटितसंश्लेषा, पवनगतिरिव अत्तिचपला, अना-
य्यसङ्गतामिव अस्थिरा, आशीविष इव इरूपचारा, सन्ध्या-
अलेखेव सहूतरागा, जल्बुदबुदाबलाव स्वभावभणरा,
शरित्रकातारव कृतब्रा, स्बपलब्धद्रव्यराशिरिव क्षणदृष्टन
छा । अपिच-
ओर तुम कहो कि मुझे राज्य मिळगया है ऐसा मानकर रक्ष्मीके मदसे'
आत्माको प्रतारण नहीं करना चाहिये । जिस कारणसे कि राजोंके रेखयेः
चळायमान होते हैं। बांसके चढनेकी समान राज्य लक्ष्मीकी प्राप्ति कठिन है।
क्षणमात्र विनाश होनेबाली, सैकड़ों प्रपत्नोति धारण करनेपरभी दुर्धर, भळी
प्रकार भाराधित होनेपरभी अन्ते वंचना करनेवाढी, बानर जातिकी समानः
चपळ अनेक चित्तवाढी, कमलपत्रमें जळकी समान अत्यन्त सम्बन्ध रहित,
पवन गतिकी समान अति चपळ, असाधु संगतिकी समान अस्थिर, सपे विषको
समान दुश्चिकित्स्य, संध्याके मेघकी समान मुहूर्तमानको अनुरागवाढी, जळके
बुढब्नुलांके समूहकी समान स्वमावसे संग होनेवाडी, इङक अग्रमाकी समान
कतव्य, सपमे प्राप्त हुए द्रव्यप्तमूहकी समान देखनेपर क्षणमात्रमें नष्ट होनेवा-
ळी ऐसी राजलक्ष्मी हे । औरमी- ,
भाषाटीकासमेतम्। (३९५)
ba >
यदैव राज्ये क्रियते$मिषेकस्तदेव बुद्धिव्येसनेष योज्या ।
घटा हि राज्ञामभिषेककाले सहाम्भसेवापदमुह्विरन्तिर६६
जिस समय राथ्यर्मे अभिषेक किया उसी समयसे राजाने विपत्तिके विषयमे
वुद्धीको छगा देना चाहिये, राजोंके अभिषकसमयन घट जलोके साथही आप-
त्तिकों निकारते हैं॥ २६६ ॥
न च कश्चित् अनधिगमनीयो नाम अस्ति आपदासुक्तस्व-
आपत्तियोको कोईँभी अगम्य नहीं हे, कहा है कि-
रामस्य व्रजनं बलेनियमनं पाण्डोः सुतानां वनं
वृष्णीनां निर्धनं नलस्य नृपते राज्यात्परिश्रंशनस्।
नाटयाचार्य्यंकमञ्जुनस्य पतनं सञ्चिन्त्य लड्केश्वरे
सै कालवशाज्जनोऽत्र सहते कः कं परित्रायते॥२६७॥
रामचन्द्रको वनगमन, वलिको वधन, पाण्डपुत्रोंको वनवास, यदुबंशियोंका
निधन, राजा चळका राज्यसे भ्रष्ट होना, अर्जुतका ( विराट मवनमें ) नाटयाः
चार्य होना, ( त्रिमुवन विजयी ) रावणका नाश विचार कर यह जन काळबासे
सव कुछ सहते हैं, कोन किसकी रक्षा करता है ( अथोत् कोई नहीं शादूल
घिक्रीडितवृत्त ) | ९६७ |
क्क स दशरथः स्वर्ग भूत्वा महेन्द्रसुहद्गतः
क स जलनिवेवेलां वध्वा तपः सगरस्तथा ।
क स करतळाजातो वेभ्यः क सूय्थतडुमल-
नेतु बळवता कालेनेते प्रबोध्य निमीलिताः ॥ २६८ ॥
जो इन्द्रके सुहू होक्षर स्वरैमे गये वह दशरथ कहा हैं, समुद्रकी वेछाके
नियन्ता राजा सगर कहा हें, वेवराजाके हाथके मथनसे उत्पन हुआ (देखो श्री
मद्भागवत पर हमारा तिळक ) एथुराजा कहा हे, सूर्यका पुत्र मनु कहा है,
भो ! काळने यह सव वली प्रगट कर नष्ट करदिये ॥ २६८॥
मान्धाता छ गतस्त्रिलोकविजयी राजा क सत्यव्रतो
देवानां नृपतिर्गतः क्क नहुषः सच्छास्तरवान् केशवः |
मन्यन्ते सरथाः सकुअरवरा। शक्रासनाध्यासिनः
कालेनेव महात्मना त्वतुकूताः कालेन निर्वासिताः २६९
( ३९६ ) पश्च्तन्नम् ।
त्रिछोकका जीतनेवाढा मान्धाता कहाँ गया १, सत्यन्नत राजा कहां दै?,
देवताओंका राजा नहुप कहां गया १, सत् झाखवान् भगवान् केशव कहां है १,
यह महात्मा जो इन्द्रके सहित एक आसनमें बेव्नेवाछे माने जाते थे, काठने
इनको उत्पन्न किया ओर विध्वंस भी कर दिया || २६९ ॥
अपि च-
ओरमो--
सच नृपतिस्ते सचिवास्ताः भमदार्तानि काननवनानि ।
स चत्ते च ताश्च तानि च कन्तान्तदृष्टानि नष्टानि ॥२७०॥
वह राजा, वह मंत्रा, वे स्री, वे उपवन, वे ( राजा ) वह (संत्री ) वे सव
काने देखकर खाय नष्ट कर दिये | २७० |
एवं मत्तकरिकर्णचश्चलां राञ्यलक्ष्मीमवाप्य न्यायेक-
निष्ठो भूत्वा उपचुङ्कष्व-
इति श्रीविष्णुशर्मेविरचिते पञ्चतन्त्रके काकोळूकीयं नाम
तृतीयं तन्त्रं समाप्तम् ।
इस प्रकार मतवाळे हार्धाके कानकी समान चचछ राज्य ढक्ष्मीको प्राप्त हो.
न्यायकी निष्टामान होकर मोगकरो |
इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतंत्रके पाडितज्बालाप्रसादसिश्रकृतभापारीकायां
काकोळ्कीर्यं नामवृतीर्य तन्तं सम्पूर्णम् ।
७०
अथ लब्धप्रणाशंनाम चतुर्थ तन्त्रम्।
——— RPE
अथ इदमारभ्यते लब्धप्रणाशं नाम चतुर्थ तन्त्रं यस्य
अयमादिमः क्लकः-
अब यह छाव्धप्रणाशनाम ( प्राप्त होकर नष्ट होजाना ) चौथे तन्त्रको
आरम किया जाता है जिसके आदिक यह छोकहै-
समुत्पन्नेषु कार्य्येषु बुद्धियेस्थ न हीयते ।
स एव डुग तराति जलस्थो वानरो यथा ॥ १॥
कार्येके उतपन्न होनेमे जिसकी वुद्धि क्षय नहीं होती हे वह कठिन कार्यको
इस प्रकार तरजाताहे जैसे जळमें स्थित वानर ॥ १ ॥
तद्यथा अतञश्रृयते-
सो यह सुना गयाहै कि-
कथा १.
अस्ति कर्िमिश्रित् समुद्रीपकण्ठे महान् जम्बूपादपः
सदाफलः, तत्र च रक्तसुखो नाम वानरः प्रतिवसति स्म ।
तत्र च तस्य तरोरधः कदाचित् करालमुखो नाम सकः
ससद्रसलिलात निप्क्रम्य जुकोमलवाङ्कासनाथे तीरोपान्ते
न्याविशत्। ततश्च रक्तमुखेन स प्रोक्त+- भो ! भवान् समः
भ्यागतोऽतिथिः । तद्गक्षयतु मया दत्तानि अमृततुल्यानि
जम्बूफलानि. । उक्तश्व--
= किसा सागरक कतार जामुनका दक्ष सदा फरुवाळाइ,वहा रक्तमुखनामवाला
„वानर रहताथा।सां उस-रक्षक, नाच एक समय कराछमुखनामधाला नाका समुद्रक
जल्स निकलकर सुकामळ रतस युक्त उसक तटप "प्रात इभा । तब रक्तमखन
कहा-“मो ! आप "आये. हुए हमारे अतिथिहों । सो खाओ हमारे दिये हुए
अमुतक समान जम्वूफल | कहा हु
-- मियो वाः यादि वा द्वेष्यो मूर्खो वा यदि पण्डितः। .
वेश्वदेवान्तमापन्नः सोऽतिथिः स्वमेसंक्रमः ॥ २ ॥
( ३९८ ) पश्चतन्च्रम् ।
प्रिय बा द्वेपी भूख वा पंडित जो वैश्वदेव वलिके समय प्राप्त हो वह स्वर्ग-
गमन सेतुभूत अतिथि होताहे ॥ २ ॥
न पृच्छेच्छरणं गोत्रं न च विद्यां कुलं न च।
अतिथि वैश्वदेवान्ते आद्वे च मतरबबीत ॥ ३ ॥
वश्वदेवके अन्तमं श्राहममें उपस्थित अतिथिका घर गोत्र विद्या कुछ न पठे,
यह मचुने कहाहै ॥ ३ ॥
दूरमार्भश्रमश्रान्तं वेश्वदेवान्तमागतम् ।
अतिथि पूजधेद्यस्ठु स याति परमां गतिम् ४॥
दूर मार्गके श्रमे प्रापतहुए वैश्वदेवके अन्तर्म आयेहुए अतिथिका जो प्रूजव
करताहे, वह परम गतिको प्रात होताई ४ |
अपूजितोऽतिथियेस्य ग्रहाद्याति विनिश्वतन् ।
गच्छन्ति विमुखास्तस्य पिलुजिः सह देवताः ॥ ५ ॥
जिसके घरसे अप्नजित अतिथि श्वांत छेता हुआ जाताहे, उसके यहांसे
देवता पितरों सहित विमुख होकर चळ जाते है ॥ ५ ॥
एवसुक्ता तस्मे जम्बूफलानि ददो । सोऽपि तानि भक्ष-
यित्वा तेन सह चिरं गोष्ठीछुखमनुभूय भूयोऽपि स्वभवनम-
गात् । एवं नित्यमेव तो वानरनकरो जम्चच्छायास्थितो
विविधशाखगोष्ठया कालं नयन्तो झुखेन तिष्ठतः । सोऽपि
मकरो भक्षितशेषाणि जम्बूफलानि गह गत्वा स्वपल्याः
- प्रयच्छाति । अथ अन्यतमे दिवसे तया स पृष्टः-' “नाथ ! क्क
एवं विधानि अमुतफलानि प्राप्तो षिए। स आइ-- मद्रे! मम
अस्ति परमसुहद रक्तमुखो नाम वानरः स घरीतिपूर्वीमिमानि
फलानि प्रयच्छति’ । अथ तया अभिहितम्-' यः सदा
एव अझूतमाथाणि ईदशानि फलानि भक्षयति तस्य हृदय-
ममृतमयं भविष्यति । तत् यदि मया भार्यया ते प्रयोजन,
ततः तस्य हृदय महा प्रयच्छ, येन तद्भक्ताथित्वा जरामरणरः
हिता त्वया सह भोगान् झुनज्मि”। स आह“ भङ्गे ! मा
मा एवं वढ् । यतः स प्रतिपन्नो$स्मार्क भ्राता, अपरं फलः
भाषाटीकासमेतम् । (३९९)
दाता, ततो व्यारादयिठुं न शक्यते । तत् त्यज एनं
मिथ्याग्रहम् । उक्तश्चः-
ऐप्ता कह उसके निमित्त जम्वूफळ दिये | वह भी उनको भक्षणकर उसके
साथ चिरकाळ गोष्टोुखका अनुभवकर फिर अपने घरको गया । इस प्रकार
नित्यही बह वानर भोर नाका जामनकी छायामें स्थित हुए विविध शात्रकी
गोष्टीसे समय बिताते घुखसे स्थित रहे । बह मकरमी खावेसे बचे हुए जामनके
फरलोंको घर जाकर अपनी ज्लीको देता । तव एक दिन उसने उससे पूछा-
“नाथ ! कहाते यह अमृतमय फल ळातेहो £ ” बह बोळा-" भद्दे ! मेरा एक
- परम मित्र रक्तमुख वानर प्रीतिस इन फर्छोको देताहे । तब उसने कहा जो सदा
ऐसे अमृतमय फळ खाताहे उसका हृदयभी अमृतकी समान होगा । सो यदि
मुझ भायोसे तेरा कुछ प्रयोजन हो तो उसका हृदय छाकर मुझेदे । जिससे
उसे मक्षणकर जरा मरणसे रहित हो तेरे साथ भोग भोगू!” । वह बोला-
“मदे ! ऐसा मत कहो कारण कि वह वुद्धिमान् हमारा जाता तया फळ देनेवा-
डाह वह मारा नहीं जासक्ता सो इस मिथ्या आग्रहको त्यागदो कहा है कि-
एकं प्रसूणते माता दिलीय॑ वाक प्रसूघते ।
वाग्जातमधिकं प्रोचुः सोद्यादपि बन्धुवत् ॥ ६॥ ??
माता एक सोदर उत्पन्न करती है, वाणी दूसरा उत्पन्न करती है, वाणीसे
उत्पन्न हुआ सोंदरसे मी अधिक मित्रझी समान श्रेष्ट होता है ऐसा पडितेंने
कहा है ॥ ६ ॥”
अथ मकरी आह - त्वया कदाचित अपि मम वचनं
अन्यथा कृतस् । तत् नूनं सा वानरी भविष्यति यतः तर्या
अनुरागतः सकलमपि दिनं तत्र गमयसि। तत त्वं ज्ञातो
मया सम्यक् । यतः--
तव मकरी बोळी-“तेने कमी मेरा बचन अन्यथा न किया, सो अवश्यही
बह वानरी होगी । इससे उसके अलुरागसे सम्पूर्णे दिन बहा बिताते हो सो
यह मैले अच्छी प्रकार जान छिया जिससे-
साह्माद वचनं प्रयच्छसि न मे नो वाञ्छितं किश्चन
माथः भोच्छासिषि इतं हुतवहज्वालासमं राजिषु ।
(४००) पञ्चतन्त्रम् ।
कण्ठाळेषपारेम्रहे शिथिलता यन्नादराच्यम्बसे
तत्ते धूर्त! हृदि स्थिता मियतमा काचिन्ममेवापरा आ”
न अच्छी प्रकार मुझसे बोछते हो, न वांडित देते हो, जळती अभिकी-
समान रात्रिम प्रायः श्वास छेते हो, कंठके आलिंगन करनेमें शिथिलता करते
हो, न आदरसे चुम्बन करते हो, इससे हे धूते | मेने जाना कि तुम्होर हृदयम
मरसमान कोई अन्यज्ना है] ७ ॥
सोऽपि पत्नचाः पादोपसंग्रहं कुत्वा अङ्कोपारि निधाय
तस्याः कोपकोटिमापन्नायाः सुदीनसुवाच-
बहू भी ह्लीके चरण पकड़ कर गोदीमें रख गत्यन्त क्रोषको प्राप्त इई छीसे .
दान हा बाठा-
` “माथि ते पादपतिते किङ्करत्वमुपागते ।
त्वं भाणवलछमे कर्मात्कोपने कोपमेष्यसि ॥ < ॥ ”
मुझे तेरे चरणोपर गिरने तथा दोनताको प्राप्त होनेमें भी हे प्राणप्यारी!
है कोपने ! केस कारण तू क्रोध बरती हे ॥ ८ ॥”
सा अपि तद्वचमनमाक्ण्थ अश्रुप्छुतस॒खी तसुवाच-
यह इस वचनको सुनकर आंसुवोसे मुखको मिजोती उससे बोळी-
“सा मनोरथशतेस्तव धूत्त कान्ता
सेव स्थिता मनासि कुत्रिमभावरभ्या ।
अस्माकमस्ति न कथाविदिहावकाश-
स्तस्मात्कृतं चरणपाताविडम्बनाभिंः ॥ ९ ॥
हे घूते | सैंकडो मनोरथोंकेसाथ कपटसे सन हर्ने वाळी वह कान्ता तेरे
मनमें स्थित है । इस हृदयम हमारे निमित्त स्थान नहीं है सो भब चरणपातकी
पविडम्बनासे कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ ९ ॥
अपर सा यदि तव वल्लमा न भवति तत् कि मया भणि-
तेऽपि तां न व्यापादयास १। अथ यादे सवानरस्तत् कः
तेन सह तव स्नेहः ? तत् किंबहुना यादे तस्य हृदयं न भक्ष
यामि, तत् मया; माथोपवेशन कृतं बिद्धि” । एवं तस्याः
निश्चयं 'ज्ञात्वा चिन्ताव्याकुलियहदयः स प्रोवाच-अथवा
साधु इद्मुच्य त-
भाषाटीकासमेतम् । (४०१)
सो यादै वह तुम्हारी प्यारी न होती तो क्यो मेरे निमित्त तुम उसको न मारते!
और जो वह वानर हे तो उसके सहित तेरा स्नेह केसा | सो बहुत कहनेसे
*क्याहै यदि उसका हृदय भक्षण न करूगी तो मेरा मरणक निमित्त कृत सकल
जाने?” । इस प्रकार बह उसके निश्चयकों जान चिन्तासे व्याकुल हृदय हो
बोळा । भधवा अच्छा कहा हे-
“वज्रलेपस्य मूर्खस्य नारीणां कर्कटस्य च ।
एको ग्रहस्तु मीनानां नीलीमयपयोस्तथा ॥ १०॥
“धबज्जळेप ( महा ) मूख, नारी, केकडा, मत्स्य, नीली भोर मद्यप इनका
` एकवारही इढग्रह होता है || १० ॥
तत् कि करोमि ? कथं स मे वध्यो भवाति” इति विचि-
न्त्य वानरपाश्वेमगमत् । वानरोऽपि चिरायान्तं ते सोद्वेग -
मवलोक्य प्रोवाच “मो मित्र ! किमद्य चिरवेलायां समा-
यातोऽलि १ कस्मात् साहादं न आलपासे ? न सुभाषितानि
पठसि (स आह~-*“मिच ! अहं तव भ्रातृजायया निछुर-
तरेर्वाक्येरमिहितः-'* भोः कृतघ्न ! मा मे त्वं स्वसुखं दशय
यतः त्वं प्रतिदिनं मित्रं उपजीवासे न च तस्य पुनः प्रत्युप-
कारं गृहदर्शनमात्रेण अपि करोषि। तत ते प्रायश्चि्तमपिः
नास्ति । उक्तश्व-
सो क्या करू किस प्रकार उसको मारू?” | ऐसा विचार कर घानरके समीप
आया, वानर भी उसे आता देख उद्देगपवक बोछा,-“ मो मित्र !
क्या भाज देरसे आये ? क्यों भानन्दएूर्वक नहीं बोळते हो | कयो नहीं
अच्छ वचन पढते हो १? वह वोडा--““मित्र | में तेरी भामीसे आज निष्ठुर
वचनसे ताडित हुआ हू । उसने कहा है-“भो क्रतघ ! तू मुझे अपना मुख मत
. दिखला जो कि तू प्रतिदिन मित्रोंसे उपर्जावित होताहे परन्तु घर दिखाने मात्रसे
भी उसका प्रत्युपकार नहीं करता हे, सो तेरा प्रायश्चित्त भी नहीं है। कहा है--
अह्मत्रे च सुरापे च चोरे भग्नन्रते शाठे ।
निष्कृतिविहिता सद्भिः कृतन्ने नास्ति निष्कृतिः॥ ११ ॥
२६
(४०२) पञ्चतन्त्रम् ।
्रह्महत्यारा, सुरापी, चोर, ब्रतभगकरनेचाला सत्पुरुपॉंने इनकी निष्कृति कही
है परन्तु कतन्नकषी निष्कृति नहीं है ॥ ११ ॥
तत त्वं मम देवर गृहीत्वा अद्य प्रत्युपकाराध गृहमानय।-
नो चेत् खया सह मे परलोके दर्शनम्? । तत् अहं तया
एवं ओोक्तः तव सकाशमागतः । तत् अद्य तथा सह त्वदर्थे
कलहायत्तो मम इयती बेला विलग्ना। तत् आगच्छ मे गहम्।
तव अआतृषत्नी रचितचठुप्का घभशुणितवस्रमणिमाणिक्यायुः
चिताभरणा द्वारदेशबद्धवन्दनमाला सोत्कण्ठा तिष्ठति” ।
मर्कट आह-““भो मित्र ! सुक्तमभिहितं मद्खातपल्या ।
उक्तश्व-”
सो तू मेरे देवरको ग्रहण कर उसका प्रत्युपकार करनेको घर लेआना । नहीं
तोतेरे साथ मेरा परलोक दर्शन होगा” सो में इस प्रकारस कहा हुआ तुम्हारे
पास आया हूं । सो आज तुम्हारे अर्थ ल्लीके साथ केशा करते हुए मुझे इतनी
द्रेर ढग गई | सो मेरे घरको भाओ | तुम्हारी मागी आंगन सजाये वडे मोल्के
अल्ल मणि माणिक्यसे रचित गहनेवाळे दवारदेश बंधी वंदन माछा किये उत्कं-
ठित स्थित हे”? वानर वोछा- “मो मित्र | तुम्हारी जायाते सत्य कहा हे ।
कहा हे कि-
बर्जयेत्कोलिकाकार मित्रं घाज्ञततरो नरः।
आत्मनः सम्मुखं नित्यं य आकर्षति लोलुपः ॥ १२॥
आति बुद्धिमान् मनुष्य कपट भाकाखाले मित्रको खाग दे जो कपटी मित्र
लोमके कारण नित्य अपने सन्मुख मित्रको खेंचता हे ॥ १२॥
तथाच-
और देखो-
ददाति भ्रतिगहाति गह्यमार्याति प्रच्छति ।
झुङ्क्तें भोजयते चेव षड्विधं भीतिलक्षणम् ॥ १३॥
जो देता, ग्रहण करता, युत्त वात कहता ओर: पूछता, भोजन करता,
भोजन कराता है ये छःप्रकारका प्रातिका उक्षण हे ॥ १३ ॥
परं बर्थ वनचराः, युष्मर्दयश्च जलान्ते गृहं, तत् कथं
भाषाटीकासमेतम् । (४०३)
शक्यते तत्र गन्तुम,तस्मात तामपि मे ब्रातृपत्तीमच आनय
येन प्रणम्य तस्या आशीर्वाद गरहामि । स आह,-भों
मित्र ! अस्ति समुद्रान्तरे सुरम्पे पुलिनभदेशेऽरमदगृहम्।
तत् मम ऽष्ठमारूढः सुखेन अङ्कतभयो गच्छ? । सोऽपि
तच्छ्रुत्वा सानन्दमाह,-* भद्र ! यदि एवं तत कि विलम्ब्यते
त्वर्य्यताम् । एषोऽहं तव पृष्ठमारुढः । तथानुछिति अगाधे
जलधौ गच्छन्तं मकरमालोक्य भयत्रस्तमना वानरः मोवाच-
“ज्ञात! ! शनेः शनेः गम्यताम् । जलकल्लोलेः प्लाब्पते मे
शरीरम तत् आकण्य मकरः चिन्तयामास! “असो अगाधं
जलं पापतो मे वशः सञ्जात।, मतपृष्ठगतः तिलमात्रमापि
न्चलिठुं न शक्गोति। तस्मात् कथयामि अस्य निजामिप्रायं;
येन अभीष्टदेवतास्मरणं करोति’? । आह च,- “मित्र ! त्वं
मथा वधाय समानीतो भाय्यावाकयेन विश्वास्य । तत्
स्मर्य्यतामभीष्टदेवता” । स आह,-“'आतः ! कि मया
तस्याः तवापि च अपकृतं ! थेन मे वधापायः चिन्तितः? ।
मकर आह, “भोः ! तस्थाः लावत् तव हृदयस्थ अप्तुतमय-
'फळरसास्वादनम्ष्टस्य भक्षणे दोहदः सञ्जातः तेन एतदनु-
'छितम्” । भत्युत्पन्नमतिः बानर आइ,- “भद्र ! यदि एवं तत
कि त्वया मम तत्र एव न व्याहतम् | येन स्वहृदयं जम्वूको-
ठरे सदा एव मया सुगुप्तं कृतम । तद् भ्रातूपल्या अर्पया-
मि । स्वया अहं झून्यहइयोऽतर कस्मात् आनीतः १” तदा-
करण्य मकरः सानन्दमाह,-““भद्र ! यदि एवं तदर्षय मे
द्यं येन सा दुष्टपत्नी तद्वक्षयित्वा अनशनाइत्तिष्ठति ।
अह त्वां तमेव जम्ड्रपादपं प्रापयामि?! । एवसुक्ता निवच्ये
जम्बूतलमगात्। वानरोऽपि कथमपि जह्पितविविधघदेवतो-
पचारपूजः तीरमासादितवान्। ततश्च दीघेतरचंक्रमणेन तमेव
जम्द्रपादपमारूदः चिन्तयामास । “अहो | लब्धाः तावत्
बाणाः! अथवा साधु इदसुच्धते-
(४०४) पञ्चतन्त्रम् ।
परन्तु इम वनचर हे और तुम्हारा जलक अन्तम घर है सो में किस प्रकार
चहां जासक्ता हूं । इस कारण उस हमारी मामीको यहीं ढाभो जिससे प्रणाम
कर उसका आशीवोद प्रहण करूं” | वह बोला,-“भो मित्र | समुद्रके भीतर
तटमें मनोहर वालुकामय स्थानमें हमारा घर है। सो मेरी पाठपर चढ सुखसे
निर्भय हो चलो!” | वहमी यह सुन आनन्द्से वोळा,-“मद्र ! यदि ऐसा है
तो देर करनेका क्या काम झीघ्रता करो यह में तुम्हारी पीठपर चढा ” । ऐसा
कहकर जलमें जाते हुए मकरको देख कर भयसे व्याकुल मन हो वानर बोला
“भाई शनेः २ 'चछो । जढकी लहरोंसे मेरा शरीर ढका जाता है!” | यह सुन-
कर मकर विचारने लगा | “यह अगाध जलमे प्राप्तहों मेरे वशीभूत इआ है,
मेरी पाठको प्राप्त हुआ तिळमात्रभी नहीं चळ सकता हे । सो इससे अपना
अभिप्राय कहूं जिससे यह भपने इष्ट देवताका स्मरण करे” । और बोळा भी-
“मित्र ! तुमको में भायोके वाक्यसे विश्वास दिछाकर मारनेक निमित्त छाया
हूं ! सो अपने इष्ट देवताका स्मरण करो!' । वह चोला,- लाता ! क्या मैंने
उसका ओर तुम्हारा अपकार किया ६१ जो मेरे ववका उपाय बिचार किया है”!
सकर बोछा,- मो ! उसको अमृतमय फलके रसाखादसे माठे तुम्हारे हृदय
खानेका गर्भोवस्थाका मनोरथ है तिससे यह अनुष्ठान किया है”” । तत्कालवुद्दि
प्रगटवाळा चावर बोढा,-““'भद्र ! जो ऐसा है तो वहीं तुमने क्यों न मुझसे
कहा । जो कि मैने अपना हृदय जग्वूकी कोटरमें सदाहासे गुप्त कर रक्खा हे!
सो तुम्हारी पत्नीकोही अर्पण करूं | सो तुम मुझ शून्यह्ृदयको यहां क्यों
छाये”” | यह सुनकर मकर भानन्दस वोला,--“भद्र ! जो ऐसा है तो मुझको
अपना हृदय दे जिससे वह दुष्टपत्नी भक्षण करके अनशन ( अभोजन ) से
उठे । मैं तुझे उस जम्बूब॒क्षकों प्रात्त करता हूं” । ऐसा कह छोटकर जामनः
दृक्षके नीचे गया | चानरमो किसी प्रकार विविध देवतोंकी सत्कार पूजाकी
जल्पना कर तटपर आया । फिर बडी कुलांच मारकर उस जामनके पेडपर
चढ़कर विचारने छगा। “अहो ! अब प्राण बचे । अथवा अच्छा कहा है-
न विश्वसेद्विश्वस्ते विश्वस्तेऽपि न विश्वसेत ।
विश्वासाद्गयस्ुतपन्नं मूलान्यपि निक्कन्तति ॥ १४ ॥
. अघिश्वासीका विश्वास न करे और विश्वासीकाभी बिश्वास न करे विश्वाससे
उत्पन्न हुआ भय जडसे नष्ट कर देता है ॥ १४ ॥
आषादीकासमेतम्। (४०५)
तन्मम एतदद्य पुनजन्मदिनामिव सञ्जातम्’! इति चिन्त-
मानं मकर आइ,-*'भो मित्र ! अर्षय तत् हृदयं यथा ते
- श्रातपत्नी भक्षयित्वा अनशनादातिष्ठाति ” । अथ विहस्य
निभत्सयव् बानरः तमाह,- गघेक घिक मूख ! विश्वास
घातक ! किं कस्यचित हृदयद्वयं भवति ?। तदाशु गम्षतां
जम्बूब्रक्षस्प ऊधम्तात, न भूयोऽपि त्वया अत्र आगन्तव्य-
म् । उक्तश्च यतः-
सो आज यह मेरे नये जन्मका दिन हैं” । ऐसा विचार करते मकर उससे
बोला, मो ! मित्र उस हृदयको अर्पण करो जिसे तुम्हारी भाभी भक्षण कर
अनशन ब्रतसे उठे”? । फिर हॅसकर घुडकता हुआ वावर उससे बोळा-“धिकू
धिक् मूर्ख ! विश्वासघातक ! क्या किसीके दो हृदय होते हँ । सो शीघ्र जाभो
जम्बूरक्षक नाच फिर कमा मत आना । कहा हेन
सकृदृष्टक यो मित्र पुनः सन्धाठुमिच्छति ।
स मृत्युप्पगहाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ १५॥”
एक वार दृष्ट हुए मित्रसे जो फिर मिळतेकी इच्छा करता है वह मृत्यु-
कोही ग्रहण करता हे जैसे खिचडी गर्भको ग्रहण कर मुत्युको प्राप्त
होती है ॥ १६ र _
तत् श्रुत्वा मकरः सबिलक्षै चिन्तितवान्, “अहो ! नया
अतिमूटेन किमस्य स्वचित्ताभित्रायो निवेदितः तद्यदि
असो पुनरपि कथञ्चिद्विश्वासं गच्छाति तद्व्योऽपि विश्वासः
यामि” । आह च-““मित्र ! हास्येन मया तेऽभिप्रायो
लब्धः । तस्या न किञ्चित् तब हृदयेन योजनम् । तत्
आगच्छ श्राधुणिकन्यायेन अस्मदशहम । तव भ्रातृपत्नी
सोत्कण्ठा वर्तते? । वानर आहु-*'भो दुष्ट ! गम्यताम्
अधुना नाहमागमिष्यामि । उक्तश्च-
यह सुनकर नाका छजित हो विचारने ढगा-“अहो ! मुझ भति सूखने
वय इसका प्रात आपत चित्तका अभिप्राय कथन कर दिया । सा याद यह
फिर किसी प्रकार विश्वासको प्राप्त हो तो इसको फिर विश्वास प्रात कर
(४०६) पञ्चतन्त्रम् ।
७ ba
और बोढा-“ मित्र ! हास्यसे मेने आपका अभिप्राय जाना । उसको कुछभी
तुम्हारे हृदयसे प्रयोजन नहीं है। सो आभो भतिथिरूपसे हमारे धर चडो ।
तेरी भाभी उत्कंठित है” | वानर बोला-“भो दुष्ट ! अब जाओ में नही:
आऊंगा । कहा हैन
बुखुक्षितः कि न करोति पापं
क्षीणा जना निष्करुणा भवन्ति ।
आख्याहि भद्रे भियदर्शनस्य
न गङ्गदत्तः पुनरेति कूपम् ॥ १६ ॥!?
खा क्या पाप नहीं करता? क्षीण मनुष्य करुणाहीन हो जाते हे, हे भद्दे !
प्रियदर्शनसे कहना गंगदत्त फिर कूपमें नहीं आवेगा ॥ १६ ॥”
मकर आह-“'कथमेंतत् ?? स आह-
मकर बोला-- यह केसी कथा है १? बह बोळा-
कथा २
कस्मिश्चित् कूपे गङ्गदत्तो नाम मण्डकराजः प्रतिवसति
स्म । स कदाचित दायादः उद्देजितोरघट्टघटीमारुहम
निष्क्रान्तः अथ तेन चिन्तितम् ।यत् कथं तेषां दायादानां
मया प्रत्यपकारः कत्तेब्य। । उत्तम्व-
किसी कूपमें गंगदत्त नामक मेडकराजा रहता था, वह कमी हिस्सेदारोसे
उद्घाजत इभा कुएका ढकळाका भाडम्यत कर बाहर नकला । और उसत
विचाराः “इन गोतियोंका . अपकार किस प्रकार करूं। कहा है-
'आषादि येनापकृत येन च हसितं दशासु विषमासु ।
अपकृत्य तयोरुभयोः पुनरपि जातं नरं मन्ये ॥ १७ ॥??
7
जिसने आपत्तिमै अपकार क्रिया और विषम दशमं हैसा उन दोनोके प्रति
फिर भपकार करकेही मनुष्यको उत्पन्न हुआ ऐसा में मानता हूं ॥ १७ ह!
एवं चिन्तयन् बिछे प्रविशन्तं कष्णसपेंमपश्यत्। तं दृष्टा
भूयोऽपि अचिन्तयत् | यत् एने तच कूपे नीखा सकलदा-
यादाना उच्छद करान । उक्त
ऐसा विचार कर बिलम प्रवेश करते काळे सांपको देखा । उसको देखकर
भाषाटीकासमेतम् । (४०७)
फिरभी विचारने छगा कि “इसको उस कूपमें छेजाकर समूर्ण दायादोका नाझ
करूं | कहा हे- `
शञ्ञुभियाजयेच्छडं बलिना बलवत्तरम्।
स्वकार्याय यतो न स्यात्काचित्पीडात्र तत्क्षये ॥ १८॥
शत्रुओंक्षे साथ शत्रुओको मिडावै, बढ्वान्के साथ बढ्वानकों अपने
कार्यके निमित्त छगावे कारण कि, उसके क्षयो फिर कुछ पीडा नहीं होती १८
तथाच-
और देखो-
शञ्कुन्मूलयेत्माज्ञस्तीक्ष्णं तीक्ष्णेन शचुणा ।
व्यथाकरं सुखार्थाय कण्टकेनेव कण्टकम् ॥ १९ ॥ ”
बुद्धिमान् तीक्ष्ण शत्रुको तीक्ष्ण शनये नष्ट करावे ब्यथा करनेबाळा काटा
सुखके निमित्त काटेसेही निकाळा जाता है ॥ १९ |!
एवं स विभाव्य बिलद्वारं गत्वा तमाहूतवान-“एहि !
एहि ! ! प्रियदर्शन | एहि।” तत् श्रुत्वा सपैश्चिन्तयामास ।
“'य एष मां आह्वयति, स स्वजातीयो न भवति यतो नेषा
सर्पबाणी । अम्धेन केनापि सह मम मर्त्यलोके सम्धार्न
नास्ति । तदत्र एव दुर्गे स्थितः तावत् वेञ्चि कोऽयं भवि-
ष्याति । उक्तञ्च--
ऐसा विचार बिके हारे जाकर उसे बुढाता इआ--“आओ | भाओ ! !
प्रिददर्शन ! भाञओ |” तव पुनकर साप बिचारने छगा । “यह मुझे बुढाता
है सो अवऱ्यही मेरी जातीका न होगा । कारण कि यह सकी बाणी नहीं है ।
ओर किसीके साथ मत्मेछोकर्म मेरी मित्रता नहीं है । सो इसी दुमे स्थित हुभा
पहले जानू कि यह कौन होगा । कहा है कि--
यस्य न ज्ञायते शीलं न कुलं न च संश्रयः ।
न तेन सङ्गति कुय्यांदित्युवाच बृहस्पति; ॥ २० ॥
जिसका कुछ शीर और आश्रय न जाना हो उसकी संगति न करे ऐसा
चुहस्पतिजीने कहा है ॥ २० ॥ '
कदाचित् कोऽपि मन्त्रवादी ओषधचतुरों वा मामाहूय
(४०८) पश्चतन्त्रम् ।
बन्धने क्षिपति । अथवा कश्चित् पुरुषो , वेरमाख्रित्य कस्य-
चिद्वक्षणार्थे मामाह्दयति”। आह च- भो; | को भवान्!”
स आह-*'अहं गङ्गदत्तो नाम मण्ड्काधिपातिः त्वत्सकाशे *
मेच्यथमभ्यागतः | तच्छृत्वा सप आह,-' मो | अश्रद्वेघमे
तत् यत् तृणानां वद्धिना सह सङ्गम; । उक्तञ-
कमी कोई सपमत्रम कुशल ओषधीम चतुर मुझे बुळाकर बंधनर्म डालना
चाहता है । अथवा कोई पुरुष वैरकों भाश्चित कर किसीके मक्षणके निमित्त
मुझे घुलाता है” | बोळा मी-'“भो ! आप कोन हैं १” । वह बोछा-'मैं
गंगदत्तनामक मण्डकराजा तुम्हारे पास ।मेत्रता करनेको आयाहू” | यह
सुनकर सप बोलाल ना ! यह श्रद्धाक अवाग्य बचन ह जा तृण भार भागका
समागम होना, कहा है-
यो थस्य जायते वध्यः स स्वमेऽपि कथश्वन ।
न तत्समीपमभ्येति तत्किमेवं भजल्पसि ॥ २१ ॥??
जो जिसका वध्य हो बह स्वप्तमेंभी कमी उसके समीप न जाय, सो तू
ऐसी जल्पना क्यों करता हे | २१ ॥7
गङ्गदत्त आइ- भो; सत्यमेतत् । स्वभाववरी त्वम्
अस्माकम् । परं परपरिभवात् प्राप्तो5६ ते सकाशम् । उक्तश्च-
गगदत बाला- भा ! यह सत्य इ तुम हमार स्वश्नापषिक वरा हा परन्तु
शब्रुओंसे तिरस्कृत होकर भे तुम्हारे पास आया हूं। कहा हेट
सर्वनाशे च सञ्जाते माणानामपि संशये ।
अपि शजं प्रणम्यापि रक्षेआणधनानि च ॥ २२ ॥”
सवंनाश और प्राणसशयक उत्पन हानेम शत्रकोमा प्रणाम कर अपन प्राण
आर घनका रक्षा कर ॥ २२ ॥
सर्प आइ- “कथय कस्मात ते पारेभवः ।” स आह-
*प्दायांदभ्यः! । सोऽपि आह-“क ते आश्रयो वाप्यां कूपे
तडागे ह्रदे वा ?,तत्कथय स्वाश्रयम् ।? तेनोक्तम्- पाषा-
-णचयनिवद्वे कूपे’? । सर्प आह- “अहो !' अपदा वर्ष तन्ना
स्ति तत्र मे प्रवेशः । प्रविष्टस्य च स्थानं नास्ति । यत्र स्थितः
तव दायादान् व्यापादयामे । तट्रम्यताम् । उक्तश्च-
भाषाटीकासमेतम् । (४०९)
सपे बोळा-''कहो किससे तुम्हारा पारेमव हुआ हे”? बह बोला-गोत्रियों-
१ | वह बाढा-“कहा तेरा आश्रय है । वावडी, कुर, तडाग चा हुदम “सां
> अपना आश्रय कहो? षह बोडा-''पत्थरसमूहसे बनेहुए कूपे” । सर्प बोछा-
“मो | हमारे चरण नहीं हें सा हमारा बहा प्रवेश नहीं हो सकता न रहनेका
स्थान है जहा स्थित होकर तुम्हारे दायादोंकों मक्षण करू सो जाञँ।
कहा हे-
यच्छक्यं असितु शस्यं अस्तं पारिणमेच्च यत् ।
हितश्च परिणामे यत्तदाद्यं भूतिमिच्छता ॥ २३ ॥!
जो वस्तु भक्षण करनेको सामर्थ्य हो षह प्रशस्त हे और जो खाकर पाक
होजाय भौर पाकमे हितकारक हो कल्याणका इन्छावाळेकों वह वस्तु खानी
चाहिये [| २२ ॥
गंगदत्त आह-भोः ! समागच्छ त्वं अहं सुखोपायेन तत्र
तव प्रवेशं कारथिष्यामि। तथा तस्य मध्ये जलोपान्ते रम्य-
तरं कोटरं अस्ति । तत्र स्थितः त्वं लीलया दायादान् व्या-
पादथिष्यासि? । तच्छत्वा सपों उघचिन्तयत्। “अहं तावत्
पारणतवया', कदानचत कथाञ्चत् सूपकमक प्रामान ।
तच्ठखावहाो जाचनापायोऽयमनेन कुलांमारण मन दाशतः
तद्गत्वा तान् मण्डूकान् भक्षयामि’? इति । अथवा साधु
इदसुच्यत-
गगदत वोळा-“'भो ! आप आइये में सुख उपायसे बहा तुम्हारा प्रवेश
कराऊगा ] उसके मध्य जळके समीप मनोहर खखोडळ हे । वहा
स्थित होकर तू छीछासे ही दायादोकों भक्षण करना ” | यह सुन सर्प विचा-
रने लगा | “मेरी अवस्था इद्ध होगई है कमी एक चूहा प्राप्त होता हे) सो
सुखदायक जीवनोपाय इस कुळाङ्गारने वर्णन किया है। सो जाकर उन मण्डको”
को भक्षण कड्गा। अथवा अच्छा कहा है-
यो हि माणपरिक्षीणः सहायपरिवजितः
स हि सरवसुखोपायां वृत्तिमारचयेदबुधः ॥ २४ पर) `
जो प्राणोसि परिक्षीण सहायसे रहित हो वह पडित सबै सुखके उपायवाली
वृत्तिकों आचरण करे ॥ २४ ॥?
(४१०) पञ्चतन्त्रम् ।
एवं विचिन्त्य तमाह-'भो मंगदत्त! यदि एवं तदगे भव
येन तत्र गच्छावः” । गंगदत्त आह- भोः प्रियदर्शन ! अहं
त्वां सुखोपायेन तत्र नेष्यामि स्थानश्च दशेयिष्यामि। पर”
त्वया अस्मत्परिजनो रक्षणीयः । केवलं यानहं तव दर्शयि-
ष्यामि ते एव भक्षणीयाः? इति । सर्प आह-“ साम्म्रतं त्वे
में मित्र जातं तन्न भेतव्यम्,तव वचनेन भक्षणीयाः ते दाया-
दाः! एबमुक्ता बिलात् निष्क्रम्य तमालिङ्गच च तेनेव सह
्रस्थितः। अथ कूपमासाद्य अरघट्टघाडिकामार्गेण सर्प; तेन
आत्मना स्वालयं नीतः। ततश्च गद्गदत्तेन ऋष्णसपे कोट `
धत्वा दर्शिताः ते दायादाः । ते च तेन शनेः शनेः भक्षिताः
अथ मण्डूकाभावे सपेंण आमिहितम्-““भद्र ! निःशषिताः
ते रिपषः तत मयच्छ अन्यत् में किजित् भोजनं, यतोऽहं
त्वया अत्र आनीतः”? । गङ्गदत्त आह-* भद्र ! कृतं त्वया
मित्रकृत्यम, तत् साम्प्रतम् अनेन एव घटिकायन्त्रमागण
गम्यताम”इति। सपे आह-*'भो गङ्गदत्त ! न सम्यगभिहितं
त्वया । कथमहं तत्र गच्छामि । मदीयबिलदुगनन्येन
रुद्धे भविष्यति । तस्मात् अत्रस्थस्य मे मण्डकमेकेक
स्ववर्गीयं प्रयच्छ नो चेत् सवानपि भक्षयिष्यामि’ इति ।
तच्छुत्वा गङ्गदत्तो व्याकुलमना व्यचिन्तयत् । “अहो!
किमेतन्मया कृतं सपेमानयत्ता तद्यदि निषेधयिष्यामि तत्स"
वॉनपि भक्षयिष्यति । अथवा युक्तमुच्यते-
ऐसा विचार कर उससे बोडा-“भो ! गंगद यदि ऐसा हो तो आगे हो
जिससे वहां चले” | गंगदत्त बोळा-'"भो ! प्रियदर्शन ! में तुमको सुखके उपा-
यते वहां ले जाऊंगा और स्थान भी दिखाऊंगा । परन्तु हमारे पारेजनोंकी तुमने ,
रक्षा करना | केवळ जिनको मै दिखाऊं उन्हीको खावा” | सर्प बोळा-“'भव '
तू हमारा भित्र हांगया । सा मतडरां तुम्हार बचनस में तुम्हार गातियाका भक्षण
करूंगा”? । ऐसा कह बिळसे भिकल उसका भालिंगन कर उसके संग चळा |
तब कूपको प्राप्त हो ढेंकलीके मार्गसे सरपैको बह स्वर्यं अपने स्थानमें छाया | तव
भाषाटीकासमेतम् । (४१९)
गंगदत्तने काळे सर्पको खखोडळमे धरकर उन दायादोको दिखाया वे उसने
शबैः २ खालिये । तव मण्डूकोंका अमाव देखकर सर्पने कहा-- भद्र ! तुम्हारे
“शत्रु तो निइशोष होगये सो मुझे कुछ और भोजन दो, जो कि तुम मुझे यहा
लाये हो” | गगदत्त बोला-“मित्र | तुमने मित्रका कार्य किया हे। सो अब
इसी ढेकलीके मार्गले जाओ” | सर्प बोछा- भो गगदत्त | तुमने अच्छा नहीं
कहा कैसे में वहां जाऊ | मेरा बिलदुग औरने घेर छिया होगा इस कारण यहीं
स्थित हुए मुझे एक एक मेडक अपने कुटुम्बका दो । नहीं तो सबको खाजा-
ऊगा” यह सुन गगदत्त व्याकुळ मनसे विचारने ळ्या ।“अहो| सर्पको छाकर
ˆ यह मैंने क्या किया । सो यदि निपेध करू तो यह सवहीको खाजादगा |
अथवा युक्त कहा है-
योऽमित्रं कुरूते मित्रं वीयर्धाभ्याधिकमात्मनः ।
स करोति न सन्देहः स्वयं हि विषभक्षणम् ॥ २५ ॥
जो अपने पराक्रमसे भाषिक अमित्रको मित्र करता है इसमें सन्देह नही.
बह स्वयही विष भक्षण करता है ॥ २९ ||
तत् प्रयच्छामि अस्य एकं दिनं प्रतिसुहृदम्। उत्तश्च-
सो प्रतिदिन इसको मै एक एक सुद्दद दू | कहा हे-
सर्वस्वहरणे युक्तं शव ब(द्वेयुता नराः ।
तोषयन्त्यल्पदानेन वाडवं सागरो यथा ॥ २६॥
बुद्धिमान् मचुष्य सर्वेस्च इरण करसेमें युक्त हुए शत्रुको अल्प दानसे'
सन्तुष्ट करे जैसे सागर वडवा अग्निको प्रतिदिन अश््प जल देताहे ॥ २६॥
तथाच
ओर देखो-
यो दुर्षेलोऽणूनपि याच्यमानो
बलीयसा यच्छाति नेव साम्ना ।
यच्छते नेव च दश्यमानं
खारीं स चूर्णस्य एनददाति ॥ २७ ॥
जो दुबेळ प्रवळकी सात्वनापूर्वक याचना करनेपर अव्पभी प्रदान, नहीं
करता हे तथा दर्श्येमानमी नहीं देता है वह डाटनेसे चूर्णे स्थानमै खारी
(४१२) पश्वतन्नम् ।
हि
पारैमाण द्रव्यको किए देता दै ( अर्थात् बळ्वानके थोडा मांगने पर न देनेसे
फिर आविक देवा पडता है ) उपजाति इच || २७ ||
तथाच
और देखो- _
सर्वनाशे ससुत्पत्ने अद्ध त्यजति पाण्डितः ।
अद्भैन कुरते कार्य्य सरवेनाशो हि दुस्तरः ॥ २८ ॥
सवे नाझ उत्पन्न होनेमें पंडित जन आधा त्याग देते हैं और भाषेसे कार्य
करते हैं, सर्व नाश बडा दुस्तर है ॥ २८ ॥
न स्वल्पस्य कृत भार नाशयन्मातमात्नरः
एतदेव हि पाण्डित्यं यत्स्वल्पात्मूरिसक्षणम् ॥ २९॥ ”
बुद्धिमान् मलुष्य थोडेके निमित्त बहुतका नाश न करे यही चतुराई है कि
थोडे देकर बहुतकी रक्षा करनी ॥ २९ |” '
एवं निश्चित्य नित्यमेकेकं आदिशाति । सोऽपि तं भक्ष
'यित्वा तस्य परोक्षेप्थानपि भक्षयति । अथवा साइ
इद्छुच्यल-
“ऐसा विचार कर नित्यही एक एक देने- लगा । वहभी उसे भक्षण कर उसके
पोछेमें भोरोंकोमी भक्षण कर जाता । भथवा यह अच्छा कहा हे-
यथा हि मालिनेवस्रेयत्र ततोपविश्यते ।
एवं चालितवित्तस्तु वित्तशेष॑ न रक्षति ॥ ३० ॥ _
-जेसे परळीत वल्ल पहरे हुए मनुष्य जहां“ तहां बैठ 'जाता है इस प्रकार
प्वेधन होनेपर यह प्राणी शष धनकी भो रक्षा नहीं करता हे ॥ ३० ॥ -
अथ अन्यदिने तेन अपरान् मण्ड्कान् मक्षयित्वा गङ्गदत्तः
सुतो यझुनादत्ता भाक्षतः । त भक्षितं ज्ञात्वा गङ्गदत्तः तार
स्वरेण घिक धिक प्रलापपरः कथाञ्चिदापे न विरराम । ततः
स्वपत्न्या आभनाहतः
तब दूसरे दिन वह ओर मेडकाको भक्षण करके गंगदत्तक पुत्र यघुनादतको
भी भक्षण कर गया उसको खाया हुआ जानकर गंगदत तारस्वरसे अपनेको
"चिकू घिक करता हुआ किचित् काळ भी विशमको प्राप्त न इभा। तव उसका
ज्ञीने कहा-
भावाटीकासमेतम । (४१३)
“कि क्रन्दसि दुराक्रन्द स्वपक्षक्षयकारक ।
स्वपक्षस्य क्षये जाते को नस्त्राता भविष्यति ॥ ३१॥
“हे दुष्ट रोदन करनेवाले ! कयो रोदन करता है, हे अपने पक्षके क्षय करने
वाळे | अपना पक्ष क्षय हानेपर अब कान इमा रक्षा करगा || ३ १ ॥
तत् अद्यापि विचिन्त्यतां आत्मनो गनष्क्रमणमस्य
वधोपायश्च? । अथ गच्छता कालेन सकलमपि कवाळेल
मण्ड्ककुळम् । केवलमेको गङ्गदत्तः तिष्ठाति । ततः भियद्श-
नेन भाणितं ,-“'भो गङ्गदत्त! चुसाक्षितोऽह निःशेषिताः सव
मण्ड्काः । तदीयतां मे किखित् भोजनं यतोऽहं त्वया अन्न
आनीतः! स आइ, मो मित्र ! न त्वया अत्र विषये मया
अवस्थितेन कापि चिन्ता काय्या तत् यादे मां प्रेषयसि
ततोऽन्यकूपस्थान् अपि मण्डूकान् विश्वास्य अत्र आनयामि’?
स आइ- मम तावत त्वं अनक्ष्यो श्रावस्थाने, तत् यदि एवं
करोषि तत् साम्प्रतं पितृस्थाने भवसि, तदेवं क्रियताम् इति।
सोऽपि तत् आकण्ये अरघट्टघाडिकां आश्चित्य विविधदेबतो
पकल्पित्तपूजोपयाचितः तस्मात् कूपात विनिप्कान्तः। प्रिय-
दर्शनोऽपि तदाकांक्षया तत्रस्थः भतीक्षमाणः तिष्ठाते । अथ
चिरात् अनागते गंगदत्ते ्रियदशेनोऽन्यकोटरनिवासिना गो
घामुवाच--“भद्रे ! क्रियतां स्तोकं साहाय्यम् । यतः चिरपरि-
चितःते गड़दत्त; तद्गत्वा तत्सकाशं कुत्राचि्ञलाशये अन्विष्य
मम सन्देशं कथय थेन आगम्यतां एकाकिना अपि भवता
इततर यदि अन्ये मण्डूका न आगच्छन्ति । अहँ त्वय
बिना नात्र वस्तु शक्रोमि । तथा यादे अहं तव विरुद्ध आ.
रामि तत् सुकृतमन्तरं मया विधूतम्’? गोधा अपि तद्वच-
नात् गङ्कदत्तं इृततरमन्विष्य आह-भद्र गङ्गदत्त! स तव
सुहत मियदशेनः तव मार्ग समीक्षमाणः तिष्ठाति । तत् शीध्रं
पगम्यतामिति। अपरञ्च तेन तव विरूपकरणे सुङ्कतमन्तरे
(४१४) पञ्चतन्त्रस् ।
शतम् । तत् निःशड्लेन मनसा समागम्यताम” । तत् आकण्य
गङ्गद्त्त आइ- |
सो अब भी अपने निकळनेका उपाय बिचार करो इसके वधका उपाव भी
विचारों” इत प्रकार समयके बीतते २ वह सम्पूण मण्हूककुळका भक्षण
करगया | केवळ एक गंगदत्त रहगया । तब प्रियदर्शनने कहा-“भो गंग-
दत्त ! में भूखा हूं सम्पूर्ण निशेष होगये । सो मुझे कुछ भोजन दे क्यों कि
तू मुझे यहां छाया है? | बह बोछा-“भो मित्र ! इस विषयमे तुझे मेरे 'रहते
कुछ चिन्ता न करनी चाहिये । सो यदि तुम मुझे भेजो ता और कूपमें स्थित
मेंडकॉको विश्वास देकर यहाँ लाउ? | बह बोळा-“मो ! तू तो भाईके त्या-
नमें होनेते मेरा अमक्ष्य हे | सो यदि ऐसा करेगा तो तू मेरे पिताके स्थानों
होगा । सा ऐसाही करो” वह भी यह सुनकर उस ढेंकलीका आश्रय कर अनेक
देवताओंकी पूजाका संकल्प करके उस कूपसे निकला । प्रियदर्शन भी उसकी
आकांक्षासे वहीं स्थित हो वाट देखता स्थित था । तब बहुत दिनोंतक गग-
दत्तके न आगनेमे प्रियदशेन दूसरी खखोडळमें रहनेवाळी गोधासे बोळा-“मद्रे !
थोडी हमारी सहाय करो | कारण कि तुम गंगदत्तकों बहुत समयसे जानती
हो । सो जा उसके पास उसे किसी सरोबरमे दूंढकर मेरा संदेशा कह तुम
इंकळे ही शीघ्र चले आओ यदि दूसरे मेंडक नहीं आते हैं तो में तुम्हारे बिना
>. aS जा fy ५ = ~ हय ७, he
यहा रहनका समथ नहा हू । आर यदि म तेरे साथ विरुद्ध आचरण करू तो -'
' मैंने इस अन्तर्मे अपने पुण्यका फळ लगा दिया है” । गोधा भी उसके घचन-
से शीघ्र गंगदत्तको ढूंढ कर बोडी-“'मद्र गंगदत्त ! चह तुम्हारा मित्र प्रियदर्शन
तुम्हारी वाट देखता स्थित हे सो शीघ्र आओ । कदाचित शका हो तो तुमसे
विरुद्ध आचरण करनेपर उसने अपना पुण्य बीचमें घर दिया है । सो निरंक
मनसे आओ” | यह छुन गंगदत्त बोळा-
““बुसुक्षितः कि न करोति पापं
क्षीणा नरा निष्करूणां भवन्ति ।
आख्यादि भद्रे, मियदर्शनर्य
|
भाषाटीकासमेतम् | (४१५)
कप
“मूखा क्या पाप नहीं करता है, क्षीण मनुष्य दयारहित होजाते हैं मदे
प्रियद्रीनल कहना में फिर कूपमें नहीं भाऊगा [३२ |?”
>पत्रमुक्ता स तां विसजयामास।
यह कह उसने उसको बिदा करदिया । -
तत भो इष्ट जरूचर ! अहमपि गंगदत्त इव त्वद्गृहे न
कथाञ्चित अपि यास्यामि’? । तत श्रत्वा मकर आहइ“-भो
मित्र ! न एतद् युज्यते । सवथा एव मे कृतन्रतादोषं अप-
नय मद्शहागमनेन। अथवा अत्र अहं अनशनात् प्राणत्याग
तव उपरि करिप्यामि? । वानर आह-“'मूठ ! कि अहं
लम्बरकणों मूर्खो ृष्टापायोऽपि स्वयमेव तन्न गत्वा आत्मानं
व्यापादयामि ।
सो हे दृ जलचर ! मेंभी तेरे घर गगदत्तकी समान किसी प्रकार नहीं
जाऊगा” | यह घुनकर मकर बोळा-''मो मित्र | सर्वधा तुमको यह युक्त
नहीं हे मेरे कृतव्नता दोषको मेरे घर चळ कर दूरकरो | अथवा में यहा छघनकर
तुम्हारे ऊपर प्राण त्यागन करूगा” बाबर वोळा-“मूर्ख । क्या में छम्त्रकणे
सूखे हू जो अपाय ( आपत्ति ) देखकर भी खय वहा जाकर अपनेको नष्ट करू '
आगतश्च गतश्चैव दृष्टा सिहपराक्रमम् ।
अकणहदयों मूर्खो यो गत्वा पुनरागतः ॥ ३३॥??
- जो आकर सिंहके पराकमको दखकर भाग गया और क्णेहृदयरहित होनेके
कारण बह मूर्ख फिरसी आगया ॥ ३३ |!”
मकर आइ,- “भद्र ! स को लम्बकणः १ कथं दष्टापायो-
ऽपि मृत; ? तत मे निवेद्यताम्” ! वानर आह- -
मकर वोला,-'मद्र वह छम्बकर्ण कोनेहे £ किस प्रकार आपत्ति देखकर
मो वह्या जाकर मृत हुआ ? । सो सुझते कहो” । वातर बोडा-
कथा ३.
बट हळ क. 3. क क क ed
कस्मिश्चित् बनोदैशे करालकेशरो नाम सिहः प्रति-
वसति स्म । तस्य च धूसरको नाम शृगालः सदा एव अलुः
(४१६) पञ्चतन्त्रम् ।
यायी परिचारको5स्ति । अथ कदाचित् तस्थ हस्तिना सह
युद्धयमानस्य शरीरे गुरुतराः प्रहारा; सञ्चाता येः पदमेकमपि
चालिहुं न शक्कोति तस्य अचलनात् च धूसरकः शुतक्षामक-
ण्ठो दोबेल्यं गतः । अन्यस्मिन् अहनि तं अवोचत् - स्वामिः
नू! बुझुक्षया पीडितोऽह पदात पदमपि चलितुं न शक्नोमि
तत्कथं ते शुश्रषां करोमि” । सिंह आह-“भो ! गच्छ अन्वेः
षय किश्चत् सत्वं येन इमां अवस्थां गतोऽपि व्यापादयामि’
तदाकण्ये श्गालोऽन्वेषयव कश्चित्समीपवत्तिनं ग्रामं आसा-
दित्वात् । तत्र लम्बकर्णो नाम गदभः तडागोपान्ते प्रविरल-
दू्बोकुरान् कृच्छादास्वादयन् इष्टः । ततश्च समीपवत्तिना
भूत्बा तेन अभिहितः- 'माभ!नमर्कारोऽयं मदीयः सम्भा-
व्यता चिरात् दष्टोऽसितत कथय तत् किमेवं इवलतां गतः!”
स आइ,- भो ममिनीपुत्र कि कथयामि,रजकोऽलिनिदयो-
ऽतिमारेण मां पीडयति,घासमुष्टिमपि न प्रमच्छाति केबलं दू-
वाँकुरान् घूलिमिश्रितान् भक्षयामि।तत्कुतो मे शरीरे पुष्टि!!!
शृगाल आइ- माम ! यदि एवं तदस्ति मरकतसदृशशष्पः
आयो नदीसनाथो रमणीयतर? प्रदेशः। तत्र आगत्य मया सह
सुभाषितगोष्ठीलुखमतभवन् तिष्ठ । लम्बकर्ण आह भो
भगिनीसुत ! युक्तमुक्तं भवता परं वयं ग्राम्याः पशवोऽरण्यः
चारिणां बध्यास्तत् कि तेन भव्यप्रदेशेन ” श्रगाल आह-
“माम ! मेवं वद, मद्भुजपञ्नरपरिरक्षितः स देशः ! तन्नास्ति
कस्याचित् अपरस्य तत्न प्रवेशः । परमनेन एब दोषेण रजक-
कदर्थिताः तत्र तिस्रो रासभ्योऽनाथाः सन्ति । ताश्च पुष्टिमा
पन्ना योबनोस्कटा इदं मां ऊछु।-यदि त्वं अस्माकं सत्यो
माठुलः तदा किखित् म्रामान्तरं गत्वा अस्मद्योग्यं कञ्चित
पतिमानय' । तदर्थ त्वामहं-तत्र नयामि” । अथ श्रगालवचः
नाति अत्वा कामपीडिताँगः तमवोचत्। “भद्र ! यदि एवं
तदग्रे भव, येन आगच्छामि । अथवा साधु इदसच्यते-
भाषारीकासमेतम्। (४१७)
किसी स्थानमै करालकेशर ( कठिन गर्देनके बाळवाळा ) नामक सिंह रहता
या. उसका डूतरक नान खगाछ सदा अनुगा परिचारक था | एक समय
हार्थाके साथ युद्ध करते उसके झरीरमे कठिन प्रहार पडगयेथ जिनसे एक
पगभी चळनेको समर्थ नहीं था | उसके असमथ होनेसे वह घूसरक मी भूखते
व्याकुङकण्ठ दुर्बेळताको प्राप्त होगया और किसी दिन उससे बोळा-“'स्थामिन्!
में यूखसे व्याकुळ हो एक पगमी नहीं चछ सकता । सो किस प्रकार तुम्हारी
श॒ुक्षणा करूए! सिंह बोछा-“भो | जाकर कोई जीत दूढ जिससे इस अवस्थाको
प्रात हुआ भी उसे मारू! । यह सुन श्वगा खोज कती किसी समीपवर्ती
ग्रामे प्राप्त हुभा । वह ठम्बकर्णे नामबाछा गधा सरोवरके समपि छम्बायमान
दुर्वादलके अकुरोंकू कच्छू ( कष्ट ) से खाता हुआ देखा | तब सर्मापवर्ती होकर
उसने कहा-“मामा ! हमारा नमस्कार ग्रहण करो, बहुत दिनॉसे देखा हे कहो
क्यो ऐसे दुब हो रहे हो ?' बह वोछा “सो मान्ने ! क्या कहू यह निदेयी
धोबी अति वोझसे मुझको पाडा देताहे मुठ्ठीभर घासभी नही देता । केवळ
बूरिमिळे दूर्वाडूर भक्षण करता हू तो कहासे मेरे शरारमे पुष्टि होगी? । श्वगाङ
बोछा-“जो ऐसा है तो मरकतमणिकी समान शष्प ( घास ) वाढा नदाके
किनारे मनोहर स्थान हे। बहा आकर मेरे साथ सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुमवकर
स्थिति हो” | रूम्बफर्ण बोडा,- 'मो भानजे ! ठीक कहा - तुमने । परन्तु हमः
ग्राम्य पशु वनचारियोके वध्य हैं सो उस मनोहर स्थानसे क्या है ” शृगाछ
बोळा--“'मामा | ऐसा मत कहो वह देश मरे भुजपजरसे रक्षित है । सो
वहा किसी औरका प्रवेश नहीं हे किन्तु इसी दोषते रजकसे छेशित हुई तीन
गधी अनाया वहा भोर भी हैं । वे पुष्टिको प्राप्त हुईं जवानीते उत्कट मुझसे
यो बोलीं -“जो तू हमारा सत्य मामा है तो-किसी ग्रामान्तरमें जाकर हमारे `
योग्य किसी स्वामीको छाओ” । उस कारण में तुमको बहा किये जाता हु । -
[-तब श्रृगाळके वचन सुन कामसे पीडित अग हो उससे बोछा-भद्द | जो
ऐसा हे तो आगे हो जिससे में बहा पहचु | अथवा अच्छा कहा दे-
नामृतं न विषं किश्चिदेकां सुक्ता नित्तम्बिनीम् ।
यस्याः सङ्गेत जीव्येत म्रियेत च बियोगतः ॥ ३४॥
२७
(४१८) पञ्चतन्त्रस् ।
एक ल्लोको छोडकर कोई वस्तु अमृत ओर विप नहीं है जिसके संगसे
प्राणी जाता और वियोगसे मरता हे || १४ |
-तथाच-
और देखो-
यासां नास्नापि कामः स्पात्सङ्गम॑ दर्शनं दिना ।
तासां दृकसङ्गमं प्राप्य यन्न द्रवति कोतुकम् ॥ ३५ ॥ ४
जिसका संगम व दर्शन तो दूर रहो बाम सात्रसेही कामके उद्रेक होता है
उस खरीजनके दृष्टिको प्राप्त हो जो द्रवे बह आश्चर्ये है ॥ ३५ || ”
तथातुठिते शृगालेन सह सिंहान्तिकमागतः । सिंहोऽपि
व्यथाकुलितस्त ष्ट्रा यावत् सम्तत्तिन््ठाति तावत् रासभः
पलायिछुं आरब्धवान् । अथ तस्य पलायमानस्य सिंहेन
तलप्रहारो दत्तः। स च मन्दभाग्यस्य व्यवसाय इव व्यर्थतां
गतः ! अचान्तरे झुगालः कोपाविष्टस्तछ्ुवाच-''भोः ! कि
एवंविधः प्रहारस्ते यद्गदैभोऽपि तब पुरतो बलाद्गच्छति ।
तत्कथं गजेन सह युद्धं करिप्यसि १ तद् हृष्टं ते बलम्? अथ
बिळक्षस्मितं सिंह आह-भो? ! किमहं करोमि। मया न
कमः सम्जीकृत आसीत् । अन्यथा गजोऽपि मत्क्रमाकान्तों
न गच्छति” शृगाल आइ- “अद्यापि एकवारं तवान्तिके
तमानेप्यामि। परं त्वया सञज्ीक्कतक्रमेण स्थातव्यम्’ ।
सिंह आइ- भद्र ! यो मां प्रत्यक्ष दृष्टा गतः स पुनः कथः
मत्र आगमिष्धाते । तदन्यत् किमपि सत्त्वमन्विष्यताम |
अुगाल आइ- “कि तव अनेन व्यापारेण त्वं केवलं सजित-
ऋमः तिष्ठ”) । तथा अठुष्ठिते शृगालोऽपि यावत् रासभः
मार्मेण गच्छति तावत तत्रैव स्थाने चरन रष्टः । अथ शृगालं
दृष्टा रासमा भाह- भो भगिनीछुत | शोभनस्थाने त्वया
अहं नीतः, द्राक मृत्युवशं गतः तत्कथय कि तत्सत्वम् ?
यस्य अतिरोद्रवजसदशकरमहारात् अहं सुक्तः ” । तत
शरुत्वा ्रहसन् शृगाल आइ- “भद्र ! रासभी त्वां आयान्तं
भाषाटीकासमेतम्। (४१९)
दृष्टा सावुरागं आलिंगथिठुं समुत्यिता-। त्व॑ च कातरत्वात
नष्टः सा एुनन शक्ता त्वा विना स्थातुमातया तु नश्यत ते$-
बलम्वनाथ हस्तः क्षती न अन्यकारणन, तत आगच्छ, सा
त्वत्कृते पायोप्देशना डपावष्टा गीतात । एतत् बदाति-* 'यत्
लम्बकर्णो यदि मे भत्ता न भवति, तत् अहमग्ना जले वा
आवचशाम, पुनस्तस्य वयाग साहु न शक्नान”! तत्मसाद्ं
कुत्वा तत्र आगम्यत्तामात्त। ना चत् तव स्त्राहत्या भाव"
ष्याते । अपर भगवान् कामः काप तव डपार करिष्यति |
उक्तश्व-
ऐसा करनेपर शुगालके साथ सिंहक्के समीप आया | सिह भी व्याकुळ हों
उसे देख जबतक उठता हे कि तबतक गधा भागने रूगा । तब उस भागते
हुएके सिहने पजेका प्रहार किया वह मन्दभागीके उद्यमकी समान व्यर्थ होगया]
इसी समय झुगाछ क्रोधित हो उससे बोछा- भो ! क्या आपका ऐसा प्रहार
हे, जो गधा भी तुम्हारे आगेसे बढपूर्घक जाता है । सो हाथीके साथ कैसे
युद्ध करोगे * सो देखलिया तुम्हारा वछ” | तब छन्त हो सिह बोला,--- भि
क्या करू पहलेसे तयार नया) नहीं तो हायीमी मेरे पराक्रमसे न जाने पाता?
गाळ बोछा- अब भी एक वार उसे तुम्हारे पास लाऊंगा परन्तु तुम तयार
रहना” ] सिंह बोळा-““भद्र जो मुझे प्रत्यक्ष देखकर गया हे वह फिर किस
प्रकार यहा आवेगा । सो भर किसी जीवकी खोज करो” | झगाळ बोछा-
“तुम्हें इस वातसे क्या, तुभ केवळ तयार रहो” ऐसा कहकर शूगाळभी जबतक
गधेके मासे जाने लगा | तब उसी स्थानमे उसे चरते देखा | तब छगाल्को
देखकर गधा बोला-“'भो भगिनीपुत्र | अच्छे स्थानमे मुझे छेगये एक साथही
मृत्युको प्रात किया था । सो कह वह कोनसा जाब हे १ जिसके अति कठिन
_ बजकी समान प्रहारसे में छुटा ह” । यह सुन हसता हुआ दुगाळ बोळा-“'मद्र |
बह गधी तुझे आया हुआ देख अनुरागसे आछिंगन करनेको उठी थी । चू
कातरतासे भाग गया अव बह तेरे विना स्थित होनेको समर्थे न हुईं । उपने
भागते हुए तुझे पकडनेको हाथ फैलाया था और कारणसे नहीं सो आओ। घह
x
तेरे बिना मरणके निमित्त पेढी है। और यों कहती हे “जो ख्म्रक्र्ण मेरा
(४२० ) पञ्चतन्त्रम् ।
स्वामी न होगा तौ मैं असि वा जळमें प्रवेश करजाऊंगो । कारण कि उसका
वियोग सहनेको में समर्थ नहीं हु”? । सो कृपाकर बहांको आओ। नहीं तौ तुम्हे
खीहत्या होगी और भगवान् कामदेव तुमपर क्रोध करेंगे । कहा हे-
ख्रीसुद्रो मकरध्वजस्य जयिनी सवार्थसम्पत्करी
ये मूढाः प्रविहाय यान्ति कुधियो मिथ्याफलान्वेषिणः ।
ते तेनेव निहत्य निर्देयतर नश्नीकृता सुण्डिताः
केचिद्रक्तपटीकृताश्च जटिलाः कापालिकाश्चापरे ॥३६ा”
जो दुबुद्धि पुरुष कामके जीतनेवार्डी ध्वजा सव अर्थ और सम्पत्ति करनेवा-
लीको छोडकर मिथ्या फळ तपश्चर्या आदि करते हैं । वे उस कामनेही निष्ठुर-
तासे उन्हे मारकर कोई नंगे, कोई सुडित, कोई लाळवल्नपाठे, कोई जटाधारी,
कोई कपाली करदिये हैं ॥ ३६ |”
अथ असो तद्वचनं श्रद्वेयलया दुत्वा भूयोऽपि लेन सह
प्रस्थितः | अथवा साधु इदसुच्यते-
बं यह उसके वचनका श्रद्धा सुनकर ।फर भा उसके संग गया, अथवा
अच्छा कहा हे
जानन्नपि नरो देवात्मकरोति विगहितम् ।
कमे कि कस्यचिल्लोके गदितं रोचते कथम् ॥ ३७॥
मनुष्य जानकरभी प्रारब्धसे निन्दित कम करता हे नहीं तो संसारे निन्दित
कम किसको अच्छा लगता है ॥ ३७ ॥
अत्रान्तरे सज्तितक्रमेण सिंहेन स लम्बकणों व्यापा-
दितः । ततस्तं हत्वा श्रगालं रक्षकं निरूप्य स्वयं खानाथ
नद्यां गतः | श्रगालेनापि लोल्योत्सुक्यात् तस्य कर्णहृदयं
भक्षितम् । अत्रान्तरे सिंहो यावत स्नात्वा कृतदेवार्चनः
अतर्षितापितुगणः समायाति तावत् कर्णहदुयरादितों रासभः
"तिष्ठति । तं दृष्टा कोपपरीतात्मा सिंह शृगालं आइ-
«प्याप | किमिदमलुचितं कनं समाचरितम्। यत् कणेहद्य-
भक्षणेन अयसन्छिषए्टतां नीलः”? । श्रृगालः सबिनयमाह-
“स्वामिन्! मा मा एवं वद्! यत्कणहृदयराहितोऽयं रासभः
आषाटीकासमेतम्। (४२१)
आसीत् येन इह आगत्य त्वामवलोकष भूयोऽपि आगतः”? ।
अथ तद्वचनं श्रद्धेयं मत्वा सिंहः तेनेव सह संविभज्य निःश-
-ड्रितमनाः तं भक्षितवान् । अतोऽईं बवीमि-
इसी समय तयार बैठे सिंहने ठम्बकर्णको मारडाळा तव उसे मार उसको
रक्षामे शगालको निरूपण करके सय खान करनेके निमित्त नदीको गया । शुगा-
लतेमी चचळता को और उत्कठासे उसका कान और हृदय भक्षण किया, इसी
समय तिहभी जवतक जान कर देवताचेन करके पितृगणोंको तृत करके आया
तवतक कर्णहृदयसे रहित गईभको देखा । उसे देख धसे सिह झगालसे
चोला-*'पापिप्ठ | क्या यह तेने अनुचित कर्म किया जो कर्ण हृदयको भक्षण-
कर यह झूठा कर दिया” | शृगाल विनयपूर्वक बोछा-' स्वामिन् ऐसा मत कहो!
यह गधा कणे और हृदयसे रहितही था, जिससे यहा आकरभी तुम्हें देखकर
फिरमी आया” । तव उसके वचनको सिंहने श्रद्धाले मानकर उसको बिभाग कर
उसके साथ निःशक होकर भक्षण किया । इससे में कहता हू--
“आगतश्च गलश्चेव रष्टा सिंहपराक्रमम ।
अकर्णहृदयो मूर्खा यो गत्वा पुनरागत्तः ॥ ३८ ॥?'
जो जाकर भार हके पराक्रमको देखकर चछा गया । पस्तु कर्ण भौर
हदय रहित होनेके कारण वह मूख फिर आया ॥ २८ ॥7
तन्मूख ! कपट कृतं त्वया । परं युधिष्ठिरणेव सत्यवचः
नेन विनाशितम् । अथवा साधु इदसच्यते-
सा मूख | तन कपट किया परन्तु युर्थिष्टरिकी समान सत्य बचनले नष्ट कर
दिया । अथवा यह अच्छा कहा है-
स्वाथसुत्सुज्य यो दम्दा सत्घ व्रते सुमन्द्धाः
स स्वाथांद् सश्यते नूनं युधिष्ठिर इवापरः ॥ ३९ ॥??
जा मूहमात पाखण्ड मनुष्प स्वाथकां छोडकर सत्य कहता हे बह युधिष्टि-
रकी समान अवश्य स्वाथेते नष्ट होता हे॥ ३९ ||?
मकर आह-“कथमेतत् ९” स आह-
मकर वोळा-“यह केसी कथा है ?? बह बोछा--
( ४२२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
कथा ४
कस्मिश्चित अधिष्ठाने कुम्भकारः प्रतिवसति स्म।स
कदाचित प्रमादादद्धेभग्रघटकपरतीक्णाग्रस्योपारि महता
वेगेन धावन् पतितः ! ततः कर्परकोस्या पाडितललाटो
रुघिरपाविततनः कृच्छादुत्याय स्वाश्रयं गतः । ततश्च
अपथ्यसेबनात् स पहारस्तस्य करालता गतः कृच्छेण
नीरोग्यतां नीतः । अथ कदचित् इभिक्षषीडिते देशे स
कुम्भकारः क्षुत्तामकण्ठः केश्चित राजसेवकेः सह देशान्तरं
गत्वा कस्यापि राज्ञः सेवको बभूब । सोऽपि राजा तस्य ˆ
ललाटे विकरालं रहारक्षतं इष्ट्रा चिन्तवामास । ““यद्वीरः
पुरुषः कश्चित् अथम् । नूनं तेन लळाउपट्टे सम्मुखमहारः* ।
अतस्तं सम्मानादिनिः सर्वेषां राजपुत्राणां मध्ये विशेषश्न-
सादेन पश्यतिस्म । तेऽपि राजपुत्राः तस्प तं प्रसादातिरेकं.
पश्यन्तः परमेर्ष्याधर्म वहन्तो राजभयात् न किञ्चित् ञखुः ।
अथ अन्यस्मिन्नहनि तस्थ लूपतेः वीरसम्भावनायां क्रियः
माणायां विग्रहे सझुपस्थिते ्रकरपमानेषु गजेषु सन्नह्यमानेघु
वाजिषु योधेषु प्रणणीक्रियमाणेषु तेन भूशुजा स छुम्भकारः
प्रस्तावानुगतं पृष्टो निजने ।' भो राजपुत्र | कि ते नाम ! का
च जातिः ? कस्मिन् संग्रामे महारोपयं ते ललाटे लग्नः । स
आइ- देव ! नायं शस्त्रमहारः । युधिष्ठिराभिधः कुलाः
लोऽहं भक्त्या मद्गहेऽनेककपेराणि आसत् । अथ कदाचित
मद्यपानं कृत्वा निर्मतः प्रधावन् कर्परोपरि पतितः । तस्य
प्रहारविकारोऽयं मे ललाटे एबं विकरालतां गतः” । तदा"
कर्ण्य राजा सत्रीडमाह- “अहो ! बश्चित्तोऽहं राजपुत्रालुका-
रिणा अनेन कुलालेन । तत दीयतां द्राक एतस्थ चन्द्रा
तथानुष्ठिते कुम्भकार आह-- मा मा एवं कुरु । पश्य मे रणे
हस्तलाघबम्'? राजा प्रांह-''भोः सर्वशुणसम्पन्नो भवान् ।
तथापि गम्घताम्। उक्तश्च
माषारीकासमेतम्। (४२३)
किसी एक स्थानमें कुमार रहता था वह कमी प्रमादसे आधे टूटे घडेके
तीक्ष्ण कोरके ऊपर वेगसे घावमान होकर पतित हुआ । तब उप्त ठीकडेकी
> कोरसे माथा फट जानेकै कारण रुधिरसे लिप्त शरीर होकर कठिनतासे उठ अपने.
घरको गया | तत्र अपध्वसेवमसे बह प्रहार उसका अधिक होगया और कठिन-
तासे निरोगताको प्राप्त हुआ । तब एक समय हुभिक्षपे पीडित देशके होनेमें वह
कुंभार भूखसे व्याकुळ कठ किन्ही राजसेवकोके साथ देशान्तरम जाकर किसी
राजाका सेवक हुआ । वह राजाभी उसके माथेम तीक्ष्ण प्रहारका घाब देखकर
दिचारने जगा “यह कोई वीरपुरुप हे । इससे माथेके सामने सन्मुख प्रहार सहन
किया है”! इस कारण उसको सम्मानादिसे सम्पूर्ण राजपुत्रोके मध्य विशेष प्रसन्न
तासे देखता । वेमी राजपुत्र उसकी अविक प्रसन्नताको देखते हुए परम ईषो-
घर्मको बहन करते राजभयते कुछमी न बोळे | तव और दिन उस गीरसभ्राववा
( पररक्षा ) करनेमें विप्र होनेपर हायियाकि कल्पित होनेमे ओर घोडेकि सजित
होनेपर तया योद्धाभोके प्रकृष्ट सजित होनेपर उत राजाने प्रसासे प्राप्त हुए एका-
न्तमें उप्तत पूछा ।--“भो राजपुत्र ! तुम्हार क्या नाम "क्या जाती दै? किस
सग्राममे यह प्रहार तुम्हारे महतको लगा हे २) वह वोळा--''देव ! यह शन्नप्रहार
नहीं ह में युधिष्ठिर नामवाळा कुमार हू । मेरे घरमे अनेक फूटे वर्तन थे, सो
एक समयमै मद्यपान करके निकला दोडता इभा वर्तनोपर गिरा उसके प्रहा-
रका विकार यह मेरे मायेने पिकराळताको प्राप्त हो गया है” । यह छुन राजा
लज्ित हो बोळा-“महो राजपुत्रका अनुसरण करनेवाले इस कुमारने मुझे
ठाळिया, सो अपी गलहस्त देकर उमे निकालदो?” | ऐसा कहनेपर कुभकार
बोडा-- ऐसा मत करो, रणमें मेश हेस्तलाबत्र देखो” | राजा बोडाट “मो !
आप सर्वगुणसपन्न हो तौ मी जाओ । कहा दे-
शुरक्च कृतविद्यश्च दर्शनीयोऽल्लि पुत्रक |
यस्मिन्कुले त्वमृत्पन्नी गजस्तत्र न हन्यते ॥ ४० ॥'?
हे पुत्र | तू शार विद्यावान् भोर दशनीय है परन्तु जिस कुछमे उन इए
हो उसमे हस्ती नहीं मारे जाते ॥ ४० ||
कुलाल आह--''कथमेतत ९ राजा कथयति -
कुछार चोढा--“यह केसी कथा है |'' राजा कहने छगा-
(४२४ ) पश्चतन्त्रम् ।
कथा <.
कसिमिथिढुदेशो लसिहदम्पती प्रतिवसतः स्म, अथ सिंही
पुचद्दयमजीजनत् । सिंहोडवे नित्यमेव झृगान् व्यापाद्य
सिह्ये ददाति, अथ अन्यस्मिन्नहनि तेन किमपि न आसा-
दितम् । वने खमतोऽपि तस्य रविरस्तं गतः |! अथ तेन
स्वगृहं आगच्छता थ्गालशिश्ञु) प्राप्तः । ते च बालकोऽप-
भिति अवधार्य यत्नेन दंष्टामध्यगतं कृत्वा सिंह्या जीवन्त-
मेव समपितवान् । तततः सिह्या अभिहितं-“भोः कान्त !
त्वयानीतं छिश्चित अस्मार्क भोजनम्! सिंह आह-* “मिय!
मया अद्य एनं श्ृगालशिश्ं परित्यज्य न किञ्चित् सत्वमा-
सादितम्। स च बालोऽयमिति मत्वा न व्यापादितो विशे-
षात् स्वजातीयश्च । उक्तश्च
किसी स्थानमें एक शेर शेरनी रहतीथी | उस समय सिहीके दो पुत्र उत्प
इए, तिहभी नित्यही मृर्गोको मारकर सिंहीको देता । तत्र एक दिन उप्त
कुछ नहीं पाया । तब उसको अपने घर आते गीदडका बच्चा मिढा | षह
बाळक हे यह निश्चय करके यत्नत डाढोंके भीतर धारण करके सिद्दीकी जाताही
देता हुआ | तब तिही बोढौं--“मो स्वामिन् | तुम कुछ हमारा भोजन छाये!”।
सिंह बोछा-“ प्रिय | आज इत जूगाळ शिश्षुके सिवाय मुझे और कुछ चहीं
मिला हे । इते भी वाळक समझकर न मारा कारण कि सजातीय है । कहा है--
ख्रीविप्रालिड्िबालेषु प्रहत्तव्यं न कहिचित् ।
प्राणत्यागे5पि सञ्जाते विश्वस्तेषु विशेषतः ॥ ४१ ॥
खरी, ब्राह्मण और बालक इनपर कमा प्रहार नहीं करना चाहिये प्राणत्या-
गमी हो तो भी विशेष कर विश्वासीपर तो प्रहार करेही नहीं ॥ ४१ ॥
इदानीं त्वं एन भक्षयित्वा पथ्यं कुछ । प्रभातेऽन्यत `
किञ्चित् उपाजेयिष्याभि” । सा प्राह-'भो कान्त ! त्वया
बालकोऽयं :विचिन्त्य न हतः । तत कथमेनमहं स्वोदरार्थे
विनाशयामि । उक्तश्च
Ei]
भाषाटीकासमेतम्। (४२५
सो इस समय तू इसको भक्षण करके पथ्य कर प्रात'समय और कुछ
ठपार्जन करूगा?? | वह बोळी- “भो स्त्रामिन् | जब आपने इसे बाळक जान-
जय औक.
का न मारा तौ कैसे इसको में अपने उदरके निमित्त विनाश करू! 'कहाँहे कि-
अकृत्यं नेव कर्तव्यं प्राणत्यागेऽपि संस्थिते ।
न च कृत्य परित्याज्यं धर्म एष सनातनः ॥ ४२॥
प्राणत्याग द्वोनेपरमी अकृत्य नहीं करना चाहिये और कृत्यको छोंडना नहीं
चाहिये यह सनातन धर्म हे ॥ ४२ ॥
तस्मात् मम अयं तृतीयः पुत्रों भविष्यति’ । इत्येवखुक्का
तमपि स्वस्तनक्षीरेण परां पुष्टिमनयत् । एवं ते त्रयोऽपि
शिशवः परस्परमज्ञातजातिविशेषा एकाचारविहारा बाल्य
समय ग॥नवाहथान्त । अथ कदाचत् तत्र वन भ्रमत
अरण्यगजः समायातः । तं इष्टा तौ सिंहसुतो डो
अपि कुपिताननो तं प्रति प्रचलितो यावत लावत तेन
श्रृगालसुतेन अभिहितम्, अहो ! गजोऽयं ग्रुप्मत
कुलशच्ु, तन्न गन्तव्यमतस्य अभिमुखम्? । एवझुक्ता ग॒हं
प्रधावितः । तो अपि ज्येष्ठबान्धबमंगात्निरुव्साहतां गती
अथवा साधु इदसच्यते-
इसे मेरा यह तीसरा पुत्र होगा”? । ऐसा कह उसको भी स्तनके दूधसे पुष्ट
करनेछगी । इस प्रकार वे तीनो वाळक परस्पर अपनी जातिको न जाननेवाळे
एक आचरण और विहारस वाळ समयको बिताते हुए | एक समय उस वनम
घूमता हुआ बनचारो हाथी आया | उसे देख वे दोनोही हिहपुत्र ऋषितमुख हो
उसकी ओर ज्योंही चळे तबतक उस श्रगाठपुत्रने कहा-“अहो ! यह हाथी
तुम्हारे कुछके शत्रु हैं । सो इसके सन्मुख मत जाओ? ऐसा कह घरको भागा
व दोनों मी बडे भाईके पायन करनेसे निरुत्साह होकर गये | अथवा यह अच्छा
कहाहे-
एकेनापि सुधीरेण सोत्लाहेन रणं प्रति।
सोत्साहं जायते सन्य भन्ने भगमवाप्ठुयात ॥ ४३॥
(४२६) पञ्चतन्त्रम् ।
एकभी घैयेवान् उत्साइवाळफे रणमें स्थित होनेसे सेना उत्साइवाळी होती
है और भम होनेसे भङ्ग होजाती है ॥ ४३ ॥
तथाच-
ओर देखो--
अत एव हि वाव्छन्ति भूपा योधान्महाबलान्। `
शूरान्वीरान्कृतोत्साहान्वर्जयन्ति च कातरान् ॥ ४४ ॥
इसी कारण राजा महाबळी योधाओंकी इच्छा करते हैं शूर, वीर, उत्ताह-
संपन्नका संग्रह करना । कायरोका नहीं ॥ ४४ ॥'?
अथ तो द्वो अपि गृहं प्राप्य पित्रोरग्रतो विहसन्तो ज्येष्ठ
श्रातुचेष्टितमूचतुः।' “यथा गजं दृष्टा दूरतोऽपि नष्टः” । सोऽपि
तदाकण्य कापावष्टमनाः प्रस्फारताधरपछ्व* तात्रलाचन'
गत्राशखा झकाट कुत्वा ता १नभत्सयन् परुषतरवचनान
उवाच । ततः सिंह्या एकान्ते नीत्वा म्रबोधितोऽसो- वत्स!
भव कदाचत् जल्प । जवदायलठघुचातराो एता” । अथ असा
मभूतकोपाविष्टः ताखुवाच- “किमहं एताभ्यां शोयण रूपेण
विद्याभ्यासेन कोशलेन वा हीनः । येन मां उपड्सतः
तन्मया अबश्यं एतो व्यापादनीयो”' । तदाकण्थ सिंही तस्य
जीबितामिच्छन्ती अन्तर्विहस्य प्राह-
तब वे दोनोंही घरको प्राप्त होकर माता पिताके आगे हसकर बडे भाईकी
चेष्टाको कहते इए । 'जेसे वह हाथीको देख दूरसेही साग गया!?| वही यह छुन
क्रोधाविष्ट ममसे होठरूवी पछ फडकाता लाळ नेत्र तीन शिखाबाली भकुटी--
को कर उन दोनोको घुडकता हुआ अधिक कठोर वचन बोळा | तब सिंहीने
एकान्तमें छेजाकर उसे समझाया !“पुत्र ! ऐसा कभी न कहना। यह दोनो तेर
छोटे भ्राता हैं”! तब यह अत्यन्त क्रोंवितहों उस ( सिंही ) से बोळा, “क्या मैं
इनसे शूरता, रूप, विद्या अभ्यास, चतुराईमें कम हूं? जिससे मेरा हास्य करते है
इससे अवश्यहा मॅ इन, दानाको मार डाढुगा” | यह सुन [सहा उसके जापक
इच्छा करती मनमें हँसकर बोळी-
लक
ह
भाषारीकासमेतम्। (४२७)
“ग़रोएसि कृतविद्योऽसि दर्शनी योऽसि पुत्रक ।
यस्मिन्कुले त्वमुत्पन्नों गजस्तत्र न हन्यते ॥ ४५ ॥
हे पुत्र | तू शर विद्यावान् ओर रूपवानभा है परन्तु जिस कुल्मे तू उन
हुआ है उस कुळमें हार्थाको कोई मार नहीं सक्ता ॥ ४५॥
तत् सम्यक श्रृणु वत्स । त्वं शगालीखुतः कृपया मया र्वः
स्तनक्षीरेण पुष्टि नीतः । तद् यावत एतो मत्पुत्रो शिशुत्वात
ताँ शगाल न जानीतः, तावत् टुततरं गत्वा स्वजातीथानां
मध्ये भव, नो चेत् आभ्यां हतो मृत्युपथं समेष्पास'” ।
सोऽपि तद्वचनं श्रुत्वा भयव्याकुलमनाः शनेः शनेः अपरृत्य
स्वजात्या मिलितः । तस्मात् त्वमपि यावत् एते राजपुत्राः
त्वां कुलालं न जानान्ति तावत् ढुततरमपसर । नो चत
एतेषां सकाशात विडम्बनां राप्य सरिष्यसि' छुलालोऽपि
तदाकर्ण्य सत्वर प्रनष्टः । अतोऽहं ब्रवीमि-
सो पुत्र ! भली प्रकारले छुन तृ गीदडीकापुत्र हे मेते कृपा कर अपने
स्तनके दुग्धसे पुष्ट किया हे । सो जवतक यह दोनों पुत्र बाळक होनेके कारण
तुझे शगाङ न जाने तबतक शीघ्र जाकर स्वजातिथोंके मध्यमे हो । नहीं तो
इन दोनोसे हत होकर मृत्युमागको प्रात होगा” | बहभी उसके वचन सुन
भयव्याकुळ मनसे शनेः २ चळ कर झपनो जातीमें मिलगवा । इससे तू भी
जबतक यह राजपुत्र तुझकों कुमार न जाने तबतक शीघ्र जा । नहीं तो
इनसे तिरस्कारको प्राप्त होकर मरगा”? । कुमारभी यह सुनकर शीघ्र चछागया।
इससे मे कहता हू कि-
स्वार्थसुत्सुज्य यो दम्भी सत्यं व्रते सुमन्दधीः ।
स स्वार्थाद् श्रश्यते नूनं युधिष्ठिर इदापरः ॥ ४६॥
जो दम्मी अपसा स्वार्थ त्यागच कर सत्य बोळता हे षह दूसरे युर्धिष्टिरकी
समान भवश्यही अपने स्वार्यसे भ्रष्ट होता हे॥ ४६॥
विक मूर्ख यत् त्वया स्त्रियोऽर्थे एतत् काय्यंमबुठ्ठाठु
आर्यं न हि स्त्रीणां कथश्चिद्दिश्वाससुपगच्छेत् । उक्तञ्च-
७८
६५
रे
( ४२८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
७ हा
€
सो धिक् सूखे |
"किया । किसी प्रकार ज्ियोंका बिश्वास न करें | कहा है-
यदर्थ स्वकुल त्यक्तं जीवितादँख हारितम् ।
सा मां त्यजति निःल्लेहा कः श्रीणां विश्वसेत्नरः । ४७॥
जिसके निमित्त कुछ त्यागन किया आधा जीवन नष्ट किया बह खेह-
रहित होकर मुझको त्यागच करती हे कोन मनुष्य रीका विश्वास करे ॥४७४१
मकर आह?" कथमेतत्??? वानर आह-
मकर बोळा-“यह केसी कथा !” बानर बॉळा-
कथा ६.
अस्ति कस्मिश्चित् अधिष्ठाने कोऽपि ब्राह्मणः । तस्य च
भाय्यों प्राणिश्योऽपि अतिप्रिया आसीत् । सापि प्रतिदिनं
कुटुम्बेन सह कलहं कुर्वाणा न विश्राम्यति । सोऽपि ब्राझ्मणः
कलहमसहमानों भाय्यावात्सर्यात् स्वकुटुम्बं पारित्यञ्य
ब्राह्मण्या सह विभकृष्ट देशान्तरं गतः। अथ महाटवीमध्ये
ब्राह्मण्या अभिहितः,-' 'आर्यर्यपुन्र ! तृष्णा मां बाधते । तदु-
दकं कापि अन्वेषय' । अथ असो तद्वचनानन्तरं यावत्
उदकं ग्रहीत्वा समागच्छति तावत तां मृतामपश्यत् । अति-
चल्॒भमतया विषाद कुर्वत यावत् विलपति तावत आकाशे
वाचं छणोति | तथा दि यदि ब्राह्मण त्वं स्वकीयजीदित-
स्पा ददालि, ततः ते जीवति बामणी” । तत् श्रुत्वा बाह्म"
णेन शुची भूय तिसुनिर्वाचाभिः स्वजीविताङ्ध दत्तम् । वाक
सममेव च बाहाणी जीविता सा; अथ तो जल पीत्वा
वनफलानि भक्षयित्वा गन्ठुमारब्धो ! ततः ऋमेण कस्यचित
'नगरस्य प्रदेश पृष्पवाटिकां घाविश्य ब्राहमणो भायाम
अभिहिंतबान- “भद्रे ! यावत् अहं भोजनं गृहीत्वा समाग-
च्छामि तावत् अत्र त्वया स्थातव्यम्” इत्यभिधाय ब्राह्मणो
नगरमध्ये जगाम। अथ तस्यां पुष्षबाटिकायां पंयुः अरः
ने ल्लीके निमित्त इस कार्यके अनुएानका भारम्भ
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भाषाटीकासमेतम् । (४२९ )
घट्टं खेलयन् दिव्यगिरा मीतसुह्विरति। तत्व श्रत्वा कुसुमे-
षुणा अर्दितया ब्राह्मण्या तत्सकाशं गत्वा अभिहितम्- भद्र!
यदि मां न कामयसे, तत मत्सक्ता खीइत्या तव भविष्यति?
पंगुरववोत,-“किंव्याधिग्रस्तेन मया करिष्यासि ?? सा
अन्रदीत,-' “किमनेन उक्तेन अवश्य त्वया सह मया संगमः
कर्तव्यः” | तत् श्रुत्वा तथा क्तवान् । सुरतानन्तरं सा अत्र-
वीत-“इतः प्रभति यावञ्जीबं मया आत्मा भवते दत्तः।
इति ज्ञात्वा भवानपि अस्माभिः सह आगच्छतु’ । सोख-
वीत-“'एबमस्लु,? अथ ब्राह्मणो भोजनं गृहीत्वा समागत्य
तया सह भोक्तम आरब्धः सा अन्नवीत- एप पंगु: इझुक्षि-
तः सदेतस्याप कियन्तमापें आस दइ” इात । तथा
अछछिते ब्राह्मण्या अभिहितम्- द्राण ! सहायहीनः त्वं
यदा आ्रामान्तरं गच्छसि; तदा मम वचनसहायोऽपि ना।स्ति
तत् एनं पण शृहीत्वा गच्छावः १! सोऽत्रवीत-''म शङ्गोमि
आत्मानमपि आत्मना वोढुं कि पुनः एनं पशुम् ?? सा अन्न-
वीत-* पेटाभ्यन्तरस्यं एनमहं नेष्यामि’ अथ तत्क्रतकवच-
नव्यामो हितचित्तेन तेन प्रतिपन्नं, तथा अलुषिते अन्यस्मिन्
दिने कूपोपकण्ठे विश्रान्तो ब्राह्मणः तया च पंगुपुरुषासक्तया
सम्भेय्य कूपान्तः पातितः । सापि पशुं गृहीत्वा कर्स्मिश्वित्
नगरे प्रविष्टा । तत्र शुल्कचोय्यरक्षानिमित्त राजपुरुषेरित-
स्तता अमाद्विः तन्मस्तकस्था पेटा इषा, वलात् आच्छिद्य
राजामरे नीता | राजा च यावत् तां उइवाटयांति, तावत् तं
पंगु ददश । ततः सा घ्राह्मणी विलापं कुर्वत्ती राजपुरुषातुपर्द
एव तच आगता । राज्ञा एष्टा “को वृत्तान्तः” इति । सा
अग्रवीद,- मम एष भर्ता व्याविवावितो दायादसमहेः
ह्वेजितो मया सेहव्याकालितमानसया शिरसि कुत्वा भद-
ढीयनगरे आनीतः ” तत् श्रत्वा राजा अघ्रदीत्- “त्राह्माणि!
त्वं मे भागिनी, आमद्यं गृहीत्वा भर्ना सह भोगान् सुजाना
(४३०) पञ्चतन्त्रस्।
खुखेन तिष्ठ” । अथ स ब्राह्मणो दैववशात् केनापि साधुना
कूपादुत्तारितः परिख्रमन् तदेव नगरं आयातः । तया दुष्ठ-
भार्ययया दष्टो राज्ञे निवोदितः। “ राजन्! अयं मम भर्तुः
बेरी समायातः ? । राज्ञा अपि वः आदिष्टः । सोऽत्रवीतः
“देव | अनया सम सक्तं किविद शृदीतमारित यदि त्वं धर्म-
वत्सलः तद्दापय” । राजा अन्रवीत्-' “भद्रे ! यत् त्वया अस्य
सक्तं किश्चिदगहीतमार्ति तत् समर्पय? । सा म्राइ- देव !
मया न किचित् गृहीतम्” । ब्राह्मण आह-“'यन्मया त्रिवा-
चिक स्वजीदितादे दतं तदेहि’ । अथ सा राजभयात तत्र
एव निवाचिकं एव जीबितमनेन दत्तमिति जल्पन्ती भाणेः
बिसुक्ता । ततः सविस्मयं राजा अत्रवीत-' “किमेतत्’’ इति।
ब्राह्मणिनापि पू्बेबृत्तान्तः सकलोऽपि तर्ने निवोदितः। अतोऽहं
वीमि ,
किसी स्थानमें कोई ब्राह्मण था। उसको अपनी त्री प्राणासेभी अधिक
प्यारी थी । बह प्रतिदिन ङुटुम्बके साथ छेश करती नहीं उपरामको प्राप्त
होती थी । वह ब्राणमी छेशका न सहकर भार्याके प्रेमसे अपने कुटुम्वको छोड
ब्राझणीके संग बहुत दूर देशको चळा गया । तव महाजंगळके मध्यमे ब्राह्मणीने
कहा-- आर्य्यपुत्र | सुझे बडी प्यास लगी है। सो कहीं जळकी खोज करो” ।
तब यह उसके बचन कहनेपर जबतक जळ लेकर आता हे तवतक उपे मरा
देखता इभा | भति प्यारके कारण दुःखसे जव विछाप करने ळगा । तब
आशाञ्चबाणी सुनाई दी ।“हे ब्राह्मण ! यदि तू इसे अपने जीवनके आधे दिन
देगा तो यह ब्राह्मणी जिये” । यह सुन ब्राह्मणने पवित्र होकर तीन वार उच्चा-
रण कर अपने जीवनका अधे दिया । वोळनेके साथही वह ब्राह्मणी जी उठी ।
तब षे दोनों जळ पान कर बनके फळ भक्षण करते चढ्ने ठगे | तब क्रपसे
किसी नगरके देशमें पुष्पवाटिकामें प्रवेश कर ब्राह्मणने अपनी मार्यासे कहा-
“मद्र | जबतक में भोजन ग्रहण कर आऊं | तबतक तुम यहीं रहो”? ऐसा कह
आह्मण नगरके बीचमै गया | तब उस पुष्पवाटिकामें एक लंगडा कुएकी सीडी
पर खेळता हुआ मनोहर वाणीसे गीत गा रहा था । उसको सुन कामबाणसे
भाषाटीकासमेतम । (४३१)
अर्दित हो ब्राहमणी उसके पास जाकर बोळी,-“भद्र ! यदि मेरी इच्छा नहीं
करो तो मुझ आसक्तकी ज्लीहत्या तुमको छगैगी!” | छगडा वोळा-“ व्याधीसे
"ग्रस्त मुझसे तू क्या करेगी ?? वह बोली इस कहनेते क्या है। अवश्य तेरे सगमे
सगम करूंगी” | यह सुनकर उसने वेसाही रिया, सुरतके अंतर्मे वह गेळी-
“अवसे लेकर जीवन पर्यन्त अपना आतमा मैंने तुम्हें दिया। ऐसा जानकर तुमभी
हमारे साथ भाओ'? वह बोळा“ ऐसाही हो” तब ब्राह्मण भोजन लिये भाकर
उसके साथ खाने लगा] वह बोरी-“यह लगडा भूखा है सो इसकोभी कुछ प्रास
प्रदान करो ”[वैसा करनेपर फिर ब्राह्मणीने कहा--“हे त्राह्ण! तुम सहापहीन होकर
ग्रामान्तरको जाते हो।सो मेरा कोई बचनसहायकमी नहीं सो इस पगुको ळेच?"
बह बोळा-“में स्वय अपनेसे अपने लेजानेको तो समर्थ हूही नहीं । फिर इस
पगुको कैसे लेचछगा ?” बह बोडी-“गठरीके भीतर कर इसको में ले जाऊ-
गी?! | तब उसके बनावटी वचनेंसि मोहित चित्त होकर उसने वह सत्र अगी-
कार किया । वेसा करनेपर एक दिन कूपके समीप विश्राम करते हुए आह्मणको
उस पुमे भासक्त चित्तबाळी ल्वीने कूपमें गिरा दिया । वहमी पयुक्तो ग्रहण
कर किसी नारं प्रविष्ट इई | वहा करके चुराजानेकी खोज रक्षाके निमित्त
इधर उधर घूमते हुए राजपुरुमोंने उसके मस्तकपर वह गठरी देखी । और
चुसे छीनकर राजाके आगे लाये | राजानेभी जव उत्त खोला तौ उसमे
छाडेको देखा । तब वह ब्राह्मणी विलाप करती हुई राजपुरुषोंके पीछे २ बहा
आई राजाने पछा-“तेरा क्या वृत्तान्त हे”? बह बोळी-''मेस यह क्वामी रोग-
अस्त गोतियोंसे उद्वेजित इभा हे मेंने खहसे व्याकुळ मनसे शिरपर धारण कर
आपके नगरमे प्रात किया है!” | यह सुनकर राजा बोछा-श्राह्मणि ! तू मेरी
बहन दो प्राम प्रहण कर भर्ताके सग भोगोंको भोगती सुखते रह” । उधर
बह् ब्राह्मण दैववशसे किसी साघुद्वारा कुरस निकारा हुआ, घूमता हुआ उसी
नगरमें आया | और दुष्ट उत्त मायीने देखकर राजासे कहा-“राजन् । यह मेरे
स्वामीका पेरी आया हे” । राजाने उसके वधकी आज्ञा दी । वह बोला-“देवा
इसने मेश सक्त ( सक्रान्त बस्तु ) कुछ ग्रहण कर लिया है । जो तुम धर्मवत्सळ
हो तो दिछादो” | राजा बोढा--“मद्दे | जो तुमने इसका सक्त ( सक्रान्त )
प्
कुछ लिया हो तो देना”।वह बोली-“देव[मैंने कुछ प्रण नहीं किया”! ब्राह्मण
(४३२) पञ्चतन्त्रम् ।
च. सड
बोळा-'“जो मैंने तीन वाचा देकर अपने जीवनका आधा दिया हे वह दे” |
तब थह राजाके भयसे “'जिबानित जीवित जो इसने दिया सा मैंने दिया"
एसा कहती हुई प्राणरहित हुई । तब निस्मयसे राजा बोढा- यह क्याहे' |
त्राह्मणन समरण पहळा वृत्तान्त उससे निवेदन किया । इससे में कहता हूं-
यदयथें स्वकुछं त्यक्तं जीविताद्ध्च हारितम् ।
सा मां त्यजति निःखेहा कः स्रीणां विश्वसेन्नरः ॥४आा?
जिसके निमित्त कुछ त्यागा, आधा जीवन दिया, उसने खहरहित हो मुझे
व्यागन करदिया, कौन मनुष्य ल्षियोंका विश्वास करे || ४७ || ?
वानरः पुपराह- साधु च इद्सुपारूयानकं श्रयते ।
फिर वानरने कहा-“'यह अच्छा उपाख्यान सुना जाता है।
न किं दद्यान्न कि कुर्यात्छीभिरभ्यर्थित्तो नरः।
अनश्वा यत्र हेषन्ते शिरः पर्वणि मुण्डितम् ॥ ४८ ॥ ?
खासे प्राप्त हुआ मनुष्य क्या न दे और क्या नहीं करता हे, अथीत् सबही
कुछ देता और करता है, जिस भवस्थामे घोडे न होकरमी हसते हे और
और पूर्व दिन चौदश अष्टमी आदि निषेधके दिनेमेंमी शिएका मुण्डन होता
हे । ल्लीके बशीभूत होकर कार्य अकार्यको नहीं जानता हे || ४८॥ ”
मकर आइ- कथमेतत् ९” दानरः कथय'ति-
मकर बोछा-- वह कैसे ?” वानर कहने लगा-
~ he कथा ७. = ~
अस्ति प्रख्यातबलपोरुषोऽनेकनरेन्द्र्सुकटमरीचिजाल-
जडिलीकतपादपीठः शरस्छश'काकिरणनिर्मलयशाः ससुद्र-
पय्घन्तायाः एथिव्या भत्ता नन्दो नाम राजा, तस्य सर्वेशा-
ख्राविगतसमर्ततत्वः सचिवो वररुचिर्नाम तस्य च प्रणय-
कलहेन जाया छुपिता । सा च अतीबवछमा अनेकमकारं
पारेतोष्यमाणापि न प्र्तीदति ब्रवीति च भरत्ता,-“भद्रे!
येन प्रकारेण ठुष्यसि ते बद । निश्चितं करोमि” । तत! कथ-
शित् तया' उक्तं“ यादि शिरो सुण्डयित्वा मम पादयोः
१”. क
निपतसि, तदा प्रसादाभिमुखी भवानि” । तथा अडुछिते
आषाटीकासमेतम् । (४३२)
असन्ना आसीत् । अथ नन्दस्य भार्यापि तथा एवं रुष्टा
प्रसाद्यमानापि न ठुप्याते। तेन उक्त,” भद्रे ! त्वया विना
BE HE ~ हि तिर >>. ~
सुहूत्तेमपि न जीवामि, पादयोः पतित्वा त्वां प्रसादयामि’
सा अत्रवीत- “यदि खलीनं सुखे क्षिप्य अहं तव पुठे समा-
रुह्या त्वां घावयामि । धावितस्तु यदि अश्ववत द्विषसे, तदा
प्रसन्ना भवामि”? । राज्ञापि तथा एव अवुष्ठितम् । अथ भः
भातसमये सभायां उपविष्टस्य राज्ञ! समीपे वररुचिः
आयात! | तञ्च इष्टा राजा पप्रच्छ)-' भो बररूचे ! कि
„~ पर्वणि सुण्डितं शिरर्त्वया १! सोऽञ्रवीत-
विख्यात बळ पुरुश्र्थवाला अनेक राओके मुकुटॉके किरणजाळसे सेबित -
चरणपीठवाला, दारद्काळके चन्द्रमाकी समान निमेळ यशवाछा, सागर पर्य्यन्त
पृथ्वीका स्वामी, नन्द नाम राजा था | उसके सम्पूर्ण शाल्मके तत्व जाननेवाळा
वररूचि नाम मन्त्री था । उसकी त्री प्रेमके कलहमें क्रोधित हुईं । वह बहुत
प्यारी थी इस कारण अनेक प्रकार सन्तुष्ट करने परभी प्रसन्न न हुई । उसका
भती बोला-"भडे । तुम किस कारणसे प्रसन्न होती हो ? सो कहो । अवश्य
उसको में करू!” तब किसी प्रकार उसने कहा-''यांदे शिर सुंडाकर मेरे.
चरणोमें गिरो तो में प्रसन्न होजाऊर्गी” । वेसा करनेपर चह प्रसन्न हुई । तब
नन्दकी भायीमी उसी प्रकार रूठकर किसी प्रकार सन्तुष्ट नहीं होती । उसने
कहा- भद्दे ! तेरे विना मैं सुहुते मात्रमी नहीं जी सकता । चरणमें पडकर
तुझे प्रसन्न करता हू” । वह बोळी-““थादि सुखमें गाम डाको और मैं तुम्हारे
ऊपर चढ कर शीघ्रतासे तुम्हे चछाऊ । और-दौडते इए तुम घोडेकी समान
शब्द करो तो में प्रसू”? । राजानेमा वेसा किया | तब प्रातःकाळ समारे
बेठे राजाके समीपे वररच आया उसे देखकर राजाने एछा-“अहो वररुचि !
किस परथमे तुमने दिर मुँडाया ?? वह बोछा--
न किं दद्यान्न कि ङय्यात्छ्री भिरभ्यर्थितो नरः ।
अनश्वा यत्र ह्वेषन्ते शिरः पवाणि मुण्डितम् ॥ ४९ ॥
खते प्रार्थित इभा मनुष्य क्या नहीं देता ओर क्या नहीं करता जहा घोडे
न होकरभी मनुष्य हंसते हैं उसी पवेमेंभी शिर मुडित हुआ हे ॥ ४९ ॥
१८ है
(४३४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तत् मो इष्टमकर ! त्वमपि नन्दुवररुचिवत स्रीवश्य;
ततो भद्र! आगतेन त्वया माँ प्रति वघो पायप्रयास; प्रारब्धः
परं स्ववाग्दोषेण एव प्रकटीभूतः | अथवा साधु इदमुच्यते- `
सा हं दुष्टजलचर ! तरमा नन्द आर चरराचका समान त्रागा चशाभूत ६ |
सो सद्र | भातंहा तुमच मर निमित्त वधके उपायका श्रम प्राम किया परन्त
तुम्हारी वाणीके दोषसेही वह प्रगट होगया हे । अथवा यह अच्छा कहा हैं-
आत्मनो सुखदोषेण, बध्यन्ते शुकसारिकाः
बकास्तत्र न बध्यन्ते मोनं सर्वार्थसाधनम् ॥ ५० ॥
तोते और मैना अपने सुख ( वाणी ) के दोषसे ही बन्धनमें पडते हैं और -
चगळे नहीं बेधते मौनही सब अर्थका साधक है ॥ ५० ॥
तथाच-
और देखो-
सुग॒पत रकयमाणोऽपि दशेयन्दारुर्ण वपुः
वयाग्रचमप्रतिच्छन्रो वाक्कृते रासभो हतः ॥ ५१॥'
गुप्त राक्षत हुजामा अपना दारुण शरार ।दखाता हुआ व्यात्रक चमेस
दका गधा अपनी वाणीके दाषसे मारा गया ॥ ६१ i
मकर आह-' “कथमेतत् १” वानरः कथयति-
अकर बोळा-“यह केसे ?” वानर कहने रगा-
' कथा ८
कस्मिश्वित अधिष्ठाने शुद्षपटो नाम रजकः भतिवसाति.
स्म | तस्य च गर्दमः, एकोऽस्ति, सोऽपि घातामाबात् अति.
दुर्बलता गतः । अथ तेन रजकेनं अटव्यां परिश्रमता' मृत
व्याघ्रो दृष्टः । चिम्तितश्च, अहो ! शोभनमापतितम् ।
अनेन व्याघ्रचर्मणा प्रतिच्छ।द्य रासभं रात्रो यवक्षेत्रेषु उत्स
क्ष्यामि, येन व्याघ्रं मत्वा समीपवतिनः क्षेत्रपाला एनं न
निप्कास्तयिष्यन्ति’ । तथा अदतुष्टिते रासभो यथेच्छया यव-
अक्षण कति प्रत्यूषे भूयोऽपि रजकः स्वाश्रयं नयाति । एदं
गच्छता कालेन स रासभः पीवरतनुजातः । कृच्छाद् बन्धः
भाषाटीकासमेतम् । (४१५)
सस्थानमपि नीयते । अथ अन्यस्मिन् अहनि स मदोद्धतो
दूरात रासभीशब्दमश्णोत् । ततश्रवणमात्रेण एव स्वयं
-शब्दयितुमारव्धः । अथ ते क्षेत्रपाला रासभोऽयं व्याप्रचर्म-
प्रतिच्छन्न इति ज्ञात्वा लगुडशरपाषाणप्रहारेः तं व्यापादित-
वन्त; । अतो5ह-बवीमि-
किसी एक स्थानर्म शुद्धपट नाम धोबी रहता था । उसका एक गधा था बह
घासके विना भतिदुवेळताको प्राप्त इआ । तत्र उस धोबीने बनमें घूमते हुए
एक मरा व्याप्र देखा विचाराभी, “ अहो ! बहुत अच्छा हुआ | इस व्याघ्र
( चीते ) के चमडेते ढककर रात्रि गतेको जौके छेत्रमें छोड दूगा | जिससे
इसको व्यात्र मानकर समीपवर्ती क्षेत्रपाल इसको न निकाळेंगे'' । ऐसा करनेपर
गधा यथेच्छ धान्य खेत भक्षण करने छगा सवेरे धोबी उसे अपने स्थानमें छाता।
इस प्रकार समय वीतनेपर गधा पुष्ट शरीर होगया । काठिनतासे वेधन स्थानमें
छे जाया जाता । तत्र और दिन उक्त मदोद्धतने दूरसे गधैयाका शब्द सुना
उसके सुनतेही वह स्वय शब्द करने लगा । तव वे क्षेत्रपाल यह तो गधा है
व्याघ्रचर्मसे ढका हे ऐसा जानकर छठिया बाण तथा पत्यरके प्रहारोंसे उसे
मारते इए । इससे में कहता हुं-
सुशुत्तं रक्ष्यमाणोऽपि दशेयन्दारूणं' वपुः ।
वयात्रचर्ममरतिच्छन्नो वाक्कृते रासभो हतः ॥ ५२॥ ??
अच्छी प्रकार रक्षा होकर मी भपना दारण शरीर दिखाता हभा व्याघ्रचर्मते
ग्रच्छन्न हुआ गधा वाणीके दोपते मारा गया ॥ ५२ |? -
अथ एवं तेन सह वदतो मकरस्य जलचरेण एकेन
आगत्य अमिहिते- भो मकर ! त्वदीया भाया अनशनो-
पिष्टा त्वायि चिरयति ्णयाभिभवाद्विपन्ना” । एवं तद॒ज्व-
यातसदशवचनमाकर्ण्य अतीव व्याक्कालितहदयः प्रलपितमेवं
चकार। “अहो ! किमिदं सञ्जात मे मन्दभाग्यस्य । उक्तश्च
तब ऐसे उसके साथ कहते मकरके एक जळचरने आकर उससे कहा-“भो-
मकर | तुम्हारी जली अनशन ब्रते वेंठी इई तुम्हारे चिरकालतक न आनेसे
म्रेमकी अवमाननाके कारण मर गई” । इस प्रकार उसके बज्ञपातकी समान
(४३६) पञ्चतन्त्रम् ।
बचन सुनकर हृदयसे. आति व्याकुळ होकर वह इस प्रकार विळाप करने लगा |
“यह मुझ मन्द् माग्यका क्या हुआ । कहा है-
माता यस्थ-गदे नास्ति आय्यो च भ्रियवादिनी ।
अरण्यं तन गन्तव्यं यथा रण्यं तथा गृहम्-॥ ५३॥
जिसके घरमें माता नहीं तथा प्रियवादिनी खी नहीं उसको परम जाना
उावित हे कारण कि घर बनकाही समान है ॥ १३ ॥
तत् मित्र ! क्षम्यतां, मया तेऽपराधः कृत सम्मति अहं
तु ख्रीवियोगात् वेश्वानरभवेशं कारिष्यांमि” । तत् शृत्वा
वानरः प्रहसत् म्रोवाच,-* “भो ज्ञातः मया अथममेव यतं त्वं
स्त्रीवश्यः ख्रीजितश्च। साम्प्रतश्च अत्यय; सञ्जातः । तत्
मूढ ! आनन्देऽपि जाते त्व॑ विषादं गतः ताइग भाग्याया
मृतायां उत्सवः करे युज्यते, उक्तश्च यतः
सा मित्र ! क्षमा करना जो मैने आएका अपराध कया इ भभन ल्रावयागस
भिसे प्रवेश करूँगा! | यह सुन वानर हसता इभा बोढा- मो ! यह मचे
पहल्हां जाना थाक तू ल्क वशायूत आर खरस जांता.गया इ । अन्न. विवा"
ह्यगया त सा मूख | आनन्दके समयभी त विषादको प्राप्त इभा एसा सत्राक
मरनंग्र ता उत्सव करना चाहिय । कहा हूं क्षि- |
या भार्या दुष्टचारित्रा सततं कलहुमिया ।
भाय्योरूपेण सा शेया विद्ग्धेदोरूणा जरा ॥ ९४॥
, जा भाया दुष्ट चाण सदा कश करनंवाला हां पाडताका वह ल्ाख्प दारण
चुढापा जानना, ॥ १५४ ॥ | ©
- तस्मात्संवेप्रयत्नेन नामापि परिवजेयेत् । ,
सत्रीणामिह हि सर्वासां य इच्छेत्लुखमात्मनः ॥ ५५ ॥
इस करण जो अपने. सुखकी इच्छा करे वह ल्लियोंके नामको भी त्याग-
चक्र ९६॥ , 2: . 7
यदन्तस्तन्न जिहायाँ यजिह्वायां न तद्वहिः ।
थद्वितं तन्न कुर्वन्ति विचित्रचरिताः स्त्रियः ॥ ५६ ॥
भाषाटीकासमेतम् । (४३७)
जो मनमें हे बह जिह्वा ( वचन )'मे नहीं, जो जिह्मं बह बाहर नहीं, जो
हित है उसके करनेकी इच्छा नहीं करती, लिये भद्भुत चारित्रवाली हे ॥ ५६ ॥
के नाम न विनश्यन्ति मिथ्याज्ञानान्निताम्बनीस् ।
रम्यां य उपसर्पन्ति दीपाभां शलभा यथा ॥ ५७॥ ,
अज्ञानसे मनोहर नितम्बवाळी ल्लीके निकट जाकर कोन मष्ट नही होते हें
दीपकी व्योस्तिको प्राप्त होकर पतग जैते हीं वचत ॥ ५७ ||
अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः ।
गुञ्जाफलसमाकाराः स्वभावादेव योषितः ॥ ५८ ॥
यह स्री भीतर विषरूप वाहरसे मनोहर हें स्वभावसेही खी चौँटळीके फलके
आकारवाळी हैं | ५८ ॥
ताडिला अपि दण्डेन शखरपि विखण्डिताः ।
न वशं योषितो यान्ति न दानेने च संस्तवेः॥ ५९ ॥
दण्डसे ताडित भौर शल्लसे विखण्डित होकर तथा दान और स्तुतिसिमी ह्ली
चशीमूत नहीँ होती हैं ॥ ५९ ॥
आस्तां तावत्किमन्येन दोरात्म्पेनेह योषिताम् ।
विघतं स्वोदरेणापि घ्रन्ति पुर्न स्वकं रुषा ॥ ६० ॥
जियोंकी और दुरात्मता इस ससारमे रहो अथोत् अधिक क्या कहें यह
ओधसे अपने उदरमें स्थित पुत्रकोभी मार देती हें ॥ ६० ॥
रूक्षायां खेहसद्वावे कठोरायां खुमादंवम् ।
नीरसायां रसं वालो बालिकाथो विकल्पयेत् ॥ ६१॥'?
मूर्ख ( पुरुष ) रूखीमें प्रेम सद्भाव, कठोरमें मृढुता, नीरसमे रस इच बाळा-
ओम कल्पना करता हे ॥ ६१ ॥
मकर आह,-““भो मित्र ! अस्तु एतत, परं कि करोमि,
मम अनर्थद्वयमेतद् सञ्जातम् । एकस्तावत् गहभंगः, अपर-
स्त्बद्विषेन मित्रेण सह चित्तविश्लेषः, अथवा भवाति एवं
देवयोगाद, उक्तश्च थततः-
मकरने कहा,-- भो मित्र | है तो ऐसाही परन्तु में क्या करू मुझको यह
दो अनथ हुए । एक तो घरका नाश दूसरे तुम्हारी समान भित्रका वियोग |
अथवा देव योगसे ऐसा होता ही है । कहा हे- `
(४३८) पञ्चतन्त्रम्।
याहर्श मम पाण्डित्यं ताइशं द्विगुणं तव।
नाभूज्ञारो न भत्ता च कि निरीक्षसि नश्निके ॥६२॥ _
जैसे मेरी पंडिताई हे उससे दूनी तुम्हारी हे केवळ जार ( उपपति ) ही नहीं
परतु सता मी नही हे वसनरहिते क्या देखती दे ॥ ६२ ॥ ”
वानर आद,-“कथमेतत १” मकरो$जवीत-
वानर बोला,--“वह केसी कथा १” मकर बोला-
कथा ९
कास्मिश्चिदर्थिष्ठाने हालिकदम्पती प्रतिवसतः स्म ।
सा च हालिकभाय्यां पत्युवेंद्धभावाव् सदेव अन्यचित्ता न
कथञ्चिद् गृहे स्थरय्यमा लम्बते, केवलं परपुरुषान अन्वेषमाणा
परिञ्रमाति । अथ केनाचित् परवित्तापहारफेण धूर्तेन सा
क्षिता विजने प्रोक्ता च,-“'सुभगे ! सतभाथ्यों5हम । त्व
दर्शनेन स्मरपीडितश्च । तद्दीयतां मे रतिदक्षिणा)” ततः
तयाभिहितं,- भो सुभग ! यदि एवं तदास्त मे पत्युः प्रभूतं
घनं स च वृद्धत्वात् ्रचलितुमापि असमर्थः तत् । तद्वनमा-
दाय अहमागच्छामि । येन त्वया सह -अन्यत्र गत्वा यथे-
च्छया रतिसुखमछभविष्यामि” .। , सोऽ्रवीत्+=* रोचते
मह्यमपि एतत् श्रत्यूषेऽत्र स्थाने शीप्रमेव समागन्तव्थं येन
शुभतरं फकिखित् नगरं गत्वा त्वया सह जीवलोकः सफलाः
'क्रियते” । सापि तथोति प्रतिज्ञाय अहसितवदना स्वग
गत्वा रात्रा प्रसुत्त भत्तार सव वित्तमादाय प्रत्यूषसमथ तत
कथितस्यानशुपाद्रवत् । धूत्तोऽपि तामग्रे विधाय दक्षिणां
दिशमाश्रित्य सत्वरगतिः प्रस्थितः । एवं तयोः ब्रजतोः
योजनद्रयमात्रेण अग्रतः काचित् नदी समुपस्थिता । तां
दृष्टा धूत्तः चिन्तयामास, “किं अहमनया योवंनमान्ते वर्त-
मानयोकरिष्यांमि। किच कदापि अस्याः पृष्ठंतः कोऽप
समेष्यति, तन्मे महान् अनर्थः स्यात्। तत् केवलमस्या
वित्तं आदाय गच्छामि” इति निश्चित्य तामुवाच, मिये?!
भाषाटीकासमेतम् । (४३९ )
सुदुस्तरा इथे महानदी । तदहं द्रव्यमात्रं पारे धृत्वा समा"
गच्छामि । ततः त्वां एकाकिनीं स्वपृष्ठमारोप्य सुखेन उत्ता
_ रयिष्यामि?। सा प्राह- सुभग! एवं क्रियताम्’ इत्युक्त्वा
अशेषं वित्तं तस्मे समर्पयामासाअथ तेन अभिहितं, “भद्रे!
परिधानाच्छादनवख्मपि समर्पय, येन जलमध्ये निःशंका
ब्रजसिं’? । तथा अनुष्ठिते धूत्तों वित्तं वस्रयुगलश्वच आदाय
यथाचिन्तितविषथं गतः । सापि कण्ठनिवाशतहर्तयुगला
सोद्वेगा नेदीएलिनदेशे उपबिष्टा यावत तिष्ठति, तावत् एत-
स्मिन्नन्तरे काचित् शगालिका मांसपिण्डग्हीतबदना तत्र
आजगाम । आगत्य च यावत् पश्याति, तावत नदीतीरे
महान् मत्स्यः सालिलात निष्क्रम्य बहि।स्थित आस्ते । एतश्च
दष्टा सा मांसपिण्ड समुत्सुज्य तं मत्स्यं प्रति डपाद्रवत्। अचा-
न्तरे आकाशात् अवतीर्य कोऽपि गृधस्तं मांसपिण्डमादाय
पुनः खसुत्पपात । मत्स्योऽपि शगालिकां दृष्टा नद्यां प्रविवेशा
सा शृगालिका व्यर्थश्रमा शश्र अवलोकयन्ती तया नम्नि-
कया सस्मितं अभिहिता-
किसी स्थानमै हालिक स्री पुरुष रहते थे । वह हालिककी खी पतिके वृद्ध
होनेसे सदा औरकी चिन्ता करती किसी प्रक्रारंमी घरमै स्थिरताको प्राप्त न
होती । केवळ परपुरुषो खोज कर स्थित थी । तब किसी पराया धन हरने-
बाळे धूर्तेने उसे देख कर एकान्तमें कहा-“सुभगे ! मेरी छरी मरगई है । तेरे
दईीनसे मे कामे पीडित हुआ हू । सो मुझे रति दक्षिणा दो” । तब उसने
कृह्दा- मो सुभग ! जो ऐसा हे तो मेरे पतिके बहुत धन है इद्ध होनेसे वह
चळनेको समब नहीं हे । सो उसका धन लेकर मे आती हू । जो तुम्हारे साथ
और स्थानमें जाकर रतिका सुख अनुभव करू?” | उसने कहा-“यह बात
सुझेभी मळी छगती है | प्रातःकाळ इस स्थानम तुम शीघ्र भावा जिससे अच्छे
निसा नगरम जाकर तुम्हार सग जवत सफळ करू १ | बंहभा बहुत अच्छा
शसा प्रातज्ञा कर हसफर अपने घर जाय रात्रिम पतिके साजानपर सब धनका
छेकर कथित स्थानमै आई धूर्तमी उसे आगे लेकर दक्षिण दिशाको आश्रय
(४४०) पञ्चतन्त्रम् ।
कर शीघ्रातिसे चछा । इस प्रकार उन दोनोके जानेपर दो योजन चरकर
कोई नंदी आई । उसे देखकर धूर्त विचारने लगा “योबनके नष्ट होनेसे इसे
ळेकर में क्या करूंगा | ओर कदाचित इसके पीछे कोई जावेगा । तो मेरा
महान् अनर्थ होगा । सो केवळ इसका धनही छेकर जाऊं” ऐसा विचार
निश्चय कर उससे बोडा,--“ग्रिये | यह महानदी दुस्तर है । सो पहले पार घन
रखकर पीछे छोटं | फिर में तुझे इकळीको पीठपर चढाकर छुखसे पार उतार
दूंगा?” । वह बोडी-“सुमग ! ऐसाही करो” । ऐसा कह सम्पूर्ण धन उसको
अपेण करती हुईं । तब उसने कहा-“भद्रे ! पहरनेके बत्रमी अपेण करो
जिससे जळके वीचमें निरंक चलेगी” | ऐसा कह वह धूते धन और दोनो
वल्ल ( ढहँगा डुपद्टा ) ळेकर यथामिङषित स्थानको गया । वहमी अपने कॅम
दोनों हाथ डाळे उद्दगसे नदीके किनारे जबतक बैठी रही । तवतक उसी
समय कोई गीदडी सुखे मांतपिण्ड ग्रहण किये बद्दां आई । आकर जबतक
देखने ठगी तबतक नदीके किनारे महामच्छ जछसे निकलकर बाहर स्थित
था । यह देख कह मांसपिंडको छोड उस मत्स्पके प्रते धावमान इई इसी
समय आकाशले उतर कर कोई गिद्ध उस मांतपिडको छेकर फिर आकाशको
घाबमान हुआ । मत्स्य मी श्रगाठिकाको देखकर जलमें प्रवेशकर गया तत्र वह
शृगाली व्यर्थश्रम होकर गृध्रको देखने ळग इस समय वमिकाने हसकर कहा-
गृध्रेणापहतं मांसं मत्ह्योऽपि सलिलं गतः ।
- मत्स्यमांसपरिञ्रष्टे कि निरीक्षसि जम्डुके॥ ६३॥
. गाध्रने मांत हरण किया मत्स्य मी जल्ये गया हे जम्बुके | मत्स्य और
मांमसे ष्ट होकर अब क्या देखती हे ॥ ६३॥
तच्छ्रत्वा श्रगालिका तामपि परतिधनजारपरिश्रष्टां दृष्टा
पहासमाह- |
यह सुनकर श्र॒गाछिकाने उस पति, धन और जारसे अष्ट इई देखकर
उपहाससे कहा- '
“यादश मम पाण्डित्यं ताइशं द्विगुणं तव ।
माभूज्ारो न भर्ता च कि निरीक्षसि नम्निके ॥ ६४ ॥
भाषारीकासमेतम् । (४४१)
जितना मेरा पांडित्य हे तेरा उससे दूना है, हा जारमी गया और , मर्तामी
नहीं हे नाग्नेके ! क्या देखती है! ॥ ६४ ॥?
” एवं तस्य कथयतः पुनरन्येन जलचरेण आगत्य निवेः
दितम-“यदहो ! त्वदीयं शहमपि अपरेण महामकरेण गदी"
तम? । तत् श्रत्वा असी अतिइःखितमवाः तं गृहात् निःसा:
रायेतु उपाय चिन्तयन् उवाच, अहो ! पश्यतां में देवोप-
हतत्वम् ।
इस प्रकार उसके कहनेपर फिर दूसरे अळचरने भाकर कहा-““अहो ! तुम्हारा
घरभी दूसरे महामकरचे ग्रहण कर लिया” । उसे सुन यह ढु'खीमनसे उसे
बरसे निकाठनेको उपाय विचारता हुआ बोळा । मेरे प्राख्चका घात तो देखो-
मित्रं द्यमित्रताँ यातमपर मे मिया मृता ।
गृहमन्येन च व्याप्त किमद्यापि भविष्यति ॥ ६५ ॥
मित्र अमित्र हुआ भौर प्रिया मेरी मरगई घर दूसरे प्राप्त इआ अब
क्या होगा | | ६५॥
अथवा युक्तमिदसुच्यते-
अधवा यह युक्तही कहा है--
क्षते प्रहारा निपतन्त्यभाक्ष्णः
मन्नक्षये वद्धीति जाठराञ्जिः
आफ्त्छु वराणि समुद्भवन्ति
वामे विधो सबेमिंदं नराणाम् ॥ ६६॥
घावके ऊपर वाखार प्रहार पडते हैं, अनके क्षये भूल बढ़ती है भापदार्मे
वेरी चढते हैं, विधाताके वाम होनेमें मनुष्योक्तों पह सब कुछ हाता हे ॥ ६६ ॥
तत् कि करोमि ! किमनेन सह युद्धं करोमि ? किवा
सास्ना एव सम्बोध्य गृहात निःसारयामि। किवा भेदं दानं
वा करोम १ अथवा असुमेव वानरभित्रं पृच्छामि ? उक्तश्च~
सो क्या करू ! क्या उसके साथ युद्ध करू £ या साम उपायसे समझाकर
'घरसें निकाङ | भथवा भेद वा धनसे सन्तुष्ट करू ?। क्षयवा इस धानर भित्रसे `
है पूछ £ कहा है--
(४४२) पश्वतन्त्रमू । -
यः पृष्ठा कुरुते कार्य्ये भ्ष्ठव्यान्सबहितान्गुरून् ।
न तस्य जायते विन्नः कस्मिश्रिद॒पि कर्मणि ॥ ६७ ॥
जो अपने पूछनेमें योग्य हितकारी गुरुओसि धूछकर कार्ये करता हे उसको
किसी काममें वित्न नहीं होता है॥ ६७॥? |
एवं सम्प्रधायर्थ भूयोऽपि तमेव जम्वूवक्षमारूठं कपिम-
पूृच्छत,- जो मित्र ! पश्य में मन्दभाग्यताम् । यत् सम्मति
गहमपि मे बलवत्तरेण मकरेण रुद्धम्। तदई त्वां प्रष्टमभ्या-
गतः । कथय कि करोमे ! । सामादीनाम् उपायानां मध्ये
करय अत्र विषय?) स आइ- 'भोः कुतन्न ! पापचारिन् !
मया निर्षिद्धो$पे कि भूयों मामनुसरासे, नाहं तव मूखेस्य
उपदेशमपि दास्यामि? । तच्छृत्वा मकरः प्राह-भो मित्र!
सापराधस्य मे पूर्वस्नेहमतुस्सृत्य हितोपदेश देहि,” . वानर
आह-न अहं ते कथायष्यामे । यत् भाय्यावाक्येन भवता
अहँ समुद्रे प्रक्षेप्ठु नीतः, तदेवं न युक्तं यद्यपि भार्य्या सव
लोकादपि वल्लमा भवति तथापि न मित्राणि बान्धवाश्च
आय्योवाक्येन समुद्रे प्रक्षिप्यन्ते। तन्मुखे ! मूढत्वेन नाशः
तव मया प्रागेव निवेदित आसीत् । यतः
एसा विचार [फर भा उस जासुनक दृक्षपर चढ चानरस पूछन लगान भा
मित्र | मेरी मन्दसाग्यत्ता ता देखा [क, इस समय घर भा मरा बलवान मकरं
ग्रहण करळिया । सो में तुझसे एछनेको आया हूं कह नपा करूं £ सामादि उपायोग
इस समय कोन उचित हे” ) वह बोडा,--“भो झतन्न पापिष्ठ ! मुझसे निषेधको
प्राप्त हुआ भी फिर मुझसे क्यो पूछता है। में तुझ मूखेको उपदेशभी नहीं दूंगा'१,
यह सुनकर मृकर-बोछा,-- भो मित्र | में अपराधीहू पर मेरा 'पू्वखेह स्मरण कर
हितोपदेश दे” | बानरने कहा,-- में तुझसे नहीं कहूंगा । जो 'साय्योवावयस
तुम मुझे समुद्रमें डाळनेको लेगय थे सो युक्त नहीं किया । यपि माय्यी सर्व
-छाकस भा प्यारा हाता हे तथाप मत्र आर बन्धु भायोक “वाक्यस सागरम
महो डाले जाते हैं सो मूख ! मूढ होनेसे तेरा नाश मेंने प्रथमही कह दियाथा |
क्यों कि-
भाषाटीकासमेतम् । (४४२)
सतां बचनमादिष्टं मदेन न करोति यः।
स विनाशमवाम्रोति घण्टोष्ट इव सत्वरम् ॥ ६८ ॥ 7!
जो मदसे सत्पुरुषोके कहे वचन नहीं करता हे वह घण्टा बन्धे उँटकी समान
शीघ्र नाशको प्राप्त होता हे ॥ ६८ ॥”
मकर आह,-“कथमेतत !!'' सो$ःवीत-
मकर वोळा,-“यह केसे £” वह बोला-
| कथा 9०,
कस्मिश्विद्धिष्ठाने उज्ज्वळको नाम रथकारः प्रतिव-
सतिस्म । स च अतीव दारिद्रचोपहतः विन्तितवान-
“अहो ! धिक् इयं दरिद्रता अस्मद्गृहे । यतः सर्वोऽपि जनः
स्वकमंणि एव रतः तिष्ठति । अस्मदीयः पुन्व्यांपारो न
अत्र अधिष्ठाने अईति । यतः सवलोकानां चिरन्तनाः चतु
भूमिका गृहा? सन्ति । मम च नात्र, तत कि मदीयेन रथ:
कारत्वेन योजनम्? इति चिन्तयित्वा देशात् निष्क्रान्तः ।
यावत् किञ्चित् वनं गच्छति तावत् गह्ृराकारवनगहनमध्ये
सूर्य्यास्तमनवेलायां स्वयूथाद् भ्रष्टां ्रसदवेदनया पीडयमा-
नां उद्टोमपश्यव, स च दासेरकयुक्तासष्टी गहीत्वा स्वस्था"
नाभिमुखः भस्थितः । गहमासाथ रज्जु गृहीत्वा तामुष्टिकां
बबन्ध । ततश्च ती&णं परशुमादाय तस्याः कृते पछवानय-
नाथ पर्वेतेकदेशे गतः । तच च नूतनानि कोमलानि बहूनि
पल्लवानि छित्वा शिरसि समारोप्य तस्या अभ्रे निचिक्षेप ।
तया च तानि शनेः शने! भक्षितानि । पश्चात् पल्लवभक्षण-
मभावादहर्निशं पीवरतढु; उष्टी सञ्जाता । सोऽपि दासे-
रको महान् उष्टः सञ्जातः । ततः स नित्यमेव दुग्ध गृहीत्वा
स्वकुटुम्बं पारिपालयाति। अथ रथकारेण वछ्भत्वात दासे-
'रकग्रीवायां महती घण्टा भ्रतिबद्धा । पश्चात् रयकारो व्यः
चिन्तयत, अहो ! किमन्येः इष्क्तकर्मभिः यावत् मम
(४४४) पञ्चतन्त्रम् ।
एतस्मादेव उष्टीपरिपालनात् अस्य कुटुम्बस्य भव्यं सञ्जातम्।
तत् कि अन्येन व्यापारेण? । एवं विचिन्त्य गृहमागत्य प्रि
यामाह ,-'भद्रे ! समीचीनोऽय व्यापारः तव सम्मतिः चेत
कुतोऽपि धनिकात् किचित द्रव्यमादाय मथा शर्जुरदेशे
गन्लव्यं करभग्रहणाय। तावत् त्वया एतौ यत्नेन रक्षणीयौ।
यावत् अहमपरामुट्टी गृहीत्वा समागच्छामि? । ततश्च गुजे-
रदेशं गत्वा उष्टी गृहीत्वा स्वणहं आगतः । कि बहुना, तेन
तथा कृतं यथा तस्य प्रचुरा उष्टाः करभाश्च सम्मिलिताः
ततस्तेन महुदुष्टरयूथं कुत्वा रक्षापुरुषो शतः । तस्य वर्ष
अति दृत्या करभं एकं प्रयच्छाति । अन्यश्च अहनिशं दुग्धपानं
तस्य निरूपितम् । एवं रथकारोऽपि नित्यमेव उड्टीकरभव्या
पारं.कुदेन् सुखेन तिष्ठति । अथ ते दासेरका अधिष्ठानोपवने
आहारार्थं गच्छन्ति । कोमलंवछ्लीः यथेच्छया . भक्षयित्वा
महति सरसि पार्नायं पीत्वा सायन्तनसमये मन्दं मन्दं ठी
लया गहं आगच्छन्ति । स च पूवदासेरको मदातिरेकात्
पृष्ठे आगत्य मिलाति | ततस्ते? कलमे! अभिदितः-“अहो !
मन्दमातिः अयं दासेरको यथा यूथादश्रष्टः पृष्ठे स्थित्वा घण्टां
वादयन् आगच्छति । यदि कस्यापि इष्टसत्वस्य सुखे
पतिष्यति, तन्नूनं मृत्युमवाप्स्यति’ । अथ तस्य तद्वनं :
गाहमानस्य कश्चित् सिंहो घण्टारवं आकण्यं समायातः ।
याबत् अवलोकयति, तावत् उष्टीदासेरकाणां यूथं गच्छाति
एकस्तु पुनः पृष्ठे क्रीडां कुर्वन् बळरीश्वरन यावत तिष्ठति,
तावत् अन्ये दासेरकाः पानीयं पीत्वा स्वग्रहे गताः । सोऽपि
वनात् निष्क्रम्य यावदिशोऽवलो कयाति, तावत् न कञ्चित् मागे
“पश्यति वेत्ति च। यूथाद्वष्टो मन्दं मन्दं ब्रह च्छन्दं कुवन् यावत -
पकियद्रं' गच्छति, तावत् तच्छब्दाबुसारी सिद्दो5पि कमं
कत्वा निभतो$ओ व्यवस्थितः । ततः यावत् उष्टः समीपं
आगतः तावत् सहेन लम्फयित्बा वायां गृहीदो मारितश्च! -
अतोऽहं त्रवीमि-
भाषाटीकासमेतम् । (४४५)
किसी स्थानमें उज्ज्यलक नाम रथकार रहता या । वह आति दरिद्र होकर
विचारने छगा । “महो हमारे घरकी दरिद्रताको धिक्कार है । जो कि सम्पूर्ण
मनुष्य अपने कर्ममे रत हुए स्थित हैं । हमारा कार्य तो इस स्थातर्मे नहीं
चलता । जो कि समूर्ण ढोकोके पुराने चार कोष्टके घर हें । मेरा नहीं हे सो
क्या मेरे रथकार होनेसे प्रयोजन है” । ऐसा विचार कर देशसे चढागया ।
जमी कुछ दूर वनर्मे पचा कि, सूर्यके अस्त समय अपने यूथसे अष्ट इई प्रस-
चपीडासे युक्त एक ऊटनीकों देखा । वह उस बचेसे युक्त ऊटनीको छेक्कर अपने
घरको चळा, घरमै प्राप्त हो रस्सी ळे उससे उस उटनीको बाघता हुआ | तीज
(तीक्षण) कुऱ्हाडीको ळेकर उसके निमित्त पत्ते छेनेको पर्दतके एक स्थानर्मे गया!
वहा नूतन कोमळ बहुतसे पत्ते छेदनकर शिरपर धारणकर उसके आगे डाळ
देता डुभा । वहभी उनको शन; २ भक्षण करने ठगी तव रातदिन पल्लव
भक्षणक्के प्रभावसे पुष्ट शरीर उटची होगई । ओर दासेरकमी महान् ऊट होगया।
तबतक नित्यही दूधको ग्रहणकर अपने कुटुम्बकी पाळना करता । तब रथका-
रने प्यारके कारण ऊटके बचेकी गर्देनमें बडा घटा बाध दिया । पीछे रथकार
विचारने ढगा । “अहो ! और दुष्त कमेसि क्या हे जवले में इस ऊटके
पालन करने लगा उससे इत कुटुम्बकी कुशळ इई सो अब ओर व्यापारसे
क्या हे? ऐसा विचार घर भानकर अपनी प्रियासे बोळा-“मद्रे | यह व्यापार
अच्छा हे । जो तेरी सम्मति हो तो किसी धनीसे कुछ द्रव्य लाकर में उटके
बचे ग्रहण करनेको गुजेर देशमें जाऊगा । तवतक तृ इन दोनोंकी यनसे रक्षा
कर । जबतक में ओर उटनीको लाऊ !!) तब बह गुजर देशम जाय ऊटनीको
ग्रहणकर अपने घर आया | बहुत कहनेसे कया हे उसने बह् किया जो उसके
बहुतसे ऊठके बचे होगये । तब उसने बडा ऊर्ठोका यूथ कर एक रक्षा पुरुष
रक्खा । उस रक्षकको नोकारीमें प्रतिवर्ष एक ऊटका बच्चा देता । भौर प्रतिदिन
दूघपानमी उसको निरूपण करदिया । इस प्रकार रथकार नित्यही ऊटनी ऊटके
बच्चोका व्यापार करता सुखसे स्थित था | और वे ऊटके बचे घरके उपवने
भोजनको जाते । कोमळ बेळें यथेन्छ_ मोजनकर बडे सरोवरमे पानी पीकर
संव्यासमय मन्द २ ळाठासे घरको आते । और वह पहळा बचा मदके आधिक
होनेसे पीछे आकर मिळता । तब उन बचोंने कहा-“अहो-| यह बच्चा बडा
(४४६) पञ्चतन्त्रम् ।
मन्द्मति है जो यूथते भ्रष्ट हो. पीछे स्थित होकर घण्टेको बजाता हुआ जाता है
ही दुष्ट जीवके सुखमें गिरा तो अवश्य .मरेगा!! । तब उसके
उस घनमे फिरते इए कोई सिंह घण्टेका शब्द झुनकर भया. | जब जाकर
देखा कि ऊंटके बच्चोंका समूह जाता है । और एक पीछे क्रीडा करताइथा
वेळ खाताहुआ जबतक स्थित हे तबतक और ऊंटके, बच्चे पानी पीकर अपने
घर गये । वह भी बनसे निकळकर जबतक दिशा्ओंको देखता है तवतक न
कोई मागेको देखता वा जानता है ( सन्ध्याके कारण अन्धकार हुआ ) यूथसे
भ्रष्ट हुआ बडा शब्द करता जबतक मन्द २ कुछ दूर चछा तबतक उस
शब्दका अनुसारी सिंहमी तैयार हो एकान्तर्मे आगे स्थित हुआ । सो जबतक -
ऊंट निकट आया । तब सिंहने कूदकर उसकी गर्दन पकड़कर मारडाळा । इससे
मैं कहता हूँ-
सता वचनमादिष्टं मदेन न करोति यः ।
स विनाशमवाम्रोति घण्टोष्ट इव सत्वरम् ॥ ६९ ॥''
संत्पुरुषोंके कहे वचनको जो मदसे नहीं करता हे वह घण्टा बंधे उठकी
समान विनाशको प्राप्त होता हे || ६० ॥!!
अथ तच्छुत्वा मकरः प्राइ,-'भद्र-
यह सुनकर मकर बोळा-*अद्र-
आहुः सातपद् भन जनाः शास्त्रविचक्षणाः ।
मित्रताश्च पुरस्कृत्य किखिद॒क्ष्यामि तच्छृणु ॥ ७० ॥
झालम चतुर मनुष्य साप्रपदिककोही मित्रता कहते हैं सो मित्रताको आगे
कर जो कुछ में कहताहूं सो सुन ॥ ७० ॥
उपदेशप्रदातृर्णां नराणां हितमिच्छतास् ।
परास्मिन्निह लोके च व्यसन नोपपद्यते ॥ ७१॥
हितकी इच्छासे उपदेश फरनेवाळे मनुष्यांको परछोक और इत छोर्कम दुःख
नही होता हे ॥७१॥
तत सवथा कृतन्नस्यापि मे कुरू प्रसाद उपदेशप्रदानेन ।
उक्तव- ` ˆ
_ सो स्था मुञ्च कृतप्तररभी उपदेश दानकरके प्रसन्नता करो । कह है कि-
भाषाटीकासमेतम् । (४४७ १.
उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को रुणः __
अपकारिषु यः साघुः स साछुः साद्वेरुच्यते ॥ ७२ ॥/!
जो उपकारियोंमें साधु है उसके साघुताम क्या गुण दै (“जो भफ्कारयापर
कृपा वरे महात्माओंने उसेद साधु कहो है ॥ ७२ |
तदाकण्य वानरः प्राह,- भद्र! यादे एवं तहिं तत्र गत्वा
तन सह युद्ध कुरु । उत्तत्व-
यह सुनकर घानर बोळा-““भद्र | जो ऐसा है तो जाकर उसके संग युद्ध कर-_
हतस्त्वं प्राप्स्यसि स्वर्ग जीवन् शहमथों यशाः । '
युद्धयमानस्य ते भावि गुणद्रयमलुत्तमम् ॥ ७३ ॥
मरत खगेको प्रात होगा जीनेछे सद आर सश प्रात होगा, सुद्ध फरनछ
तुझको दोनो प्रकार श्रेष्ठ गुण प्राप्त होंगे | ७३ ॥
उत्तम प्राणिपातेन शूरं भेदेन योजयेत्।
नीचमहपप्रदानेन समशक्तिं पराक्रमः ॥७४॥
उत्तमको प्रणाम करके, शरको भेद करके, नीचको कुछ देकर युक्त करे
सोर ससान बळ्वाळसे युद्ध करे ॥ ७४ |”?
मकरः माह्, “कथमेतत् ?' सोऽब्रवीत्,
मकर बोछा,- यह केसे !'' वह बोछा-
कथा .93
Do
आसीत् कार्मश्चेत वनोदेशे महाचठुरको नाम शगाल
तेन कदारचत अरण्ये स्वयं सृतो गजः समासादितः । तस्थ
मन्तात् परिभ्रमति परं काठिनां त्वचं भें न शक्कोति ।
अथ अब अवसर इतश्चेतश्च विचरन् काश्रेत सिहस्तत्रेव प्रदेश
समांययो । अथ सिह समागतं दृष्टा स क्षितितलविन्यस्त-
मालिमण्डलः सयोजितकरयुगलः सबिनयसुवाच,-“स्वा-
मिन् ! त्वदीयोऽह लागुडिकः स्थितः त्वदर्थे गजामिमं रक्ष्या-
ैन। तव् एन भक्षयतु स्वामी” । तं भ्रणतं -इष्टा सिंहः
(४४८ ) पञ्चतन्त्रम् ॥
प्राह,-“भोः ! न अहमन्धेन हतं सत्व कदाचिदपि अक्ष-
यामे । उक्तत्व-
` किसी वनमें महा चतुरक नाम श्रगाळ रहताथा । उसको एक समय बन
स्वयं मृतक हुआ हाथी मिला । उसके चारा ओर प्रमा फान्तु उसकी कठिन
त्वचा भंग करनेकों समर्थ न हुआ । इसी समय इवर उधर पिंचारण करता
कोई सिह वहां आया, तब सिंहको आया हुआ देखकर यह प्रथ्वीमें अपना शिर
रकर दोनों हाथ जोडकर विनयपूर्वक बोळा,-“स्वामिन् | में आपकी लकडा
घारणक्रनेवाळा स्थित हूं भापहीके निमित्त इस हाथीकी रक्षा करता हूं। सो
स्वामी इसको भक्षण करें? । उस प्रणाम करते इएको देखकर सिंह बोळा
“भो ! में दूसरेके मारे' हुए जीवको कमी भक्षण नहीं करता हूं । कहा है कि-
वन सहा सुगलासनक्ष्या
बुखाक्षता नव. तुण चरान्त ॥
एवं कुलीना व्यसनानिभूता
न नीतिमार्ग पारेलईयन्ति ॥ ७५ ॥
बनमें भी सिंह मृगके मांसका भक्षण करते हैं भखे होकरमी तण नहीं खाते
हैं, इसी प्रकार कुङके मनुष्य व्यसनसे तिरस्कृत होकर भी नातिमार्गको उल्लंघन
नहीं करत हृ 0७५ ॥
तत् तव एव गजोऽयं मया प्रसादीकृतः तत् अत्वा शृगालः
सानन्दमाह+~“युक्तमिदं स्वामिनो निजभत्येषु। उक्तश्च यतः"
सो थह हाथी तुमको मैंने प्रमन्नतारूपसे दिया हे” । यह सुनकर
गाळ आनीदित होकर बोढां,-“स्त्ामीको अपने अरत्यॉमें यह बात डचितही
हे । जिससे कि कहा है-
अन्त्यावस्थोऽपि महान्स्वामिगुणान्न जहाति शुद्धतया ।
न श्ेतभावसुज्झति शंखः शिखिञ्चक्तिमुक्तोऽपि ॥ ७६ ॥
अन्त्य अवस्थाको प्राप्त इभा भी महान् पुरुष शुद्धतासे ' स्वामीके युणोंकों
नहीँ. त्यागता हे जैसे झुद्ध करनेको अमिमें मस्मकर निकाला इभा शंख अपनी
श्रेतताको नहीं त्यागता है ॥ ७६ ॥
अथ सिंहे गते कश्चिद् व्याच! समायया, तमपि दष्ट्रा
' असो ब्यचिन्तयत्। “अहो ! एकस्तावत् इरात्मा प्रणिपातेन
भाषाटीकासमेतम्। - (४४९)
अपवादितः । तत् कथमिदानीम् एनमपवाहयिष्यामि । नूनं
शूरोऽयम्, न खळ भेदे बिना साध्यो भविष्याति । उक्तश्च
-यतः-
तब सिंहको जानेपर कोई चीता वहा आया । उसको भी देखकर यह
विचारते छगा । “एक हुरात्माको तो प्रणामकर सगाया ! सो, अब किस प्रकार
इसको यहासे दूर करू । निश्चयही यह दूर हे भेदके विना साध्य नहीं होगा ।
जिस कारण कहा हे कि-
न यत्र शक्यते कतुं साम दानमथापि बा ।
भेदस्तत्र प्रयोक्तव्यो यतः स वशकारकः ॥ ७६॥
जहा साम, दान करनेको यह प्राणी समर्थ न हो वहा भेदका प्रयोग करे
कारण कि यही बशमै करनेवाला हे ॥ ७६ ॥
(कश्च) सर्वयुणसम्पन्नोऽपि भेदेन बध्यते । उक्तश्च यतः-
क्यों कि सर्व गुणसम्पन्न भी भेदसे बघता है । कहा दै कि-+
अन्तःस्थेन विरुद्धेन सुवत्तेनाविचारुणा ।
अन्तर्भिन्नेन सम्प्राप्तं मौक्तिकेनापि बन्धनम ॥ ७७॥
भन्तरमे स्थित विरुद्ध सुडोछ होनेसे मनोहर भीतरसे भिन्न होनेके कारण
मोती भी बन्धनको प्राप्त होता हे । अथवा अन्तर्गत ( ढुर्गम स्थित ) सुचारित्र,
ठोक रजन करनेवाले आंवरणसे युक्त अभ्यन्तरसे भिन्न प्रजासे उपजापको प्राप्त
हुए औरो करके आत्मा बधनको प्राप्त किया जाता है ॥ ७७ ॥
एवं सम्प्रधार्यं तस्याभिमुखो भूत्वा गर्वात् उन्ननकन्धरः
ससम्भ्रमम् उवाच,- “माम ! कर्थं अन्न भवान् मृत्युमुखे
प्राविष्टः थेन एष गजः सिंहेन व्यापादितः। स च माम् एतद्र
क्षणे नियुज्य नद्यां खानार्थ गतः । तेन च गच्छता मम
समादिष्टं, यदि कश्चिदिह व्याघः समायाति, तत त्वया
सुझुत्तं मम आवेदनीयम् । येन वनमिदं मया निर्या
कत्तेव्यम् । यतः पूर्व व्याघिण एकेन मया व्यापादितो गजः
शुन्ये भक्षयित्वा उच्छिष्टतां नीतः । तदिनात् आरभ्य
२९
(४५०) पञ्चतन्त्रम् ।
व्याघान् प्रति प्रकपितोऽस्मि'' । तत श्रुत्वा व्याघः सन्त्रस्तः
तमाह,-“ भी भागिनेय ! देहि मे घाणदक्षिणाम् -। त्वया
तस्य अन्न चराय आयातस्याप मदाया काप वात्तान
आख्येया” । एवमभिधाय सत्वरं पलायाञ्चक्रे । अथ गते
व्याप्रे तत्र कश्चित् द्वीपी समायातः । तमपि दृष्ठा असो
व्यचिन्तथत्,- इदर्दष्टरोऽयं चित्रकः, तदस्थ पाश्वोदर्य
गजस्य यथा चमच्छेदो भवाते तथा करोमि” । एवं
निश्चित्य तमपि उवाच,-“भो भगिनीसुत ! किमिति
चिरात इष्टोऽसि ? कथञ्च बुसुक्षित इव लक्ष्यसे ? तद अति- .
थिरसि मे । एष गजः सिंहेन हतः तिष्ठति । अहं च अस्य
तदादिष्टो. रक्षपालः । परं तथापि यावत् सिंहो न समाः
याति, तावत् अस्य गजस्य मांसं भक्षयित्वा त्ति कृत्वा
इततर॑ ब्रज ! स आइ,” माम ! यादे एवं तन्न कार्य्य मे
मालाशनत, यतो जीवन्नरो बद्रशतान पश्यात । उक्तश्च-
एसा चार कर उसके सामन हांकर गवस ऊच कन्ध कर सम्म
बोढा,- मामा ! आप केसे यहां मृत्युसुखर्म प्रविष्ट हुए हो? जिस सिंहने
इस हाथीको मारा हे वह मुझे इसकी रक्षाम नियुक्त कर खान करनेको
नदीके किनारे गया है। उसने जाते. हुए सुझसे कहा-''जो कोई मेरे पीछे
व्याप्र आवे तो तू मुझे गुप्ततासे कह देना । क्यों कि यह बन में व्याप्ररहित
करदूंगा । कारण पहले एक व्याप्रन मेरा मारा हुआ हाथी एकान्तर्मे भक्षण कर
उच्छिष्ट करदिया । उसदिनसे में व्याप्रोपर क्रोधित इभा हूं” । यह खुन व्या
उससे घवडाकर बोला,- भी भानजे | सुझे प्राणदक्षिणा दे तुझे यहां उसके
देखें भानेपर भी मेरी कोई बात त कहनी?” । ऐसा कह शीघ्र पळायन करू
गया | तब व्याप्नेके जानेमें कोई शादूल वहां जाया । उसे देखकर यह
शिचारने छगा,-“यह शादूल दढ दाढोंवाला हे । सो इसके निकटसे जैसे
हाथीका चर्षेछेद् हो पेसा करूं | ऐसा विचार कर उससे बोळा,-““मो भातजे!
क्या कारण है बहुत दिनो तुझको देखा । क्या भूंखेकी समान दीखता हे £ ।
सो मेरा अतिथि हे । यह हाथी सिंहसे मरा पडा हे । में उसकी भाज्ञासे इसकी
भाषाटीकासमेतम्। (४५१)
रक्षा करता हू । पर तौ भी जबतक कि सिह नहीं आता हे, तबकत इस
हाथीका मास भक्षण कर तृतिको प्राप्त होकर शीघ्र जा” । वह बोळा-“मामां!
“जो ऐसा है तो मुझे मासभक्षणसे प्रयोजन नहीं, कारण कि जीता रहे तो
मनुष्प सैकडों मगछोंको देखता हे । कहा है कि-
यच्छक्यं ग्रसितुं आस अस्तं परिणमेञ्च यत!
हितश्च परिणाम यत्तदाद्यं भूत्तिमिच्छता ॥ ७८ ॥
मनुष्य जो ग्रास असनेकों समर्थ हो ओर जो खावेसे पच जाय परिणाममें
[हितकारी हो ऐश्वर्पक्षी इच्छा करने वाळेको वह भोजन करना चाहिये ॥ ७८ ॥
तव सर्वथा तदेव भुज्यते यदेव परिणमति। तत् अहामि-
तोऽपयास्यामि? । शृगाल आहइ,- “भो अधीर ! विश्रब्धो
भूत्वा भक्षय त, तस्थ आगमन द्रताअध तव अह निवेद
विष्यामि” । तथा अत्तुष्टिते द्वीपिना भिन्नां त्वचं विज्ञाय
जम्बूकेन अभिदितम्-“भो भगिनीसुत! गम्यताम, एष सह;
समायाति” । तत श्रृत्वा चित्रको दूर श्रविष्टः । अथ यावदसां
तद्भेदक्कतद्वारेण किचिन्मांसं भक्षवति, तावत् अतिसंङ-
दोऽपरः श्रगाळः समाया । अथ तम् आत्मवुहयपराक्रम
हक एनं छोकमपठत-
सो जो पचजाय सर्वथा उतीको स्का भच्छा है । सो भें यहाते जाता हू”? ।
आगाल बोढा- मो अधीर ! निडर होकर तू मक्षण कर ।' उसका आगमन
दूसरेसेमी में तुझसे कहदूगा” । ऐसा करने पर शादूँढसे 'खाछ फाडी हुई
जानकर श्वगाळने कहा-““भो मानुजे ! जाओ पह सिंह भारहाहै”” | यह छुन
चित्रक दूर भाग गया । सो जबतक यह उस भदन किये द्वारसे मास खाने
उगा तबतक अतित्रोध किये दूसरा शश्वगाळ आया तब उसने अपनी तुल्य परा-<
अममे उसे जानकर यह कोक पढा--
उत्तमं अणिपातेन शूरं भेदेन योजयेत् ।
नीचमल्पप्रदानेन समशक्ति पराक्रमेः ॥ ७९ ॥
उत्तमको प्रणाम कर, शूरको भेद करके, चीचको कुछ देकर और समान
शक्तिको पराक्रमसे युक्त करे ॥ ७६ ॥
(४५२) _ पञ्चतन्त्रम् ।
- तदमिसुखक्कतप्रयाणः स्वदुष्टामिः तं विदाय्ये दिशो भागं
कृत्वा स्वयं सुखेन चिरकालं हस्तिमांसं बुसुजे । एवं त्वमपि
तं रिपुं स्वजातीयं युद्धेन परिभूय दिशो भागं कुरू । नो चेत्
पश्चाद् बद्धमूलात् अस्मात त्वमपि विनाशम् अवाप्स्यसि!
उक्तश्च यत्तः~ हि
सो उसके सामने गमन कर अपनी डाढोसे उसे विदीर्ण ( मार ) कर दिशा-
आँका बलिरूप कर स्ववं सुखसे बहुत काळतक हाथीका मांस खाता रहा।
इसी प्रकार तू भी उस भपनी जातिके इन्रुको युद्धसे जीत दिशाओंकी भेट
कर, नहा तां पाछ जड पकड जानत इस जलचरस तू हा विताशका प्रात
होगा । कहा है कि-
सम्भाव्यं गोषु सम्पन्नं सम्भाव्यं ब्राह्मणे तपः ।
सम्भाव्यं सत्रीषु चापर्यं सम्भाव्यं जातितो भयमू ॥ ८०॥
गोभोमें सम्पत्ति रहती है, आह्मणमें तपहोही सकता हे, ज़ियोंमें चपलता
होतीही हे, जातिसे भय होताही हे ॥ ८०॥
अन्यच्च-
आरभा- eve
सुभिक्षाणि विचित्राणि शिथिलाः पौरयोषितः
एको दोषी विदेशस्य स्वजातिर्यद्विरूष्यते ॥ ८१ ॥”
खाच याग्य ववाचत्र अन्नाक दचम पुरल्षा सुक्तहरत होती ह परन्तु [नदशा
एक दोष हे, अपनी जाती उसको सहन नहीं करती है विरोध करती है॥८ १।”
मकर आह, कथमेतत्?” वानरोऽब्रवीत्,
मकर बोळा,-“यह केसे १” वानर कहने छगा- '
कथा १२
अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने चित्रांगो नाम सारमेयः । .
तत्र च चिरकालं दुर्भिक्षं पतितम् । अन्नाभावात् सारमेयाः
दयो निष्कुलतां गन्तुम् आरब्धाः । अथ चित्रांगः क्षुत्क्षाम
कण्ठः लद्गयात देशान्तरं गतः । तत्र च कस्मिश्चित् पुरे
कस्यचित् गृहमेधिनो गदिण्या; प्रमादेन प्रतिदिनं गहं
भाषाटीकासमेतम्। (४५३)
प्रविश्य विविधान्नानि भक्षयन् परां वृत्ति गच्छाति । परं
तदगृहात् बदिनिष्क्रान्तोःच्येः मढोद्धतसारमेयैः सर्वेदिक्षु
'“पारेदृत्य सर्वाङ्गेषु दंटाभिः विदार्यर्यते । ततः तेन विचन्ति
तय अहो ! वरं स्वदेशो यत्र दुभिक्षेऽपि सुखेन स्थीयते,
न च कोऽपि सुद्ध करोति, तदेव स्वनगरं ब्रजामि’ इति
अवधाय्यथ स्वस्थान प्रात जगाम । अथ असा दशान्तराव
समायातः सर्वेरपि स्वजनेः पृष्ठः, “भोः चित्राड़ ! कथय
अस्माकं देशान्तरवात्ताम्, कीहग्देशः? किं चेष्टितं लोकस्य ?
क आहारः, कश्च व्यवहारः तत्र १” इति । स आइ)- “कि
कथ्यते विदेशस्य स्वरूपाविषयः ।
किसी स्थाने चित्रांगनामक कुत्ता रहता था । घहा बहुत काळतक दुर्भिक्ष
पड गया। अन्नके अभावसे कुत्तों आदिके यूथ भ्रष्ट होगये । तब चित्राग मयसे
देशान्तरको गया । बहा किसी एक नगरमें किसी गृहस्थकी लीके प्रमादसे प्रति-
दिन घस प्रवेशकर अनेक अन्नको खाकर परम तत्तिको प्राप्त हाता । परन्तु
उसके घरसे निकलते और मदसे उद्धत कुत्तोंसे सब ओरसे धिरकर स्ोह्में
डाढोसे विदीणे होता । तब उसने विचार किया,- "हभ अपना देश अच्छा है
जहा दुसिक्षमेंमी सुखसे रहा जाता हे। न कोई युद्ध करता है, इससे भपने नगरको
जाता हु” । ऐसा विचारकर अपने स्थानको गया | तब इस देशान्तरसे आये
इएसे सव कुत्तोने एछा,-“मो चित्राम ! हमसे देशान्तरकी वार्ता कहो । वह
केसा देश हे ? ढोकाको केसी चेष्टा है ? । केसा आहार और कैसा वहाका
व्यवहार हे १? | वह वोळा,=““विदेशका स्वरूप ओर वातो क्या कहँ--
सुभिक्षाणे विचित्राणि शिथिलाः पारयोषितः ।
एको दोषो विदेशस्य स्वजातियेद्विरुष्यते ॥ ८२॥”
खाने योग्य विचित्र भन्नोमें पुरक्षियें सदा हाथ ढीळा किये रहती हैं । विदे-
शें एकही दोष है कि जो भपनी जाति विरुद्ध रहती है ॥ ८२ ॥”
सोऽपि मकरः तड्पदेशं श्रत्वा कृतमरणनिश्चयो वानरम्
'अनज्ञाप्य स्वाश्रयं गतः । तत्र च तेन स्वगृहभ्रविष्टेन आतत्ता-
(४५४) पञ्चतन्त्रम् ।
यिना सह विग्रहं कृत्वा हढसत्त्वावष्टम्ननाचच ते - व्यापाद्य
स्वाश्रयश्व॒ लब्ध्वा सुखन चरकालम आतष्ठत् । साधु इद-
मुच्यते,-
बहुभी मकर उसके उपदेशको प्रहणकर मरणमें निश्चयकर वानरकी आज्ञा
ळे अपने स्थानको गया | तब उसने अपने घरें प्रवेशकर उस शत्रुके ' साथ
युद्धकर दृढ बंढकी प्राप्ति होनेसे उसे मारकर अपने स्थानको छे सुखसे चिर-
काळतंक स्थिति की | यह अच्छा कहा है-
अकृत्य पोरूष या श्रीः कि तयापि सुभोग्यया।
रूवः समंश्नांति देवादुपगंतं तृणम् ॥ ८३॥
इति औविष्णुरायीदिराचिते दच्चतन्त्रके सब्बग्रणायं ताय चतुय
तन्त्रं समाप्तम् ।
. जो छक्ष्मी विवा पराक्रमके प्रात होती दै भोगने योग्य अनायास प्राप्त हुई
उस ठक्ष्मीसे क्या हे जैसे बूढ़ा गो ( वृषभ ) देवले प्राप्त हुए तूर्णोको
खाता है ॥ ८३॥ '-
इर्ति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पंचतित्रके पडितज्वाछाप्रसादभिश्रकृतभाषा-
टीकायां छब्धंप्रगादं नाम चतुर्थ तंत्र समाप्तम् ॥
अथ अपरीक्षितकारकं पंचमं तन्त्रम्।
अथ इदमारभ्यतेऽपरीक्षितकारकं नाम पञ्चमं तन्त्रं यस्य
अयम् आदिमः छोकः-
भव यह ( १) भपरीक्षितकारकनाम पांचवा तत्र आरम लिया जाता है
जिसके आदिम यह छोक है-
कुदृष्टं कुपरिज्ञातं कुथुत कुपरीक्षितम् ।
तन्नरेण न कत्तेव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥ १॥
जो दुद्ृ्ट हो, कुत्सित जाना गयाहो, बुरी प्रकार सुनाहो, जो घुरी प्रकार
परीक्षा किया हो वह मनुष्यको नहीं करना चाहिये जैसा कि इस संसारमें
नाईने किया ॥ १ ॥
तद्यथा अजुश्रयते-
सो ऐसा सुना दै- -
` कथा १.
अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे पाटालिपुत्रं नाम नगरम्। तत्र
मणिभद्रो नाम अषा प्रातवसाते स्म । तस्य च घमाथकाम-
मोक्षकर्माणि कुवेतो विधिवशात् धनक्षयः सञ्जातः । ततो
विभवक्षयात् अपमानपरम्परया परं विषादं गतः । राची
सुप; चिन्तितवान,- अहो! धिक इमां दरिद्रताम्। उक्तश्च-
दक्षिणके देशमै पाटलिपुत्रनाम एक नगर हें | बहा मणिमद्रवाम एक सेठ
रहताथा, उसके धर्मे, अर्थ, काम, मोक्षको सेवन करते प्रारन्ध बशसे घन क्षय
होगया । तब घनके क्षय होनेके कारण अपमानको परम्परासे परम बिषादको प्राप्त
इभा, रातमें सोता हुआ विचारने ल्गा,-'“भहो ! इत दारेद्रताको धिक्कार दे ।
कहा है कि--
शीळं शोचं क्षान्तिर्दाक्षिण्यं मधुरता कुले जन्म ।
न विराजन्ति हि सर्व वित्तविद्दीनस्य पुरुषस्य ॥ २॥
१ बे समझे करना | शि
(४५६ ) पश्वतन्च्रस् ।
शीळ, पवित्रता, सहनशीलता, चतुराई, मधुरता, कुध्मे जन्म, वित्तहीव
पुरुषके कुछ भी मळे नहीं लागते ॥ ९ ॥
मानो वा दपों वा विज्ञानं विश्रमः छुबुद्धिवो ।
सबै प्रणश्याति समं वित्तविद्दीनो यदा पुरुष; ॥ ३॥
जब पुरुष धनहीन होता है तब मान, दपे, बिज्ञान, विछास, बुद्धि, एक
साथही सब नष्ट होजाते हैं || ३ ॥
प्रतिदिवस याति लयं बसन्तवाताहतेव शिशिरश्रीः।
बुद्विबद्विमतामपि कुटुम्बमरचिन्तया सततस् ॥ ४ ॥
बसन्तकी वातस हत हुई शिशिर ऋतुका श्यामाका समान घु्मानाका
बुद्धि निरन्तर कुट्म्बके भरण पोषणकी चिन्तामेंही लय होजाता इं ॥ ४ ॥
नश्याति विपुलमतेरपि बुद्धि; परुषस्य मन्दविभवस्य ।
घतलबणतेलतण्डलवखेन्यनचिन्तया सततम् ॥ ९ ॥
न्द ऐश्वर्य होजानेपर महावुद्धिमानकी बुद्दि भी नष्ट हाजाता इ, चिस्तर
घत, ढवण, तेछ, तण्डुल, वस्न, इंधनकों (चिन्ताह ठगा रहते ९ ॥५॥
गगनमिव नष्टतारं शुष्क सरः श्मशानमिव रौद्रम्।
प्रियदशनमपि रूक्षं भवात गृह धनावहानस्य ॥ ६ ॥
नष्ट तरेबाळे आकाइकी समान, सूखे सरोबरकी समान सवकर रमशानक
समान धनहीनका घर प्रियद्शेन भी उपरोक्त प्रकारका छगता हे ॥ ६॥
न विभाव्यन्ते लघवो वित्तविहीनाः पुरोऽपि निवसन्तः
सततं जातविनष्टाः पयसामिव बुद्धदाः पयसि ॥ ७ ॥
घनसे होन ब्घुपुरुष आग विवास करते हुए भा विदित नहीं होते जसे
tv 4५ वीय
जळंसे उत्पन होकर जकमें हो नष्ट होकर ( बुळ्खुले ) नहीं विदित हात ६॥७
सुकुल कुशल सुजन-वहाय कुलकुशलशीलाविकलेऽपि ।
आदये करपतराविव नित्यं रज्यन्ति जनानिवद्दाः ॥ ८॥
जन समूह अच्छे कुठीन चतुर छुजन ( निघनी पुरुषका छोड़कर ) कुठ
चतुरता और शीलसे दीन भी धनी पुरुषर्मे कर्पवृक्षको समान नित्य अनुराग
करते ६॥ ८ ॥
भाषाटीकासमेतम्। (४५७)
विफलमिह पूर्वखुकतं विद्यावन्तोऽपि कुलसमुद्धता; ।
यस्य यदा विभवः स्यात्तस्य तदा दासतां यान्ति ॥ ९॥
इस ससारमे पुमे उपकार कोई नहीं गिवता विद्याबान् और अच्छे ङुळमे
उत्पन्न इए मी जिसके सम्पत्ति हो उमकी दासताको प्राप्त होते हैं ( मे उप-
कारं किये निधनकों कोई नहीं सेबता ) ॥ ९ |
लघुरयमाह न लोकः कामं गर्जन्तमपि पति पयसाम् ।
सर्वमलजाकरमिह यत्कुवन्तीह परिएणांः ॥ १० ॥”
मनुष्य कठोर गर्जना करते हुए भी जळके पति सागर (धनी) को यह अल्पवेग
हे ऐसा नहीं कहते धवी इस सतारमें जो कुछ करते हैं वह उनको छजाकर
नहीं होता ( प्रत्युत सब छाघा करते हें) ॥ १० ॥'? ॥
एवं सम्मरधार्म्य भूयोऽपि आचिन्तयत्,- “यदहुम् अनशनं
कुत्वा प्राणान् उत्सजामि,किमनेन नो व्यर्थजीवितव्यसनेन
एवं निश्चयं कृत्वा सत्तः | अथ तस्य स्वप्ने पद्मनिषिः क्षपण-
करूपी दर्शन गत्वा प्रोवाच-भोः श्रेष्ठिव् ! मा त्वं वेराग्यं
गच्छ। अहँ पद्मनिधिः तव पूर्वुरुषोपाजितः, तइनेन एव
रूपेण मातः त्वद्शृहम् आगमिष्यामि। तत् त्वया अहं लगुड"
अहारेण शिरसि ताडनीयो, येन कनकमयो भूत्वा अक्षयो
भवामि”? | अथ प्रातः भबद्धः सन् स्वप्नं स्मरन् चिन्ताचत्रं
आरूढः तिष्ठति। “अहो सत्योऽयं स्वप्नः किंवा असत्यो
भविष्यति न ज्ञायते । अथवा नूनं मिथ्या भाव्यं यतोऽहं
केवलं वित्तमेव चिन्तयामे । उक्तश्च, -
ऐसा विचार कर फिर भी सोचने छगा,-तो मे कघन करके प्रार्णोकों
त्यागदू । इस व्यर्थ जीवनसे क्या छाभ हे” । एसा निश्चय कर सोगया । उसको
सप्तम पञ्मनिधि बोद्ध सन्यासीके वेषमे दीन देकर बोळा,-““मो ! सेठ तुम
५ वैरागयको मत प्राप्त छे । में पझानिवि तुम्हारे पुरुषका उपार्जन किया' हुआ
हू । सो इसी खूपसे प्रातःकाळ तुम्हारे घरको भाऊँगा । सो तुम ळयुडका प्रहार
मेरे शिरपर करना । जिससे में सुवणका होकर भक्षय हो जाऊगा” । तब प्रभा-
(४५८) पञ्चतन्त्रम् ।
तमें जागकर ( सेठ ) स्वरको स्मरण करता चिन्ता युक्त बैठा,-“अहो यह सवप
सत्य ह, वा असत्य हांगा सां नहा जानाजाता | अथवा अवस्यहा [मंथ्या होगा
कारण क मातादन में घनकाहा चिन्ता करता ह । कहा है- |
व्याधितेन सशोकेन चिन्ताम्रस्तेन जन्तुना ।
कामार्तेनाथ मत्तेन इष्टः स्वप्नो निरथेकः ॥ ११॥
व्याधियुक्त शोकवान् चिन्तासे ग्रस्त कामात और मत्त प्राणीका देखा हुआ
स्वप्त निरथेक होता है ॥ ११ ॥
एतस्मिन् अन्तरे तस्य भाय्येया काश्चित् नापितः पादः
प्रक्षालनाय आहूतः । अत्रान्तरे च यथानिर्दिष्टः क्षपणकः
सहसा माइबभूव। अथ स तमालोक्य प्रहष्टमना यथा आस
न्नकाष्ठदण्डे न तं शिरसि अताडयत्। सोऽपि खुवणेमयो भुत्वा
ततक्षणात् भूमी निपातितः ! अथ स श्रेष्ठी नितं स्त्रगृह मध्यं
कृत्वा नापितं सन्तोष्य प्रोवाच, त्तदेतत् धनं वत्राणि च
मया दत्तानि गृहाण । भद्र ! पुनः कस्यचित् न आख्येयों
वृत्तान्तः,' नापित्तोऽपि स्वगृहं गत्वा व्यत्विन्तयत्,~' तून"
मेते सरबेऽपि नग्नकाः शिरसि दण्डहताः काश्चनमया भवन्तिः
तदहमपि प्रातः प्रभूतानाहूय लगुडे; शिरसि इन्मि, येन
अभूतं-हाटकं में भवति” । एवं चिन्तयतो महता कष्टेन निशा
अतिचक्राम । अथ मभाते अभ्युत्थाय ब्ृहछणुडमेकं प्रणणी
कृत्य क्षषणकविहारं गत्वा जिनेन्द्रस्य दक्षिण्यं विधाय
जालुभ्यास् अवानिं गत्वा वकऋद्वारन्यस्तोत्तरीयाश्चलः तार"
स्वरेण इमं श्लोकम् अपठत-
इसी समय उसकी भायीने किसी नाईको पांव धोनेके निमित्त बुलाया ।
इसी समय कहेडुएके अनुसार वह संन्यासी प्रगट हुआं ।- वह उसे देखकर
प्रसन्न -मनसे घोरे घरी हुई काष्ठको लकडीसे उसके शिरमें ताडन करता भया |
वह भी सुवणेमय होकर उसी समय प्ृथ्वीपर गिरा तब वह सेठ एकान्तर्मे उसे
अपने घरमें ळेजाकर नाईको सनन््तोषित कर बोळा,-“यह घन भीर बल्ग मेरे
दिये इए प्रहण कर । भद्र ! यह वृत्तान्त किससि “व कहना? । नाई मी अपने
भाषारीकासमेतम्। (४५९)
घरमे जाकर विचारने छगा,-“अवश्यहा यह सब बोद्ध सन्यासी शिरने डण्डेसे
प्रहार करनेसे सोनेके होजाते हैं सो मेंमी बहुतोंकों बुलाकर उण्डेसि रमे
प्रहार करके मारू । जिससे मेरे यहा बहुत धन होजाय'? | ऐसा विचार कर
बडे कष्टसे उसने रात बिताई प्रात,काङही उठकर एक बडे डण्डेको तयारकरं
संन्यासियोके विहासस्थलमें जाकर जनेन्द्रकी तीन प्रदक्षिणा करके जघाके घळसे
ृथ्बीमें बेठकर वक्रद्ार ( मुख ) में डुप्टा लपेटे इए ऊचे स्वरसे इस छोकको
पढने छगा-
जयन्ति ते जिना येषां केंवलज्ञानशालिनाम् ।
आजन्मनः स्मरोत्पत्तौ मानसेनोषरायितम् ॥ १२॥
केवळ निरवर्छिनन ज्ञानवाळे जिनके चित्तर्मे जन्मसेही कामोत्पत्ति ऊषरवतू
रही हे ( नहीं इई ) वे क्षपणक सबसे उत्कृष्ट वर्तते हैं ॥ १२ ॥
अन्यच्च
भौरमी--
सा जिह्वा या जिनं स्तोति तवित्तं यज्जिने रतम् ।
तावेव च करो श्लाध्यो यो तत्पजाकरो करो ॥ १३ ॥
वही जिह्वा है जो जिनकी स्तुति करती हे, बही चित्त हे जो जिनमें रत
हे, वही छाघनीय हाथ हैं जो बोद्धकी पूजा करनेबाळे हैं ॥ १३॥
तथा चल
और देखो-
व्यानव्याजसुपेत्य चिन्तयसि कामुन्मीहय चक्षुः क्षण
पश्यानंगशरातुरञ्ननमिमं त्रातापि नो रक्षसि ।
मिथ्याकारूणिकोऽसि निर्घणतरस्त्वत्त; कुतोऽन्यः पुमान्
सेष्यै मारवधूमिरित्यमिहितो वोद्धो जिनः पातु बश॥१४ा
हे माननीय ! भ्यानके बहानेसे किस कान्ताका स्मरण करता है, आख खोल-
कर कामबाणसे विद्ध इस जनको अवलोकन कर | त्राणमें समर्य होकरमी हमारा
रक्षा क्यो नहीं करता ? | इस कारण तुम अळीक दयावाले हो, तुमसे अविक
और निदेयी पुरुष कोन. होगा, ईषापूर्वक कामदेवकी वधूसे इस प्रकार कहेइए
बौद्ध जिन तुम्हारी रक्षा करे || १४ ॥
( ४६० ) पञ्चतन्त्रस् ।
एवं संस्तुत्य ततः प्रधानक्षपणकम् आसाद्य क्षितिनिहि-
तजालचरणो “नमोऽस्तु वन्दे’? इति उच्चाय्पे लब्धधर्मबृ-
द्चशार्वादः सुखमालिवानुग्रहळब्धब्रतादेश उत्तरीयनिब-"
द्र्म्रन्थिः सप्रश्रयम् इृदमाह,- भगवन् ! अद्य अभ्यवरण-
क्रिया समस्तमुनिसमेतेन अस्मद्ग्रहे कत्तेव्या'! स आह,-
“मोः आवक ! घमजोऽपि किमेवं वदसि कि वयं ब्राह्मणस-
मानाः । यत आमन्त्रण करोषि । बयं सदैव तत्कालपरिच-
रथया भ्रमन्तो भक्तिमाजं श्रावकम् अवलोक्य तस्य गृहे
गच्छामः तेन कृच्छादभ्यर्थिताः तद्गृहे प्राणधारणमात्राम्
अशनक्रियां कुर्मः । तत् गम्यतां नेवं भूयोऽपि वाच्यम् ।
तच्छ्त्वा नापित आह, “भगवन्! बेग्नि अहं युष्मद्वभम,
पर भवलो बहुआवका आहेयन्ति, साम्प्रतं पुनः पुस्तका
च्छादनयोग्धानि कर्पटानि बहुमूल्यानि भ्रशुणीकृतानि तथा
पुस्तकानां लेखनाथ छेखकानाश्च वित्तं सा्चितम आस्ते;
तत्सबेथा कालोचितं कार्थ्यम्'' । ततो नापितोऽपि स्वगृहं
गतः तत्र च गत्वा खादिरिमयं लगुडं सज्जीकृत्य कपाटयुगलं
द्वारे समाधाय साङ्धप्रहरेकसमथे भूयोऽपि विहारद्वारम
आश्रित्य सर्वान् ऋमेण निष्क्रामतो गुरुप्राथनया स्वगृहम्
आनयत, तेऽपि सर्वे कर्पटबित्तलोमेन भक्तियुक्तानपि परिः
चितश्रावकान् पारित्यज्य प्रहष्ठमनस्तस्य पृष्ठतो य्य! । अथवा
साध इद्सुच्यते `
“ इस प्रकार स्तुतिकर प्रधान क्षपणक्षके पास जाकर पृथ्वीमें जेघाचरणको
छुवाय; “आपको नमस्कार दे” ऐसा उचारण कर घमैदृद्धिका आशीर्वाद ग्रहण
कर, प्रधान क्षपणकके अनुग्रहे ब्रतदीक्षाको प्रात हो गळवल्नके निमित्त उत्त
रीयकी गांठ बांधे नम्रतापूर्यक इस प्रकार बोला-“भाज भोजनकी क्रिया सब
सुनियोके साथ मेरे घर करनी चाहिये” । वह बोडा-“भो श्रावक . | (धर्ष
सुने इए ) धर्मका जान्नेराला होकरमी क्यों ऐसा कहता हे । क्या हम ब्राह्मणको
समान है, जो निमंत्रण करता हे । हम तो सदाह तत्काळकी परिचयोसे समते
भाषाटीकासमेतम् । (४६१)
हुए किसी भक्त श्रावकको देखकर उसके घर चढे जाते है, और उसकी अत्यन्त
प्राथेनासे उसके घरमै प्राणधारण मात्र भोजन क्रियाको करते हैं, सो जाओ फिर
> ऐसा न कहना?” । यह सुन नापित बोंछा--' भगवन् | मैं भापका धर्म जानता
हू, परन्तु भापको बहुत श्रावक ( सरावर्गा ) बुछाते हैं, मेंने तो इस समय
बहुतस पुस्तकके वाधने योग्य बज्न बहु मूल्यके सम्नह किये हैं । तथा पुस्तकोके
निमित्त लेखकोंको धन एकत्र किया स्थित है । सो सरथा समयके उचित कार्य
करो” | तब नाईमी अपने घर गया । और वहा जाकर खेरकी छकडीको तयार
कर दोनों किवाड घएकी वदकर डेढ प.रतक फिरभी बिहारद्वार परस्थित होकर
सबके क्रमसे आश्रमसे निकलनेपर वडी प्र,्थनासे उन्हें अपने घरमें छाया । वेमीं
सब कपट भौर घनके लोमसे, मक्तियुक्त जाने पूछे हुए सरावागीयोको छोडकर प्रसन्नः
मनसे उसके पीछे २ गये । यह भन्छा ही कहा हे कि-
एकाकी गहसंत्यक्तः पाणिपात्री दिगम्बरः ।
सोऽपि संवाह्यते लोके तष्णया पश्य कोतुकम् ॥ १५॥
जो इकळा ग॒हझून्य हाथरूपी पात्रबाळा दिगम्बर ( नग्न हे ) वहर्भा ससारमें
तृष्णासे इरण होता हे इस कौतुकको देखो॥ १९ ॥
जीर्यन्ते जीय्येतः केशा दन्ता जीर्य्यन्ति जीय्यतः ।
चक्षुः ओत्रे च जीर्येते तुष्णेका तरुणायते ॥ १६ ॥
बूढ़े होनेसे वाळ जीर्ण होजाते हैं, जीर्ण होनेसे दातमी जीर्ण होजाति हैं नेत्र
भोर कानमी जीर्णे होजाते हैँ एक नृष्णाही तरुण होती जाती है ॥ १६॥
अपरं ग्रहमध्ये हान् प्रबेश्य वारं निभ्गतं विधाय लगुड-
प्रहारैः शिरसि अताडयत, तेऽपि ताडचमाना एके मृताः
अन्ये भिन्नमस्तकाः फूत्कत्तुम् उपचक्रामिरे । अनान्तरे तमा-
कन्दम् आकर्ण्य कोटरक्षपालेः आभिहितं,~'भी भोः ! किम्
अयं महान् कोलाहलो नगरमध्ये | तद्गम्यतां गम्यताम्’? ।
ते च सर्वे तदादेशकारिणः तत्सहिता वेगात् तदशृहं गताः
तावत् रुधिरावितदेहाः पलायमाना नग्नका दष्टाः । तैः स
नापितो बद्धः । हतशेषेः सह धमीधिष्ठानं नीतः । तेः नापितः
(४६२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
Lo. Lan
पृष्टः-भोः ! किमेतत् भवता कुकृत्यमनुष्ठितस ११ स
आह/;- कि करोमि ? मया श्रोष्ठिमाणिमद्रणहे ष्ठ एवंविधो
उघातिकरः'? । सोऽपि सर्वमाणिभद्रवृत्तान्तं यथाइष्टम् अक?”
थयत । नतः श्रेष्ठिनम् आहूय भाणितबन्तः,-* भोः श्रेषिन् !
कि त्वया कश्चित क्षपणको व्यापादितः १” ततः तेनापि
सवे! क्षपणकइत्तान्तः तेषां निवेदितः। अथ तेः अभिदितम्-
तब घरमै उनको प्रवेश कराकर द्वार बंद कर उनके शिरमै डंडेसे प्रहार
करने कगा । वे मो ताडित हुए कोई मरगबे कोई शिरफूटमेसे चिलाते हुए
भागे, इसी समय उनके चिल्लानेके शब्दको सुनकर नगरके रक्षकोंने कहा-“मो
भो यह नगरके मध्यम क्या बडा कोळाहल है सो जाओ जाभो'' | वे सब उन
की आज्ञा करते उघक सहित वेगसे उस घरम गये | उन्होंने राधिरस भीजे
शरीर भागते हुए क्षपणकोंकों देखा | तब उन्होंने उस नाईको बांध लिया ।
और मरनेसे बचे हुओंके साय न्यायालयर्मे प्राप्त किया । तब उन्होने नाईसे
'पूछा- मो ! यह क्या हे | सेने बडा कुकृत्य किया है !?” बह बोछा- मैं क्या
करू ? मेंने सेठ मणिमद्रके घरमे इस प्रकारका ब्यापार देखा था”! | ओर वह
सब मणिमडके दृष्टन्तकों जेता देखा था तेसा कहता भया | तब वे श्रेष्ठीको
खुळाकर कहते भये-- “सो सेठ ! क्या तेने किसीक्षपणकको मारा १ |” तब उससे '
सब क्षपणकका इत्तान्त उनसे कहा । तब उन्होने कहा,- _
«अहो ! शूलम् आरोंप्यताम असो इष्टात्मा कुपरीक्षित-
कारी नापितः!! । तथा अबुछिते तेः अभिहितम-
“अहो इस दुरात्माको शूळपर आरोपण करदे! यह दुष्टात्मा बाई कुपरीक्षित
करनेवाला हे” । ऐसा करनेपर उन्होंने कहा,”
- «कुट कुपरिश्ञातं कुश्ुत॑ कुपरीक्षितम् ।
- तत्ररेण न कत्तेव्यं नापितेनात्र यत्कृतम् ॥ .१७॥
“जो बुरा देखा, कुत्सित जाना, कुत्सित सुना, कुत्सित परीक्षा कियाइभा है
मनुष्पकों वह बात नहीं करनी चाहिये जो नाईनें किया ॥ १७ ॥ .
अथवा साधु इरदसुच्यते- |
अथवा यह अच्छा कहा हे-
भाषाटीकासमेतम् । (४६३)
अपरीक्ष्य न कर्तव्य कत्तव्धं सुपरीक्षितम् ।
'पश्चाद्गवति सन्तापो ब्राह्मण्यां नकुलाथतः ॥ १८॥'?
२ कोई काम विना परीक्षासे न करना चाहिये, परीक्षासेही करना चाहिये, बिना-
र
विचारे सन्ताप होला हे, जैसे ब्राह्मणीको नकुळके निमित्त हुआ था ॥ १८।।”
मणिभद्र आह,-* “कथमेतत् ९” ते धर्माधिकारिणः पोचुः -
मणिभन्र बोळा,- “वह केसी कथा |”? बे घमोधिकारी बोले-
कथा २.
कर्िमिश्चिद्यिष्ठाने देवशर्मा नाम बाह्मणः प्रतिवसति
स्म। तस्य भार्यो सूता छुतम अजनयत,तस्मिन एव दिने
नकुली नकुल प्रसूता । अथ सा सुतवत्सला दारकवत्तमपि
नकुलं स्तन्यदानाभ्यङ्गमदनादिभिः पपोष । परं तस्य न विश्व-
साति “यत् कदाचित एष स्वजातिदोषवशात् अस्य दारः
कस्य विरुद्धम् आचरिष्यति’? इति, एवं जानाति स्वचित्ते ।
उक्तश्च
किसी स्थानमें देवशर्मा नाम ब्राह्मण रहता था उसकी भायोने पुत्र उत्पन्न
किया ॥ उसी दिन नोळीने एक नकुछको उत्पन्न किया । चह पुत्रबत्सका बाळ-
ककी समान उस न्योठेकोमी दूध दान शरीरके मलनेभादिसे पुष्ट करती भई ।
परन्तु उसका विश्वास न करती कि “यह कदाचित् अपनी जातिके दोसे इस
वालकके विरुद्ध आचरण करेगा” ऐसा अपने चित्तमें जानती । कहा हे--
“कुपुत्रोऽपि भंवेत्पुसां हृदयानन्दकारकः ।
ढुविनीतः कुरूपोऽपि मूखोऽपि व्यसनी खलः ॥ १९ ॥
“कुपुत्रभी पुरुषोंके हृदयके आनन्दका करनेवाळा होता हे, चाहै दुर्विनीत
कुरूप व्यसनी खळ हो ॥ १९ ॥ रा
एवं च भाषते लोकश्चन्दनं किल शीतलम् ।
पुत्रगात्रस्य संस्पर्शश्चन्द्नादतिरिच्यते ॥ २० ॥
ठोक यह कहते हैं कि, चन्दन शीतळ है परन्तु पुत्रका शरीर 'चन्दनसे
अविक शीतळ हे परन्तु पुत्रके शरीरस्परीसे चदन अधिक तळ नहीं है ॥२७॥
( ४६४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
सीहदस्य न वाञ्छन्ति जनकस्य हितस्य च ।
लोकाः प्रपाळकस्यापि यथा पुत्रस्य वन्घनम् ॥ २१ ॥”
छोक मित्र पिता हितकारी पाळकके वंघनकी इच्छा नहीं करतेहें जैसे पुत्रक.
प्रणयबन्धनको इच्छा करते हैं ॥ २१ |”?
अथ सा कदाचित् शय्यायां पुत्रं शाययित्वा जलकुम्भम्
आदाय पततिसुवाच;-' ब्राह्मण | जलार्थम् अहं तडागे था-
स्थामि, त्वया पुत्रोऽयं नकुलात् रक्षणीयः? । अथ तस्यां
गतायां प्रष्ठे बाह्मणोऽपि शुन्य गृहं मुक्ता भिक्षार्थं कचित्
निर्मतः । अत्रांतरे दैववशात कृष्णसपों बिलात् निष्क्रान्तः -
नकुलोऽपि तं स्वभाववेरिणं मत्वा भ्रातुः रक्षणार्थं सर्पेण सह
युद्धा सपे खण्डशः कृतवान् । ततो रुधिराएावित्तवद्नः
सानन्दः स्वव्यापारशरकाशनाथ मातुः सन्मुखो गतः | मातापि
तं रुधिरक्कित्रमुखम् अवलोक्य शंकितचित्ता 'यदनेन दुरा
त्मना दारको भक्षितः”? इति विचिन्त्य कोपाद तस्योपरि
तं जलकुम्भं चिक्षेप । एवं सा नकुलं व्यापाद्य यावत प्रलपंती
गृहे आगच्छति, तावत सुतः तथेव सुतः तिष्ठति । समीपे
कुष्णसर्प खण्डशः कुतम् अबलोक्य पुत्रचधशोकेन आत्मः
शिरोवक्षस्थळं च ताडयितुम् आर्धा । अत्रान्तरे ब्राह्मणो
गुहीतनिवोपः समायातो यावत पश्याति, तावत् पुत्रशोका-
मितत्ता ब्राह्मणी प्रलपति,-“'भो भो लोभात्मन ! लोभाभि-
भूतेन स्वया न कुतं मद्चः, तदबुभव साम्प्रतं पुत्रसृत्युदुःख-
बुक्षफलम् । अथवा साधु इदसुच्यते,- _
तब वह कमी सेजमे पुत्रको सुळा कर जळका घडा छे पतिते बोडी-' ब्राह्मण !
मैं जलके निमित्त सरोवरको जाती हूं तुम इस पुत्रकी नकुछसे रक्षा करना” ।
तब उसके जानेपर त्राझणमी शून्य घरको छोडकर भिक्षाके निमित्त कहीं
गया । इसी समय देवयोगसे एक काळा सांप बिल्ले. निकला | नौडामी उठे
स्वमाववैरी मानकर श्राताकी रक्षाके निमित्त सर्के संग युद्ध कर उस (सर्प )
को खण्ड २ करता भया । तब रुविरसे मुखरंगे आनन्दसे अपने व्यापारको
भार्षटीकासमेतम् ।: (४ ६५ )
प्रकाश करनेके निमित्त माताके सन्मुख गया । माताभी रविरसे गीला उसका
मुख देखकर शाकितचित्तसे “कि, इस दुरात्माने मेरा बाळक खाया है” ऐसा
"बिचार कर कधसे उसके ऊपर वह जळका घडा फेका | इस प्रकार वह नोले-
को मारकर जबतक विलाप करती घरमै आहे तबतक बालक सो रहा था |
निकटही काळे सपैको टुकडे हुआ देखकर पुत्रवधके शोकसे अपना शिर दृक्षकी
जडे मारने छगी । इसी समय त्राण भिक्षा छेकर आय देखने लगा कि,
ुत्रशोकसे त्राझणी विछाप कर रही है। “भो! मो ! छोर्मा ! ढोभके कारण
तेत मेश वचन न किया । सो अब पुत्रकी मृत्युके दुखेळूपी वृक्षका फळ भोग |
अथवा अच्छा कहा हेट
अतिलोभो न कत्तव्यों लोभं नेव परित्यजेत् ।
अतिलोमामिभूतस्थ चक्र श्रमति मस्तके ॥ २२॥”
आति लोम नहीं करना चाहिये और सर्वथा लोम त्यागत मी न करे, आति
लोभी मनुष्यके मत्तकपर चक्र घूमता हे ॥ २२ |!)
आझण आह),-“कथमेतत् १” सा प्राह;-
ब्राह्मण बोला-“'यह कैसे १”? बह बोळी--
कथा ३.
कार्मिश्चित् आधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणपुत्राः परस्परं मित्र-
तां गता वसन्ति स्म, ते चापि दारिद्र्योपहताः परस्परं
मन्त्रं चक्रुः “अहो ! धिक इयं दारिद्रता । उक्तश्च _
किसी स्थानर्म चार ब्राह्मणके पुत्र परस्पर मित्र रहते थे वे दारद्रताको
प्राप्त हो परस्पर विचार करने लगे । “अहो ] इस दारिद्रताको विकार है | कहा है--
वरं चनं व्याप्रगजादिसेवित
जनेन हीनं बहुकण्टकाइतम् ।
तृणानि शय्या परिधानवल्कलं
न बन्धुमध्ये धनहीनजीवितस ॥ २३ ॥
सिंह हाथियोंसे सेवित मनुष्योंसे हीन बहुत काटोंते युक्त बन बहुत अच्छा
है, तृणकी शय्या और वल्कछ वल्न उत्तम है, परन्तु बधु्ोके बीचमें धनहीन
होकर जाना भळा नहीं | २३॥
३०
(४६६) पश्चलन्त्रम्।
तथाच-
और देखो-
४. छ च. वितो Cons = [a
स्वामी द्वेष्टि खुसेवितोऽपि सहसा मोज्झन्ति सद्वान्यवा
राजन्ते न शुणास्त्यजन्ति ततुजाः स्फारीभवन्त्यापद्ः ।
आय्या साधु सुवेशजापि भजते नो याग्ति मित्राणि च
न्घायारोपितविक्रमाण्यपि नृणां येषां न हि स्वाद्धनम् २४॥
जिन मनुष्योके पास धन नहीं है अच्छी प्रकार सेवन करनेसे प्रभु उनका
आदर नहीं करता हे, सद्भान्धत्र उसको त्याग देते हैं, गुण उसके शोमित बही
होते हँ, पुन्रसाग देते हैं, आपत्ति विस्तारको प्रात होती हैं, सतूकुछमे उन्न
हुईं भायो भी उनको नहीं भजती हे, नीतिमागसे पुरुषकारसे प्राप्त हुए भित्र
मी उनके पास नहीं आते हें ॥ २४ ॥
शूरः सुरूपः सुभगश्व वाग्मी
शस्त्राणि शाख्राणि विदांकरोति ।
अर्थ विना नेव यशश्च मानं
प्राम्नोति मच्योऽत्र मतुष्यलोके ॥ २५॥
हूर, सरूपत्ान्, सुन्दर, वाचाळ, शत्रन तथा शालका जाननेवाळा मनुष्य
अर्थेके बिना इस छोकमें यश तथा मानको प्राप्त नहीं होता है ॥ २५ ॥
तानीन्द्रियाण्याविकळलानि तदेव नाम
सा डुद्धिरभतिहता वचनं तदेव ।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुष; स एव
बाह्यः क्षणन भवताात एवाचननतत् ॥ २६ ॥
वही अविकल इन्द्री, वही नाम है, वही अप्रतिहत बुद्धि और वही वचन
है, किन्तु वही पुरुष धनकी गरमीले रहित हुमा क्षणमात्रमें सबसे पृथक होता
हे यह विचित्र हे.॥ २६॥
तूच्छामः कुत्रचित् अर्थाय)? इति संमन्घ्य स्वदेशदुरं
च स्वसुहत्सहितं बान्धवयुतं णहं च परित्यज्य प्रस्थिताः,
अथवा साधु इदमुच्यते-
सो कहीं घनप्रातिके निमित्त जांयगे'' | ऐसा विचारकर अपने देश पुरको
तथा सुहृद बांधवोके सहित घरको छोड़कर चढे | अथवा यह अच्छा कहाहै-
माषाटीकासमेतम्। (४६७)
सत्यं परित्यजति शुञ्चाते बन्छुवर्ग
शीप्रं बिहाय जननीमपि जन्मभूमिम् ।
सरत्यज्य गच्छति विदेशमभीष्टलोकं
चिन्ताकुलीकृतमातिः एसुषोऽन्र लोके ॥ २७॥
सत्यको छोड बन्धुवर्गेको व्यागकर तथा जननी और जन्मभूमिकोभी शीघ्र
त्यागकर चिन्तासे व्याकुछ छुआ पुरुष अमीष्ट लोक वा देशको जाता है ॥२७॥
एवं ऋमेण गच्छन्तोऽवन्तीं प्राप्ताः, तब सित्राजले कृत-
खाना महाकालं भणम्य यावत् निर्गच्छन्ति, तावत् भैरचा-
नन्दो नाम योगी सम्मुखो बभूव | ततस्तं बाझणोचित्तबि-
घिना सम्भाव्य तेनेव सह तस्थ मठ जग्धः । अथ लेन ले
पृष्टाः,-'छुतो भवन्तः समायाताः ? छ यास्थथ १ कि प्रयो-
जनम् ९! । ततः तैः अभिहितम्,- वर्ष लिद्धियात्रिकाः
तत्र यास्यामो यत्र धनातिः घुृत्युर्वा भविष्यतीति एप
निश्चयः । उक्तश्च-
इस प्रकार वे क्रमते जाते भवतिका पुरीम प्राप्तहुए वहा तिप्रानदीके जळमें
खानकर महाकाऊको प्रणामकर जब चळने लगे तबतक भैखानन्द नाम योगी
सामने आया | तन उस ब्राह्मणका उचित विधिसे सत्कारकर उसीफे संग
उप्तके मठको गये । तब उसने घूछा-“तुम काइसे आये हो १। कहा जाभोगे? |
क्या प्रयोजन है,”” तब इन्होंने कहा-“ हमने कार्यसिद्विके निमित्त यात्रा की
हे । जहा घन मिळेगा वहा जायगे चाह मृत्यु होजाय यह निश्चय हे । कहा है-
दुष्प्राप्याणि बहूनि च लभ्यन्ते वाञ्छितानि द्रविणानि ।
अवसरदुलिताभिरलं तनुनिः साहसिकपुरुषाणाम् ॥ २८ ॥
- साहसी पुरुषोंको यथा समयर्मे चेष्टा किये शरीरसे दुर्डम भर बाछित यथेष्ट
बहुतसे घन प्राप्त होते हैं ( आर्य्याबृत्त ) ॥ २८॥
तथाच-
और देखों-
पतति कदाचिन्नभसः खाते पातालतोऽपि जलमेति ।
देवमचिन्त्यं बळचद्वळवानठु पुरुषकारोऽपि ॥ २५ ॥,
(४६८) पञ्चतन्त्रम् ।
कभी जळ आकारासे पुष्करिणी आदिमें पतित होता है, कभी पाताढसे निकलता
है, देव भचिन्त्य ओर बळ्वान् है पुरुषकारमँ यह बात नहीं (विफल) है ॥२९]
अभिमतासिद्धिरशेषा भवति हि पुरुषस्य पुरुषकारेण ।
देवमिति यदपि कथयसि पुरुषगुणः सोचप्यहष्टाख्य॥३०॥
पुरुषकारसे पुरुषको सम्पूण मनोरथ सिद्धि मिळती है ओर जो देवको कहता
है घहभा पुरुषका अदष्ट नामक गुण है ॥ ३० ||
भयमलुळं शुरूलोकातृणमिब तुलयन्ति साधु साहसिकाः ।
आणानड्तमेतञ्चरितं चरितं शदाराणाम् ॥ ३१॥
साहसी पुरुष गुरुजनोंसे भतुळ भय तथा प्रा्णोको तृणकी समान मानते
हें महान् पुरुषोंका यह अद्भुत चरित्र हे || ३१॥
क्केशस्याङ्गमदत्वा सुखमेव सुखानि नेह लभ्यन्ते ।
मधुभिन्मथनायस्तेराक्तिष्यति बाहुमिलेक्ष्मीमू ॥ ३२॥
इस संसारमें शरीरको विना केरा दिये सुखकी प्राप्ति नही होती है मघुसूद-
नने समुद्रमथनसे श्रान्तहुए भुजार्था हाराहा लक्ष्मीकी प्राप्ति को थी॥ ३९ |
तस्य कथं न चला स्यात्पत्नी विष्णोर्तेसिहकस्थापि।
मासांश्चतुरो निद्रां यः सेबलि जलगतः सततम् ॥ ३३॥
चासहरूपघारा उन विष्णुका छक्ष्मा क्या चछायमान चहा जाँ जळत 'स्थत
हो चार महीने निरन्तर निद्रा सेवन करते हैं ॥ ३३ ॥
दुरधिगमः परभागो यावत्पुरुषेण साहसं न कृतम्।
जयति तुलामधिरूढो भास्वानिह जलदपटलानि ॥३४॥
जबतक पुरुष साहस नहीं करता तबतक पराया भाग दुर्छम हे तुळा
( राशि ) को प्राप्त होकरही सूर्य मेघससूहोंकी' जीतता हे ॥ ३४ ॥
तस्कथ्यत्ताम् अस्माकं कश्चित् घनोपायो विवरप्रवेशशा-
किनीसाधनश्मशानसेवनमहांमांसविक्रयसाथकवत्तिम्रशृती"
नामेकनंम इति । अद्वुतशक्तिभेवान् शूयते । वयमपि अति- `
साहसिकाः | उक्तश्व-
सो कोई हमको धनप्रातिका . उपाय कहो, पाताळामन, झाकिंनीसाधन,
इमझानसबन, महामांसविक्रय, साधकवर्ति आदिमें कोई एक ( विधि बताओ )
आप अद्भूत शक्तिवाळे सुन जाते हो । इममी बडे साहसी हैं । कहा हे-
भाषाटीकासमेत्तम् । (४६९)
महान्त एव महतामर्थ साधयितुं क्षमाः ।
ऋते समुद्रादन्यः को बिभति वडवानलम् ॥ ३५ ॥??
महान् पुरुषही महान् अयोको साधनेमें समर्थ होते हैं समुद्रके विना वडवा-
नळ धारण करनेको कौन समर्थ हो सकता हे ? ॥ ३९ ॥”
भेरवानन्दोऽपि तेषां सिद्ध्यर्थं बहूपायं सिद्धवत्तिचतुष्टय॑
कृत्वा अपेयत् । आह, च-''गम्यतां हिमालपदिशि, तच
सम्माप्तानां यत्र वत्तिः पतिष्यति, तत्र निधानम् असन्दिग्घ
प्राप्स्यथ, तत्र स्थानं खनित्वा निधि गहीत्वा व्याधुष्य-
तताम्” । तथा अडुषिते तेषां गच्छताम् एकतमस्य इस्ताद्र-
त्तिनिपपात । अथ असौ यावत तं प्रदेशं खनति तावव
ताम्रमयी भूमिः । ततः तेन अभिदितम्-' अहो ! शह्यतां
स्वेच्छया तास्रस्? । अन्ये ग्रोचुः,- “भो मूठ! किमनेन
क्रियते ! तत् प्रभूतमपि दारिद्रयं न नाशयति । तइत्तिष्ठ
अग्रतो गच्छामः? । सोऽत्रवीत,-“ “यान्तु भवन्तो न अहमभ्रे
यास्यामि” । एवम् अभिधाय तारं यथेच्छया गृहीत्वा
प्रथमो निवृत्तः । ते त्रयोऽपि अभ्रे प्रस्थिताः! अथ किखि-
न्माचं गतस्य अग्रेसरस्य वत्तिः निपपात । सोऽपि यावत
खनितुम् आरब्धः तावत् रूप्यमयी क्षितिः । ततः अहर्षितः
आह)" यत् भो ! गृह्यतां यथेच्छया रूप्यम् । न अग्रे गन्त-
व्यम्’? | तो ऊचलः-“'मोः ! एष्ठतः ताम्रमयी भूमिरश्रतो
रूप्यमथी । तत् नूनम अग्रे सुवर्णमयी भविष्यति । तदनेन
अभूतेनापि दारिद्र्यनाशो न भवति । तत् आवाम् अग्रे या
स्यावः”। एवमुक्ता द्वौ अपि अग्रे स्थितौ । सोऽपि स्वशक्त्या
रूप्यम् आदाय निवृत्तः । तयोरापि गच्छतोः एकस्य अमरे
वत्तिः पपात । सोऽपि प्रहष्टो यावद खनति तावत् खुवणे-
भूमि दृष्टा द्वितीयं म्राह,- भों ! गह्यतां स्वेच्छया खुवर्णम्
सुवर्णोदन्यत् न किञ्चित् उत्तमं भविष्यति’? । स आह,-
“मूढ ! न किश्चित् वेत्सि । माक ताम्रं, ततो रूप्यं, ततः
(४७०) पञ्चतन्त्रम्}
सुवर्णे, तन्नूनमतः परं रत्तानि सविष्यन्ति थेषास् एकतमे-
नापि दारिद्रचनाशो भबति । तहुत्तिष्ठ अग्रे गच्छावः । किस-
नेन सारभूतेनापि भ्रभूतेन? । स आह, गच्छतु भवान!
अहमन स्थितहत्वां घतिपालायिष्यामि”। तथातुठिते सोऽपि
गच्छन् एकाकी शीप्मावमलापसम्तततदुः पिपासाकुलितः
सिदडिमार्मच्छुत इतश्चेतश्च बजाज । अथ चास्यन् स्थलोपरि
पुरुषमेक झथिरप्लावितगात्रं अम्चक्कमस्तकमपश्यत् । ततो
दुततर॑ गत्वा लस् अवोचत, “सोः ! को भवात् ? किमेष
चक्रेण अमता शिरसि तिष्ठसि ?। तत्कथय मे यदि कुत्र
चित् जलसस्ति १! । एवं तर्य प्रवदतः तञ्चक्न तत्क्षणात
तस्य शिरसो त्राह्मणमस्तके चटितम्। छ आइ-- भद्र !
किमेतत् १!” स आह, 'थन्मसापि एवमेच एतत् शिरसि
चटितम्” । स आह-तत्कथय, कदा एतत् उत्तरिष्यति ?।
महुली मे वेदना वर्तते! । स आह,-' यदा त्वामिव कश्चिद
घृतसिद्धिवत्तिः एवमागत्य त्वास् आलापयिप्यति तदा तस्य
मस्तके चटिष्यति” । आह,-' “कियान् कालस्तब एवं स्थि-
तस्य?! स आह, साभ्प्रतं को राजा धरणीतले !” स
आह,-“बीणावत्सराजः'। स आह,- अध तावत् कालस.
ख्याँ न जानानि । परं यदा रामो राजा आसीत तदाई
दारिद्रयोपहतः सिद्विवत्तिमादाथ अनेन पथा समायातः।
ततो मया अन्यो नरो मस्तकधूतचक्रो इष्टः पृष्टश्च । ततश्च
एतत् जातम्? । स,आह,-''भट्ग ! कथं तव एवं स्थितस्य
भोजनजलम्रातिः आसीत् १!” । स आइ,- “भद्र ! धनदेन
निधानहरणभयात सिद्धानामेतत भयं दशितं तेन कश्चिदपि
न आगच्छति । यदि कश्चित आयाति स क्षुस्पिपासानिद्राः
राहितो जरामरणवर्जितः केवलमेवं वेदनाम् अलुभवत्तीति ।
तदाज्ञापय माँ स्वगृहाय,” इत्युक्ता गतः । अथ तास्मित् चि
रयाति स सुबणसिादिः तर्य अन्वेषणपरः तत्पदपंत्तया यावत्
भाषाटीकासमेतम् । (४७१)
किञ्चित् वनान्तरम् आगच्छति तावत् स रुधिरप्लावितश-
-रीरः तीक्ष्णचक्रेण मस्तके समता सबेदनः कणव उपविष्टः
तिष्ठाति। तत्समीपवर्तिता भूत्वा सबाप्प पृष्ट/- “भद्र ! किमे-
तत १” स आह,-विधिनियोगः”? । स आह,- कर तत
कथथ कारणमेतस्य” । सोऽपि तेन पृष्ट; सर्व चक्रवत्तान्तम
अकथयत् । दत्वा असो तं विगर्हयन् इदमाह । “भो! नि-
विद्धः त्वे सया अनेकशो न झणोषिमे वाक्यम्। तत् किं
क्रियते ! विद्यावानपि कुलीनोऽपि बुद्धिरहितः । अथवा साधु
इद्छुच्यते-
भेखानन्दमी उनकी सिद्धिके निमित्त वहुतले उपाय सोच चार सिद्ध वती
बनाकर अर्पण करता हुआ | और बोला-*'हिमाळयकी ओर जावो । वहां
जानेम जहा बत्ती गिरजाय, बहा भवश्य धनको प्राप्त होगे वह स्थान खोदकर
धन ग्रहण कर प्रकाश कगे” ऐसा करनेपर जाते हुए उनमेसे एकके हाथसे
बत्ती गिर पडी, तब वह उस स्थानको खोदने छगा तो ताममयी भूमे
दष्टिगोचर हुई । तब उसने कहा- कहो ! अपनी इन्छासे ताम्रप्रहण करो”? ।
और वोळे“रे मूढ । इसे लेकर क्या करेंगे | बडा दरिद्र तो नाश न होगा । सो
उठो आगे चडो'' । वह बोछा,-' तुम जाओ मे तो आगे न जाऊगा” ।
ऐसा कह यथेच्छ ताम्र ग्रहण कर पहला निइच हुभा वे तीन आगे चछे । तब
कुछ दूर आगे चळकर और बत्ती गिरी | बहमी जव खदने लगा तव चादी-
की भूमि मिळी । तव प्रसन्न होकर बोछा-“भो ! यथेच्छ चादी ग्रहण करो
आगे मत चलो!” वह बोके-'भों ! पीछे ताम्रमयी भूमी यहा चार्दाकी | सो
अवश्य आगे सुवर्णकी भूमी होगी सो इस बहुतसेमी दारिद नाश न होगा सो
हम दोनो भागे जाते हैं” ऐसा कहकर दोनो. आगे चळे ।वहभी अपनी शक्तिसे
चादीकों छेकर निवृत्त हुआ । उन दोनोके चळनेपर भागे फिर वत्ती गिरी ।
वह प्रसन्न होकर जब खोदने को तब सुवणेभूमिकों देख दूसरेसे बोळा-“मो!
अपनी इच्छासे सुवर्ण ग्रहण करो | सुवणेसे और कुछ उत्तम न होगा” । वह
बोळा--“'मूखे | तु कुछ नहीं जानता पहळे ताबा फिर चादी फिर सोना, अब
इसके आगे अवश्य रत्न होंगे | जिनके पानेमें एकसेदी दारिद्का नाश होजायगा |
( ४७२) पञ्चतन्त्रम् ।
सो उठ आगै चळे, इस महावोझके धारणते क्या” । वह बोला-“जाओ मैं
यहीं बैठा तुम्हारी बाट देखता हूं” | एसा कहनेपर वहमी इका जाता हुआ
गरमीके सूर्येतापसे तप्त शरीर हुआ प्याससे व्याकुल हो सिद्धपथते नष्ट हों
इधर उधर घूमने छगा | तब घूमता हुआ स्यळके ऊपर एक पुरुषको रुधिरसे
बित शरीर मस्तकपर चक्र घूमता हुआ देखा सो बहुत शीघ्र जाकर उससे
बोढा- मो ! आप कोनहो ? किस प्रकार शिरेपर चक्र घुमते हुए तुम स्थित
हो | सो बताओ मुझे यदि कहीं जळ हो तो” ऐसा उसके कहतेही उसी क्षण
उसके शिरसे ( वहचक्र ) त्राझणके शिरमें पतित इभा, वह बोठा-““भद्र | यह
क्या है १ जो मेरेभी यह डिरपर पड़ने छगा | सो कहो यह कब उत्तरेगा? ।
मुझे बडा दुःख है! वह बोढा- “जब तेरीसमान कोई सिद्धबत्ती हाथमें लिये
आकर तुझसे बात करेगा, तव यह उसके मस्तकपर पतित होगा? वह बोळा-“यहां
रहते तुझको कितना समय हुआ १” वह बोठा-“इस समय पृथ्वीतळ्मे कीन राजा
है? वह बोळा--'बीणाबत्स राजा है” | बह बोळा-“थें काळसंख्याको तो नहीं
जानता । परन्तु जव राम राजाथे तब में दरिद्रताके कारण सिद्धवत्ती लेकर
इस मार्गसे आया था । तब मैंने और एक मनुष्य जिसके मस्तकपर चक्र
घूमता था देखकर उससे पूछा । तब मेरे ऐसा होगया” । वह वोळा- भद्र !
किस प्रकार तुम्हें यहां जळ ओर भोजनकी प्रात्ति होती है” वह बोळा-“भब्र !
कुबेरचे धन हरणके भयसे सिद्धोंको यह भय दिखाया हे । जिससे कोई भी
यहां नही आता हे ओर यदि कोई भाता है तो क्षुधा पिपासा निद्रासे रहित
जरामरणसे रहित हो केवळ वेदनाको अनुभव करता है | सो मुझे धर जानेको
आज्ञादो”? ऐसा कहकर गया । तब उसको देर होनेपर षह सुवणसिंद्वि उसको
ढूंढता हुआ उसकी पद पंक्तिसे जबतक कुछ वनान्तरे जाता है, तबतक उसको
रुधिरसे प्छावितरारीर तीक्ष्ण चक्र मस्तकपर घूमता बेदनासे व्याकुळ विलाप
करते इए बेठा पाया | उसके समीपवर्ता हो आंखॉमें आंसू भरकर उससे
धुछा- भद्र | यह क्या हे”? १ उसने कहा-“प्रारब्धका नियोग है” वह बोला-
“किसे” 2 बह उससे पूछा हुआ समूर्ण चक्रके वृत्तान्तको कहता इभा । यह
खुन वह इसकी निन्दा करता इभा इस प्रकार बोला,-“मो ! मेंने अनेकवार
निषेध किया परन्तु तेने मेरा बचन न सुना । सों क्या किया जाय । विद्यावान
कुछीत भी बुद्धिरहित होता हे । अथवा अच्छा कहा है-
भाषाटीकासमेतम् । (४७३)
चरं वुद्धिने सा विद्या विद्याया बुद्धिरुत्तमा ।
बुद्धिहीना विनश्यत्ति यथा ते सिहकारकाः ॥ ३६ ॥
बुद्धि अच्छी है वैसी बिद्या अच्छी नहीं बुद्विहीने मनुष्य सिहकारकॉकी
समान नष्ट होते हैं । ३६ ॥
चक्रधर आह-“'कथमेतत् ९! सुवर्णसिद्धिः आह-
चक्रधर बोछा,- “यह कैसी कथा 2” सुवर्णसिद्धि बोळा-
कथा ४.
कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो बाह्मणपुत्राः परस्परं मित्र-
भावम् उपगता वसन्ति स्म । तेषां त्रयः शाख्रपारंगताः
परन्तु बुद्धिरहिताः । एकस्तु बुद्धिमान्, केवले शास्त्रपराइ-
सुख अथ तेः कदाचित मित्रे; मन्त्रितम्। “को झुणो विद्या-
था येन देशान्तरं गत्वा भूपतीन् परितोष्य अर्थोपार्जना न
क्रियते ? ततपूर्वदेशं गच्छामः? । तथावष्ठटिते किश्चिन्मार्मै
गत्वा तेषां ज्येष्ठतरः प्राह,- अहो ! अस्साकमेकः चतुथों
मूटः केवलं बुद्धिमान न च राजप्रतिग्रहो बुद्धया लभ्यते
वेद्या विना । तन्न अस्मै स्वोपाजितं दास्यामि । तद्गच्छतु
गृहम”? । ततो द्वितीयेन अभिहितम्-*'भो सुबुद्धे ! गच्छ
त्वं स्वणृहं यतः ते विद्या नास्ति? । ततः तृतीयन अभिहि-
तम्)- अहो ! न युज्यते एवं कर्ठ यतो वयं बाल्यात् भन्ति
एकत्र क्रीडिताः तत् आगच्छतु महातुभावोऽस्मदपाजितविः
ततस्य समभागी भविष्यतीति । उक्तश्व-
किसी स्थानमें चार ब्राह्मणके पुत्र परस्पर मित्रभावको प्राप्त इए रहते थे ।
उनमें तीन तो झाल्नके पारगामी थे परन्तु घुद्विहीन थे । एक उनमे बुद्धिमान्
कवळ शाह्नसे पराड्मुख था । तब उन मित्राने एक समय सम्मति करी |
“बिद्यासे न्या गुण है जिससे देशान्तरमें जाकर राजोंको सन्तुष्ट करके घन उपार्जन
न किया जाय । सो पू देशको चै । ऐसा कहकर कुछ मार्गमे जाकर उनमे
व्येष्ठतर बोळा,-“'भहो हम्मे एक ही चौथा मूढ केवळ बुद्विमान् परन्तु राजासे
भट कवळ घुद्वस बिद्याक बिना प्राप्त नहीं हाता । सा इम इसका अपना
६ ४७४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
उपार्जन किया न देंगे । सो घर जाओ?” तब दूसरेने कहा- भो सुबुद्ध ! तुम
अपने वरको जाओ कारण कि तुम विद्या नहीं है””। तब तीसरेने कहा- ऐसा -.
करनेको तुम योग्य नहीं हो हम बाढकपनसे एक स्यानमें खेळे हैं । सो आप
महानुभाव आइये हमार उपाजन किये घनके समान भागी होंगे-
किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला ।
या व बेश्वेय सामान्या प॒थिकेछयसुज्यते ॥ ३७ ॥
कहा है उल छक्ष्मीसे बया करें जो केवळ बधूकी समान है और जो साधारण
वेश्याकी समान पथिक्षोंसे नहीं भोगी जाती हें॥ ३७॥
तयाचच-
और देखो-
अर्य मिजः परो वेति गणवा लघुचेततास ।
रचरिलानान्स बसुणेव छुटुस्बकम् ॥ २८ ॥
यह हमारा हे यह पराया यह ल्घाचत्तवाछाका गणना हुं । भार उदार
चारेत्रवारकी वसुधाभर कुटुम्ब हे ॥ ३८ ॥
लदागच्छलु एकोऽपि” इति । तथा असुष्टिते तेः मार्गा"
श्रिवेः अटव्यां खृतसिहर्थ अस्थीनि दृष्टानि । ततश्च एकेन
अभिद्वितम्,- अहो ! अव वि्याप्रत्ययः क्रियते । किशिदु-
तत सत्वं घृतं तिष्ठति, तद्विद्यामभावेण जीवनसाहिति कुमः,
अहस् अश्थिशश्चयं करोनि’? ततश्च एकेन आत्छुक्यात्
अस्थिल्चयः कूलः । द्वितीयेन चर्ममांसरुषिरं संयाजतम्।
नत्तीयोऽदि यावज्जीवनं सञ्चारयति तावत् खुबाद्वना नि"
बिद्धः । “भोः ! तिष्ठद भवात्, एष (सिंहो निष्पाद्यते यदि
एनं सजीवं करिष्यसि ततः सर्वानपि व्यापादयिष्याति'
इति तेन अमिहितः स “घिक मूख ! नाई विद्याया विफ-
लत्तां करोमि” । ततः तेनाभिहितम् तहि पतीक्षस्व क्षण
यावदहं इृक्षमारोहामि” तथाउछिते यावत् सजीवः कृतः
तावत् ते त्रयोऽपि सिंहेन उत्थाय व्यापादिताः स च पुन’
वृक्षात अवतीर्य गृह गतः । अतोऽहं ब्रवीमि
भावाटीदयलमेतम् । (४७५ )
Th
सो यहभी चळे!? | ऐसा करनेपर उन वटोहियोंचे जगछमे मरे सिहकी हड्डी
“देखी । तब एकने कहा- अहो ! भाज विद्याकी परीक्षा करे । कोई यह जीव
मृतक हुआ स्थित है | सो विद्याके प्रभावले उसको जीवित करें | में भस्विस-
चय करू?” । तत्र एकने उत्कठासे अस्थिसंचय की । दूसरेनें ( मन्त्रसे ) चमे
मास रुघिरसे युक्त किया । तीसराभी जवतक उसको जाबित करने लगा ।
तवतक सुबुद्धिने निपेव किया- मो ! आप ठहरो । यह सिह निर्मित किया
जाता है । जो इसे जीवित करोगे तो यह सत्रको नष्टकर देगा” | इस प्रकार
उसके कहनेपर बह वोळा,-' विकू सूखे ! में विद्याको विफळ नहीँ कूगा” ।
नव उसने कहा-“तो क्षणमात्र प्रतीक्षा करो जबतक में इक्षपर चढ जाउ?" ।
ऐसा करनेपर जभी उन्हाने उसे जिवाया तबतक उन तीनोंको उठकर सिहने
मारडाला । और बह फिर रृक्षते उतरकर धर गया । इससे में कहता ह-
वरं बुद्धिन सा विद्या विधाया घुद्धिसत्तमा ।
बुद्धिहीना विनश्यन्ति यथा ते सिहकारका। ॥ ३९ ॥
बुद्धि अच्छी हे विद्या नहीं विद्यासे वुद्धि श्रेष्ठ हे बुद्धिहीन पुरुप सिंह बना-
नेत्रालोकी समान नष्ट होते हैं ॥ ३९ ॥
अतः परसुत्तव्व-
औरमी कहा हे-
अपि शस्रेष कुशला छोकाचारविवर्जिता: ।
स्वे ते हास्यतां यांति यथा ते मूखेपण्डिताः ॥ ४० ॥"
शाल्लर्म भी कुशळ लोकाचारसे हीन सब वे मूखेपडितोकी समान हास्यताको:
प्राप्त होते हैं ॥ ४० ॥?
चक्रघधर आहइ- कथमेतत् ९” सो्बीत-
चक्रधर बोळा-'“यह कैसे 2? वह बोला-
कथा «.
कस्मिश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणाः परस्पर मित्र-
त्वम आपन्ना वसन्ति स्म । बालभावे तेषां मतिः अजायत ।
“सो ! देशान्तरं गत्वा विद्याया उपार्जनं क्रियते”? । अथ
अन्यस्मिन् दिवसे बराह्मणाः परस्परं निश्चयं कुत्वा विद्योषा
(४७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
जेनार्थ कान्यकुब्जे गताः, तत्र च विद्यामठे गत्वा पठन्ति।
एवं द्वादशाब्दानि यावत् एकाचित्ततया विद्याकुशलास्ते सर्वे
सञ्जाताः । ततः तेः चतुभिमिलित्वा उक्तम्-“'वयं सर्व- `
विद्यापारे गत्ताः । तदुपाध्यायम् उत्कलापयित्वा स्वदेश
गच्छामः । तथेव क्रियताम् इत्युक्ता ब्राह्मणा उपाध्याय-
सुत्कलापयित्वा अततुज्ञां लब्ध्वा पुस्तकानि नीत्वा प्रचलिताः
यावत् काश्चत् माग यान्त तावत द्वा पन्याना समायाता ।
उपविष्टाः सर्वे तत्रेकः प्रोवाच,- किन मार्गेण गच्छामः ९
एतस्मिन् सभये तस्मिन् पत्तने कश्चित् वणिक्पुत्रो मृतः
तस्य दाहार्थे महाजनो गतोऽभूत् । ततः चतुणी मध्यात्
एकेन पुस्तकम् अवलोकितम्-' महाजनो थेन गतः स
पन्थाः? इति “तत् महाजनमार्गेण गच्छामः” । अथ ते
पण्डिता याबत् महाजनमेलापथिकेन सह यान्ति तावत्
रासभः काश्चित् तत्र श्मशाने ष्टः। अथ द्वितीयेन पुस्तकम्
उद्घाटय अबलो कितम्-
किसी स्थानमें चार ब्राह्मण परस्पर मित्र रहतेये । बालकमावमेंही उनको
यह बुद्धि हुई कि,- सो | देशान्तरमं जाकर विद्या उपाजन करना चाहिय”।
तब और दिन वे ब्राह्मण परस्पर निश्चय करके विद्या उपाजेतके निमित्त कनो-
जको गये । वहां विद्यालयमै जाकर पढ़ने ळगे । इस प्रकार बारह वर्मे एक
चित्तसे बिद्या पढ़तेमें वे सब विद्याम कुशळ इए | तब उन चारोंने मिलकर कहा-
“इम सब विद्याके पार हुए सो उपाध्यायको संतुष्ट कर अपने देशको जांय' |
“एसाही करो” यह कहकर वे ब्राह्मण उपाम्यायको सन्तुष्ट कर उनकी आज्ञा लेकर
पुस्तकें लेकर चळे | जबतक कुछ मा्ेमें जाते हैं कि तबतक दो मागे आये ।
सब वेठ गये | उनमें एक बोळा,-“किस मार्गसे जांय १ '7 | इसी समय उस
-चगरमें कोई बणिकृपुत्र मरगया । उसके दाहके निमित्त महाजन जाते थे । तब
चारोंके बीचमें एकने पुस्तक खोळ कर कहा--"जिसमें बहुतसे ढोंग गमन
करते हैं बही मागी है इससे महाजबोंके मागस गमन करें” | तब वे महाजन
जब महाजनके संग मार्ग जाने लगे । तबतक इमज्ञानर्मे कोई गधा देखा । तब
-दूसरेने पुस्तक खोलकर देखा कि-
भाषाटीकासमेतम् । (४७७)
“उत्सवे व्यसने प्राते दुभिक्षे शचुसंकटे ।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः ॥ ४१॥
“उत्सव, व्यसनप्रात्ति, दुभिक्ष, शत्रुसकट, राजद्वार भोर इमशानमें जो
स्थित हो वह बडु है॥ ४१ ॥
तत् अहो ! अयम् अस्मदीयो बान्धवः” । ततः कश्चित्
तस्य वायां लगति । कोऽपि पादौ पक्षालयाति। अथ
यावत् ते पण्डिताः दिशाम् अवलोकनं कुर्वन्ति तावत् कश्चित
उष्टो दष्टः । तेश्च उक्तस,-- “एतत् किस् ?” तावत् तृतीयेन
पुस्तकम् उद्धाट्य उक्तम्, धर्मस्य त्वरिता गतिः” “एष
अर्मस्तावत” । चतुर्थेन उक्तम्,- इष्टं धमेण योजयेत् ।” अथ
तेश्च रासभ उष्टुग्रीवायां बद्धः केनचित् रजकस्य अभ्रे कथि-
तम् । यावत् रजकः तेषां मूर्खपण्डितानां प्रहारकरणाय
समायातः तावत ते भनष्टाः यावदम्रे किंश्चित् स्तोकं मार्ग
यान्ति तावत् काचित् नदी समासादिता । तत् तस्या जल-
मध्ये पलाशपत्रम् आयातं दृष्टा पण्डितेन एकेन उतक्तम्--
सो अहो यह हमारा वशु है” । सो कोई उसकी ग्रीबामे गता है कोई
चरण धोता दे । तब ज्योंद्दी वे पडित दिशाभोकी ओर देखते हैं तबतक कोई
उट देखा । उन्होंने कद्दा-“यह क्या है ?” तव तीसरेने पुस्तक खोलकर
कहा-“ धमकी शीघ्र गति है” | “यह धर्म हे” चौयेने कहा-“ष्टको धर्मके
साथ सयुक्त करना चाहिये” | तब उन्होंने गलेको उटकी गरदनमें बाधा ।
तब यह किसीने धोबीके आगे कहा सो जबतक बह धोबी उन मूर्ख पडितोंको
प्रहार करनेको आया । तवतक षे पळायन करगये । जबतक आगे किसी छु
मागको प्राप्त हुए कि तवतक कोई नदी मिली तब उसके जळमें ढाकका पत्र
भाया देखकर एक पडितने कहा-
“आगमिष्यति यत्पत्रं तदस्मांस्तारथिष्यति ।7?
“जो यह पत्र आ रहा है सो हमको तार देगा ।?
एतत् कथयित्वा तत्पन्रस्य उपरि पतितो यावत् नद्या
नीयते तावत् तं नीयमानम् अवलोक्य अन्येन पण्डितेन
केशान्तं गहीत्वा उक्तस
(४७८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
ऐसे कह उस पत्रके ऊपर शिरे जबतक्र नदी उसे ( पंडितको ) बहा
खेचळी तबतक उसे वहता हुआ देख दूसरे पंडितने बाल पकडकर कहा--
“सर्वनाशे खछुत्पन्ने अद्ध त्यजति पण्डित; ।
अद्धेन कुर्ते काय्य सबनाशो हि इभ्सहः ॥ ४२॥”
सर्वनाश उपस्थित होनेमे पडित जन सधा व्यागदेते हें आधेसेही कावे
करते है कारण कि सर्वनाश नहीं सहा जाता है ॥ ४२ ॥
he ह. कल
इत्छुक्ता तस्य ॥रारश्च्छंदां राहत: । अथ तश्च पश्चात्
गत्वा काश्चद्याम आप्लादेतः । ताप ग्रामीण निभन्तिताः
पृछक पृथक गहेष नीलाः । ततः एकस्य सून्रिका घतखण्डसं
युक्ता भोजने दत्ता । ततो विचिन्त्य पण्डितेन उक्तम्- “यही
घसूत्ली विनश्यति’ -एवस्ुकत्वा भोजन परित्यज्य गतः। तथा
द्वितीयस्य मण्डका दत्ताः! तेनापि उक्तश्च- अतिविस्तार
विस्तीण तद्वन्न चिरायुषम्’ । स च भोजन त्यक्ता गतः
अथ ततायस्थ वाडकाभाजन दत्तम् । तत्राप पाण्डतन
उक्तम्- छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति? एवं तेऽपि त्रथः पण्डि
ताः क्षुत्वासनन्ठा लाक हाश््षमानाः तत) स्थानात् स्व-
देश गताः] अथ सुवर्णसिद्धि आइ- यस्बं लोकव्यवहारम्
टाजानंन् मथा वाय्यमाणाञपं न।स्थत' ततः इटशामवस्थास्
पतः । अतोऽहं ब्रवीमि-
ऐसा कह उसका शिर काट छिया । तव वह पीछे फिर कर किसी ग्रामे
पहुंचे | उन्हे ग्रामीण निमंत्रित कर पृथक् पृथक भपने घर छेगथे तब एकचे
सूत्रवृत खांडल युक्त भोजनको दिया | तब विचार कर पंडितने कहा-“जो
कि दीघेसूत्री ( आछसी ) नष्ट होता है” | ऐसा कह भोजन त्याग कर गया !
दूसरेने मण्ड (मिष्टाल) दिया तब उसने कहा “ अतिविस्तारसे विस्ती 'चिरायुके
निमित्त नहीं होता है” | भोर वह मौ भोजन त्याग कर चळागया । तासरबे
वाटिका ( फिट्टी ) का भोजन दिया | षह्यां भो उत्त पंडितने कहा- छिद्र युक्त
{ पिष्टक ) में बहुत अनर्थ होते हैं!” । इस प्रकार षे तीनो पंडित सूलस ब्या-
कुछ छोकोंसे इंसीको प्राप्त हुए अपने देशोंको प्राप्त हुए । तब सुबणोतीद्धि
बोढा- जो कि तू छोकव्यवहारको न जानकर मुझसे निवारण किया हुआ भी
न स्थित हुआ इस कारण ऐसी दशाको प्राप्त-हुआ-। इससे में कहता-हूं--
भाषाटीकासमेतम्। (४७९)
अपि शाख्रेघु कुशला लोकाचारविवर्जिताः ।
सर्षे ते हास्यतां थान्ति यथा ले सूखपण्डिताः ॥ ४३ ॥?!
कि, शाल्नमे कुशल भी लोकाचार न जानने कारण उन मूर्ख पडितोकी
समान वे सभी हास्यताको प्राप्त होते हैं ॥ ४३ ॥!?
तत् श्रत्वा चक्रधर आह- अहो | अकारणमेतत ।
यह सुनकर चक्रधर बोछा-'जहो | यह तो अकारण है।
बहुबुद्धयो विनश्यन्ति इष्टदैवेन नाशिताः ।
स्वल्पबुद्धयोप्प्पेकास्मिन कुले नन्दन्ति सन्ततम् ॥ ४४॥
हुए देवसे नाशित होकर महाबुद्धिमान् भी नष्ट होते हें भौर स्तर्पबुद्धिवारे
भी एक कुमे निरन्तर आनन्दको प्राप्त होते है ॥ ४४ ॥
उक्तश्च-
कहा है कि- १
अरक्षितं तिष्ठति दैवरक्षितं
सुरक्षितं देवहत॑ विनश्याति।
जीवत्यनाथोऽपि वने विसर्जित+
कृतम्रयत्रोषपि सहे न जीवाति ॥ ४५॥
नहीं राक्षित किया दैवसे राक्षेत होकर स्थित रहता है, भढी प्रकार रक्षा
कया हआमी देवसे हत होनेके कारण नष्ट हो जाता हे, वनमे विसर्जन किया
अनाथ मी जाता हे, और यत्न करनेपर घरमें भी नही जीता ॥ ४१ ||
तथाच-
आर देखो-
शतबद्विः शिरस्थोऽयं लम्बते च सहखधीः
एकब॒द्विरह भद्रे कडामि बिमले जले ॥ ४६॥'
यह शतबुद्धि शिरपर है ओर यह सहलबुद्धि छठकता हे ह् भरे | भ एक-
बुद्धि हू जो उच्घ्य जलम क्रीडा करता हू ॥ ४६ ॥
सुबणद्धिः आह+-कथमेतत' स आह,-
- सुवर्णसिद्धि वोळा- “यह केसे??? चक्रधर बोला-
(४८० ) पञ्चतन्त्रम् ।
_ कथा ६
कार्मिंश्चित् जलाशये शतबुद्धिः सहस्बुद्धिश्व दो मत्स्यो
निवसतः स्म। अथ तयोः कब्चद्धिनाम मण्डका मत्रता गत |
एवं ते त्रयो$पि जलतीरे कञ्चित् काळं वेलायां सुभाषितसु
खम् अठुभूय भूयाप सालल भावशान्त अथ कदाचचत तेषां
गोष्ठीगतानां जालहस्तधीवराः पनूतः मत्स्येः व्यापादिते
मस्तक गवदूत* अस्तमनवलाया तास्मन् जलाशय समा-
याताः | ततः सलिलाशयं दृष्टा मिथः प्रोचुः-अहो ! बहुम
त्प्पोष्य हदा दश्यत स्वल्पसाललश्व । ततभाते अन्न आग-
मिष्यामः? । एवमुक्त्वा स्वगरहं गताः । मत्स्याश्च विषण्ण-
बदना मिथो । मन्त्रं चकः ततो मण्डूक आह-“भोः ! शत-
बुद्धे ! शतं धीवरोक्तं भवता ? तव किमत्र युज्यते करम् !
पलायनम् अवष्टम्भो वा ? यत्कत्तं युक्तं भवति तत् आदिश्य-
ताम् अद्य १” तत् श्रत्वा सहस्रबुद्धिः भस्य आह,-भो
मित्र | मा सषायतो वचनरुमरणमात्रादव भयं न काय्यम्।
न भेतव्यम् । उक्तश्च-
किसी सरोबरमें शतथुद्धि और सहसबुद्धि नामके दो मच्छ रहते थे | उनका
एकबुद्धिनाम मेडक मित्र होगया । इस प्रकार बे तीनों ही जळके किनारे किसी
कालतक सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभव कर फिरभी जकमें प्रवेश कर जाते |
कमी गोष्ठीमें प्राप्त होनेपर जाळ हाथमे लिये धीमर बहुतसी मच्छियोंको मार-
कुर मस्तकपर घरे अस्तके 'समय उस सरोवरके निकट प्राप्त इए | तब सरोव-
रको देख परस्पर कहने लगे-“'अहयो ! यह ह्रद बहुत मछलियोंसे युक्त थोडे
जळवाला हे । सो प्रातःकाल यहां जादग” | ऐसा कह अपने घर गये | तव
मत्स्य व्याकुळ हो परस्पर मेत्रणा करने लगे | तब मेडक बोळा-““भो शतबुद्धि !
सुना तुमने धीमरोंका वचन | सो अब क्या करना उचित है ? पछायन
करना वा गुप्त होकर यहां रहना ? । जो करना उचित समझो वह भमी कहोई?
यह सुन सहसबुद्धि इँसकर बोळा,--“ मित्र | डरो मत, वचनके स्मरण मात्रसेही
~
भय न करना चाहिये, मत डरो | कहा हे कि-
भाषारीकासभेतम् । (४८१)
सपीणाश खलानाच सर्वेषां दुष्टंचतसाम् ।
अभिमाया न सिद्धचन्ति तेनेदं बत्तेते जगत् ॥ ४७ ॥
सर्प, खळ, और सत्र प्रकारके दुष्टचित्तवाळे पुरुपोके अमिप्राय सिद्ध नहीं
होते हैं इसासे यह जगत वर्तता है || ४७॥
तत् तावत तेषाम् आगमनमपि न सम्पत्स्यते, भबिष्य"
ति वा, तहिं त्वां बुद्धिमभावेण आत्मसहितं रक्षयिष्यामि
यतोऽनेकां सलिलमतिचय्याम् अहं जानामि’? । तत् आक-
ण्यं शतङुद्धिः आह,~ भो ! युक्तमुक्तं भता, सदस्तबद्धिरेष
भवान्। अथवा साधु इदयुच्यति-
सो पहले तो उनके आगमनकीमी सम्भावना नहीं। और होगा लो तुझे
चुद्धिके प्रभावत्त अपने सहित रक्षा करुणा । कारण अनेक जलको गतियोंमें
चलना में जानता टू” यह सुनकर शातर्घुद्दि बोढा,-+भो ! तुमने सत्य कहा ।
आप सहर बुद्धिही हो । अथवा यह अच्छा कहा है--
बुद्धेब॒द्धिमतां लाक नास्त्यगम्यं हि किचन ।
बुद्धया यतो इता नन्दाश्वाणक्येनासिपाणयः ॥ ४८॥
बुद्धिमानोंका बुद्धिके सम्मुख ससारमें कोई वस्तु भगम्य नहीं होती वादवसेही
चाणक्यने खङ्गपाणि नन्देका वध किया ॥ ४८ ॥
तथाच-
और देखो--
न यत्रास्ति गतिर्वायो रश्मीनाथ विवस्वतः।
तत्रापि विशत्याशु बुद्धिईद्विमता सदा ॥ ४९ ॥
जहा वायु और सूर्यकी किरणको गति नहीं हे षहामी वुद्धिमानोकी बुद्धि सदा
प्रवेश कर जाती हे! ४९, ॥
ततो वचनश्रवणमात्रादपि पितुपय्यायागतं जन्मस्थानं
त्यछु न शक्यते । उत्तत्च-
Un बक
सो घचनश्र णमात्रसेही पिता आदिके क्रमस प्रत हुई जन्मभूमि त्यागेको
सप्र नहीं होना | कहा है कि-
३१
(४८२) पञ्चतन्त्रम् ।
न तस्स्वर्ेऽपि सोख्यं स्थादिव्यस्पर्शनक्षा मने ।
कुस्थानेऽपि भवेत्पुंसां जन्मनो यत्र सम्भवः ॥ ५० ॥
बह् दिव्य स्पशेसे शुभग स्वगमेमी सुख नहीं हे जो सुख पुरुषोको कुत्सित
जन्मस्थानमें भी होता हे | ५०॥
तन्न कदाचिदपि गन्तव्यम् । अहं त्वां सुबुद्धिमर्भावण
रक्षयिष्यामि” । मण्डूक आह,-“भद्रो | मम तावत् एका
एव बुद्धि; पलायनपरा, तत् अहम् अन्यं जलाशयमणेद
समाय्यों-यार्घा न” एवमुक्त्वा स मण्डको रात्रो एव अन्य"
जलाशय गतः थीवरेः अपि प्रभाते आगत्य जधन्यमद्पमो-
तमजलचरा मत्स्थकूमेमण्ड्ककर्कटाद्यो गृहीताः तो अपि
शतबुद्धिसहल्चुद्वी सभाय्धो पलायमानो चिरम् आत्मानं
गतिविरोषबिज्ञानेः कुटिलचारेण रक्षन्तो जाले पातितो व्या-
पादिनो च। अय अपराहसमये प्रहष्टास्ते धीवराः स्वणहं प्रति
स्थिताः । गुरूत्वात् च एकेन शतबुद्धिः स्कन्धे कृतः। सह
स्रबुद्धिः प्रलम्बमानो नीयते । ततश्च वापीकण्ठोपगतेन मंड-
केन तो तथा नीयमानो दृष्टा अभिहिता स्वपत्नी-भिये !
पश्य पश्य ।
सो किता प्रकार डरना न चाहिये | में तुम्हारी अपनी बुद्धिके प्रमाबसे
रक्षा करूंगा”! मण्डूक बोळा- मद्रा! मेत तो एकह्दी बुद्धि पठायनम है, सा में
तो दूसरे जळाशयको भमी भायीके सहित जाता हू, ऐस! कहकर वह मण्ड्क
रात्रिमेह्ी दूसरे जलाशयक्को चग्रगया । घीमरानभी प्रतत:काळ भाकर निकृष्ट
पम,उत्तम जलचर मत्त्य कछुर मेंडक, कॅकडे आदि पकडे यह दोनोंभी दात-
बुद्धि सहसबुद्धि भायोसहित भागतेहुए वहुत समयतक्र , भपनेक्रो गतिविरोषक
विज्ञान और कुटिळाचरणसे रक्षा करतहुए अन्ते जाळते पडकर मारेगये | तब
तसरे प्रहरके समय प्रपन्न इए वे धीमर अपने घ(की ओर चढे । भारी होते
एने शतबुद्धको कंधेपर घरा, सहलबुद्धिकोभी टटकाकर छेचडे | तब वाव-
डीके समीप प्राप्तहुए मण्डूकने उनको इस प्रकार छेज ता देख अपनी जीसे
कृहान ग्रिन ! देखो देखो !
भाषाटीकासमेतम् । र ४८३)
शतबुद्धिः शिरस्थो5यं लम्चते च सहस्नधीः । र
एकबुद्धिरह भद्रे ! क्रीडामि विमले जले ॥ ५१ ॥/)
` यह शातबुद्धि शिरपर है और यह सहखबुद्धि लटकता हे हे भद्दे | में एक-
बुद्दि निमेळ जलमें क्रीडा करता हू ॥ ५१ ॥!
अतोऽहं बवीमि-“'न एकान्ते डुद्धिरपि प्रमाणम्’? । खुव-
सिद्धिः आह“ “यद्यपि एतदस्ति तथापि मित्रवचनम अहु-
छंघनीयम्। परं कि क्रियते । निवारितोऽपि मया न स्थितोऽ-
तिलौल्यात् विद्याहंकाराच । अथवा साधु इदसुच्यते,-
इससे में कइता हु-“निरी वुद्धिकाही प्रमाण नहीं दै” सुवर्णसिद्धि बोडा-
“यद्यपि ऐसा दे तथापि मित्रके वचन उल्लघन करने नहीं चाहिये परन्तु क्या
कियाजाय, मेरे निवारण करनेपरभी तो चञ्चत्र्तासे न ठहरे तथा विद्याका भह-
कार किया | अथवा यह अच्छा कहा हन"
साध मातुल गीतेन मया प्रोक्तोऽपि न स्थितः ।
अपूर्वोषयं मणिर्यद्वः सम्मात्त गीतलक्षणम् ५२ ॥”
धन्य नामा! घन्य ! मेरे कहनेपरमा गीतप्रिय होनेके कारण आप स्थित न
हुए तिससे यह भपूत्रे माणि बावकर गीतका पुरस्कार प्राप्त किया ॥ ५२ ॥”
चक्रधरः, प्राह्, कथमेतत !?? सोऽवीत- '
चक्रधर चोळा=“यह कैसे |!" सुवणेतिद्धि बोला-
कथा ७.
कस्मिश्चित् अधिष्ठाने उद्धतो नाम गदेभः प्रतिवसातिस्म।
स संदेव रजकर्ह भारोदहनं कृत्वा रात्रो स्वेच्छया पर्य्य-
टाति । ततः प्रत्यूषे बन्धनभयात् स्वयमेव रजकगहम् आ“
साति । रजकोऽपि ततस्तं बन्धने न नियुनक्ति । अथ तस्य
रात्रो पर्य्येटतः क्षेत्राणि कदाचित् श्रगालेन सह मेती
सञ्जाता । स च पीवरत्वात् दृतिभंगं कृत्वा कर्केठिकाक्षेत्रे
अगालसद्दितः प्रविशति । एवं तो यदृच्छया चिभेटिकाभ-
क्षणं कृत्वा प्रत्यहं प्रत्यूषे स्वस्थानं त्रजतः । अथ कदाचित
लेन मदोद्धतेन रासभेन व्वेत्रमध्यास्थितेन शगालोऽभिहित्तः
(४८४) पञ्चतन्त्रम् !
“भो भगिनी खत ! पश्य पस्य, अतीव निर्मला रजनी । तदह
गीतं करिष्यामि । तत कथय कतमेन रागेण करोमि १)?
आइ,- “मामा किमनेन वृथा अनथप्रचालनेन यतः चोरक्म
प्रवृत्तो आवां निःतेश्व चोरजारेः अत्र स्थातव्यम् । उक्तश्च-
किसी स्थानभें उद्धत नाम गधा रहता था । पह सदा घोबीके घरमै बोझ
उठाकर रात्राको स्वेच्छासे पर्यटन करता । और प्रातःकालही बन्धनके भयसे
स्वयं ही घोबीके घर आजाता । रजक भी उसको बन्धनम न नियुक्त करता ।
तव उसके रात्रिमे घूमतेहुए क्षेत्रेम श्वगाळके साथ एक समय उसकी मित्रता
होगई । बह पुष्ट हॉनेसे बाड तोडकर ककडाके खेतमें श्रगालसहित घुस
जाता । इस प्रकार वे यथेच्छ ककडी भक्षण करते प्रतिदिन प्रातःकाळ अपने
स्थानको जाते | तब कमी उस मदोद्धत गधेने क्षेत्रके मध्यस्थित हो शशगाढसे.
कहा-“मो भानजे | देख २ बडी निर्मळ रात्रि हे । सो में गीत करता हूं ।
सो कह कौनसे राग ( खर ) सें गाऊं ?? | वह बोळा,~“मामा ! इन अन-
थेके व्यापारसे कया है ? बयो कि चोरझममें प्रकत इए हम दोनो हैं | इस
ससारमं चोर जारोंको मोब रहना चाहिये । कहा है-
कासयुक्तस्त्यजेच्चोय्थ निद्राछश्वेत्स चोरिकाम्।
जिह्वालाल्य रूजाक्रान्ता जीवित याऽन वाञ्छात शा
खांसीबाळा चोरी न करे, बहुत सोनेबाळा चोरीकी दृत्तिको त्यागन करे
रोगी जिह्वाका खाद त्यागदे, जो जीवनकी इच्छा करे तो [| ९६३ ॥
अपर त्वदाय गात न मधुरस्वर शखशब्दाबुकार दूरा-
दाप श्रूयत । तदच क्षन्न रक्षापुरुषाः सन्ति । त उत्याय वध
बन्ध वा कारष्यान्त । तद्वक्षप तावत् असृतमया' चिभटीः
मा त्वम अत्र गीतव्यापारपरो भव । तत श्रत्वा रासभ
आह,- मो ! बंनाश्रयत्वरात त्वं गीतरसं न वेत्सि । तेन एत
दत्रवाषे । उक्तव्व-
फिर तेरा गीतभी मधुर, सरका नहीं हे झांखके शब्दकी समान दूरसे भी
सुना जाता हे । ओर इस खेतर्मे रक्षा पुरुष हैं | वे उठक्तर बध वा बंधन
करेंगे सो अमृतमय ककडी खाओ । इस समय तुम गीतका व्यापार मतकरो” |
यह सुनकर गधा बेछा,-“मो ! वनवासी होनेसे तू गीतरसको नहीं जातता है
इससे ऐसा कहता है “कहा है-
भाषाटीकासमेतम्। (४८५१
शरज्ज्योत्लाइते दूरं तमलि मिंयसत्रिथी । _
घन्घानां विशाति श्रोत्रे गीतझंकारजा सुधा ॥ ५८ ॥१
शरदरमे चन्द्रकषिरणद्वारा अधकार दूर (नाश ) करनेपर प्रिय जनोके
निकट बडमागी पुरुषेके कानमें गीतके झकारते उत्पन्न हुईं सुधा प्राप्त
होती हे ॥ ५४ ॥”
शृगाल आह-“माम ! अस्ति एतत्, परं न वेत्सि त्वं
गीतं केबलम् उन्नद्सि । तत् कि तेन स्वार्थश्रंशकेन १” रासभ
आह,-“'धिक् धिक सूख! किमहं न जानामि गीतम १
तद्यथा तस्य भेदान् शणु-
श्रगाळ बोला,- मामा ! हे तो ऐसाही परन्तु तुम गीत नहीं जानते केवळ
कुष्सित शब्द करते हो, सो उस स्वाथनाशक ( गीत ) से क्या है” । रासम
वोढा-- घिक् | धिक् मूखे | क्या मैं गीत नहीं जानता सो उसके भेद सुन-'
सप्त स्वराखधो मामा मूच्छेनाश्चैकविशतिः ।
तालास्त्वेकोनपश्चाशत्तित्रो मात्रा लयाखयः ॥ ५५ ॥
सात स्वर ( निषाद, ऋषम, गान्वार, पड़ज, मध्यम, देवत, पचम ), तीव
ग्राम, इक्कीस मूर्च्छना, आरोह अवरोहक स्वर, उनचाश ताऊ, तीन मात्रा,
तीन ळय ॥ ९५९ ॥
स्थानत्रयं यतीनाञ्च षडास्यानि रसा नव ।
रागाः षट्निशति्भावाश्चत्वारिंशत्ततः स्मृताः ॥ ५६ ॥
यतियोंके तीन विसम स्थान, छः सुख, नौ ( शगार, हास्य, करुणा, रौड,
वार, भयानक ) रस, छत्तीस राग, ४० चाळीस भाव॥ ९६१ ॥ द्
पश्चाशीस्यधिकं ह्ेतङ्गीताङ्गानां शतं स्मृतम् ।
स्वयमेव पुरा घोक्तं भरतेन श्रुतेः परम् ॥ ५७ ॥
यह एकसो पचासी गीतके अग श्रुति पर भरत सुनिने स्वय कहे हैं ॥५७॥
नान्यह्रीतात्मियं लोके देवानामपि हश्यते ।
शुष्कस्मायुस्वराह्लादाञ्यक्ष जघ्राह रावणः ॥ ९८ ॥
गीतसे अधिक छोकर्मे प्रिय भौर कुछ नहीं है तप करनेसे शुष्क इन्द्रिय
दिरा युक्त होकरभी स्वरसे ही रावणने शिषजीको पशीभूत कियाथा ॥ ६८ ॥
(४८६) पञ्चतन्त्रम् ।
तत् कथं भगिनीसुत ! माम् अनभिज्ञ वदन् निवार-
यति ?? । शृगाल आह,” माम ! यादि एवं तदहं तावद्
वृतेः द्वारस्थितः क्षेत्रपालम् अवलोकयामि । त्वं पुनः
स्वेच्छया गीतं कुर? । तथा अबुषिते रासभरटनम् आकर्ण्य
क्षेत्रपः क्रोधात् दन्ताव् घर्षयन् प्रधावितः । यावत् रासभो
इष्ट; तावत् लणशुडभ्रहारेः तथा हतो, यथा भताडितों
भूपे पतितः। ततश्च सच्छिद्रम उळखलं गले बद्धा क्षेत्र
पालः प्रखुतः । रासभोऽपि स्वजातिस्वमावात गतवेदनः
क्षणेन अभ्युत्थितः ।
हे भानजे ! सो तू मुझे अनभिज्ञ किस प्रकार कहकर निवारण करता
है” | झर्गाळ बोला,-“जो ऐसा है तो में वृतिके द्वारपर स्थित हुआ क्षत्रपाळको
अवलोकन करूं । तू अपनी इच्छासे गीतका गान कर” । ऐसा करनेपर
गपेका शब्द सुनकर क्षेत्रपाल ओधसे दांत पीसता धावमान इभा और गधेको
देखते ही इस प्रकार लगुड प्रहारसे ताडन किया कि वह ताडित हो पृथ्वीपर
गिर पडा | तन् सछिद्र उळ्खळको उसके गलेमे बांधकर क्षेत्रपाल सो मया!
और गधाभी जातिस्वभावसे वेदना रहित हो क्षणमात्रमें उठ बैठा ।
उक्तत्व-
कहा है-
“सारमेयस्य चाश्वस्य रासभस्य विशेषत; ।
सुहूतात्परतो न स्यात्महारजनिता व्यथा ॥ ५९ रै
कि कुत्ता घोडा भौर बिशेष कर गधा एक मुहूर्तसे पीछे इनको प्रहारकी
व्यथा नहीं होती हे || ९९ ॥”
ततः तदेव उळूखलम आदाय वृतिं चुणोयेत्वा पलायि-
तुम् आरब्धः । अत्रान्तरे श्रगालोऽपि दूरादेव तं दृष्टा सस्मि-
तम् आह-
इस कारण उसी उळूलको देकार उस वाडको तोड भागने लगा । इसी
समय शइगाळना दूरस उत्त दख हसता हुआ बाला ण
“साधु मातुल गीतेन मया क्तोऽपि न स्थितः
अपूवोऽयं माणिबंद्धः सम्मातं गीत्तलक्षणम् ॥ ६० पर”
भाषाटीकासमेतम्। ( ४८७ )
“बन्य मामा ! मेरे कहे हुए गीतक्षभी भाप यथेष्ट स्थित न हुए यह अपूर्व
मणि बाव छी मळा गीतका लक्षण प्राप्त हुभा ॥ ६० |!
` तद्भवानपि मया वारयमाणोऽषि न स्थितः ? । तत्
श्रत्वा चक्रधर आह,- "भो मित्र! सत्यमेतत् । अथवा साधु
इ द्घच्यते-
इसी कारण ठुममी मेरे निवारण करनेसे स्थित न हुए” | यह सुन चक्रधर
चोढा,-''भो मित्र | यह सत्य है । अथवा यह अच्छा कहा है-
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा मित्रोक्तं न करोति यः ।
स एव निधनं याति यथा मन्थरकोलिकः ॥ ६१॥”
जिसको खय वुद्धि नहीं और मित्रका कहा नहीं करता हे वह मन्थर को
ककी समान निधनको प्राप्त होता हे॥ ६१ |?
सुवर्णसिद्धिः आह- कथमेतत् ११” सोऽब्रवीत्-
सुबणीसिद्धि बोला-“यह केसे 2? बह वोळा-
कथा <.
कस्मित्चित अधिष्ठाने मन्थरको नाम कोलिकः प्रति-
वसति स्म, तस्य कदाचित पट्कमाणि कुर्वतः सर्वपट्टकर्म-
काष्ठानि भग्नानि । ततः स कुठारम् आदाय वने काष्ठार्थ
गतः! स च समुद्रतटं यावत् स्मन् मयातः, ततश्च तत्र शि-
शपापादपर्तेन इष्ट ततः चिन्तितवान् “महान् अथं वृक्षो
इश्यते । तदनेन कत्तितेन प्रभूतानि पट्टकर्मापकरणानि भवि-
ष्पन्ति! इति अवधार्य तस्योपरि कुठारमुतक्षितवान् | अथ
तत्र वृक्षे कश्चित् व्यन्तरः समाश्रित आसीत् । अथ तेन
अभिहितं-“भो ! मदाधश्रयोऽयं पादपः, सवथा रक्षणीयो,
यतोऽहम् अब महासरख्पेन लिष्ठामि समुद्रकललोलस्पर्शनात
शीतवायुना आप्यायितः” कोलिक आइ- भो; ! किमहं
करोमि, दारुसामगी बिना मे कुटुम्बं बुसुक्षया पीड्यते ।
तस्मात् अन्यत्र शीघ्र गम्यताम् । अहम् एन कत्तेयिष्यामि”
व्यन्तर आहत मो; ! उुष्टः तव अहृम्। तत् प्राथ्यंताम् अ-
[ ४८८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
भोष्टं किखित् । रक्षनं पादपम्’? इाति । कोलिक आह-“यदि
एब तदह स्वग॒ह गत्वा स्वामन स्वभाय्याक्च एषा आगोम-
ष्यामि । ततः त्वया देयम्? । अथ तथा” इति प्रतिज्ञाते
व्यन्तरण स बनाळक महः स्वगृह भात निवृत्त, । यावत
अश्र गच्छात लावत आासपरवरा नजजुहद नापतप अपश्यत।
ततस्तस्य व्यन्तरवाक्य निवेदबामास । ““'यदहो मित्र! मम
काश्चत वपन्तरः सिद्ध: तत्कथय (क आथये १ । अह त्वां
प्रय आगतः” । नापित आह-'भद्र ! यदि एवं तत राज्यं
प्राथय यन त्व राजा भवास आह त्वन्मन्ना च । द्वा आप
इह खुखमतभूय परलोकछुखम् अनुभवावः । उक्तश्व-
किसी स्थानमै मन्थरक नाम कोलिक रहता था । किसी समय वल्ल कार्य
करते हुए उसके संपूर्ण कपडे वुनके कर्मकाष्ट ( तुरीवेमादि ) भम होगये । दब
बह कुऱ्हाडी लेक! वनभ काठके निमित्त गया । षह जवतक घुमद समुद्रके
किनार गया, तज वहां उसने सीसोका एक इक्ष देखा | तत्र श्चारने ढगा ।'यह
बडा वृश्च दीखता हे । सो इतके काटनेसे अनेक पट्ट निर्माणकी वस्तु हो जायगी
ऐसा चार उसपर कुठाराघात किया । उत वृक्षमें कोई व्यन्तर (पक्षी पिशेप)
रहता या । उसने कहा- जो ! यह इश्च मेरे रहनेका स्थान है । सव प्रकार
रक्षा करना चाहिये । क्योकि मे यहां महासुखसे रहता हूं, समुद्रकी ळहरोंके
स्पश्से शीत वायुसे प्रसन्न हुआ रहता डू”? । कौछिकने कहा-'मो ! में क्या
करूं ! काठके विना मेरा कुटुम्ब भूखसे पीडित हे । इत कारण शत्र और
स्थानम जाभों । में इसे काटूगा” । व्यतर बोछा,- मो ] में तुम्हारे ऊपर
प्रतन हू, सो कुछ अभाष्ट वर मांगा | इस दृक्षका रहने दा?! । कोलिक बाला
“जो ऐसा है तो में अपने घर जाकर अपनी भित्र भायीसे पूछ जाऊं तब तुम
देना” | तब “बहुत अच्छा” यह व्यन्तरप्त प्रतिज्ञा करके वह कोछिक प्रसन्न
हो अपने घरकी ओर चडा । जबतक आगे जाता हे तवतक प्रामर्मे प्रवेशकर
निजमित्र नाईको देखा । तब उसने उससे व्यन्तरका राक्य निवेदन किया ।
कि,-“'अहो भित्र ! मुझे व्यन्तर सिद्ध हे कहो क्या मांगू £ । भे तुझसे पूछ-
नेको आया हूँ”? । नाई वोछा,-“मन्र | जो ऐसा दे तो राज्यका प्रार्थना कर।
जिससे तू राजा हो और मैं तेस मन्त्री, दोनोहा यहां सुख अनुभवकर पर-
लोकका सुख प्राप्त करें कहा हे-
भाषाटीकासमेतम्। ( ४८९)
राजा दानपरो नित्पमिह व्हीतिमवाप्य च ।
तत्मन बात्पुनः स्वर्ग स्पद्धते त्रिदशः सह ॥ ६२ ॥
नित्य दान करतेवाळा राजा इस ठाकम कातका प्रात हबर उसक प्रमा-
चे फिर स्वगेमे देवताओंसे स्पृहा किया जाता हे ॥ ६२॥ है
कोलिक आइ-' अस्ति एतत्परं तथापि गृहिणीं एच्छा-
बि? । स आहइ-''भद्र | शा्रबिरुद्वमेतत् यत् खिया सह
मन्त्रः, यतस्ताः स्वलपमतयो भवन्ति, उक्तश्च-
कोळिक बोळा-“हे तो योही परन्तु अपनी खरीसे पृछ” ॥ वह चोला
“भद्र । यह शास्नक विरुद्ध ६ जाके खास सम्पात करने कारण क, वह्
सत्य बुद्धिवाळी होती हैं | कहा है-
भोजनाच्छादने दद्यादतुकाले च सङ्गमम् ।
सूषणाद्यञ्च नाराणां न ताभिमन्त्रयत्छुधाः ॥ ६३
उनका भाजन भाच्छादन द ऋतु झ्ाळम साम कर तथा उचक्षा अपण देदे
परन्तु उनके साथ सम्प्रति न करे ॥ ६३॥
यत्र खी थत्र कितवो बालो थत्राप्रशासिताः ।
तदूशह क्षणमायाति भार्मेवो दीदमत्रदीत् ॥ ६४॥
जहा स्री अप्रशासित ( अशिक्षित ) है जहा दुर्जन भौर बालकको शासना
नहीं वह घर क्षय होजाता हे, ऐसा मार्गव ऋषिनें कहा है || ६४ ॥
तावत्स्यात्सुमरसन्नास्यस्तावहुरूजने रतिः ।
पुरूषो योषितां यावन्न शृणोति वचो रहः॥ ६८ ॥
जबतक यह एकान्तमे ख्रीजचाक वचन नही छुनता है तपीतक इसकी गुरु-
जनेंमें रति है तमीतक प्रसन्न सुख हे ॥ ६५ ॥
एताः स्वार्थपरा नार्य्यः केवलं स्वसुखे रताः ।
न तासां वमः कोऽपि सतोऽपि स्वसखं बिना ॥ ६६॥'?
यह स्वाैमें तत्पर त्री केवळ अपने झुखमेंही रत रहती हैं अपने सुखके
दिना उनको कोई प्यारा नहीं बहुत क्या पुत्रमी नही ॥ ६६ ॥”
कोलिक आह,- तथापि प्रष्टव्या सा मया, यतः पति-
ब्रता सा। अपरं ताम् अएष्टरा अहं न किखित्करोमि । एवं तमभि-
धाय सत्वरं गत्वा तां उवाच,-प्रिये ! अद्य अस्मार्क
( ४९० ) पञ्चतन्त्रस् ।
काश्चत् व्यन्तरः (सळ, स वाञ्छत प्रयच्छात, तदहे त्वा
प्रष्टुम् आगतः । तत्कथय [क घाथये ? एष तावत् मम मित,
नापितो वदति एवं थत् राज्यं प्रार्थयस्व’ । सा आह,
“आय्य पुत्र ! का मतिनापितानाम्। तत न काय्य तद्वचः
उतक्तश्व-
कोलिक बोला,- तोभी उससे पूछना चाहिये | कारण कि वह पतिव्रता
है | और उसके बिना पूछे में कुछमी नहीं करता । ऐसा उससे कह शत्र
जाकर उससे वोळा,-'।प्रिये ! हमको आज कोई व्यन्तर सिद्ध हुआ है वह
मनोवांछित देता है सो में तुमको पुछनेको आया हूं । सो कह क्या मांगूं | ॥
भर यह मेरा मित्र नाई तो कहता हे कि राज्यकी प्रार्थना करो” | वह बोली-
“यामिन् नाईयोंको क्या बुद्धि होती हे) सो उसके वचन न करना । कहा है कि-
चारणवान्दाभिनाचनापतंबालकरोपं ।
न मन्त्र मातमान्कुय्यात्साद्ध ।भक्षाभरव च ॥ ६७॥
चारण, बन्दीजन, नीच, नापित और बाळकों भिक्षुकोंके साथ बुद्धिमान
सम्मति न करे ॥ ६७ ॥
अपरं महती क्लेशपरम्परा एषा राज्यस्थितिः सन्धिविग्र-
हयानासनसंश्रयद्धेधीमावादिभि कदागचत पुरूषस्य सुरज
न प्रयच्छताात । सत,
और यह राज्यको स्थिति तो वडे केशकी करनेवाळी हे । सधि, विग्रह, यान,
आसन, संश्रय, दे्घाभावादेसे कमी पुरुपको सुख नहीं मिलता । कारण कि-
यदव राज्य क्रखतंगभषकश्तद्व यात व्यसनघु वाद्ध'
घडा चृपाणामाभषककाले सहाम्नसवापद्सादररान्त द्दा
जभी राज्य अभिषेक किया जाता हे उसी समय व्यवसनोंमें बुद्धि छग
नाती है राजोंके अभिपेक्त समपर्मे घडे जढाँके साथ आपत्तिको उद्गीर्ण
करते हैं ॥ ६८ ॥
तथाच-
भोर देखो-
रामस्य त्रजन वनं नंवसन पण्डा; सुताना दन '
वृष्णीनों निधन नलस्य नपते राज्यात्पारत्रशनम् १
भाषाटीकासमेतम्। (४९१
. सौदासं तदवस्थमळुनवधं सञ्चिन्त्घ लेकेश्वरं
दृष्टा राज्यकते विडम्बनगतं तस्मान्न तद्वाञ्छयेत् ॥ ६९ ॥
रामचन्द्रको वनमे जाना, पण्डुपुत्रोंका बनगमन, इष्णिवशियोका निधन,
नछराजाका राज्यसे अष्ट होना, सौदास राजाका गुरु शापसे राक्षस होना,
कार्तेवीये भजन और रावणका बध विचार राज्यके निमित्त अनेक पिडम्बना
देखकर राप्यकी बाठा न करे ॥ ६९ ॥
यदर्थ भातरः पुत्रा अपि वाञ्छन्ति ये निजाः।
बघं राज्यकृतां राज्ञां तद्राज्यं द्रतस्त्यजेत्॥ ७० ॥'?
जो अपने भाई पुत्र हें वेमी जिस राज्यके निमित्त राजाके वघकी इच्छा
करते हैं इस कारण दूरसेही राज्यको त्यागे [| ७० ॥?
कौलिक आइ,-““सत्यमुक्ते भवत्या । तत् कथब कि
प्रार्थथे !'? सा आह,-*'त्वं तावदेकं पडं नित्थमेव निष्पाद-
यसि, तेन सर्वा व्घघसिद्धिः सम्पद्यते । इदानी त्वं आत्म-
नोऽन्यत् बाहुयुगलं द्वितीयं शिरश्च याचस्व, येन पटट्वयं
सम्पादयोस पुरतः पुष्ठतश्व, एकस्य मूल्येन गहे यथापूव
व्ययं सम्पादयिष्यसि । द्वितीयस्य मूल्येन विशेषकृत्यानि
करिष्यसि । एवं सोख्धेन स्वजातिमध्ये क्वावमानस्य
कालो यास्यति । लोकद्वयस्य उपार्जना च भविष्यति”
सोऽप तदाकण्य प्रहष्टः प्राह--*'साडु पतित्रते ! साधु,
युक्तसुक्त भवत्या; तदेव करिष्यामि, एष मे निश्चयः?
ततोऽसा गत्वा व्यन्तरं प्राथथाञ्चक्रे,- “भो ! यदि मम
ईप्सितं भयच्छसि तत् देहि मे द्वितीयं बाहुयुगलं शिरश्च? ॥
एवम् अभिहिते तत्क्षणादेव द्विशिराः चतुबा हुश्च सञ्जातः ।
ततो हृष्टमना यावत् गृहम् आगच्छति, तावत् लोकेः राक्ष
सोऽयमिति मन्यमानेः लशुडपाषाणप्रहारैः ताडितो मृतश्च।
अतोऽहं नवीमि-
काछिक बोला- तिने सब्य कहा, सो बता कि क्या मागू १? बह बोलौी--
“तुम एक पट प्रतिदिन दुन छेतेहो उससे सब खचे मळी प्रकार चलता है; इस
(४९२ ) पञ्चतन्त्रम्।
समय तुम अपची दो सुजा ओर एक शिर मांग छो जिससे भागे पछि दा कपडे
वुन सकोगे एकके मूल्यसे तौ यथापूर्व॒ घरका खचे चढेगा । और दूसरके
मूल्यसे विशेष कार्ये होंगे, इस प्रकार सुखएवेक अपनी जातिके मध्यमं कावित
हो समय बीतेगा, और दोनो लोकी प्राति होगी” । वही यह सुन प्रसेन
हो बोला- धन्य पतिव्रता धन्य ! तेने अच्छा कहा । बही करूंगा जो तेरा
निश्चय है” | बहमी यह सुनकर व्यन्तरसे मांगता हुआ,- भो यदि मुझको
यथेच्छ वर देता है तो दो भुजा और एक शिर पीछे करदो” | ऐसा कहंतेही
बह उसी समय दो शिर और चार भुजावाळा होगया, सो प्रसन्ने होकर जब
वर आने लगा तबतक मनुष्योंने राक्षस है यह ऐसा मानकर छकडी पाषाणोके
प्रहारसे ताडित किया जिससे वह मरगया | इससे में कहता हं-
यस्य नास्ति स्वयं अज्ञा मित्रोक्तं न करोति यः ।
स एव निधनं याति यथा मन्थरकोलिकः ॥ ७१ ॥7
जिसको स्वयं प्रज्ञा नही और मित्रका कहना भी नही मानता वह मन्थर
कौलिककी समान नष्ट होता हे ॥ ७१ ॥”
चक्कधरः आह,- भोः ! सत्यमेतत् । सोऽपि जनोश्रद्धे-
यामाशापिशाचिकां भाष्य हास्यपदवी यालि। अथवा साधु
ङढ्सुच्यते, केनापि-
"चक्रधर बोला--'भो ! यह सत्य हे सबही मनुष्य श्रद्धाके अयोग्य आझा-
रूपी पिशाचिनीको प्राप्त होकर हास्य पदवीको प्राप्त होते हैं, यह किंसीने
अच्छा कहा है-
अनागतवती चिन्तामसम्भाव्यां करोति यः। -
स णव पाण्डुरः शेते सोमशर्मपिता यंथा ॥ ७२ ॥?
जो होनेके अयोग्य नहीं भाई हुईभी चिन्ताको करता हे षह सोमरामोके
'पिताके समान पाण्डुर होकर शयन करता है | ७२ ॥?'
सुवर्णसिद्धिः आह,-“कथमेतत !!' सोध्बवीत्-
सुवर्णसिद्धि बोला,-“यह कैसे £” बह बोळा-
कथा ९,
कस्मिख्चित् नगरे कश्चित् स्वमावकूपणो नाम बाह्मणः
अतिवसति स्म, तेन भिक्षाजितेः सक्तुभिः सुक्तशेषेः कलशः
भाषाटीकासमेतम्। (४५३ )
सम्प्रितः । तख घटे नागदन्ते अवलम्ब्य तस्य अधस्ताच
खट्ट निधाय सतनम् एकहष्ट्या तम् अवलोकयति । अथ
कदाचित रात्रो सुतः चिन्तयामास, “यव पारिपूर्णोज्यै घट-
स्तावत् सक्तुनिः वत्तते । तद् यदि दुर्भिक्षं भवति तत् अनेन
रुपकाणां शतसुत्पद्यते ! ततस्तेन मया अजाठ्ठयं महीत-
व्यम । ततः षाण्मासिकमसववशात् ताभ्यां यूयं भविष्यति ।
ततोऽजाभिः प्रभूता गा अहीप्यामि, गोभिः महिषीमीहिषी-
भिः बडवा वडवाम्रसवतः प्रभूता अश्वा भविष्यन्ति, तेषां
विक्रयात्. प्रभृतं छुवर्ण भविष्यात; सुत्रणेन चतुःशालं गृहं
सम्पद्यते । ततः काञ्रिद आाह्मणो मम शहम आगत्य मातर
बयस्कां रूपाटयां कन्यां दास्यति, तत्सकाशाद पुत्रो में
भविष्याति; तस्य अहं सोमशर्मेति नाम करिष्यामि । ततः
नस्मिन् जादुचलनयोग्ये सञ्जातेऽहं पुस्तकं ग्रहीत्वा अश्व-
शालायाः पृष्ठदेशे उपविष्टः तद्वधारादिष्यामि । अत्रान्तरे
सोमश्चर्मा मां दृष्ठा जनन्युत्सङ्गाव् जाउप्रचलनपरोऽश्वखुरास-
ब्वत्त मत्समीपम् आगमिष्यति । ततोऽ द्रा्मणी कोपा-
विष्ठोऽभिधास्यामि, गहाण तावव बालकम् ! सापि ग्रहकर्म-
व्यमतया अस्मत. वचनं न श्रोष्यति, ततोऽहं ससुत्वाय ताँ
पादमहारेण ताइयिप्यामि?। एवं तेन ध्यानस्थितेन तथा
एव पादपरहारों दत्तो; यथा स घटो मग्न! ! सक्तामि! पाण्ड-
रतां गतः । अतोऽहं त्रवीमि-
कितीएक नगरमें रूमावसे कृपण नाम त्राह्मण रहता र उसने मिक्षासे
पाये खानमे वन्ने सत्जोसे एक वदा प्रजी किया ! उस घडेको लूटीपर छटका-
कर उसके नीचे खाद बिछाये निरन्तर एक दृष्टीचे उसे देखता रहता तव किली
पनम [बचारन छगा | कि, यह वज्ञ मरा द खता इ] थे
व
ह् स्ययर्ञा विका [ता उसका म दा बकरी मो
इसे उनका यूथ होजावगा तो बकरीवोसे पिर
De ho
+
हौ
त्ती
चो
|
0)
अस मैस, गेतत्ते घाडी वाडीसे बहुतते घोडे
(४९४) पश्वतत्चम् ।
त्पन्न होंगे उनके बेचनेत बहुतसा सोना प्राप्त होगा, उससे चतुःशाळा कर
बनाऊंगा तंब कोई ब्राहमण मेरे घरमें आकर वयस युक्त मनोहर कन्या देगा ।
उसका द्वारा मेरे पुत्र होगा । उसका मैं सोमशर्मा नामकरण करूंगा । फिर
उसके जांघोसे चढ्ने योग्य होनेमें पुस्तक्ष अहणकर अश्वशालाके पीछे वेठा हुआ
उसका ध्यान कहंगा | इसी समय सोमश्पा मुझे देखकर, माताकी गोदसे
घुटनोंसे चडता हुआ घोडके खुरके समीची होकर मेरे निकट आवेगा | तव
मै ब्राह्मणीसे क्रोध कर कहूंगा । वालकको ग्रहणकर । बहमी घरके कामे
बयप्र हुई मेरा वचन न सुनेगी।तो में उठकर उते पाद प्रहारसे ताडव करता!
इतत प्रकारसे ध्यानमे स्थित हुए उसने जाही ळात मारी त्योंही वह घडा टूटा
और सत्तुओके बिखरने से श्वेताको प्रात इआ । इससे में कहता हूं-
अनागतवर्ती चिन्तामसम्भाव्यां करोति यः।
स एवं पाण्डुरः शेते सोमशमेपिता यथा ॥ ७३ ॥7!
जो नहीं आई हुईं ओर असम्भान्प चिन्ताको करता है वह सोमशर्मा व्रङ्ष-
के पिताकी समान श्वेत हो सोता हे ॥ ७३॥
सुवर्णसिद्धिः आह- एवमेतत् । कस्ते दोषों ! यतः सवाँ"
ऽपि लोमेन विडंबितो बाध्यते । डक्तश्च-
`= मुत्रणसीद्धने कहा-“एसेही है तेरा दोष क्या है £ सब्र लोभसे वंचितहो
पीडित होतेहे | कहा है-
यो लोल्यात्कुरुते कर्म नेवोदकंमवेक्षते । |
विडम्वनामवाप्रोति स॒ यथा चन्द्रभूपतिः ॥ ७४ ॥'?
जो चपळतासे कमे करता हे और उसका परिणाम नहीं सोचता है बह
चन्द्रराजाकी समान बिडम्बचाको प्रात होता है || ७४ ॥?
` चक्रपर आह;-“'कथमेतत ?”? आह ।
चक्रवर चोडा-“यह केसे १? बह बोछा-
; कृथा 3०,
कस्मिश्चित् नगरे चन्द्रो नाम भूपतिः प्रतिवसति स्म,
तस्य पुत्रा वानरक्रीडारता वानरयूय नित्यमेब अनेकमोजन”
भाषाटीकासमेतम् । (४९५)
कयादिभिः पुष्टि नयन्ति स्म । अथ वानरयूथाधिपो यः स
आओशनसबाहँस्पत्यचाणक्यमतावित्तदनुष्ठाता च तान् सर्वा-
नापि अध्यापयति स्म । अथ तस्मिन् राजग्रहे लघुकुमारवा-
हुनयोग्यं मेषयूथमास्त, तम्मध्यात् एको जिह्वालोल्यात
अहर्निशं निःशंक महानसे भविश्य यत पश्यति तत्सवं भक्ष-
यति ते च सूपकारा यत्किञ्चित् काष्ठं मृण्मयं भाजने काँस्य-
पात्रं ताम्रपात्र चा पश्यति तेनाशु ताडयति सोऽपि वानरयूः
थपः तदृष्टा व्य(वेन्तयत,-' अहो भेषसूपकारकलहोऽयं
चानराणां क्षयाय मविष्यति यतोउन्नास्बाढ्लम्पटायं मषो
महाकोपाश्च सूपकारा यथासत्रवस्तुना महरन्ति । तद् यदि
वस्तुनोऽमावात कदाचित उल्मुकेन ताइयिष्यन्ति तदा
ऊर्णाभच्रो5पं मेषः स्वल्पेनापि वह्निना भ्ज्वलिप्पति । तत्
दह्यमानः पुनः अश्वकुट्चां समीपवत्तिन्थां मवेक्ष्यति, सापि
तणधाचुय्यात् ज्वलिप्याति । ततोऽश्वा वह्विदाहम् अवा-
प्रयन्ति । शालिहोत्रेण पुनः एतदुक्तम, यत् वानरवसया
अश्वानां वह्विदाहदोषः प्रशास्याति तत् नूनम् एतेन भाव्यम्
अत्र निश्चयः । एवं निश्चित्य सर्वान् वानराव आहूय रहसि
ओवाच- यत्!
क्रिस नगरमे चन्द्रवाम राजा रहता था । उसके पुत्र सदा बानरॉसे खेळ
करते । बानरयूथ नित्यद्दौ भनेक भोजन भक्ष्यादिसे पुष्ट किये जाते | तब
वानरयूथका आर्षपात्त जा था बह भागव छृहस्पार्प चांणक्ष्यका मत जाननं-
चाळा तथा अनुष्ठान कनवाछा उव सवका अध्ययन कराता, उस राजघरमे
खु कुमारक बोहने याग्य मर्घाका यूथ था, उनेक नाचमे एक संघ जिव्हाका
चञ्चळतासे रातदिन निर्भय रसोईमे प्रवेशकर जो देखता बह सब खाजाता ।
वे रसोई करनेवाठे जो कुछ काष्ठ खुवर्णमय कासी था ताबेका पात्र जो
प्रत उसस शाप्र उच्चका ताडन करते | घहभा वानर यूथ यह दखकर
सिचौरचे लगा [| अहा यह मप जाए सूपकाराका छरा वानरा[क क्षयक
बनाम हांगा । जा [के भनक खादम छम्रट बह भर ६ भार मह्क्राधा
यह रसोइये निकट रकखीइई वस्तुमे प्रहार करते. हे । सो यदि वश्तुके
(४९६) पञ्चतन्त्रम् ।
अभावसे कमी जळती ढकडीसे ताडन किया तो तौ बहुत ऊत्तवाळा यह मेष
स्वल्प आग्रिसेमी जळ जायगा । सो यह जळता हुआ समीपवर्ती अश्शाढार्मे
प्रवेश करेगा । बहभी तृणके अविक होनेंत प्रजाठेत हो जायगी । तब घोडे
अन्निसे जळ जाँयगे । अश्वशाल्नके ज्ञाताने कहाहे वानरोंकी चरबासे थोडॉका
अग्निदोप शान्त होताहे । सो अवश्यही यह होगा निश्चयहै । ऐसा विश्वयकर
सब बानरोंकों घुळाकर एकान्तमें बोडा । कि--
मेषेण सूपकाराणां कलहो यत्र जायते ।
स भविष्यत्य लन्दिग्धं वानराणां क्षयावहः ॥ ७५ ॥
जहां मेषके साथ सूपकारँका हेदा होताहे षह अवश्य वानरोंके क्षयके -.
निमित होताहै ॥ ७९ ||
तस्मात्स्यात्कलहो यन्न गहे नित्यमकारणः |
तढ्गह जीविनं बाञ्छन्द्रतः परिवर्जयेत् ॥ ७६॥
इस कारण जहां घरमै नित्य अकारण केश होतारहे, जीनेकी इच्छा करने”
वाळा दूरसही उस घरको त्यागन करदे ॥ ७३ ॥
तथाच-
ओर देखो-
कलहान्तानि हम्योणि कुवाक्यान्तशख सोहदम ।
कुराजान्तान राष्ट्रांण कुकमान्त यशो नृणाम् ॥ ७७॥
कलहले स्थान नष्ट होजातरे, कुमाक्यसे मित्रता नष्ट होजातीहे, कुराजासँ
देश नष्ट होजाते हैं, कुकपोसे मनुष्यांके यश. नष्ट होजातेहें | ७७ ॥
तन्न यावत् स्वेषां संक्षयो भवति तावदेतत् राजगृहं
सन्त्यज्य वनं गच्छामः? । अथ तत् तस्य वचनम् अश्रद्धेयं
श्रत्वा मदोद्धता वानराः प्रहस्य प्रोचुः- “भो ! भवतो बढ"
भावात् बादवकल्य सात यंन पतदत्रबाष । उक्तश्च-
, सो जबतक सबका सक्षय न हो तबतक यह राजगृह छोडकर वनको
चल?” |] .तव उसके वचनको श्रद्धाक अयाग्य सुनकर मदसे उद्धत इए वातर
हसकर बो-“मो | आपको वृद्धताते घुद्धिकी विकळता प्राप्त इहे जिससे
ऐसा कहतेरी । कहा हे-
भाषाटीकासमेतस् । (४९७)
बदन दशनेहीनं लाला स्वाति नित्यशः ।
न मतिः स्फुरति क्कापि बाले वृद्धे विशेषतः ॥ ७८ ॥
वदन दातोंसे हीन नित्य छार टपकानेवाळा होनेसे वाळक और बृद्धको
मति स्फुरित नहीं होतीहे ॥ ७८ ॥
न वय स्वगसनानाोपनभागान् नानाविधाव भ्क्ष्यावशपान
शाजपुत्रः स्वहस्तद्तान अमसतकल्पानू पार त्यज्य तन अदय्या
कघायकटतिक्तक्षाररूक्षफलानि भक्षयिष्यामः”? । तच्छृत्वा
अश्चकळ्षां दृष्टि कृत्वा स प्रोबाच,- रे रे सूखा ! यूयम्
एतस्य सुखस्य पारणाम न जानोथ । कन पापरसास्वाद
नप्रायम् एतत् खुखस्, परिणामे विषवत् भाविष्धाते ! तदहं
कुलक्षय स्वय न अवलाकायप्या।भ, साम्मत वन
खास्यास | उक्तश्च-
ने हम स्वर्गक्की समान उपभोग अवेक प्रकारके भदत विशेपोको राजपुत्रोके
हाथसे दियेहुए अपृतक्षी समान छोडकर बनमें कसल, कडवे, तीखे, रूखे फळोका
खांयमे”” । यह सुन आखोंमे आलू भरकर वह बोला-“ररे मूर्खो ! तुम इस
सुखका परिणाम नहीं जानतेहो । क्या यह सुख पाप रसके आस्वादनकी समान
नहीं हे ? । परिणमर्मे विषवत् होगा । सो में कुलका क्षय स्वय नहीं देखगा थ्व
बनको जाऊगा । कहाहै कि-
मित्रं व्यसनसम्पराप्त स्वस्थानं एरपीडितम् ।
धन्यास्ते ये न पश्यन्ति देशभंगं कुलक्षयम् ॥ ७९ ॥??
व्यसन प्राप्त हुए मित्र और परपीडित अपने स्थानको तथा देशभग और
कुळक्षयक्रो जो नहीं देखतेहे वे धन्यहैं | ७९ ||!
एवम् अभिधाय सर्वान् तान् परित्यज्य स॒ यूथाधिपोऽ-
टब्यां गतः ।
ऐसा कह उन सबको छोड वह यूथपति वनको चडागया ।
अथ तस्टिन् गतेऽन्यस्मिन् अहनि स मेषो मद्दानसे
आविष्टो था +त सूपकारेण न अन्यत किचित् समाप्तादित,
तावत अद्धज्वाळलकाछन ताइ्यमाना जाश््दर्यमानशरारः
३२
(४९८) पञ्चतन्त्रम् ।
शब्दायमानो5शवकुत्यां भत्यासन्रवात्तन्यां मोवष्टः । तत्र दण”
आखय्यपुक्ताया क्षितौ तस्य अलुठत' सवत्राप वाह्वज्वालाः
तथा समझुध्त्यत्ता यथा कीचदश्वार स्फुटितलोचनाः पञ्चत्वं . ,
गताः केचित् बन्धनानि त्रो टथित्वा अद्धदग्धशरीरा इतश्चेतश्च
जायमाणा धावमानाः सवनाप॑ जनसमूहम् आकुलाचकुर
अत्रान्तर राजा सावषादः शालहातन्रज्ञाव् वद्यांन् आहूथ
प्रोवाच,- भो; ! मोच्यताम् एषाम् अउवानाँ कश्चित् दाहो-
पशसनोपायः'! । तेऽपि शास्त्राणि विलोक्य प्रोखुः,-“ढेव !
प्राक्तमत्र विषय भगवता शालदीन्रण। यत्-
तब उसके जानेमे एक दिन वह मेष रसोईमें आया तबही सूपकारोंने और
कुळ व पाकर आधे जळते काएसे ताडित किया, प्रचलित शरीर शब्द करता
हुआ समीपवर्ती अश्शाहामं प्रविष्ट हुआ । वह बहुत तृण खी हुई भूमिम
सत्र स्थानें उसके छोटनेसे इसप्रकार अभि ज्ञाछा लग उठी कि किसी घोडकी
आंख फूट गई, कोई मरगये, कोई बन्नको तोडकर अधजले शरीर इधर उधर
हासते दौडते सबही जनसमूहोंकों व्याकुळ करते हुए । इसी समय राजा
विपाद पूर्वक शालिहोन्रके ज्ञानबाळे वैद्योंको बुखाकर बोछा,-“मो ! इन घोडों
की दाहशान्तिका कोई उपाय कहो” । वेमी शाज्ञ देखकर बोळे-“'देव ! इस
विषयमें भगवान् शालिहोत्रने कहा है-
कपीतां मेदसा दोषो वहिदाहसमुद्गवः।
अश्वानां नाशमभ्योति तमः सूय्योद्य यथा ॥ ८० ॥
घोडोंके अधिदाहसे उत्पन्न हुआ दोप वानरोंकी चरबासे इस प्रकार नष्ट
हो जाता है जैसे सूबके उद्यमे अन्धकार || ८० ||
तत् ऋषताम् एतत् ।चाकात्सत द्राक् यावत् एत न दाह.
दोषेण विनश्यन्ति” । सोऽपि तदाकण्थ समस्तवानरवधम्
आदष्टवान् । कि बहुना सवाप त वानरा व (बधायुधलग-
डपाषाणांदानः व्यापादता इात। अथ साप वानरयूथपः
त पुन्रपान्ननखातछुतमागनयाद्सक्षय ज्ञात्वा पर विषादम
उपागतः। स त्यक्ताहारक्रियो वनात् वने पय्यटाति, अचि-
न्यञ्च, कथमहं तस्य नृप/पसद्स्य अनृणताकृत्येन अपकृत्यं
कारष्याम । उक्तश्व-
भाषादीकासमेतम् । (४९९)
सो शीघ्र इनकी चिकित्सा करो कि, यह जवतक दाहके दोषस नाराको
आप्त न हा? ] बहमी सुनकर सम्पूज वानरांके वधको भाज्ञा देता हुआ । बहुत
- चीहनस क्या ह व तबहा वावर अनेक भायुष ठगुड पत्थरादस मार गये ) तब
चह भी वानरयूथप उस पुत्र, पोत्र, भातापुत्र, भानजे, आदिका क्षय जानकर
परम विषादको प्राप्त हुआ । और भोजनको त्याग विचार करते २ इधरसे
उधर वनम चमन ढगा । किस प्रकार में इस दृपनाचका अरणता सम्पादन
( बरका ठेवा ) कर अपकार करू। कहा हे कै-
मषयेद्धर्षणां योऽन वेशजां परनिभिताम ।
अयाद्वा यदि वा कामात्स जेयः पुझषाधमः ॥ ८१ ॥?
जा इस ससारम दुसरक किये कुलक तररकारका भय वा कामत सहेन करता
इ उत्त पुरुषार्म अधम जानना उचित है ॥ ८१ ॥[” र
अथ तेन वृद्धवानरेण छुत्नाचात्पिपासाकुळेन श्रमता पाञ्चि
नीखण्डमण्डितं सरः समासादितम् । तत् यावत सुक्ष्मेद्ि-
कया अवलाकयति तावत् वनचरमङुष्याणाँ पदर्पक्तिशवे-
शोऽस्ति न निष्क्रमणम्। ततः चिन्तितम् “चनं अत्र जलान्ते
दुष्टप्राहेण भाव्यम्, तत् पा्मिनीनालम् आदाय दूरस्थोऽदि
जलं पिबामि” । तथाडछिते तन्मध्यात् राक्षसी निष्क्रम्य
रत्रमालाविभूषितकण्डः तमुवाच),- “मो अत्र यः सलिले प्रवेशं
करोति स मे भक्ष्य इति ! तत् नास्ति धूत्ततरस्त्वत्समोऽन्यो
थत् पानीयम् अमेन विषिना पिबसि । ततः तुष्टो हम, प्राथ
यश्व हृइयबाड्छितम”? कपिराह,-''भोः ! कियती ते अक्षण-
शक्तिः,” स आह~-*'शतसहस्नायुतलक्षाणि अपि जलप्रबि-
छानि भक्षयामे | बाह्यतः शमा ली5पि मां दूषयति'॥ वानर
आइ- “अस्ति मे केनचित् भूपतिना सह अत्यन्तं वेरम,यदि
'एनाँ रत्रमालां मे प्रयच्छालि तत् सपरिवारमपि तं भूपति
-वाक्प्रपसेन लोमधित्वा अत्र सरसि प्रवेशयामि” । सोऽपि
श्रद्धेयं व वस्तस्य श्षत्वा रजमालां दत्वा श्राह,- भको मित्र!
-यत् सञ्चित भति तत् कर्तव्यम्? हत वानरोऽपि रत्नमा
-लाविभूषितऊण्ठो बृक्षमासादेषु परिख मन् ज दष्टः पृष्टश्च-
(५००) पञ्चतन्त्रम् |
“जो यूथप! अवान् इयन्तं कालं कुत्र स्थित्ः १ भवता ईच्क
रत्नमाला कुत्र लब्धा ? या दीप्त्या सूय्बेमपि तिरस्क-
रोति” । वानरः प्रा आस्त छुन्रांचत् अरण्ये गुप्ततरं
महत्सरो घनदोनामतम्, तत्र सूर्य्येऽद्वोदिते रदिवारे थः
काश्चित् निमज्जति स धनदप्रसादात ईदक रत्नमालाविभूः
षितकण्ठो निःसरति” । अथ भूभुजा तदाकर्ण्य स वानरः
समाहूतः पृष्टश्च-भो युथाधिप ! कि सत्यमेतत् ? रत्रमा-
लासनाथं सरोऽस्ति कापे ?” कपिराह्,-' “स्वामिन् ! एष
अत्यक्षतया मत्कण्ठास्थतया रत्रभालया प्रत्यघस्ते। तद यदि
रत्रम्राळया प्रयोजन तन्मया सह कमपि प्रेषय थेन दर्श-
यामि” । तत् शत्वा वृपतिः आह-''यदि एवं तदहं सपरि-
जनः स्वयम एष्यास थन अभूता रल्रमालाः सम्पद्यन्ते’ ।
वानर आह- एवं क्रियताम” । तथा अदुष्ठिते भूपतिना
सह रलमालालाभन सब कलतरभृत्याः प्रस्थिताः । वानरोऽपि
शज्ञा दोलाधिझढेन स्वोत्संगे आरोपितः झुखेन प्रीतिपूर्वेस्
आनीयते । अथवा साएु इदसुच्यते-
तब उस वृद्ध वानरने छुपा ।परासासत व्याकुळ हां बनम घूम हुए कम-
ढना खण्डस साउत एक सरावा प्राप्त किया । जबतक सूक्ष्म दासं उत देखता
६ के तनतक वनचर मनुष्याक। पदफक्तित्त प्रवेश तो दखा परन्तु निकलना न
पाया । दव उसन विचार किया । “निश्चयही इस जळके भीतर दुष्ट ग्राह
होगा | सत्र कमढक पत्तसे जळ प्रहणकर दूरसे पिऊ! | ऐसा करते ही उस
राक्षस ।नकिळकर रत्नमाछास भू।षेत कण्ठ उससे बोछा,-“भो | जो इस जढमें
अवश करता ह वह मरा अशय हाता ह सा तमस आधेक घत दूसरा नहा हागा
जा पाना इस प्रकारल पाता ह । सो में तुझसे सन्तुष्ट हू । अपना मनोवांडित
मांग छ” वानर बॉळा,--*'मो ] तुमर्म भक्षणकी शक्ति कितनी ६१? बह बोला
ता दशसह क्षमा जळम प्रब इए खस्क्ता र । भार बाह्रसं तो शगारूभा
सुझको परामव करसकता हे?' | वानर चाछ,--“मेर। एक राजाके संग बडा पैर
५ आ इत त्नमालाका मुझ द ता सप -«र उत्त राजाकू घाणाक प्रपचस
र नतकर इस सरवर प्रदिष्ट करू? | घट्सी श्रद्धा करने योग्य उत्तके वचनको
भाषाटीकासमेतस । (५०१)
छुनकर रत्नमाला देकर वोढा,-“मो मित्र ! जो उचित समझो सो करे” ।
वानरभी रत्नमाढासे भूपित कण्ठ होकर बृक्ष और महळोपर घूमता हुआ जनोंसे
देखा और पूछा गया,- भो यूथप ! भाप इतने समयतक कहा थे * आपने एसी
रत्वमाळा कहा पाई ? जो कान्तिसे सूर्यकोमी तिरस्कार करती है" । घानरने
कहा,- एक वम गुए बडा सरोवर कुबेरका बनाया हे बहा सूर्यके आधा
निकल्नेएर इतवारको जो मनुष्य स्वान करें बह कुबेरके प्रसादसे इस प्रकार
मूपितक हो निकछता है!” । तब राजाने यह सुन उस बानरको घुळाकर
पृछा,- सी । यूथपति क्या यह सत्य है ?” | वामरने कहा,- स्वामिन् यह
प्रत्यक्ष मर कण्डम स्थित रत्नमाळाही आपको विश्वास कराती है। सो यदि रत्न-
डास प्रयोजव ई ता पर सग कितोका भजो जिसे दिखाऊ बह सुनकर
राजा बोळा,-“'जो ऐसा हे तो मे पारेजनसहित स्वय जाऊगा | जिससे रत्न
माळा प्राप्त हो?” । वानर बोळा,-“ऐसा ही करो” | ऐसा कहनेपर राजाने रत्व-
माडाके छोमसे सब जी भूस भेजे | आर वानरकाभी राजा पालकोमँ भपनी
गोदमे वेढाय सुखे प्रीति ळे चढा?' | अथवा यह अच्छा कहा है-
तृष्णे देवि ! नमस्तुभ्यं यया वित्तान्विता अपि ।"
अङ्ृत्येषु नियोज्यन्ते श्राम्पन्ते दुर्गमेष्वपि ॥ ८२ ॥
हे तृष्णा देवि | तुमको नमस्कार हे, जिसते धनी पुरुषमी भकायसि वियुक्त
कर दुगगेभ स्थानें ज्माये जाते हैं [| ८२ ॥
तथाच-
और देखो--
इच्छाति शती सहस सहस्ती लक्षमीहते ।
लक्षाधपस्तथा राज्य राज्यस्थः स्वगनाहते ॥ ८३ ॥
सोबाल! सहलकी, सह्यमाठा ठाखकी, लक्षाधिप राज्यकी ओर राज्याधिप
स्वर्गकी इन्छा करता इ ॥ ८३
जाय्यन्त जीय्यंतः कशा दून्ता जाय्धान्त जाय्यंतः
जीय्यतश्चक्षुषी जोति तृष्णेका तरुणायते ॥ ८४ ॥"
णे हानत केश जीणे होते हं, जीर्ण होनेते दात जीणे होजाते हैं, नेत्र
श्रोत्रमी जीर्ण होते हैं, एक तृष्णाही तरुण होती जाती हे (८४ ॥”
(५०२) पञ्चतन्त्रम् ।
अथ तत्सरः समासाद्य वानरः प्रत्यूषसमये राजानम्
उबाच,-“'देब !' अद्धोंदिते सुर्य्यत्र प्रविष्टानां सिद्धिभि-
दाति । तत्सवोंऽपि जन एकदा एव प्राविशठु, त्वया एनमेया
सह प्रवेष्टव्यं थेन पूर्वदष्टस्थानम आसाख मरभूतास्ते रत्नः
माला दशयामि” । अथ प्रविष्टाः ते लोकाः सर्वे भक्षिता
राक्षसेन । अथ तेषु चिरायमाणेष राजा वानरमाह;-“ भो
यूथाधिप ! किमिति चिरायते मे जनः १” । तत् श्रत्वा
वानरः सत्वरं वृक्षस् आरूह्म राजानम् उवाच,-**भो दुष्टनर-
पते ! राक्षसेन अन्तःसलिळस्थितेन . भक्षितस्ते परिजनः
साधित मथा कुलक्षयज वेरम्, तत गम्यताम् । त्वं स्वामीति
मत्वा न अत्र ्रवेशितः । उक्तश्व-
} तब उस सरोबरको प्रात होकर वानर प्रमातकाठमें राजासे बोला, द्वा
यहां आधे उदय होते सूर्ये प्रवेश करनेवाळोंको सिद्धि होगी । सो सबही मनुष्य
एक साथ प्रवेश करें, जाप पीछे मेरे साथ प्रवेश करना जिससे (वमे देखे
खानको प्राप्त होकर बहुतसी रत्नमाला तुमको दिखाऊंगा” । तब प्रवेश कियेहुए
वे कोक सब उस राक्षसने खाळिये तब उनके देर करनेपर राजा वानरसे बोळा,-
“मो यूयाधिप | क्या कारण है जो इमारे जन देर करते हे?” । यह सुनकर
वानर शीघ्र वृक्षपर चढकर राजासे बोठा-““मो कि राजन्। भीतर जळके स्थित
हुए राक्षसने तुम्हारे परिजन भक्षण किये । रें अपने झुळक्षयसे उत्पन हुआ
बेरसाधन किया । सो जाओ स्वामी जानकर इसमें तुम्हें प्रवेश न कराया |
कहा है कि-
कृते प्रतिकृति कुथ्याद्धिसिते प्रतिहिसितम् ।
न तत्र दोषं पश्यामि इष्टे इष्टं समाचरेत्॥ ८५ ॥
उपकारबाळेके संग उपकार करे, हिंसावाळके संग हिसा करे, दुष्टके संग
दुष्टता करे, इसमें मे दोष नहीं देखता हूं ॥ ८५॥
तत्या मम कुलक्षयः कृतो मया पुनस्तव” इति। अथ
एतदाकण्य राजा कापावष्ट: पदातः एकाका यथायातमा-
गण निष्क्रान्तः । अथ तारमन् भूषता गत राक्षस; तृता
जलात गनप्क्रम्य सानन्दामदसाह+
भाषाटीकासमेतम्। (५०३)
तेने मेरा छुछक्षय किया मैंने तेरा” । तब यह बचन सुन राजा महाक्रो-
थित हो पैरो इकळा जिवरसे आया था उस मार्गसे चछा | तब उस राजाके
जानेपर तृत हुआ राक्षस जळते निकळ ध्यनन्द्से यह बोठा-
“हतः शः कृतं मित्र रलमाला न हारिता ।
नालेनापिषता तोय॑ भवता साझ वानर ॥ ८६॥'
“हे वानर आपने पद्मनाठसे जळ पीकर शत्रु मारा, मुझसे मित्रता की, मेरी
रत्गाढा भो न खोई, घन्य हो !॥ ८६ ॥”
अतोऽहं ब्रवीमि-
ऽपे में कहता हु-
ह ज [च CA 0 ७ फू.
यो लाल्यात्कुरुते कम नवोदकमबेक्षेत ४
विडम्बनामवाप्रोति स यथा चन्द्रभूपतिः ॥ ८७ ॥??
जो चचछतासे कर्म करके उतका परिणाम नहीं सोचता हैं वह चन्द्
राजाक्षी समान बिडम्वनाको प्रात होता हे ॥ ८७ (९!
एवमुक्ता भूयोऽपि स चक्रधरमाह,- भो मित्र ! प्रेषय मां
येन स्वगृहं गच्छामि” | चक्रधर आह)- भट्ट ! आपदर्थे
धनमित्रसंग्रहः क्रियते । तत् माम् एवेविध त्यक्ता क
यास्यास | उक्तश्व-
ऐसा कह फिर भी चक्रघरसे बोछा--“मुझे जाने दो जो में अपने घर जाऊ")
चक्रधर बोा,--“मद्र ! आपत्तिके निमित्त धन भौर मित्रका सग्रह किण जाता
है, सो इस प्रकार मुझे छोडकर कहा जाता दे १ कहा है--
यस्त्यक्का सापदं मित्र याति निष्ठुरतां सुहृत् ।
कृतन्नस्तेन पापेन नरके यात्यसंशयम्॥ ८८ ॥77
जो सुहृत् आपति मित्रको छोडकर विष्टर हो जाता हे पह इतन उस
पापसे अवश्य नरकको जाता है | ८८”
'सुबर्णसिद्विः आइ,-“भोः ! सत्यमेतव यदि गम्यस्थाने
शक्तिर्भवति | एततपुनः मदुष्याणाम् अगम्यस्थानम् । नास्ति
कस्यापि ताम् उन्मोचयितु शक्तिः । अपरं यथा यथा चक्र-
भ्रमंवेद्नया तव मुखविकार पश्याम तथा तथा अहमेतव जा-
नामि यत् द्राक् गच्छामि मा कश्चित ममापि अनथों भबतु!यतः-
(९०४) पश्वतन्चम् ।
सुवर्णेसिद्वि वोढा,- “भो ! यह सत्य है यदि सुगम स्थानमें शक्ति होती
है तो । भोर यह तो मनुष्योकों अगम्य स्थान है किसीमे भी तुझे छुडानेकी
शक्ति नहा है । और ज्यो ज्यों चक्रके श्रमणकी वेदनासे तरे सुखका विकार
देखता हूं त्या त्यों में यह जानता हू कि, शीघ्र जाऊ जिससे कोई मेरे उपर
अनर्थ नही । क्योकि-
याशी दद्नच्छाया हश्यते तब वानर
विकालेन गृहीतोऽसि यः परेति स जीवति ॥ ८९ ॥”
हे वानर ! जेसी तेरे सुखकी छाया दीखती हे इससे जानता हूं तूमी विप-
रीत समय ( ढुभीग्य ) स आक्रान्त हुआ है जो इस संकटसे भागे वह जिये ८९?”
चऋघर आइ-' "कथमेतत् ९” सोऽब्रबीव्-
चक्रधर बोछा,- यह केसे £? बह बोला--
कथा ११.
कस्मिश्चित् नगरे भद्रसेनो नाम राजा प्रतिवसति स्म ।
तस्य सर्वलक्षणसम्पन्ना रत्नवती नाम कन्या अस्ति । तां
कश्चित् राक्षसो जिहीषति रात्री आगत्य उपभुङ्क्ते । परं
कुलरक्षोपधानां हत्त न शङ्गाति । सापि तत्समये रक्ष
सान्निष्यजामदश्थाम् अदुभवति कम्पादिभिः। एबम् अति-
क्रामति काले कदाचित स राक्षसो मध्यनिशायां गहकोणे
स्यितः । सापि राजकन्या स्वसखीम् उवाच,- सखि !
पश्य एष विकालः समथे नित्यमेव मां कदर्थयति अस्ति
तस्य इुरात्मनः घ्रातिपेधोपायः काश्चत १! । तच्छ्रत्वा राक्ष-
सोऽपि व्याचिन्तयत्-' नूनं यथा अहं तथा अन्योपि कश्चित
विकालनामा अस्या हरणाय नित्यमेव आगच्छति । पर
सोऽपि एनां हे न शक्रोति । तत् ताबत् अश्वरूपं कृत्वा
अश्वमध्यगतो निरीक्यामि किरूपः स॒ किम्प्रभावश्च ?
इति । एव राक्षस्तोऽश्वरूप कुत्वा अश्वानां मध्ये गतिष्ठात ।
तथानुछित निशीथसमये राजगदे कश्चित अश्वचारः प्रविष्ट ॥
स च सर्वान् अश्वाद् अलोक्य तं राक्षसम् अश्वतम विशाय
अधिरूढः! अत्रात्तरे राक्षसः चिन्तयामास-“'नूनमेष विका"
भाषाटीकासमेतम् । (५०५)
लनामा मां चोरं मत्वा कोपात निहन्तुम् आगतः। तत् कि
करोमि? एवं चिन्तयन सोऽपि तेन खलीनं मुखे निधाय
` कशाघातिन ताडितः । अथ असी भयन्रस्तमनाः प्रधावि-
लुम् आरब्धः । चौरोऽपि दूरं गत्वा खलीनाकर्षणेन तं स्थिर
कर्तुम् आरब्धवान् । स तु केवलं बेगाद्वेगतरं गच्छति । अथ
तं तथाऽगाणतखलीमाकर्षणं मत्वा चोरः चिन्तथामास,-
“अहो न एवंविधा वाजिनो सबन्ति अगणितखलीनाः
लन्तूनम् अनेन अश्वरूपेण राक्षसेन भवितव्यम् । तद् यदि
कर्थञ्चत् पांशुलं भूमिदेशम् अवलोकयामि तदा आत्मानं
लन पातयासि। न अन्यथा भे जीवितव्यमस्ति' । एवं चिन्त-
यत इष्टदेवतां स्भरतस्तस्य सोऽश्वो वटवृक्षस्य तळे निष्क्रा-
न्तः। चौरोऽपि वडभरोहम् आसाच तत्रैव बिलन्नः । ततो
द्वी अपि तो पृथणभूतो परभानन्दभाजौ जीवितविषये लब्ध-
अत्याशो सम्पन्नौ । अथ तत्र वटे कश्चित् राक्षससुहृत वानरः
स्थित्तः आसीत लेन राक्षसं नर्तम् आलोक्य व्याह्तम्- मी
मित्र! किमेवं पलाय्यतेऽलीकभ्रयेन, त्वद्भक्ष्योऽयं सातुपः
भक्ष्याम्? । सोऽपि वानरवचो निशम्घ स्वरूपम् आधाय
शंकितमनाः हखलितगातिः निवत्तः । चौरोऽपि तं वानराहूतं
ज्ञात्वा कोपात् तस्य लांगूलं लम्बमानं सुखे निधाय चार्वित-
वानू। वानरोऽपि तं राक्षसाभ्याधिकं मन्यमानो भ्यं न
किश्चिडुक्तवाव् केवलं व्घथात्तो निमीलितनयनः तिष्ठाति !
राक्षसोऽपि तं तथाभूतम् अवलोक्य श्लोकमेंचमपठत-
कित्ती नारमे भद्रसेन नाम राजा रहता था । उसकी सब नक्षणसे सपनन
रत्नवती नाम कन्या यी | उसे कोई राक्षस ग्रहण करनेकी इच्छा करता रात्रिम
आकर उसे भोगता । परन्तु रक्षावे उपाय होनेके कारण उसे हरनेको समर्थ न
होता । वह भी राक्षसे समोगमें उसके सगकी अबस्थाको कपादिसे अनुभव
करती । इम प्रकार समयके बीतनेपर एक समय बह राक्षस आधीरातमें घरके
(२
कमें स्थित हुआ । वह भी राजकन्या अपनी सखीति बोळी,-“सखिं ! देख
(५०६) पञ्चतन्त्रम् ।
इसी ( १ ) विकाळमें वह नित्यही मुने छेशित करता है । उस दुरामाके
प्रतिषेध ( नष्ट ) होनेका कोई उपाय हे. £? यह पुनकर राक्षस भी विचारे
छगा । “अवश्यही जैसा में हू ऐसा कोई दूसरा विकार नाम इसके हस्नेकों
नित्यही भाता है | परन्तु वह भी इसके हरनेकी समर्थ नहीं होता । सो घोडेक्का
रूप घरकर थोडोंके बीचमें स्थित होकर देख् क्रि, बह किस रूप और किस
प्रभावका इस प्रकार राक्षस घोडेका रूप करके थोडके मध्यमे स्थित
हुआ । ऐसा करनेपर अद्वेरात्रको राजगृहमें कोई घोडोंका चोर भाया । बह सङ
घोडोंको देख उस राक्षसको श्रेष्ठ घोडा जानकर उसपर चढा । इसी समय
राक्षस विचारने लगा । “अत्रशयही यह विकाळ मुझे चोर जानकर धसे मार-
नेको आया है । सो में क्या करूं?” ! ऐसा विचारते वह भो ळगामको मुख
रख कोडेके आधातसे ताडित करता हुआ । तब यह भयसे व्याकुळ मन हो
'पळायन करने लगा । चोरमी दूर जाकर ळगाम खेचकर उसको स्थित करने
लगा ॥ ओर बह तो केवळ महावेगसे भागवेही लगा | तव वह चोर उसको
लगाम खँचनेको न गिननेवाळा मानकर बिचारने उगा । “अहो इस प्रकारके
घोडे नहीं होते इं जो छगामको न गिरने सो अवश्यही यह घोडेरूपी राक्षस
होगा । सो कहीं यदि रेतळी पृथ्वी देखे तो वहां कूद पड़ । अन्यथा भेरा जीबन
न होगा” | ऐसा विचार करते इष्टदेवताका स्मरण करते हुए वह घोडा वटक
नवको होकर विकळा । चोर बटकी शाखा अवछम्वन कर बही स्थित इभा,
इस प्रकार दोनोंदी पृथक् होकर परमानन्दको प्राप्त हो जीवनको प्रा
आझावाळे हुए | उस वठमे कोई राक्षतका मित्र वानर रहता था । उसने राक्ष-
सको व्याकुळ हुना देखकर यह कहा,-“भो मित्र | वृथा मयसे क्यों पलायन
करते दो, सो यह मननुप्य तो भक्ष्य हे इसे खाजाओ?' । वहमी वानरके वचन
सुन अपना स्वरूप धारण कर शंकित मनसे गति रुकीहुई लौटा । चोरमी उसे
वानरका बुढाया हुआ जावकर धसे उसको लम्बी घूछक्रो सुखम डाळ चबाने
गा । वानरमी उसको राक्षसे भधिक मान स्यसे कुछ न बोला केवळ
व्यथासे दुःखी हो आंख मीञ्जकर वेठ गया राक्षसमी उसे ऐसा देख यह लोक
पढ़ने छगा,-
३ कुसमय.
भाषाटीकासमेतम् । (५०५);
“'याइशी वदनच्छाया इश्यते तव वानर |
विकालेन गृहीतोऽसि यः परेति स जीवाति॥ ९० ॥
“हे वानर ! जशी तेरे मुखकी छाया दोखती हे विकासे गृहीत हुआ
तृमी विदित होता है, जो भागेगा सों जियेगा ॥ ९० ॥?
उक्त्वा अनष्ठश्च ।
यह कह भागगया--
तलेषय माँ थेन गृह गच्छामि । त्वं पुनः अवुभुङ्क्ष्व अत्र
स्थित एच लोभडक्षफलम्'” । चक्रधरः प्राह,- नो! ! अका-
रणमेतत, दैवदशाव सम्पद्यते नृणाँ शुभाशुभम् । उक्तश्च
सो मुझे जानेकी आज्ञा दो । और तू यहाँ स्थित हुआ छोभवृक्षका फळ
भोग । चक्रघर बोछा,-- भो । यह भकारण हुआ हे । देववशसे मनुष्योको,
शुभाशुभ फळकी प्राति होती है । कहा है-
ढुभेख्चिकूटः परिखा समुद्रो
रक्षांसि योधा धनदाश्च वित्तम् ।
शास्त्रच यरुघोरानसा भ्रणोतं
स रावणो देववशाद्विपन्नः ॥ ९१ ॥
जिसका ढुगे त्रिकूट पेत, समुद्र खाई, राक्षस योधा, कुबेरसे घनकी प्रापि,
जिसके यहा शुक्रका निर्मित किया शत्र वह रावण भी देववशसे नष्ट
हुआ ॥ ९१ ॥
तथाच-
और देखो-
अन्धकः कुन्जकश्चेव त्रिस्तनी राजकन्या ।
चयोऽप्यन्धायतः सिद्धाः सम्मुखे कर्मणि स्थिति ॥९२॥'?
तथा अधा कुबडा तीच स्तनबाळी राजकन्या यह तीनों कर्मके सुख
होनेमें अन्यायसे भी सिद्ध हुए ॥ ९२ ॥?
सुवर्णसिद्धिः आह-“ “कथमेतत् ९” सोध्जवीत-
सुवर्णासिद्धि बोळा,-''यह केसे ०? बह बोडा-
(५०८ ) पञ्चतस्त्रब् ।
कृथा ३४२.
अस्ति उत्तरापथे मधुपुर नाम॑ नगरम् । तत्र मधुसेनो
नाम राजा बभूव | तस्य कदाचित विषयसुखम् अद्लभवतः
उन्नेस्तनी कन्या बभूब । अथ तां जिस्तनी जातां शुत्वा स
राजा' कङ्चुकिनः प्ोधाय,- यद् सीः त्यज्यतामिय
'विस्तनी यत्वा दूरेउरण्य यथा कश्चित न जानाति" ।
लच्छृत्वा कछ्चुकिनः घोचः,- महाराज ! जञायते यत्
अनिष्टकारिणी न्रिस्तनी कन्या भवति । तथापि त्राह्मणा |
आहूय प्रष्टव्या थेन लोकद्दर्थ न विरुद्धधते । यत्त
उत्तर दिशार्म एक मधुपुर नाम नगर हैं । वहां मधुपेन चामवाळा राजाथा |
उलकां कमा [वेषयपुख अचुसव करते तान सतनवाळा कन्या हुई। उसका तान
स्ततब्राळी हुई सुनकर राजा कंचुकीसे बोळा,--“मो ! इस तीन स्तनीको दूर
वनमें जाकर त्याग दा जो कोई भी इसको न जानें” । यह सुन कुंचकी
चाल “महाराज | यह जाना ता हे कि. तीन स्ती कन्या अतिष्टकईरैणी
हाता इ | ता मा ब्रह्मणाका घुढाकर वूजझ्ञाजाय, [जसस दाता काका न विंगड I
वयाक-
यः सततं परिपृच्छति श्रणोति सन्धारयत्यनिशम् ।
ठस्य दिवाकरकिरणेनलिनीव विवद्धते बुद्धि; ॥ ९३ ऐ
जो सदा पूछता, सुनता, रातदिन धारण करता हे उसका बुद्ध सका
किरणासे कमळिनीकी समान बढ़ती इं | ९३ ॥
सथाच-
और देखो-
पुच्छकेन सदा भाव्यं पुरुषेण विजानता ।
राक्ष्सेन्द्रएहीतोऽपि प्रश्नान्मुक्तों द्विज; पुरा ॥ ९४ हे ??
वज्ञ पुरुषकांमा प्रश्न करना चाहिय, राक्षसेन्द्रस प्रहत हुआ काई पुरुष
व्यहूळे प्रश्नसेही सुक्त हुभा था ॥ ९४ |”.
राजा आह-“'कथमेतत् ? ते प्रोचुः-
राजा बोछा,-“यह कैसे ?” वे बोळे-
भाषाटीकासमेतम् | (५०९४)
कथा १३
देव ! कास्माश्वत् वनोदेशे चण्डकमा नाम राक्षसः प्राते-
वसात स्म, एकदा तन अमता अटव्या कोश्वद ब्राह्मणः
समासादितः । ततः तस्य स्कन्धमारहा परोवाच,-''भो
अप्रेसरो गम्पताम । बाह्यणो5पि भयत्रस्तमनाः तमादाय
आस्थतः । अथ तस्य कमलोांद्रकांमला पादा दृष्ठा ब्राह्मणो
राक्षसम् अपृच्छत-' भो; ! किमेवं विधो ते पादी अतिको-
मला ९” । राक्षत आह-' भो! ब्रतमरिति, नाहम आद्र”
पादो भूमि स्पृशामि” । ततः तच्छृत्वा आत्मनो मोक्षोपायं
चिन्तयन् सरः घात्तः। ततो राक्षसेन अभिहितम्, !
यावद्ह स्मान कृत्वा दंवताद्नावाध विधा आगच्छान
तावत् त्यया अतः स्थानात् अन्यन्न न गन्तव्यम्’? । तथालु-
छित (द्विजः चिन्तयामास । “नूनं देवत्ताचेनवियेरूध्यं मामेष
भक्षयिष्यति । तत् द्ततर गच्छाम यन एष आद्रपादा न
मम पृष्ठम् एष्यात?' । तथाइुष्टिते राक्षो ्रतसङ्गमयात्
तस्य पृष्ठ न गतः । अतोष्ह ब्रवीमि
दब | किसा बनके निकट चण्डकमा नाम राक्षस रहता था | एक समय.
रात्रिकों वर्ना भमण करते उसे कोई त्राह्मण मिला | तब उसके कघेपर चढ़कर
बोढा,-भो ! भागे होकर चछो”” ] ब्राह्मणयभी भय व्याकुळ मनले उसे ढेकर
चला तब उससे कमछके मब्यभागकी समान चरणोंकों कामळ देख कर ब्राह्मण
राक्षससे पूछने छगा--“मो | इस प्रकार आपके चरण कोमळ क्यों है ११
राक्षस वोळा,-““भो ! यह मेरा ब्रत है कि, गाळे पाव में ऐश्वीको स्पश नहीं
करता हू''| यह सुनकर अपने छुटनेके उपायको विचारता हुआ वह सरोवरको
प्रात्त हुआ । तब राक्षतने कहा,-*'मो ! जबतक में स्तानकर देवताचेन
मित्र करके आऊ तबतक तुम इस स्थानसे ओर कहीं न जाना” | ऐसा करने
पर ब्राह्मण विचारते छगा-“भवश्यही देवार्चन निधिके उपरान्त यह मुझको
खा जायगा | सा शौध्रतासे जाऊ जिससे यह गाळे चरण होनेके कारण मेरे
पीछे न आ सकेगा” | एसा करनेपर राक्षस ब्रतभगके डरसें उसके पीछे
गया । इससे में कहता हे-
(५१० ) पश्चतन्त्रम्।
पृच्छकेन सदा भाव्यं पुरुषेण विज्ञानता ।
राक्षसेन्द्रयदी तान पश्मान्सुक्तों द्विज: पुरा ॥ ९५॥”
ज्ञानी पुरुषको र्भा सदा पूछता चाहिये, राक्षसेन्द्रसे पूछा हुआ ब्राह्मण प्रश्नसे-
हा छूटा ॥ ९५ ॥7
अथ लेभ्घः तच्छ्रत्वा राजा द्विजान् आहूय मोवाच,- मो
ब्राह्मणाः ! निघ्तनी मे कन्या सप॒त्पन्ना तत् कि तस्याः माते
विधानम् अस्ति न वा ?? ते मोचुः- देव ! श्र्यतास्-
तब उनसे सुनकर राजा ब्राह्मणे।को घुलाकर बोढछा,-“भो ब्राह्मणो ! मेरे
तीन' स्तनकी कन्या उन्न हुई है सो कोई उसका प्रतिविधान हे घा नहीं एव
बाल,” दव सानय=
हीनाड़ी वाधिकाङ्गी वा या भवेत्कन्यका नृणाम् ।
अज्ञः स्यात्सा विनाशाय स्वशालबिधनाय च ॥ ९६ ॥
जा हाच अन्गत्राछा था आएक अगवाळा कन्या सदुष्पाक हा वह भताक
और अपने शीळक नाशके लिये होती हे ॥ ९६ ॥
या पुनद्धित्तनी कन्या थाति लोचनगोचरम्।
पितरं नाशयत्येत्र सा ठुतं नात्र संशयः ॥ ९७ ॥
आर जा कहां तान स्तनबाळा कन्या पताक नत्राचर हाता षह यात्र
अपने [पताका नाश करता हैं इसम सन्देह वहा ॥ ९७ ॥
तस्मात् अस्या दर्शनं परिहरतु देवः । तथा यदि कश्चित
उद्घाहयति तदेनां तस्मे दत्त्वा देशत्यागेन नियोजयिदव्या
ङ्राति । एवं कृते लोकद्॒थाविरुद्धता भवति’? । अथ तेषां तद
वचनम् आकण्ये स राजा पटहशब्देन सर्वच घोषणाम् आज्ञा
ययामास्त-' अहो ! त्रिस्तनी राजकन्धां यः कश्चित् उद्वाह"
याति स सुवर्णलक्षम् आपोलि देशत्यागश्व । एवं तस्याम्
आघोषणायां क्रियमाणायां महान् कालो व्घतीतः। न क-
'श्चित् तां भतिगहाति । सापि योवनोन्मुखी सञ्जाता खुग॒प्त-
स्थानास्थिता यत्नेन रक्ष्यमाणा तिष्ठति । अथ तत्रे नगरे
काश्वेत अन्धः तिष्ठति। तर्य च मन्थरकनामा कुब्जोऽग्रेसरो
यष्टिम्राही । ताभ्यां ते पदहशावइमाकण्प मिथो मन्त्रितम्
भाषाटी कासमेंतम । (८११)
< स्पृश्यते$बं पटहो यादे कथमपि दैवात् कन्या लम्यते तथा
झुदर्णेम्राप्तिश्व भवति, खुखेन खुवर्णेप्राप्या कालो व्रजति ।
* अथ यदि तस्या दोषतो सुत्युभबति ढारिद्रचोपात्तस्प अस्य
केशस्य पर्यन्तो भवति । उक्तच--
इस कारण स्वामी ! इसके दरीनको त्यागिये ओर जो इसे विवाहनेरी
इच्छा करे तो वह उसे देकर देश त्यागकी आज्ञा दो ऐसा करनेपर दोनो
छोकोमें अविरुद्धता होगी” । तव उतके यह वचन सुनकर वह राजा दाजेके
शब्दसे सर्वत्र घोषणा करानेकी आजा देता हुआ- भहो | इस तीन स्तनघाळी
कन्याको जो विवाह करेगा वह लाख मदारफो पावेगा ( परन्तु ) देश त्याग
करवा होगा” । इस प्रकार उत्तकी घोषणाको वड्दुत समय बीत गया । दिसीने
उपक्षो ग्रहण न किया | बहभी युत्रा भवस्याको प्रात होकर गुप्त स्थानमें स्थित
हुई यत्नसे रक्षित थी । उता नगरमें एक अन्धा था । उसके पास एक मन्थरक
नामवाळा कुडा लकडी पकडा कर भागे चडनेवाळा था | उन्होंने उस वाय-
झन्दको सुनकर परस्पर विचारा ['“यह शब्द जो घोषित होता हे सो यदि हम पटहको
स्पद्चे करें तो इसके अनुसार प्रारव्वसे कन्या प्रात हो जाय तो. सुवणके छाभसे
हमारा समय सुख भोगते बीतेगा भीर जो यदि उसके दोपसे मृत्यु हो जाय तौ
द्रिद्रतासे प्राप्त इए इतत छेशका अन्त होजायगा | कहा हे--
लज्जा स्नेहः स्वरमधुरता वद्धयो यौवनश्रीः
कान्तासंगः स्उजनममता दुःखहानिविलासः |
अर्मः शाखं सुरशुरूमातिः शोचमाचारचिन्ता
पूर्ण सर्व जठरपिठरे माणिनां संभवन्ति ॥ ९८ ॥
छा, खेह, स्वरकी मधुरता, वुद्धि, योवनक्री लमी, कान्ताका संग,
स्वजनकी ममता, दु.खहानि, बिछास, धर्मशास््र, देव गुरुमे भक्ति, पवित्रता,
संदाचारका अनुष्ठान यह सव प्राणियोंके पेट २रनेमें होते हें ॥ ९८ ॥
एवसुक्त्वा अन्येन गत्वा स पटहः स्पृष्टः । “भो ! अहं
तां कन्याम् उद्वाहचानि यदि राजा मे भ्रमच्छति” । ततस्तैः
राजपुरुषैः गत्वा राज्ञे निवेदितम, - “देव! अन्धकेन केनचित
पहः सृष्टः । तद विषये देवः प्रमाणम्? । राजा भाह-
(५१३) पश्चतन्त्रम् ।
ऐसा कहकर अन्धेने जाकर उस पटढको स्पर्श किया । “मो! मैं उस
कन्याको विवाहूंगा जो राजा मुझे कन्याको देगा'१ तब उन राजपुरुपान राजा-
से जाकर कहा- देव ! किसी अन्धने वह घोषणाका वाजा छुआ है) सो
इसमें देवही प्रमाण है? | राजा बोळा,-
अन्धा वा बाथ वाप कुछा वाप्यन्त्यजोऽपि वा ।
चातगृह्नातु ता कन्था सलक्षां स्याद्व्देशज ॥ ९९ ॥”
अन्धा, बहरा, कुछ, अन्त्यन ( नीच) कोईहो छाख भशरफी सहित
कन्पाकों ग्रहण करे ओर दशस बाहर हो ॥ ९९ |?
अथ राजादेशात् तः रक्षाएरुषेः तं नदीतीर नीत्वा सुव-
णलक्षेण समं विवाहविधिना निस्तनीं तस्मे दत्वा जल-
याने निधाय कवत्ताः ऑक्ताः-''भोः ! देशान्तरं नीत्वा
कास्माश्चित् अधिष्ठाने अन्धः सपत्नाकः कुब्जकेन सह
मोचनीयः । तथालुष्ठिते विदेशब आसाद्य कस्माशित
अधिष्ठाने केवत्तदरीते चयो5पि मूल्येन गृहं प्राताः झुखेन
कालं नयान्त स्म, कवलम अन्धः पय्यैके सुप्तः तिष्ठति !
गृह्व्यापारं मन्थरकः करोति, एव गच्छता कालेन निस्त
न्याः कुब्जकेन सह विक्रतिः समपद्यत । अथवा साधु इद”
मुच्यते,
तब राजाका आज्ञास उन राजपुर्घरान उस नदाक ।केनार रुजाकर ळाल
सुवणक साथ हा विवाह वायल वह तांन स्तनको कन्या उसे देकर नाव
बेठाय मलाहोंसे कहा-“भो | इन्हें देशान्तरमें ठेजाकर किसी स्थानें सतरीसहित
अन्धे कुबडेको छोडदो” ऐसा करनेपर विदेशको प्राप्त हो कैवर्तकके दिखाये किसा
स्थानम वे तीनों मूल्यके साथ घरक प्राप्त हुए सुखते समयको विताने छगे।
कवळ खन्या पठगक ऊपर साताह। रहेता । घरका काय्य कुडा करता इत
प्रकार समय जात त्रित्तनाक साथ लगडका ब्याभिचार प्रगट हुआ | अथवा
यह अच्छा कहा ह~
यदि स्याच्छीतलो वाहिश्रन्द्रषा दहनात्मकः ।
सुस्वादः सागरः स्रीणां तत्हतीत्वं प्रजायते ॥ १०० ॥
जो अग्नि शीतळ चद्र्मा जळामेवाला और सागर स्वादिष्ट हो तौ
कदाचित् ्नियोंमे सतीत्व होजाय || १०० |
भाषाटीकासमेतम । (५१३)
अथ अन्धेद्यः चिस्तन्या मन्थरको$मिहितः। “'भोः सुभग! ``
यादि एषः अन्धः कथाविद्वयापा्चते तत् आवयोः सुखेन
^ कालो याति, तदन्विष्यतां कुत्नचित विषं थेन अस्मे तअदढाय
(र
सुखिनी भवामि” । अन्यदा कुब्जकेन परिभ्रमता सृतः
कृष्णसर्पः प्राप्त:। तं गृहीत्वा प्रहृष्टमना यृहमभ्येत्य तामाह,-
“घुगे ! लब्धोऽयं कृण्णसपः। तदेनं खण्डशः कृत्वा प्रभूत-
शुण्ठयादिनिः संस्कार्य्य अस्मे विकलनेत्राय मत्स्यामिषं
भणित्वा प्रयच्छ थेन द्राक विनश्यति यत्तोऽस्थ मत्स्यस्य
आमिषं सदा मियम्? । एवसुक्त्वा मन्थरको बाह्ये गतः ।
सापि प्रदीते बहौ कुष्ण खण्डशः कुत्वा तकम् आदाय
गृह्व्यापाराकुला तं विकलाक्षं सपश्रयम्ुवाच,- “आर्य्य
पुत्र ! लव अभीष्टं मत्स्यमांसं समानीत यतः त्वं सदा एव
तत् पृच्छसि । ते च मत्स्या वह्नो पाचनाथ तिष्ठन्ति । तद्या-
वत् अहं गृहकृत्यं करोमि तावत् त्वं दर्वीम् आदाय क्षणमेकं
तान् प्रचाल्य” । सोऽपि तदाकण्य हृष्टमनाः सुक्कणी पारि
लिहन इतम् उत्याय दर्वी आदाय प्रमथितुमारब्धः । अथ
तस्य मत्स्यान् मथतो विषगभवाप्पेण संस्पृष्टं नीलपटलं चक्षु
भ्याम् अगलत् । असो अपि अन्धो बहुगुर्ण मन्यमानो
विशेषात् नेत्राभ्यां बाष्पग्रहणम् अकरोत्। ततो लब्धदृष्टि-
जातो यावत् पश्यति तावततक्रमध्ये कृष्णसपखण्डानि केव-
लानि एव अवलोकयाते । ततो ब्यचिन्तयव,- “अहो !
किमेतत् १ मम मत्स्यामिषं कथितमासीदनया, एतानि
तु कृष्णसपेखण्डाने । तत् तावत विजानामि सम्यक
न्िस्तन्धाः चेष्टितं कि मम वधोपायक्रमः कुब्जस्प बा,
उताहो अन्यस्य वा कस्यचित् ९” एवं विचिन्त्य स्वाकारं
गहन अन्धवत कर्म करोति यथा पुरा । अत्रान्तरे कुब्जः समा-
गत्य निःशंकतया आलिगनचुम्बनादिभिः निस्तनी सेवि-
तुम् उपचक्रमे। सोऽपि अन्धः तम् अवलोकयन् अपि यावत् न `
३३
(५१४) पञ्चतन्त्रस् । ..
किञ्चित् शस्तं पश्यति तावत् कोपव्याकुलमनाः पूर्ववत् शयनं
गत्वा कुब्जं चरणाभ्यां संगृह सामर्थ्यात् स्वमस्तकोपारि
स्रामयित्वा त्रिस्तनीं हृदये व्यताडयत् । अथ कुब्जमहारेण
तस्याः तृतीयः स्तन उरसि प्रविष्टः । तथा बलात मस्तको-
पारेख्रामणेन कुब्जः श्राअलतां गतः । अतोऽहं-बवीसि-
तब भोर दिन त्रिस्तवीने मन्धरकसे कहा,-“मो सुभग ! यदि यह अन्ध
किसी प्रकारसे मारा जाय तो हम दोनोंका समय सुखसे बीते, सो कही विषको
खाज करां जां इसे देकर में सुखी हं? तब- एक दिन कुबडने घुमते-हुए काढा
मराहुभा साप पाया, उसको ग्रहण- कर प्रस्न हुआ घरमे आकर उससे बोळा-
“भि सुभग ! यह काडा सांप रम्बा हे, सो इसे टुकड कर अनेक सांठभादि
मसालोंसे संस्कृत कर इस विकलनेत्रके निमित्त मच्छीका मॉस बताकर प्रदान
करूं । इससे झटही, यह नष्ट हो, जायगा | कारण एके ' इसको मत्स्यका मांस
सदा प्रिय है” । ऐसा कह मन्थरक बाहर गया । वह भी दातत अग्रिम काळे
सर्के टुकेड कर मद्ठामें डाल घरके' व्यापारं: व्याकुळ. ' हुईं उस 'चिकलाक्षते
नम्रतापूंषक बोरी ,-“भाय्यंपुत्र | यह तुम्हारा अभीष्ट मत्त्यमांत प्राप्त किया हे ।
जिसको तुम-सदाही- पुछा करते हो थे मत्य अभ्निमे पकानेको स्थित हैं सो
जबतक भ॑ घरका कार्य करूं, तबतक तुम करछुडी लेकर एक क्षणमात्रको उन्हे
चछा” | वह भो यह वचन सुन प्रसन्न मनसे जिद्वासे होठ चाटता इभा
शीघ्र उठ करछछीत चलाने रगा । तब उसको मतस्य मथतेमें विष ,गर्मसे, उठा
घुभा नेत्रोंके नील पटलको-छगता इभा, | तब यह अन्धा उसे बहुत उपकारक
मान्न विशेषकर नेत्रोंसे, ( १ ) बाष्प ग्रहण करता भया । तब इष्टिके प्राप्त होनेसे
जब देखने छगा, तब मड्टेके-बीचमं' केबल काळे सांपके टुकडही देखे. । तब
विचारने ठगा,-“भहो-यह क्या हे? इसने तो मुझे मत्स्यका मांत बताया
था ओर यह तो काढे सांपके खण्ड हं । सो, इस त्रिस्तनीकी चेष्टाको भळी
प्रकारसे, जानू? क्या यह मरे वघका उपाय हेया कुब्जकके वा किसी अन्यका£?
-एसा विचार कर; अपने,आकारको छिपाये इए भन्ध्रकी समान कम करने- ढगा
जस के पहले । इत समय कुन्जक आकर ।नइ्शकतास आलिंगन चुम्बना-
देस त्रेप्तनाका -सवने लगा | वह भा अन्धा उसका देखकर जब काई राख्न
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१ भाफ
भाषाटीकासमेततम्। (५१५)
न पाता इभा तबतक पूर्ववत शयन स्थानमें जाकर कुब्रडकी टागे पकड साम-
, -थ्येसे अपने मत्तकपर घुमाक्षर त्रिस्तनीके हृदयमें प्रहार करता हुआ । तब
` कुब्जके प्रहारसे उसका तीसरा स्तन हृदयमें प्रवेश कर गया झर बरसे मस्तकके
ऊपर घुमानेसे कुनडा सीधा होगया । इससे मैं कहता हू- ८०
अन्धकः कुव्जकश्वेव राजकन्या च न्िस्तनी ।
त्रयोऽप्यन्यायतः सिद्धाः सन्मुखे कर्मणि स्थिते ॥१०१॥”!
अन्वा, कुत्रडा भोर तीन स्तनवाळी राजकन्या यह तीयों सन्मुख कर्मकी
ह्थितिमें भन्यायसे सिद्ध इए ॥ १०० |?
सुवर्णसिद्धिः आह,-'“'भोः सत्यमेतत्, देवातुकूलतया
सवं कल्याणं सम्पद्यते । तथापि पुरुषेण सतां वचनं काय्येम।
न पुनः एवमेत्र वर्तेते स त्वामिज विनश्याति। .
सुवणीसिद्वि बोळा,-“मो ! यह सत्य हे, देवानुकूळतासे हब कार्थमें मगछ
होगा तो भी पुरुषको सतूपुर्पोके वचन करने चाहिये, न कि ऐसाही है यह
कहनेसे वह पुरुष तुम्हारी समान नए होगा ।
तथाच- , |
और देखो-
एकोद्रा? प्रथमजीवा अन्योऽन्यफलभाक्षिणः ।
असंहता विनश्यान्ति भारण्डा इव पाश्षिणः ॥ १०१ ॥ ??
एक उदर, पृथक् प्रीववाके परस्पर फलके भक्षण कर्ती मेळ न करनेसे भारण्ड
पक्षीकी समान नष्ट होते हैं ॥ १०१ |”
चक्रधर आइ),-“कथमेतद ? ” सोऽब्रवीत् ।
चक्र धर बोढा,- यह कैसे १? बह बोला-
कथा १४.
~ कस्मिश्चित् सरोवरे भारण्डनामा पक्षी एकोदरः प्रथग-
ग्रीवः प्रतिवसति स्म । तेन च समुद्रतीरे पारि्रमता किथित्
फलम् अमृतकल्पं तरङ्गाक्षितं .सम्भ्राक्तम् । सोऽपि भक्षयन्
इदमाह, “अहो! बहूनि मया अमृतम्रायाणि समुद्रकलोला-
हतानि फलानि भक्षितानि । परमपूर्वोऽस्य आस्वादः, तत
(५१६) पञ्चतस्त्रस् ।
कि पारिजातहारिचन्दनतससम्भर्व कि वा किश्चित् अमृत-
मयफलम् अव्यक्तेनापि विधिना पातितस। एवं तस्य बुवतो
द्वितीयसुखेन अभिद्दितम,- “को ! यदि एब तत ममापि
स्तोकं प्रयच्छ येन जिद्वासौख्यम् अतुभवामि” । ततो पिह-
स्य प्रथमवक्षेण अभिहितय,-' “आवयोः तावदेकं उदरं एका,
तृतिश्व भवति । ततः कि प्रथम्भाक्षितेन, वरमनेन शेषेण
प्रिया तोष्यते । एवं अभिधाय तेन शेषं भारण्डयाः प्रदत्त
सापि तत् अस्वाद्य प्रहतमा आलिङ्गनचुम्बनसम्भावनाने-
कचाटुपरा बभूव । द्वितीय सुखं तदिनादेब प्रभृति सोद्वेगं
सविषादश्च तिष्ठछि । अथ अन्येद्यः द्वितीयसुखेन विषफलं
प्राप्मम्। तद् दृष्टा अपरमाह,- “भो! निखिश पुरुषाधम निर-
पेक्ष! मया विषफलम् आसादितम्। तत तवापमानात अक्षया" `
मि”। अपरेण अभिहितम्, “मूर्ख ! मा मा एवं कुरु, एवं
कुले दयोरयि विनाशो भविष्यति? । अथ एवं वदता लेन
अपमानेन फळं भक्षितं कि बहुना, द्री अपि विनष्टो ।
अतोऽहं ब्रवीमि,
[केसा सरावरमं भारण्ड नामवाळा पक्षा एक उद्र भार दा शिखराला रहता
था । उसने सागरके किनारे घूमते हुए कोई फल समृतकी समान तरङ्गीस ।
फेका इभा प्राप्त किया वह भो उसे भक्षण करता यह बोळा,-“'अहो || बहुतते
मन अमृतका समान सागरका लहरस क्षत हुए फल खाय- ह परन्तु इसका
स्वाद अपूव हू । सा क्या पारजात हारचन्दनक वृक्षस उत्पन भा हं! क्या
कोई अमतमय फळ ? बा मरी अच्छी चोविस प्राप्त हुभा है” | इस- प्रकार उसके
' कहनस उसके दुसर सुख कहा मां यदि एसाह ता'सुझ भा धाडापा दा
जिसस जिहाका,सुख अनुभव करूंगा” | तब हसकर प्रथम सुखने कहा- हम
दोनोंका एकही उदर हे एकही तृप्ति. होती है । सो पथक् भक्षण करनेसे क्या
-हे इस शेषसे प्रियाको सन्तुष्ट करेगे”! | ऐसा कहकर: उसने , शेष भारण्डीको
“दिया ।“बहमी उसको खाकर प्रसन्न मनसे आलिंगन चुम्बनकी - सम्भावनास -अनेक
चाठु बचन कहती हुई । दूसरा सुख उसी दिन लेकर उद्वेग भोर .विषाद युक्त
सने लगी । तब और दिल दूसरे मुखने एक विष फळ, पाया | उसको देखकर
भाषाटीकासमेतम्। (५१७)
दूसरेसे बोला,--"हे निहुर पुरषेमि नांच! दरेक सुखको अपेक्षासे रहित ! मे
बिषफछ पापा है। सो तेरे अपमानते खाता ह”? दूसरेने कहा-“मूर्ख | ऐसा मत
करें | ऐसा करनेसे दोनोहीका वाश होगा”। तब ऐसा कहनेपरभी उसने अपमानते
फळ खा छिया | बहुत कहनेसे मया दोनोही नष्ट हुए । इससे में कहता ह-
एकोदराः पृथशग्रीवा अन्योऽन्यफलभक्षिणः ।
असंहता विनश्यन्ति भारण्डा इव पक्षिणः ॥ १०२ ॥
कि एक उदर पृथक् सुख परस्पर फळमक्षणकी, इन्छावाळे विना मेळके
भरण्ड पक्षीकी समान नष्ट होते हैं॥ १०२॥”
चक्रधर आह,- सत्यमेतत् । तद्गच्छ गुहम्, परमेकाकिना
न गन्तव्यम् । उक्तश्च)
चक्रधर बोला,=“बह सत्य है । सो घरको जाओ । परन्तु इकळे न जाना।
कहा है-
- एक! स्वादु न मुखीत नेकः सुतेष आशयात् ।
एको न गच्छेदध्वानं नेकश्चार्थात् ्रचिन्तयेत् ॥ १०३॥
स्वादु पदार्थ इकळा न खाय, सोते इमे इकळा न जागे इकछा मार्गमे न
जाय भौर इकळादी कार्थको न विचारे ॥ १४३ |
अपिच-
औरसी-
अपि कापुरुषो मार्ग द्वितीय! क्षेमकारकः ।
कर्कटेन द्वितीयेन जीवितं परिरक्षितम् ॥ १०४ ॥
मागम दूसरे कायर एुरुपकोभी साध छे जानेसे हित होता है, जैसे दूसरे सही
कर्कटचे जीवनकी रक्षा की॥ १०४ |”,
सुवर्णसिद्धिः आह,-''कथमेतत १” सोजबीत्,-
खणेसिद्धि बोढा,- यह केसे १! चक्रधर बोछा,-
शा कथा १५.
कार्रिमश्वित् अधिष्ठाने ब्रह्मदत्तनामा आहाणः प्रतिवसति
स्म+ स च प्रथोजनवशात मामे प्रस्थितः स्वमाचा अभिहि-
त~“ यत् वत्स ! क्थमेकाकी जसि ? तदन्विष्यतां कश्चित्
द्वितीय; । सहायः स आह,- अम्व ! मा भैषी; | निरुपद्र-
(९१८) पश्चतन्चस् ।
=
वोऽयं मागः, काय्यवशात एकाकी गमिष्यामि) । अथ तस्य
तं निश्चर्थ ज्ञात्वा समीपस्थवाप्याः सकाशात् ककेटम् आ
दाथ मात्रा अभिहितः, वत्स ! अवश्यं यदि गन्तव्यं
तदेष करकेटोऽपि सहायः भवतु । तत एनं गृहीत्वा गच्छ'
सोऽपि मातुर्वचनात उभाभ्यां पाणिभ्यां तं संगृहा कपूर ।
पुटेकामध्ये निधाय पात्रमध्ये संस्थाप्य शी प्रस्थितः ।
अथ गच्छन् ग्रीष्मोष्मणा सन्तप्तः काश्वित मागस्थं वृक्षम'
आसाद्य तन्नेव प्रसुतः । अत्रान्तरे वृक्षकोटरात् निर्गत्य सप!
श्तत्समीपम् आगतः । सोऽपि कपरसुगन्धसहजग्रियत्वात् तं
पारित्यज्य बर्खे विदाय्य अभ्यन्तरगता कर्परपुटिकामातिलोः|
ल्यात असक्षयत् । सोऽपि करकटः तत्रेव स्थितः सन् सपप्रा!
णान् अपाहरत । ब्राह्मणोऽपि यावत प्रबुद्धः पश्यति तावत
सोपे कृष्णसपों निजपाशों कपूरपुटिकोपारे स्थितः तिष्ठति!
तं इष्टा व्याचिन्तयत् ।” कर्कटेन अयं हत इति प्रसन्नो भूत्वा
अनवीव;,-“'भोः सत्यम् अभिहितं मम भात्रा यत पुरुषेण
कोऽपि सहायः काय्यों न एकाकिना गंतव्यस” । यतो मया
श्रद्वापारितचेतसा तद्वचनम् अतुष्ठितम्। तेनाहं ककटेन सर्प
व्थापादनात रक्षितः । अथवा साध इदझुच्यते- " "
कित्ता स्थान ब्रह्मदत्तनामक ब्राह्मण रहता था | वह प्रयाजनस गांबका जाच
लगा तत्र उसका मातान कहा, पुत्र | क्यो इकळा जाता हे [2 सा कोई
दुसरा सहायक खोजो” । वह बोढा,-“मा | मत डरो, यह: मागे उपद्रबरहित
है । कार्यवशस इकलाहा जाऊंगा ११ | तब उसके इस ।वश्चयका जानकर सर्माप
स्थित बावडीमसे ककडको ठाकर माताम कहा- पुत्र | यदि अवस्य जातेहा
होता तां यह ककडामा तुम्हारा सहायक हांगा | सा इसका छकर जाभा”
वहम माताक वचनस दाना हाथास उसका ग्रहण कर करको पटका ( थला |
में डाल पात्रम रखकर शात्रतास चढ़ा | तव जात हुए गरमाका ज्वाटास
घवडाकर किसा मागम स्थित वृक्षका प्राप्त हॉकर वहां सांगया । इसा समय;
बन्नका खखाडळमत !नकछ कर सप उसक समीप आया, बहमा कूर सुग
न्विको स्वभावसे प्यार करनेसे, उसे छोड ल्लको विदीण कर भीतर धरी दुई ।
कपूरकी पोटली आति चपळतासे भक्षण करनेछगा । वह केंकड उसमें 'स्थित.
भाषारीकासमेतम् । (५१९)
हुआ सपके प्राण हरता हुआ । जाह्मण भा जवतक जागकर देखता हे ता
समीपही काळा ताप अपने विकट कारक पोटळीके ऊपर स्थित ह । कक
टने इसको मारा” ऐसा विचारकर प्रसन्न होकि बोल,--“मो ! मेरी माताने
“यू कहाथा कि. जो “पुरुषको लोई संदावकार रखना चाहिय इकछे च जाता
चाहिये? | सोर जो मैंने भ्रद्धाते णे वितले उसके वचन माच । इतात सं
ककेटद्रारा सपको मारतेसे वचा । अथवा बह अच्छा कहा हेन
। क्षीणः खर्वाते शशी रविदद्धा वद्धयात पयसा नाथम् ।
अन्य एदपाद सहाया धानना खियमच्चुभवन्त्यत्यं ॥ १०५
आदमी विपत्ति आवपर सहायता करवत्राठ और हातह तथा सपायक
प्रनुमव तो आही करतह, जेते सूउक्तों सहाबतात बढाइ चन्द्रमा क्वाण
निपरमी जदतकों व्योताह भोर समुद्रकों बडाताहे ॥ १०९ ॥
मन्ते तीर्थे द्विजे देवे देवसे भेषजे गरा!
यादृशी भावना यस्य सिद्धिसँचति ताइशी ॥ १०६ ॥
मन्त्र, तीये, त्राह्मग, देवता, स्योतिषा, आवा, शुद इतय जसी जितकी
गवना होती है वसेह सिद्धि होती ह ॥ १०६ ॥
एवसुस्त्वा असौ त्राह्मणो यथाभिमेतं गतः । . अतो$ई
प्रवीमि-
ऐसा कह यह ब्राग भमिडीपत सातको गया । इससे मैं कहता हूँ-
४८ अपि कापुरुषो मार्गे द्वितीयः क्षेमकारकः
कर्ददेन द्वितीयेन सपात्पान्यः अरक्षितः ॥ १०७ ॥?'
“पक्के कापर पुस्य भी मागम दूरा ।इंक्कारक हाता छ दूर वाकडन वठा-
हीको उपसे रक्षा का ॥ १०७॥
एवं श्रत्वा सुवर्णसिद्धिः तमतुज्ञाप्य स्वगृहं प्रति निद
यह सुनकर सुवर्णाताद उसको व्गशस अपन घर्न प्रात गग
डात श्राविष्युङसाबरा बच पच्चतन्जक अपसाक्षद*
~ आर्क सास एमे तन्त्रं ससाम्रम्।
नि आविष्युश्षमनिरचिते पंचतंब्रके गडितच्वालाप्रशरमिश्रक्षनमापोद्जाबा
न
अअ्रीन्िदकास्कत ( विनासिचारेकरना ) यान अन्दर उमातम, ।
॥ झुभ भवतु ॥
(५२० ) पश्व॑तन्त्रस ।
दोहा-सीतापति रघुनाथश्री, भरत छषण हनुमान ।
हिये शद्ुसूदन सुमरि, सञजनको सुखदान॥ १॥
पश्वतन्त्रभाषा तिलक, कीन्हों मति अनुसार । _ |
बारबार शिवपद सुभर, बुधजन प्राण अधार ॥ २
रामनवमि लिथिमेषरवि, किधो संक्रमण आज!)
प्रेम सहित पूजे सबन, अवधराज महाराज ॥ ३ ॥
सम्वत् युगशर अंकविधु, चेचशुकझ रविवार। ,
नवमीतिथिको ग्रथ यह, कीन्हों पूर्ण विचार ॥ ४ ॥
वसत राम गंगा निकट, नगर घुरादाबाद् ।
कियो तिलक अतिशोध कर, द्विज.उवालाम्रसाद॥६ |
वेंकटेश्वर यंत्र पाते, खेमराज गुणवान ।
तिनको कीन्हों भेट यह, सकलसुमंगल खाम ॥ ६
रामराम सियराम कहु, रामराम सियराम। ।
राम राम के कहतही, सिद्ध होत सब काम ॥ ७॥.
बहुरिशारदा शिवाश्री, जगदम्बा शुणगाय ।
करहुं आर्थना जोरकर, कीजे सदा सहाय ॥ ८ ॥
सन्तसमागम जगतमें, सकल सुर्मगल सूल ।
करहि जो तिनपर लषन युत, राम रहहि अनुकूल ॥९॥
॥ शुभमस्तु ॥
पञ्चतन्त्रं भाषाटीकासमेतं समाप्तम् ।
पुस्तक मिलनेकां ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
““रीबिङकटेः्वर'' स्टीम भेस-बंबई «